सुप्रीम कोर्ट को कोई धमका नहीं सकता', राहुल गांधी SC मार्च पर सीजेआई की टिप्पणी

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट मार्च को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत ने सख्त टिप्पणी की है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका इतनी कमजोर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को कोई डरा-धमका नहीं सकता। ये बेकार की कोशिशें हैं और इनपर कोई ध्यान नहीं देता। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के आचरण पर भी सवाल उठाए हैं। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि राहुल गांधी को खुद के आचरण को लेकर सफाई देनी होगी।

आज राहुल गांधी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। यह सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत के बेंच के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान राहुल गांधी और अन्य नेताओं के कथित एसआईआर अनियमितताओं के विरोध में सुप्रीम कोर्ट तक मार्च का जिक्र होने पर सीजेआई ने कहा, 'कोई भी न्यायपालिका को दबाव में नहीं डाल सकता'।

हमें पता है कि बाहर क्या हो रहा है-सीजेआई

वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने अदालत में राजनीतिक जुलूस और उसके घटनाक्रम पर आपत्ति जताते हुए कहा कि करीब 200 वकीलों ने इस तरह के दबाव बनाने के प्रयास पर चिंता जताते हुए ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ऐसी घटनाओं से अनजान नहीं है और वह एकांतवास में नहीं है, हमें पता है कि बाहर क्या हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कमजोर प्रयासों पर कोई ध्यान नहीं देता, जबकि अदालत बाहर दिए जा रहे बयानों से भी अवगत है।

सुप्रीम कोर्ट तक निकाला था मार्च

ये पूरी सुनवाई 12 अक्टूबर को इंडिया ब्लॉक के सुप्रीम कोर्ट मार्च से जुड़ी हुई है। इस दिन राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियों ने बाराखंभा रोड से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक विरोध मार्च निकाला था। इस मार्च में हजारों लोग शामिल हुए थे। भीड़ के रूप में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे नेताओं ने वहां पहुंचकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ याचिका दी थी। इस याचिका में कथित वोट चोरी का आरोप लगाते हुए एक्शन लेने की मांग की गई थी।

केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस

सुनवाई के दौरान अदालत ने असदुद्दीन ओवैसी समेत नेताओं की ओर से निर्वाचन आयोग से संबंधित दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किए और समान राहत वाली याचिकाओं को एक साथ रखने का निर्देश दिया।

हिंदू धर्म बदलने पर नहीं मिलेगा आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट का रिजर्वेशन पर बड़ा फैसला

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रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति का व्यक्ति दूसरा धर्म अपनाकर आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। ये फैसला तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनाया है। इसके साथ ही मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

इस मामले में हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले कुछ लोगों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) की श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था। कोर्ट ने कहा है कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति का व्यक्ति दूसरा धर्म अपनाने के बाद आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से निकलकर किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में चला जाता है, वह केवल अपने धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत मिलने वाले विशेष लाभों का दावा नहीं कर सकता। पिछली सामाजिक व्यवस्था में झेला गया पिछड़ापन, नए धर्म में भी स्वतः ही लागू नहीं हो जाता, जिससे उसे उस नए धर्म में ‘पिछड़ा वर्ग’ का दर्जा मिल सके।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का जन्म हिंदू परिवार में हुआ था। उसने वर्ष 2016 में इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार एक महिला से निकाह किया और इस्लाम धर्म अपना लिया। इसके बाद उसने अपना नाम बदलकर समीर अहमद रख लिया। याचिकाकर्ता के मुताबिक, कायाथार स्थित सुन्नत जमात ने वर्ष 2015 में एक प्रमाण पत्र जारी किया था, जिसमें उसके इस्लाम स्वीकार करने की जानकारी दी गई थी। इसके बाद उसने खुद को मुस्लिम लेब्बई समुदाय का बताते हुए सामुदायिक प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया। हालांकि, कायाथार के तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उसने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के फैसले को किया था रद्द

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसके तहत इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में आरक्षण का लाभ देने की अनुमति दी गई थी। इस आदेश के तहत अन्य पिछड़े वर्गों के ऐसे व्यक्तियों को जो इस्लाम धर्म अपना लेते थे, पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। मामले में तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राज्य सरकार का तर्क है कि धर्म परिवर्तन के कारण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

दिल्ली में इंटरनेट बंद पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी माफी, हलफनामा में कहा- जानबूझकर नहीं किया

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दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के चलते 10 अक्टूबर को कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवा बाधित हुई थी। जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई थी। इस मामले में केंद्र की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया गया है। केंद्र ने इसे बिना अनुमति प्रदर्शन रोकने के लिए उठाया गया कदम बताया और बिना शर्त माफी मांगी।

