वाजपेयी ने दी भारत को नव विकास की गारंटी”, अटल जी को पीएम मोदी ने यूं किया याद
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* आज यानी 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई का 100वां जन्म दिवस है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दिग्गज नेता अटल बिहारी जन्‍म के शताब्दी वर्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्‍हें याद करते हुए देश के लिए उनके योगदान को याद किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनकी कविताओं की साहसिक लाइन को याद किया। उन्होंने लिखा कि मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं…लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? अटल जी के ये शब्द कितने साहसी, कितने गूढ़ हैं? अटल जी, कूच से नहीं डरे, उन जैसे व्यक्तित्व को किसी से डर लगता भी नहीं था। पीएम मोदी ने आगे लिखा है, वह यह भी कहते थे...जीवन बंजारों का डेरा आज यहां, कल कहां कूच है..कौन जानता किधर सवेरा। आज अगर वह हमारे बीच होते, तो अपनी जन्मतिथि पर नया सवेरा देख रहे होते। मैं वह दिन नहीं भूलता, जब उन्होंने मुझे पास बुलाकर अंकवार में भर लिया था और जोर से पीठ पर धौल जमा दी थी। वह स्नेह, वह अपनत्व, वह प्रेम मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा है। पीएम मोदी ने राजनितिक अस्थिरता के दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व की सरहना की और कहा कि 21वीं सदी को भारत की सदी बनाने के लिए उनकी एनडीए सरकार ने जो कदम उठाए, उसने देश को एक नई दिशा, नई गति दी। 1998 के जिस काल में उन्होंने पीएम पद संभाला, उस दौर में पूरा देश राजनीतिक अस्थिरता से घिरा हुआ था। 9 साल में देश ने चार बार लोकसभा के चुनाव देखे थे। लोगों को शंका थी कि ये सरकार भी उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाएगी। ऐसे समय में एक सामान्य परिवार से आने वाले अटल जी ने, देश को स्थिरता और सुशासन का मॉडल दिया। भारत को नव विकास की गारंटी दी। *ऐसे नेता, जिनका प्रभाव भी आज तक अटल-पीएम मोदी* वो ऐसे नेता थे, जिनका प्रभाव भी आज तक अटल है। वो भविष्य के भारत के परिकल्पना पुरुष थे। उनकी सरकार ने देश को आईटी, टेलीकम्यूनिकेशन और दूरसंचार की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ाया। उनके शासन काल में ही, एनडीए ने टेक्नॉलजी को सामान्य मानवी की पहुंच तक लाने का काम शुरू किया। भारत के दूर-दराज के इलाकों को बड़े शहरों से जोड़ने के सफल प्रयास किये गए। वाजपेयी जी की सरकार में शुरू हुई जिस स्वर्णिम चतुर्भुज योजना ने भारत के महानगरों को एक सूत्र में जोड़ा वो आज भी लोगों की स्मृतियों पर अमिट है। *लोकल कनेक्टिविटी को बढ़ाया-पीएम मोदी* लोकल कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए भी एनडीए गठबंधन की सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसे कार्यक्रम शुरू किए। उनके शासन काल में दिल्ली मेट्रो शुरू हुई, जिसका विस्तार आज हमारी सरकार एक वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के रूप में कर रही है। ऐसे ही प्रयासों से उन्होंने ना सिर्फ आर्थिक प्रगति को नई शक्ति दी, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों को एक दूसरे से जोड़कर भारत की एकता को भी सशक्त किया। *अटल सरकार में भाई-भतीजावाद में फंसी देश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिली-पीएम मोदी* जब भी सर्व शिक्षा अभियान की बात होती है, तो अटल जी की सरकार का जिक्र जरूर होता है। शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मानने वाले वाजपेयी जी ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहां हर व्यक्ति को आधुनिक और गुणवत्ता वाली शिक्षा मिले। वो चाहते थे भारत के वर्ग, यानि ओबीसी, एससी, एसटी, आदिवासी और महिला सभी के लिए शिक्षा सहज और सुलभ बने। उनकी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई बड़े आर्थिक सुधार किए। इन सुधारों के कारण भाई-भतीजावाद में फंसी देश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिली। उस दौर की सरकार के समय में जो नीतियां बनीं, उनका मूल उद्देश्य सामान्य मानवी के जीवन को बदलना ही रहा।
अब केजरीवाल के संजीवनी योजना और महिला सम्मान योजना पर उठे सवाल, जानें क्या है पूरा मामला?

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दिल्ली में केजरीवाल सरकार की महिला सम्मान योजना और संजीवनी योजना को लेकर सवाल उठने लगे हैं। दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग ने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा घोषणा की गई योजना को लेकर एक नोटिस जारी किया है। इस नोटिस के जारी किए जाने के बाद अब संजीवनी योजना और महिला सम्मान योजना पर अब सवाल खड़े हो गए हैं।दिल्ली के सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने एक पब्लिक नोटिस जारी कर कहा है कि राज्य में अभी तक ऐसी कोई योजना नहीं है। ऐसे में कोई भी नागरिक अपनी निजी जानकारी किसी व्यक्ति के साथ साझा न करें।

दिल्ली सरकार के महिला और स्वास्थ्य विभाग ने महिला सम्मान योजना और संजीवनी योजना को लेकर कहा है कि ये योजनाएं उनके पास अधिसूचित नहीं हैं। अधिसूचित होने पर दिल्ली सरकार स्वयं इसके लिए पोर्टल शुरू करेगी और पंजीकरण कराएगी। इन योजनाओं को लेकर जारी किए गए नोटिस में कहा गया है कि महिला एवं बाल विकास विभाग, दिल्ली सरकार को मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स के माध्यम से यह जानकारी मिली है कि एक राजनीतिक पार्टी दिल्ली की महिलाओं को मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना के तहत प्रति माह 2100 रुपये देने का दावा कर रही है। यह स्पष्ट किया जाता है कि दिल्ली सरकार द्वारा ऐसी कोई योजना अधिसूचित नहीं की गई है। यदि और जब ऐसी कोई योजना अधिसूचित की जाती है, तो महिला एवं बालविकास विभाग, दिल्ली सरकार पात्र व्यक्तियों के लिए एक डिजिटल पोर्टल लॉन्च करेगा, ताकि वे अनुमोदित दिशा-निर्देशों के अनुसार अपनी आवेदन ऑनलाइन प्रस्तुत कर सकें। पात्रता की शर्ते और कार्यविधि विभाग द्वारा समय-समय पर स्पष्ट रूप से अधिसूचित की जाएंगी।

