RSF की प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट: वैश्विक पैमाना या भारत की अधूरी तस्वीर?

डॉ. पंकज सोनी

Reporters Without Borders (RSF) की सालाना रिपोर्ट पर भरोसा करने से पहले एक बुनियादी सवाल है—यह बनती कैसे है? किसके संसाधनों से, किन स्रोतों के आधार पर और किस दृष्टिकोण के साथ? 140 करोड़ की आबादी, दर्जनों भाषाओं और सैकड़ों संस्कृतियों वाले भारत की प्रेस स्वतंत्रता क्या पेरिस में बैठकर तैयार प्रश्नावलियों से मापी जा सकती है?

हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पेरिस स्थित एक NGO Reporters Without Borders (RSF) अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी करता है। इस रिपोर्ट में भारत का स्थान प्रायः 150 के बाद ही दिखाई देता है। 2026 की रिपोर्ट में भारत 157वें स्थान पर है, जबकि 2025 में भी यही रैंक और 2024 में 159वां स्थान था।

रिपोर्ट आते ही देश का एक वर्ग चिंतित स्वर में कहता है—“लोकतंत्र खतरे में है”, “पत्रकारिता समाप्त हो रही है”, “प्रेस पर दबाव बढ़ गया है।” लेकिन इन प्रतिक्रियाओं के बीच एक मूल प्रश्न अक्सर अनदेखा रह जाता है—यह सूचकांक तैयार कैसे होता है? भारत इसमें लगातार पीछे क्यों रहता है?

दरअसल, RSF एक फ्रांसीसी गैर-सरकारी संगठन है, जिसकी फंडिंग के स्रोत पूरी तरह पारदर्शी नहीं माने जाते। यूरोपीय सरकारें और कुछ निजी फाउंडेशन इसे सहयोग देते हैं। इसका प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक मुख्यतः सर्वेक्षण, धारणाओं और सीमित केस स्टडी पर आधारित होता है। यह कोई पूर्णतः वैज्ञानिक या वस्तुनिष्ठ मापदंड नहीं, बल्कि चुनिंदा लोगों की राय का संकलन है, जिसमें पश्चिमी उदारवादी मूल्यों को पत्रकारिता का मानक मान लिया जाता है।

यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—क्या इतने विशाल और विविध देश की मीडिया स्वतंत्रता का आकलन सीमित प्रश्नावलियों के आधार पर किया जा सकता है? भारत में प्रेस स्वतंत्रता का मूल्यांकन यहाँ के संविधान, न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में होना चाहिए, न कि केवल किसी बाहरी संस्था के आकलन से।

इस रिपोर्ट का एक बड़ा विरोधाभास यह भी है कि इसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को कई बार भारत से बेहतर स्थान दिया गया है। पाकिस्तान में पत्रकारों के लापता होने, मीडिया पर सैन्य दबाव और वरिष्ठ पत्रकार Arshad Sharif की हत्या जैसी घटनाएं व्यापक रूप से सामने आ चुकी हैं। वहीं बांग्लादेश में डिजिटल सुरक्षा कानून के तहत पत्रकारों पर कार्रवाई के मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में यह तुलना स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े करती है।

वैश्विक स्तर पर भी मीडिया स्वतंत्रता की स्थिति जटिल है। अमेरिका में Julian Assange के खिलाफ लंबे समय तक कानूनी कार्रवाई चली। पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने मीडिया को “एनिमी ऑफ द पीपल” तक कहा। रूस और चीन में मीडिया पर राज्य का प्रभाव जगजाहिर है। इसके बावजूद RSF रैंकिंग में इन देशों की स्थिति अपेक्षाकृत कम आलोचनात्मक दिखाई देती है, जिससे भू-राजनीतिक पूर्वाग्रह की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

International Federation of Journalists (IFJ) के अनुसार 2025 में दुनिया भर में 128 पत्रकारों की हत्या हुई, जिनमें अधिकांश मध्य-पूर्व और संघर्ष क्षेत्रों से थे। भारत में ऐसे मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही, और हर घटना पर न्यायिक व प्रशासनिक प्रक्रिया सक्रिय होती है।

भारत की जमीनी तस्वीर देखें तो यहाँ 900 से अधिक सैटेलाइट चैनल, 17,000 से ज्यादा पंजीकृत समाचारपत्र और लाखों डिजिटल प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं। अनेक मीडिया संस्थान सरकार की खुलकर आलोचना करते हैं और निर्बाध रूप से कार्य कर रहे हैं। संसद, न्यायपालिका और सोशल मीडिया—तीनों स्तरों पर अभिव्यक्ति की विविधता स्पष्ट दिखाई देती है।

हालाँकि, भारतीय पत्रकारिता की एक चुनौती यह भी है कि बिना प्रशिक्षण या मान्यता के बड़ी संख्या में लोग मीडिया के नाम पर सक्रिय हो गए हैं। कुछ मामलों में यह स्थिति अव्यवस्था और अविश्वसनीयता को जन्म देती है, जो समग्र तस्वीर को प्रभावित करती है।

RSF की निष्पक्षता पर सवाल केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। The GuardianGlobal Times और अन्य संस्थानों द्वारा इसके वित्तीय स्रोतों व दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाए गए हैं। यहाँ तक कि Encyclopaedia Britannica में भी कुछ संदर्भों में इसके संभावित पक्षपात का उल्लेख मिलता है।

स्पष्ट है कि RSF का सूचकांक एक उपयोगी संकेतक हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम सत्य मानना उचित नहीं। उतना ही गलत इसे पूरी तरह खारिज कर देना भी होगा।

भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में प्रेस स्वतंत्रता का मूल्यांकन बहुआयामी दृष्टिकोण से ही संभव है—जहाँ वैश्विक सूचकांक, स्थानीय वास्तविकता और संस्थागत अनुभव, तीनों को संतुलित रूप से समझा जाए।

(लेखक जनसंपर्क विभाग भोपाल में सहायक मीडिया सलाहकार हैं और यह इनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

यह जानकर राहत मिली कि ट्रंप सुरक्षित, डिनर पार्टी में फायरिंग पर पीएम मोदी की प्रतिक्रिया

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व्हाइट हाउस के डिनर प्रोग्राम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में हुई ताबड़तोड़ फायरिंग पर भारत की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। साथ ही उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को टैग कर आगे कहा कि यह जानकर राहत मिली कि वो और उनकी पत्नी ठीक हैं।

पीएम मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, 'यह जानकर राहत मिली कि वाशिंगटन डीसी के एक होटल में हुई हालिया सुरक्षा घटना के बाद राष्ट्रपति ट्रंप, फर्स्ट लेडी मेलानिया और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस सुरक्षित और स्वस्थ हैं। मैं उनकी निरंतर सुरक्षा और कुशल मंगल की कामना करता हूं। लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है और इसकी स्पष्ट रूप से निंदा की जानी चाहिए।'

ट्रंप ने भी दी हमले की जानकारी

वहीं, इस घटना के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक अपडेट शेयर किया, जिसमें उन्होंने कन्फर्म किया कि स्थिति कंट्रोल में आ गई है और सिक्योरिटी एजेंसियों के तुरंत प्रतिक्रिया की तारीफ की। उन्होंने बताया कि संदिग्ध को पकड़ लिया गया है और कहा कि इवेंट को जारी रखने के बारे में कोई भी फैसला लॉ एनफोर्समेंट अथॉरिटीज करेंगी।

सुरक्षा बलों की तत्परता से टली बड़ी घटना

बता दें कि यह घटना उस समय हुई जब वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस संवाददाता डिनर चल रहा था। इसी दौरान एक व्यक्ति हथियारों और चाकू के साथ होटल की लॉबी में घुस गया और बॉलरूम की ओर बढ़ने लगा, जहां बड़ी संख्या में अमेरिकी नेता और पत्रकार मौजूद थे। जैसे ही संदिग्ध व्यक्ति ने आगे बढ़ने की कोशिश की, तुरंत तैनात सीक्रेट सर्विस के जवानों ने तेजी से कार्रवाई करते हुए उसे काबू में ले लिया और हिरासत में ले लिया। सुरक्षा बलों की तत्परता की वजह से एक बड़ा हादसा टल गया।

