msyadav

Feb 19 2024, 14:47

అక్రిడిటేషన్‌ అనేది రాయితీ కార్డు మాత్రమే* *-జర్నలిస్టులని గుర్తించే పట్టా కానే కాదు* *-నిజాలు రాసేవారంతా జర్నలిస్టులే* *-చిన్నపెద్


అక్రిడిటేషన్‌ అనేది రాయితీ కార్డు మాత్రమే

-జర్నలిస్టులని గుర్తించే పట్టా కానే కాదు

-నిజాలు రాసేవారంతా జర్నలిస్టులే

-చిన్నపెద్ద అనేది సిండికేట్ల సృష్టే

-జర్నలిస్టు ఔనో కాదో తేల్చాల్సింది పత్రిక ఎడిటర్లు మాత్రమే "ఖాకీలు" కాదు.

-డెమోక్రటిక్ జర్నలిస్ట్ ఫెడరేషన్ జాతీయ అధ్యక్షుడు:మనసాని కృష్ణారెడ్డి.

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India

Feb 19 2024, 14:15

संदेशखाली मामलाः सुप्रीम कोर्ट से ममता बनर्जी सरकार को राहत, संसद की विशेषाधिकार समिति की कार्यवाही पर लगाई रोक

#sandeshkhali_case_big_relief_for_mamta_government_as_supreme_court 

इन दिनों पश्चिम बंगाल में संदेशखाली मामले को लेकर सियासत गर्म है। इस बीच संदेशखली मामले में पश्चिम बंगाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने संसद की विशेषाधिकार समिति के नोटिस पर रोक लगा दी है।दरअसल, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सुकांत मजूमदार यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे। पुलिस ने लाठीचार्ज किया और वो घायल हो गए। इसी मामले में संसद की प्रिविलेज कमेटी ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और डीजीपी के खिलाफ विशेषाधिकार उल्लंघन की कार्रवाई करने का फैसला लिया था।ममता बनर्जी सरकार के सांसदों ने प्रिविलेज कमेटी की कार्रवाई को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका पेश की, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी।

पिछले हफ्ते सभी भाजपा सांसदों को संदेशखाली जाने से रोका जा रहा था, तभी सुकांत मजूमदार पुलिस से भिड़ गए। इस दौरान उन्हें चोटें भी आईं। सांसदों से दुर्व्यवहार के मामले में शिकायत मिलने पर लोकसभा सचिवालय की विशेषाधिकार समिति ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और संबंधित जिले के डीएम एसपी और थानाध्यक्ष को समन जारी कर 19 फरवरी को पेश होने का आदेश दिया था।

इस नोटिस को चुनौती देते हुए पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से याचिका दायर की गई थी। पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने यह मामला सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच के सामने उठाया। सिब्बल ने कहा, ‘संदेशखाली में धारा 144 लगी हुई थी। ऐसे में धारा-144 का उल्लंघन करके की गई राजनीतिक गतिविधि विशेषाधिकार का हनन नहीं हो सकती।

प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलों का संज्ञान लिया और सोमवार सुबह साढ़े दस बजे पेश होने के लिए जारी नोटिसों पर रोक लगा दी।

बता दें कि पश्चिम बंगाल के 24 उत्तरी परगना जिले में स्थित संदेशखाली लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। यहां कई महिलाओं ने टीएमसी नेता शाहजहां शेख और उसके करीबी शिबू हजारा एवं उत्तम सरकार पर यौन शोषण और उनकी जमीन पर अवैध कब्जा करने का इल्जाम लगाया है। यहां के प्रदर्शनकारी लगातार प्रशासन से इनकी गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं। संदेशखाली के महिलाओं ने मीडिया को बताया कि शाहजहां शेख के लोगों ने न सिर्फ उनके साथ अत्याचार किया, बल्कि उनके मछली पालन वाली जमीन भी कब्जा ली थी। इसके साथ ही यह भी बताया कि शाहजहां शेख, शिबू हजारा और उत्तम सरकार के लोग नाबालिग बच्चों को नहीं छोड़ते थे। उन्हें शराब के साथ हथियार थमा देते थे। हालांकि राज्य सरकार ने इस मामले में बीजेपी पर तिल का ताड़ बनाने का आरोप लगाया है।