अवमानना के आरोपों से इनकार

केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने बुधवार की देर शाम को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अवमानना नोटिस का जवाब दिया। इसमें केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी है। हालांकि, गोविंद मोहन ने अवमानना के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में इंटरनेट पाबंदियां लगाने के संबंध में 9 अक्टूबर को दिए गए कोर्ट के आदेश का कोई जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया गया।

नीट पेपर लीक को लेकर हुए प्रदर्शन का हवाला

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर केंद्र सरकार की ओर से गृह सचिव गोविंद मोहन ने कहा कि 9 अक्टूबर को केंद्र सरकार की ओर से लगाई गई पाबंदियों का मकसद शांति बनाए रखना और कानून-व्यवस्था बिगड़ने से रोकना था। उन्होंने बताया कि बिना जरूरी अनुमति के एक विरोध प्रदर्शन होने वाला था। साथ ही, उन्होंने नीट पेपर लीक को लेकर 20 जुलाई को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस को आए अनुभवों का भी हवाला दिया।

दिल्ली में 9 और 10 अक्टूबर को बंद रही थी सेवाएं

बता दें कि केंद्र के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को रात 10 बजे तक एक दिन के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित करने का अनुरोध किया था। सरकार ने इस अनुरोध पर विचार करने के बाद इसे मंजूरी दी थी। जिसके बाद दिल्ली में प्रदर्शन वाले इलाके में इंटरनेट सेवा बाधित रही थी। दिल्ली के रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट प्रतिबंध था। यह पाबंदी केवल मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर थी, इसमें वाई-फाई और ब्रॉडबैंड कनेक्शन शामिल नहीं थे।

सुप्रीम कोर्ट से राहुल गांधी को बड़ी राहत, निचली अदालत की कार्यवाही पर लगाई रोक, जानें पूरा मामला

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राहुल गांधी चुनाव आयोग पर लगातार सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे हैं। इस बीच उन्हें सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ ट्रायल पर रोक लगा दी है। ये मामला महाराष्ट्र की एक ट्रायल कोर्ट से जुड़ा है।

यह मामला राहुल गांधी के उस कथित बयान से जुड़ा है जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के लिए कथित अपमानजनक टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी को लेकर बीजेपी के एक कार्यकर्ता ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मामला निचली अदालत तक पहुंचा और राहुल गांधी को समन जारी किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्यवाही फिलहाल नहीं होगी। हालांकि यह राहत अभी अंतरिम है। मामले में अंतिम फैसला आना बाकी है।

चार सप्ताह में मांगा जवाब

मंगलवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने इस मामले में महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता महेश श्रीश्रीमल को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा। राहुल ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 8 सितंबर के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए मानहानि केस रद्द करने से इनकार कर दिया था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की थी याचिका

राहुल गांधी ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आठ सितंबर 2026 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने राहुल गांधी को 2019 में जारी समन रद्द करने से इनकार कर दिया था। यह समन मुंबई की गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत ने 28 अगस्त 2019 को शिकायत पर कार्रवाई करते हुए जारी किया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को शिकायत पर सुनवाई छह सप्ताह तक टालने का अपना 2021 का आदेश जारी रखने को कहा था, जिससे राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट जा सकें।

पीएम मोदी पर लगाया था आरोप

याचिका श्रीमाल नाम के एक शख्स ने लगाई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने 20 सितंबर 2018 को राजस्थान में एक सार्वजनिक भाषण में पीएम मोदी की बदनामी की थी। दावा किया गया था कि राहुल गांधी के बयानों का मतलब बीजेपी के सभी सदस्यों और पीएम मोदी से जुड़े भारतीय नागरिकों पर सीधे आरोप लगाना था।

पूरी दिल्ली से हटाए जाएंगे बैरिकेड्स, इंटरनेट भी होगा बहाल, सीजेपी प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

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राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी नेताओं के प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। प्रोटेस्ट को लेकर लगाई गई पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक में मेट्रो, इंटरनेट से लेकर आम जनता की स्वतंत्र आवाजाही पर जवाब दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने और भी कई सारे निर्देश जारी किए हैं।

दिल्ली में 10 अक्तूबर को हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध से जुड़े मामलों की सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान मेट्रो सेवाओं की स्थिति, नागरिकों की आवाजाही और इंटरनेट कनेक्टिविटी से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर टिप्पणी की। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से बंद किए गए मेट्रो स्टेशनों का विवरण और उनकी भौगोलिक स्थिति दर्शाने वाला नक्शा पेश करने को कहा। पीठ का कहना था कि इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रतिबंधों का लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन तक पहुंच पर क्या प्रभाव पड़ा।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को कारण बताओ नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और कहा कि हम संबंधित अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे संक्षिप्त हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए। कथित अवमाननाकर्ताओं को नोटिस जारी किया जाए। वे अवमानना याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करें और साथ ही ऊपर उल्लिखित आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करें।