डोनाल्ड ट्रंप पर हमला, बाल-बाल बचे अमेरिकी राष्ट्रपति, वॉइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में फायरिंग

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा में बड़ी चूक सामने आई है। वॉशिंगटन के हिल्टन होटल में शनिवार रात एक कार्यक्रम के दौरान अचानक गोलीबारी की घटना हुई, जिससे वहां हड़कंप मच गया। कार्यक्रम में जब गोली चली, उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति और फर्स्ट लेडी मंच पर ही मौजूद थीं। गोली चलने की आवाज सुनकर कार्यक्रम स्थल पर अफरा-तफरी मच गई, जिसके बाद सीक्रेट सर्विस एजेंट्स ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तुरंत वहां से निकाला।

CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही गोलियों की आवाज सुरक्षा एजेंसियों ने सुनी, वैसे ही यूएस सीक्रेट सर्विट तुरंत एक्टिव हो गई। एजेंट्स ने तेज आवाज में अलर्ट देते हुए ट्रंप को स्टेज से हटाया और बाहर ले गए। उनके साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और कैबिनेट के अन्य सदस्य भी मौजूद थे, जिन्हें भी तुरंत सुरक्षित जगह पहुंचाया गया।

ट्रंप के साथ वेंस भी थे मौजूद

राजधानी वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान गोलीबारी की घटना को अंजाम दिया गया। इस कार्यक्रम में ट्रंप के साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और विदेश मंत्री मार्को रुबियो भी मौजूद थे।

हमलावर पकड़ा गया

घटना के लगभग एक घंटे बाद डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया है जिसमें उन्होंने जानकारी दी है। ट्रंप ने बताया कि हमलावर को पकड़ लिया गया है और स्थिति से निपटने के लिए सीक्रेट सर्विस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जमकर तारीफ की। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'वॉशिंगटन डीसी में आज क्या शाम रही। सीक्रेट सर्विस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने शानदार काम किया है।'

हमारे संविधान पर हुआ हमला- ट्रंप

ट्रंप ने कहा कि यह सब कुछ अचानक हुआ। एक आदमी कई हथियारों से लैस होकर सिक्योरिटी चेकपाइंट पर घुस गया। इस दौरान सीक्रेट सर्विस ने बहुत अच्छा काम किया और तेजी से एक्शन लेते हुए उसे पकड़ लिया। उन्होंने आगे कहा कि आदमी ने हमारे संविधान पर हमला किया है। 

एक अधिकारी को लगी गोली

गोलीबारी की घटना का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि एक अधिकारी को लगी है, लेकिन वह बच गया, क्योंकि उसने एक बहुत अच्छी बुलेटप्रूफ जैकेट पहनी हुई थी। उसे बहुत करीब से बंदूक से गोली मारी गई और जैकेट ने अपना काम किया। वह बहुत अच्छा है। वह बहुत अच्छी स्थिति में है, उसका मनोबल बहुत ऊंचा है और हमने उससे कहा कि हम उससे प्यार करते हैं और उसका सम्मान करते हैं।

अमेरिका में नौकरी पाना होगा मुस्किल! ट्रंप के सांसदों ने संसद में पेश H-1B वीजा को रोकने का बिल

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अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में बीते एक वर्षों में विदेशियों के प्रवास का मुद्दा गर्माया हुआ है। ट्रंप प्रशासन न सिर्फ अवैध प्रवासियों, बल्कि अब वैध तौर पर अमेरिका में काम के लिए जाने वाले लोगों को भी निशाना बना रहा है। इसी बीच ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसदों ने अमेरिकी संसद में एच-1बी वीजा पर रोक लगाने का प्रस्ताव पेश किया है।

बिल में आश्रितों को लाने की अनुमति नहीं देने का प्रस्ताव

एरिजोना से सांसद एली क्रेन ने ‘एंड एच-1बी वीजा एब्यूज एक्ट ऑफ 2026’ पेश किया, जिसे सात अन्य रिपब्लिकन सांसदों ने भी समर्थन दिया है। विधेयक में एच-1बी कार्यक्रम में सुधारों का प्रस्ताव है, जिसमें वार्षिक सीमा को 65,000 से घटाकर 25,000 करना, न्यूनतम वेतन 2,00,000 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष निर्धारित करना और एच-1बी वीजा धारकों को आश्रितों को अमेरिका लाने की अनुमति नहीं देना शामिल है।

अमेरिकी कर्मचारी का ना मिलना करना होगा साबित

बिल में एच-1बी कार्यक्रम में लॉटरी प्रणाली को वेतन-आधारित चयन प्रणाली से बदलने के साथ ही नियोक्ताओं को यह प्रमाणित करना अनिवार्य होगा कि उन्हें कोई योग्य अमेरिकी कर्मचारी नहीं मिल पा रहा है और उन्होंने छंटनी नहीं की है। एच-1बी कर्मचारियों को एक से ज्यादा नौकरियां करने से रोकना और तृतीय-पक्ष भर्ती एजेंसियों की ओर से उन्हें रोजगार देने पर प्रतिबंध लगाना शामिल है।

विधेयक पारित हुआ तो भारत पर क्या होगा असर?

अगर अमेरिकी संसद में रखा गया एंड एच-1बी वीजा अब्यूज एक्ट पारित हो जाता है, तो भारत पर इसका नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है। क्योंकि एच-1बी वीजा हासिल करने वालों में भारत का पहला स्थान है। भारतीय पेशेवर एच-1बी कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। वित्त वर्ष 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, कुल मंजूर 3,99,395 एच-1बी याचिकाओं में से 71% (करीब 2.83 लाख वीजा) सिर्फ भारतीयों को मिले थे। वर्ष 2015 से 70 प्रतिशत से ज्यादा एच-1बी वीजा से जुड़ी मंजूरी भारतीयों को ही मिल रही है। अगर यह विधेयक पारित होता है तो अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के लिए एफ-1 (स्टूडेंट वीजा) से ओपीटी (छात्रों को काम करने की मंजूरी देने वाला कार्यक्रम) संकट में पड़ जाएगा। इसके अलावा एच-1बी और अंत में ग्रीन कार्ड तक पहुंचने का दशकों पुराना स्थापित मार्ग पूरी तरह से टूट जाएगा। इस विधेयक के चलते भारतीय पेशेवरों के अमेरिका में नौकरी के लिए प्रवेश पर या तो पूरी तरह रोक लग जाएगी या इसमें भारी देरी होगी।

यूएस-ईरान शांति वार्ताःडील के लिए ट्रंप खुद पहुंच सकते हैं पाकिस्तान

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अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही है। इस बीच खबर आ रही है कि डोनाल्ड ट्रंप भी ईरान के साथ इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता में समझौता होने की स्थिति में खुद भी शामिल हो सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे राउंड की युद्धविराम वार्ता होने की उम्मीद अब काफी बढ़ गई है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने चर्चा में शामिल एक पाकिस्तानी सूत्र के हवाल से कहा है कि बातचीत के फिर से शुरू करने की दिशा में प्रगति हो रही है। उन्होंने ये भी संकेत दिया है कि अगर ईरान के साथ कोई समझौता हो जाता है तो या तो खुद डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान आ सकते हैं या फिर ऑनलाइन माध्यम से इसमें शामिल हो सकते हैं।

ट्रंप ने दी बम बरसाने की धमकी

ये खबर ऐसे वक्त में आई है, जब ईरान-अमेरिका वार्ता में लगातार गतिरोध चल रहा है। इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और उन्होंने दावा किया है कि ईरान को समझौता करना ही होगा। उन्होंने अपनी ताजा धमकी में कहा कि अगर ईरान समझौता नहीं करेगा, तो बम बरसेंगे। हालांकि इसके बाद भी ईरान ने अड़ियल रवैया जारी रखा है।

पाकिस्तान के लिए अब तक नहीं रवाना हुआ ईरानी प्रतिनिधिमंडल

ईरान की सरकारी टेलीविजन रिपोर्ट के अनुसार अभी तक कोई भी ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान में होने वाली शांति वार्ता में भाग लेने के लिए रवाना नहीं हुआ है। यह वार्ता अमेरिका के साथ संभावित शांति वार्ता से जुड़ी बताई जा रही है, जिसे लेकर क्षेत्रीय स्तर पर काफी चर्चा बनी हुई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की ओर से फिलहाल किसी भी डेलीगेशन के पाकिस्तान जाने की पुष्टि नहीं की गई है, जिससे इस बैठक को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।