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Feb 15 2024, 16:34

उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट से वापस ली अपनी जमानत अर्जी, दिल्ली दंगों की साजिश रचने के आरोप में जेल में है बंद

#umar_khalid_withdraws_bail_petition_in_supreme_court

दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपितों में से एक उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी जमानत याचिका वापस ले ली है। खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने इसकी पुष्टि की है। याचिका वापस लेने की वजह हालात में बदलाव को बताया गया है। 2020 में हुए दिल्ली दंगों के आरोपी जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने की आस लगाए थे। उसकी जमानत पर बुधवार (14 फरवरी) को सुनवाई होनी थी। लेकिन, इस बीच उमर खालिद ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत याचिका वापस ले ली है।

उमर के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पंकज मिथल की बेंच को बताया कि वो परिस्थितियां बदलने की वजह से अपनी जमानत याचिका वापस लेना चाहते हैं और नए सिरे से ट्रायल कोर्ट के सामने जमानत मांगने के लिए आवेदन करेंगे। उमर की याचिका अप्रैल-2023 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी, जिसकी सुनवाई कई बार स्थगित की जा रही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए उनकी जमानत याचिका रद्द कर दी है. जिसके बाद उमर खालिद अब नए सिरे से अपनी जमानत के लिए याचिका दायर कर सकेगा। बताते चलें कि इस से पहले उमर खालिद की जमानत याचिका की अर्जी दिल्ली की कड़कड़डूमा सत्र अदालत मार्च 2022 में खारिज कर चुकी है। उमर खालिद ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया था। तब से यह माना जा रहा था कि उमर खालिद जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है। मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से उमर खालिद के केस में जवाब तलब किया था। नवंबर 2023 में दोनों पक्षों के वकीलों के मौजूद न होने की वजह से मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में नहीं हो पाई थी।

बता दें कि 2020 में सीएए और एनआरसी के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा हुई थी, जिसमें 53 लोगों की मौत हो गई थी और 700 से अधिक घायल हो गए थे। सितंबर 2020 में गिरफ्तार किए गए उमर खालिद दंगों की पहचान मास्टरमाइंड के रूप में की गई। उनके साथ कुछ अन्य लोगों के खिलाफ भी आतंकवाद विरोधी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था।

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Feb 15 2024, 16:03

राहुल गांधी ने कहा-चुनावी बॉन्ड स्कीम नरेंद्र मोदी की भ्रष्ट नीतियों का एक और सबूत, जानें कोर्ट के फैसले पर किसने क्या कहा

#supreme_court_decision_on_electoral_bonds_political_reactions

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड स्कीम को रद्द करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहरा दिया है। अब इस मामले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आने लगीं हैं।विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर खुशी जताई है।विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है।राहुल गांधी ने आरोप लगाए हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने बॉन्ड को ‘रिश्वत और कमीशन’ लेने का जरिया बनाया था। आज इस बात पर मुहर लग गई है। इसी के साथ मल्लिकार्जुन खरगे, पवन खेड़ा और जयराम रमेश समेत वाम नेता सीताराम येचुरी एवं शिवसेना (यूटीबी) के आदित्य ठाकरे ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया दी।