मेट्रो सेवा पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि मेट्रो सेवाएं सामान्य समय सारणी के मुताबिक चलनी चाहिए और शहर में लोगों की आवाजाही पूरी तरह बहाल की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अंतरिम आदेश पारित करेगा, जिसके तहत मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलेंगी, जब तक कानून-व्यवस्था की ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो, जिसमें प्रतिबंध आवश्यक हो जाएं। आम जनता की स्वतंत्र आवाजाही बहाल की जाएगी।

इंटरनेट बहाली पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान दिल्ली में इंटरनेट सेवाओं का मुद्दा भी उठा। पीठ ने शहर में इंटरनेट सुविधा बहाल करने की बात कही। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि इंटरनेट सेवाएं पिछली रात से ही बहाल हैं। अदालत ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लेने की बात कही।

UPI पर चार्ज लगाए जाने पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र व आरबीआई से मांगा जवाब

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई पेमेंट पर MDR लगाने पर रोक लगाने से फ‍िलहाल इनकार कर द‍िया है। हालांक‍ि, सीजेआई सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ इंड‍िया यानी NPCI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इन्‍हें चार हफ्ते में यह बताने को कहा है क‍ि चार्ज क्‍यों लगाना जरूरी है।

केंद्र सरकार ने ये फैसला लिया है कि 15 अक्टूबर से ₹2,000 से ज़्यादा के कुछ खास UPI 'पर्सन-टू-मर्चेंट' ट्रांजैक्शन पर MDR लगाया जाना है। शुल्क लगाने की केंद्र सरकार की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 हफ्ते के भीतर मांगा हलफनामा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला कानूनी से ज्यादा तकनीकी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समेत सभी पक्षों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस रिट याचिका पर ये नोटिस जारी किया है जिसमें केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा 14 और 15 सितंबर को जारी उन गजट नोटिफिकेशन्स को रद्द करने की मांग की गई है, जिनमें 2,000 रुपये से ज्यादा के कमर्शियल UPI ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने की घोषणा की गई थी।

क्या है याचिकाकर्ता की दलील

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि UPI के आने के बाद ब्लैक मनी से जुड़े ट्रांजैक्शन में कमी आई है। याचिका में नई MDR व्यवस्था के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI भुगतान पर शुल्क लगाने का फैसला पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लिया गया। शुल्क लगाने से अर्थव्यवस्था में नकदी और काले धन के लेन-देन में बढ़ोतरी हो सकती है, और व्यापारी इस अतिरिक्त लागत का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं।

क्या बोली सरकार?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि डेबिट/क्रेडिट कार्ड से लेन-देन करने में लागत आती है। UPI भी इससे अलग नहीं है। 2 ऑपरेटर यह सेवा देते हैं। एक तो बैंक हैं। यह भारत सरकार द्वारा की जाने वाली वैधानिक वसूली नहीं है। यह प्लेयर्स के बीच सेटलमेंट फीस है, जिसे NPCI सुविधाजनक बनाता है। सरकार इसमें से एक रुपया भी नहीं ले रही है।

क्या है मामला

इस महीने की शुरुआत में, केंद्र सरकार ने UPI के लिए एक नया फ्रेमवर्क घोषित किया, जिसके तहत ₹2,000 से ज़्यादा के UPI पेमेंट पर 0.4% का MDR लगेगा। सरकार का कहना है कि व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांजैक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार के अनुसार, ट्रांसफर की गई रकम चाहे कितनी भी हो, सभी व्यक्ति-से-व्यक्ति ट्रांज़ैक्शन के लिए UPI पूरी तरह से मुफ़्त बना रहेगा। MDR मर्चेंट पेमेंट सिस्टम का एक चार्ज है, न कि UPI पेमेंट करने वाले ग्राहकों से लिया जाने वाला शुल्क। बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि मर्चेंट MDR का बोझ ग्राहकों पर न डालें, जबकि UPI ऐप्स को प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए चार्ज लगाने से मना किया गया है।

অপেক্ষার অবসান, সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত স্কুল-কলেজ-বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষকরাও পাচ্ছেন বকেয়া ডিএ, হাইকোর্টে জানাল রাজ্য

