साहित्यकार प्रवीण गुगनानी को प्रदान किया गया एनलाल जैन “स्वदेशी” सम्मान
भोपाल। दुष्यंत स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के तत्वाधान में आयोजित एनलाल जैन स्वदेशी सम्मान बैतूल के साहित्यकार प्रवीण गुगनानी को प्रदान किया गया। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता मनोज श्रीवास्तव ने की और बतौर मुख्य अतिथि हेमंत मुक्तिबोध उपस्थित रहे।
ज्ञातव्य है कि एनलाल जैन बैतूल जिले के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री और संवेदनशील साहित्यकार रहे हैं जिनकी उंगली पकड़कर साहिब राव राजुरकर जैसे कई छात्रों ने साहित्य और साहित्य की दुनिया की बारहखड़ी सीखी थी। उनके प्रेरणास्रोत का दायरा सम्पूर्ण बैतूल जिले में फैला था। उन्होंने लंबे समय तक “ताप्ती के तेवर” पत्रिका का संपादन किया और “वीणा के तार” एवं “अनुभूति की रेखाएँ” काव्य संग्रह प्रकाशित हुए।
उनकी स्मृति में पहला सम्मान बैतूल के साहित्यकार प्रवीण गुगनानी को प्रदान किया गया।
प्रवीण गुगनानी समकालीन हिंदी साहित्य और शिक्षण क्षेत्र से जुड़े एक सक्रिय व्यक्तित्व हैं। वे मुख्यतः लेखन, चिंतन और शैक्षिक गतिविधियों के माध्यम से समाज में वैचारिक जागरूकता फैलाने के लिए जाने जाते हैं।
सर्वप्रथम एनलाल जैन की पुत्री करुणा राजुरकर ने पिता का मार्मिक स्मरण करते हुए कहा कि हमारे बाबू जिनका जन्म छिंदवाड़ा में हुआ था परन्तु उनकी कर्मभूमि बैतूल जिला रही। इसलिए उनकी स्मृति में यह सम्मान इन दो जिलों की साहित्यिक विभूतियों को प्रदान किया जाता है।
प्रवीण गुगनानी ने अपने उद्बोधन में कहा कि एनलाल जैन एक कुटुंब प्रणाली की उत्पत्ति थे और उन्होंने परिवार प्रथा को मज़बूत करने हेतु समर्पित भाव से कार्य किया था। वे कृषकाय लेकिन पक्की धारणा के व्यक्ति थे। मैं उनके नाम का सम्मान प्राप्त कर अनुगृहीत हूँ।
रामराव वामनकर ने एनलाल जैन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि वे दुष्यंत संग्रहालय के अध्यक्ष भी रहे थे। संग्रहालय से जुड़ी नीतियां बनाने मे उनका महती योगदान हमेशा स्मरणीय रहेगा। लक्ष्मीकांत जवणे ने संस्मरण साझा करते हुए बताया कि एनलाल जैन और प्रवीण गुगनानी मुलताई में ज़मीन से जुड़े सामाजिक सरोकार के प्रमुख व्यक्तित्व थे। अशोक निर्मल ने बताया कि
अपनी स्मृतियों को साझा किया।
इस अवसर पर अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि करुणा जी ने पिता जी स्मृति में सम्मान स्थापित कर साहित्यिक पितृऋण का उतारा किया है। जो निश्चित ही सराहनीय कदम है।
मुख्य अतिथि हेमन्त मुक्तिबोध ने कहा कि आज हम पहचान के संकट से गुज़र रहे हैं। एनलाल जैन जैसे महानुभाव एक ऐसी पहचान रखते थे जो भारतीय परंपरा से जाकर जुड़ती थी।
महेश सक्सेना ने स्वागत उद्बोधन में एनलाल जैन के व्यक्तित्व के बारे में सभी अतिथियों को परिचित कराते हुए कहा कि उन्होंने प्रभातपट्टन में प्राचार्य के रूप में अधिकांश समय व्यतीत किया था।
एनलाल जैन की नातिन विशाखा राजुरकर ने उपस्थित अतिथियों का आभार प्रदर्शन किया। कार्यक्रम का संचालन घनश्याम मैथिल ने किया। इस अवसर पर नगर के गणमान्य साहित्यकार मौजूद रहे।


















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खान आशु