नोटिस में कहा गया है कि ऐसी कोई योजना अस्तित्व में नहीं है, इसलिए इस गैर- मौजूद योजना के तहत पंजीकरण के लिए फॉर्म/आवेदन के स्वीकार का सवाल ही नहीं उठता। कोई भी निजी व्यक्ति/राजनीतिक पार्टी जो इस योजना के नाम पर फॉर्म आवेदन एकत्रित कर रहा है या आवेदकों से जानकारी एकत्र कर रहा है, वह धोखाधड़ी कर रहा है और उसके पास कोई अधिकार नहीं है। नागरिकों को सावधान किया जाता है कि इस योजना के नाम पर व्यक्तिगत विवरण जैसे बैंक खाता जानकारी, वोटर आईडी कार्ड, फोन नंबर, आवासीय पता या कोई अन्य संवेदनशील जानकारी साझा करना सार्वजनिक डोमेन में जानकारी लीक होने का खतरा पैदा कर सकता है, जो अपराध/साइबर अपराध बैंकिंग धोखाधड़ी का कारण बन सकता है। इस स्थिति में नागरिक पूरी तरह से अपने जोखिम पर होंगे और उन्हें किसी भी तरह के परिणामों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

हाल ही में केजरीवाल ने की थी घोषणा

इस योजना के तहत अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली की मुख्यमंत्री अतिशि की सरकार केंद्र शासित प्रदेश की महिलाओं को हर माह एक हजार रुपये की सहायता करेगी। इसके साथ ही दिल्ली में आप की दोबारा सरकार बनने के साथ इस योजना के तहत सहायता राशि बढ़ाकर 2100 रुपये कर दी जाएगी।

इसके साथ ही अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में बुजुर्गों के इलाज के लिए संजीवनी योजना शुरू की गई है। इस योजना के लिए 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों को पूरी तरह मुफ्त ईलाज की व्यवस्था है। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी नोटिस में इस योजना को लेकर भी सचेत किया गया है।

केरीवाल ने दी प्रतिक्रिया

दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल कल्याण विभाग और स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी नोटिस को लेकर अरविंद केजरीवाल ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे लेकर सोशल मीडिया साइट एक्स पर एक पोस्ट लिखा है। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि महिला सम्मान योजना और संजीवनी योजना से ये लोग बुरी तरह से बौखला गए हैं। अगले कुछ दिनों में फ़र्ज़ी केस बनाकर आतिशी जी को गिरफ्तार करने का इन्होंने प्लान बनाया है उसके पहले “आप” के सीनियर नेताओं पर रेड की जायेंगी आज 12 बजे इस पर प्रेस कांफ्रेंस करूंगा।

मुझे ज़ोमैटो बहुत पसंद है लेकिन’: दिल्ली के ग्राहक की डिलीवरी एजेंट से बातचीत के बाद दीपिंदर गोयल से अपील

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ज़ोमैटो डिलीवरी एग्जीक्यूटिव और दिल्ली के एक निवासी के बीच हुई दिल को छू लेने वाली मुलाकात ने सोशल मीडिया का ध्यान खींचा है। दिल्ली में रहने वाले हिमांशु बोहरा, शिवा सरकार नामक एक युवा डिलीवरी एग्जीक्यूटिव से मिलने के बाद बहुत दुखी हुए, जो अपने पिता के निधन के बाद अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए अथक परिश्रम करता है।

यह कहानी बोहरा द्वारा लिंक्डइन पर पोस्ट की गई, जिसका शीर्षक था “शिव सरकार की कहानी।” उन्होंने बताया कि एक रात, सुबह 3 बजे काम खत्म करने के बाद, उन्होंने ज़ोमैटो के ज़रिए खाना ऑर्डर किया। जब दरवाज़े की घंटी बजी, तो उन्होंने दरवाज़ा खोला और पाया कि शिवा सरकार बाहर कड़ाके की ठंड के बावजूद एक गर्मजोशी भरी मुस्कान के साथ उनका ऑर्डर डिलीवर कर रहे थे। फिर भी, बोहरा को उस युवक के व्यवहार में एक अनकही भारीपन महसूस हुआ।

त्याग का जीवन

सरकार को अंदर बुलाते हुए, बोहरा ने उन्हें पानी दिया और धीरे से उनका हालचाल पूछा। तब उस युवक ने अपने संघर्षों के बारे में बताया। अपने पिता को खोने के बाद, उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कक्षा 8 में ही स्कूल छोड़ना पड़ा। अब, वह अपनी छोटी बहनों की शादी के लिए पैसे बचाने के लिए डिलीवरी एग्जीक्यूटिव के तौर पर लंबे समय तक काम करते हैं।

बोहरा ने लिखा, "मैं उनकी ताकत देखकर दंग रह गया।" "यह युवक, जिसे अपनी आकांक्षाओं का पीछा करना चाहिए, इसके बजाय अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए समय के खिलाफ़ दौड़ रहा है, और वह भी ऐसे दृढ़ संकल्प के साथ जिसकी केवल प्रशंसा की जा सकती है।" बोहरा ने सरकार जैसे कई युवा व्यक्तियों के बारे में बताया, जो अपने परिवारों को पालने के लिए अपने सपनों का त्याग करते हैं। उन्होंने एक मार्मिक सवाल भी उठाया: समाज ऐसे व्यक्तियों की कैसे मदद कर सकता है?