इन मामलों पर विवाद बरकरार

-ईरान का परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करे, जबकि तेहरान का कहना है कि किसी भी प्रतिबंध की समयसीमा सीमित होनी चाहिए।

-यूरेनियम भंडार: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ईरान के लगभग 400 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण चाहता है, लेकिन ईरान ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है।

-स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: ईरान का कहना है कि वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर प्रतिबंध तब तक जारी रखेगा जब तक अमेरिका अपने प्रतिबंध नहीं हटाता, जबकि अमेरिका का रुख सख्त बना हुआ है।

-जमे हुए आर्थिक संपत्ति: ईरान करीब 20 अरब डॉलर की फ्रीज़्ड संपत्तियों को जारी करने और प्रतिबंधों में राहत की मांग कर रहा है।

-युद्ध क्षतिपूर्ति: तेहरान ने अमेरिका और इस्राइल के हमलों से हुए नुकसान के बदले लगभग 270 अरब डॉलर के मुआवजे की भी मांग उठाई है।

ट्रंप ने ‘पोप’ को भी नहीं बख्शा, ईरान युद्ध पर की आलोचना तो भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति

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अमेरिका-ईरान जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर अब कैथोलिक पोप लियो आ गए हैं। ट्रंप ने पोप लियो की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि हमें ऐसा पोप पसंद नहीं जो यह कहे कि परमाणु हथियार रखना ठीक है। ईरान के साथ संघर्ष और पाकिस्तान में आयोजित बातचीत विफल होने के बाद पोप लियो ने ट्रंप की कड़ी आलोचना की। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में पोप पर तीखा पलटवार किया।

सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आलोचना

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में पोप की आलोचना करते हुए लिखा कि पोप लियो अपराध के मुद्दे पर कमजोर हैं और विदेश नीति के लिए खराब हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसे पोप को पसंद नहीं करते जो यह मानते हों कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना ठीक है।

मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए-ट्रंप

ट्रंप ने पोप लियो के भाई लुईस की तारीफ की और कहा कि मुझे उनका भाई लुई उनसे कहीं ज्यादा पसंद है, क्योंकि लुईस पूरी तरह से MAGA समर्थक हैं। उन्हें बात समझ आती है, पर लियो को नहीं! उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो ईरान के पास परमाणु हथियार होने को जायज समझे। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो यह सोचे कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर हमला करना भयानक था, जो भारी मात्रा में ड्रग्स, अपराधियों, ड्रग डीलरों को अमेरिका भेजने से कृत्यों में शामिल था। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की आलोचना करे, क्योंकि मैं वही कर रहा हूं, जिसके लिए मुझे भारी बहुमत से चुना गया था- अपराध दर को रिकॉर्ड निचले स्तर पर लाना और इतिहास का सबसे बड़ा शेयर बाजार बनाना।

कट्टर वामपंथियों को खुश करने का लगाया आरोप

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि लियो को शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि सभी जानते हैं कि पोप बनने के लिए उनका नाम किसी भी लिस्ट में नहीं था और चर्च ने उन्हें केवल इसलिए पोप बनाया क्योंकि वे एक अमेरिकी थे। उन्हें लगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से निपटने का यही सबसे अच्छा तरीका होगा। उन्होंने आगे कहा कि अगर मैं व्हाइट हाउस में नहीं होता तो लियो वेटिकन में नहीं होते। ट्रंप ने आगे कहा कि अपराध और परमाणु हथियारों के मामले में लियो की कमजोरी मुझे रास नहीं आती और न ही यह तथ्य कि वे ओबामा के समर्थक डेविड एक्सलरोड से मिलते हैं, जो वामपंथी विचारधारा का एक हारा हुआ व्यक्ति है, जो चर्च जाने वालों और पादरियों की गिरफ्तारी चाहता था। ट्रंप ने कहा लियो को कट्टर वामपंथियों को खुश करना बंद करना चाहिए और एक महान पोप बनने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि नेता बनने पर।

ईरान युद्ध पर मुखर होकर बोल रहे पोप लियो

बता दें कि लियो XIV पहले अमेरिकी पोप हैं जो अमेरिका और इज़रायल के ईरान के साथ युद्ध के बारे में लगातार मुखर हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने ईरान के लोगों के खिलाफ ट्रंप की बयानबाजी और धमकियों की निंदा करते हुए उन्हें पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया था। यह टिप्पणी ट्रंप की उस धमकी के जवाब में आई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ दो सप्ताह के संघर्ष विराम पर सहमति बनने से कुछ घंटे पहले "आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी।"

अमेरिका-ईरान में 2 हफ्ते का सीजफायर, 40वें दिन रुकी जंग

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मिडिल ईस्ट के लिए आज की सुबह एक बड़ी राहत लेकर आई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण जंग पर 40 दिनों के बाद सीजफायर हो गया है। दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर दो हफ्तों के सीजफायर यानी युद्धविराम की घोषणा कर दी है।

ट्रंप ने ईरानी सभ्यता ही खत्म करने की दी थी धमकी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (स्थानीय समयानुसार) को कहा कि वे दो हफ्तों के लिए ईरान पर बमबारी रोकने पर सहमत हो गए हैं। यह सहमति उनकी डेडलाइन की रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 5.30 बजे) की समय सीमा से दो घंटे से भी कम समय पहले बनी। ट्रंप ने डेडलाइन पूरी होने पर पूरी सभ्यता को तबाह करने की धमकी दी थी।

अमेरिका-ईरान के बीच पुराने विवादों पर सहमति

ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल मीडिया पर दो हफ्तों के युद्धविराम समझौते की जानकारी दी और कहा कि यह समझौता इस शर्त पर किया गया है कि ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने पर सहमत हो। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, अमेरिका पहले ही अपने कई सैन्य लक्ष्य हासिल कर चुका है और अब ईरान के साथ दीर्घकालिक शांति समझौते की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान की तरफ से 10 बिंदुओं का एक प्रस्ताव मिला है, जिसे बातचीत के आधार के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच पुराने विवादों के अधिकतर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुआ सीजफायर?

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर के साथ हुई बातचीत के आधार पर- जिसमें उन्होंने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं आज रात ईरान भेजे जा रहे विनाशकाली बल को रोक लूं- और इस शर्त पर कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित रूप से खोलने पर सहमत हो, मैं दो हफ्ते की अवधि के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को रोकने पर सहमत हूं। यह एक दो-तरफा युद्धविराम होगा।'

ईरान ने क्या कहा?

वहीं, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान पोस्ट करके युद्ध-विराम स्वीकार करने की बात कहीय़ उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री शरीफ की ट्वीट में की गई भाईचारे वाली अपील के जवाब में, और अमेरिका द्वारा उसके 15 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के आधार पर बातचीत की मांग को देखते हुए, साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान के 10 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के सामान्य ढांचे को बातचीत का आधार मानने की घोषणा को ध्यान में रखते हुए, मैं ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से यह घोषणा करता हूं: अगर ईरान पर हमले रुक जाते हैं, तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं अपनी रक्षात्मक कार्रवाई रोक देंगी।”

उन्होंने आगे कहा, “दो हफ्तों की अवधि के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही संभव होगी, लेकिन इसके लिए ईरान की सशस्त्र सेनाओं के साथ समन्वय (कॉर्डिनेट) करना होगा और कुछ तकनीकी सीमाओं का भी ध्यान रखना होगा।”

ट्रंप ने दिया था 48 घंटे का अल्टीमेटम

बता दें कि, ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया चुके था, लेकिन बाद में इस समय-सीमा को कई बार बढ़ाया गया। फिर इसे बढ़ाकर 8 अप्रैल की रात तक कर दिया गया था। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि समझौते की संभावना अभी भी है, लेकिन अगर बात नहीं बनी तो वे 'सब कुछ खत्म कर देंगे।' उन्होंने यह भी दावा किया था कि ईरान के आम लोग अपनी सरकार से खुश नहीं हैं और वे अमेरिका की कार्रवाई का समर्थन कर सकते हैं।

