झारखंड की जनता भाजपा के आरोप पत्र पर नहीं, हेमंत सरकार के कामों पर भरोसा करती है : विनोद पांडेय
सत्ताधारी दल झामुमो ने भाजपा द्वारा जारी आरोप पत्र पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने प्रेस बयान जारी करते हुए कहा है कि हेमंत सरकार पर लगाए गये सभी आरोप राजनीतिक हताशा की उपज हैं। भाजपा झारखंड की जनता को फिर से भ्रमित करना चाहती है, परंतु जनता सब कुछ देख रही है। यह वही भाजपा है जिसने 19 साल सत्ता में रहकर गरीब, आदिवासियों, किसानों और युवाओं के लिए कुछ नहीं किया और आज विकास को कलंकित करने की कोशिश कर रही है।
विनोद पांडेय ने कहा कि भाजपा का आरोप पत्र झूठ और अतिशयोक्ति का मिश्रण है, जिसमें न विकास दिखता है, न झारखंड की वास्तविकता। उन्होंने कहा कि 7 गारंटी पर धोखे की बात करने वाली भाजपा अपना शासन याद करे। भाजपा ने 5 साल तक राज्य में एक भी नई सामाजिक सुरक्षा योजना नहीं शुरू की। आज हेमंत सरकार करीब 50 लाख महिलाओं को मंईयां सम्मान योजना के तहत सम्मान राशि दे रही है। 2500 रुपये मासिक डीबीटी के रूप में सीधा खाते में भेजे जा रहे हैं, जो देश में किसी भी राज्य की सबसे बड़ी प्रत्यक्ष सहायता योजना है। यह धोखा नहीं, भरोसा है।
कर्मचारी हित से भाजपा को परेशानी क्यों?
उन्होंने कहा - पहली बार राज्य कर्मियों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना, महंगाई भत्ता बढ़ोतरी, पेंशनभोगियों को राहत—ये सभी निर्णय भाजपा सरकार ने कभी लेने की हिम्मत नहीं की।
शिक्षा–स्वास्थ्य में तेज कदम, भाजपा बोलने लायक नहीं
6 नए पोर्टल, टेक–बी कार्यक्रम, सैकड़ों शिक्षकों की नियुक्ति, 480 स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशाला की स्वीकृति—ये सब 1 साल में हुआ।
भाजपा अनाज की बात करती है, हकीकत भूली है। जब पूरे देश में गरीब अनाज के लिए लाइन में थे, तब यही भाजपा केंद्र में महंगाई बढ़ाकर मजदूरों का पेट काट रही थी। दूसरी तरफ झारखंड में लाखों परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा, गैस सब्सिडी, और राहत योजनाओं पर सरकार लगातार काम कर रही है।
रोजगार और बहाली पर भ्रम फैलाने की कोशिश
8791 नियुक्ति पत्र युवाओं को सम्मानजनक आजीविका है। भाजपा बताये कि उसके शासन में कितनी बहालियाँ हुईं? उस समय तो परीक्षा घोटाले, पेपर लीक और नियुक्ति बंदी ही पहचान थे।
आदिवासियों के नाम पर राजनीति बंद करे भाजपा
विनोद पांडेय ने कहा भाजपा बताये कि आदिवासियों की जमीन, उनकी संस्कृति, भाषा और संसाधनों को सबसे ज्यादा किसने लूटा? सबसे ज्यादा खनन लूट, सबसे ज्यादा विस्थापन और सबसे ज्यादा पुलिसिया दमन भाजपा काल में हुआ। आज वे आदिवासियों की बात करके मगरमच्छ के आँसू बहा रहे हैं।
विकास को घोटाला बता रही भाजपा :
झामुमो महासचिव ने कहा कि भाजपा हर उस विभाग में घोटाला बताती है जहां विकास हो रहा है। भाजपा ने 19 साल में भ्रष्टाचार की ऐसी जमीन तैयार की थी, जिस पर आज भी कई विभागों में सुधार का काम चल रहा है। हेमंत सरकार ने ई–गवर्नेंस, वित्तीय मॉनिटरिंग, टेंडर प्रक्रिया सुधार और डिजिटलीकरण पर बड़े कदम उठाए हैं।
सरकार की उपलब्धियों पर झामुमो का जोर
विनोद पांडेय ने कहा कि भाजपा आरोप लगा रही है, पर जनता के सामने ये ठोस उपलब्धियाँ हैं:
47 लाख महिलाओं को मंईयां सम्मान योजना की राशि
