क्या रेत पर हो सकता है अगला महाकुंभ? सोनम वांगचुक ने पीएम मोदी को क्यों ऐसा लिखा
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जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने पर चिंता जताई है।


उन्होंने अपने पत्र में इन ग्लेशियरों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया क्योंकि ये भारत की जीवनदायिनी गंगा और यमुना जैसी नदियों का स्रोत हैं। यही नहीं, वांगचुक ने चेताया है कि कहीं 144 साल के बाद अगला महाकुंभ रेत पर आयोजित करना ना पड़ेगा। वांगचुक, अमेरिका की अपनी यात्रा से लौटे हैं।


वे हिमालय के ग्लेशियरों के संरक्षण पर काम कर रहे हैं, खारदुंग ला के एक ग्लेशियर से बर्फ का एक टुकड़ा लेकर लद्दाख से दिल्ली और फिर अमेरिका पहुंचे। बर्फ को इन्सुलेशन के लिए लद्दाख के प्रतिष्ठित पश्मीना ऊन में लपेटकर एक कंटेनर में रखा गया था।


बर्फ को दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ले जाया गया, उसके बाद वह अमेरिका के लिए रवाना हुए, जहां से यह बर्फ जलवायु कार्यकर्ता के साथ बोस्टन में हार्वर्ड कैनेडी स्कूल, एमआईटी और न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय तक गई, और फिर 21 फरवरी को न्यूयॉर्क में हडसन नदी और ईस्ट नदी के संगम पर इसे विसर्जित कर दिया गया।


अमेरिका की अपनी यात्रा से लौटे वांगचुक ने अपने लेटर में देश की नदियों की मौजूदा सूरत-ए-हाल का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि अगर वक्त रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में नदियां पूरी तरह सूख सकती हैं। वांगचुक ने प्रधानमंत्री मोदी से हिमालय के ग्लेशियरों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए आयोग गठित करने का भी आग्रह किया है।



बता दें कि 2025 को ग्लेशियरों के प्रोटेक्टशन का इंटरनेशनल ईयर घोषित किया गया है। ऐसे में पत्र में वांगचुक ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को ग्लेशियर ईयर में अहम भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद हिमालय में पृथ्वी पर बर्फ और हिम का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, जिसके कारण इसे ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है। पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने कहा, भारत को ग्लेशियर प्रोटेक्शन में अहम भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि हमारे पास हिमालय है और गंगा एवं यमुना जैसी हमारी पवित्र नदियां यहीं से निकलती हैं।



उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियां मौसमी हो सकती हैं। उन्होंने कहा, जैसा कि हम सभी जानते हैं, हिमालय के ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं, और अगर यह और वनों की कटाई वर्तमान दर से जारी रही, तो हमारी पवित्र नदियां मौसमी हो सकती हैं। इसका यह भी मतलब हो सकता है कि अगला महाकुंभ पवित्र नदी के रेतीले अवशेषों पर ही संभव हो।


उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि आम लोगों में जमीनी स्तर पर बहुत कम जागरूकता है। वांगचुक ने कहा, इसलिए मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि आपके नेतृत्व में भारत हिमालय में सबसे अधिक ग्लेशियर वाले देश के रूप में अग्रणी बने।
केन्द्र सरकार ने दोषी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने का किया विरोध, सुप्रीम कोर्ट में दायर किया हलफनामा
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सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों केंद्र सरकार से जवाब मांगा था कि क्या दोषी सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ने पर हमेशा के लिए बैन लगना चाहिए। इस मामले पर अब केंद्र सरकार की तरफ से हलफनामा दाखिल किया गया है। केन्द्र सरकार ने दोषी राजनेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग का विरोध किया है। केंद्र ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं होगा।

*अयोग्यता तय करना संसद के अधिकार क्षेत्र में- केंद्र*
केंद्र सरकार ने दोषी करार दिये गए राजनीतिक नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की सजा को कठोर कहा है। साथ ही अनुरोध करने वाली एक याचिका का उच्चतम न्यायालय में विरोध करते हुए कहा है कि इस तरह की अयोग्यता तय करना केवल संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। शीर्ष अदालत में दाखिल हलफनामे में केंद्र ने कहा कि याचिका में जो अनुरोध किया गया है वह विधान को फिर से लिखने या संसद को एक विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देने के समान है, जो न्यायिक समीक्षा संबंधी उच्चतम न्यायालय की शक्तियों से पूरी तरह से परे है।