ट्रंप ने ईरान को एक ही रात में ख़त्म करने की धमकी दी, सीजफायर प्रस्ताव खारिज होने पर धमकाया

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक ही रात में खत्म करने की धमकी दी है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट पर ईरान को लेकर बेहद कड़ी और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। ट्रंप ने कहा था कि अगर ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए समझौता नहीं किया, तो उन्हें भारी तबाही का सामना करना पड़ेगा।ट्रंप ने कहा कि ईरान को एक ही रात में खत्म किया जा सकता है, और वह रात शायद कल रात हो।

पूरे देश को एक रात में तबाह करने की धमकी

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सामने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए जो मियाद रखी थी वो मंगलवार को अमेरिकी समय के मुताबिक रात 8 बजे खत्म हो रही है। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अगर ईरान समझौता नहीं करता तो पूरा देश एक रात में तबाह हो सकता है।

बुनियादी ढांचों पर हमले की चेतावनी

ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपनी धमकी का दायरा बढ़ाते हुए हमलों में सभी बिजली संयंत्रों और पुलों को भी शामिल कर लिया है। ट्रंप ने बार-बार चेतावनी दी है कि अगर तेहरान कोई समझौता करने में नाकाम रहता है, या तेल के परिवहन के लिए बेहद अहम जलमार्ग, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने में नाकाम रहता है, तो अमेरिका ईरान में बिजली संयंत्रों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचों पर हमला कर सकता है।

ईरान ने 'अस्थायी युद्धविराम' को ठुकराया

ट्रंप की यह धमकी तब आई है, जब ईरान ने अमेरिकी सीजफायर प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। तेहरान ने 45 दिन के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और कहा है कि वह युद्ध का स्थायी अंत चाहता है। ईरान ने कहा है कि वह अस्थायी सीजफायर के लिए तैयार नहीं है।

आज की रात ईरान पर भारी!

ट्रंप ने कहा कि हॉर्मुज खोलना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। यह दुनिया के 20% तेल का रास्ता है। ईरान ने युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका-इजरायल के जहाजों को गुजरने नहीं दिया। अब अमेरिका का कहना है कि अगर समझौता नहीं हुआ तो पावर प्लांट और पुलों पर हमले शुरू हो जाएंगे। अब ईरान के पास सिर्फ कुछ घंटों का वक्त है, जिसमें या तो वो समझौता करे या फिर उसे मलबे के ढेर में बदलना होगा। भले ही संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, लेकिन अमेरिका पीछे नहीं हटेगा। अल्टीमेटम खत्म होने के बाद आज रात ईरान पर अमेरिका-इजरायल का हमलों का सैलाब आ सकता है।

अमेरिका-ईरान तनाव गंभीर युद्ध बना

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक गंभीर युद्ध का रूप ले चुका है। यह युद्ध 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के साथ शुरू हुआ था। इस संघर्ष की शुरुआत में अमेरिकी और इजरायली हमले में ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, उनकी पत्नी और दूसरे कई वरिष्ठ नेताओं की मौत हुई थी। इस बीच ईरान ने अमेरिका द्वारा प्रस्तावित 45 दिनों के अस्थायी युद्धविराम को आधिकारिक तौर पर खारिज कर दिया है। ईरान की मांग है कि युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त किया जाए। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए मंगलवार रात 8 बजे (ET) तक का समय दिया है।

ट्रंप ने फिर लिया भारत-पाक के बीच सुलह का श्रेय, ईरान के साथ जंग के बीच 50 करोड़ लोगों की जान बचाने का दावा

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष को समाप्त कराया था। उन्होंने कहा मैंने दो परमाणु शक्तियों के बीच युद्ध खत्म करवा नहीं तो वह खतरनाक हो सकता था। ऐसा करके मैंने 50 करोड़ लोगों की जान बचाई। ट्रंप ने ये बयान उस वक्त दिया है, जब ईरान के बीच जंग तेज होती जा रही है और पश्चिमी एशिया में तनाव अपने चरम पर है।

8 युद्ध खत्म कराने का दावा

मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को व्हाइट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'मैंने भारत और पाकिस्तान समेत 8 युद्ध खत्म कराए हैं, यहां तक कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने मुझसे कहा कि मैंने 30 से 50 मिलियन लोगों की जान बचाई।' 

नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने जताया अफसोस

ट्रंप ने यह भी कहा कि एक और युद्ध खत्म करना बाकी है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह ईरान, यूक्रेन या कोई अन्य वैश्विक संघर्ष है। साथ ही नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर फिर से अफसोस जताया।

ट्रंप का यह दावा नया नहीं

ट्रंप का यह दावा नया नहीं है; उन्होंने पहले भी कई बार कहा है कि उन्होंने इस संघर्ष को समाप्त कराया था, जबकि भारत सरकार ने इन दावों का खंडन किया है। दरअसल, पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया, जो कि 3 दिनों तक चला था। इसी जंग को लेकर ट्रंप एक बार नहीं दो बार नहीं कई बार युद्ध को रुकवाने का दावा कर चुके हैं।

ट्रंप का यूटर्न! बिना होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाए ही ईरान संग युद्ध खत्म करने को तैयार

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ छिड़ी जंग को और खींचने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित तौर पर होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने की अपनी जिद छोड़ दी है। रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पूरी तरह खुले बिना ही ट्रंप ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान को खत्म करने के लिए तैयार हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल की सोमवार को छपी रिपोर्ट में प्रशासनिक अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी गई है।

ट्रंप ने होर्मुज पर कदम पीछे खींचा

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों के हवाले से बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वह ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान खत्म करने को तैयार हैं, भले ही होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहे। ट्रंप ने कहा कि इस समुद्री गलियारे को फिर से खोलने के जटिल अभियान को फिलहाल छोड़ देंगे। रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप ने अपने सहयोगियों से कहा है कि इस अहम तेल मार्ग को खोलना अब जीत के लिए जरूरी नहीं माना जा रहा

बदलाव की क्या है वजह?

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप और उनके सलाहकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस जलमार्ग को जबरन खुलवाने की कोशिश से संघर्ष के उस समय-सीमा से आगे खिंच जाने की संभावना है, जो प्रशासन ने तय की है। इसके बजाय मौजूदा रणनीति सैन्य अभियानों को कम करने से पहले ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करने पर केंद्रित है।

ईरान की नेवी और मिसाइल भंडारों को कमजोर करना होगा टारगेट

वॉल स्ट्रीट जर्नल रिपोर्ट की मानें तो अब उन्होंने फैसला किया है कि अमेरिका को ईरान की नेवी और मिसाइल भंडारों को कमजोर करने और युद्ध को खत्म करने के मुख्य टारगेट पर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अहम जलमार्ग में व्यापार को निर्बाध रूप से फिर से शुरू करने के लिए ईरान पर दबाव डालना चाहिए। अधिकारियों के मुताबिक अगर यह नाकाम रहता है तो वाशिंगटन यूरोप और खाड़ी में अपने सहयोगियों पर होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने में मदद करने के लिए दबाव डालेगा।

ईरान का दुनिया के अहम ऊर्जा मार्ग पर बना रहेगा नियंत्रण

बता दें कि कुछ दिनों पहले तक अमेरिका के लिए स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को खोलना बहुत जरूरी लक्ष्य था, लेकिन अब ट्रंप का रुख बदल गया है और वे बिना इसे पूरी तरह खोले भी युद्ध खत्म करना चाहते हैं। वहीं ईरान इस जलमार्ग को घेरे हुए है और इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल-गैस के लिए हाहाकार मचा हुआ है। इस बदलाव से ईरान का दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक पर नियंत्रण बना रह सकता है। इस रास्ते में रुकावट के कारण दुनिया भर में तेल सप्लाई और कीमतों पर असर पड़ता रहेगा क्योंकि इसी रास्ते से दुनिया का 20 फीसदी तेल-गैस आता है।

RSF की प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट: वैश्विक पैमाना या भारत की अधूरी तस्वीर?

