जेल से बाहर नहीं आ पाएगा अबू सलेम, हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया झटका

#abusalemprematurereleasein1993bombayblastscasesupremecourtdismissplea

साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी और गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे सालेम की समय पूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अबू सलेम जेल से बाहर नहीं आ सकेगा. उसका कानूनी तिकड़म फेल हो गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

अबू सलेम की समय से पहले रिहाई वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। उसकी याचिका पहले बॉम्बे हाई कोर्ट से भी खारिज हुई थी। जिसके बाद अबू सलेम के वकील ने सर्वोच्च अदालत का रुख किया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रिहा ना करने का फैसला बरकरार रखा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सलेम की रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के निर्णय में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि मानने से इनकार कर दिया।

नासिक सेंट्रल जेल में बंद है सलेम

बता दें कि अबू सलेम अभी नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। सलेम ने पुर्तगाल से हुए प्रत्यर्पण संधि के तहत 25 साल की सजा पूरी होने का दावा करते हुए रिहाई की याचिका भी लगाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

2030 में अबू सलेम की सजा का 25 साल होगा पूरा

अबू सलेम की तरफ से कहा गया है कि सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर उसने 25 साल की सजा पूरी कर ली है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा था कि उसकी याचिका समय से पहले दायर की गई है, उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। सलेम ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई फटकार

#NoidaNews #SupremeCourt #CJISuryaKant #AkshatTripathi #GreaterNoida #ExecutiveMagistrate #JantarMantarProtest #CJP #BNSS130 #GautamBuddhaUniversity

*नई दिल्ली:* नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई लताड़*

#NoidaNews

नई दिल्ली: नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।

অবশেষে স্থায়ী প্রধান বিচারপতি পাচ্ছে কলকাতা হাই কোর্ট, একসঙ্গে দেশের ৮ হাই কোর্টে প্রধান বিচারপতি নিয়োগ

#CalcuttaHighCourt

নয়াদিল্লি / কলকাতা: দীর্ঘ অপেক্ষার অবসান। অবশেষে স্থায়ী প্রধান বিচারপতি পেতে চলেছে কলকাতা হাই কোর্ট। কলকাতার নতুন প্রধান বিচারপতি হিসেবে নিযুক্ত হলেন বিচারপতি রবীন্দ্র ভিঠালরাও ঘুগে।

বর্তমানে বম্বে হাই কোর্টের ভারপ্রাপ্ত প্রধান বিচারপতি হিসেবে দায়িত্ব পালন করছেন তিনি। শনিবার কেন্দ্রীয় আইন মন্ত্রকের তরফে ৮টি হাই কোর্টে প্রধান বিচারপতি নিয়োগের বিজ্ঞপ্তি জারি করা হয়।

সুপ্রিম কোর্টের কলেজিয়াম, প্রধান বিচারপতি সূর্য কান্তের নেতৃত্বে গত ৯ ও ৩১ আগস্ট এই নামগুলি সুপারিশ করেছিল। রাষ্ট্রপতি সংবিধান প্রদত্ত ক্ষমতাবলে প্রধান বিচারপতির সঙ্গে পরামর্শক্রমে এই নিয়োগে সম্মতি দিয়েছেন বলে এক্স হ্যান্ডেলে জানিয়েছেন কেন্দ্রীয় আইনমন্ত্রী অর্জুন রাম মেঘওয়াল।

দীর্ঘদিন ধরে ভারপ্রাপ্ত প্রধান বিচারপতির হাতে চলছিল কলকাতা হাই কোর্ট। স্থায়ী প্রধান বিচারপতি নিয়োগে বিচার ব্যবস্থায় গতি আসবে বলে মনে করছে আইনজীবী মহল।

১৯৯০ সালে আইনজীবী হিসেবে কর্মজীবন শুরু করেন। শুরুতে শ্রমিক ইউনিয়নের হয়ে প্রায় দু'হাজার মামলায় সওয়াল করেছেন। পরে বহু শিল্প সংস্থা ও বহুজাতিক সংস্থার হয়েও মামলা লড়েছেন। দীর্ঘ ১৩ বছর বিচারপতি পদে থাকার পর এবার কলকাতা হাই কোর্টের শীর্ষ পদে আসছেন তিনি।

আর কোন কোন হাই কোর্টে নতুন প্রধান বিচারপতি?