कांग्रेस ने चुनावी बॉन्ड योजना पर उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय नोट के मुकाबले वोट की ताकत को और मजबूत करेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस फैसले से इस बात पर मुहर लग गई है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनावी बॉन्ड को रिश्वत और कमीशन लेने का माध्यम बना दिया था। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वायनाड से सांसद राहुल गांधी ने चुनावी बॉन्ड स्कीम को लेकर सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए कहा, "नरेन्द्र मोदी की भ्रष्ट नीतियों का एक और सबूत आपके सामने है। बीजेपी ने इलेक्टोरल बॉन्ड को रिश्वत और कमीशन लेने का माध्यम बना दिया था. आज इस बात पर मुहर लग गई है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, 'हम आज उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हैं जिसने मोदी सरकार की इस 'काला धन रूपांतरण' योजना को "असंवैधानिक" बताते हुए रद्द कर दिया है। हमें याद है कि कैसे मोदी सरकार, पीएमओ और वित्त मंत्रालय ने भाजपा का खजाना भरने के लिए हर संस्थान - आरबीआई, चुनाव आयोग, संसद और विपक्ष पर बुलडोजर चला दिया था। राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, कांग्रेस ने हमेशा से कहा था इलेक्टोरल बॉन्ड, खारिज किए जाना चाहिए। ये बीजेपी का स्कैम था. इलेक्टोरल बॉन्ड पर पीएम, वित मंत्री और जेपी नड्डा को जवाब देना चाहिए।

राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि यह किसी राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए उम्मीद की किरण है। यह देश के नागरिकों के लिए उम्मीद की किरण है। सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा कि 'यह पूरी योजना मेरे दिवंगत दोस्त अरुण जेटली के दिमाग की उपज थी, जिसे भाजपा को समृद्ध करने के लिए लाया गया था। सभी जानते हैं कि भाजपा सत्ता में है और चुनावी बॉन्ड योजना का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को ही मिलेगा। मजेदार बात ये है कि चुनावी बॉन्ड योजना का चुनाव से कोई संबंध नहीं है। यह असल में उद्योग जगत और भाजपा के बीच का संबंध है, जिसके तहत भाजपा को बड़े पैमाने पर दान मिला। बीते वर्षों में भाजपा को करीब पांच से छह हजार करोड़ रुपये का दान मिला है।

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Feb 13 2024, 11:04

किसान आंदोलन को रोकने के लिए सीजेआई से लगाई गई गुहार, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने लिखी चिठ्ठी

#farmers_protest_ supreme_court_bar_association_president_writes_to_cji

किसान फिर एक बार एक बड़े जत्थे के साथ दिल्ली कूच कर रहे हैं। पिछली बार मोदी सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा था और तीन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था। एक साल के लंबे आंदोलन के बाद कृषि कानूनों को निरस्त करवाने में कामयाब रहे किसान एक बार फिर आंदोलन कर रहे हैं। पंजाब-हरियाणा के साथ ही कई और राज्यों के किसान आज दिल्ली कूच कर रहे हैं। किसानों के आंदोलन से एक बार फिर दिल्ली की रफ्तार थमने वाले है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष आदिश अग्रवाल ने भारत के मुख्य न्यायधीश यानी सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ को चिठ्ठी लिखकर किसान आंदोलन पर स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया है।

बार एसोसिएशन ने सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ को लिखे पत्र में किसान आंदोलन में गलत उद्देश्यों से शामिल किसानों के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है। चिट्ठी में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में घुसकर समस्या खड़ी करने और लोगों के आम जनजीवन को प्रभावित करने वाले किसानों पर स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करे। इसके साथ ही इसमें सीजेआई चंद्रचूड़ से मांग की गई है कि किसानों के विरोध प्रदर्शन के कारण आज जो वकील कोर्ट में पेश ना हो पाए, उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया जाए।

पत्र में कहा गया है कि किसानों के 2020-21 वाले आंदोलन के दौरान लोगों को बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा था। इसके साथ ही इसमें दावा किया गया कि पिछले किसान आंदोलन की चलते कई लोगों की मौत भी हो गई थी। ऐसे में आज किसान दिल्ली की तरफ बढ़ रहे हैं। ऐसे आंदोलन में गलत उद्देश्य से शामिल किसानों पर स्वत संज्ञान लेकर कार्रवाई की जाए।