डॉ. पंकज सोनी

Reporters Without Borders (RSF) की सालाना रिपोर्ट पर भरोसा करने से पहले एक बुनियादी सवाल है—यह बनती कैसे है? किसके संसाधनों से, किन स्रोतों के आधार पर और किस दृष्टिकोण के साथ? 140 करोड़ की आबादी, दर्जनों भाषाओं और सैकड़ों संस्कृतियों वाले भारत की प्रेस स्वतंत्रता क्या पेरिस में बैठकर तैयार प्रश्नावलियों से मापी जा सकती है?

हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पेरिस स्थित एक NGO Reporters Without Borders (RSF) अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी करता है। इस रिपोर्ट में भारत का स्थान प्रायः 150 के बाद ही दिखाई देता है। 2026 की रिपोर्ट में भारत 157वें स्थान पर है, जबकि 2025 में भी यही रैंक और 2024 में 159वां स्थान था।

रिपोर्ट आते ही देश का एक वर्ग चिंतित स्वर में कहता है—“लोकतंत्र खतरे में है”, “पत्रकारिता समाप्त हो रही है”, “प्रेस पर दबाव बढ़ गया है।” लेकिन इन प्रतिक्रियाओं के बीच एक मूल प्रश्न अक्सर अनदेखा रह जाता है—यह सूचकांक तैयार कैसे होता है? भारत इसमें लगातार पीछे क्यों रहता है?

दरअसल, RSF एक फ्रांसीसी गैर-सरकारी संगठन है, जिसकी फंडिंग के स्रोत पूरी तरह पारदर्शी नहीं माने जाते। यूरोपीय सरकारें और कुछ निजी फाउंडेशन इसे सहयोग देते हैं। इसका प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक मुख्यतः सर्वेक्षण, धारणाओं और सीमित केस स्टडी पर आधारित होता है। यह कोई पूर्णतः वैज्ञानिक या वस्तुनिष्ठ मापदंड नहीं, बल्कि चुनिंदा लोगों की राय का संकलन है, जिसमें पश्चिमी उदारवादी मूल्यों को पत्रकारिता का मानक मान लिया जाता है।

यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—क्या इतने विशाल और विविध देश की मीडिया स्वतंत्रता का आकलन सीमित प्रश्नावलियों के आधार पर किया जा सकता है? भारत में प्रेस स्वतंत्रता का मूल्यांकन यहाँ के संविधान, न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में होना चाहिए, न कि केवल किसी बाहरी संस्था के आकलन से।

इस रिपोर्ट का एक बड़ा विरोधाभास यह भी है कि इसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को कई बार भारत से बेहतर स्थान दिया गया है। पाकिस्तान में पत्रकारों के लापता होने, मीडिया पर सैन्य दबाव और वरिष्ठ पत्रकार Arshad Sharif की हत्या जैसी घटनाएं व्यापक रूप से सामने आ चुकी हैं। वहीं बांग्लादेश में डिजिटल सुरक्षा कानून के तहत पत्रकारों पर कार्रवाई के मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में यह तुलना स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े करती है।

वैश्विक स्तर पर भी मीडिया स्वतंत्रता की स्थिति जटिल है। अमेरिका में Julian Assange के खिलाफ लंबे समय तक कानूनी कार्रवाई चली। पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने मीडिया को “एनिमी ऑफ द पीपल” तक कहा। रूस और चीन में मीडिया पर राज्य का प्रभाव जगजाहिर है। इसके बावजूद RSF रैंकिंग में इन देशों की स्थिति अपेक्षाकृत कम आलोचनात्मक दिखाई देती है, जिससे भू-राजनीतिक पूर्वाग्रह की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

International Federation of Journalists (IFJ) के अनुसार 2025 में दुनिया भर में 128 पत्रकारों की हत्या हुई, जिनमें अधिकांश मध्य-पूर्व और संघर्ष क्षेत्रों से थे। भारत में ऐसे मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही, और हर घटना पर न्यायिक व प्रशासनिक प्रक्रिया सक्रिय होती है।

भारत की जमीनी तस्वीर देखें तो यहाँ 900 से अधिक सैटेलाइट चैनल, 17,000 से ज्यादा पंजीकृत समाचारपत्र और लाखों डिजिटल प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं। अनेक मीडिया संस्थान सरकार की खुलकर आलोचना करते हैं और निर्बाध रूप से कार्य कर रहे हैं। संसद, न्यायपालिका और सोशल मीडिया—तीनों स्तरों पर अभिव्यक्ति की विविधता स्पष्ट दिखाई देती है।

हालाँकि, भारतीय पत्रकारिता की एक चुनौती यह भी है कि बिना प्रशिक्षण या मान्यता के बड़ी संख्या में लोग मीडिया के नाम पर सक्रिय हो गए हैं। कुछ मामलों में यह स्थिति अव्यवस्था और अविश्वसनीयता को जन्म देती है, जो समग्र तस्वीर को प्रभावित करती है।

RSF की निष्पक्षता पर सवाल केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। The GuardianGlobal Times और अन्य संस्थानों द्वारा इसके वित्तीय स्रोतों व दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाए गए हैं। यहाँ तक कि Encyclopaedia Britannica में भी कुछ संदर्भों में इसके संभावित पक्षपात का उल्लेख मिलता है।

स्पष्ट है कि RSF का सूचकांक एक उपयोगी संकेतक हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम सत्य मानना उचित नहीं। उतना ही गलत इसे पूरी तरह खारिज कर देना भी होगा।

भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में प्रेस स्वतंत्रता का मूल्यांकन बहुआयामी दृष्टिकोण से ही संभव है—जहाँ वैश्विक सूचकांक, स्थानीय वास्तविकता और संस्थागत अनुभव, तीनों को संतुलित रूप से समझा जाए।

(लेखक जनसंपर्क विभाग भोपाल में सहायक मीडिया सलाहकार हैं और यह इनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

यह जानकर राहत मिली कि ट्रंप सुरक्षित, डिनर पार्टी में फायरिंग पर पीएम मोदी की प्रतिक्रिया

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व्हाइट हाउस के डिनर प्रोग्राम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में हुई ताबड़तोड़ फायरिंग पर भारत की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। साथ ही उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को टैग कर आगे कहा कि यह जानकर राहत मिली कि वो और उनकी पत्नी ठीक हैं।

पीएम मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, 'यह जानकर राहत मिली कि वाशिंगटन डीसी के एक होटल में हुई हालिया सुरक्षा घटना के बाद राष्ट्रपति ट्रंप, फर्स्ट लेडी मेलानिया और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस सुरक्षित और स्वस्थ हैं। मैं उनकी निरंतर सुरक्षा और कुशल मंगल की कामना करता हूं। लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है और इसकी स्पष्ट रूप से निंदा की जानी चाहिए।'

ट्रंप ने भी दी हमले की जानकारी

वहीं, इस घटना के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक अपडेट शेयर किया, जिसमें उन्होंने कन्फर्म किया कि स्थिति कंट्रोल में आ गई है और सिक्योरिटी एजेंसियों के तुरंत प्रतिक्रिया की तारीफ की। उन्होंने बताया कि संदिग्ध को पकड़ लिया गया है और कहा कि इवेंट को जारी रखने के बारे में कोई भी फैसला लॉ एनफोर्समेंट अथॉरिटीज करेंगी।

सुरक्षा बलों की तत्परता से टली बड़ी घटना

बता दें कि यह घटना उस समय हुई जब वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस संवाददाता डिनर चल रहा था। इसी दौरान एक व्यक्ति हथियारों और चाकू के साथ होटल की लॉबी में घुस गया और बॉलरूम की ओर बढ़ने लगा, जहां बड़ी संख्या में अमेरिकी नेता और पत्रकार मौजूद थे। जैसे ही संदिग्ध व्यक्ति ने आगे बढ़ने की कोशिश की, तुरंत तैनात सीक्रेट सर्विस के जवानों ने तेजी से कार्रवाई करते हुए उसे काबू में ले लिया और हिरासत में ले लिया। सुरक्षा बलों की तत्परता की वजह से एक बड़ा हादसा टल गया।