*6 साल की अयोग्यता ही काफी-केंद्र*
केंद्र ने कहा,वर्तमान में 6 वर्षों की अयोग्यता अवधि से बढ़कर आजीवन प्रतिबंध लगाना अनुचित कठोरता होगी और यह संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। केंद्र ने कहा कि न्यायपालिका संसद को किसी कानून में संशोधन करने या उसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। केंद्र ने मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि कोर्ट संसद को कानून बनाने या संशोधन का निर्देश नहीं दे सकती।

*क्या है मामला?*
वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए नेताओं को 6 साल के लिए अयोग्यता को अपर्याप्त बताते हुए राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए दोषी विधायकों और सांसदों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। उन्होंने याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनिम, 1951 की धारा 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।
मौजूदा कानून के तहत आपराधिक मामलों में 2 साल या उससे अधिक की सजा होने पर सजा की अवधि पूरी होने के 6 साल बाद तक चुनाव लड़ने पर ही रोक है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने याचिका में दोषी राजनेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने और अलग-अलग अदालतों में उनके खिलाफ लंबित मुकदमों को तेजी से निपटाने की मांग की है।
तमिलनाडु नई शिक्षा नीति के खिलाफ क्यों? सीएम स्टालिन याद कर रहे 6 दशक पुराना है विवाद
#tamil_nadu_hindi_controversy



राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को लेकर तमिलनाडु सरकार के साथ केंद्र का राजनीतिक गतिरोध बढ़ता जा रहा है।केंद्र ने स्पष्ट कर दिया है कि वह स्कूल स्तर पर तीन-भाषा नीति को लागू करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सीएम स्टालिन का आरोप है कि हिंदी थोपने की कोशिश हो रही है।तमिलनाडु तीन भाषा नीति का विरोध कर रहा है और अब भी दो भाषा नीति पर अड़ा है। लेकिन वह मातृभाषा तमिल की रक्षा करेंगे। मुख्यमंत्री स्टालिन ने कहा कि वे किसी भी कीमत पर नई शिक्षा नीति लागू नहीं करेंगे। उनका राज्य एक और भाषा युद्ध के लिए तैयार है।

सीएम स्टालिन ने कहा कि 1965 से ही डीएमके ने मातृभाषा तमिल की रक्षा के लिए अनेक बलिदान दिए हैं। पार्टी का हिंदी से मातृभाषा तमिल की रक्षा करने का इतिहास रहा है। 1971 में कोयंबटूर में डीएमके की छात्र यूनिट ने हिंदी विरोधी सम्मेलन में कहा था कि वह बलिदान देने के लिए तैयार हैं। स्टालिन ने कहा कि मातृभाषा की रक्षा करना पार्टी के सदस्यों के खून में है। यह भावना उनके जीवन के अंत तक कम नहीं होगी।

*स्टालिन ने 1937-39 के बीच हुए हिंदी विरोधी आंदोलन को किया याद*
सवाल है कि तमिलनाडु के सीएम स्टालिन जिस ने तमिल की रक्षा के लिए किस बलिदान की बात कर रहे हैं। स्टालिन ने राज्य में 1937-39 के बीच हुए हिंदी विरोधी आंदोलन को याद किया और कहा कि ईवी रामासामी ‘पेरियार’ सहित अलग-अलग नेताओं ने आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था।तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध 1937 से ही है, जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रांत में हिंदी को लाने का समर्थन किया था पर द्रविड़ कषगम (डीके) ने इसका विरोध किया था।तब विरोध ने हिंसक झड़पों का स्वरूप ले लिया था और इसमें दो लोगों की मौत भी हुई थी।

*क्या है पूरा विवाद*
राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और तमिलनाडु सीएम एमके स्टालिन के बीच बीते कई दिनों से जुबानी जंग चल रही है। बीते दिनों राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तमिलनाडु में लागू करने से स्टालिन के इनकार पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नाराजगी जाहिर की थी। वहीं स्टालिन, केंद्र सरकार पर जबरन राज्य में इसे लागू करने का आरोप लगा रहे हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा था कि जब तक तमिलनाडु राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और तीन भाषा फार्मूले को स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक केंद्र सरकार की तरफ से उसे फंड नहीं दिया जाएगा।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक लचीले त्रि-भाषा फार्मूले की वकालत करता है। इसमें बहुभाषी शिक्षा पर जोर दिया जाता है, जबकि राज्यों को ढांचे के भीतर अपनी भाषा चुनने की अनुमति दी जाती है। हालांकि, तमिलनाडु सरकार ने लगातार इस नीति का विरोध किया है, यह तर्क देते हुए कि यह राज्य के लंबे समय से चले आ रहे दो-भाषा फार्मूले को कमजोर करता है। साथ ही भाषाई पहचान के लिए संभावित खतरा पैदा करता है।