- পাটনা: বিচারপতি ভি কামেশ্বর রাও (দিল্লি হাই কোর্ট)

- রাজস্থান: বিচারপতি সঞ্জয়কুমার আগরওয়াল (ছত্তিসগড় হাই কোর্ট)

- বম্বে: বিচারপতি মহেশচন্দ্র ত্রিপাঠী (এলাহাবাদ হাই কোর্টের প্রধান বিচারপতি)

- পাঞ্জাব ও হরিয়ানা: বিচারপতি অশ্বিনীকুমার মিশ্র

- ছত্তিসগড়: বিচারপতি কৃষ্ণরাম মহাপাত্র (ওড়িশা হাই কোর্ট)

- মধ্যপ্রদেশ: বিচারপতি অল্পেশ যশবন্ত কোগজে (গুজরাট হাই কোর্ট)

- জম্মু-কাশ্মীর ও লাদাখ: বিচারপতি পুষ্পেন্দ্র সিং ভাটি (রাজস্থান হাই কোর্ট)

কেন্দ্রের আনুষ্ঠানিক বিজ্ঞপ্তি জারির পরই এই নিয়োগ কার্যকর হবে।

JPSC परीक्षा विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBI जांच की मांग वाली याचिका पर केंद्र और झारखंड सरकार को नोटिस

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षा में कथित गड़बड़ी का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जेपीएससी की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच का अनुरोध करने वाली याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में 19 अप्रैल 2026 को आयोजित 14वीं जेपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक जांच कराने के साथ परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा आयोजित करने की मांग की गई है।

जेपीएससी के अलावा कई परीक्षाओं में गड़बड़ी

सुनवाई के दौरान वकील ने बताया कि झारखंड में छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा कि क्या मामला कई परीक्षाओं से जुड़ा है। वकील ने बताया कि एक मामला जेपीएससी और दूसरा झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (जेएसएससी) की परीक्षा से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा का भी जिक्र हुआ। सीजेआई ने पूछा कि क्या ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा भी लोक सेवा आयोग कराता है। कोर्ट ने कहा कि वह इस पहलू को भी देखेगा कि यह परीक्षा कैसे आयोजित होती है।

याचिका में क्या हैं मांगे

याचिकाकर्ता ने झारखंड के बाहर के किसी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है। प्रस्तावित समिति में फोरेंसिक विज्ञान, आईटी, परीक्षा सुरक्षा, OMR मूल्यांकन, साइबर सुरक्षा और लोक प्रशासन के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है। इसके साथ ही OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और परिणाम तैयार करने की पूरी प्रक्रिया के स्वतंत्र ऑडिट की मांग भी की गई है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका दो जुलाई को प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम जारी होने के बाद सामने आए विवाद के बीच दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, एक सफल उम्मीदवार की OMR उत्तर पुस्तिका की कार्बन कॉपी वायरल होने के बाद परीक्षा के मूल्यांकन को लेकर सवाल उठे। याचिका में दावा किया गया है कि संबंधित उम्मीदवार ने प्रथम प्रश्नपत्र में 100 में से केवल 48 सवालों के जवाब दिए थे, इसके बावजूद उसे सफल घोषित किया गया। इन कथित अनियमितताओं को लेकर रांची में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

UGC के नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही बड़ी बात

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देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर केंद्र सरकार फिर से विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्र ने यह जानकारी दी। इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन नियमों पर अंतरिम रोक भी लगा चुका है।

केंद्र सरकार का बड़ा बयान

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की ओर से जारी किए गए 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' को लेकर पूरे देश में बड़े स्तर पर बवाल देखने को मिला था। इन नियमों पर सवर्णों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद यूजीसी के नियमों का ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। अब गुरुवार को इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई हुई जिसके दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है।