बदलाव की अपील

अपने पोस्ट में ज़ोमैटो के सीईओ दीपिंदर गोयल को संबोधित करते हुए, बोहरा ने डिलीवरी एग्जीक्यूटिव के लिए अपस्किलिंग प्रोग्राम, स्कॉलरशिप या आसान लोन जैसी पहल का सुझाव दिया। उन्होंने पूछा, "क्या होगा अगर ये डिलीवरी एग्जीक्यूटिव फिर से सपने देख सकें? क्या वे ऐसे कौशल सीख सकें जो जीविकोपार्जन करते हुए उज्जवल भविष्य के द्वार खोल सकें?"

वायरल पोस्ट और प्रतिक्रियाएं

सरकार की एक तस्वीर (उनकी सहमति से शेयर की गई) के साथ पोस्ट तेज़ी से वायरल हो गई। ज़ोमैटो ने जवाब दिया, बोहरा की कहानी को उजागर करने के

लिए धन्यवाद दिया और डिलीवरी पार्टनर को सीधे प्रशंसा व्यक्त करने के लिए ऑर्डर आईडी का अनुरोध किया। सोशल मीडिया उपयोगकर्ता भी उतने ही भावुक थे। “यही कारण है कि मानवता मायने रखती है,” एक ने लिखा। दूसरे ने टिप्पणी की, “शिव की कहानी हम सभी को कड़ी मेहनत को महत्व देने के लिए प्रेरित करती है।” एक उपयोगकर्ता ने प्रणालीगत बदलावों का आह्वान करते हुए कहा, “अब समय आ गया है कि कंपनियाँ अपने फ्रंटलाइन कर्मचारियों में निवेश करें।”

पाकिस्तान और BRICS: रणनीतिक रिश्ते और भविष्य की संभावनाएँ

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पाकिस्तान का BRICS (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, और दक्षिण अफ्रीका) के साथ संबंध जटिल रहा है, जिसमें देश सदस्य नहीं है, लेकिन विभिन्न तरीकों से इस समूह के साथ जुड़ा हुआ है। यहाँ इस संबंध का एक अवलोकन है:

1. गैर-सदस्य स्थिति:

पाकिस्तान BRICS का सदस्य नहीं है। इस समूह की शुरुआत 2006 में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन (BRIC) से हुई थी, और दक्षिण अफ्रीका 2010 में शामिल हुआ। हालांकि पाकिस्तान ने इस समूह में शामिल होने की इच्छा जताई है, खासकर इसके आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व के कारण, लेकिन इसे अब तक पूर्ण सदस्य बनने का निमंत्रण नहीं मिला है। यह सदस्यता न मिलने की एक बड़ी वजह भारत के साथ क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा है, जो BRICS का एक मुख्य सदस्य है।

2. आर्थिक संलिप्तता:

सदस्य न होने के बावजूद, पाकिस्तान BRICS के कई देशों के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंध बनाए रखता है। यह चीन, जो BRICS के भीतर प्रमुख साझेदार है, के साथ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) के ढांचे में जुड़ा हुआ है, जो पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को चीन के शिनजियांग क्षेत्र से जोड़ता है। यह रणनीतिक गठबंधन पाकिस्तान को क्षेत्रीय आर्थिक गतिवधियों में महत्वपूर्ण बनाता है, जिससे यह अप्रत्यक्ष रूप से चीन के माध्यम से BRICS से जुड़ा हुआ है।

3. भारत के साथ संबंध:

BRICS में भारत की सदस्यता पाकिस्तान के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि दोनों देशों के बीच कश्मीर को लेकर लंबी प्रतिस्पर्धा रही है। इस प्रतिस्पर्धा के कारण, पाकिस्तान का BRICS में शामिल होने का प्रयास अक्सर विफल होता है। भारत के साथ कूटनीतिक और भू-राजनीतिक तनाव की वजह से पाकिस्तान के लिए BRICS में सदस्यता पाना मुश्किल है।

4. कूटनीतिक और रणनीतिक हित:

पाकिस्तान ने विभिन्न तरीकों से BRICS के साथ जुड़ने की कोशिश की है। यह कुछ BRICS आउटरिच सम्मेलनों में दक्षिण एशियाई क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के रूप में शामिल हुआ है, लेकिन जब भी भारत से जुड़ी संवेदनशील समस्याएँ उठती हैं, तो इसे अक्सर मुख्य चर्चाओं से बाहर रखा जाता है। रूस के साथ पाकिस्तान के संबंधों में वृद्धि हो रही है, और दोनों देशों ने रक्षा और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने में रुचि दिखाई है। यह बढ़ता हुआ संबंध BRICS से पाकिस्तान की अप्रत्यक्ष भागीदारी के लिए अवसर खोल सकता है।

5. चीन की भूमिका:

BRICS में चीन का प्रभाव पाकिस्तान के इस समूह के साथ संबंधों में एक महत्वपूर्ण कारक है। पाकिस्तान ने चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है, और यह रणनीतिक साझेदारी पाकिस्तान के व्यापक कूटनीतिक रुख को प्रभावित करती है। जबकि BRICS स्वयं पाकिस्तान को औपचारिक रूप से शामिल नहीं करता है, पाकिस्तान का चीन के साथ संबंध अक्सर इसे विभिन्न द्विपक्षीय और क्षेत्रीय संदर्भों में समूह के करीब लाता है।

6. भविष्य की संभावनाएँ:

भविष्य में BRICS के विस्तार को लेकर चर्चा रही है, और पाकिस्तान, ईरान जैसे देशों ने इसमें शामिल होने की इच्छा जताई है। हालांकि, BRICS के निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल है, और कोई भी विस्तार मौजूदा सदस्य देशों के हितों को संतुलित करना होगा, खासकर भारत और चीन के, जो इस समूह की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पाकिस्तान का BRICS के साथ संबंध मुख्य रूप से अप्रत्यक्ष है, लेकिन यह चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी और भारत के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा से प्रभावित होता है। जबकि यह औपचारिक संरचना से बाहर है, पाकिस्तान व्यापार, ऊर्जा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के माध्यम से BRICS देशों के साथ द्विपक्षीय आधार पर जुड़ा हुआ है, खासकर चीन के साथ। पाकिस्तान की BRICS में भागीदारी के लिए भविष्य की संभावनाएँ व्यापक भू-राजनीतिक परिवर्तनों पर निर्भर करती हैं, जिसमें चीन, भारत और अन्य प्रमुख वैश्विक खिलाड़ियों के बीच बदलते हुए रिश्ते शामिल हैं।

