Samarpit SPI: From College Dream to National Movement—Empowering India Through Service and Democracy

INDIA | April 25, 2026 — In an era where digital connectivity often replaces physical community action, Samarpit SPI (Social Progress Initiative) is bridging the gap. What started in 2020 as a modest pact between three college friends has officially matured into a registered NGO trust, mobilizing hundreds of volunteers to tackle India’s most pressing grassroots challenges through humanitarian aid and democratic education.

The Genesis: Small Steps, Massive Vision

The foundations of Samarpit SPI were laid in the rural heartlands of Bihar. Founders Shivam Parashar, Harshit Gupta, and Shami Ahmad recognized a recurring theme in their community: a disconnect between available rights and the citizens meant to exercise them. Driven by the belief that "real change begins with responsibility," the trio began conducting local awareness drives, a mission that resonated so deeply it quickly expanded from three friends to a core team of ten selfless advocates.

Proving Resilience During Global Crisis

The true mettle of Samarpit SPI was tested during the COVID-19 pandemic. While the world retreated, the organization stepped forward. By coordinating oxygen cylinder logistics, distributing life-saving medicines, and providing relief packages to vulnerable families, Samarpit SPI transitioned from a local initiative to a critical lifeline. This period of intense service solidified their reputation for "real solutions for real needs."

The Intellectual Evolution: Merging Sociology with Service

As the movement gained momentum, it attracted a new wave of intellectually driven youth, including several UPSC aspirants. A pivotal moment in the organization’s history was the addition of Kumari Prachi, a Master’s graduate in Sociology. Her academic expertise in governance and social structures provided the framework necessary to transition the group into a formal entity.

Under her guidance, the movement was officially registered as a Trust-based NGO in February 2026, ensuring the longevity and scalability of their impact.

A New Chapter: The 2026 Leadership Team

With its official registration, Samarpit SPI has introduced a dedicated Board of Trustees to oversee its national expansion:

President: Shivam Parashar

Vice President: Kumari Prachi

Secretary: Ritik Roshan

Treasurer: Satish Runi

Trustee: Advik Vivan

Program Directors Harshit Gupta & Shami Ahmad

Supported by 15 active leads and a network of over 300+ volunteers nationwide, this leadership team is prepared to take the "Samarpit" mission to every corner of India.

The Three Pillars of Progress

Samarpit SPI operates through a focused, three-pronged strategy designed to create holistic societal shifts:

1. Serving Humanity Beyond symbolic gestures, the organization conducts daily food distribution drives and maintains a rapid-response network for emergency welfare.

2. Empowering Communities By focusing on educational support and vocational skill awareness, they provide the tools necessary for long-term financial independence.

3. Strengthening Democracy Perhaps their most unique pillar, Samarpit SPI conducts civic awareness campaigns. These programs educate citizens on their constitutional rights and duties, fostering a more informed and active electorate.

 "Meaningful change does not require fame or fortune—only commitment, compassion, and collective action," says Shivam Parashar, Founder and President. "We are proving that when the youth take ownership of their democracy, the entire nation rises."

About Samarpit SPI

Samarpit SPI (Social Progress Initiative) is a registered non-profit organization dedicated to nation-building at the grassroots level. Based in New Delhi with deep roots in rural India, the NGO focuses on humanitarian aid, community upliftment, and civic education. By leveraging the energy of educated youth and volunteers, Samarpit SPI aims to build a stronger, more democratic India through direct action and social advocacy. For more information you can visit https://www.samarpitspi.com/

यूएस-ईरान शांति वार्ताःडील के लिए ट्रंप खुद पहुंच सकते हैं पाकिस्तान

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अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही है। इस बीच खबर आ रही है कि डोनाल्ड ट्रंप भी ईरान के साथ इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता में समझौता होने की स्थिति में खुद भी शामिल हो सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे राउंड की युद्धविराम वार्ता होने की उम्मीद अब काफी बढ़ गई है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने चर्चा में शामिल एक पाकिस्तानी सूत्र के हवाल से कहा है कि बातचीत के फिर से शुरू करने की दिशा में प्रगति हो रही है। उन्होंने ये भी संकेत दिया है कि अगर ईरान के साथ कोई समझौता हो जाता है तो या तो खुद डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान आ सकते हैं या फिर ऑनलाइन माध्यम से इसमें शामिल हो सकते हैं।

ट्रंप ने दी बम बरसाने की धमकी

ये खबर ऐसे वक्त में आई है, जब ईरान-अमेरिका वार्ता में लगातार गतिरोध चल रहा है। इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और उन्होंने दावा किया है कि ईरान को समझौता करना ही होगा। उन्होंने अपनी ताजा धमकी में कहा कि अगर ईरान समझौता नहीं करेगा, तो बम बरसेंगे। हालांकि इसके बाद भी ईरान ने अड़ियल रवैया जारी रखा है।

पाकिस्तान के लिए अब तक नहीं रवाना हुआ ईरानी प्रतिनिधिमंडल

ईरान की सरकारी टेलीविजन रिपोर्ट के अनुसार अभी तक कोई भी ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान में होने वाली शांति वार्ता में भाग लेने के लिए रवाना नहीं हुआ है। यह वार्ता अमेरिका के साथ संभावित शांति वार्ता से जुड़ी बताई जा रही है, जिसे लेकर क्षेत्रीय स्तर पर काफी चर्चा बनी हुई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की ओर से फिलहाल किसी भी डेलीगेशन के पाकिस्तान जाने की पुष्टि नहीं की गई है, जिससे इस बैठक को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।

इन मामलों पर विवाद बरकरार

-ईरान का परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करे, जबकि तेहरान का कहना है कि किसी भी प्रतिबंध की समयसीमा सीमित होनी चाहिए।

-यूरेनियम भंडार: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ईरान के लगभग 400 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण चाहता है, लेकिन ईरान ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है।

-स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: ईरान का कहना है कि वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर प्रतिबंध तब तक जारी रखेगा जब तक अमेरिका अपने प्रतिबंध नहीं हटाता, जबकि अमेरिका का रुख सख्त बना हुआ है।

-जमे हुए आर्थिक संपत्ति: ईरान करीब 20 अरब डॉलर की फ्रीज़्ड संपत्तियों को जारी करने और प्रतिबंधों में राहत की मांग कर रहा है।

-युद्ध क्षतिपूर्ति: तेहरान ने अमेरिका और इस्राइल के हमलों से हुए नुकसान के बदले लगभग 270 अरब डॉलर के मुआवजे की भी मांग उठाई है।

ट्रंप ने ‘पोप’ को भी नहीं बख्शा, ईरान युद्ध पर की आलोचना तो भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति

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अमेरिका-ईरान जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर अब कैथोलिक पोप लियो आ गए हैं। ट्रंप ने पोप लियो की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि हमें ऐसा पोप पसंद नहीं जो यह कहे कि परमाणु हथियार रखना ठीक है। ईरान के साथ संघर्ष और पाकिस्तान में आयोजित बातचीत विफल होने के बाद पोप लियो ने ट्रंप की कड़ी आलोचना की। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में पोप पर तीखा पलटवार किया।

सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आलोचना

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में पोप की आलोचना करते हुए लिखा कि पोप लियो अपराध के मुद्दे पर कमजोर हैं और विदेश नीति के लिए खराब हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसे पोप को पसंद नहीं करते जो यह मानते हों कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना ठीक है।

मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए-ट्रंप

ट्रंप ने पोप लियो के भाई लुईस की तारीफ की और कहा कि मुझे उनका भाई लुई उनसे कहीं ज्यादा पसंद है, क्योंकि लुईस पूरी तरह से MAGA समर्थक हैं। उन्हें बात समझ आती है, पर लियो को नहीं! उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो ईरान के पास परमाणु हथियार होने को जायज समझे। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो यह सोचे कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर हमला करना भयानक था, जो भारी मात्रा में ड्रग्स, अपराधियों, ड्रग डीलरों को अमेरिका भेजने से कृत्यों में शामिल था। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की आलोचना करे, क्योंकि मैं वही कर रहा हूं, जिसके लिए मुझे भारी बहुमत से चुना गया था- अपराध दर को रिकॉर्ड निचले स्तर पर लाना और इतिहास का सबसे बड़ा शेयर बाजार बनाना।

कट्टर वामपंथियों को खुश करने का लगाया आरोप

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि लियो को शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि सभी जानते हैं कि पोप बनने के लिए उनका नाम किसी भी लिस्ट में नहीं था और चर्च ने उन्हें केवल इसलिए पोप बनाया क्योंकि वे एक अमेरिकी थे। उन्हें लगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से निपटने का यही सबसे अच्छा तरीका होगा। उन्होंने आगे कहा कि अगर मैं व्हाइट हाउस में नहीं होता तो लियो वेटिकन में नहीं होते। ट्रंप ने आगे कहा कि अपराध और परमाणु हथियारों के मामले में लियो की कमजोरी मुझे रास नहीं आती और न ही यह तथ्य कि वे ओबामा के समर्थक डेविड एक्सलरोड से मिलते हैं, जो वामपंथी विचारधारा का एक हारा हुआ व्यक्ति है, जो चर्च जाने वालों और पादरियों की गिरफ्तारी चाहता था। ट्रंप ने कहा लियो को कट्टर वामपंथियों को खुश करना बंद करना चाहिए और एक महान पोप बनने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि नेता बनने पर।

ईरान युद्ध पर मुखर होकर बोल रहे पोप लियो

बता दें कि लियो XIV पहले अमेरिकी पोप हैं जो अमेरिका और इज़रायल के ईरान के साथ युद्ध के बारे में लगातार मुखर हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने ईरान के लोगों के खिलाफ ट्रंप की बयानबाजी और धमकियों की निंदा करते हुए उन्हें पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया था। यह टिप्पणी ट्रंप की उस धमकी के जवाब में आई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ दो सप्ताह के संघर्ष विराम पर सहमति बनने से कुछ घंटे पहले "आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी।"

अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता टूटी, जानें कहां फंसा पेच

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जिसका डर था वहीं हुआ। ईरान-अमेरिका की शांति वार्ता पहले दौर में ही दम तोड़ गई। अमेरिका-ईरान के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटों तक चली शांति वार्ता बेनतीजा रही। इस कूटनीतिक प्रयास के विफल होने के साथ ही पश्चिम एशिया में संकट गहराने की संभावना बढ़ गई है। शांति वार्ता असफल होने के बाद से अमेरिका-इजराइल के एक बार फिर से आक्रामक रुख अपनाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

ईरान ने अमेरिकी शर्तों को मानने से किया इनकार

अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में चल रही बेनतीजा रही बातचीत को लेकर अमेरिका के मुख्य वार्ताकार उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रविवार सुबह इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि क्योंकि ईरान ने हमारी शर्तें मानने से मना कर दिया है। साथ ही यह भी कहा कि कोई समझौता नहीं हो पाया है।

वेंस ने कहा- ईरान के लिए ज्यादा बुरी खबर

वेंस ने कहा कि हमने ईरानियों के साथ कई अहम बातचीत की है, जो अच्छी खबर है। बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह अमेरिका के नहीं बल्कि ईरान के लिए ज्यादा बुरी खबर है।

ईरान ने क्या कहा?

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने कहा कि हमने कई मुद्दों पर सहमति बनाई, लेकिन 2-3 महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद थे, और अंततः वार्ता किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकी। वार्ता का यह दौर एक साल में सबसे लंबा था। कूटनीति कभी समाप्त नहीं होती। यह राष्ट्रीय हितों की रक्षा का एक साधन है। राजनयिकों को युद्ध और शांति दोनों समय में अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

पाकिस्तान ने की युद्धविराम जारी रखने की मांग

21 घंटों तक चली बातचीत के विफल होने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने दोनों देशों का बातचीत की मेज पर आने के लिए धन्यवाद किया। इसी के साथ उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच युद्धविराम समझौता जारी रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं, युद्धविराम की समयसीमा बढ़े और दोनों पक्ष युद्धविराम का पालन करें।

पाकिस्तान में बैठी “पंचायत”, शांति वार्ता से पहले धमकी और चेतावनी, अमेरिका-ईरान के बीच हो पाएगा सुलह?

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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज से शुरू होने वाली अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है। पश्चिम एशिया में एक महीने से ज्यादा वक्त से जारी जंग और हालिया युद्धविराम के बीच यह बातचीत बेहद अहम मानी जा रही है। शांति वार्ता के लिए ईरान का प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच गया है. इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बगर कालिबाफ कर रहे हैं। इधर अमेरिका की ओर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भारी-भरकम दल के साथ इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। हालांकि, वार्ता से पहले ईरान ने अमेरिका के सामने बड़ी शर्त रखी है। वहीं, अमेरिका भी धमकी देने से नहीं चूका।

बातचीत से पहले ईरान ने रखीं दो शर्तें

वार्ता से पहले ईरान ने अपनी शर्तें भी साफ कर दी हैं। ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा है कि बातचीत शुरू होने से पहले लेबनान में युद्धविराम लागू होना चाहिए और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियां रिलीज की जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इन शर्तों के बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी।

अमेरिका ने शांति वार्ता से पहले दी है चेतावनी

इससे पहले, इस्लामाबाद जाने वाले विमान में सवार होने से पहले वैंस ने मीडिया से कहा, "जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, अगर ईरानी सद्भावना से बातचीत करने को तैयार हैं, तो हम निश्चित रूप से उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं। अगर वे हमें धोखा देने की कोशिश करेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि हमारी वार्ताकार टीम इतनी सहृदय नहीं है।"

पाकिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी

इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस वार्ता को ‘मेक ऑर ब्रेक’ बताया है। इस्लामाबाद में सेरेना होटल को वार्ता के लिए पूरी तरह खाली कराकर सुरक्षा घेरे में लिया गया है। शहर को हाई अलर्ट पर रखा गया है और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई है। पाकिस्तानी एयरफोर्स और उसके एयर डिफेंस एक्टिव हैं।