কলকাতা: দীর্ঘ টালবাহানার পর অবশেষে আশার আলো দেখলেন রাজ্যের সরকার পোষিত ও সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত শিক্ষা প্রতিষ্ঠানের শিক্ষক-শিক্ষাকর্মীরা। এবার তাঁরাও পেতে চলেছেন বকেয়া মহার্ঘ ভাতা (ডিএ)। বুধবার কলকাতা হাইকোর্টে বিচারপতি অমৃতা সিনহার এজলাসে রাজ্য সরকারের তরফে এই গুরুত্বপূর্ণ সিদ্ধান্তের কথা জানানো হয়েছে। তবে পুরো প্রক্রিয়াটি সম্পন্ন করতে কিছুটা সময় লাগবে বলে আদালতে জানিয়েছে রাজ্য।

*কী নিয়ে মামলা?*

২০০৮ থেকে ২০১৯ সাল পর্যন্ত বকেয়া ডিএ-র দাবিতে কলকাতা হাইকোর্টের দ্বারস্থ হয়েছিল পশ্চিমবঙ্গ প্রধান শিক্ষক সমিতি। সংগঠনের অভিযোগ, 'গ্রান্ট ইন এড' বা সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত বিভিন্ন স্তরের স্কুল, কলেজ, বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষক-শিক্ষাকর্মী এবং কর্মচারীরা বারবার বঞ্চনার শিকার হচ্ছেন।

*আদালতে কী জানাল রাজ্য?*

এদিন শুনানিতে রাজ্যের আইনজীবী স্পষ্ট জানান, সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত ও সরকার পোষিত শিক্ষা প্রতিষ্ঠানের শিক্ষক এবং শিক্ষাকর্মীদেরও বকেয়া ডিএ দেওয়ার বিষয়ে রাজ্য সম্মত। প্রক্রিয়া শুরু হবে, তবে আর্থিক ও প্রশাসনিক কারণে কিছুটা সময় লাগবে।

*মামলার প্রেক্ষাপট*

রাজ্য সরকারি কর্মচারীদের ডিএ বঞ্চনার মামলা চলছে ২০১৭ সাল থেকে। SAT থেকে কলকাতা হাইকোর্ট হয়ে মামলা গড়ায় সুপ্রিম কোর্ট পর্যন্ত। চলতি বছরের ৫ ফেব্রুয়ারি সুপ্রিম কোর্ট নির্দেশ দেয়, অল ইন্ডিয়া কনজিউমার প্রাইস ইনডেক্স (AICPI) অনুযায়ী ডিএ দিতে হবে।

*পুরসভার কর্মীদের কী হবে?*

বকেয়া ডিএ-র ক্ষেত্রে পুরসভার কর্মীদের ভবিষ্যৎ কী, তা নিয়ে প্রশ্ন দীর্ঘদিন ধরেই ঘুরপাক খাচ্ছে। তবে এদিনের শুনানির পর আইনজীবী মহলের একাংশের মত, যেহেতু মামলাটি 'গ্রান্ট ইন এড' কর্মচারীদের নিয়ে, সেক্ষেত্রে পুরসভার কর্মীরাও এই সুবিধার আওতায় আসতে পারেন।

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जेल से बाहर नहीं आ पाएगा अबू सलेम, हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया झटका

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साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी और गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे सालेम की समय पूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अबू सलेम जेल से बाहर नहीं आ सकेगा. उसका कानूनी तिकड़म फेल हो गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

अबू सलेम की समय से पहले रिहाई वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। उसकी याचिका पहले बॉम्बे हाई कोर्ट से भी खारिज हुई थी। जिसके बाद अबू सलेम के वकील ने सर्वोच्च अदालत का रुख किया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रिहा ना करने का फैसला बरकरार रखा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सलेम की रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के निर्णय में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि मानने से इनकार कर दिया।

नासिक सेंट्रल जेल में बंद है सलेम

बता दें कि अबू सलेम अभी नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। सलेम ने पुर्तगाल से हुए प्रत्यर्पण संधि के तहत 25 साल की सजा पूरी होने का दावा करते हुए रिहाई की याचिका भी लगाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

2030 में अबू सलेम की सजा का 25 साल होगा पूरा

अबू सलेम की तरफ से कहा गया है कि सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर उसने 25 साल की सजा पूरी कर ली है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा था कि उसकी याचिका समय से पहले दायर की गई है, उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। सलेम ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई फटकार

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*नई दिल्ली:* नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई लताड़*

#NoidaNews

नई दिल्ली: नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट को कोई धमका नहीं सकता', राहुल गांधी SC मार्च पर सीजेआई की टिप्पणी

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट मार्च को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत ने सख्त टिप्पणी की है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका इतनी कमजोर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को कोई डरा-धमका नहीं सकता। ये बेकार की कोशिशें हैं और इनपर कोई ध्यान नहीं देता। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के आचरण पर भी सवाल उठाए हैं। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि राहुल गांधी को खुद के आचरण को लेकर सफाई देनी होगी।

