BRICS समिट के लिए भारत आएंगे रूसी राष्ट्रपति पुतिन, 11 सितंबर को पीएम मोदी के साथ बैठक

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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत दौरे पर आएंगे। 11 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी तय हो गई है।

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इस मुलाकात की पुष्टि की है। दिमित्री पेस्कोव ने मंगलवार को भारतीय पत्रकारों के साथ वर्चुअल बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने वाला है।

पीएम मोदी और पुतिन के बीच करीबी व्यक्तिगत संबंध

मॉस्को से वर्चुअल ब्रीफिंग के जरिए पत्रकारों से बात करते हुए पेस्कोव ने कहा, "दोनों नेता भारतीय और रूसी नेता बहुत करीबी व्यक्तिगत संपर्क में हैं। उनके रिश्ते बहुत व्यावहारिक हैं, और वे इतने ईमानदार हैं कि हमारे एजेंडे और द्विपक्षीय संबंधों के सबसे संवेदनशील मुद्दों पर बहुत खुले और रचनात्मक तरीके से चर्चा कर सकते हैं। ज़ाहिर है, इससे हमारे सहयोग के लिए नए रास्ते खुलते हैं।"

इन मुद्दों पर होगी बात

मोदी-पुतिन की बैठक में व्यापार, आर्थिक सहयोग और परिवहन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। दोनों देश आपसी कारोबार बढ़ाने और अपनी कंपनियों के लिए नए मौके तलाशने पर भी बात कर सकते हैं। भारतीय कंपनियां रूस के बाजार में विस्तार करना चाहती हैं, जबकि रूस भारत में अपने कारोबार और उत्पादों की पहुंच बढ़ाने में रुचि रखता है।

रूस यूक्रेन युद्ध पर चर्चा संभव

यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ने, पश्चिमी प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे कई बड़े सवालों से जूझ रही है। ऐसे में बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध और फारस की खाड़ी में जारी तनाव भी चर्चा का हिस्सा हो सकता है। दोनों नेता युद्ध की मौजूदा स्थिति और उसके असर पर बात कर सकते हैं। रूस के मुताबिक, खाड़ी में जारी घटनाओं का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

भारत 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। यह तेजी से आगे बढ़ रहे प्रमुख उभरते बाजार वाले देशों और विकासशील देशों के अंतर-सरकारी मंच के लिए एक अहम पल होगा। भारत ने इस साल 1 जनवरी को ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली, जो इस समूह की कमान संभालने का उसका चौथा मौका है। साल 2026 ब्रिक्स की स्थापना के 20 साल पूरे होने का भी प्रतीक है।

S-400 की सफलता के बाद S-500 और Su-57 पर भारत की नजर, रूस के साथ डिफेंस डील को लेकर हलचल!

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भारत अपनी वायु रक्षा प्रणाली और लड़ाकू विमानों की संख्या दोनों को तत्काल मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।ऑपरेशन सिंदूर में S-400 की जबरदस्त सफलता के बाद भारत की रूस के S-500 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और SU-57 स्टील्थ फाइटर जेट पर निगाहें है।

पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, पाकिस्तानी हवाई खतरों के खिलाफ भारत की रूसी निर्मित एस-400 प्रणालियों को बड़े पैमाने पर तैनात किया गया था। पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना के S-400 सिस्टम ने असाधारण दूरी से दुश्मन के अर्ली वार्निंग एयरक्राफ्ट को मार गिराया था। रूस अब उस परिचालन अनुभव का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। रूस ने भारत को 5 अतिरिक्त S-400 स्क्वाड्रन देने की भी पेशकश की है।

50 हजार करोड़ में हुई थी S-400 की डील

भारत ने 2018 में करीब 5.43 अरब डॉलर के समझौते के तहत पांच S-400 स्क्वाड्रन का ऑर्डर दिया था। इनमें से चार की डिलीवरी हो चुकी है, जबकि पांचवां और अंतिम स्क्वाड्रन नवंबर 2026 तक मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा भारत सरकार पांच और S-400 स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे चुकी है, जिसकी कीमत 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है।