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Feb 12 2024, 17:29

“डिप्टी सीएम का पद असंवैधानिक नहीं” उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति पर सवाल उठाने वाली याचिक को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज

#supremecourtofindiadismissedpetitionrelatedtodeputy_cms

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने की प्रथा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को आज खारिज कर दिया है। अलग-अलग राज्यों में उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ याचिका दायर की गई थी, जिस पर आज कोर्ट ने बड़ी बात कही है।चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने ‘पब्लिक पॉलिटिकल पार्टी’ द्वारा दायर जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा, यह सिर्फ एक (पद का) नाम है और भले ही आप किसी को उपमुख्यमंत्री कहते हैं, इससे दर्जा नहीं बदलता।उप-मुख्यमंत्री भी मंत्री ही होता है।पद को कोई नाम दे देने से संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं होता है।

दरअसल इस जनहित याचिका में कहा गया था कि संविधान में कोई प्रविधान नहीं होने के बावजूद विभिन्न राज्य सरकारों ने उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति की है। याचिकाकर्ता का कहना था कि उपमुख्यमंत्री का पद संविधान में नहीं लिखा है। अधिवक्ता मोहनलाल शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति का राज्य के नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं है। न ही कथित उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति होने पर राज्य की जनता का कोई अतिरिक्त कल्याण होता है।

याचिका में यह भी कहा गया था कि उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति से बड़े पैमाने पर जनता में भ्रम पैदा होता है और राजनीतिक दलों द्वारा काल्पनिक पोर्टफोलियो बनाकर गलत और अवैध उदाहरण स्थापित किए जा रहे हैं, क्योंकि उपमुख्यमंत्रियों के बारे में कोई भी स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकते हैं, हालांकि उन्हें मुख्यमंत्रियों के बराबर दिखाया जाता है।

मामले में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा, सबसे पहले और सबसे जरूरी बात यह है कि एक उपमुख्यमंत्री राज्य सरकार में मंत्री होता है और इससे संविधान का उल्लंघन नहीं होता।पीठ ने कहा कि उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति कुछ राज्यों में पार्टी या सत्ता में पार्टियों के गठबंधन में वरिष्ठ नेताओं को थोड़ा अधिक महत्व देने के लिए अपनाई जाने वाली एक प्रथा है... यह असंवैधानिक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उपमुख्यमंत्री का पदनाम उस संवैधानिक स्थिति का उलंघन नहीं करता है कि एक मुख्यमंत्री को विधानसभा के लिए चुना जाना चाहिए। लिहाजा इस याचिका में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।

14 राज्यों में 26 उपमुख्यमंत्री

बता दें कि देशभर के 14 राज्यों में इस समय 26 उपमुख्यमंत्री नियुक्त हैं।सबसे अधिक डिप्टी सीएम आंध्र प्रदेश में हैं। वहां सीएम वाई एस जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार में उनके पांच डिप्टी हैं।

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Feb 01 2024, 18:58

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित, जानें क्या है मामला

#supreme_court_reserves_verdict_on_minority_status_of_amu 

भारत के चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर 57 साल पुराने विवाद मामले की सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। बेंच इस मामले में बीते आठ दिनों से लगातार सुनवाई कर रही थी। इस दौरान अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनीं।जल्दी ही इस मामले पर कोर्ट अपना फैसला सुनाएगी। बेंच में जस्टिस संजीव खन्ना, सूर्यकांत, जे बी पारदीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा भी शामिल हैं। 