राज्य की आपत्तियों के बावजूद, केंद्र सरकार पूरे देश में नई शिक्षा नीति को लागू करने पर अड़ी हुई है। केंद्र का कहना है कि नीति को शैक्षिक परिणामों को बढ़ाने और क्षेत्रीय भाषाई प्राथमिकताओं का उल्लंघन किए बिना बहुभाषी दक्षता को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
तमिलनाडु नई शिक्षा नीति के खिलाफ क्यों? सीएम स्टालिन याद कर रहे 6 दशक पुराना है विवाद
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को लेकर तमिलनाडु सरकार के साथ केंद्र का राजनीतिक गतिरोध बढ़ता जा रहा है।केंद्र ने स्पष्ट कर दिया है कि वह स्कूल स्तर पर तीन-भाषा नीति को लागू करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सीएम स्टालिन का आरोप है कि हिंदी थोपने की कोशिश हो रही है।तमिलनाडु तीन भाषा नीति का विरोध कर रहा है और अब भी दो भाषा नीति पर अड़ा है। लेकिन वह मातृभाषा तमिल की रक्षा करेंगे। मुख्यमंत्री स्टालिन ने कहा कि वे किसी भी कीमत पर नई शिक्षा नीति लागू नहीं करेंगे। उनका राज्य एक और भाषा युद्ध के लिए तैयार है।

सीएम स्टालिन ने कहा कि 1965 से ही डीएमके ने मातृभाषा तमिल की रक्षा के लिए अनेक बलिदान दिए हैं। पार्टी का हिंदी से मातृभाषा तमिल की रक्षा करने का इतिहास रहा है। 1971 में कोयंबटूर में डीएमके की छात्र यूनिट ने हिंदी विरोधी सम्मेलन में कहा था कि वह बलिदान देने के लिए तैयार हैं। स्टालिन ने कहा कि मातृभाषा की रक्षा करना पार्टी के सदस्यों के खून में है। यह भावना उनके जीवन के अंत तक कम नहीं होगी।

*स्टालिन ने 1937-39 के बीच हुए हिंदी विरोधी आंदोलन को किया याद*
सवाल है कि तमिलनाडु के सीएम स्टालिन जिस ने तमिल की रक्षा के लिए किस बलिदान की बात कर रहे हैं। स्टालिन ने राज्य में 1937-39 के बीच हुए हिंदी विरोधी आंदोलन को याद किया और कहा कि ईवी रामासामी ‘पेरियार’ सहित अलग-अलग नेताओं ने आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था।तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध 1937 से ही है, जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रांत में हिंदी को लाने का समर्थन किया था पर द्रविड़ कषगम (डीके) ने इसका विरोध किया था।तब विरोध ने हिंसक झड़पों का स्वरूप ले लिया था और इसमें दो लोगों की मौत भी हुई थी।

*क्या है पूरा विवाद*
राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और तमिलनाडु सीएम एमके स्टालिन के बीच बीते कई दिनों से जुबानी जंग चल रही है। बीते दिनों राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तमिलनाडु में लागू करने से स्टालिन के इनकार पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नाराजगी जाहिर की थी। वहीं स्टालिन, केंद्र सरकार पर जबरन राज्य में इसे लागू करने का आरोप लगा रहे हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा था कि जब तक तमिलनाडु राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और तीन भाषा फार्मूले को स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक केंद्र सरकार की तरफ से उसे फंड नहीं दिया जाएगा।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक लचीले त्रि-भाषा फार्मूले की वकालत करता है। इसमें बहुभाषी शिक्षा पर जोर दिया जाता है, जबकि राज्यों को ढांचे के भीतर अपनी भाषा चुनने की अनुमति दी जाती है। हालांकि, तमिलनाडु सरकार ने लगातार इस नीति का विरोध किया है, यह तर्क देते हुए कि यह राज्य के लंबे समय से चले आ रहे दो-भाषा फार्मूले को कमजोर करता है। साथ ही भाषाई पहचान के लिए संभावित खतरा पैदा करता है।