ईरान-अमेरिका सीजफायर में पाकिस्तान मध्यस्थ या मोहरा? जानें क्यों उठ रहे सवाल

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अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर हो गया है। इसमें पाकिस्तान की अहम भूमिका सामने आई है, जिसे खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया है। लेकिन पाकिस्तान यहां भी अपनी नापाक हरकत से बाज नहीं आया है। ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर पाकिस्तान खुद को शांति दूत के रूप में पेश कर रहा है। शांति वार्ता की मेजबानी कर वह अपनी छाती ठोक रहा है। लेकिन, सच्चाई कुछ अलग है।

पाक मात्र एक मैसेंजर

ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक असल में व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान को दबाव डालकर इस्तेमाल किया। इस्लामाबाद कोई न्यूट्रल ब्रोकर नहीं था। वह सिर्फ अमेरिका का सुविधाजनक मैसेंजर बनकर रह गया। रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका ने पाकिस्तान पर जोर डाला कि वह वाशिंगटन का प्रस्ताव तेहरान तक पहुंचाए। पाकिस्तान को सक्रिय भूमिका नहीं दी गई, बल्कि सिर्फ एक चैनल बनाया गया।

यूएस ने पाकिस्तान को ही क्यों चुना?

रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका को लगा कि ईरान मुस्लिम पड़ोसी देश के जरिए आने वाले ऑफर को ज्यादा आसानी से मान लेगा। यही वजह थी कि पाकिस्तान को चुना गया।

इजरायल के राजदूत ने भी उठाया सवाल

अमेरिका-ईरान के बीच दो सप्ताह के सीजफायर पर पाकिस्तान खुद की अपनी पीठ थपथपा रहा है। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने भी उसकी मध्यस्थ की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। इजरायली राजदूत रूवेन ने अमेरिका-ईरान के बीच चल रही सीजफायर की बातचीत में मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका पर संदेह जताया है। उन्होने कहा, इजरायल इस्लामाबाद को एक "विश्वसनीय पक्ष" के रूप में नहीं देखता है। रूवेन अजार ने कहा, 'हम पाकिस्तान को एक भरोसेमंद पक्ष के रूप में नहीं देखते हैं. मुझे लगता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने निजी कारणों से पाकिस्तान की मध्यस्थता का इस्तेमाल करने का फैसला लिया है।

किसके इशारों पर नाच रहा पाक?

वहीं, 'फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज' (FDD) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और अमेरिकी ट्रेजरी के पूर्व एनालिस्ट जोनाथन श्नाइजर ने पाकिस्तान की इस भूमिका पर गंभीर संदेह जताते हुए पूछा है कि क्या पाकिस्तान वाकई शांति चाहता है या वह सिर्फ चीन के इशारों पर नाच रहा है? जोनाथन श्नाइजर का मानना है कि पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति उसे स्वतंत्र फैसले लेने की अनुमति नहीं देती है। पाकिस्तान, चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) और 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' में बुरी तरह फंसा हुआ है। श्नाइजर ने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान अमेरिका के साथ नए गठबंधन बनाकर अपनी स्थिति सुधारना चाहता है या वह केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 'माउथपीस' के तौर पर काम कर रहा है।

कौन कर रहा पाकिस्तान की गाड़ी ड्राइव, क्या अमेरिका लिख रहा शहबाज शरीफ की X पोस्ट क्या?

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सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भारी किरकिरी हो रही है। अमेरिका और ईरान में तनाव के बीच खुद को चौधरी दिखाने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पोल खुल गई है। शहबाज शरीफ के मात्र एक पोस्ट से ईरान जंग के सीजफायर पर पाकिस्तान के रोल पर सवाल खड़े हो गए हैं। जिसके बाद सवाल उठ रहे है कि क्या पाकिस्तान को अमेरिकी की तरफ से कंट्रोल किया जा रहा है?

कैसी है पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका?

दरअसल, पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की एक सोशल मीडिया पोस्ट की। शहबाज शरीफ ने मंगलवार को एक्स पर एक पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान के खिलाफ संभावित कार्रवाई की समयसीमा बढ़ाने की अपील की थी। उन्होंने लिखा था कि कूटनीति को आगे बढ़ने का मौका देने के लिए समय सीमा को दो सप्ताह तक बढ़ाया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने ईरान से होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का भी आग्रह किया था, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम है।

ऐसे शुरू हुआ विवाद

सारा विवाद तब शुरू हुआ, जब सोशल मीडिया यूजर्स ने शहबाज शरीफ के पोस्ट की ‘एडिट हिस्ट्री’ पर ध्यान दिया। यूजर्स का ध्यान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की पोस्ट की ‘एडिट हिस्ट्री’ पर चला गया, जिससे पता लगता है कि उनकी इस पोस्ट को किसी दूसरे ने तैयार किया है। स्क्रीनशॉट के अनुसार, उस पोस्ट के शुरुआती संस्करण में सबसे ऊपर लिखा था: ‘Draft – Pakistan’s PM Message on X यानी ड्राफ्ट- एक्स पर पाकिस्तान के पीएम का संदेश।’

सिर्फ टेक्निकल गलती थी या कोई बड़ा संदेश

ऐसा होना यह केवल एक छोटी सी टेक्निकल गलती थी या कोई बड़ा इशारा? किसी देश के प्रधानमंत्री के ऑफिशियल कम्युनिकेशन में ड्राफ्ट शब्द लिखा होना बड़े सवाल पैदा करता है, लेकिन क्या ये पाकिस्तान के अधिकारियों की लापरवाही थी या फिर किसी बड़ी बात का संकेत। सवाल उठ रहें है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति ने ये ड्राफ्ट पाकिस्तान को भेजा था। या फिर किसी और ने भेजा था।

कौन कर रहा पाकिस्तान की गाड़ी ड्राइव?

आलोचकों का कहना है कि यह किसी लीडर के अपनी आवाज में बोलने जैसा कम और उसके लिए तैयार किए गए टेम्पलेट जैसा अधिक लगता है। इस घटना ने जियोपॉलिटिकल सर्कल में एक लंबे समय से चली आ रही सोच को और बढ़ा दिया है कि पाकिस्तान के स्ट्रेटेजिक और डिप्लोमैटिक फैसले अक्सर बाहरी ताकतों से प्रभावित होते हैं।

पाकिस्तान बना मुखौटा, चीन सीजफायर का सूत्रधार, ईरान को बातचीत के लिए किया तैयार

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अमेरिका और ईरान के बीच 5 हफ्तों से ज्यादा तक चली जंग के बाद बुधवार 8 अप्रैल की सुबह राहत भरी खबर आई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों तक हमले रोकने की घोषणा की। ट्रंप ने इसे दो तरफा युद्धविराम बताया और कहा कि यह इस शर्त पर होगा कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से खोलेगी।

चीन ने पर्दे के पीछे रहकर किया काम

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि यह फैसला पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ की अपील के बाद लिया गया। अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्ते के सीजफायर के पीछे चीन की अहम भूमिका सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि चीन ने पर्दे के पीछे रहकर ईरान को बातचीत के लिए तैयार करने में मदद की। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह डील पाकिस्तान की मध्यस्थता और आखिरी समय में चीन के दखल के बाद संभव हो पाई।