आज राहुल गांधी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। यह सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत के बेंच के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान राहुल गांधी और अन्य नेताओं के कथित एसआईआर अनियमितताओं के विरोध में सुप्रीम कोर्ट तक मार्च का जिक्र होने पर सीजेआई ने कहा, 'कोई भी न्यायपालिका को दबाव में नहीं डाल सकता'।

हमें पता है कि बाहर क्या हो रहा है-सीजेआई

वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने अदालत में राजनीतिक जुलूस और उसके घटनाक्रम पर आपत्ति जताते हुए कहा कि करीब 200 वकीलों ने इस तरह के दबाव बनाने के प्रयास पर चिंता जताते हुए ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ऐसी घटनाओं से अनजान नहीं है और वह एकांतवास में नहीं है, हमें पता है कि बाहर क्या हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कमजोर प्रयासों पर कोई ध्यान नहीं देता, जबकि अदालत बाहर दिए जा रहे बयानों से भी अवगत है।

सुप्रीम कोर्ट तक निकाला था मार्च

ये पूरी सुनवाई 12 अक्टूबर को इंडिया ब्लॉक के सुप्रीम कोर्ट मार्च से जुड़ी हुई है। इस दिन राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियों ने बाराखंभा रोड से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक विरोध मार्च निकाला था। इस मार्च में हजारों लोग शामिल हुए थे। भीड़ के रूप में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे नेताओं ने वहां पहुंचकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ याचिका दी थी। इस याचिका में कथित वोट चोरी का आरोप लगाते हुए एक्शन लेने की मांग की गई थी।

केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस

सुनवाई के दौरान अदालत ने असदुद्दीन ओवैसी समेत नेताओं की ओर से निर्वाचन आयोग से संबंधित दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किए और समान राहत वाली याचिकाओं को एक साथ रखने का निर्देश दिया।

हिंदू धर्म बदलने पर नहीं मिलेगा आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट का रिजर्वेशन पर बड़ा फैसला

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रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति का व्यक्ति दूसरा धर्म अपनाकर आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। ये फैसला तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनाया है। इसके साथ ही मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

इस मामले में हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले कुछ लोगों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) की श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था। कोर्ट ने कहा है कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति का व्यक्ति दूसरा धर्म अपनाने के बाद आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से निकलकर किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में चला जाता है, वह केवल अपने धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत मिलने वाले विशेष लाभों का दावा नहीं कर सकता। पिछली सामाजिक व्यवस्था में झेला गया पिछड़ापन, नए धर्म में भी स्वतः ही लागू नहीं हो जाता, जिससे उसे उस नए धर्म में ‘पिछड़ा वर्ग’ का दर्जा मिल सके।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का जन्म हिंदू परिवार में हुआ था। उसने वर्ष 2016 में इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार एक महिला से निकाह किया और इस्लाम धर्म अपना लिया। इसके बाद उसने अपना नाम बदलकर समीर अहमद रख लिया। याचिकाकर्ता के मुताबिक, कायाथार स्थित सुन्नत जमात ने वर्ष 2015 में एक प्रमाण पत्र जारी किया था, जिसमें उसके इस्लाम स्वीकार करने की जानकारी दी गई थी। इसके बाद उसने खुद को मुस्लिम लेब्बई समुदाय का बताते हुए सामुदायिक प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया। हालांकि, कायाथार के तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उसने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के फैसले को किया था रद्द

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसके तहत इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में आरक्षण का लाभ देने की अनुमति दी गई थी। इस आदेश के तहत अन्य पिछड़े वर्गों के ऐसे व्यक्तियों को जो इस्लाम धर्म अपना लेते थे, पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। मामले में तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राज्य सरकार का तर्क है कि धर्म परिवर्तन के कारण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

दिल्ली में इंटरनेट बंद पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी माफी, हलफनामा में कहा- जानबूझकर नहीं किया

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दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के चलते 10 अक्टूबर को कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवा बाधित हुई थी। जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई थी। इस मामले में केंद्र की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया गया है। केंद्र ने इसे बिना अनुमति प्रदर्शन रोकने के लिए उठाया गया कदम बताया और बिना शर्त माफी मांगी।

अवमानना के आरोपों से इनकार

केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने बुधवार की देर शाम को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अवमानना नोटिस का जवाब दिया। इसमें केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी है। हालांकि, गोविंद मोहन ने अवमानना के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में इंटरनेट पाबंदियां लगाने के संबंध में 9 अक्टूबर को दिए गए कोर्ट के आदेश का कोई जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया गया।