राज्य की आपत्तियों के बावजूद, केंद्र सरकार पूरे देश में नई शिक्षा नीति को लागू करने पर अड़ी हुई है। केंद्र का कहना है कि नीति को शैक्षिक परिणामों को बढ़ाने और क्षेत्रीय भाषाई प्राथमिकताओं का उल्लंघन किए बिना बहुभाषी दक्षता को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
मई में रूस जा सकते हैं पीएम मोदी, विक्ट्री डे परेड के बन सकते हैं मुख्य अतिथि
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर रूस की यात्रा पर जाने वाले हैं। रूसी मीडिया ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, पीएम मोदी मॉस्को के रेड स्कवायर पर आयोजित होने वाली 80वीं ग्रेट पैट्रियोटिक वॉर (महान देशभक्ति युद्ध) परेड में बतौर अतिथि शामिल होंगे। पीएम मोदी को रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने 9 मई को विक्ट्री डे परेड पर आमंत्रित किया है। इस परेड में भारतीय सेना का एक दल भी शामिल हो सकता है।

पीएम मोदी के अलावा कई अन्य देशों के राष्ट्र प्रमुख भी ग्रेट पैट्रियोटिक वॉर परेड में बतौर अतिथि शामिल हो सकते हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावारोव ने कहा है कि कई आमंत्रित देशों ने 9 मई को होने वाली परेड में आने की पुष्टि कर दी है। 9 मई का दिन रूस के लिए ऐतिहासिक दिन है। यही वह दिन है, जब द्वितीय विश्व में उसकी जीत हुई थी। यह सेकेंड वर्ल्ड वॉर में जीत की वर्षगांठ है। 1945 में दूसरे विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी पर दर्ज जीत के उपलक्ष्य में रूस हर साल 09 मई को अपना वार्षिक विजय दिवस यानी विक्‍ट्री डेट मनाता है।

*एक साल के भीतर तीसरा रूस दौरा*
अगर पीएम मोदी रूस जाते हैं तो यह 2025 की उनकी पहली आधिकारिक रूस यात्रा होगी। हालांकि, एक साल के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ये तीसरी यात्रा होगी। इससे पहले 2024 में दो बार रूस की यात्रा पर गए थे। जुलाई में पीएम मोदी का द्विपक्षीय दौरा था, जबकि अक्टूबर में ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पीएम मोदी रूस गए थे। वहीं, पर कजान शहर में उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हुई थी।

*ट्रंप से मिलने के बाद पुतिन से मिलेंगे मोदी*
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 फरवरी को अपने अमेरिकी दौरे के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की थी और भारत-अमेरिकी संबंधों के अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने पर भी दोनों नेताओं के बीच चर्चा हुई थी. ट्रंप और पुतिन की संभावित मुलाकात को लेकर भी तैयारियां चल रही है। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी के विक्ट्री डे परेड में शामिल होने की खबर से वैश्विक राजनीति में काफी हलचल देखने को मिल रही है. दिलचस्प बात यह है कि पहले राष्ट्रपति ट्रंप के भी 9 मई के परेड में शामिल होने की चर्चा थी लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इन अटकलों को खारिज कर दिया

यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका और रूस के बीच बातचीत चल रही है। प्रधानमंत्री मोदी पहले भी रूस और यूक्रेन दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलकर शांति की अपील कर चुके हैं। यह देखना होगा कि इस यात्रा के दौरान यूक्रेन युद्ध पर क्या चर्चा होती है।
ट्रंप बेच रहे “नागरिकता”, अमेरिका में बसने का दिया शानदार ऑफर, 50 लाख डॉलर में मिलेगी 'गोल्ड कार्ड'
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अमेरिका की सत्ता में वापसी के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले ही आदेश के तहत देश में अवैध प्रवासियों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। ट्रंप ने इस काम के लिए अमेरिकी सेना को लगाया और सैन्य विमानों का इस्तेमाल किया गया। पड़ोसी मेक्सिको से लेकर, अर्जेंटीना, भारत समेत कई देशों के प्रवासियों को जहाजों में भरकर भेजा गया। ये वो लोग हैं, जिन्होंने अमेरिका में रहने का सपना देखा। वहीं दूसरी तरफ ट्रंप ने अमेरिका मे बसने का सपना देखने वालों के लिए बड़ा ऑफर पेश किया है। ये ऑफर अमीरों के लिए है। जी हां, अपर आपके पास पैसे हैं तो आप आसानी से अमेरिका की नागरिकता खरीद सकते हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को अमीर आप्रवासियों के लिए गोल्ड कार्ड पेश किया है, जिसे 50 लाख डॉलर में खरीदा जा सकता है। भारतीय करेंसी में करीब 44 करोड़ रुपए अमेरिका में निवेश करवाएंगे। ट्रंप ने इसे अमेरिकी नागरिकता का रास्ता बताया। ट्रंप ने इसमें शामिल होने वाले लोगों के बारे में बताते हुए कहा, वे अमीर होंगे और सफल होंगे। वे बहुत सारा पैसा खर्च करेंगे और बहुत सारे टैक्स का भुगतान करेंगे और बहुत से लोगों को रोजगार देंगे। हमें लगता है कि यह बहुत सफल होने वाला है।