राज्य कर्मियों के लिए स्वास्थ्य बीमा, DA में वृद्धि
शिक्षा क्षेत्र में नए पोर्टल, नए कॉलेज भवन, विज्ञान लैब
975 स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त—कई चरणों में सैकड़ों बहालियां
टेक–बी कार्यक्रम से आईटी में रोजगार
-बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट में 26 हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव
-नेतरहाट जंगल सफारी, मसानजोर रिसॉर्ट, नए योजनाओं का शुभारंभ
-सड़क–पुल, बिजली परियोजनाओं में प्रगति की रफ्तार
-दुमका में ‘झारखंड फ्लाइंग इंस्टीट्यूट’ की शुरुआत
-गिग वर्कर कानून और फैक्टरी संशोधन से श्रमिकों को संरक्षण
झारखंड बदला है, बदलेगा—भाजपा गए जमाने की बात
विनोद पांडेय ने कहा कि भाजपा डर और झूठ के सहारे राजनीति कर रही है। लेकिन झारखंड की जनता विकास देख रही है। हेमंत सरकार जन–सुरक्षित, श्रमिक–केंद्रित, महिला–सम्मान आधारित और संस्थागत सुधारों पर काम करने वाली सरकार है।







गृहस्थ आश्रम : भारतीय जीवन-दर्शन का केंद्रबिंदु भारतीय ज्ञान परम्परा का प्रवाह हजारों वर्षों से ऐसे चलता आया है, मानो हिमालय की शाश्वत शृंखलाओं से निकली कोई दिव्य नदी हो—कभी शांत, कभी प्रचण्ड, परन्तु सदैव जीवनदायिनी। इस परम्परा में गृहस्थ आश्रम कभी न तो उपेक्षा का विषय रहा है, न ही निन्दा का। भारतीय मानस समझता रहा है कि जीवन केवल संन्यास की पथरीली कंदराओं में ही नहीं, बल्कि गृहस्थी के दीप-स्तंभों में भी वैसे ही प्रकाशित होता है जैसे किसी मन्दिर की ज्योति में ईश्वर का तेज। भारत के ऋषि-कुल को देखें तो प्रतीत होगा कि हमारा समाज वास्तव में “ऋषियों की संतान” है। लगभग प्रत्येक ऋषि—अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप, याज्ञवल्क्य—सभी गृहस्थ थे; उनकी ऋचाएँ, ब्रह्मज्ञान और अध्यात्म की ऊँचाइयाँ गृहस्थ जीवन की गोद में ही पलकर विराटता प्राप्त कर सकीं। सोलह संस्कारों में विवाह को प्रमुख इसलिए कहा गया कि यह न केवल एक वैयक्तिक संस्कार था, बल्कि सम्पूर्ण समाज के संतुलन का आधार-स्तंभ था—मानो मनुष्य-जीवन का वह द्वार जहाँ से कर्तव्य, प्रेम, त्याग और सृजन सब मिलकर प्रवेश करते हों। सनातन वैदिक धर्म ने मनुष्य-जीवन को सौ वर्ष का पूर्ण वृत्त मानकर उसे चार आश्रमों में विभाजित किया—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। यह विभाजन मात्र आयु-क्रम नहीं था; यह जीवन का एक चतुर्ऋतु-चक्र था—ब्रह्मचर्य वसंत की तरह ज्ञान और उत्साह का; गृहस्थ ग्रीष्म की भाँति कर्म, तप और दायित्व का; वानप्रस्थ शरद की तरह मन्द, उज्ज्वल और अनुभवों का; और संन्यास हेमंत की तरह निर्मल, शांत और मोक्षमार्ग का। सबको इन चारों से होकर गुजरना था ताकि व्यक्ति जीवन को सम्पूर्ण रूप में जी सके और अन्ततः समाज को अपनी परिपक्व प्रतिभा अर्पित कर सके। जो पंथ जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में ही संन्यास अनिवार्य कर बैठे—वे एक ओर सूखे हुए वृक्षों की तरह खड़े रहे, जिनकी जड़ें समाज की मिट्टी से कट गईं; और जब जड़ों का रस ही समाप्त हो जाए, तो वृक्ष कितने दिन टिक सकता है? फलतः ऐसे पंथ काल के थपेड़ों में विलीन हो गए। भारतीय इतिहास पर दृष्टि डालें तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रवृत्ति और निवृत्ति किसी विशाल