नीट पेपर लीक को लेकर हुए प्रदर्शन का हवाला

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर केंद्र सरकार की ओर से गृह सचिव गोविंद मोहन ने कहा कि 9 अक्टूबर को केंद्र सरकार की ओर से लगाई गई पाबंदियों का मकसद शांति बनाए रखना और कानून-व्यवस्था बिगड़ने से रोकना था। उन्होंने बताया कि बिना जरूरी अनुमति के एक विरोध प्रदर्शन होने वाला था। साथ ही, उन्होंने नीट पेपर लीक को लेकर 20 जुलाई को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस को आए अनुभवों का भी हवाला दिया।

दिल्ली में 9 और 10 अक्टूबर को बंद रही थी सेवाएं

बता दें कि केंद्र के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को रात 10 बजे तक एक दिन के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित करने का अनुरोध किया था। सरकार ने इस अनुरोध पर विचार करने के बाद इसे मंजूरी दी थी। जिसके बाद दिल्ली में प्रदर्शन वाले इलाके में इंटरनेट सेवा बाधित रही थी। दिल्ली के रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट प्रतिबंध था। यह पाबंदी केवल मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर थी, इसमें वाई-फाई और ब्रॉडबैंड कनेक्शन शामिल नहीं थे।

सुप्रीम कोर्ट से राहुल गांधी को बड़ी राहत, निचली अदालत की कार्यवाही पर लगाई रोक, जानें पूरा मामला

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राहुल गांधी चुनाव आयोग पर लगातार सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे हैं। इस बीच उन्हें सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ ट्रायल पर रोक लगा दी है। ये मामला महाराष्ट्र की एक ट्रायल कोर्ट से जुड़ा है।

यह मामला राहुल गांधी के उस कथित बयान से जुड़ा है जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के लिए कथित अपमानजनक टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी को लेकर बीजेपी के एक कार्यकर्ता ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मामला निचली अदालत तक पहुंचा और राहुल गांधी को समन जारी किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्यवाही फिलहाल नहीं होगी। हालांकि यह राहत अभी अंतरिम है। मामले में अंतिम फैसला आना बाकी है।

चार सप्ताह में मांगा जवाब

मंगलवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने इस मामले में महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता महेश श्रीश्रीमल को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा। राहुल ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 8 सितंबर के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए मानहानि केस रद्द करने से इनकार कर दिया था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की थी याचिका

राहुल गांधी ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आठ सितंबर 2026 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने राहुल गांधी को 2019 में जारी समन रद्द करने से इनकार कर दिया था। यह समन मुंबई की गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत ने 28 अगस्त 2019 को शिकायत पर कार्रवाई करते हुए जारी किया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को शिकायत पर सुनवाई छह सप्ताह तक टालने का अपना 2021 का आदेश जारी रखने को कहा था, जिससे राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट जा सकें।

पीएम मोदी पर लगाया था आरोप

याचिका श्रीमाल नाम के एक शख्स ने लगाई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने 20 सितंबर 2018 को राजस्थान में एक सार्वजनिक भाषण में पीएम मोदी की बदनामी की थी। दावा किया गया था कि राहुल गांधी के बयानों का मतलब बीजेपी के सभी सदस्यों और पीएम मोदी से जुड़े भारतीय नागरिकों पर सीधे आरोप लगाना था।

पूरी दिल्ली से हटाए जाएंगे बैरिकेड्स, इंटरनेट भी होगा बहाल, सीजेपी प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

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राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी नेताओं के प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। प्रोटेस्ट को लेकर लगाई गई पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक में मेट्रो, इंटरनेट से लेकर आम जनता की स्वतंत्र आवाजाही पर जवाब दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने और भी कई सारे निर्देश जारी किए हैं।

दिल्ली में 10 अक्तूबर को हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध से जुड़े मामलों की सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान मेट्रो सेवाओं की स्थिति, नागरिकों की आवाजाही और इंटरनेट कनेक्टिविटी से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर टिप्पणी की। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से बंद किए गए मेट्रो स्टेशनों का विवरण और उनकी भौगोलिक स्थिति दर्शाने वाला नक्शा पेश करने को कहा। पीठ का कहना था कि इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रतिबंधों का लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन तक पहुंच पर क्या प्रभाव पड़ा।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को कारण बताओ नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और कहा कि हम संबंधित अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे संक्षिप्त हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए। कथित अवमाननाकर्ताओं को नोटिस जारी किया जाए। वे अवमानना याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करें और साथ ही ऊपर उल्लिखित आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करें।

मेट्रो सेवा पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि मेट्रो सेवाएं सामान्य समय सारणी के मुताबिक चलनी चाहिए और शहर में लोगों की आवाजाही पूरी तरह बहाल की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अंतरिम आदेश पारित करेगा, जिसके तहत मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलेंगी, जब तक कानून-व्यवस्था की ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो, जिसमें प्रतिबंध आवश्यक हो जाएं। आम जनता की स्वतंत्र आवाजाही बहाल की जाएगी।