पनामा नहर की क्या है अहमियत, अमेरिका के कंट्रोल की दी धमकी, ट्रंप के बयान से मची खलबली

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अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पनामा नहर पर नियंत्रण वापस लेने के बयान से विवाद खड़ा हो गया है। ट्रंप ने रविवार को कहा कि उनका प्रशासन पनामा नहर पर नियंत्रण हासिल करने का प्रयास कर सकता है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा से कहा है कि वह पनामा नहर की फीस कम करे या तो उस पर नियंत्रण अमेरिका को वापस कर दे। ट्रंप ने आरोप लगाया कि मध्य अमेरिकी देश पनामा अमेरिकी मालवाहक जहाज़ों से ज़्यादा क़ीमत वसूल रहा है। वहीं पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने इस धारणा को अपने देश की संप्रभुता का अपमान बताते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया।

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ट्रंप के पास अगले महीने अमेरिका की कमान आने वाली है।इससे पहले ट्रंप ने रविवार को कहा कि उनका प्रशासन पनामा नहर पर नियंत्रण हासिल करने का प्रयास कर सकता है जिसे अमेरिका ने ‘मूर्खतापूर्ण’ तरीके से अपने मध्य अमेरिकी सहयोगी को सौंप दिया था। ट्रंप ने अपनी इस बात के पीछे तर्क दिया कि अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ने वाली इस अहम नहर से गुजरने के लिए जहाजों से ‘बेवजह’ शुल्क वसूला जाता है।

एरिजोना में ‘टर्निंग प्वाइंट यूएसए अमेरिकाफेस्ट’ में समर्थकों को संबोधित करते हुए ट्रंप ने ये बातें कहीं। पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने इस धारणा को अपने देश की संप्रभुता का अपमान बताते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया। साथ ही कहा कि पनामा कभी भी सौदेबाजी का विषय नहीं होगा। पनामा के राष्ट्रपति मुलिनो ने ट्रंप के बयान को खारिज कर कहा, 'नहर और उसके आसपास का हर वर्ग मीटर पनामा का है और पनामा का ही रहेगा। पनामा के लोगों के कई मुद्दों पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन जब हमारी नहर और हमारी संप्रभुता की बात आती है तो हम सभी एकजुट हैं। इसलिए नहर का नियंत्रण पनामा का है और यह कभी भी सौदेबाजी का विषय नहीं होगा।'

पनामा नहर अहम क्यों?

82 किलोमीटर लंबी पनामा नहर अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ती है। हर साल पनामा नहर से क़रीब 14 हज़ार पोतों की आवाजाही होती है। इनमें कार ले जाने वाले कंटेनर शिप के अलावा तेल, गैस और अन्य उत्पाद ले जाने वाले पोत भी शामिल हैं। पनामा की तरक़्क़ी का इंजन उसकी यही नहर है। पनामा के पास जब से नहर का नियंत्रण आया है, तब से उसके संचालन की तारीफ़ होती रही है। पनामा की सरकार को इस नहर से हर साल एक अरब डॉलर से ज़्यादा की ट्रांजिट फीस मिलती है। हालांकि पनामा नहर रूट से कुल वैश्विक ट्रेड का महज पाँच फ़ीसदी करोबार ही होता है।

अमेरिका ने पनामा को क्यों सौंपी थी नहर

अमेरिका ने 1900 के दशक की शुरुआत में इस नहर का निर्माण किया था। उसका मकसद अपने तटों के बीच वाणिज्यिक और सैन्य जहाजों के आवागमन को सुविधाजनक बनाना था। 1977 तक इस पर अमेरिका का नियंत्रण था। इसके बाद पनामा और अमेरिका का संयुक्त नियंत्रण हुआ लेकिन 1999 में इस पर पूरा नियंत्रण पनामा का हो गया था। अमेरिका ने 1977 में राष्ट्रपति जिमी कार्टर द्वारा हस्ताक्षरित एक संधि के तहत 31 दिसंबर 1999 को जलमार्ग का नियंत्रण पनामा को सौंप दिया था।

पनामा नहर विवादों में क्यों?

यह नहर जलाशयों पर निर्भर है और 2023 में पड़े सूखे से यह काफी प्रभावित हुई थी, जिसके कारण देश को इससे गुजरने वाले जहाजों की संख्या को सीमित करना पड़ा था। इसके अलावा नौकाओं से लिया जाने वाला शुल्क भी बढ़ा दिया गया था। इस वर्ष के बाद के महीनों में मौसम सामान्य होने के साथ नहर पर पारगमन सामान्य हो गया है लेकिन शुल्क में वृद्धि अगले वर्ष भी कायम रहने की उम्मीद है।

पाकिस्तान को बड़ा झटकाः ब्रिक्स के पार्टनर कंट्रीज की लिस्ट में भी नहीं मिली जगह, भारत के वीटो के आगे हुआ पस्त

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ब्रिक्स में सदस्यता पाने का ख्वाब देखने वाले पाकिस्तान का सपना चूर हो गया है। पाकिस्तान की ब्रिक्स की सदस्यता पाने की उम्मीदों को भारत के सख्त विरोध ने चकनाचूर कर दिया है। भारत के कड़े विरोध की वजह से पाकिस्तान न सिर्फ ब्रिक्स की सदस्यता से वंचित हुआ, बल्कि उसे पार्टनर कंट्रीज की सूची में भी जगह नहीं मिल पाई। इस बीच, तुर्किए ने खुद को ब्रिक्स पार्टनर कंट्रीज की सूची में शामिल कराकर महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त किया है।