भारत स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण की ओर बढ़ा

लेकिन S-500 का प्रस्ताव काफी जटिल है। दरअसल, यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब भारत स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा कार्यक्रम 'प्रोजेक्ट कुशा' के कुछ पहलुओं का परीक्षण शुरू कर रहा है, जिसका उद्देश्य अंततः एस-400 श्रेणी में एक भारतीय विकल्प प्रदान करना है। इसके अलावा, भारत का अपना बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) प्रोग्राम भी काफी आगे बढ़ चुका है। ऐसे में भारी बजट खर्च करके S-500 खरीदना क्या सही फैसला होगा, या फिर इस डील से भारत के अपने घरेलू प्रोजेक्ट्स को झटका लगेगा।

सुखोई सु-57 फेलॉन को लेकर भी चर्चा

रूस का दूसरा प्रमुख प्रस्ताव है, सुखोई सु-57 फेलॉन। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों की घटती संख्या और सबसे महत्वपूर्ण बात, आने वाले वर्षों तक किसी भारतीय स्टील्थ फाइटर के अभाव से जूझने के बीच, रूस ने पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर के प्रति अपना समर्थन और भी तीव्र कर दिया है। मॉस्को ने संकेत दिया है कि भविष्य में Su-57 से संबंधित किसी भी प्रस्ताव में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, स्थानीयकरण और भारत में उत्पादन को शामिल किया जा सकता है।

अचानक मॉस्को क्यों पहुंचे CIA चीफ? मॉस्को में सीक्रेट लैंडिंग से पूरी दुनिया में खलबली

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रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच मास्को में सोमवार को एक अप्रत्याशित घटना देखने को मिली है। जिसके बाद पूरी दुनिया खासकर यूरोप में खलबली मच गई है। मंगलवार को अचानक अमेरिकी एयरफोर्स का विमान मॉस्को की जमीन पर उतरा। विमान लैंड होते ही अंदर से निकले दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी CIA के चीफ जॉन रैटक्लिफ। यह विमान मॉस्को के वनुकोवो हवाई अड्डे पर उतरा था, जिसके बाद से इस घटना को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

अमेरिका-रूस की खुफिया एजेंसियों में संपर्क

सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, एक अमेरिकी अधिकारी ने पुष्टि की है कि सीआईए चीफ जॉन रैटक्लिफ ने मंगलवार को मॉस्को का दौरा किया। उन्होंने बताया कि सीआईए प्रमुख मॉस्को में अपने समकक्ष के साथ बैठक के लिए C-17 ग्लोबमास्टर विमान से रूस पहुंचे हैं। मामले से परिचित लोगों ने सीबीएस रिपोर्टर ओलिविया गाज़िस को बताया कि रैटक्लिफ मंगलवार को मॉस्को में बैठकें करने वाले थे।

सीक्रेट यात्रा की खबर से मचा हड़कंप

वॉशिंगटन से लेकर मॉस्को तक इस सीक्रेट यात्रा की खबर फैलते ही हड़कंप मच गया है। हालांकि, न तो व्हाइट हाउस और न ही क्रेमलिन ने आधिकारिक तौर पर इस दौरे की पुष्टि की है। लेकिन फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा से लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पर्दे के पीछे कोई बहुत बड़ी रणनीतिक डील चल रही है।

सीआईए चीफ क्यों पहुंचे रूस?

सीआईए डायरेक्टर का पद संभालने के बाद जॉन रैटक्लिफ की यह पहली मॉस्को यात्रा है। इस दौरे में भविष्य में कैदियों की अदला-बदली को लेकर संवेदनशी बातचीत भी शामिल हो सकती है। अप्रैल 2025 में अमेरिका और रूस की दोहरी नागरिकता रखने वाली केसिनिया करे़लिना की रिहाई में रैटक्लिफ की व्यक्तिगत भूमिका रही थी। सीआईए ऐतिहासिक रूप से सिर्फ खुफिया जानकारी जुटाने का काम ही नहीं करती, बल्कि अमेरिका और रूस के बीच मुश्किल बैक-चैनल कूटनीति को संभालने में भी बड़ी भूमिका निभाती रही है। ऐसे में ये दौरा काफी अहम माना जा रहा है।

भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, रूस पर प्रतिबंध वाला बिल अमेरिकी सीनेट में पास

#ussenatepassesrussiasanctionsbillallows100percenttariffonindiachina

अमेरिका और रूस की तनातनी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। रूस और उसके दोस्तों को तोड़ने के लिए अमेरिका ने ब्रह्मास्त्र चल दिया है। अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार 7 जुलाई को रूस पर प्रतिबंध वाले बिल को मंजूरी दे दी है। इस बिल में 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान है। इसका मकसद रूस से ऊर्जा खरीद करने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाना है।

अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देने वाला बिल पास

अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 टैरिफ लगाने का अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देने वाला बिल शुक्रवार को पास कर दिया। सीनेट में इस बिल को 86-11 के भारी बहुमत से पास किया गया। अब इसे अमेरिकी हाउस (कांग्रेस) में पेश किया जाएगा। इसके पहले बिल का नाम बदलकर लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 किया गया। यह बिल पूर्व अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया था, जिनकी पिछले महीने अचानक मौत हो गई थी।

भारत और चीन जैसे देशों के खिलाफ लगेगा 100 फीसदी टैरिफ

इस बिल का मकसद मॉस्को व तेहरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। बिल को मंजूरी मिलने के बाद ट्रंप को भारत, चीन जैसे देशों के खिलाफ 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार मिल जाएगा। साथ ही, यह उन देशों को भी निशाना बनाता है, जो तेल-गैस खरीद के जरिये रूस के युद्ध प्रयासों को आर्थिक मदद जारी रखे हुए हैं।

रूसी तेल और गैस आयातकों पर लगेगा प्रतिबंध

यह बिल अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों के सामान पर 100% टैरिफ लगाने की मंजूरी देता है, जो रूसी तेल और गैस के शीर्ष 5 आयातक हैं। इनमें भारत और चीन भी शामिल हैं। तर्क दिया गया है कि इससे रूस की पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से होने वाली कमाई कम होगी और मॉस्को पर यूक्रेन युद्ध को खत्म करने का दबाव बढ़ेगा। इस समय चीन, भारत, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया रूस के शीर्ष 5 ऊर्जा खरीदार हैं।

रिपब्लिकन व डेमोक्रेट दोनों पार्टियों का समर्थन

खास बात यह है कि इस बिल को रिपब्लिकन व डेमोक्रेट दोनों पार्टियों का समर्थन मिला। दोनों पार्टियों के समर्थन वाले इस बिल को दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था। सीनेट में इसे 86 वोटों के साथ भारी समर्थन हासिल हुआ। केंटकी के रैंड पॉल अकेले ऐसे रिपब्लिकन थे, जिन्होंने इस कानून का विरोध किया। वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी के 10 सीनेटरों ने इसके विरोध में वोट किया।

BRICS समिट के लिए भारत आएंगे रूसी राष्ट्रपति पुतिन, 11 सितंबर को पीएम मोदी के साथ बैठक

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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत दौरे पर आएंगे। 11 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी तय हो गई है।

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इस मुलाकात की पुष्टि की है। दिमित्री पेस्कोव ने मंगलवार को भारतीय पत्रकारों के साथ वर्चुअल बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने वाला है।

पीएम मोदी और पुतिन के बीच करीबी व्यक्तिगत संबंध

मॉस्को से वर्चुअल ब्रीफिंग के जरिए पत्रकारों से बात करते हुए पेस्कोव ने कहा, "दोनों नेता भारतीय और रूसी नेता बहुत करीबी व्यक्तिगत संपर्क में हैं। उनके रिश्ते बहुत व्यावहारिक हैं, और वे इतने ईमानदार हैं कि हमारे एजेंडे और द्विपक्षीय संबंधों के सबसे संवेदनशील मुद्दों पर बहुत खुले और रचनात्मक तरीके से चर्चा कर सकते हैं। ज़ाहिर है, इससे हमारे सहयोग के लिए नए रास्ते खुलते हैं।"

इन मुद्दों पर होगी बात

मोदी-पुतिन की बैठक में व्यापार, आर्थिक सहयोग और परिवहन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। दोनों देश आपसी कारोबार बढ़ाने और अपनी कंपनियों के लिए नए मौके तलाशने पर भी बात कर सकते हैं। भारतीय कंपनियां रूस के बाजार में विस्तार करना चाहती हैं, जबकि रूस भारत में अपने कारोबार और उत्पादों की पहुंच बढ़ाने में रुचि रखता है।

रूस यूक्रेन युद्ध पर चर्चा संभव

यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ने, पश्चिमी प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे कई बड़े सवालों से जूझ रही है। ऐसे में बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध और फारस की खाड़ी में जारी तनाव भी चर्चा का हिस्सा हो सकता है। दोनों नेता युद्ध की मौजूदा स्थिति और उसके असर पर बात कर सकते हैं। रूस के मुताबिक, खाड़ी में जारी घटनाओं का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

भारत 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। यह तेजी से आगे बढ़ रहे प्रमुख उभरते बाजार वाले देशों और विकासशील देशों के अंतर-सरकारी मंच के लिए एक अहम पल होगा। भारत ने इस साल 1 जनवरी को ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली, जो इस समूह की कमान संभालने का उसका चौथा मौका है। साल 2026 ब्रिक्स की स्थापना के 20 साल पूरे होने का भी प्रतीक है।

S-400 की सफलता के बाद S-500 और Su-57 पर भारत की नजर, रूस के साथ डिफेंस डील को लेकर हलचल!