समुद्र में उठती-गिरती लहरों की तरह हैं—कभी प्रवृत्ति की ज्वार, तो कभी निवृत्ति का भाटा। वैदिक काल कर्म, यज्ञ और सामाजिक सक्रियता का युग था; उपनिषदकाल में निवृत्ति के बीज अंकुरित हुए—मौन, ध्यान, आत्मबोध शिखर की ओर बढ़े; बौद्ध काल में निवृत्ति ने वटवृक्ष का रूप ले लिया—विस्तार, गहराई और व्यापकता के साथ; और पुनः मुगल व आधुनिक युग में प्रवृत्ति ने अपनी जमीन वापस पा ली—कर्म, समाज, कुटुम्ब और राष्ट्र की चेतना उन्नत हुई। इस प्रकार भारत में प्रवृत्ति से निवृत्ति और निवृत्ति से प्रवृत्ति का आवागमन निरंतर चलता रहा—मानो सूर्य दिन में चमके और रात में चन्द्रमा; दोनों आवश्यक, दोनों पूरक। समाज ने मनुष्य को सामाजिक बनाया है; इसलिए समाज का ऋण चुकाए बिना संन्यास लेकर पलायन कर जाना भारतीय मनस्विता का मार्ग नहीं रहा। वन ही सत्य का एकमात्र द्वार नहीं—गृहस्थ का अन्न, गृहस्थ की अग्नि और गृहस्थ की करुणा से ही ऋषियों का वन-जीवन पोषित हुआ। गृहस्थ आश्रम बिना पानी के वह नदी होता, जिसमें न तो प्रवाह होता न जीवन। अतः संन्यास को भी वही व्यक्ति ग्रहण करता था जिसने गृहस्थ-धर्म को पूर्ण निष्ठा से निभाया हो—तभी उसका संन्यास समाज के लिए प्रकाश-दीप होता था, पलायन नहीं। भारतीय जीवन-दर्शन कभी एकांगी नहीं रहा। उसने प्रवृत्ति और निवृत्ति, गृहस्थ और संन्यास, कर्म और ध्यान—सबको एक ही सूत्र में पिरोया। इससे सम्बंधित दृष्टांत महाभारत के वन पर्व में वर्णित है, जिसमें ऋषि माकंदव्य ने युधिष्ठिर को यह कहानी सुनाई थी। इसे कपोतोपाख्यान (कबूतर की कहानी) के नाम से जाना जाता है। यह कहानी धर्म, वैराग्य, और गृहस्थ धर्म के श्रेष्ठ आदर्शों को दर्शाती है -एक समय की बात है, एक अति सुंदर और गुणवान ऋषिकुमार थे, जो बचपन से ही विरक्त (दुनिया से मोह रहित) और तपस्वी स्वभाव के थे। वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वन में वास करते थे। उसी राज्य में एक राजकुमारी थी, जो अत्यंत रूपवती और धर्मात्मा थी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो राजा ने उसका स्वयंवर आयोजित किया। देश-विदेश के अनेक राजकुमार और प्रतिष्ठित व्यक्ति उस स्वयंवर में उपस्थित हुए। राजकुमारी ने जब सभा में उपस्थित सभी लोगों को देखा, तो उसे कोई भी अपने योग्य नहीं लगा। तभी उसकी दृष्टि उस ऋषिकुमार पर पड़ी जो किसी कारणवश सभा में मौजूद थे। ऋषिकुमार का तेजस्वी रूप, शांत स्वभाव और वैराग्य से भरा व्यक्तित्व राजकुमारी को इतना भाया कि उसने लेशमात्र भी विचार किए बिना, उन ऋषिकुमार के गले में वरमाला डाल दी। यह देखकर पूरी सभा चकित रह गई, क्योंकि ऋषिकुमार तो वैरागी थे और विवाह के बंधन से दूर रहना चाहते थे। जैसे ही राजकुमारी ने ऋषिकुमार को वरमाला पहनाई, तो ऋषिकुमार को लगा कि उनका ब्रह्मचर्य भंग हो रहा है और वह सांसारिक मोह-माया के बंधन में फंस रहे हैं। राजकुमारी के चयन को स्वीकार न करते हुए, वह तत्काल उस स्वयंवर सभा से उठकर गहन वन की ओर भाग गए। राजकुमारी भी उनके पीछे भागी, लेकिन ऋषिकुमार वैराग्य की धुन में तेजी से आगे निकल गए और घने जंगल में अदृश्य हो गए। राजकुमारी ने जब ऋषिकुमार को भागते हुए देखा, तो वह अत्यंत दुखी हुई और राजा से कहा कि वह उसी ऋषिकुमार को पति के रूप में स्वीकार करेंगी। राजा अपनी बेटी के हठ के कारण चिंतित