*वीजा कार्ड ईबी-5 की जगह लेगा 'ट्रंप गोल्ड कार्ड'*
ट्रंप ने गोल्ड कार्ड को मौजूदा आप्रवासी निवेशक वीजा कार्यक्रम ईबी-5 के विकल्प के लिए रूप में प्रस्तावित किया है और कहा कि भविष्य में 10 लाख गोल्ड कार्ड बेचे जाएंगे।ट्रंप ने कहा कि वे ईबी-5 आप्रवासी निवेशक वीजा कार्यक्रम को गोल्ड कार्ड के साथ बदल देंगे जो बड़ी रकम वाले विदेशी निवेशकों को अमेरिकी नौकरियों का सृजन या संरक्षण करने के लिए स्थायी निवासी बनने की अनुमति देता है। उन्होंने दावा किया कि इस पहल से राष्ट्रीय कर्ज का भुगतान जल्द हो सकता है।

*ईबी-5 वीजा क्या है?*
• अमेरिकी नागरिकता पाने के लिए फिलहाल EB-5 वीजा आसान विकल्प है
• इसके लिए 1 मिलियन डॉलर यानी कि 8.75 करोड़ रुपए चुकाने होते हैं
• इस वीजा को लेकर अमेरिका का स्थायी नागरिक बना जा सकता है
• इससे अमेरिकी बिजनेस में निवेश करने वाले विदेशियों को "ग्रीन कार्ड" मिलता है है
• EB-5 वीजा की शुरुआत अमेरिका ने साल 1990 में की थी
• इस वीजा प्रोग्राम का मकसद विदेशी निवेशकों को प्रोत्साहित करना था

*ईबी-5 को क्यों बदल रहे ट्रंप?*
ईबी-5 वीजा कार्यक्रम, विदेशियों को ग्रीन कार्ड प्राप्त करने के लिए अमेरिकी प्रोजेक्ट में कम से कम 10.5 लाख डॉलर या आर्थिक रूप से संकटग्रस्त क्षेत्रों में 800,000 डॉलर निवेश करने अनुमति देता है। हालांकि, इस कार्यक्रम को दुरुपयोग के लिए आलोचना का भी सामना करना पड़ा है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान, ट्रम्प ने न्यूनतम निवेश को बढ़ाकर 18 लाख डॉलर करने का प्रयास किया, लेकिन 2021 में एक न्यायाधीश ने इस कदम को पलट दिया। बाइडन प्रशासन ने बाद में 2022 में कार्यक्रम को नवीनीकृत करते समय वर्तमान निवेश स्तर 10,50,000/800,000 डॉलर निर्धारित किया।
साल में दो बार होंगी सीबीएसई 10वीं बोर्ड की परीक्षाएं, जानें नए नियम में छात्रों के क्या-क्या
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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने कक्षा 10वीं के छात्रों के लिए अपनी परीक्षा प्रणाली में बड़ा सुधार किया है। बोर्ड के ताजा निर्णय के अनुसार, 2026 से सीबीएसई कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षाएं साल में दो बार आयोजित करेगा, जिससे छात्रों को अपना प्रदर्शन सुधारने का एक अतिरिक्त अवसर मिलेगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में एक उच्च स्तरीय मीटिंग में सीबीएसई को दो बार बोर्ड एग्जाम की स्कीम तैयार करने को कहा था। अब सीबीएसई ने मंगलवार को ड्राफ्ट पॉलिसी जारी कर दी है, जिस पर 9 मार्च तक सुझाव मांगे गए हैं।जनता से राय लेने के बाद जल्द ही इसे लागू किया जाएगा।