भोपाल। साल 1980... धार जिला मुख्यालय का आनंद उच्चतर माध्यमिक विद्यालय। पंकज ग्वालियर से तो जनार्दन, इरफान, राजेश, अशफाक और कमल किसी मुहल्ले के स्कूल से आकर यहां जमा हुए थे। सहपाठी दोस्त बने। दोस्ती गहराती रही, यहां तक कि कॉलेज तक भी साथ नहीं छूटा और स्नातक और स्नातकोत्तर पढ़ाई भी साथ ही चलती रही। इस बीच कई होली, कई रमजान, अनेक दिवाली और दर्जनों ईद के त्यौहार साथ मनाने का क्रम जारी रहा। जारी रहने का यह सिलसिला अब दशकों बाद भी बना हुआ है। इरफान की मास्टरी, राजेश की महिला एवं बाल विकास विभाग की सरकारी नौकरी, अशफाक की पत्रकारिता या पंकज का इंश्योरेंस वर्क या जनार्दन का मेडिकल काम कभी बाधा नहीं बना। बस फर्क इतना हुआ कि भौतिक मुलाकातों में कमी आ गई और उसकी जगह सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने ले ली, जिसकी डोर ने आज भी इन यारों की यारी को सरसब्ज रखा हुआ है।
स्कूल कॉलेज से हाथ छुड़ाते वक्त तय नहीं था कि कौन किस रास्ते आगे बढ़ेगा। लेकिन जहां राजेश ने सरकारी नौकरी के साथ खुद को धार की परिधि में ही बांध लिया था, वहीं इरफान भी चंद कदम दूर मांडू जाकर ठहर गए। पंकज और जनार्दन ने इंदौर को ठिकाना बनाया तो दोनों के घर भी संयोग से एक ही कालोनी में आ लगे। अशफाक अखबारों की दुनिया के साथ बहते हुए भोपाल तक आकर रुका, जबकि कमल पटेल ने अपनी पैतृक नगरी धार का दामन छोड़ पाने का मोह नहीं पाला।
पंकज गुप्ता सब दोस्तों में ऐसा शख्स थे, जिनके घर पहला टीवी आया था, हमारा नियम से चित्रहार, साप्ताहिक या फिल्म देखने जाने का सिलसिला चलता रहा। यह क्रम ऐसा था कि दिन याद रखकर पंकज के पिताश्री घर आते तो हम लोगों के लिए भी खानपान के सामान साथ लेकर आते। जब बहन सपना दुल्हन बनी तो हम लोगों ने दिल्ली तक पहुंचकर शादी में शिरकत की और बहन को विदा किया।
राजेश वाणी इस मंडली का पहला व्यक्ति था, जिसने सबसे पहले सात फेरे लिए थे। इरफान, पंकज के साथ अच्छे दोस्तों की तरह जोबट तक पहुंचे और देर रात होने वाले फेरों के लिए जागरण भी किया। हालांकि शादी के बाद जब भी हम लोग इंदौर जाकर पंकज के यहां ठहरते, पंकज ने राजेश के पास सोने से इनकार कर दिया था। वजह क्या थी, यह वही जानते हैं।
सरकारी मास्टर बनने से पहले इरफान पठान एक रोलिंग मिल में पर्चेस मैनेजर हुआ करते थे। जमाना कैश पेमेंट का था, डिजिटल लेनदेन उस समय नहीं होता था। कैश साथ होने की अपनी रिस्क और बनिए का दिमाग अपनी जगह। फैक्ट्री मालिक विष्णु सेठ ने मशवरा दिया कि अशफाक को भी साथ ले जाया करे इरफान। अच्छी जगह रुकने और अच्छा खाना खाने के साथ उन्होंने गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान का कोना कोना नापने का मौका दिया। इस दौरान हम कई बार अजमेर घूमते तो अनेक बार पावागढ़ के दर्शन से भी नहीं चूकते।
पंकज, इरफान, जनार्दन, राजेश, अशफाक की इस मंडली का एक और हिस्सा हुआ करते थे, नाम था श्रीचंद मलानी। कारोबार के पक्के और व्यवहार के सच्चे इस मित्र के साथ बरसों की हजारों यादें अब भी बंधी हुई हैं। बस यह है कि आज भौतिक रूप से वह हमारे साथ नहीं हैं।
काम की व्यस्तता ने सभी लोगों को भौतिक रूप से दूर जरूर कर दिया है, लेकिन वास्तविकता यह है आज भी दिल से सब एक दूसरे से उतने ही जुड़े हैं। वही अपनापन, वही मिलने की शिद्दत, वही एक दूसरे के लिए फिक्र। इरफान के बेटे की शादी हो या जनार्दन की सालगिरह, अशफाक के घर वालिद के दुनिया से रुखसत होने का गम, या राजेश या कमल के घर कोई मांगलिक कार्य, आज भी सभी उसी सम्मान और व्यवहार के साथ याद किए जाते हैं। इनकी 46 बरस की दोस्ती को जिंदा रखने के लिए एक व्हाट्स एप ग्रुप बनाया गया है स्कूल फ्रेंड्स, जो इस कड़ी को मजबूती देता रहता है। इसमें कुछ स्कूली दौर के साथी देवेंद्र काशिव भी मौजूद हैं और जितेंद्र आहूजा भी। इस ग्रुप से हटकर इस जमाने में साथ रहीं डॉ कुसुम बौरासी और नसीम खान भी गाहे बगाहे मुलाकातों में शामिल हैं।
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