आखिरी समय में चीन के दखल आई काम

अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने युद्धविराम में अहम भूमिका निभाई है। ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध में दो हफ्ते के सीजफायर के फैसले के पीछे पाकिस्तान के अलावा चीन की बड़ी भूमिका सामने आई है। न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान के जोरदार प्रयास के साथ-साथ चीन ने आखिरी मिनट में दखल देकर ईरान को समझाया और तनाव कम किया। रिपोर्ट की मानें तो चीन ने ईरान को साफ चेतावनी दी कि अगर ट्रंप अपनी धमकी के मुताबिक ईरान के एनर्जी साइट्स और बुनियादी ढांचे पर हमला करते हैं तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी।

ट्रंप बोले- चीन ने ईरान को किया तैयार

सीजफायर को लेकर ट्रंप ने कहा है कि चीन ने ईरान को बातचीत के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। एक टेलीफोनिक बातचीत में उनसे पूछा गया कि क्या चीन ने ईरान को सीजफायर के लिए प्रेरित किया। इस पर ट्रंप ने कहा, “हां, मैंने सुना है”। हालांकि, इस मुद्दे पर चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया आना बाकी है।

संघर्ष के बाद से ही चीन सीजफायर के लिए था प्रयासरत

वहीं, वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता लियू पेंगयू ने कहा कि संघर्ष शुरू होने के बाद से ही चीन सीजफायर और युद्ध खत्म कराने के लिए काम कर रहा था। उन्होंने कहा कि चीन हर उस प्रयास का स्वागत करता है जो शांति की दिशा में हो और सभी पक्षों को बातचीत के जरिए मतभेद खत्म करने चाहिए। चीन ने उम्मीद जताई कि सभी संबंधित पक्ष इस मौके का फायदा उठाकर जल्द से जल्द संघर्ष खत्म करेंगे। गौरतलब है कि चीन इससे पहले 2023 में ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौता कराने में भी अहम भूमिका निभा चुका है।

अमेरिका-ईरान में 2 हफ्ते का सीजफायर, 40वें दिन रुकी जंग

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मिडिल ईस्ट के लिए आज की सुबह एक बड़ी राहत लेकर आई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण जंग पर 40 दिनों के बाद सीजफायर हो गया है। दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर दो हफ्तों के सीजफायर यानी युद्धविराम की घोषणा कर दी है।

ट्रंप ने ईरानी सभ्यता ही खत्म करने की दी थी धमकी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (स्थानीय समयानुसार) को कहा कि वे दो हफ्तों के लिए ईरान पर बमबारी रोकने पर सहमत हो गए हैं। यह सहमति उनकी डेडलाइन की रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 5.30 बजे) की समय सीमा से दो घंटे से भी कम समय पहले बनी। ट्रंप ने डेडलाइन पूरी होने पर पूरी सभ्यता को तबाह करने की धमकी दी थी।

अमेरिका-ईरान के बीच पुराने विवादों पर सहमति

ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल मीडिया पर दो हफ्तों के युद्धविराम समझौते की जानकारी दी और कहा कि यह समझौता इस शर्त पर किया गया है कि ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने पर सहमत हो। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, अमेरिका पहले ही अपने कई सैन्य लक्ष्य हासिल कर चुका है और अब ईरान के साथ दीर्घकालिक शांति समझौते की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान की तरफ से 10 बिंदुओं का एक प्रस्ताव मिला है, जिसे बातचीत के आधार के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच पुराने विवादों के अधिकतर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुआ सीजफायर?

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर के साथ हुई बातचीत के आधार पर- जिसमें उन्होंने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं आज रात ईरान भेजे जा रहे विनाशकाली बल को रोक लूं- और इस शर्त पर कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित रूप से खोलने पर सहमत हो, मैं दो हफ्ते की अवधि के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को रोकने पर सहमत हूं। यह एक दो-तरफा युद्धविराम होगा।'

ईरान ने क्या कहा?

वहीं, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान पोस्ट करके युद्ध-विराम स्वीकार करने की बात कहीय़ उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री शरीफ की ट्वीट में की गई भाईचारे वाली अपील के जवाब में, और अमेरिका द्वारा उसके 15 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के आधार पर बातचीत की मांग को देखते हुए, साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान के 10 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के सामान्य ढांचे को बातचीत का आधार मानने की घोषणा को ध्यान में रखते हुए, मैं ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से यह घोषणा करता हूं: अगर ईरान पर हमले रुक जाते हैं, तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं अपनी रक्षात्मक कार्रवाई रोक देंगी।”

उन्होंने आगे कहा, “दो हफ्तों की अवधि के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही संभव होगी, लेकिन इसके लिए ईरान की सशस्त्र सेनाओं के साथ समन्वय (कॉर्डिनेट) करना होगा और कुछ तकनीकी सीमाओं का भी ध्यान रखना होगा।”

ट्रंप ने दिया था 48 घंटे का अल्टीमेटम

बता दें कि, ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया चुके था, लेकिन बाद में इस समय-सीमा को कई बार बढ़ाया गया। फिर इसे बढ़ाकर 8 अप्रैल की रात तक कर दिया गया था। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि समझौते की संभावना अभी भी है, लेकिन अगर बात नहीं बनी तो वे 'सब कुछ खत्म कर देंगे।' उन्होंने यह भी दावा किया था कि ईरान के आम लोग अपनी सरकार से खुश नहीं हैं और वे अमेरिका की कार्रवाई का समर्थन कर सकते हैं।

एस जयशंकर ने ईरान, यूएई और कतर से की बात, पश्चिम एशिया के हालात पर हुई चर्चा

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अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के चलते पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रविवार शाम को कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अपने समकक्षों के साथ टेलीफोन पर बातचीत की और क्षेत्र के बिगड़ते सुरक्षा हालातों पर चर्चा की। कतर और यूएई के नेताओं से बात करने के तुरंत बाद, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची का फोन आया। 

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जसीम अल थानी से पश्चिम एशिया संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर उसके असर को लेकर रविवार को चर्चा की। विदेश मंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान से भी फोन पर बातचीत की।

युद्ध और तनाव पर पर चर्चा

विदेश मंत्री जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस बातचीत की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के साथ क्षेत्र में चल रहे युद्ध और तनाव पर विचार साझा किए गए। इसके बाद जयशंकर ने यूएई के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान से संपर्क किया। उन्होंने पश्चिम एशिया की उभरती स्थिति पर विस्तार से चर्चा की।

ईरान के विदेश मंत्री का आया फोन

इसी कड़ी में ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची ने भी डॉ. जयशंकर को फोन किया। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोशल मीडिया पर यह बताया है कि उनके पास ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का फोन आया। दोनों नेताओं ने वेस्ट एशिया में चल रही टेंशन को लेकर लंबी बातचीत की।

ट्रंप की चेतावनी के बीच बढ़ी हलचल

ईरान के विदेश मंत्री, कतर के प्रधानमंत्री और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री से जयशंकर की फोन पर बातचीत ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दी गई हालिया चेतावनी के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट को नौवहन के लिए फिर से नहीं खोला गया तो ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों को नष्ट कर दिया जाएगा।

Samarpit SPI: From College Dream to National Movement—Empowering India Through Service and Democracy

INDIA | April 25, 2026 — In an era where digital connectivity often replaces physical community action, Samarpit SPI (Social Progress Initiative) is bridging the gap. What started in 2020 as a modest pact between three college friends has officially matured into a registered NGO trust, mobilizing hundreds of volunteers to tackle India’s most pressing grassroots challenges through humanitarian aid and democratic education.