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रूस ने हाल ही में 13 नए पार्टनर कंट्रीज की घोषणा की है। रूस ने इन 13 देशों को ब्रिक्‍स में पार्टनर कंट्री बनने का न्‍योता भेजा है जिसमें से 9 ने इसकी पुष्टि कर दी है। ये नौ देश हैं- बेलारूस, बोलविया, इंडोनेशिया, कजाखस्‍तान, क्‍यूबा, मलेशिया, थाइलैंड, यूगांडा, उज्‍बेकिस्‍तान। ये पार्टनर कंट्रीज आगे चलकर ब्रिक्‍स के सदस्‍य बनेंगे। ये देश 1 जनवरी 2025 से ब्रिक्स के पार्टनर कंट्रीज बनेंगे

चीन-रूस का समर्थन भी नहीं आया काम

हालांकि, इन 13 देशों में पाकिस्‍तान का नाम नहीं है। पाकिस्तान, जो चीन और रूस के समर्थन से ब्रिक्स में प्रवेश की कोशिश कर रहा था, इस सूची में अपनी जगह बनाने में असफल रहा।

ब्रिक्स में भारत का सख्त रुख

भारत का विरोध पाकिस्तान की ब्रिक्स में सदस्यता के प्रयासों के लिए सबसे बड़ा अवरोध साबित हुआ। पाकिस्तान ने ब्रिक्स में शामिल होने के लिए चीन और रूस से समर्थन प्राप्त किया था, लेकिन भारत ने साफ तौर पर इसका विरोध किया। ब्रिक्स के नए सदस्य देशों को शामिल करने के लिए सभी संस्थापक सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। भारत ने पाकिस्तान की दावेदारी का कड़ा विरोध किया, जिससे उसके लिए दरवाजे बंद हो गए। भारत का यह विरोध पाकिस्तान की विदेश नीति के कमजोर पक्ष को उजागर करता है। भारत के सख्त रुख के कारण पाकिस्तान के लिए ब्रिक्स का दरवाजा बंद हो गया।

कश्‍मीर को लेकर तुर्की के बदले रूख का असर?

ब्रिक्‍स के 13 नए पार्टनर कंट्रीज का ऐलान हो गया है जिसमें सबसे बड़ा फायदा तुर्की को हुआ है। इन दिनों कश्‍मीर मुद्दे को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर उठाने से परहेज कर रहे तुर्की को पार्टनर कंट्रीज में जगह मिल गई है। माना जा रहा है कि कश्‍मीर को लेकर तुर्की के राष्‍ट्रपति एर्दोगन के रुख में आए बदलाव की वजह से भारत ने ब्रिक्‍स में उसकी दावेदारी का विरोध नहीं किया।

राजनयिक लचीलापन और रणनीतिक समायोजन

विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की की ब्रिक्‍स में भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि कूटनीतिक लचीलापन और रणनीतिक समायोजन के माध्यम से देशों को महत्वपूर्ण कूटनीतिक लाभ मिल सकता है। तुर्की ने अपने कूटनीतिक रिश्तों में लचीलापन दिखाते हुए भारत के साथ अपने पुराने मतभेदों को सुलझाने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने तुर्की के पक्ष में सहमति जताई। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने अपने राजनयिक प्रयासों में उस लचीलापन और समायोजन का इस्तेमाल नहीं किया, जिससे उसे इस अवसर का लाभ मिल सकता था। पाकिस्तान को अब अपनी कूटनीतिक रणनीतियों पर पुनर्विचार करना होगा।

ब्रिक्‍स में पाकिस्‍तान की बड़ी व‍िफलता

ब्रिक्स के पार्टनर कंट्रीज में भी पाकिस्तान को जगह नहीं मिलने की बड़ी वजह उसकी विदेश नीति है। कुछ पाकिस्‍तानी विश्लेषकों भी ये बात मानते हैं। पाकिस्‍तान की विदेश मामलों की जानकार और चर्चित पत्रकार मरियाना बाबर ने एक्‍स पर लिखा', ' यह पाकिस्‍तान के विदेश मंत्रालय की पूरी तरह से विफलता है। वह भी तब जब इशाक डार विदेश मंत्री हैं जिनकी विदेशी मामलों में सबसे कम रुच‍ि है। यहां तक कि नाइजीरिया ने पाकिस्‍तान से बेहतर किया है। पाकिस्‍तान को रूस, चीन और भारत ने ब्रिक्‍स से बाहर रखा।' बता दें कि इशाक डार नवाज शरीफ के समधी और मरियम नवाज के ससुर हैं। इशाक डार पहले वित्‍त मंत्री हुआ करते थे लेकिन अब उन्‍हें शहबाज शरीफ के विरोध के बाद मजबूरन विदेश मंत्रालय से संतोष करना पड़ रहा है।

पाकिस्तान के लिए क्यों जरूरी थी ब्रिक्स की सदस्यता

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान को अगर ब्रिक्स में सदस्यता मिल जाती, तो इसके माध्यम से उसे कई लाभ मिल सकते थे। ब्रिक्स के सदस्य देशों के साथ पाकिस्तान को व्यापार और निवेश के क्षेत्र में नए अवसर मिल सकते थे। ब्रिक्स का सदस्य बनने से पाकिस्तान को विभिन्न वैश्विक मंचों पर भी अधिक प्रभाव मिल सकता था। इसके अलावा, ब्रिक्स के सदस्य देशों से आर्थिक सहायता और सहयोग पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में मदद कर सकता था।

विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान को अपनी कूटनीतिक रणनीति में बदलाव लाने की जरूरत है। इसे अपनी विदेश नीति को अधिक लचीला और समायोजनीय बनाना होगा, ताकि भविष्य में इसे इस तरह के अवसरों से वंचित नहीं होना पड़े।

मोहम्मद यूनुस सार्क को फिर जिंदा करना चाहते हैं, पाकिस्तान बना मददगार, लेकिन भारत क्यों नहीं चाहता?