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भारत अपनी वायु रक्षा प्रणाली और लड़ाकू विमानों की संख्या दोनों को तत्काल मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।ऑपरेशन सिंदूर में S-400 की जबरदस्त सफलता के बाद भारत की रूस के S-500 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और SU-57 स्टील्थ फाइटर जेट पर निगाहें है।

पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, पाकिस्तानी हवाई खतरों के खिलाफ भारत की रूसी निर्मित एस-400 प्रणालियों को बड़े पैमाने पर तैनात किया गया था। पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना के S-400 सिस्टम ने असाधारण दूरी से दुश्मन के अर्ली वार्निंग एयरक्राफ्ट को मार गिराया था। रूस अब उस परिचालन अनुभव का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। रूस ने भारत को 5 अतिरिक्त S-400 स्क्वाड्रन देने की भी पेशकश की है।

50 हजार करोड़ में हुई थी S-400 की डील

भारत ने 2018 में करीब 5.43 अरब डॉलर के समझौते के तहत पांच S-400 स्क्वाड्रन का ऑर्डर दिया था। इनमें से चार की डिलीवरी हो चुकी है, जबकि पांचवां और अंतिम स्क्वाड्रन नवंबर 2026 तक मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा भारत सरकार पांच और S-400 स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे चुकी है, जिसकी कीमत 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है।

भारत स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण की ओर बढ़ा

लेकिन S-500 का प्रस्ताव काफी जटिल है। दरअसल, यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब भारत स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा कार्यक्रम 'प्रोजेक्ट कुशा' के कुछ पहलुओं का परीक्षण शुरू कर रहा है, जिसका उद्देश्य अंततः एस-400 श्रेणी में एक भारतीय विकल्प प्रदान करना है। इसके अलावा, भारत का अपना बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) प्रोग्राम भी काफी आगे बढ़ चुका है। ऐसे में भारी बजट खर्च करके S-500 खरीदना क्या सही फैसला होगा, या फिर इस डील से भारत के अपने घरेलू प्रोजेक्ट्स को झटका लगेगा।

सुखोई सु-57 फेलॉन को लेकर भी चर्चा

रूस का दूसरा प्रमुख प्रस्ताव है, सुखोई सु-57 फेलॉन। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों की घटती संख्या और सबसे महत्वपूर्ण बात, आने वाले वर्षों तक किसी भारतीय स्टील्थ फाइटर के अभाव से जूझने के बीच, रूस ने पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर के प्रति अपना समर्थन और भी तीव्र कर दिया है। मॉस्को ने संकेत दिया है कि भविष्य में Su-57 से संबंधित किसी भी प्रस्ताव में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, स्थानीयकरण और भारत में उत्पादन को शामिल किया जा सकता है।

अचानक मॉस्को क्यों पहुंचे CIA चीफ? मॉस्को में सीक्रेट लैंडिंग से पूरी दुनिया में खलबली

#ciachiefjohnratclifferussia_visit

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच मास्को में सोमवार को एक अप्रत्याशित घटना देखने को मिली है। जिसके बाद पूरी दुनिया खासकर यूरोप में खलबली मच गई है। मंगलवार को अचानक अमेरिकी एयरफोर्स का विमान मॉस्को की जमीन पर उतरा। विमान लैंड होते ही अंदर से निकले दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी CIA के चीफ जॉन रैटक्लिफ। यह विमान मॉस्को के वनुकोवो हवाई अड्डे पर उतरा था, जिसके बाद से इस घटना को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

अमेरिका-रूस की खुफिया एजेंसियों में संपर्क

सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, एक अमेरिकी अधिकारी ने पुष्टि की है कि सीआईए चीफ जॉन रैटक्लिफ ने मंगलवार को मॉस्को का दौरा किया। उन्होंने बताया कि सीआईए प्रमुख मॉस्को में अपने समकक्ष के साथ बैठक के लिए C-17 ग्लोबमास्टर विमान से रूस पहुंचे हैं। मामले से परिचित लोगों ने सीबीएस रिपोर्टर ओलिविया गाज़िस को बताया कि रैटक्लिफ मंगलवार को मॉस्को में बैठकें करने वाले थे।