इंटरनेट बहाली पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान दिल्ली में इंटरनेट सेवाओं का मुद्दा भी उठा। पीठ ने शहर में इंटरनेट सुविधा बहाल करने की बात कही। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि इंटरनेट सेवाएं पिछली रात से ही बहाल हैं। अदालत ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लेने की बात कही।

UPI पर चार्ज लगाए जाने पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र व आरबीआई से मांगा जवाब

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई पेमेंट पर MDR लगाने पर रोक लगाने से फ‍िलहाल इनकार कर द‍िया है। हालांक‍ि, सीजेआई सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ इंड‍िया यानी NPCI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इन्‍हें चार हफ्ते में यह बताने को कहा है क‍ि चार्ज क्‍यों लगाना जरूरी है।

केंद्र सरकार ने ये फैसला लिया है कि 15 अक्टूबर से ₹2,000 से ज़्यादा के कुछ खास UPI 'पर्सन-टू-मर्चेंट' ट्रांजैक्शन पर MDR लगाया जाना है। शुल्क लगाने की केंद्र सरकार की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 हफ्ते के भीतर मांगा हलफनामा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला कानूनी से ज्यादा तकनीकी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समेत सभी पक्षों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस रिट याचिका पर ये नोटिस जारी किया है जिसमें केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा 14 और 15 सितंबर को जारी उन गजट नोटिफिकेशन्स को रद्द करने की मांग की गई है, जिनमें 2,000 रुपये से ज्यादा के कमर्शियल UPI ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने की घोषणा की गई थी।

क्या है याचिकाकर्ता की दलील

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि UPI के आने के बाद ब्लैक मनी से जुड़े ट्रांजैक्शन में कमी आई है। याचिका में नई MDR व्यवस्था के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI भुगतान पर शुल्क लगाने का फैसला पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लिया गया। शुल्क लगाने से अर्थव्यवस्था में नकदी और काले धन के लेन-देन में बढ़ोतरी हो सकती है, और व्यापारी इस अतिरिक्त लागत का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं।

क्या बोली सरकार?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि डेबिट/क्रेडिट कार्ड से लेन-देन करने में लागत आती है। UPI भी इससे अलग नहीं है। 2 ऑपरेटर यह सेवा देते हैं। एक तो बैंक हैं। यह भारत सरकार द्वारा की जाने वाली वैधानिक वसूली नहीं है। यह प्लेयर्स के बीच सेटलमेंट फीस है, जिसे NPCI सुविधाजनक बनाता है। सरकार इसमें से एक रुपया भी नहीं ले रही है।

क्या है मामला

इस महीने की शुरुआत में, केंद्र सरकार ने UPI के लिए एक नया फ्रेमवर्क घोषित किया, जिसके तहत ₹2,000 से ज़्यादा के UPI पेमेंट पर 0.4% का MDR लगेगा। सरकार का कहना है कि व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांजैक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार के अनुसार, ट्रांसफर की गई रकम चाहे कितनी भी हो, सभी व्यक्ति-से-व्यक्ति ट्रांज़ैक्शन के लिए UPI पूरी तरह से मुफ़्त बना रहेगा। MDR मर्चेंट पेमेंट सिस्टम का एक चार्ज है, न कि UPI पेमेंट करने वाले ग्राहकों से लिया जाने वाला शुल्क। बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि मर्चेंट MDR का बोझ ग्राहकों पर न डालें, जबकि UPI ऐप्स को प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए चार्ज लगाने से मना किया गया है।

অপেক্ষার অবসান, সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত স্কুল-কলেজ-বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষকরাও পাচ্ছেন বকেয়া ডিএ, হাইকোর্টে জানাল রাজ্য

কলকাতা: দীর্ঘ টালবাহানার পর অবশেষে আশার আলো দেখলেন রাজ্যের সরকার পোষিত ও সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত শিক্ষা প্রতিষ্ঠানের শিক্ষক-শিক্ষাকর্মীরা। এবার তাঁরাও পেতে চলেছেন বকেয়া মহার্ঘ ভাতা (ডিএ)। বুধবার কলকাতা হাইকোর্টে বিচারপতি অমৃতা সিনহার এজলাসে রাজ্য সরকারের তরফে এই গুরুত্বপূর্ণ সিদ্ধান্তের কথা জানানো হয়েছে। তবে পুরো প্রক্রিয়াটি সম্পন্ন করতে কিছুটা সময় লাগবে বলে আদালতে জানিয়েছে রাজ্য।