डोनाल्ड ट्रंप पर हमला, बाल-बाल बचे अमेरिकी राष्ट्रपति, वॉइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में फायरिंग

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा में बड़ी चूक सामने आई है। वॉशिंगटन के हिल्टन होटल में शनिवार रात एक कार्यक्रम के दौरान अचानक गोलीबारी की घटना हुई, जिससे वहां हड़कंप मच गया। कार्यक्रम में जब गोली चली, उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति और फर्स्ट लेडी मंच पर ही मौजूद थीं। गोली चलने की आवाज सुनकर कार्यक्रम स्थल पर अफरा-तफरी मच गई, जिसके बाद सीक्रेट सर्विस एजेंट्स ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तुरंत वहां से निकाला।

CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही गोलियों की आवाज सुरक्षा एजेंसियों ने सुनी, वैसे ही यूएस सीक्रेट सर्विट तुरंत एक्टिव हो गई। एजेंट्स ने तेज आवाज में अलर्ट देते हुए ट्रंप को स्टेज से हटाया और बाहर ले गए। उनके साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और कैबिनेट के अन्य सदस्य भी मौजूद थे, जिन्हें भी तुरंत सुरक्षित जगह पहुंचाया गया।

ट्रंप के साथ वेंस भी थे मौजूद

राजधानी वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान गोलीबारी की घटना को अंजाम दिया गया। इस कार्यक्रम में ट्रंप के साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और विदेश मंत्री मार्को रुबियो भी मौजूद थे।

हमलावर पकड़ा गया

घटना के लगभग एक घंटे बाद डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया है जिसमें उन्होंने जानकारी दी है। ट्रंप ने बताया कि हमलावर को पकड़ लिया गया है और स्थिति से निपटने के लिए सीक्रेट सर्विस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जमकर तारीफ की। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'वॉशिंगटन डीसी में आज क्या शाम रही। सीक्रेट सर्विस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने शानदार काम किया है।'

हमारे संविधान पर हुआ हमला- ट्रंप

ट्रंप ने कहा कि यह सब कुछ अचानक हुआ। एक आदमी कई हथियारों से लैस होकर सिक्योरिटी चेकपाइंट पर घुस गया। इस दौरान सीक्रेट सर्विस ने बहुत अच्छा काम किया और तेजी से एक्शन लेते हुए उसे पकड़ लिया। उन्होंने आगे कहा कि आदमी ने हमारे संविधान पर हमला किया है। 

एक अधिकारी को लगी गोली

गोलीबारी की घटना का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि एक अधिकारी को लगी है, लेकिन वह बच गया, क्योंकि उसने एक बहुत अच्छी बुलेटप्रूफ जैकेट पहनी हुई थी। उसे बहुत करीब से बंदूक से गोली मारी गई और जैकेट ने अपना काम किया। वह बहुत अच्छा है। वह बहुत अच्छी स्थिति में है, उसका मनोबल बहुत ऊंचा है और हमने उससे कहा कि हम उससे प्यार करते हैं और उसका सम्मान करते हैं।

अमेरिका में नौकरी पाना होगा मुस्किल! ट्रंप के सांसदों ने संसद में पेश H-1B वीजा को रोकने का बिल

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अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में बीते एक वर्षों में विदेशियों के प्रवास का मुद्दा गर्माया हुआ है। ट्रंप प्रशासन न सिर्फ अवैध प्रवासियों, बल्कि अब वैध तौर पर अमेरिका में काम के लिए जाने वाले लोगों को भी निशाना बना रहा है। इसी बीच ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसदों ने अमेरिकी संसद में एच-1बी वीजा पर रोक लगाने का प्रस्ताव पेश किया है।

बिल में आश्रितों को लाने की अनुमति नहीं देने का प्रस्ताव

एरिजोना से सांसद एली क्रेन ने ‘एंड एच-1बी वीजा एब्यूज एक्ट ऑफ 2026’ पेश किया, जिसे सात अन्य रिपब्लिकन सांसदों ने भी समर्थन दिया है। विधेयक में एच-1बी कार्यक्रम में सुधारों का प्रस्ताव है, जिसमें वार्षिक सीमा को 65,000 से घटाकर 25,000 करना, न्यूनतम वेतन 2,00,000 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष निर्धारित करना और एच-1बी वीजा धारकों को आश्रितों को अमेरिका लाने की अनुमति नहीं देना शामिल है।

अमेरिकी कर्मचारी का ना मिलना करना होगा साबित

बिल में एच-1बी कार्यक्रम में लॉटरी प्रणाली को वेतन-आधारित चयन प्रणाली से बदलने के साथ ही नियोक्ताओं को यह प्रमाणित करना अनिवार्य होगा कि उन्हें कोई योग्य अमेरिकी कर्मचारी नहीं मिल पा रहा है और उन्होंने छंटनी नहीं की है। एच-1बी कर्मचारियों को एक से ज्यादा नौकरियां करने से रोकना और तृतीय-पक्ष भर्ती एजेंसियों की ओर से उन्हें रोजगार देने पर प्रतिबंध लगाना शामिल है।

विधेयक पारित हुआ तो भारत पर क्या होगा असर?

अगर अमेरिकी संसद में रखा गया एंड एच-1बी वीजा अब्यूज एक्ट पारित हो जाता है, तो भारत पर इसका नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है। क्योंकि एच-1बी वीजा हासिल करने वालों में भारत का पहला स्थान है। भारतीय पेशेवर एच-1बी कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। वित्त वर्ष 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, कुल मंजूर 3,99,395 एच-1बी याचिकाओं में से 71% (करीब 2.83 लाख वीजा) सिर्फ भारतीयों को मिले थे। वर्ष 2015 से 70 प्रतिशत से ज्यादा एच-1बी वीजा से जुड़ी मंजूरी भारतीयों को ही मिल रही है। अगर यह विधेयक पारित होता है तो अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के लिए एफ-1 (स्टूडेंट वीजा) से ओपीटी (छात्रों को काम करने की मंजूरी देने वाला कार्यक्रम) संकट में पड़ जाएगा। इसके अलावा एच-1बी और अंत में ग्रीन कार्ड तक पहुंचने का दशकों पुराना स्थापित मार्ग पूरी तरह से टूट जाएगा। इस विधेयक के चलते भारतीय पेशेवरों के अमेरिका में नौकरी के लिए प्रवेश पर या तो पूरी तरह रोक लग जाएगी या इसमें भारी देरी होगी।

यूएस-ईरान शांति वार्ताःडील के लिए ट्रंप खुद पहुंच सकते हैं पाकिस्तान

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अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही है। इस बीच खबर आ रही है कि डोनाल्ड ट्रंप भी ईरान के साथ इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता में समझौता होने की स्थिति में खुद भी शामिल हो सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे राउंड की युद्धविराम वार्ता होने की उम्मीद अब काफी बढ़ गई है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने चर्चा में शामिल एक पाकिस्तानी सूत्र के हवाल से कहा है कि बातचीत के फिर से शुरू करने की दिशा में प्रगति हो रही है। उन्होंने ये भी संकेत दिया है कि अगर ईरान के साथ कोई समझौता हो जाता है तो या तो खुद डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान आ सकते हैं या फिर ऑनलाइन माध्यम से इसमें शामिल हो सकते हैं।

ट्रंप ने दी बम बरसाने की धमकी

ये खबर ऐसे वक्त में आई है, जब ईरान-अमेरिका वार्ता में लगातार गतिरोध चल रहा है। इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और उन्होंने दावा किया है कि ईरान को समझौता करना ही होगा। उन्होंने अपनी ताजा धमकी में कहा कि अगर ईरान समझौता नहीं करेगा, तो बम बरसेंगे। हालांकि इसके बाद भी ईरान ने अड़ियल रवैया जारी रखा है।

पाकिस्तान के लिए अब तक नहीं रवाना हुआ ईरानी प्रतिनिधिमंडल

ईरान की सरकारी टेलीविजन रिपोर्ट के अनुसार अभी तक कोई भी ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान में होने वाली शांति वार्ता में भाग लेने के लिए रवाना नहीं हुआ है। यह वार्ता अमेरिका के साथ संभावित शांति वार्ता से जुड़ी बताई जा रही है, जिसे लेकर क्षेत्रीय स्तर पर काफी चर्चा बनी हुई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की ओर से फिलहाल किसी भी डेलीगेशन के पाकिस्तान जाने की पुष्टि नहीं की गई है, जिससे इस बैठक को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।