नियमों पर फिर से विचार कर रही सरकार

गुरुवार को यूजीसी के नियमों पर हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह UGC के 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' पर फिर से विचार कर रही है, जिनपर कोर्ट ने अभी रोक लगा रखी है। केंद्र सरकार और UGC की ओर से सुनवाई में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि फैसला क्या होगा, लेकिन हम इस पर फिर से विचार कर रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्तों में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह सभी याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को शामिल करते हुए एक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने ये भी कहा है कि हलफनामे की कॉपी याचिकाकर्ताओं को भी देनी होंगी। याचिकाकर्ता उसके बाद दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।

जनवरी में नियमों पर लगाई गई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट इसी साल जनवरी में इन नियमों पर रोक लगा चुका है। कोर्ट ने कहा था कि नियमों का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने वाला हो सकता है। साथ ही, रैगिंग को इन नियमों के दायरे से बाहर रखने पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह भी निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक UGC के इस बारे में 2012 के नियम लागू रहेंगे।

क्या हैं UGC के 2026 नियम?

यूजीसी ने ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से बनाए थे। इनका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसा तंत्र तैयार करना था, जिससे किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। ये नियम जनवरी 2026 में लागू किए गए थे और इन्होंने यूजीसी के पुराने 2012 वाले नियमों की जगह ली थी।

JPSC परीक्षा में गड़बड़ी का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, जनहित याचिका दायर

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएमसी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) परीक्षा में कथित गड़बड़ी को लेकर रांची में छात्रों का प्रदर्शन जारी है। इस बीच ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन ने याचिका दाखिल की है। इस याचिका में नए सिरे से परीक्षा के आयोजन और मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है।

48 सवालों के जवाब देने पर ही पास हो गया एक कैंडिडेट

बता दें कि ये मामला JPSC की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 से जुड़ा है। यह परीक्षा 19 अप्रैल 2026 को हुई थी और इसका प्रारंभिक रिजल्ट 2 जुलाई 2026 को जारी किया गया था। रिजल्ट आने के बाद एक सफल उम्मीदवार की OMR शीट की कार्बन कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल होने की खबर सामने आई थी। फिर आरोप लगा कि उम्मीदवार ने पहले पेपर में 100 में से सिर्फ 48 सवालों के जवाब दिए, फिर भी वह परीक्षा में सफल घोषित हुआ।

याचिका में क्या मांग की गई?

अब सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर याचिका दायर की गई है। याचिका में 9 अप्रैल 2026 को हुई प्रारंभिक परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की गई है। याचिका में खास तौर पर प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, OMR शीट की कस्टडी और मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने जांच की जिम्मेदारी CBI को सौंपने या सुप्रीम कोर्ट या झारखंड से बाहर के किसी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र कमेटी गठित करने की मांग की है।

परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने की मांग

याचिका में प्रारंभिक परीक्षा रद्द कर नए सिरे से परीक्षा कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि नई परीक्षा अदालत की निगरानी में तय सुरक्षा उपायों के साथ कराई जाए। इसके अलावा OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और रिजल्ट तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग भी की गई है।

परीक्षा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से परीक्षा से जुड़े सभी भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश देने की मांग की गई है।परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज, डिस्पैच रजिस्टर, स्कैनिंग रिकॉर्ड, समेत तमाम इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं। परीक्षा से जुड़े सभी डिजिटल रिकॉर्ड संरक्षित किए जाने की भी मांग की गी है।

आसाराम को अंतरिम राहत देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, राजस्थान सरकार को जारी किया नोटिस

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धर्मगुरु आसाराम बापू को र नाबालिग दुष्कर्म मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मेडिकल आधार पर मांगी गई अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने आसाराम की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी करते हुए राजस्थान सरकार से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट का जमानत देने से इनकार

शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और कहा है कि यदि आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर होती है या जान को खतरा होता है, तभी जमानत पर विचार किया जाएगा। याचिका में उन्होंने 2013 में एक नाबालिग के रेप केस में हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी सजा और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया था।

पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और शील नागू शामिल हैं। इस बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अभी जमानत पर कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा। पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा और उसके बाद ही आगे विचार किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत के मामलों में यह देखा जाता है कि क्या कोई गंभीर आवश्यकता है, जैसे जीवन पर खतरा आदि।