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) को अल्पसंख्यक दर्जा देने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमाम दलीलें सुनीं। सुनवाई के दौरान कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा कि किसी भी राष्ट्रीय महत्व के संस्थान को राष्ट्र के ढांचे को प्रतिबिंबित करना चाहिए। एएमयू में 70 से 80 फीसदी मुस्लिम छात्र पढ़ रहे हैं और वे आरक्षण के बगैर वहां पढ़ रहे हैं। मेहता ने कहा, 'मैं धर्म के नजरिए से बात नहीं कर रहा हूं। यह बहुत ही गंभीर मामला है। संविधान में जिस संस्थान को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है, उसे राष्ट्रीय ढांचे को प्रतिबिंबित करना चाहिए। प्रवेश में आरक्षण के बिना यह स्थिति है।' मेहता ने कहा है कि एक अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को केंद्रीय शिक्षण संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 (2012 में संशोधित) की धारा 3 के तहत आरक्षण नीति लागू करने की आवश्यकता नहीं है। इस पर अदालत ने कहा कि किसी अल्पसंख्यक संस्थान के राष्ट्रीय महत्व का संस्थान होने में कुछ गलत नहीं है।

बता दें कि मुसलमानों में शिक्षा की कमी को देखते हुए सुधारवादी नेता सर सैय्यद अहमद ख़ान ने 1877 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (एमएओ कॉलेज) की स्थापना की थी। एमएओ कॉलेज और मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन को एएमयू में लाने के लिए द अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट 1920 (एएमयू एक्ट) पास किया गया। 1951 में एएमयू एक्ट में संशोधन किया गया और इसमें मुसलमानों के लिए धार्मिक शिक्षा को बाध्यकारी बनाने और यूनिवर्सिटी कोर्ट में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के मैन्डेट को हटा दिया गया। इस एक्ट में 1965 में एक बार फिर संशोधन किया गया और कोर्ट की शक्तियों को कार्यपालिका के साथ साथ दूसरे निकायों के बीच बाँट दिया गया, जिसमें गवर्निंग बॉडी के लिए सदस्यों के नामांकन की ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति को दी गई।

इस विवाद की शुरुआत 1967 में हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने एस अज़ीज़ बाशा बनाम भारत सरकार मामले में एएमयू एक्ट में 1951 और 1965 में हुए संशोधन की समीक्षा की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चूंकि एएमयू की स्थापना मुसलमानों ने की है इसके कामकाज के संचालन का हक़ उनके पास होना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने संविधान में किए गए संशोधनों को बरकरार रखा। बेंच ने कहा कि न तो अल्पसंख्यक मुसलमानों ने इसकी स्थापना की है और न ही वो इसका प्रबंधन करते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस एक्ट को केंद्रीय क़ानून के ज़रिए लागू किया गया था। कोर्ट के इस फ़ैसले को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसके बाद 1981 में एएमयू एक्ट में एक और संशोधन किया गया, इसमें इसके अल्पसंख्यक दर्जे पर मुहर लगाई गई।

साल 2005 में एएमयू ने स्नातकोत्तर मेडिकल सीटों में से 50 फ़ीसदी को मुसलमान छात्रों के लिए रिज़र्व किया। इसी साल डॉक्टर नरेश अग्रवाल बनाम भारत सरकार मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिज़र्वेशन पॉलिसी को रद्द कर दिया और कहा कि 1981 का संशोधन अधिकार क्षेत्र से बाहर था। इसके बाद 2006 में भारत सरकार और यूनिवर्सिटी दोनों ने ही सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 

फिर भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा दायर अपील वापस ले लेगी। इसने बाशा मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1967 के फैसले का हवाला देते हुए दावा किया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है क्योंकि यह सरकार द्वारा वित्त पोषित एक सेंट्रलल यूनिवर्सिटी है।

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Jan 29 2024, 16:24

हिंदू पक्ष ने की ज्ञानवापी मस्जिद के वजूखाने में सर्वे की मांग, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

