ईरान-इस्राइल युद्ध : 12 साल बाद गैस गोदामों पर 500 मीटर तक लगी लंबी कतार

*व्यावसायिक सिलिंडरों की आपूर्ति बंद, घरेलू की बुकिंग तीन गुना बढ़ी, आनलाइन बुकिंग का सर्वर फेल*

नितेश श्रीवास्तव

भदोही। ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच कालीन नगरी में एलपीजी घरेलू गैस सिलिंडर की मांग तीन गुना बढ़ गई है। व्यावसायिक सिलिंडरों की आपूर्ति बंद होने के बाद होटल, ढाबा और मिठाई दुकानदार अब घरेलू सिलेंडर का इस्तेमाल कर रहे हैं। 12 साल बाद एक बार फिर एजेंसियों के गोदामों पर 500 मीटर लंबी कतार देखने को मिली। ऑनलाइन बुकिंग का सर्वर फेल होने के कारण उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ गई है। एजेंसी संचालकों के मोबाइल नॉट रिचएबल बता रहा है। जिले में भारत गैस, इंडियन ऑयल और एचपी की 40 एजेंसियां हैं। इससे 2.07 लाख उज्ज्वला और तीन लाख सामान्य उपभोक्ता जुड़े हैं। युद्ध के कारण विश्व में गैस, तेल की आपूर्ति प्रभावित होने का अंदेशा है। सोशल मीडिया पर अफवाह उड़ते ही आपूर्ति कम होने के पहले ज्ञानपुर नगर में स्थित एक एजेंसी पर ग्राहकों की लंबी कतार लग गई। कुछ लोगों को ही सिलिंडर मिला। कुछ लोग बिना लिए ही वापस लौट गए। कुछ इसी तरह गोपीगंज, अभोली, भदोही स्थित एजेंसियों पर दिखा। एजेंसी संचालकों ने बताया कि पहले एक दिन में 400 से 500 सिलिंडरों की मांग होती थी। बीते चार-पांच दिनों से मांग एक हजार तक पहुंच गई है। मांग में बढ़ोतरी के सापेक्ष आपूर्ति 50 फीसदी तक ही हो रही है। गोपीगंज नगर में बेबी बानो, करीम, शिवशंकर चौबे, रवि गुप्ता ने बताया कि करीब एक सप्ताह के इंतजार के बाद भी गैस सिलिंडर नहीं मिल रहा है।


सहालग, रमजान के कारण रिफिलिंग की बढ़ी मांग
इन दिनों सहालग के साथ रमजान भी चल रहा है। इस कारण भी घरेलू गैस सिलिंडर की मांग बढ़ी है। शादी के आयोजनों में व्यावसायिक सिलिंडर की आपूर्ति बंद होने से घरेलू सिलिंडर का ज्यादा प्रयोग हो रहा है। इस कारण एजेंसियों और गोदामों पर भीड़ बढ़ गई है। एलपीजी गैस डिस्ट्रीब्यूशन एसोसिएशन के अध्यक्ष अरुण मिश्रा ने बताया कि लोग पैनिक होकर बुकिंग करा रहे हैं। इससे एजेंसियो पर भीड़ बढ़ी है। पहले हर गाड़ी में 10 से 12 व्यावसायिक सिलिंडर आते थे, अब नहीं आ रहे हैं।
होटल कारोबारियों की बात
सरकार को जल्द से जल्द व्यावसायिक सिलिंडरो की आपूर्ति शुरू करानी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। रेस्टोरेंट और होटल बंद हो सकते हैं। वैकल्पिक व्यवस्था से काम चलाया जा रहा है। दो से तीन दिन बाद संकट और बढ़ जाएगा। - संजय उमर वैश्य, रेस्टोरेंट संचालक

व्यावसायिक सिलिंडर नहीं मिल रहा है। एजेंसी संचालकों ने मोबाइल बंद कर दिए हैं। अधिक कीमत देने के बाद भी नहीं मिल रहा है। जो सिलिंडर लगा है उसके खत्म होने के बाद होटल बंद करने की नौबत आ जाएगी।
- विजय कुमार चौरसिया, होटल संचालक
जिनके यहां शादी पड़ी है उनके माथे पर बल पड़ गया है। सिलिंडर जिसके पास है वह काला बाजारी कर रहा है। एक-दो दिन में स्थिति बिगड़ने की संभावना है। - आरिफ अंसारी, मैरिज लान संचालक
स्कूलों में लकड़ी से एमडीएम बनाने पर रोक है। बुधवार को विद्यालय का सिलेंडर खत्म हो गया। एजेंसी पर नहीं मिलने के कारण घर से सिलिंडर लाकर एमडीएम बनवाया गया। आपूर्ति नहीं सुधरी तो विद्यालयों में एमडीएम बनाने में दिक्कत होगी। - सुधीर सिंह, प्रधानाध्यापक, प्राथमिक विद्यालय पड़ाव।

जिले में फिलहाल सिलिंडर आपूर्ति में कोई संकट नहीं है। लोग पैनिक होकर बुकिंग कर रहे हैं। पांच मार्च तक की बुकिंग वाले ग्राहकों को सिलिंडर मिल चुका है। व्यावसायिक सिलिंडर की आपूर्ति शासन से बंद कर दी गई है। कई एजेंसियों पर नजर रखी जा रही है ताकि कालाबाजारी न हो सके। - सुनील कुमार, डीएसओ।

40 एजेंसी जनपद में करती है सिलिंडर वितरण
5.10 लाख घरेलू उपभोक्ता हैं जिले में
15 हजार व्यावसायिक सिलिंडर के उपभोक्ता हैं
भारतीय जहाजों के लिए खुला होर्मुज स्ट्रेट, दो टैंकर सुरक्षित निकले, रंग लाई विदेश मंत्री जयशंकर की कूटनीति