The Genesis: Small Steps, Massive Vision

The foundations of Samarpit SPI were laid in the rural heartlands of Bihar. Founders Shivam Parashar, Harshit Gupta, and Shami Ahmad recognized a recurring theme in their community: a disconnect between available rights and the citizens meant to exercise them. Driven by the belief that "real change begins with responsibility," the trio began conducting local awareness drives, a mission that resonated so deeply it quickly expanded from three friends to a core team of ten selfless advocates.

Proving Resilience During Global Crisis

The true mettle of Samarpit SPI was tested during the COVID-19 pandemic. While the world retreated, the organization stepped forward. By coordinating oxygen cylinder logistics, distributing life-saving medicines, and providing relief packages to vulnerable families, Samarpit SPI transitioned from a local initiative to a critical lifeline. This period of intense service solidified their reputation for "real solutions for real needs."

The Intellectual Evolution: Merging Sociology with Service

As the movement gained momentum, it attracted a new wave of intellectually driven youth, including several UPSC aspirants. A pivotal moment in the organization’s history was the addition of Kumari Prachi, a Master’s graduate in Sociology. Her academic expertise in governance and social structures provided the framework necessary to transition the group into a formal entity.

Under her guidance, the movement was officially registered as a Trust-based NGO in February 2026, ensuring the longevity and scalability of their impact.

A New Chapter: The 2026 Leadership Team

With its official registration, Samarpit SPI has introduced a dedicated Board of Trustees to oversee its national expansion:

President: Shivam Parashar

Vice President: Kumari Prachi

Secretary: Ritik Roshan

Treasurer: Satish Runi

Trustee: Advik Vivan

Program Directors Harshit Gupta & Shami Ahmad

Supported by 15 active leads and a network of over 300+ volunteers nationwide, this leadership team is prepared to take the "Samarpit" mission to every corner of India.

The Three Pillars of Progress

Samarpit SPI operates through a focused, three-pronged strategy designed to create holistic societal shifts:

1. Serving Humanity Beyond symbolic gestures, the organization conducts daily food distribution drives and maintains a rapid-response network for emergency welfare.

2. Empowering Communities By focusing on educational support and vocational skill awareness, they provide the tools necessary for long-term financial independence.

3. Strengthening Democracy Perhaps their most unique pillar, Samarpit SPI conducts civic awareness campaigns. These programs educate citizens on their constitutional rights and duties, fostering a more informed and active electorate.

 "Meaningful change does not require fame or fortune—only commitment, compassion, and collective action," says Shivam Parashar, Founder and President. "We are proving that when the youth take ownership of their democracy, the entire nation rises."

About Samarpit SPI

Samarpit SPI (Social Progress Initiative) is a registered non-profit organization dedicated to nation-building at the grassroots level. Based in New Delhi with deep roots in rural India, the NGO focuses on humanitarian aid, community upliftment, and civic education. By leveraging the energy of educated youth and volunteers, Samarpit SPI aims to build a stronger, more democratic India through direct action and social advocacy. For more information you can visit https://www.samarpitspi.com/

यूएस-ईरान शांति वार्ताःडील के लिए ट्रंप खुद पहुंच सकते हैं पाकिस्तान

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अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही है। इस बीच खबर आ रही है कि डोनाल्ड ट्रंप भी ईरान के साथ इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता में समझौता होने की स्थिति में खुद भी शामिल हो सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे राउंड की युद्धविराम वार्ता होने की उम्मीद अब काफी बढ़ गई है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने चर्चा में शामिल एक पाकिस्तानी सूत्र के हवाल से कहा है कि बातचीत के फिर से शुरू करने की दिशा में प्रगति हो रही है। उन्होंने ये भी संकेत दिया है कि अगर ईरान के साथ कोई समझौता हो जाता है तो या तो खुद डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान आ सकते हैं या फिर ऑनलाइन माध्यम से इसमें शामिल हो सकते हैं।

ट्रंप ने दी बम बरसाने की धमकी

ये खबर ऐसे वक्त में आई है, जब ईरान-अमेरिका वार्ता में लगातार गतिरोध चल रहा है। इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और उन्होंने दावा किया है कि ईरान को समझौता करना ही होगा। उन्होंने अपनी ताजा धमकी में कहा कि अगर ईरान समझौता नहीं करेगा, तो बम बरसेंगे। हालांकि इसके बाद भी ईरान ने अड़ियल रवैया जारी रखा है।

पाकिस्तान के लिए अब तक नहीं रवाना हुआ ईरानी प्रतिनिधिमंडल

ईरान की सरकारी टेलीविजन रिपोर्ट के अनुसार अभी तक कोई भी ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान में होने वाली शांति वार्ता में भाग लेने के लिए रवाना नहीं हुआ है। यह वार्ता अमेरिका के साथ संभावित शांति वार्ता से जुड़ी बताई जा रही है, जिसे लेकर क्षेत्रीय स्तर पर काफी चर्चा बनी हुई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की ओर से फिलहाल किसी भी डेलीगेशन के पाकिस्तान जाने की पुष्टि नहीं की गई है, जिससे इस बैठक को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।

इन मामलों पर विवाद बरकरार

-ईरान का परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करे, जबकि तेहरान का कहना है कि किसी भी प्रतिबंध की समयसीमा सीमित होनी चाहिए।

-यूरेनियम भंडार: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ईरान के लगभग 400 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण चाहता है, लेकिन ईरान ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है।

-स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: ईरान का कहना है कि वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर प्रतिबंध तब तक जारी रखेगा जब तक अमेरिका अपने प्रतिबंध नहीं हटाता, जबकि अमेरिका का रुख सख्त बना हुआ है।

-जमे हुए आर्थिक संपत्ति: ईरान करीब 20 अरब डॉलर की फ्रीज़्ड संपत्तियों को जारी करने और प्रतिबंधों में राहत की मांग कर रहा है।

-युद्ध क्षतिपूर्ति: तेहरान ने अमेरिका और इस्राइल के हमलों से हुए नुकसान के बदले लगभग 270 अरब डॉलर के मुआवजे की भी मांग उठाई है।

ट्रंप ने ‘पोप’ को भी नहीं बख्शा, ईरान युद्ध पर की आलोचना तो भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति

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अमेरिका-ईरान जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर अब कैथोलिक पोप लियो आ गए हैं। ट्रंप ने पोप लियो की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि हमें ऐसा पोप पसंद नहीं जो यह कहे कि परमाणु हथियार रखना ठीक है। ईरान के साथ संघर्ष और पाकिस्तान में आयोजित बातचीत विफल होने के बाद पोप लियो ने ट्रंप की कड़ी आलोचना की। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में पोप पर तीखा पलटवार किया।

सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आलोचना

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में पोप की आलोचना करते हुए लिखा कि पोप लियो अपराध के मुद्दे पर कमजोर हैं और विदेश नीति के लिए खराब हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसे पोप को पसंद नहीं करते जो यह मानते हों कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना ठीक है।

मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए-ट्रंप

ट्रंप ने पोप लियो के भाई लुईस की तारीफ की और कहा कि मुझे उनका भाई लुई उनसे कहीं ज्यादा पसंद है, क्योंकि लुईस पूरी तरह से MAGA समर्थक हैं। उन्हें बात समझ आती है, पर लियो को नहीं! उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो ईरान के पास परमाणु हथियार होने को जायज समझे। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो यह सोचे कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर हमला करना भयानक था, जो भारी मात्रा में ड्रग्स, अपराधियों, ड्रग डीलरों को अमेरिका भेजने से कृत्यों में शामिल था। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की आलोचना करे, क्योंकि मैं वही कर रहा हूं, जिसके लिए मुझे भारी बहुमत से चुना गया था- अपराध दर को रिकॉर्ड निचले स्तर पर लाना और इतिहास का सबसे बड़ा शेयर बाजार बनाना।

कट्टर वामपंथियों को खुश करने का लगाया आरोप

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि लियो को शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि सभी जानते हैं कि पोप बनने के लिए उनका नाम किसी भी लिस्ट में नहीं था और चर्च ने उन्हें केवल इसलिए पोप बनाया क्योंकि वे एक अमेरिकी थे। उन्हें लगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से निपटने का यही सबसे अच्छा तरीका होगा। उन्होंने आगे कहा कि अगर मैं व्हाइट हाउस में नहीं होता तो लियो वेटिकन में नहीं होते। ट्रंप ने आगे कहा कि अपराध और परमाणु हथियारों के मामले में लियो की कमजोरी मुझे रास नहीं आती और न ही यह तथ्य कि वे ओबामा के समर्थक डेविड एक्सलरोड से मिलते हैं, जो वामपंथी विचारधारा का एक हारा हुआ व्यक्ति है, जो चर्च जाने वालों और पादरियों की गिरफ्तारी चाहता था। ट्रंप ने कहा लियो को कट्टर वामपंथियों को खुश करना बंद करना चाहिए और एक महान पोप बनने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि नेता बनने पर।

ईरान युद्ध पर मुखर होकर बोल रहे पोप लियो

बता दें कि लियो XIV पहले अमेरिकी पोप हैं जो अमेरिका और इज़रायल के ईरान के साथ युद्ध के बारे में लगातार मुखर हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने ईरान के लोगों के खिलाफ ट्रंप की बयानबाजी और धमकियों की निंदा करते हुए उन्हें पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया था। यह टिप्पणी ट्रंप की उस धमकी के जवाब में आई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ दो सप्ताह के संघर्ष विराम पर सहमति बनने से कुछ घंटे पहले "आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी।"

अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता टूटी, जानें कहां फंसा पेच

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जिसका डर था वहीं हुआ। ईरान-अमेरिका की शांति वार्ता पहले दौर में ही दम तोड़ गई। अमेरिका-ईरान के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटों तक चली शांति वार्ता बेनतीजा रही। इस कूटनीतिक प्रयास के विफल होने के साथ ही पश्चिम एशिया में संकट गहराने की संभावना बढ़ गई है। शांति वार्ता असफल होने के बाद से अमेरिका-इजराइल के एक बार फिर से आक्रामक रुख अपनाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

ईरान ने अमेरिकी शर्तों को मानने से किया इनकार

अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में चल रही बेनतीजा रही बातचीत को लेकर अमेरिका के मुख्य वार्ताकार उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रविवार सुबह इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि क्योंकि ईरान ने हमारी शर्तें मानने से मना कर दिया है। साथ ही यह भी कहा कि कोई समझौता नहीं हो पाया है।

वेंस ने कहा- ईरान के लिए ज्यादा बुरी खबर

वेंस ने कहा कि हमने ईरानियों के साथ कई अहम बातचीत की है, जो अच्छी खबर है। बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह अमेरिका के नहीं बल्कि ईरान के लिए ज्यादा बुरी खबर है।

ईरान ने क्या कहा?

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने कहा कि हमने कई मुद्दों पर सहमति बनाई, लेकिन 2-3 महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद थे, और अंततः वार्ता किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकी। वार्ता का यह दौर एक साल में सबसे लंबा था। कूटनीति कभी समाप्त नहीं होती। यह राष्ट्रीय हितों की रक्षा का एक साधन है। राजनयिकों को युद्ध और शांति दोनों समय में अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

पाकिस्तान ने की युद्धविराम जारी रखने की मांग

21 घंटों तक चली बातचीत के विफल होने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने दोनों देशों का बातचीत की मेज पर आने के लिए धन्यवाद किया। इसी के साथ उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच युद्धविराम समझौता जारी रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं, युद्धविराम की समयसीमा बढ़े और दोनों पक्ष युद्धविराम का पालन करें।

पाकिस्तान में बैठी “पंचायत”, शांति वार्ता से पहले धमकी और चेतावनी, अमेरिका-ईरान के बीच हो पाएगा सुलह?

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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज से शुरू होने वाली अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है। पश्चिम एशिया में एक महीने से ज्यादा वक्त से जारी जंग और हालिया युद्धविराम के बीच यह बातचीत बेहद अहम मानी जा रही है। शांति वार्ता के लिए ईरान का प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच गया है. इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बगर कालिबाफ कर रहे हैं। इधर अमेरिका की ओर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भारी-भरकम दल के साथ इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। हालांकि, वार्ता से पहले ईरान ने अमेरिका के सामने बड़ी शर्त रखी है। वहीं, अमेरिका भी धमकी देने से नहीं चूका।

बातचीत से पहले ईरान ने रखीं दो शर्तें

वार्ता से पहले ईरान ने अपनी शर्तें भी साफ कर दी हैं। ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा है कि बातचीत शुरू होने से पहले लेबनान में युद्धविराम लागू होना चाहिए और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियां रिलीज की जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इन शर्तों के बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी।

अमेरिका ने शांति वार्ता से पहले दी है चेतावनी

इससे पहले, इस्लामाबाद जाने वाले विमान में सवार होने से पहले वैंस ने मीडिया से कहा, "जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, अगर ईरानी सद्भावना से बातचीत करने को तैयार हैं, तो हम निश्चित रूप से उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं। अगर वे हमें धोखा देने की कोशिश करेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि हमारी वार्ताकार टीम इतनी सहृदय नहीं है।"

पाकिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी

इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस वार्ता को ‘मेक ऑर ब्रेक’ बताया है। इस्लामाबाद में सेरेना होटल को वार्ता के लिए पूरी तरह खाली कराकर सुरक्षा घेरे में लिया गया है। शहर को हाई अलर्ट पर रखा गया है और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई है। पाकिस्तानी एयरफोर्स और उसके एयर डिफेंस एक्टिव हैं।