#gyanvapi_mosque_case_hindu_petitioner_files_plea_in_supreme_court 

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद में हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। इस याचिका में मस्जिद के वजूखाने की सर्वे की मांग की गई है।ज्ञानवापी मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट आने के बाद हिन्दू पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की है।हिंदू पक्ष ने कोर्ट से कहा है कि वह 19 मई 2023 को दिए अपने उस आदेश में बदलाव करे, जिसके तहत परिसर में जिस जगह पर शिवलिंग मिली थी, उस जगह पर वैज्ञानिक सर्वे पर लगी रोक को हटाया जा सके।

हिंदू पक्ष का दावा है कि ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग मौजूद है। सर्वे का आदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के निदेशक को देने की मांग की गई है। शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल कर हिंदू पक्ष ने कहा है कि ये सर्वे बिना शिवलिंग को नुकसान पहुंचाए वैज्ञानिक तरीके से किया जाए।याचिका में मांग की गई है कि एएसआई का सर्वे उस क्षेत्र में कराया जाए जो सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में संरक्षित किया था। उस समय वजू खाना एरिया को संरक्षण किया गया था, उसको हटाने की मांग की गई है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि हिंदू वहां पर पूजा करना चाहते हैं क्योंकि कथित तौर पर वहां शिवलिंग है और ऐसी स्थिति में जो संरक्षण का आदेश सुप्रीम कोर्ट में जारी किया था उसे सुप्रीम कोर्ट हटाए। याचिका में कहा गया कि ज्ञानवापी मस्जिद के अन्य स्थानों पर एएसआई सर्वे कराया गया था।

इसके साथ ही याचिका में मांग की गई है कि सर्वे को परिसर में बनी नई और कृत्रिम दीवारों-छतों को हटाने के बाद ही सर्वे किया जाए। इसके अलावा अन्य सील जगहों पर भी खुदाई और अन्य वैज्ञानिक तरीकों से सर्वे किए जाएं और रिपोर्ट अदालत को दी जाए।

दरअसल, ज्ञानवापी परिसर की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सर्वे रिपोर्ट बुधवार को मुकदमे के पक्षकारों ने सार्वजनिक कर दी। सर्वे के दौरान 32 जगह मंदिर से संबंधित प्रमाण मिले हैं। पक्षकारों ने जो सर्वे रिपोर्ट दी है, वह 839 पेज की है।

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Jan 15 2024, 16:42

उद्धव ठाकरे गुट पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, 'असली शिवसेना' को लेकर स्पीकर के फैसले के खिलाफ डाली याचिका

#uddhav_thackeray_filed_petition_in_supreme_court

कुछ दिनों की खामोशी के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से भूचाल आने वाला है। विधायकों को अयोग्य ठहारने की याचिका को खारिज करने के महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर के फैसले पर उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।याचिका में उद्धव ठाकरे ने कहा है कि स्पीकर का यह फैसला गलत है, जिसमें कहा गया है कि एकनाथ शिंदे गुट के पास विधायकों की संख्या ज्यादा है और पार्टी के संविधान के अनुसार, एकनाथ शिंदे ही असली शिवसेना के नेता हैं।

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे की शिवसेना का एक-दूसरे के विधायकों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं को स्पीकर राहुल नार्वेकर ने बुधवार (10 जनवरी) को खारिज कर दिया था। नार्वेकर ने इस दौरान कहा था कि शिंदे की शिवसेना ही असली शिवसेना है। ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव आयोग ने भी ये बात मानी है। ऐसे में विधायकों की सदस्यता बरकरार रहेगी। ये फैसला शिवसेना (यूबीटी) के चीफ उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका था।

बता दें कि स्पीकर के फैसले के बाद ही पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा था कि हम जनता को साथ लेकर लड़ेंगे और जनता के बीच जाएंगे। उन्होंने कहा कि स्पीकर का जो आदेश आया है, वह लोकतंत्र की हत्या है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी अपमान है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राज्यपाल ने अपने पद का दुरुपयोग किया है और गलत किया है। अब हम इस लड़ाई को आगे भी लड़ेंगे और हमें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है। सुप्रीम कोर्ट जनता और शिवसेना को पूरा न्याय दिए बिना नहीं रुकेगा।