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ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच भारत के लिए अच्छी खबर आई है। ईरान ने भारत के साथ कूटनीतिक बातचीत के बाद भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को हॉर्मुज से गुजरने की अनुमति दे दी है। इसके बाद पुष्पक और परिमलनाम के भारतीय टैंकर सुरक्षित रूप से इस हॉर्मुज से गुजर गए।

भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता

पश्चिम एशिया में भड़के युद्ध के बीच पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई लाइन खतरे में है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पश्चिमी देशों के विदेशी जहाजों के लिए लगभग 'नो-गो जोन' बन चुका है। ईरान-इजराइल-अमेरिका जंग के बीच भारत को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। ईरान ने भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को रणनीतिक रूप से अहम 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दे दी है।

एस जयशंकर और अराघची की बातचीत से निकला हल

यह घटनाक्रम भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास आराघची के बीच हुई उच्च-स्तरीय वार्ता के बाद सामने आया है। इस मसले पर विदेश मंत्री एस जयशंकर की उनके ईरानी समकक्ष के बीच युद्ध छिड़ने के बाद कम से कम तीन बार बात हो चुकी है। जयशंकर ने मंगलवार को भी पश्चिम एशिया में जारी संकट को लेकर अब्बास अराघची से बात की।

भारत के लिए ये क्यों खास है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑयल इंपोर्टर है और ज्यादातर क्रूड मिडिल ईस्ट से आता है, जो होर्मुज से गुजरता है। युद्ध शुरू होने (28 फरवरी) से पहले ही कई भारतीय जहाज फंस गए थे। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग के मुताबिक, 28 से 37 भारतीय फ्लैग वाले जहाज वहां थे, जिनमें 1000 से ज्यादा भारतीय सीफेयरर्स थे। ईरान ने अमेरिका, इजरायल और यूरोप के जहाजों पर सख्ती बरती है, लेकिन भारत जैसे गैर-पश्चिमी देशों को छूट दी है। ऐसे में इसे काफी अहम माना जा रहा है।

क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?

होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच लगभग 55 किलोमीटर चौड़ा समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है।

-सामान्य परिस्थितियों में यहां से प्रतिदिन करीब 1.3 करोड़ बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 31 प्रतिशत है।

-इस मार्ग में बाधा आने से इराक, कुवैत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के निर्यात पर सीधा असर पड़ता है।

-दुनिया के तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का भी बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।

-इसलिए यहां तनाव बढ़ने पर वैश्विक बाजार, सप्लाई चेन और ऊर्जा कीमतों पर तुरंत असर देखने को मिलता है।

विज्ञान शिक्षक के रूप में चयनित होने पर धर्मेंद्र यादव का ग्रामवासियों ने किया सम्मान
जौनपुर। बदलापुर तहसील अंतर्गत स्थित शाहपुर सानी गांव निवासी धर्मेंद्र यादव पुत्र बीपत यादव का भदोही जिले के जूनियर हाई स्कूल में विज्ञान शिक्षक के रूप में चयनित होने पर आज ग्रामवासियों द्वारा उनका भव्य सम्मान किया गया। अत्यंत विनम्र, शालीन और सहयोगी प्रवृत्ति के धर्मेंद्र यादव का विज्ञान शिक्षक के रूप में चयन होने पर लोगों ने खुशी जाहिर की है। आज सम्मान समारोह में ग्राम प्रधान चंद्रशेखर यादव, वरिष्ठ पत्रकार शिवपूजन पांडे, पूर्व प्रधानाचार्य रामबाबू यादव, लालता यादव, हृदय नारायण सिंह, ब्रिजलाल यादव, जगपत यादव, शिवनारायण यादव, अनिल कुमार यादव, शैलेंद्र यादव, मुकेश यादव, नंदलाल यादव, आलोक यादव, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य कमल कुमार यादव, विकास यादव, विवेक यादव समेत अनेक लोग उपस्थित रहे। चंद्रशेखर यादव ने कहा कि यह पूरे गांव ही नहीं अपितु पूरे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है। उन्होंने धर्मेंद्र यादव के साथ-साथ उनके पिता बीपत यादव को भी माला पहनाकर बधाई दी।
फारूक अब्दुल्ला पर किसने की फायरिंग? बाल-बाल बची जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम की जान

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जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित होटल रॉयल पार्क में आयोजित एक शादी समारोह के दौरान उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब कार्यक्रम में अचानक फायरिंग की घटना हो गई। हमला नेशनल कॉन्फ्रेंस के संरक्षक फारूक अब्दुल्ला पर किया गया था। इस समारोह में फारूक अब्दुल्ला के अलावा जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और पार्टी के कई अन्य नेता मौजूद थे।

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फारूक अब्दुल्ला के पीछे से गोली चलाई

पुलिस के मुताबिक हमलावर ने फारूक अब्दुल्ला के पीछे से पिस्तौल तानकर गोली चला दी। गनीमत रही कि गोली उन्हें नहीं लगी। फारूक अब्दुल्ला, सुरिंदर चौधरी और दूसरे बड़े नेता नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ता सुरजीत सिंह के बेटे की शादी में शामिल हुए थे। हमलावर सुरजीत सिंह का कजिन है। वह बिजनेसमैन है और उसकी पुराने शहर में कुछ दुकानें हैं।

70 साल के हमलावर ने सिर पर तानी रिवॉल्वर

घटना का सीसीटीवी भी सामने आया है। इसमें देखा जा सकता है कि 70 साल के हमलावर कमल सिंह जामवाल ने पीछे से आकर फारूक के सिर पर रिवॉल्वर तान दी। सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत हमलावर का हाथ हटाया जिससे फायर हवा में हो गया। आरोपी को पकड़ लिया गया है और हमले के कारणों का पता लगाया जा रहा है।