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बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने एक बार फिर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) को पुनर्जीवित करने की जरूरत पर जोर दिया।संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ मीटिंग में उन्होंने सार्क को पुनर्जीवित करने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि दक्षिण एशिया के नेताओं को क्षेत्रीय लाभ के लिए सार्क को सक्रिय बनाना चाहिए, भले ही भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चली आ रही शत्रुता जैसी चुनौतियां मौजूद हों।उन्होंने कहा है कि इन दोनों देशों के बीच की समस्याओं का असर दक्षिण एशिया के अन्य देशों पर नहीं पड़ना चाहिए और क्षेत्र में एकता और सहयोग का आह्वान किया।

सार्क संगठन की शिखर बैठक वर्ष 2016 में होने वाली थी लेकिन भारत समेत इसके अन्य सभी देशों ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ इसका विरोध किया और बैठक नहीं हो सकी। उसके बाद सार्क की बात भी कोई देश नहीं कर रहा था लेकिन पूर्व पीएम शेख हसीना को सत्ता से बाहर करने के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इसको हवा देने में जुटी है

19 दिसंबर को मिस्त्र में बांग्लादेश के सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के बीच एक महत्वपूर्ण मुलाकात हुई थी। इस बैठक में सार्क को फिर से सक्रिय करने की बात कही गई। पाकिस्तानी पीएम ने बांग्लादेश को सुझाव दिया कि वह सार्क सम्मेलन की मेजबानी करे। इस पर मोहम्मद यूनुस ने भी सहमति जताई और दोनों नेताओं ने इस योजना को आगे बढ़ाने की बात कही। पाकिस्तान की मंशा थी कि इस मंच के बहाने अलग थलग पड़े पाकिस्तान को दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अपनी भूमिका मजबूत करने का मौका मिल सके।

बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुखिया (मुख्य सलाहकार) प्रोफेसर मोहम्मद युनूस की तरफ से दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) को ठंडे बस्ते से निकालने की कोशिश पर भारत ने बेहद ठंडी प्रतिक्रिया जताई है।भारत ने इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वर्तमान में सार्क को पुनर्जीवित करने का कोई औचित्य नहीं है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल से पूछा गया तो उनका जवाब था कि, “जहां तक क्षेत्रीय सहयोग की बात है तो भारत इसके लिए लगातार कोशिश करता रहा है। इसके लिए हम कई प्लेटफॉर्म के जरिए आगे बढ़ना चाहते हैं। इसमें बिम्सटेक (भारत, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और थाइलैंड का संगठन) है जिसमें कई हमारे पड़ोसी देश जुड़े हुए हैं। सार्क भी ऐसा ही एक संगठन है लेकिन यह लंबे समय से ठंडा पड़ा हुआ है और क्यों ठंडा पड़ा हुआ है, इसके बारे में सब जानते हैं।'

भारत ने इसलिए सार्क से बनाई दूरी

दक्षिण एशिया में सार्क का महत्व यूरोपीय संघ (EU), आसियान और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे वैश्विक संगठनों की सफलता के उदाहरणों से प्रेरित है। हालांकि पाकिस्तान के साथ तनाव के कारण भारत ने धीरे-धीरे इसमें दिलचस्पी कम कर दी। 2016 में पाकिस्तान में हुए शिखर सम्मेलन में भारत ने हिस्सा नहीं लिया था। भारत ने 2016 में जम्मू-कश्मीर के उरी में सेना के शिविर पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन दिए जाने पर चिंता जताई थी। उस हमले में उन्नीस भारतीय सैनिक मारे गए थे। हमले के बाद भारत ने शिखर सम्मेलन से अपना नाम वापस ले लिया। भारत जैसे बड़े देश की ओर से दूरी बनाने के बाद नेपाल, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान, मालदीव और शेख हसीना के नेतृत्व वाले बांग्लादेश ने भी सार्क में अपनी दिलचस्पी कम कर दी।

पाकिस्तान ने पहले भी सार्क को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया है

यह पहली बार नहीं है कि पाकिस्तान ने सार्क को पुनर्जीवित करने की इच्छा व्यक्त की है।डॉन के अनुसार, दिसंबर 2023 में तत्कालीन कार्यवाहक प्रधान मंत्री अनवारुल हक काकर ने भी सार्क के पुनरुद्धार की आशा व्यक्त की थी। काकर ने कहा, "मैं इस अवसर पर सार्क प्रक्रिया के प्रति पाकिस्तान की प्रतिबद्धता को दोहराना चाहूंगा। मुझे विश्वास है कि संगठन के सुचारू संचालन में मौजूदा बाधाएं दूर हो जाएंगी, जिससे सार्क सदस्य देश पारस्परिक रूप से लाभकारी क्षेत्रीय सहयोग के मार्ग पर आगे बढ़ सकेंगे।" लेकिन भारत सार्क के पुनरुद्धार के खिलाफ रहा है।

बांग्लादेश और पाकिस्तान सार्क को पुनर्जीवित क्यों करना चाहते हैं?

यह व्यापार और अर्थव्यवस्था ही है जिसके कारण बांग्लादेश और पाकिस्तान सार्क के पुनरुद्धार के पक्ष में हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है और वह अपने दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज ले रहा है। उसने खाड़ी देशों से भी कर्ज लिया है।शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश ने अच्छी आर्थिक वृद्धि देखी थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में यह बुरी तरह से विफल हो गया है। इसकी आर्थिक दुर्दशा के लिए भ्रष्टाचार को दोषी ठहराया जाता है। अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस और शरीफ दोनों ही सार्क पर नज़र गड़ाए हुए हैं। ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि सार्क की बात करते समय उनके दिमाग में व्यापार का मुद्दा था।इसमें कहा गया, "शरीफ ने बांग्लादेश के कपड़ा और चमड़ा क्षेत्र में निवेश करने में पाकिस्तान की रुचि व्यक्त की।"

क्यों नहीं है भारत को सार्क की जरूरत?