सीबीएसई की ओर से जारी ड्राफ्ट के अनुसार छात्र एक बार या दोनों बार परीक्षा देने का विकल्प चुन सकते हैं। 10वीं बोर्ड परीक्षा का पहला सेशन 17 फरवरी से 6 मार्च तक और दूसरा 5 मई से 20 मई तक आयोजित किया जाएगा। साल में दो बार बोर्ड परीक्षा होने से स्टूडेंट्स को दो पेपरों के बीच केवल एक या दो दिन का समय मिलेगा, जो उनके विषय विकल्प पर निर्भर करेगा, जो वर्तमान अंतराल से काफी कम है। अभी दो पेपर के बीच गैप पांच या 10 दिनों तक भी हो जाता है। पहली परीक्षा के नतीजे 20 अप्रैल और दूसरी के 30 जून तक घोषित होने की संभावना है। जो छात्र दोनों परीक्षाओं में शामिल होना चुनते हैं, उन्हें अंतिम मार्कशीट पर अपना सर्वश्रेष्ठ स्कोर मिलेगा।

दो एग्जाम का मतलब यह नहीं है कि सेमेस्टर जैसे आधे-आधे सिलेबस का दो बार एग्जाम लिया जाएगा। तय किया गया है कि दोनों ही बार पूरे सिलेबस और पूरे टेक्स्टबुक के आधार पर एग्जाम लिया जाएगा। आप बस यह समझिए कि आपको दो बार एग्जाम में बैठने का मौका मिल रहा है।

*रजिस्ट्रेशन में बतानें होंगे ऑपशन*
2026 में 10वीं की बोर्ड परीक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन इस साल सितंबर तक पूरा हो जाएगा। इसी वक्त छात्रों को यह बताना होगा कि वे दोनों परीक्षा में शामिल होना चाहते हैं या सिर्फ पहली या दूसरी परीक्षा में। रजिस्ट्रेशन के समय ही आपको ऑप्शनल सब्जेक्ट बताने होंगे। इसके बाद इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है। साथ ही रजिस्ट्रेशन के बाद किसी नए बच्चे को पेपर में बैठने की इजाजत भी नहीं मिलेगी। अप्रैल में पहली परीक्षा के रिजल्ट आ जाएंगे। इसके बाद केवल वही छात्र दूसरी बोर्ड परीक्षा में बैठ पाएंगे जिन्होंने रजिस्ट्रेशन के समय ऐसा विकल्प चुना था। यहां भी उनके पास विकल्प होगा। वे जिन पेपर में चाहे दोबारा एग्जाम देंगे और जिसमें चाहेंगे नहीं देंगे।

*स्कोर बढ़ाने का होगा मौका*
पहली परीक्षा के नतीजे जारी होने के बाद अगर कोई छात्र अपने सामाजिक विज्ञान, अंग्रेजी और गणित में प्राप्त नंबरों से संतुष्ट हैं, तो वह दूसरी परीक्षा के लिए इन पेपरों को छोड़ सकते हैं और केवल शेष विषयों के लिए बैठ सकते हैं। अगर संतुष्ट नहीं है, तो वह दूसरी परीक्षा में इन पेपर को दे सकते हैं या सभी पेपर के एग्जाम में शामिल हो सकते हैं। अंतिम स्कोर कार्ड में सर्वश्रेष्ठ स्कोर बताए जाएंगे। दूसरी बार परीक्षा के लिए आवेदन करते समय छात्र को इन बातों का जिक्र करना होगा।

*प्रैक्टिकल और इंटरनल असेसमेंट एक ही बार होंगे*
सीबीएसई दसवीं में छात्र लिखित परीक्षा तो दो बार दे सकेंगे, लेकिन प्रैक्टिकल व इंटरनल असेसमेंट एक ही बार होगा। अलग-अलग विषयों में होने वाले प्रैक्टिकल व इंटरनल असेसमेंट के जो नंबर मिल जाएंगे, उसे लिखित परीक्षा के बेस्ट स्कोर में जोड़कर रिजल्ट जारी किया जाएगा।
केजरीवाल के राज्यसभा जाने का रास्ता साफ! सांसद संजीव अरोड़ा को बनाया गया विधानसभा उपचुनाव का उम्मीदवार
#ludhiana_west_by_election_aap_made_sanjeev_arora_candidate