कुछ ही सेकंड में सुरक्षाकर्मियों ने दबोचा आरोपी

फारूक अब्दुल्ला के ऊपर फायरिंग होते ही सुरक्षा टीम तुरंत हरकत में आ गई। जम्मू-कश्मीर पुलिस की सुरक्षा टीम ने हमलावर को मौके पर ही काबू कर लिया। अधिकारियों के मुताबिक सुरक्षा कर्मियों ने सबसे पहले आरोपी के हाथ से पिस्तौल छीनी, उसके बाद उसे जमीन पर लिटाकर काबू में कर लिया। साथ ही पिस्तौल से गोलियां भी निकाल ली गईं, ताकि वह दोबारा हमला न कर सके। इसके बाद फारूक अब्दुल्ला को तुरंत सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया।

पिता फारूक पर फायरिंग की कोशिश से भड़के सीएम उमर

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और फारूक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला का भी बड़ा बयान आया है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने एक्स पर लिखा कि एक आदमी लोडेड पिस्टल लेकर पॉइंट-ब्लैंक रेंज में आ गया और गोली चला दी। अल्लाह का शुक्र है कि मेरे पिता बाल-बाल बचे। सवाल उठता है कि कोई Z+ NSG प्रोटेक्टेड पूर्व सीएम के इतने करीब कैसे पहुंच गया।

फतेहपुर में बंद कमरे में मां-बेटे और देवर की रहस्यमयी मौत, सुसाइड नोट मिलने से कर्ज का एंगल आया सामने
फतेहपुर। फतेहपुर जिले के Lucknow Bypass Road स्थित एक मकान में मां-बेटे और देवर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से इलाके में सनसनी फैल गई। घटना Sadar Kotwali क्षेत्र की है, जहां सुशील श्रीवास्तव के मकान में रहने वाले परिवार के तीन सदस्यों के शव बंद कमरे में मिले। पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।जानकारी के मुताबिक कमरे में मां और बेटे के शव खून से लथपथ हालत में मिले, जबकि कुछ दूरी पर महिला का देवर गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़ा था। उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी भी मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही इलाके में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुट गई।

व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख का कर्ज हो गया था

बताया जा रहा है कि परिवार मूल रूप से मुराइनटोला का रहने वाला था और कुछ साल पहले ही लखनऊ बाईपास क्षेत्र में मकान बनाकर रहने लगा था। परिवार का इकलौता बेटा अमर श्रीवास्तव सरल स्वभाव का था और कई अखबारों की एजेंसी का काम कर चुका था। हालांकि व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख रुपये का कर्ज हो गया था। कर्ज के दबाव में उसका घर भी बिक गया था और लंबे समय तक परिवार कर्जदारों से बचने के लिए छिपकर रह रहा था।

पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला

परिजनों के अनुसार अमर हाल के दिनों में लोगों से रुपये उधार मांग रहा था। उसने घटना से एक दिन पहले अपने एक दोस्त से 10 हजार रुपये उधार लिए थे और होली के आसपास अपने बहनोई से भी 10 हजार रुपये लिए थे। अमर के बहनोई ने तीनों की मौत को आत्महत्या मानने से इनकार करते हुए हत्या की आशंका जताई है।पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें तीन लोगों के नाम का जिक्र करते हुए आर्थिक तंगी और कर्ज से परेशान होने की बात लिखी गई है। सुसाइड नोट के आधार पर पुलिस उन लोगों की तलाश में जुट गई है। एसओजी और इंटेलिजेंस विंग की टीम भी मामले की जांच कर रही है।मौके से चाय के झूठे गिलास और ब्लेड का पैकेट भी बरामद हुआ है।

तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया

आशंका जताई जा रही है कि तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया और बाद में तड़पने पर ब्लेड से खुद पर वार किया। हालांकि यह भी संभावना जताई जा रही है कि तीनों के बीच आपसी विवाद के बाद हमला हुआ हो, जिसमें देवर ने मां-बेटे की हत्या कर खुद की जान ले ली हो।फिलहाल पुलिस दो पहलुओं—हत्या और सामूहिक आत्महत्या—दोनों को ध्यान में रखकर जांच कर रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि मौत जहर से हुई या ब्लेड से हुए हमले से। सुसाइड नोट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
प्रताप सिंह बने मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष, क्षेत्र में खुशी की लहर
मेरठ/बहसूमा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति पर जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से मवाना पश्चिम मंडल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। थाना क्षेत्र के गांव मीरपुर निवासी प्रताप सिंह पुत्र टिड्डा सिंह को मवाना पश्चिम का मंडल अध्यक्ष बनाया गया है।

प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने की खबर से क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। क्षेत्र के लोगों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें फोन कर बधाई दी और उज्ज्वल कार्यकाल की कामना की।

बताया गया कि सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम के आह्वान पर तथा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति एवं जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में हस्तिनापुर क्षेत्रीय अध्यक्ष पश्चिम सत्येंद्र सिसोदिया ने प्रताप सिंह को मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने से पार्टी को मजबूती मिलेगी और वह भाजपा की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने का काम करेंगे।

प्रताप सिंह के मनोनयन पर भारतीय गौ सेवा संघ के मेरठ जिला उपाध्यक्ष परविंदर उर्फ जैन साहब ने भी उन्हें बधाई दी। इसके अलावा डॉ. अनिल कुमार, जोगिंदर चौधरी, जोगिंदर, नीरज कुमार, मनोज कुमार, अजय कुमार सहित कई लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
गढ़वा: बंडा पहाड़ पर गूंजा 'हर-हर महादेव', नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन संपन्न