हुए और अपने मंत्री के साथ उस ऋषिकुमार को ढूंढने के लिए जंगल की ओर निकल पड़े। काफी देर तक भटकने के बाद भी वे ऋषिकुमार को नहीं ढूंढ पाए। राजा और मंत्री दोनों ही जंगल में रास्ता भटक गए और दिन ढलने लगा। वे भूख-प्यास से व्याकुल हो गए और थककर एक विशाल वृक्ष के नीचे बैठ गए। जिस पेड़ के नीचे राजा और मंत्री बैठे थे, उसी पर एक कबूतर (कपोत) अपनी पत्नी कबूतरी (कपोती) के साथ एक घोंसले में रहता था। जब कबूतरी ने नीचे राजा और मंत्री को ठंड से ठिठुरते और भूख से पीड़ित देखा, तो वह अपने पति कबूतर से बोली - "हे नाथ! ये दोनों अतिथि हैं और भूख-प्यास से व्याकुल हैं। अतिथि का सत्कार करना गृहस्थ का परम धर्म है। हमारे पास इन्हें देने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन हमें किसी भी प्रकार से इनकी सेवा करनी चाहिए।" कबूतर, जो धर्मात्मा और परम ज्ञानी था, अपनी पत्नी के धर्मनिष्ठ विचार से अत्यंत प्रसन्न हुआ और बोला -"तुम धन्य हो प्रिये! आज तुमने मुझे गृहस्थ धर्म का सच्चा महत्व समझा दिया।" सबसे पहले, कबूतर पास से सूखी टहनियाँ और घास लाकर लाया और एक जगह पर आग जलाई, ताकि राजा और मंत्री ठंड से बच सकें। फिर कबूतर ने राजा से कहा - "हे अतिथि! मैं आपका सत्कार कैसे करूँ? मेरे पास आपको खिलाने के लिए कोई अन्न नहीं है। इसलिए, मैं स्वयं ही आपकी क्षुधा शांत करने के लिए अपने शरीर की आहुति देता हूँ। आप मुझे पकाकर अपनी भूख मिटाइए।" यह कहकर, वह धर्मात्मा कबूतर बिना किसी संकोच के धधकती आग में कूद गया और अपने प्राणों का त्याग कर दिया। राजा और मंत्री यह देखकर बहुत दुखी और शर्मिंदा हुए। अभी उनकी भूख पूरी तरह शांत नहीं हुई थी। तब कबूतरी ने अपने पति के पदचिह्नों पर चलते हुए राजा से कहा - "महाराज! मेरे पति ने अतिथि धर्म का पालन किया है। मैं भी उनके मार्ग पर चलते हुए आपकी सेवा करना चाहती हूँ। मेरी देह भी आपकी क्षुधा शांत करने में सहायक हो।" और कबूतरी भी तुरंत उस आग में कूद गई और अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। कबूतर दम्पत्ति के इस अभूतपूर्व आत्म-त्याग और अतिथि सत्कार को देखकर राजा और मंत्री की आँखें खुल गईं। उनकी भूख तो शांत हुई या नहीं, लेकिन उनका अहंकार और मोह पूरी तरह शांत हो गया। उन्होंने कबूतर दम्पत्ति के चरणों में सिर नवाया और उस स्थान को छोड़कर वापस लौट गए। ऋषि माकंदव्य ने युधिष्ठिर से कहा - सन्यासी हो तो उस ऋषिकुमार की तरह जिसने राज्य-वैभव और राजकुमारी के प्रेम को ठुकराकर वैराग्य को सर्वोपरि माना और मोह से बचने के लिए जंगल में भाग गया। गृहस्थ हो तो कबूतर दम्पत्ति की तरह जिन्होंने अपने जीवन का मोह त्यागकर, केवल 'अतिथि सत्कार' और 'गृहस्थ धर्म' के पालन को ही अपना परम कर्तव्य समझा। यह कथा सिखाती है कि सच्चा त्याग वैराग्य में भी है और निःस्वार्थ सेवा भाव से युक्त गृहस्थ जीवन में भी है। ऋषिकुमार का त्याग विरक्ति का प्रतीक है, जबकि कबूतर दम्पत्ति का त्याग परमार्थ (दूसरों के हित) का प्रतीक है। यह वह भूमि है जहाँ कृषक हल चलाते समय भी ऋग्वेद की ऋचाएँ गाता है, और संन्यासी गहन समाधि में भी “सर्वभूतहिते रतः” का संकल्प लेता है। अतः भारत की आत्मा का सन्देश स्पष्ट है—जीवन को सम्पूर्णता में जियो, प्रत्येक आश्रम का सम्मान करो, और समाज को कुछ दिए बिना किसी एक मार्ग को श्रेष्ठ कहकर दूसरे को तुच्छ मत समझो। गृहस्थ हो या संन्यासी—दोनों भारतीय संस्कृति के दो पंख हैं; एक भी टूट जाए तो उड़ान अधूरी रह जाती है। ©® डॉ. विद्यासागर उपाध्याय