*কী নিয়ে মামলা?*

২০০৮ থেকে ২০১৯ সাল পর্যন্ত বকেয়া ডিএ-র দাবিতে কলকাতা হাইকোর্টের দ্বারস্থ হয়েছিল পশ্চিমবঙ্গ প্রধান শিক্ষক সমিতি। সংগঠনের অভিযোগ, 'গ্রান্ট ইন এড' বা সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত বিভিন্ন স্তরের স্কুল, কলেজ, বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষক-শিক্ষাকর্মী এবং কর্মচারীরা বারবার বঞ্চনার শিকার হচ্ছেন।

*আদালতে কী জানাল রাজ্য?*

এদিন শুনানিতে রাজ্যের আইনজীবী স্পষ্ট জানান, সরকারি সাহায্যপ্রাপ্ত ও সরকার পোষিত শিক্ষা প্রতিষ্ঠানের শিক্ষক এবং শিক্ষাকর্মীদেরও বকেয়া ডিএ দেওয়ার বিষয়ে রাজ্য সম্মত। প্রক্রিয়া শুরু হবে, তবে আর্থিক ও প্রশাসনিক কারণে কিছুটা সময় লাগবে।

*মামলার প্রেক্ষাপট*

রাজ্য সরকারি কর্মচারীদের ডিএ বঞ্চনার মামলা চলছে ২০১৭ সাল থেকে। SAT থেকে কলকাতা হাইকোর্ট হয়ে মামলা গড়ায় সুপ্রিম কোর্ট পর্যন্ত। চলতি বছরের ৫ ফেব্রুয়ারি সুপ্রিম কোর্ট নির্দেশ দেয়, অল ইন্ডিয়া কনজিউমার প্রাইস ইনডেক্স (AICPI) অনুযায়ী ডিএ দিতে হবে।

*পুরসভার কর্মীদের কী হবে?*

বকেয়া ডিএ-র ক্ষেত্রে পুরসভার কর্মীদের ভবিষ্যৎ কী, তা নিয়ে প্রশ্ন দীর্ঘদিন ধরেই ঘুরপাক খাচ্ছে। তবে এদিনের শুনানির পর আইনজীবী মহলের একাংশের মত, যেহেতু মামলাটি 'গ্রান্ট ইন এড' কর্মচারীদের নিয়ে, সেক্ষেত্রে পুরসভার কর্মীরাও এই সুবিধার আওতায় আসতে পারেন।

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जेल से बाहर नहीं आ पाएगा अबू सलेम, हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया झटका

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साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी और गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे सालेम की समय पूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अबू सलेम जेल से बाहर नहीं आ सकेगा. उसका कानूनी तिकड़म फेल हो गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

अबू सलेम की समय से पहले रिहाई वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। उसकी याचिका पहले बॉम्बे हाई कोर्ट से भी खारिज हुई थी। जिसके बाद अबू सलेम के वकील ने सर्वोच्च अदालत का रुख किया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रिहा ना करने का फैसला बरकरार रखा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सलेम की रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के निर्णय में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि मानने से इनकार कर दिया।

नासिक सेंट्रल जेल में बंद है सलेम

बता दें कि अबू सलेम अभी नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। सलेम ने पुर्तगाल से हुए प्रत्यर्पण संधि के तहत 25 साल की सजा पूरी होने का दावा करते हुए रिहाई की याचिका भी लगाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

2030 में अबू सलेम की सजा का 25 साल होगा पूरा

अबू सलेम की तरफ से कहा गया है कि सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर उसने 25 साल की सजा पूरी कर ली है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा था कि उसकी याचिका समय से पहले दायर की गई है, उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। सलेम ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई फटकार

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*नई दिल्ली:* नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद नोएडा प्रशासन फिर निशाने पर, CJI सूर्यकांत ने लगाई लताड़*

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नई दिल्ली: नोएडा जिला प्रशासन एक बार फिर अदालत के निशाने पर है। आकृति चौधरी केस के बाद अब अक्षत त्रिपाठी मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को जमकर फटकार लगाई है।

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के सेकेंड ईयर के कानून के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। 20 साल के छात्र पर आरोप था कि उसने यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों को CJP द्वारा बुलाए गए जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। साथ ही उस पर 'सरकार विरोधी और भ्रामक' बातें फैलाने और अशांति भड़काने का भी आरोप लगाया गया।

इसी आरोप के आधार पर 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 130 के तहत उसे शोकॉज नोटिस जारी किया था।

दिल्ली के जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कैसे, किस हिम्मत से, कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी कर सकता है!'

बताया जा रहा है कि सिविल सुरक्षा कानून की धारा 130 के तहत छात्र के खिलाफ जारी किया गया नोटिस अब वापस ले लिया गया है।