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गढ़वा :- गढ़वा के ग्राम जोबरईया के बंडा पहाड़ स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन भगवान शंकर के रुद्राभिषेक से प्रारंभ हुआ। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार संध्या काल में पावन श्री राम कथा में अयोध्या धाम से पधारे हुए परम पूज्य आचार्य पंकज शांडिल्य जी महाराज ने कथा के तृतीय दिवस में भगवान के पावन जन्म की कथा श्रवण कराया। कथा व्यास जी ने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार पापाचार बढ़ता है, दुष्ट आताताइयो का आतंक बढ़ता है प्रभु विभिन्न स्वरूपों में आकर के राक्षसों का विनाश कर धरती के भार को हल्का करते हैं। परमात्मा निराकार है लेकिन भक्त के भावना के अनुसार समय-समय पर सगुण साकार रूप रखकर इस धरती पर आते हैं। भगवान को धरती पर आने के कई कारण है मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है विप्र,धेनु,सुर,संत हित लीन्ह मनुज अवतार l कार्यक्रम में संगीतमय प्रस्तुतिकरण हेतु साथ दे रहे संगीतकारों ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं का मन मोह लिया। कथा के अंत में वृंदावन से पधारे हुए कलाकारों के

द्वारा सुंदर झांकियां की प्रस्तुति हुई। जिसमें राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के साथ बाल शाखाओं की टोली की प्रस्तुतीकरण ने उपस्थित दर्शकों का मनमोहन लिया। महायज्ञ के यज्ञाधीश आचार्य श्री श्री आशीष वैद्य जी महाराज जी ने कथा व्यास के प्रस्तुतीकरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि व्यास जी एक उद्भट्ट विद्वान है। कथा करने की इनकी गायन शैली काफी रोचक और झांकियां काफी मनोरम है। प्रधान संयोजक श्री राकेश पाल जी ने कहा कि यह महायज्ञ इस धरा धाम को पवित्र करने वाली है इस क्षेत्र के लिए परम सौभाग्य की बात है कि यहां नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का आयोजन हो रहा है।

श्री रुद्र महायज्ञ के अध्यक्ष श्री जितेंद्र कुमार पाल ने अपने सभी सदस्यों को काफी सजग होकर भक्तों के सभी आवश्यक सुविधाओं के प्रति सचेत रहने का सुझाव दिया।

वहीं संपूर्ण कथा के दौरान आज के अतिथि के रूप में गढ़वा प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री नरेंद्र नारायण जी गढ़वा से प्रमुख समाजसेवी पिंटू केसरी जी, विजय केसरीजी कथा मंडपम में विशेष रूप से उपस्थित थे।।

नगर निगम के सदन में महापौर और नगर आयुक्त ने पुनरीक्षित बजट पेश किया
सभासदो ने अपने क्षेत्रो की समस्याओं को गिनाया

वार्डो में अभी तक हुए कार्यो पर हुई चर्चा


संजय द्विवेदी प्रयागराज।नगर निगम में आज महापौर ने बजट पेश किया जिसमें शहर के शहरी क्षेत्र एवं ग्रामीण क्षेत्रो के योजनाओं का लाभ होगा नगर आयुक्त सीलम साई तेजा नगर निगम के अपने अपने सभी विभागों के अधिकारीगण के साथ उपस्थित रहे।सदन में महापौर गणेश केशरवानी और सभी वार्ड के सभासद एवं सभी जोन के अधिकारीगण भी बजट में शामिल हुए इस दौरान नगर निगम के अपने क्षेत्र से आए पार्षदगणों ने अपनी-अपनी बात रखी जिसमें शिकायतो में पेयजल तथा सड़क-नाली निर्माण तथा अतिक्रमण नालो और नालियो की साफ-सफाई  जाम नालियों की समस्या मरम्मत या निर्माण कार्य करने को चबूतरे पेयजल शौचालय/यूरिनल जल की समस्याओ हाउस टैक्स तथा नगर की सड़कों पर सफाई की व्यवस्था किये जाने की चर्चा हुई इसी क्रम में साफ-सफाई मार्ग प्रकाश मलवा अतिक्रमण जैसी समस्या को तत्काल निस्तारण का आदेश को दिया सदन में अपर नगर आयुक्त  दीपेन्द्र यादव अरविन्द कुमार रॉय राजीव कुमार शुक्ला दिनेश चन्द्र सचान मुख्य अभियंता (सिविल)संजय कटियार मुख्य अभियंता (वि./या.)डाo महेश कुमार नगर स्वास्थ्य अधिकारी गौरव कुमार  महाप्रबंधक जलकल संजय मंमगई मुख्य कर निर्धारण अधिकारी डांo विजय अमृत राज पशु चिकित्सा कल्याण विभाग रामपूजन सहायक नगर आयुक्त  अशोक कुमार जोनल अधिकारी जोन 1,  जोनल अधिकारी जोन 2, नवनीत शंखवार जोन 3, विकास जैन जोन 4,अखिलेश त्रिपाठी जोन 5, श्याम कुमार जोन 6,सौरभ यादव जोन 7. सुदर्शन चन्द्र जोन 8 अनिल कुमार मौर्या अधिशासी अभियन्ता एवं सभी जोनल अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहे।
बौद्धिक संपदा के लिए  छात्रों में जागरुकता उत्पन्न करें विश्वविद्यालय-न्यायमूर्ति सुधीर नारायण
मुफ्त विश्वविद्यालय में आईपीआर पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