हमें यह याद रखना होगा कि इस समूह में सबसे बड़ा खिलाड़ी भारत है, जो एक आर्थिक महाशक्ति है। भारत उन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जो अभी भी उच्च दर से बढ़ रही है जबकि बड़ी अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा रही हैं। एसएंडपी का अनुमान है कि सालाना 7% से अधिक की दर से बढ़ते हुए भारत 2030-31 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। भारत जी-20 और ब्रिक्स सहित कई समूहों का भी हिस्सा है। व्यापार और व्यवसाय के मामले में, सार्क को भारत की जरूरत है, न कि इसके विपरीत। भारत को अपने सदस्यों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए, यदि आवश्यक हो, तो समूह की जरूरत है। यह काम नई दिल्ली द्विपक्षीय रूप से भी कर सकता है, बिना किसी बहुपक्षीय मंच के।

दाऊद के भाई इकबाल कास्कर के खिलाफ ईडी का एक्शन, ठाणे में जब्त किया फ्लैट

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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भगोड़े अंडरवर्ल्ड गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम के भाई इकबाल कास्कर और उसके साथियों से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ठाणे में एक फ्लैट को अपने कब्जे में ले लिया है।यह कार्रवाई उसके और उसके भाई दाऊद इब्राहिम के खिलाफ चल रही मनी लॉन्ड्रिंग जांच का हिस्सा है। ईडी ने आरोप लगाया कि कास्कर और उसके साथियों ने ठाणे के एक बिल्डर को डरा-धमका कर फ्लैट सरेंडर करने के लिए मजबूर किया और संपत्ति को अपने सहयोगी मुमताज शेख के नाम पर पंजीकृत करा दिया।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, ईडी के सूत्रों ने बताया कि ठाणे पश्चिम में नियोपोलिस बिल्डिंग में स्थित आवासीय इकाई को उसके मालिक मुमताज एजाज शेख के खिलाफ 2022 में पीएमएलए के तहत जारी एक अनंतिम आदेश के तहत कुर्क किया गया है। धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के न्यायाधिकरण ने इस अनंतिम कुर्की आदेश को मंजूरी दी थी, जिससे ईडी के लिए इसे अपने कब्जे में लेने का रास्ता साफ हो गया। सूत्रों ने बताया कि फ्लैट को कब्जे में लेने की प्रक्रिया हाल ही में पूरी हुई है।

लगभग 75 लाख रुपये की कीमत का यह प्लैट मुमताज शेख के नाम पर था। कथित तौर पर इसे बिल्डर सुरेश मेहता और उनकी फर्म दर्शन एंटरप्राइजेज को निशाना बनाकर जबरन वसूली की योजना के तहत हासिल किया गया था। कथित तौर पर आरोपियों ने फर्जी चेक के जरिए फ्लैट और 10 लाख रुपये नकद मांगे, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया। ईडी की जांच में पाया गया कि ये वित्तीय लेन-देन जबरन वसूली गई रकम के लाभार्थियों को छिपाने के लिए किए गए थे।

ईडी ने दो एफआईआर के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग के लिए कास्कर की जांच की। पहला मामला एनआईए ने दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, छोटा शकील, टाइगर मेमन और अन्य के खिलाफ दर्ज किया था। दूसरा मामला इकबाल कासकर, मुमताज शेख और इसरार अली जमील सैय्यद के खिलाफ ठाणे के कासरवडवली पुलिस स्टेशन में जबरन वसूली का था। ठाणे पुलिस के मामले में बिल्डर से जबरन एक फ्लैट और 90 लाख रुपये की सुरक्षा राशि लेने का आरोप लगाया गया था। ईडी ने कहा कि उन्हें कई गवाह मिले जिन्होंने इकबाल मिर्ची, दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेमन और आईएसआई अधिकारियों के बीच संबंधों की पुष्टि की। ईडी ने कहा कि 2003 में भारत में निर्वासित होने के बाद कासकर ने कथित तौर पर बिल्डरों और मशहूर हस्तियों से धन उगाही शुरू कर दी। ईडी ने कहा कि उसने अपने सहयोगियों का इस्तेमाल पीड़ितों को डराने और दाऊद के लिए धन इकट्ठा करने के लिए किया।

चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची कांग्रेस, नियमों में बदलाव की मांग

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कांग्रेस चुनाव आयोग के नियमों में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार के हालिया फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। दरअसल, केन्द्र की मोदी सरकार ने सीसीटीवी कैमरे और वेबकास्टिंग फुटेज के साथ-साथ उम्मीदवारों की वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे कुछ इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों के सार्वजनिक निरीक्षण को रोकने के लिए चुनाव से संबंधित नियम में बदलाव किया है, ताकि उनका दुरुपयोग रोका जा सके। अब कांग्रेस ने हाल ही में किए गए इन संशोधनों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस संबंध में मंगलवार को एक याचिका दायर की। जयराम रमेश ने याचिका दायर करने की जानकारी एक्स पर दी। जयराम रमेश ने याचिका दायर करने के बाद एक्स पर लिखा, "निर्वाचनों का संचालन नियम 1961 में हाल के संशोधनों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक रिट दायर की गई है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है। इस पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी है, इसलिए इसे एकतरफा और सार्वजनिक विचार-विमर्श के बिना इतने महत्वपूर्ण नियम में इतनी निर्लज्जता से संशोधन करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। उस परिस्थिति में तो विशेष रूप से नहीं जब वह संशोधन चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने वाली आवश्यक जानकारी तक सार्वजनिक पहुंच को समाप्त करता है। चुनावी प्रक्रिया में सत्यनिष्ठा तेजी से कम हो रही है। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इसे बहाल करने में मदद करेगा।"

सरकार ने किन नियमों को बदला?

चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 93 अनुबंधों के मुताबिक, चुनाव से संबंधित सभी 'कागजात' सार्वजनिक निरीक्षण के लिए रखे जाएंगे। यानी ये सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध होंगे। अब केंद्र सरकार ने इस नियम में संशोधन किया है। इसके तहत अब नियम 93 की शब्दावली में 'कागजातों' के बाद 'जैसा कि इन नियमों में निर्दिष्ट है' शब्द जोड़े गए हैं।

चुनाव आयोग से मशवरे के बाद केंद्रीय कानून और विधि मंत्रालय की तरफ से किएगए बदलावों के बाद अब चुनाव संबंधी सभी दस्तावेजों को सार्वजनिक निरीक्षण के लिए नहीं रखा जाएगा। अब आम जनता सिर्फ उन्हीं चुनाव संबंधी दस्तावेजों को देख सकेगी, जिनका जिक्र चुनाव कराने से जुड़े नियमों में पहले से तय होगा।

इसका क्या असर होने वाला है?

चूंकि नामांकन फार्म, चुनाव एजेंट की नियुक्ति, परिणाम और चुनाव खाता विवरण जैसे दस्तावेजों का जिक्र चुनाव संचालन नियमों में किया गया है, इसलिए इन्हें सार्वजनिक निरीक्षण के लिए बरकरार रखा जाएगा। हालांकि, आदर्श आचार संहिता अवधि के दौरान सीसीटीवी कैमरा फुटेज, वेबकास्टिंग फुटेज और उम्मीदवारों की वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज चुनाव संचालन नियमों के दायरे में नहीं आते हैं। ऐसे में यह दस्तावेज जनता की पहुंच से दूर हो जाएंगे।

अब कांग्रेस ने मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के चयन पर उठाया सवाल, कहा-नियुक्तियां पहले से तय थीं, नहीं ली गई राय

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का नया अध्यक्ष सु्प्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम को नियुक्त किया गया है। एनएचआरसी के पूर्व अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा जून में रिटायर हो गए थे। इसक बाद से ही ये पद खाली था। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम को एनएचआरसी का अध्यक्ष नियुक्त किया है। हालांकि, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के चुनाव पर कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने डिसेंट नोट जारी कर चुनाव की इस पूरी प्रक्रिया को गलत कहा है।

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कांग्रेस की ओर से जारी किए गए नोट में कहा गया है कि एनएचआरसी के चेरयपर्सन की सिलेक्शन कमेटी में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी थे, लेकिन उनकी राय को गंभीरता से नहीं लिया गया।कांग्रेस ने कहा कि चयन समिति की बैठक बुधवार को हुई थी, लेकिन यह पहले से निर्धारित एक्सरसाइज थी। इसमें एक-दूसरे की सहमति लेने की परंपरा को नजरअंदाज कर दिया गया। ऐसे मामलों में यह आवश्यक होता है।

यह निष्पक्षता के प्रिंसिपल को कमजोर करता है, जो चयन समिति की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है। सभी की राय लेने विचार करने को बढ़ावा देने के बजाय समिति ने बहुमत पर भरोसा किया। इस मीटिंग में कई वाजिब चिंताएं उठाई गई थीं, लेकिन उसे दरकिनार कर दिया गया।

कांग्रेस ने इन नामों पर जताई थी सहमति

राहुल और खड़गे ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन और जस्टिस केएम जोसेफ के नाम पर सहमति जताई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वी. रामसुब्रमण्यन को मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष चुना गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष चुनते समय क्षेत्र, धर्म और जाति के संतुलन को ध्यान में नहीं रखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह चयन प्रक्रिया सरकार के दृष्टिकोण को दर्शाती है।

कांग्रेस ने उठाए ये मुद्दे

राहुल और खड़गे ने कहा था कि एनएचआरसी एक महत्वपूर्ण संस्था है। इसका काम समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के लोगों के लोगों के मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा करना है। जरूरी है कि एनएचआरसी अलग-अलग समुदायों की चिंताओं पर ध्यान दे। उनके मानवाधिकारों के उल्लंघन के प्रति संवेदनशीलता बने रहे। जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन अल्पसंख्यक पारसी समुदाय से आते हैं। वे संविधान के प्रति अपने कमिटमेंट के लिए जाने जाते हैं। अगर उन्हें चेयरमैन बनाया जाता तो एनएचआरसी का देश के लिए समर्पण का मजबूत संदेश जाता। इसी तरह, एक और अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय से आने वाले जस्टिस कुट्टियिल मैथ्यू जोसेफ ने भी ऐसे कई फैसले देते हैं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और हाशिए पर पड़े वर्गों की सुरक्षा पर जोर देता है।

ये चुने गए आयोग के सदस्य

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सोमवार को पैनल की नियुक्ति की जानकारी दी। आयोग ने एक पोस्ट में लिखा- 'राष्ट्रपति ने जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यन को अध्यक्ष, प्रियांक कानूनगो और जस्टिस विद्युत रंजन सारंगी को सदस्य के रूप में नियुक्त किया है।'

आपको बता दें कि प्रियांक कानूनगो इसके पहले राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं। कांग्रेस ने जिन जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन के नाम पर सहमति दी थी, वह पारसी समुदाय से आते हैं। वहीं जस्टिस कुट्टियिल मैथ्यू जोसेफ ईसाई समुदाय से आते हैं।

कैसे होती है एनएचआरसी प्रमुख की नियुक्ति

एनएचआरसी अध्यक्ष की नियुक्ति राष्ट्रपति एक चयन समिति की सिफारिश पर करते हैं। इस चयन समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, जबकि इसमें लोकसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता और राज्यसभा के उप सभापति भी सदस्य होते हैं। जस्टिस मिश्रा के सेवानिवृत्त होने के बाद एनएचआरसी की सदस्य विजया भारती को कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। 18 दिसंबर को हुई बैठक के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी. रामासुब्रमण्यन को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) का अध्यक्ष नियुक्त किया। साथ ही, प्रियांक कानूनगो और न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बिद्युत रंजन सारंगी को आयोग का सदस्य नियुक्त किया।