ईरान-अमेरिका सीजफायर में पाकिस्तान मध्यस्थ या मोहरा? जानें क्यों उठ रहे सवाल

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अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर हो गया है। इसमें पाकिस्तान की अहम भूमिका सामने आई है, जिसे खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया है। लेकिन पाकिस्तान यहां भी अपनी नापाक हरकत से बाज नहीं आया है। ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर पाकिस्तान खुद को शांति दूत के रूप में पेश कर रहा है। शांति वार्ता की मेजबानी कर वह अपनी छाती ठोक रहा है। लेकिन, सच्चाई कुछ अलग है।

पाक मात्र एक मैसेंजर

ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक असल में व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान को दबाव डालकर इस्तेमाल किया। इस्लामाबाद कोई न्यूट्रल ब्रोकर नहीं था। वह सिर्फ अमेरिका का सुविधाजनक मैसेंजर बनकर रह गया। रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका ने पाकिस्तान पर जोर डाला कि वह वाशिंगटन का प्रस्ताव तेहरान तक पहुंचाए। पाकिस्तान को सक्रिय भूमिका नहीं दी गई, बल्कि सिर्फ एक चैनल बनाया गया।

यूएस ने पाकिस्तान को ही क्यों चुना?

रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका को लगा कि ईरान मुस्लिम पड़ोसी देश के जरिए आने वाले ऑफर को ज्यादा आसानी से मान लेगा। यही वजह थी कि पाकिस्तान को चुना गया।

इजरायल के राजदूत ने भी उठाया सवाल

अमेरिका-ईरान के बीच दो सप्ताह के सीजफायर पर पाकिस्तान खुद की अपनी पीठ थपथपा रहा है। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने भी उसकी मध्यस्थ की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। इजरायली राजदूत रूवेन ने अमेरिका-ईरान के बीच चल रही सीजफायर की बातचीत में मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका पर संदेह जताया है। उन्होने कहा, इजरायल इस्लामाबाद को एक "विश्वसनीय पक्ष" के रूप में नहीं देखता है। रूवेन अजार ने कहा, 'हम पाकिस्तान को एक भरोसेमंद पक्ष के रूप में नहीं देखते हैं. मुझे लगता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने निजी कारणों से पाकिस्तान की मध्यस्थता का इस्तेमाल करने का फैसला लिया है।

किसके इशारों पर नाच रहा पाक?

वहीं, 'फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज' (FDD) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और अमेरिकी ट्रेजरी के पूर्व एनालिस्ट जोनाथन श्नाइजर ने पाकिस्तान की इस भूमिका पर गंभीर संदेह जताते हुए पूछा है कि क्या पाकिस्तान वाकई शांति चाहता है या वह सिर्फ चीन के इशारों पर नाच रहा है? जोनाथन श्नाइजर का मानना है कि पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति उसे स्वतंत्र फैसले लेने की अनुमति नहीं देती है। पाकिस्तान, चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) और 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' में बुरी तरह फंसा हुआ है। श्नाइजर ने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान अमेरिका के साथ नए गठबंधन बनाकर अपनी स्थिति सुधारना चाहता है या वह केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 'माउथपीस' के तौर पर काम कर रहा है।

कौन कर रहा पाकिस्तान की गाड़ी ड्राइव, क्या अमेरिका लिख रहा शहबाज शरीफ की X पोस्ट क्या?

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सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भारी किरकिरी हो रही है। अमेरिका और ईरान में तनाव के बीच खुद को चौधरी दिखाने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पोल खुल गई है। शहबाज शरीफ के मात्र एक पोस्ट से ईरान जंग के सीजफायर पर पाकिस्तान के रोल पर सवाल खड़े हो गए हैं। जिसके बाद सवाल उठ रहे है कि क्या पाकिस्तान को अमेरिकी की तरफ से कंट्रोल किया जा रहा है?

कैसी है पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका?

दरअसल, पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की एक सोशल मीडिया पोस्ट की। शहबाज शरीफ ने मंगलवार को एक्स पर एक पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान के खिलाफ संभावित कार्रवाई की समयसीमा बढ़ाने की अपील की थी। उन्होंने लिखा था कि कूटनीति को आगे बढ़ने का मौका देने के लिए समय सीमा को दो सप्ताह तक बढ़ाया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने ईरान से होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का भी आग्रह किया था, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम है।

ऐसे शुरू हुआ विवाद

सारा विवाद तब शुरू हुआ, जब सोशल मीडिया यूजर्स ने शहबाज शरीफ के पोस्ट की ‘एडिट हिस्ट्री’ पर ध्यान दिया। यूजर्स का ध्यान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की पोस्ट की ‘एडिट हिस्ट्री’ पर चला गया, जिससे पता लगता है कि उनकी इस पोस्ट को किसी दूसरे ने तैयार किया है। स्क्रीनशॉट के अनुसार, उस पोस्ट के शुरुआती संस्करण में सबसे ऊपर लिखा था: ‘Draft – Pakistan’s PM Message on X यानी ड्राफ्ट- एक्स पर पाकिस्तान के पीएम का संदेश।’

सिर्फ टेक्निकल गलती थी या कोई बड़ा संदेश

ऐसा होना यह केवल एक छोटी सी टेक्निकल गलती थी या कोई बड़ा इशारा? किसी देश के प्रधानमंत्री के ऑफिशियल कम्युनिकेशन में ड्राफ्ट शब्द लिखा होना बड़े सवाल पैदा करता है, लेकिन क्या ये पाकिस्तान के अधिकारियों की लापरवाही थी या फिर किसी बड़ी बात का संकेत। सवाल उठ रहें है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति ने ये ड्राफ्ट पाकिस्तान को भेजा था। या फिर किसी और ने भेजा था।

कौन कर रहा पाकिस्तान की गाड़ी ड्राइव?

आलोचकों का कहना है कि यह किसी लीडर के अपनी आवाज में बोलने जैसा कम और उसके लिए तैयार किए गए टेम्पलेट जैसा अधिक लगता है। इस घटना ने जियोपॉलिटिकल सर्कल में एक लंबे समय से चली आ रही सोच को और बढ़ा दिया है कि पाकिस्तान के स्ट्रेटेजिक और डिप्लोमैटिक फैसले अक्सर बाहरी ताकतों से प्रभावित होते हैं।

पाकिस्तान बना मुखौटा, चीन सीजफायर का सूत्रधार, ईरान को बातचीत के लिए किया तैयार

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अमेरिका और ईरान के बीच 5 हफ्तों से ज्यादा तक चली जंग के बाद बुधवार 8 अप्रैल की सुबह राहत भरी खबर आई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों तक हमले रोकने की घोषणा की। ट्रंप ने इसे दो तरफा युद्धविराम बताया और कहा कि यह इस शर्त पर होगा कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से खोलेगी।

चीन ने पर्दे के पीछे रहकर किया काम

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि यह फैसला पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ की अपील के बाद लिया गया। अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्ते के सीजफायर के पीछे चीन की अहम भूमिका सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि चीन ने पर्दे के पीछे रहकर ईरान को बातचीत के लिए तैयार करने में मदद की। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह डील पाकिस्तान की मध्यस्थता और आखिरी समय में चीन के दखल के बाद संभव हो पाई।