संजय द्विवेदी प्रयागराज।उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज में बुधवार को आयोजित बौद्धिक संपदा अधिकार पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं जागरूकता कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति सुधीर नारायण ने कहा कि बौद्धिक संपदा को वैश्विक स्तर पर सुरक्षित करने के लिए बड़े कानूनी बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि भारत में बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में जो भी नियम लागू हैं वह वैश्विक स्तर पर मान्य नही है।न्यायमूर्ति नारायण ने बौद्धिक संपदा अधिकार को विधिक परिपेक्ष्य में समझाते हुए बताया कि आईपीआर को लेकर भारत में अभी किसी अधिनियम का निर्माण नहीं किया गया।जिस प्रकार कॉपीराइट एक्ट की व्यवस्था है वैसी कोई व्यवस्था आईपीआर को लेकर नही है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को बौद्धिक संपदा अधिकार के सम्बन्ध में बड़े कदम उठाने चाहिए जिससे कि छात्रों के बीच जागरूकता उत्पन्न की जा सके।मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की विधि विद्या शाखा की प्रो.मानसी शर्मा ने कहा कि बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में व्यापक पैमाने पर जागरूकता की आवश्यकता है।मनुष्यो द्वारा प्रतिपादित कोई भी मौलिक रचना सृजन उसकी बौद्धिक सम्पदा के अन्तर्गत आती है।इस संपदा को विधिक संरक्षण के द्वारा ही सुरक्षित करना आईपीआर का मुख्य उद्देश्य है।प्रो.शर्मा ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी अपनी बौद्धिक सम्पदा को संरक्षित करे और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करे।हमें अपने परंपरागत एवं अर्जित ज्ञान रचना निर्माण आदि को डिजिटल माध्यम में सुरक्षित करना चाहिए।अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि बौद्धिक सम्पदा कभी अर्थपरक नहीं थी वरन् वह भारत में जनकल्याण के लिए हमेशा प्रयोग में लाई जाती रही।हमारे ऋषि मुनियों के पास बौद्धिक संपदा थी ज्ञान था लेकिन उसका सम्बंध व्यवसाय से नहीं था। पश्चिमी सभ्यता में व्यवसाय महत्वपूर्ण हुआ। वह विद्या से जुड़ा बौद्धिकता से जुड़ा और उसका विस्तार हो गया।प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि नवीन तकनीक और उनके उपभोग एवं प्रयोग के सम्बन्ध में आईपीआर को और सशक्त एवं व्यापक बनाया जाए। इसके साथ ही कृतिम बुद्धिमत्ता के दौर में बौद्धिक संपदा को सुरक्षित करने के लिए निहित कानून एवं नियमों का पालन करते हुए हमें उनको संदर्भित अवश्य करना चाहिए।उद्घाटन सत्र में अतिथियों का वाचिक स्वागत प्रो.सत्यपाल तिवारी तथा विषय प्रवर्तन प्रो.जे पी यादव ने किया। कार्यशाला का संचालन डॉ गौरव संकल्प एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ सतीश चन्द्र जैसल ने किया। कार्यशाला के अन्तय तकनीकी सत्रों में प्रतिभागियो ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
ईरान-इस्राइल युद्ध : 12 साल बाद गैस गोदामों पर 500 मीटर तक लगी लंबी कतार

*व्यावसायिक सिलिंडरों की आपूर्ति बंद, घरेलू की बुकिंग तीन गुना बढ़ी, आनलाइन बुकिंग का सर्वर फेल*

नितेश श्रीवास्तव

भदोही। ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच कालीन नगरी में एलपीजी घरेलू गैस सिलिंडर की मांग तीन गुना बढ़ गई है। व्यावसायिक सिलिंडरों की आपूर्ति बंद होने के बाद होटल, ढाबा और मिठाई दुकानदार अब घरेलू सिलेंडर का इस्तेमाल कर रहे हैं। 12 साल बाद एक बार फिर एजेंसियों के गोदामों पर 500 मीटर लंबी कतार देखने को मिली। ऑनलाइन बुकिंग का सर्वर फेल होने के कारण उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ गई है। एजेंसी संचालकों के मोबाइल नॉट रिचएबल बता रहा है। जिले में भारत गैस, इंडियन ऑयल और एचपी की 40 एजेंसियां हैं। इससे 2.07 लाख उज्ज्वला और तीन लाख सामान्य उपभोक्ता जुड़े हैं। युद्ध के कारण विश्व में गैस, तेल की आपूर्ति प्रभावित होने का अंदेशा है। सोशल मीडिया पर अफवाह उड़ते ही आपूर्ति कम होने के पहले ज्ञानपुर नगर में स्थित एक एजेंसी पर ग्राहकों की लंबी कतार लग गई। कुछ लोगों को ही सिलिंडर मिला। कुछ लोग बिना लिए ही वापस लौट गए। कुछ इसी तरह गोपीगंज, अभोली, भदोही स्थित एजेंसियों पर दिखा। एजेंसी संचालकों ने बताया कि पहले एक दिन में 400 से 500 सिलिंडरों की मांग होती थी। बीते चार-पांच दिनों से मांग एक हजार तक पहुंच गई है। मांग में बढ़ोतरी के सापेक्ष आपूर्ति 50 फीसदी तक ही हो रही है। गोपीगंज नगर में बेबी बानो, करीम, शिवशंकर चौबे, रवि गुप्ता ने बताया कि करीब एक सप्ताह के इंतजार के बाद भी गैस सिलिंडर नहीं मिल रहा है।