सुल्तानपुर में एक प्रॉपर्टी डीलर का शव संदिग्ध परिस्थितियों में कोतवाली देहात के उचहरा गांव स्थित एक बाग में मिला है। इस मृतक की पहचान भपटा निवासी 45 वर्षीय शिवकुमार गुप्ता के रूप में हुई है।......... शिवकुमार गुप्ता हनुमानगंज के असई चौराहे पर अपने परिवार के साथ रहते था। और वह प्रॉपर्टी के काम के साथ-साथ असई चौराहे पर किराना,बर्तन और फल की दुकान भी चलाता था, जिसकी देखरेख उनकी पत्नी करती थीं। मृतक के छोटे बेटे सनी गुप्ता ने बताया कि घटना वाली रात उनके पिता दादाजी के लिए किराना दुकान से दूध और बिस्किट लाए थे। उन्होंने अपनी बहन से रोटी बनाकर रखने को कहा था और बताया था कि वे एक घंटे में लौट आएंगे।
सनी के अनुसार,उनके पिता जबरदस्ती गाड़ी की चाबी लेकर गए,जबकि वे उन्हें रात में बाहर जाने से मना कर रहे थे। सुबह पड़ोसियों के फोन से उन्हें पिता की हत्या की जानकारी मिली। तो परिजनों का रो रो कर बुरा हाल है।
सनी ने बताया कि उनके पिता प्रॉपर्टी के काम के बारे में कुछ नहीं बताते थे, इसलिए उन्हें किसी पर शक नहीं है। शिवकुमार का शव घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर भपटा और पाठक पुरवा गांवों के बीच एक बाग में मिला। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर जांच पड़ताल शुरू कर दी है।
इंस्पेक्टर अखंडदेव मिश्रा ने बताया कि तहरीर मिलने और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। शिवकुमार अपने चार भाइयों में तीसरे नंबर पर थे। उनके दो बेटे और एक बेटी है। बड़े बेटे सुमित कुमार गुप्ता की शादी 28 नवंबर 2024 को हुई थी और वह दिल्ली में नौकरी करते हैं। घटना के बाद से पत्नी सुमन गुप्ता, बेटी शिवानी गुप्ता और पिता राम सिंगार गुप्ता का रो-रोकर बुरा हाल है। बड़े भाई अशोक कुमार गुप्ता ने बताया कि मेरे भाई के साथ जो घटना हुई इस सम्बन्ध में हम बहुत ज़्यादा नहीं बता सकते।
इसलिए की भाई हनुमानगंज में रहता था और हम तीन किमी दूर भपटा में रहते हैं। सुबह हम गांव में खेत में काम कर रहे थे तब हमें पता चला की भाई के साथ ये घटना घटी। घटनास्थल पर जब हम पहुंचे तो दो सौ लोगों की भीड़ लगी थी। कब निकले घर से, घटना कैसे घटी ये उनका लड़का ही बता सकता है। कोई चोट है नहीं, गाड़ी उनकी मौजूद है मौके पर। क्या किया गया कुछ पता नहीं। शिवकुमार के बड़े भाई अशोक गुप्ता एक शिक्षा मित्र हैं। शिवकुमार हनुमानगंज के एक स्वयं सहायता समूह का भी सदस्य था,जहां से उसने ऋण लिया था।
ऊषा देवी (बूथ 261) पैर टूटने के बावजूद कार्य पूरा कर बनाया अद्भुत उदाहरण।
पहुंचकर ब्राह्मण समाज ने जोरदार विरोध दर्ज किया और आई ऐएस संतोष वर्मा के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई। उसके बाद प्रधानमंत्री को संबोधित पांच सूत्री मांग पत्र उप जिलाधिकारी उत्तम तिवारी को दिया गया। समाज के प्रमुख मांगे अधिकारी को नौकरी से बर्खास्त किया जाए आपराधिक मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा जाए लोक सेवा नियमावली का उल्लंघन किया है उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाए सामाजिक