आम आदमी पार्टी की दिल्ली दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार हुई है। आप के साथ राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की भी करारी हार हुई। अब मीडिया के गलियारों में केजरीवाल के सियासी सफर पर अटकलें जारी है। अरविंद केजरीवाल के राज्यसभा जानें की अटकलें लगाई जा रही है। इस बीच आप ने संजीव अरोड़ा को लुधियाना वेस्ट का प्रत्याशी बनाया है। अब कहा जा रहा है कि संजीव अरोड़ा की खाली सीट से केजरीवाल राज्यसभा जाएंगे। हालांकि आम आदमी पार्टी ने इसका खंडन किया है।

संजीव अरोड़ा साल 2022 में राज्यसभा सांसद बने थे। अभी उनका करीब तीन साल का कार्यकाल बाकी है। इससे पहले दिल्ली की हार से उबरने के लिए आम आदमी पार्टी ने पंजाब में बड़ा दांव चला है। पार्टी ने लुधियाना वेस्ट विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में अपने राज्यसभा सांसद संजीव अरोड़ा को टिकट दिया है।

हालांकि अभी तक निर्वाचन आयोग ने चुनाव का ऐलान नहीं किया है, लेकिन पहले ही आम आदमी पार्टी ने अपने प्रत्याशी का ऐलान कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में आम आदमी पार्टी के इस ऐलान के कई मतलब निकाले जा रहे हैंष इस सीट पर अब तक किसी अन्य राजनीतिक दल ने अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है।

संजीव अरोड़ा के नाम ऐलान से पहले ही ऐसा कहा जा रहा था कि आप संयोजक अरविंद केजरीवाल अरोड़ा की सीट से राज्यसभा जा सकते हैं। हालांकि पार्टी ने इन अटकलों को खारिज किया है। आप की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि केजरीवाल राज्यसभा नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जहां तक केजरीवाल का मसला है तो मीडिया में यह भी कहा गया कि वह पंजाब के सीएम बनेंगे। अब मीडिया ही कह रहा है कि वह राज्यसभा का चुनाव लड़ेंगे। ये दोनों गलत हैं। अरविंद केजरीवाल आप के राष्ट्रीय संयोजक हैं। मैं जानती हूं कि उनकी हर जगह मांग है लेकिन वह किसी एक सीट तक सीमित नहीं हैं।

*केजरीवाल के लिए राह हुई आसान*
बता दें कि सुनील अरोड़ा द्वारा विधायक का चुनाव लड़े जाने पर उनकी राज्यसभा वाली सीट खाली हो जाएगी। उसके बाद बड़े आराम से अरविंद केजरीवाल को उस सीट पर राज्यसभा का उम्मीदवार बना दिया जाएगा। यह अपने आप में एक पूरी तरह से बिना खतरे वाला सौदा होगा। क्योंकि पंजाब में आम आदमी पार्टी का बहुमत है ऐसे में अरविंद केजरीवाल बड़े आराम से राज्यसभा का चुनाव जीत कर संसद पहुंच जाएंगे।

*कांग्रेस का दावा होगा सच!*
पंजाब कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने मंगलवार को आरोप लगाया कि केजरीवाल पंजाब के रास्ते राज्यसभा में जाना चाहते हैं। बाजवा ने दावा किया, केजरीवाल पंजाब के माध्यम से सत्ता में प्रवेश करना चाहते हैं, और कुछ राज्यसभा सदस्यों को उनके लिए त्याग करना होगा।
यूएनएचआरसी से विदेश मंत्री एस जयशंकर की दो टूक, बोले-आतंकवाद को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा भारत
#s_jaishankar_un_india_will_advocate_zero_tolerance_for_terrorism


विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के 58वें सत्र को अपने संबोधन में मानवाधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए देश की प्रतिबद्धता दोहराई। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 58वें सत्र में एक वर्चुअल संबोधन किया। इस दौरान उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत के रूख को साफ किया। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा ही आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की वकालत करेगा।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, दुनिया को एक नई बहुपक्षीय प्रणाली की स्पष्ट और तत्काल जरूरत है जो समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं को दर्शाती हो, क्योंकि पिछले कुछ सालों में मौजूदा संरचनाओं की गंभीर रूप से कमी सामने आई है। विदेश मंत्री ने कहा कि मौजूदा चुनौतियों के बीच यह परिस्थितियां और अधिक विकृत, अनिश्चित और अस्थिर होती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें और तैयारी की जरूरत है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए फिट होना जरूरी है। अब हमें बहुआयामी प्रणाली की जरूरत है जो समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप हों।

एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा व्यवस्था पर इशारा करते हुए कहा कि जब विश्व को इनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी तब यह खुद अभावग्रस्त व लाचार थे। जयशंकर ने कहा कि भारत हमेशा से वैश्विक प्रोन्नति और मानवाधिकार की रक्षा में अहम भूमिका निभाता रहा है। हमने हमेशा ही वित्तीय जिम्मेदारी के सिद्धांतों, पारदर्शिता और निरंतरता का पालन किया है। इस प्रतिबद्धता के साथ भारत ने हमेशा ही विभिन्न देशों के साथ विकास की साझेदारी निभाई है। लेकिन इसी के साथ भारत ने बिना किसी समझौते के आतंकवाद का मुकाबला किया है।

उन्होंने कहा, हम आतंकवाद का मुकाबला करने में दृढ़ और अडिग रहे हैं। भारत हमेशा आतंकवाद के लिए कतई बर्दाश्त नहीं करने की नीति की वकालत करेगा और इसे सामान्य बनाने के किसी भी प्रयास का विरोध करेगा। हम वसुधैव कुटुम्बकम यानी दुनिया को एक परिवार मानने की बात केवल बोलते नहीं हैं, बल्कि इसके अनुसार जीते हैं और आज, पहले से कहीं अधिक, इस दृष्टिकोण की तत्काल जरूरत है।
अपना “खजाना” अमेरिका को सौंपने को तैयार हुए जेलेंस्की, डील के लिए शुक्रवार को पहुंच रहे व्हाइट हाउस

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यूक्रेन और अमेरिका जल्द ही एक बड़ा समझौता कर सकते हैं। इस समझौते में यूक्रेन अपने प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले राजस्व में हिस्सा अमेरिका को देगा। यानी यूक्रेन रेयर अर्थ मटेरियल (दुर्लभ खनिज) अमेरिका को देने पर राजी हो गया है। यूक्रेन और अमेरिका दोनों देशों के अधिकारियों ने मंगलवार को इसकी घोषणा की। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि जेलेंस्की इस डील पर साइन करने के लिए शुक्रवार को अमेरिका का दौरा कर सकते हैं।

*जानें क्या है डील*
राष्ट्रपति चुनाव से पहले पिछले सितंबर में जेलेंस्की ने ट्रंप के सामने एक प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य ट्रंप को अमेरिका द्वारा सुरक्षा गारंटी जारी रखने के लिए एक ठोस कारण प्रदान करना था। हालांकि पिछले हफ्ते अमेरिकियों द्वारा प्रस्तुत किए गए ड्राफ्ट डील में कथित तौर पर यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व का 50 प्रति शत मांगा गया था, बदले में सुरक्षा प्रतिबद्धताओं की पेशकश नहीं की गई थी। ट्रंप प्रशासन ने उस अनुरोध को पिछले अमेरिकी सैन्य और वित्तीय सहायता के लिए मुआवजा बताया ।

*जेलेंस्की पर भड़के थे ट्रंप*
जेलेंस्की ने अधिकारियों से इस समझौते पर हस्ताक्षर न करने को कहा था, जिसके बाद अमेरिकी नाराज हो गया था। ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर जेलेंस्की को तानाशाह कह दिया था, जो बिना चुनाव को यूक्रेन की सत्ता में बने हुए हैं। उन्होंने यूक्रेन पर ही युद्ध को शुरू करने का आरोप लगाया था।

*यूक्रेन के पास दुनिया का 5% कच्चा माल*
यूक्रेन के पास रेयर अर्थ मटेरियल के दुनिया के कुल कच्चे माल का लगभग 5% है। इसमें ग्रेफाइट का लगभग 19 मिलियन टन भंडार शामिल हैं। इसके अलावा यूरोप के कुल लीथियम भंडार का 33% हिस्सा यूक्रेन के पास है। जंग की शुरुआत से पहले ग्लोबल टाइटेनियम उत्पादन में 7% हिस्सा यूक्रेन का था। यूक्रेन के पास रेयर अर्थ मटेरियल के कई अहम भंडार हैं। हालांकि, जंग के बाद इनमें से कई रूस के कब्जे में पहुंच गए हैं। यूक्रेनी मंत्री यूलिया स्विरीडेन्को के मुताबिक रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी हिस्से में 350 अरब डॉलर के संसाधन मौजूद हैं।