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Jan 08 2024, 15:20

बिलकिस बानो केसःओवैसी ने दोषियों की मदद के लिए पीएम मोदी से की माफी मांगने की मांग, जानें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर किसने क्या कहा

#supreme_court_verdict_on_bilkis_bano_case_political_reactions 

बिलकिस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिए अपने फैसले में गुजरात सरकार के फैसले को पलटते हुए 11 दोषियों की रिहाई रद्द कर दी। जिसके बाद दोषियों को फिर से जेल जाना होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ;(एआईएमआईएम) चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि बीजेपी सरकार को बिलकिस बानो से माफी मांगनी चाहिए। सीपीआई(एम) नेता बृंदा करात ने फैसले पर राहत जताते हुए कहा कि कम से कम, अभी कुछ न्याय की उम्मीद बची हुई है। वहीं प्रियंका गांधी ने भाजपा पर निशाना साधा। 

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उम्मीद करता हूं कि आने वाले दिनों में कोई भी सरकार किसी बलात्कारी को ऐसे नहीं छोड़ेगी। बिलकिस के रेप, उनकी बेटी-मां और दूसरी महिलाओं की हत्या में उस वक्त की बीजेपी सरकार ने अपराधियों का साथ दिया था। बिलकिस का रेप हुआ, मासूम बच्ची का कत्ल हुआ। बिलकिस ने ये लड़ाई खुद लड़ी। उस समय जब सीएम मोदी थे, बड़ा ही खराब माहौल था। नरेंद्र मोदी सरकार को बिलकिस बानो से माफी मांगनी चाहिए। बीजेपी ने दोषियों को छोड़ा था। बिलकिस बानो को इंसाफ मिलेगा।

वहीं, प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया पर साझा किए एक पोस्ट में लिखा कि 'अंततः न्याय की जीत हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के दौरान गैंगरेप की शिकार बिलकिस बानो के आरोपियों की रिहाई रद्द कर दी है। इस आदेश से भारतीय जनता पार्टी की महिला विरोधी नीतियों पर पड़ा पर्दा हट गया है। इस आदेश के बाद जनता का न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास मजबूत होगा। बहादुरी के साथ अपनी लड़ाई को जारी रखने के लिए बिलकिस बानो को बधाई।'

इधर, सीपीआई (एम) की वरिष्ठ नेता बृंदा करात ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 'हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। कम से कम यह फैसला न्याय की कुछ उम्मीद जगाता है। खासकर, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और गुजरात सरकार की क्षमताओं पर जो टिप्पणी की। यह गुजरात सरकार ही थी, जिसने दस्तावेज स्वीकार किए थे। कोर्ट ने इसे फर्जी माना है।

msyadav

Feb 19 2024, 14:47

అక్రిడిటేషన్‌ అనేది రాయితీ కార్డు మాత్రమే* *-జర్నలిస్టులని గుర్తించే పట్టా కానే కాదు* *-నిజాలు రాసేవారంతా జర్నలిస్టులే* *-చిన్నపెద్


అక్రిడిటేషన్‌ అనేది రాయితీ కార్డు మాత్రమే

-జర్నలిస్టులని గుర్తించే పట్టా కానే కాదు

-నిజాలు రాసేవారంతా జర్నలిస్టులే

-చిన్నపెద్ద అనేది సిండికేట్ల సృష్టే

-జర్నలిస్టు ఔనో కాదో తేల్చాల్సింది పత్రిక ఎడిటర్లు మాత్రమే "ఖాకీలు" కాదు.

-డెమోక్రటిక్ జర్నలిస్ట్ ఫెడరేషన్ జాతీయ అధ్యక్షుడు:మనసాని కృష్ణారెడ్డి.

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