सीक्रेट यात्रा की खबर से मचा हड़कंप

वॉशिंगटन से लेकर मॉस्को तक इस सीक्रेट यात्रा की खबर फैलते ही हड़कंप मच गया है। हालांकि, न तो व्हाइट हाउस और न ही क्रेमलिन ने आधिकारिक तौर पर इस दौरे की पुष्टि की है। लेकिन फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा से लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पर्दे के पीछे कोई बहुत बड़ी रणनीतिक डील चल रही है।

सीआईए चीफ क्यों पहुंचे रूस?

सीआईए डायरेक्टर का पद संभालने के बाद जॉन रैटक्लिफ की यह पहली मॉस्को यात्रा है। इस दौरे में भविष्य में कैदियों की अदला-बदली को लेकर संवेदनशी बातचीत भी शामिल हो सकती है। अप्रैल 2025 में अमेरिका और रूस की दोहरी नागरिकता रखने वाली केसिनिया करे़लिना की रिहाई में रैटक्लिफ की व्यक्तिगत भूमिका रही थी। सीआईए ऐतिहासिक रूप से सिर्फ खुफिया जानकारी जुटाने का काम ही नहीं करती, बल्कि अमेरिका और रूस के बीच मुश्किल बैक-चैनल कूटनीति को संभालने में भी बड़ी भूमिका निभाती रही है। ऐसे में ये दौरा काफी अहम माना जा रहा है।

भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, रूस पर प्रतिबंध वाला बिल अमेरिकी सीनेट में पास

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अमेरिका और रूस की तनातनी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। रूस और उसके दोस्तों को तोड़ने के लिए अमेरिका ने ब्रह्मास्त्र चल दिया है। अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार 7 जुलाई को रूस पर प्रतिबंध वाले बिल को मंजूरी दे दी है। इस बिल में 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान है। इसका मकसद रूस से ऊर्जा खरीद करने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाना है।

अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देने वाला बिल पास

अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 टैरिफ लगाने का अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देने वाला बिल शुक्रवार को पास कर दिया। सीनेट में इस बिल को 86-11 के भारी बहुमत से पास किया गया। अब इसे अमेरिकी हाउस (कांग्रेस) में पेश किया जाएगा। इसके पहले बिल का नाम बदलकर लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 किया गया। यह बिल पूर्व अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया था, जिनकी पिछले महीने अचानक मौत हो गई थी।

भारत और चीन जैसे देशों के खिलाफ लगेगा 100 फीसदी टैरिफ

इस बिल का मकसद मॉस्को व तेहरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। बिल को मंजूरी मिलने के बाद ट्रंप को भारत, चीन जैसे देशों के खिलाफ 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार मिल जाएगा। साथ ही, यह उन देशों को भी निशाना बनाता है, जो तेल-गैस खरीद के जरिये रूस के युद्ध प्रयासों को आर्थिक मदद जारी रखे हुए हैं।

रूसी तेल और गैस आयातकों पर लगेगा प्रतिबंध

यह बिल अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों के सामान पर 100% टैरिफ लगाने की मंजूरी देता है, जो रूसी तेल और गैस के शीर्ष 5 आयातक हैं। इनमें भारत और चीन भी शामिल हैं। तर्क दिया गया है कि इससे रूस की पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से होने वाली कमाई कम होगी और मॉस्को पर यूक्रेन युद्ध को खत्म करने का दबाव बढ़ेगा। इस समय चीन, भारत, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया रूस के शीर्ष 5 ऊर्जा खरीदार हैं।

रिपब्लिकन व डेमोक्रेट दोनों पार्टियों का समर्थन

खास बात यह है कि इस बिल को रिपब्लिकन व डेमोक्रेट दोनों पार्टियों का समर्थन मिला। दोनों पार्टियों के समर्थन वाले इस बिल को दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था। सीनेट में इसे 86 वोटों के साथ भारी समर्थन हासिल हुआ। केंटकी के रैंड पॉल अकेले ऐसे रिपब्लिकन थे, जिन्होंने इस कानून का विरोध किया। वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी के 10 सीनेटरों ने इसके विरोध में वोट किया।