जेल से बाहर नहीं आ पाएगा अबू सलेम, हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया झटका

#abusalemprematurereleasein1993bombayblastscasesupremecourtdismissplea

साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी और गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे सालेम की समय पूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अबू सलेम जेल से बाहर नहीं आ सकेगा. उसका कानूनी तिकड़म फेल हो गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

अबू सलेम की समय से पहले रिहाई वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। उसकी याचिका पहले बॉम्बे हाई कोर्ट से भी खारिज हुई थी। जिसके बाद अबू सलेम के वकील ने सर्वोच्च अदालत का रुख किया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रिहा ना करने का फैसला बरकरार रखा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सलेम की रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के निर्णय में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि मानने से इनकार कर दिया।

नासिक सेंट्रल जेल में बंद है सलेम

बता दें कि अबू सलेम अभी नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। सलेम ने पुर्तगाल से हुए प्रत्यर्पण संधि के तहत 25 साल की सजा पूरी होने का दावा करते हुए रिहाई की याचिका भी लगाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

2030 में अबू सलेम की सजा का 25 साल होगा पूरा

अबू सलेम की तरफ से कहा गया है कि सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर उसने 25 साल की सजा पूरी कर ली है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा था कि उसकी याचिका समय से पहले दायर की गई है, उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। सलेम ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई फटकार

#NoidaNews #SupremeCourt #CJISuryaKant #AkshatTripathi #GreaterNoida #ExecutiveMagistrate #JantarMantarProtest #CJP #BNSS130 #GautamBuddhaUniversity

*नई दिल्ली:* नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई लताड़*

#NoidaNews

नई दिल्ली: नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।

অবশেষে স্থায়ী প্রধান বিচারপতি পাচ্ছে কলকাতা হাই কোর্ট, একসঙ্গে দেশের ৮ হাই কোর্টে প্রধান বিচারপতি নিয়োগ

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নয়াদিল্লি / কলকাতা: দীর্ঘ অপেক্ষার অবসান। অবশেষে স্থায়ী প্রধান বিচারপতি পেতে চলেছে কলকাতা হাই কোর্ট। কলকাতার নতুন প্রধান বিচারপতি হিসেবে নিযুক্ত হলেন বিচারপতি রবীন্দ্র ভিঠালরাও ঘুগে।

বর্তমানে বম্বে হাই কোর্টের ভারপ্রাপ্ত প্রধান বিচারপতি হিসেবে দায়িত্ব পালন করছেন তিনি। শনিবার কেন্দ্রীয় আইন মন্ত্রকের তরফে ৮টি হাই কোর্টে প্রধান বিচারপতি নিয়োগের বিজ্ঞপ্তি জারি করা হয়।

সুপ্রিম কোর্টের কলেজিয়াম, প্রধান বিচারপতি সূর্য কান্তের নেতৃত্বে গত ৯ ও ৩১ আগস্ট এই নামগুলি সুপারিশ করেছিল। রাষ্ট্রপতি সংবিধান প্রদত্ত ক্ষমতাবলে প্রধান বিচারপতির সঙ্গে পরামর্শক্রমে এই নিয়োগে সম্মতি দিয়েছেন বলে এক্স হ্যান্ডেলে জানিয়েছেন কেন্দ্রীয় আইনমন্ত্রী অর্জুন রাম মেঘওয়াল।

দীর্ঘদিন ধরে ভারপ্রাপ্ত প্রধান বিচারপতির হাতে চলছিল কলকাতা হাই কোর্ট। স্থায়ী প্রধান বিচারপতি নিয়োগে বিচার ব্যবস্থায় গতি আসবে বলে মনে করছে আইনজীবী মহল।

১৯৯০ সালে আইনজীবী হিসেবে কর্মজীবন শুরু করেন। শুরুতে শ্রমিক ইউনিয়নের হয়ে প্রায় দু'হাজার মামলায় সওয়াল করেছেন। পরে বহু শিল্প সংস্থা ও বহুজাতিক সংস্থার হয়েও মামলা লড়েছেন। দীর্ঘ ১৩ বছর বিচারপতি পদে থাকার পর এবার কলকাতা হাই কোর্টের শীর্ষ পদে আসছেন তিনি।

আর কোন কোন হাই কোর্টে নতুন প্রধান বিচারপতি?

