नक्सलवाद के एक खूनी अध्याय का अंत: माओवादी थिंक टैंक प्रशांत बोस उर्फ 'किशन दा' की मौत।
रांची: भारत में नक्सलवाद के पांच दशक पुराने एक बड़े अध्याय का कल औपचारिक रूप से समापन हो गया। भाकपा माओवादी संगठन के आधार स्तंभ और 'सेकंड-इन-कमान' रहे प्रशांत बोस उर्फ किशन दा ने शुक्रवार, 03 अप्रैल 2026 को दुनिया को अलविदा कह दिया।
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साल 2021 से रांची की जेल में बंद प्रशांत बोस की मौत को देश से नक्सलवाद के पूर्ण सफाए पर 'आखरी कील' के तौर पर देखा जा रहा है।
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मजदूर यूनियन से शीर्ष कमांडर तक का सफर
प्रशांत बोस का सफर 60 के दशक में कोलकाता के मजदूर यूनियनों से शुरू हुआ था। एमसीसीआई (MCCI) के संस्थापक कन्हाई चटर्जी के साथ मिलकर उसने जमींदारी प्रथा के खिलाफ आंदोलन छेड़ा और बाद में रतिलाल मुर्मू के साथ मिलकर 'सनलाइट सेना' का गठन किया। 2004 में जब एमसीसीआई और पीडब्ल्यूजी (PWG) का विलय हुआ, तब प्रशांत बोस को ईआरबी (ERB) का प्रमुख और संगठन का मुख्य रणनीतिकार बनाया गया।
खौफनाक वारदातों का 'मास्टरमाइंड'
प्रशांत बोस केवल एक नेता नहीं, बल्कि माओवादियों का 'थिंक टैंक' था। देश की सुरक्षा को हिला देने वाली कई बड़ी घटनाओं के पीछे इसी का दिमाग था:
- प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश: पुणे के भीमा कोरेगांव हिंसा और पीएम नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने में एनआईए (NIA) की चार्जशीट में इसका नाम प्रमुखता से शामिल था।
- झीरम घाटी कांड (2013): छत्तीसगढ़ के बस्तर में विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र करमा समेत 30 कांग्रेस नेताओं की नृशंस हत्या की मंजूरी प्रशांत बोस ने ही दी थी।
- सैकड़ों मामले: अकेले झारखंड में इसके खिलाफ 70 और इसकी पत्नी शीला मरांडी के खिलाफ 18 मामले दर्ज थे। बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भी यह वांटेड था।
2021 की वह ऐतिहासिक गिरफ्तारी
प्रशांत बोस को पकड़ना सुरक्षा बलों के लिए दशकों की सबसे बड़ी कामयाबी थी। साल 2021 में झारखंड के तत्कालीन डीजीपी नीरज सिन्हा, आईजी अभियान अमोल वी. होमकर और आईबी की संयुक्त टीम ने उसे सरायकेला के कांड्रा से दबोचा था। उस समय डीजीपी ने बताया था कि प्रशांत बोस माओवादी संगठन के रहस्यों का 'महासागर' है, जिसकी गिरफ्तारी ने संगठन की कमर तोड़ दी थी।
नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने ही देश से नक्सलवाद के लगभग समाप्त होने की घोषणा की थी। केंद्र और राज्य सरकारों के साझा ऑपरेशनों, मजबूत इच्छाशक्ति और विकास कार्यों ने माओवाद को समाज की जड़ों से उखाड़ फेंका है। प्रशांत बोस की मौत के साथ ही अब वह विचारधारा भी इतिहास के पन्नों में सिमटने की कगार पर है जिसने दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दी।










2 hours and 51 min ago
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