इन मामलों पर विवाद बरकरार

-ईरान का परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करे, जबकि तेहरान का कहना है कि किसी भी प्रतिबंध की समयसीमा सीमित होनी चाहिए।

-यूरेनियम भंडार: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ईरान के लगभग 400 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण चाहता है, लेकिन ईरान ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है।

-स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: ईरान का कहना है कि वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर प्रतिबंध तब तक जारी रखेगा जब तक अमेरिका अपने प्रतिबंध नहीं हटाता, जबकि अमेरिका का रुख सख्त बना हुआ है।

-जमे हुए आर्थिक संपत्ति: ईरान करीब 20 अरब डॉलर की फ्रीज़्ड संपत्तियों को जारी करने और प्रतिबंधों में राहत की मांग कर रहा है।

-युद्ध क्षतिपूर्ति: तेहरान ने अमेरिका और इस्राइल के हमलों से हुए नुकसान के बदले लगभग 270 अरब डॉलर के मुआवजे की भी मांग उठाई है।

ट्रंप ने ‘पोप’ को भी नहीं बख्शा, ईरान युद्ध पर की आलोचना तो भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति

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अमेरिका-ईरान जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर अब कैथोलिक पोप लियो आ गए हैं। ट्रंप ने पोप लियो की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि हमें ऐसा पोप पसंद नहीं जो यह कहे कि परमाणु हथियार रखना ठीक है। ईरान के साथ संघर्ष और पाकिस्तान में आयोजित बातचीत विफल होने के बाद पोप लियो ने ट्रंप की कड़ी आलोचना की। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में पोप पर तीखा पलटवार किया।

सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आलोचना

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में पोप की आलोचना करते हुए लिखा कि पोप लियो अपराध के मुद्दे पर कमजोर हैं और विदेश नीति के लिए खराब हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसे पोप को पसंद नहीं करते जो यह मानते हों कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना ठीक है।

मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए-ट्रंप

ट्रंप ने पोप लियो के भाई लुईस की तारीफ की और कहा कि मुझे उनका भाई लुई उनसे कहीं ज्यादा पसंद है, क्योंकि लुईस पूरी तरह से MAGA समर्थक हैं। उन्हें बात समझ आती है, पर लियो को नहीं! उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो ईरान के पास परमाणु हथियार होने को जायज समझे। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो यह सोचे कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर हमला करना भयानक था, जो भारी मात्रा में ड्रग्स, अपराधियों, ड्रग डीलरों को अमेरिका भेजने से कृत्यों में शामिल था। मुझे ऐसा पोप नहीं चाहिए जो संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की आलोचना करे, क्योंकि मैं वही कर रहा हूं, जिसके लिए मुझे भारी बहुमत से चुना गया था- अपराध दर को रिकॉर्ड निचले स्तर पर लाना और इतिहास का सबसे बड़ा शेयर बाजार बनाना।

कट्टर वामपंथियों को खुश करने का लगाया आरोप

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि लियो को शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि सभी जानते हैं कि पोप बनने के लिए उनका नाम किसी भी लिस्ट में नहीं था और चर्च ने उन्हें केवल इसलिए पोप बनाया क्योंकि वे एक अमेरिकी थे। उन्हें लगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से निपटने का यही सबसे अच्छा तरीका होगा। उन्होंने आगे कहा कि अगर मैं व्हाइट हाउस में नहीं होता तो लियो वेटिकन में नहीं होते। ट्रंप ने आगे कहा कि अपराध और परमाणु हथियारों के मामले में लियो की कमजोरी मुझे रास नहीं आती और न ही यह तथ्य कि वे ओबामा के समर्थक डेविड एक्सलरोड से मिलते हैं, जो वामपंथी विचारधारा का एक हारा हुआ व्यक्ति है, जो चर्च जाने वालों और पादरियों की गिरफ्तारी चाहता था। ट्रंप ने कहा लियो को कट्टर वामपंथियों को खुश करना बंद करना चाहिए और एक महान पोप बनने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि नेता बनने पर।

ईरान युद्ध पर मुखर होकर बोल रहे पोप लियो

बता दें कि लियो XIV पहले अमेरिकी पोप हैं जो अमेरिका और इज़रायल के ईरान के साथ युद्ध के बारे में लगातार मुखर हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने ईरान के लोगों के खिलाफ ट्रंप की बयानबाजी और धमकियों की निंदा करते हुए उन्हें पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया था। यह टिप्पणी ट्रंप की उस धमकी के जवाब में आई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ दो सप्ताह के संघर्ष विराम पर सहमति बनने से कुछ घंटे पहले "आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी।"

अमेरिका-ईरान में 2 हफ्ते का सीजफायर, 40वें दिन रुकी जंग

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मिडिल ईस्ट के लिए आज की सुबह एक बड़ी राहत लेकर आई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण जंग पर 40 दिनों के बाद सीजफायर हो गया है। दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर दो हफ्तों के सीजफायर यानी युद्धविराम की घोषणा कर दी है।

ट्रंप ने ईरानी सभ्यता ही खत्म करने की दी थी धमकी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (स्थानीय समयानुसार) को कहा कि वे दो हफ्तों के लिए ईरान पर बमबारी रोकने पर सहमत हो गए हैं। यह सहमति उनकी डेडलाइन की रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 5.30 बजे) की समय सीमा से दो घंटे से भी कम समय पहले बनी। ट्रंप ने डेडलाइन पूरी होने पर पूरी सभ्यता को तबाह करने की धमकी दी थी।

अमेरिका-ईरान के बीच पुराने विवादों पर सहमति

ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल मीडिया पर दो हफ्तों के युद्धविराम समझौते की जानकारी दी और कहा कि यह समझौता इस शर्त पर किया गया है कि ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने पर सहमत हो। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, अमेरिका पहले ही अपने कई सैन्य लक्ष्य हासिल कर चुका है और अब ईरान के साथ दीर्घकालिक शांति समझौते की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान की तरफ से 10 बिंदुओं का एक प्रस्ताव मिला है, जिसे बातचीत के आधार के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच पुराने विवादों के अधिकतर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुआ सीजफायर?

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर के साथ हुई बातचीत के आधार पर- जिसमें उन्होंने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं आज रात ईरान भेजे जा रहे विनाशकाली बल को रोक लूं- और इस शर्त पर कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित रूप से खोलने पर सहमत हो, मैं दो हफ्ते की अवधि के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को रोकने पर सहमत हूं। यह एक दो-तरफा युद्धविराम होगा।'

ईरान ने क्या कहा?

वहीं, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान पोस्ट करके युद्ध-विराम स्वीकार करने की बात कहीय़ उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री शरीफ की ट्वीट में की गई भाईचारे वाली अपील के जवाब में, और अमेरिका द्वारा उसके 15 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के आधार पर बातचीत की मांग को देखते हुए, साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान के 10 बिंदुओं वाले प्रस्ताव के सामान्य ढांचे को बातचीत का आधार मानने की घोषणा को ध्यान में रखते हुए, मैं ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से यह घोषणा करता हूं: अगर ईरान पर हमले रुक जाते हैं, तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं अपनी रक्षात्मक कार्रवाई रोक देंगी।”

उन्होंने आगे कहा, “दो हफ्तों की अवधि के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही संभव होगी, लेकिन इसके लिए ईरान की सशस्त्र सेनाओं के साथ समन्वय (कॉर्डिनेट) करना होगा और कुछ तकनीकी सीमाओं का भी ध्यान रखना होगा।”

ट्रंप ने दिया था 48 घंटे का अल्टीमेटम

बता दें कि, ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया चुके था, लेकिन बाद में इस समय-सीमा को कई बार बढ़ाया गया। फिर इसे बढ़ाकर 8 अप्रैल की रात तक कर दिया गया था। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि समझौते की संभावना अभी भी है, लेकिन अगर बात नहीं बनी तो वे 'सब कुछ खत्म कर देंगे।' उन्होंने यह भी दावा किया था कि ईरान के आम लोग अपनी सरकार से खुश नहीं हैं और वे अमेरिका की कार्रवाई का समर्थन कर सकते हैं।