- পাটনা: বিচারপতি ভি কামেশ্বর রাও (দিল্লি হাই কোর্ট)

- রাজস্থান: বিচারপতি সঞ্জয়কুমার আগরওয়াল (ছত্তিসগড় হাই কোর্ট)

- বম্বে: বিচারপতি মহেশচন্দ্র ত্রিপাঠী (এলাহাবাদ হাই কোর্টের প্রধান বিচারপতি)

- পাঞ্জাব ও হরিয়ানা: বিচারপতি অশ্বিনীকুমার মিশ্র

- ছত্তিসগড়: বিচারপতি কৃষ্ণরাম মহাপাত্র (ওড়িশা হাই কোর্ট)

- মধ্যপ্রদেশ: বিচারপতি অল্পেশ যশবন্ত কোগজে (গুজরাট হাই কোর্ট)

- জম্মু-কাশ্মীর ও লাদাখ: বিচারপতি পুষ্পেন্দ্র সিং ভাটি (রাজস্থান হাই কোর্ট)

কেন্দ্রের আনুষ্ঠানিক বিজ্ঞপ্তি জারির পরই এই নিয়োগ কার্যকর হবে।

JPSC परीक्षा विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBI जांच की मांग वाली याचिका पर केंद्र और झारखंड सरकार को नोटिस

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षा में कथित गड़बड़ी का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जेपीएससी की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच का अनुरोध करने वाली याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में 19 अप्रैल 2026 को आयोजित 14वीं जेपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक जांच कराने के साथ परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा आयोजित करने की मांग की गई है।

जेपीएससी के अलावा कई परीक्षाओं में गड़बड़ी

सुनवाई के दौरान वकील ने बताया कि झारखंड में छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा कि क्या मामला कई परीक्षाओं से जुड़ा है। वकील ने बताया कि एक मामला जेपीएससी और दूसरा झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (जेएसएससी) की परीक्षा से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा का भी जिक्र हुआ। सीजेआई ने पूछा कि क्या ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा भी लोक सेवा आयोग कराता है। कोर्ट ने कहा कि वह इस पहलू को भी देखेगा कि यह परीक्षा कैसे आयोजित होती है।

याचिका में क्या हैं मांगे

याचिकाकर्ता ने झारखंड के बाहर के किसी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है। प्रस्तावित समिति में फोरेंसिक विज्ञान, आईटी, परीक्षा सुरक्षा, OMR मूल्यांकन, साइबर सुरक्षा और लोक प्रशासन के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है। इसके साथ ही OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और परिणाम तैयार करने की पूरी प्रक्रिया के स्वतंत्र ऑडिट की मांग भी की गई है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका दो जुलाई को प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम जारी होने के बाद सामने आए विवाद के बीच दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, एक सफल उम्मीदवार की OMR उत्तर पुस्तिका की कार्बन कॉपी वायरल होने के बाद परीक्षा के मूल्यांकन को लेकर सवाल उठे। याचिका में दावा किया गया है कि संबंधित उम्मीदवार ने प्रथम प्रश्नपत्र में 100 में से केवल 48 सवालों के जवाब दिए थे, इसके बावजूद उसे सफल घोषित किया गया। इन कथित अनियमितताओं को लेकर रांची में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

UGC के नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही बड़ी बात

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देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर केंद्र सरकार फिर से विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्र ने यह जानकारी दी। इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन नियमों पर अंतरिम रोक भी लगा चुका है।

केंद्र सरकार का बड़ा बयान

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की ओर से जारी किए गए 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' को लेकर पूरे देश में बड़े स्तर पर बवाल देखने को मिला था। इन नियमों पर सवर्णों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद यूजीसी के नियमों का ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। अब गुरुवार को इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई हुई जिसके दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है।