सौहार्द बिगाडने का कार्य किया है। ब्राह्मण समुदाय की भावनाएं गंभीर रूप से आहत हुई है सरकार तत्काल कार्रवाई कर उसे जेल भेजें। ज्ञापन देने वालों में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित सीताराम मिश्रा राष्ट्रीय संयोजक विश्वनाथ मिश्र राष्ट्रीय महासचिव रमेश त्रिपाठी एडवोकेट राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज पांडे एडवोकेट जिला अध्यक्ष राम नायक तिवारी तहसील अध्यक्ष रामसहाय दुबे विधिक सलाहकार जय कृष्ण पांडे एडवोकेट प्रेम शंकर पांडे सुनील दुबे राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी विनय पांडे बाबा हृदय नारायण शुक्ला हरि पांडे कुंमभज तिवारी एडवोकेट अरुण तिवारी अंकित पांडे ए राजेश तिवारी प्रवीण शुक्ला उमेश मिश्रा विकास शुक्ला मनीष मिश्रा बृजेश शुक्ला दिलीप मिश्रा पंडित केशव प्रसाद मिश्रा घनश्याम मिश्रा सूर्य प्रकाश तिवारी अजय तिवारी मित्रसेन उपाध्याय पूर्व अध्यक्ष के के तिवारी शाहित सर्व समाज के लोग उपस्थित रहे।
फाउंडेशन कौशल विकास के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है, जिसके तहत उन्हें मुफ्त प्रशिक्षण, आवश्यक उपकरण और अनुदान भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। केंद्र में सिलाई और कढ़ाई के अलावा ब्यूटीशियन, आर्ट एंड क्राफ्ट, टीकूली आर्ट, फिनिशिंग, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा छोटे उद्यम संचालन का व्यापक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
ऐधना फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रेम कुमार ने इस अवसर पर पहल के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनका लक्ष्य केवल तकनीकी ज्ञान देना नहीं, बल्कि महिलाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना है। प्रशिक्षण के अंतिम चरण में, प्रतिभागियों को व्यवसाय योजना निर्माण, लागत प्रबंधन, बाजार की मांग का विश्लेषण और ग्राहकों से जुड़ने की तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी जाती है, जिससे वे प्रशिक्षण पूर्ण करने के उपरांत स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने में सक्षम बन सकें।
प्रशिक्षण में शामिल प्रतिभागियों ने इस पहल को अपने जीवन में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव लाने वाला बताया है; कई महिलाएं, जो पूर्व में केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, अब सिलाई के माध्यम से घर से ही आय अर्जित करने की दिशा में अग्रसर हैं, और कुछ ने तो अपना छोटा बुटीक शुरू करने की योजना भी बना ली है। केंद्र प्रबंधन के अनुसार, प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने वाली सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किया जाएगा, जो उन्हें भविष्य में नौकरी या स्वरोजगार के अधिक अवसर प्राप्त करने में सहायक होगा।
यह निःशुल्क सिलाई प्रशिक्षण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ उन्हें समाज में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर प्रदान कर रहा है। कार्यक्रम के लिए पंजीकरण प्रक्रिया अभी भी जारी है, और इच्छुक महिलाएं सीधे ऐधना फाउंडेशन में पहुंचकर नामांकन करा सकती हैं।
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