ट्रंप ने ईरान को एक ही रात में ख़त्म करने की धमकी दी, सीजफायर प्रस्ताव खारिज होने पर धमकाया

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक ही रात में खत्म करने की धमकी दी है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट पर ईरान को लेकर बेहद कड़ी और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। ट्रंप ने कहा था कि अगर ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए समझौता नहीं किया, तो उन्हें भारी तबाही का सामना करना पड़ेगा।ट्रंप ने कहा कि ईरान को एक ही रात में खत्म किया जा सकता है, और वह रात शायद कल रात हो।

पूरे देश को एक रात में तबाह करने की धमकी

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सामने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए जो मियाद रखी थी वो मंगलवार को अमेरिकी समय के मुताबिक रात 8 बजे खत्म हो रही है। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अगर ईरान समझौता नहीं करता तो पूरा देश एक रात में तबाह हो सकता है।

बुनियादी ढांचों पर हमले की चेतावनी

ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपनी धमकी का दायरा बढ़ाते हुए हमलों में सभी बिजली संयंत्रों और पुलों को भी शामिल कर लिया है। ट्रंप ने बार-बार चेतावनी दी है कि अगर तेहरान कोई समझौता करने में नाकाम रहता है, या तेल के परिवहन के लिए बेहद अहम जलमार्ग, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने में नाकाम रहता है, तो अमेरिका ईरान में बिजली संयंत्रों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचों पर हमला कर सकता है।

ईरान ने 'अस्थायी युद्धविराम' को ठुकराया

ट्रंप की यह धमकी तब आई है, जब ईरान ने अमेरिकी सीजफायर प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। तेहरान ने 45 दिन के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और कहा है कि वह युद्ध का स्थायी अंत चाहता है। ईरान ने कहा है कि वह अस्थायी सीजफायर के लिए तैयार नहीं है।

आज की रात ईरान पर भारी!

ट्रंप ने कहा कि हॉर्मुज खोलना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। यह दुनिया के 20% तेल का रास्ता है। ईरान ने युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका-इजरायल के जहाजों को गुजरने नहीं दिया। अब अमेरिका का कहना है कि अगर समझौता नहीं हुआ तो पावर प्लांट और पुलों पर हमले शुरू हो जाएंगे। अब ईरान के पास सिर्फ कुछ घंटों का वक्त है, जिसमें या तो वो समझौता करे या फिर उसे मलबे के ढेर में बदलना होगा। भले ही संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, लेकिन अमेरिका पीछे नहीं हटेगा। अल्टीमेटम खत्म होने के बाद आज रात ईरान पर अमेरिका-इजरायल का हमलों का सैलाब आ सकता है।

अमेरिका-ईरान तनाव गंभीर युद्ध बना

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक गंभीर युद्ध का रूप ले चुका है। यह युद्ध 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के साथ शुरू हुआ था। इस संघर्ष की शुरुआत में अमेरिकी और इजरायली हमले में ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, उनकी पत्नी और दूसरे कई वरिष्ठ नेताओं की मौत हुई थी। इस बीच ईरान ने अमेरिका द्वारा प्रस्तावित 45 दिनों के अस्थायी युद्धविराम को आधिकारिक तौर पर खारिज कर दिया है। ईरान की मांग है कि युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त किया जाए। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए मंगलवार रात 8 बजे (ET) तक का समय दिया है।

ट्रंप ने फिर लिया भारत-पाक के बीच सुलह का श्रेय, ईरान के साथ जंग के बीच 50 करोड़ लोगों की जान बचाने का दावा

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष को समाप्त कराया था। उन्होंने कहा मैंने दो परमाणु शक्तियों के बीच युद्ध खत्म करवा नहीं तो वह खतरनाक हो सकता था। ऐसा करके मैंने 50 करोड़ लोगों की जान बचाई। ट्रंप ने ये बयान उस वक्त दिया है, जब ईरान के बीच जंग तेज होती जा रही है और पश्चिमी एशिया में तनाव अपने चरम पर है।

8 युद्ध खत्म कराने का दावा

मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को व्हाइट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'मैंने भारत और पाकिस्तान समेत 8 युद्ध खत्म कराए हैं, यहां तक कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने मुझसे कहा कि मैंने 30 से 50 मिलियन लोगों की जान बचाई।' 

नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने जताया अफसोस

ट्रंप ने यह भी कहा कि एक और युद्ध खत्म करना बाकी है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह ईरान, यूक्रेन या कोई अन्य वैश्विक संघर्ष है। साथ ही नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर फिर से अफसोस जताया।

ट्रंप का यह दावा नया नहीं

ट्रंप का यह दावा नया नहीं है; उन्होंने पहले भी कई बार कहा है कि उन्होंने इस संघर्ष को समाप्त कराया था, जबकि भारत सरकार ने इन दावों का खंडन किया है। दरअसल, पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया, जो कि 3 दिनों तक चला था। इसी जंग को लेकर ट्रंप एक बार नहीं दो बार नहीं कई बार युद्ध को रुकवाने का दावा कर चुके हैं।

ट्रंप का यूटर्न! बिना होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाए ही ईरान संग युद्ध खत्म करने को तैयार

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ छिड़ी जंग को और खींचने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित तौर पर होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने की अपनी जिद छोड़ दी है। रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पूरी तरह खुले बिना ही ट्रंप ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान को खत्म करने के लिए तैयार हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल की सोमवार को छपी रिपोर्ट में प्रशासनिक अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी गई है।

ट्रंप ने होर्मुज पर कदम पीछे खींचा

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों के हवाले से बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वह ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान खत्म करने को तैयार हैं, भले ही होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहे। ट्रंप ने कहा कि इस समुद्री गलियारे को फिर से खोलने के जटिल अभियान को फिलहाल छोड़ देंगे। रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप ने अपने सहयोगियों से कहा है कि इस अहम तेल मार्ग को खोलना अब जीत के लिए जरूरी नहीं माना जा रहा

बदलाव की क्या है वजह?

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप और उनके सलाहकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस जलमार्ग को जबरन खुलवाने की कोशिश से संघर्ष के उस समय-सीमा से आगे खिंच जाने की संभावना है, जो प्रशासन ने तय की है। इसके बजाय मौजूदा रणनीति सैन्य अभियानों को कम करने से पहले ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करने पर केंद्रित है।

ईरान की नेवी और मिसाइल भंडारों को कमजोर करना होगा टारगेट

वॉल स्ट्रीट जर्नल रिपोर्ट की मानें तो अब उन्होंने फैसला किया है कि अमेरिका को ईरान की नेवी और मिसाइल भंडारों को कमजोर करने और युद्ध को खत्म करने के मुख्य टारगेट पर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अहम जलमार्ग में व्यापार को निर्बाध रूप से फिर से शुरू करने के लिए ईरान पर दबाव डालना चाहिए। अधिकारियों के मुताबिक अगर यह नाकाम रहता है तो वाशिंगटन यूरोप और खाड़ी में अपने सहयोगियों पर होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने में मदद करने के लिए दबाव डालेगा।

ईरान का दुनिया के अहम ऊर्जा मार्ग पर बना रहेगा नियंत्रण

बता दें कि कुछ दिनों पहले तक अमेरिका के लिए स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को खोलना बहुत जरूरी लक्ष्य था, लेकिन अब ट्रंप का रुख बदल गया है और वे बिना इसे पूरी तरह खोले भी युद्ध खत्म करना चाहते हैं। वहीं ईरान इस जलमार्ग को घेरे हुए है और इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल-गैस के लिए हाहाकार मचा हुआ है। इस बदलाव से ईरान का दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक पर नियंत्रण बना रह सकता है। इस रास्ते में रुकावट के कारण दुनिया भर में तेल सप्लाई और कीमतों पर असर पड़ता रहेगा क्योंकि इसी रास्ते से दुनिया का 20 फीसदी तेल-गैस आता है।