नियमों पर फिर से विचार कर रही सरकार

गुरुवार को यूजीसी के नियमों पर हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह UGC के 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' पर फिर से विचार कर रही है, जिनपर कोर्ट ने अभी रोक लगा रखी है। केंद्र सरकार और UGC की ओर से सुनवाई में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि फैसला क्या होगा, लेकिन हम इस पर फिर से विचार कर रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्तों में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह सभी याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को शामिल करते हुए एक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने ये भी कहा है कि हलफनामे की कॉपी याचिकाकर्ताओं को भी देनी होंगी। याचिकाकर्ता उसके बाद दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।

जनवरी में नियमों पर लगाई गई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट इसी साल जनवरी में इन नियमों पर रोक लगा चुका है। कोर्ट ने कहा था कि नियमों का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने वाला हो सकता है। साथ ही, रैगिंग को इन नियमों के दायरे से बाहर रखने पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह भी निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक UGC के इस बारे में 2012 के नियम लागू रहेंगे।

क्या हैं UGC के 2026 नियम?

यूजीसी ने ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से बनाए थे। इनका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसा तंत्र तैयार करना था, जिससे किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। ये नियम जनवरी 2026 में लागू किए गए थे और इन्होंने यूजीसी के पुराने 2012 वाले नियमों की जगह ली थी।

JPSC परीक्षा में गड़बड़ी का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, जनहित याचिका दायर

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएमसी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) परीक्षा में कथित गड़बड़ी को लेकर रांची में छात्रों का प्रदर्शन जारी है। इस बीच ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन ने याचिका दाखिल की है। इस याचिका में नए सिरे से परीक्षा के आयोजन और मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है।

48 सवालों के जवाब देने पर ही पास हो गया एक कैंडिडेट

बता दें कि ये मामला JPSC की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 से जुड़ा है। यह परीक्षा 19 अप्रैल 2026 को हुई थी और इसका प्रारंभिक रिजल्ट 2 जुलाई 2026 को जारी किया गया था। रिजल्ट आने के बाद एक सफल उम्मीदवार की OMR शीट की कार्बन कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल होने की खबर सामने आई थी। फिर आरोप लगा कि उम्मीदवार ने पहले पेपर में 100 में से सिर्फ 48 सवालों के जवाब दिए, फिर भी वह परीक्षा में सफल घोषित हुआ।

याचिका में क्या मांग की गई?

अब सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर याचिका दायर की गई है। याचिका में 9 अप्रैल 2026 को हुई प्रारंभिक परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की गई है। याचिका में खास तौर पर प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, OMR शीट की कस्टडी और मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने जांच की जिम्मेदारी CBI को सौंपने या सुप्रीम कोर्ट या झारखंड से बाहर के किसी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र कमेटी गठित करने की मांग की है।

परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने की मांग

याचिका में प्रारंभिक परीक्षा रद्द कर नए सिरे से परीक्षा कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि नई परीक्षा अदालत की निगरानी में तय सुरक्षा उपायों के साथ कराई जाए। इसके अलावा OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और रिजल्ट तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग भी की गई है।

परीक्षा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से परीक्षा से जुड़े सभी भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश देने की मांग की गई है।परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज, डिस्पैच रजिस्टर, स्कैनिंग रिकॉर्ड, समेत तमाम इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं। परीक्षा से जुड़े सभी डिजिटल रिकॉर्ड संरक्षित किए जाने की भी मांग की गी है।

आसाराम को अंतरिम राहत देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, राजस्थान सरकार को जारी किया नोटिस

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धर्मगुरु आसाराम बापू को र नाबालिग दुष्कर्म मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मेडिकल आधार पर मांगी गई अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने आसाराम की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी करते हुए राजस्थान सरकार से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट का जमानत देने से इनकार

शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और कहा है कि यदि आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर होती है या जान को खतरा होता है, तभी जमानत पर विचार किया जाएगा। याचिका में उन्होंने 2013 में एक नाबालिग के रेप केस में हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी सजा और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया था।

पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और शील नागू शामिल हैं। इस बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अभी जमानत पर कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा। पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा और उसके बाद ही आगे विचार किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत के मामलों में यह देखा जाता है कि क्या कोई गंभीर आवश्यकता है, जैसे जीवन पर खतरा आदि।