आखिरी समय में चीन के दखल आई काम

अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने युद्धविराम में अहम भूमिका निभाई है। ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध में दो हफ्ते के सीजफायर के फैसले के पीछे पाकिस्तान के अलावा चीन की बड़ी भूमिका सामने आई है। न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान के जोरदार प्रयास के साथ-साथ चीन ने आखिरी मिनट में दखल देकर ईरान को समझाया और तनाव कम किया। रिपोर्ट की मानें तो चीन ने ईरान को साफ चेतावनी दी कि अगर ट्रंप अपनी धमकी के मुताबिक ईरान के एनर्जी साइट्स और बुनियादी ढांचे पर हमला करते हैं तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी।

ट्रंप बोले- चीन ने ईरान को किया तैयार

सीजफायर को लेकर ट्रंप ने कहा है कि चीन ने ईरान को बातचीत के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। एक टेलीफोनिक बातचीत में उनसे पूछा गया कि क्या चीन ने ईरान को सीजफायर के लिए प्रेरित किया। इस पर ट्रंप ने कहा, “हां, मैंने सुना है”। हालांकि, इस मुद्दे पर चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया आना बाकी है।

संघर्ष के बाद से ही चीन सीजफायर के लिए था प्रयासरत

वहीं, वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता लियू पेंगयू ने कहा कि संघर्ष शुरू होने के बाद से ही चीन सीजफायर और युद्ध खत्म कराने के लिए काम कर रहा था। उन्होंने कहा कि चीन हर उस प्रयास का स्वागत करता है जो शांति की दिशा में हो और सभी पक्षों को बातचीत के जरिए मतभेद खत्म करने चाहिए। चीन ने उम्मीद जताई कि सभी संबंधित पक्ष इस मौके का फायदा उठाकर जल्द से जल्द संघर्ष खत्म करेंगे। गौरतलब है कि चीन इससे पहले 2023 में ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौता कराने में भी अहम भूमिका निभा चुका है।

अमेरिका-ईरान में 2 हफ्ते का सीजफायर, 40वें दिन रुकी जंग

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मिडिल ईस्ट के लिए आज की सुबह एक बड़ी राहत लेकर आई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण जंग पर 40 दिनों के बाद सीजफायर हो गया है। दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर दो हफ्तों के सीजफायर यानी युद्धविराम की घोषणा कर दी है।

ट्रंप ने ईरानी सभ्यता ही खत्म करने की दी थी धमकी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (स्थानीय समयानुसार) को कहा कि वे दो हफ्तों के लिए ईरान पर बमबारी रोकने पर सहमत हो गए हैं। यह सहमति उनकी डेडलाइन की रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 5.30 बजे) की समय सीमा से दो घंटे से भी कम समय पहले बनी। ट्रंप ने डेडलाइन पूरी होने पर पूरी सभ्यता को तबाह करने की धमकी दी थी।

अमेरिका-ईरान के बीच पुराने विवादों पर सहमति

ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल मीडिया पर दो हफ्तों के युद्धविराम समझौते की जानकारी दी और कहा कि यह समझौता इस शर्त पर किया गया है कि ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने पर सहमत हो। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, अमेरिका पहले ही अपने कई सैन्य लक्ष्य हासिल कर चुका है और अब ईरान के साथ दीर्घकालिक शांति समझौते की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान की तरफ से 10 बिंदुओं का एक प्रस्ताव मिला है, जिसे बातचीत के आधार के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच पुराने विवादों के अधिकतर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुआ सीजफायर?

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर के साथ हुई बातचीत के आधार पर- जिसमें उन्होंने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं आज रात ईरान भेजे जा रहे विनाशकाली बल को रोक लूं- और इस शर्त पर कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित रूप से खोलने पर सहमत हो, मैं दो हफ्ते की अवधि के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को रोकने पर सहमत हूं। यह एक दो-तरफा युद्धविराम होगा।'

ईरान ने क्या कहा?

वहीं, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान पोस्ट करके युद्ध-विराम स्वीकार करने की बात कहीय़ उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री शरीफ की ट्वीट में की गई भाईचारे वाली अपील के जवाब में, और अमेरिका द्वारा उसके 15 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के आधार पर बातचीत की मांग को देखते हुए, साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान के 10 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के सामान्य ढांचे को बातचीत का आधार मानने की घोषणा को ध्यान में रखते हुए, मैं ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से यह घोषणा करता हूं: अगर ईरान पर हमले रुक जाते हैं, तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं अपनी रक्षात्मक कार्रवाई रोक देंगी।”

उन्होंने आगे कहा, “दो हफ्तों की अवधि के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही संभव होगी, लेकिन इसके लिए ईरान की सशस्त्र सेनाओं के साथ समन्वय (कॉर्डिनेट) करना होगा और कुछ तकनीकी सीमाओं का भी ध्यान रखना होगा।”

ट्रंप ने दिया था 48 घंटे का अल्टीमेटम

बता दें कि, ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया चुके था, लेकिन बाद में इस समय-सीमा को कई बार बढ़ाया गया। फिर इसे बढ़ाकर 8 अप्रैल की रात तक कर दिया गया था। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि समझौते की संभावना अभी भी है, लेकिन अगर बात नहीं बनी तो वे 'सब कुछ खत्म कर देंगे।' उन्होंने यह भी दावा किया था कि ईरान के आम लोग अपनी सरकार से खुश नहीं हैं और वे अमेरिका की कार्रवाई का समर्थन कर सकते हैं।

एस जयशंकर ने ईरान, यूएई और कतर से की बात, पश्चिम एशिया के हालात पर हुई चर्चा

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अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के चलते पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रविवार शाम को कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अपने समकक्षों के साथ टेलीफोन पर बातचीत की और क्षेत्र के बिगड़ते सुरक्षा हालातों पर चर्चा की। कतर और यूएई के नेताओं से बात करने के तुरंत बाद, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची का फोन आया। 

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जसीम अल थानी से पश्चिम एशिया संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर उसके असर को लेकर रविवार को चर्चा की। विदेश मंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान से भी फोन पर बातचीत की।

युद्ध और तनाव पर पर चर्चा

विदेश मंत्री जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस बातचीत की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के साथ क्षेत्र में चल रहे युद्ध और तनाव पर विचार साझा किए गए। इसके बाद जयशंकर ने यूएई के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान से संपर्क किया। उन्होंने पश्चिम एशिया की उभरती स्थिति पर विस्तार से चर्चा की।

ईरान के विदेश मंत्री का आया फोन

इसी कड़ी में ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची ने भी डॉ. जयशंकर को फोन किया। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोशल मीडिया पर यह बताया है कि उनके पास ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का फोन आया। दोनों नेताओं ने वेस्ट एशिया में चल रही टेंशन को लेकर लंबी बातचीत की।

ट्रंप की चेतावनी के बीच बढ़ी हलचल

ईरान के विदेश मंत्री, कतर के प्रधानमंत्री और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री से जयशंकर की फोन पर बातचीत ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दी गई हालिया चेतावनी के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट को नौवहन के लिए फिर से नहीं खोला गया तो ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों को नष्ट कर दिया जाएगा।