सहालग, रमजान के कारण रिफिलिंग की बढ़ी मांग
इन दिनों सहालग के साथ रमजान भी चल रहा है। इस कारण भी घरेलू गैस सिलिंडर की मांग बढ़ी है। शादी के आयोजनों में व्यावसायिक सिलिंडर की आपूर्ति बंद होने से घरेलू सिलिंडर का ज्यादा प्रयोग हो रहा है। इस कारण एजेंसियों और गोदामों पर भीड़ बढ़ गई है। एलपीजी गैस डिस्ट्रीब्यूशन एसोसिएशन के अध्यक्ष अरुण मिश्रा ने बताया कि लोग पैनिक होकर बुकिंग करा रहे हैं। इससे एजेंसियो पर भीड़ बढ़ी है। पहले हर गाड़ी में 10 से 12 व्यावसायिक सिलिंडर आते थे, अब नहीं आ रहे हैं।
होटल कारोबारियों की बात
सरकार को जल्द से जल्द व्यावसायिक सिलिंडरो की आपूर्ति शुरू करानी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। रेस्टोरेंट और होटल बंद हो सकते हैं। वैकल्पिक व्यवस्था से काम चलाया जा रहा है। दो से तीन दिन बाद संकट और बढ़ जाएगा। - संजय उमर वैश्य, रेस्टोरेंट संचालक

व्यावसायिक सिलिंडर नहीं मिल रहा है। एजेंसी संचालकों ने मोबाइल बंद कर दिए हैं। अधिक कीमत देने के बाद भी नहीं मिल रहा है। जो सिलिंडर लगा है उसके खत्म होने के बाद होटल बंद करने की नौबत आ जाएगी।
- विजय कुमार चौरसिया, होटल संचालक
जिनके यहां शादी पड़ी है उनके माथे पर बल पड़ गया है। सिलिंडर जिसके पास है वह काला बाजारी कर रहा है। एक-दो दिन में स्थिति बिगड़ने की संभावना है। - आरिफ अंसारी, मैरिज लान संचालक
स्कूलों में लकड़ी से एमडीएम बनाने पर रोक है। बुधवार को विद्यालय का सिलेंडर खत्म हो गया। एजेंसी पर नहीं मिलने के कारण घर से सिलिंडर लाकर एमडीएम बनवाया गया। आपूर्ति नहीं सुधरी तो विद्यालयों में एमडीएम बनाने में दिक्कत होगी। - सुधीर सिंह, प्रधानाध्यापक, प्राथमिक विद्यालय पड़ाव।

जिले में फिलहाल सिलिंडर आपूर्ति में कोई संकट नहीं है। लोग पैनिक होकर बुकिंग कर रहे हैं। पांच मार्च तक की बुकिंग वाले ग्राहकों को सिलिंडर मिल चुका है। व्यावसायिक सिलिंडर की आपूर्ति शासन से बंद कर दी गई है। कई एजेंसियों पर नजर रखी जा रही है ताकि कालाबाजारी न हो सके। - सुनील कुमार, डीएसओ।

40 एजेंसी जनपद में करती है सिलिंडर वितरण
5.10 लाख घरेलू उपभोक्ता हैं जिले में
15 हजार व्यावसायिक सिलिंडर के उपभोक्ता हैं
भारतीय जहाजों के लिए खुला होर्मुज स्ट्रेट, दो टैंकर सुरक्षित निकले, रंग लाई विदेश मंत्री जयशंकर की कूटनीति

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ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच भारत के लिए अच्छी खबर आई है। ईरान ने भारत के साथ कूटनीतिक बातचीत के बाद भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को हॉर्मुज से गुजरने की अनुमति दे दी है। इसके बाद पुष्पक और परिमलनाम के भारतीय टैंकर सुरक्षित रूप से इस हॉर्मुज से गुजर गए।

भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता

पश्चिम एशिया में भड़के युद्ध के बीच पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई लाइन खतरे में है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पश्चिमी देशों के विदेशी जहाजों के लिए लगभग 'नो-गो जोन' बन चुका है। ईरान-इजराइल-अमेरिका जंग के बीच भारत को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। ईरान ने भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को रणनीतिक रूप से अहम 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दे दी है।

एस जयशंकर और अराघची की बातचीत से निकला हल

यह घटनाक्रम भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास आराघची के बीच हुई उच्च-स्तरीय वार्ता के बाद सामने आया है। इस मसले पर विदेश मंत्री एस जयशंकर की उनके ईरानी समकक्ष के बीच युद्ध छिड़ने के बाद कम से कम तीन बार बात हो चुकी है। जयशंकर ने मंगलवार को भी पश्चिम एशिया में जारी संकट को लेकर अब्बास अराघची से बात की।

भारत के लिए ये क्यों खास है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑयल इंपोर्टर है और ज्यादातर क्रूड मिडिल ईस्ट से आता है, जो होर्मुज से गुजरता है। युद्ध शुरू होने (28 फरवरी) से पहले ही कई भारतीय जहाज फंस गए थे। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग के मुताबिक, 28 से 37 भारतीय फ्लैग वाले जहाज वहां थे, जिनमें 1000 से ज्यादा भारतीय सीफेयरर्स थे। ईरान ने अमेरिका, इजरायल और यूरोप के जहाजों पर सख्ती बरती है, लेकिन भारत जैसे गैर-पश्चिमी देशों को छूट दी है। ऐसे में इसे काफी अहम माना जा रहा है।

क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?

होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच लगभग 55 किलोमीटर चौड़ा समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है।

-सामान्य परिस्थितियों में यहां से प्रतिदिन करीब 1.3 करोड़ बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 31 प्रतिशत है।

-इस मार्ग में बाधा आने से इराक, कुवैत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के निर्यात पर सीधा असर पड़ता है।

-दुनिया के तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का भी बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।

-इसलिए यहां तनाव बढ़ने पर वैश्विक बाजार, सप्लाई चेन और ऊर्जा कीमतों पर तुरंत असर देखने को मिलता है।

विज्ञान शिक्षक के रूप में चयनित होने पर धर्मेंद्र यादव का ग्रामवासियों ने किया सम्मान
जौनपुर। बदलापुर तहसील अंतर्गत स्थित शाहपुर सानी गांव निवासी धर्मेंद्र यादव पुत्र बीपत यादव का भदोही जिले के जूनियर हाई स्कूल में विज्ञान शिक्षक के रूप में चयनित होने पर आज ग्रामवासियों द्वारा उनका भव्य सम्मान किया गया। अत्यंत विनम्र, शालीन और सहयोगी प्रवृत्ति के धर्मेंद्र यादव का विज्ञान शिक्षक के रूप में चयन होने पर लोगों ने खुशी जाहिर की है। आज सम्मान समारोह में ग्राम प्रधान चंद्रशेखर यादव, वरिष्ठ पत्रकार शिवपूजन पांडे, पूर्व प्रधानाचार्य रामबाबू यादव, लालता यादव, हृदय नारायण सिंह, ब्रिजलाल यादव, जगपत यादव, शिवनारायण यादव, अनिल कुमार यादव, शैलेंद्र यादव, मुकेश यादव, नंदलाल यादव, आलोक यादव, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य कमल कुमार यादव, विकास यादव, विवेक यादव समेत अनेक लोग उपस्थित रहे। चंद्रशेखर यादव ने कहा कि यह पूरे गांव ही नहीं अपितु पूरे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है। उन्होंने धर्मेंद्र यादव के साथ-साथ उनके पिता बीपत यादव को भी माला पहनाकर बधाई दी।
फारूक अब्दुल्ला पर किसने की फायरिंग? बाल-बाल बची जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम की जान

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जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित होटल रॉयल पार्क में आयोजित एक शादी समारोह के दौरान उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब कार्यक्रम में अचानक फायरिंग की घटना हो गई। हमला नेशनल कॉन्फ्रेंस के संरक्षक फारूक अब्दुल्ला पर किया गया था। इस समारोह में फारूक अब्दुल्ला के अलावा जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और पार्टी के कई अन्य नेता मौजूद थे।

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फारूक अब्दुल्ला के पीछे से गोली चलाई

पुलिस के मुताबिक हमलावर ने फारूक अब्दुल्ला के पीछे से पिस्तौल तानकर गोली चला दी। गनीमत रही कि गोली उन्हें नहीं लगी। फारूक अब्दुल्ला, सुरिंदर चौधरी और दूसरे बड़े नेता नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ता सुरजीत सिंह के बेटे की शादी में शामिल हुए थे। हमलावर सुरजीत सिंह का कजिन है। वह बिजनेसमैन है और उसकी पुराने शहर में कुछ दुकानें हैं।

70 साल के हमलावर ने सिर पर तानी रिवॉल्वर

घटना का सीसीटीवी भी सामने आया है। इसमें देखा जा सकता है कि 70 साल के हमलावर कमल सिंह जामवाल ने पीछे से आकर फारूक के सिर पर रिवॉल्वर तान दी। सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत हमलावर का हाथ हटाया जिससे फायर हवा में हो गया। आरोपी को पकड़ लिया गया है और हमले के कारणों का पता लगाया जा रहा है।

कुछ ही सेकंड में सुरक्षाकर्मियों ने दबोचा आरोपी

फारूक अब्दुल्ला के ऊपर फायरिंग होते ही सुरक्षा टीम तुरंत हरकत में आ गई। जम्मू-कश्मीर पुलिस की सुरक्षा टीम ने हमलावर को मौके पर ही काबू कर लिया। अधिकारियों के मुताबिक सुरक्षा कर्मियों ने सबसे पहले आरोपी के हाथ से पिस्तौल छीनी, उसके बाद उसे जमीन पर लिटाकर काबू में कर लिया। साथ ही पिस्तौल से गोलियां भी निकाल ली गईं, ताकि वह दोबारा हमला न कर सके। इसके बाद फारूक अब्दुल्ला को तुरंत सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया।

पिता फारूक पर फायरिंग की कोशिश से भड़के सीएम उमर

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और फारूक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला का भी बड़ा बयान आया है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने एक्स पर लिखा कि एक आदमी लोडेड पिस्टल लेकर पॉइंट-ब्लैंक रेंज में आ गया और गोली चला दी। अल्लाह का शुक्र है कि मेरे पिता बाल-बाल बचे। सवाल उठता है कि कोई Z+ NSG प्रोटेक्टेड पूर्व सीएम के इतने करीब कैसे पहुंच गया।

फतेहपुर में बंद कमरे में मां-बेटे और देवर की रहस्यमयी मौत, सुसाइड नोट मिलने से कर्ज का एंगल आया सामने
फतेहपुर। फतेहपुर जिले के Lucknow Bypass Road स्थित एक मकान में मां-बेटे और देवर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से इलाके में सनसनी फैल गई। घटना Sadar Kotwali क्षेत्र की है, जहां सुशील श्रीवास्तव के मकान में रहने वाले परिवार के तीन सदस्यों के शव बंद कमरे में मिले। पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।जानकारी के मुताबिक कमरे में मां और बेटे के शव खून से लथपथ हालत में मिले, जबकि कुछ दूरी पर महिला का देवर गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़ा था। उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी भी मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही इलाके में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुट गई।

व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख का कर्ज हो गया था

बताया जा रहा है कि परिवार मूल रूप से मुराइनटोला का रहने वाला था और कुछ साल पहले ही लखनऊ बाईपास क्षेत्र में मकान बनाकर रहने लगा था। परिवार का इकलौता बेटा अमर श्रीवास्तव सरल स्वभाव का था और कई अखबारों की एजेंसी का काम कर चुका था। हालांकि व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख रुपये का कर्ज हो गया था। कर्ज के दबाव में उसका घर भी बिक गया था और लंबे समय तक परिवार कर्जदारों से बचने के लिए छिपकर रह रहा था।

पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला

परिजनों के अनुसार अमर हाल के दिनों में लोगों से रुपये उधार मांग रहा था। उसने घटना से एक दिन पहले अपने एक दोस्त से 10 हजार रुपये उधार लिए थे और होली के आसपास अपने बहनोई से भी 10 हजार रुपये लिए थे। अमर के बहनोई ने तीनों की मौत को आत्महत्या मानने से इनकार करते हुए हत्या की आशंका जताई है।पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें तीन लोगों के नाम का जिक्र करते हुए आर्थिक तंगी और कर्ज से परेशान होने की बात लिखी गई है। सुसाइड नोट के आधार पर पुलिस उन लोगों की तलाश में जुट गई है। एसओजी और इंटेलिजेंस विंग की टीम भी मामले की जांच कर रही है।मौके से चाय के झूठे गिलास और ब्लेड का पैकेट भी बरामद हुआ है।

तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया

आशंका जताई जा रही है कि तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया और बाद में तड़पने पर ब्लेड से खुद पर वार किया। हालांकि यह भी संभावना जताई जा रही है कि तीनों के बीच आपसी विवाद के बाद हमला हुआ हो, जिसमें देवर ने मां-बेटे की हत्या कर खुद की जान ले ली हो।फिलहाल पुलिस दो पहलुओं—हत्या और सामूहिक आत्महत्या—दोनों को ध्यान में रखकर जांच कर रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि मौत जहर से हुई या ब्लेड से हुए हमले से। सुसाइड नोट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
प्रताप सिंह बने मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष, क्षेत्र में खुशी की लहर
मेरठ/बहसूमा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति पर जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से मवाना पश्चिम मंडल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। थाना क्षेत्र के गांव मीरपुर निवासी प्रताप सिंह पुत्र टिड्डा सिंह को मवाना पश्चिम का मंडल अध्यक्ष बनाया गया है।

प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने की खबर से क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। क्षेत्र के लोगों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें फोन कर बधाई दी और उज्ज्वल कार्यकाल की कामना की।

बताया गया कि सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम के आह्वान पर तथा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति एवं जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में हस्तिनापुर क्षेत्रीय अध्यक्ष पश्चिम सत्येंद्र सिसोदिया ने प्रताप सिंह को मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने से पार्टी को मजबूती मिलेगी और वह भाजपा की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने का काम करेंगे।

प्रताप सिंह के मनोनयन पर भारतीय गौ सेवा संघ के मेरठ जिला उपाध्यक्ष परविंदर उर्फ जैन साहब ने भी उन्हें बधाई दी। इसके अलावा डॉ. अनिल कुमार, जोगिंदर चौधरी, जोगिंदर, नीरज कुमार, मनोज कुमार, अजय कुमार सहित कई लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
गढ़वा: बंडा पहाड़ पर गूंजा 'हर-हर महादेव', नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन संपन्न

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गढ़वा :- गढ़वा के ग्राम जोबरईया के बंडा पहाड़ स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन भगवान शंकर के रुद्राभिषेक से प्रारंभ हुआ। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार संध्या काल में पावन श्री राम कथा में अयोध्या धाम से पधारे हुए परम पूज्य आचार्य पंकज शांडिल्य जी महाराज ने कथा के तृतीय दिवस में भगवान के पावन जन्म की कथा श्रवण कराया। कथा व्यास जी ने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार पापाचार बढ़ता है, दुष्ट आताताइयो का आतंक बढ़ता है प्रभु विभिन्न स्वरूपों में आकर के राक्षसों का विनाश कर धरती के भार को हल्का करते हैं। परमात्मा निराकार है लेकिन भक्त के भावना के अनुसार समय-समय पर सगुण साकार रूप रखकर इस धरती पर आते हैं। भगवान को धरती पर आने के कई कारण है मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है विप्र,धेनु,सुर,संत हित लीन्ह मनुज अवतार l कार्यक्रम में संगीतमय प्रस्तुतिकरण हेतु साथ दे रहे संगीतकारों ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं का मन मोह लिया। कथा के अंत में वृंदावन से पधारे हुए कलाकारों के

द्वारा सुंदर झांकियां की प्रस्तुति हुई। जिसमें राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के साथ बाल शाखाओं की टोली की प्रस्तुतीकरण ने उपस्थित दर्शकों का मनमोहन लिया। महायज्ञ के यज्ञाधीश आचार्य श्री श्री आशीष वैद्य जी महाराज जी ने कथा व्यास के प्रस्तुतीकरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि व्यास जी एक उद्भट्ट विद्वान है। कथा करने की इनकी गायन शैली काफी रोचक और झांकियां काफी मनोरम है। प्रधान संयोजक श्री राकेश पाल जी ने कहा कि यह महायज्ञ इस धरा धाम को पवित्र करने वाली है इस क्षेत्र के लिए परम सौभाग्य की बात है कि यहां नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का आयोजन हो रहा है।

श्री रुद्र महायज्ञ के अध्यक्ष श्री जितेंद्र कुमार पाल ने अपने सभी सदस्यों को काफी सजग होकर भक्तों के सभी आवश्यक सुविधाओं के प्रति सचेत रहने का सुझाव दिया।

वहीं संपूर्ण कथा के दौरान आज के अतिथि के रूप में गढ़वा प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री नरेंद्र नारायण जी गढ़वा से प्रमुख समाजसेवी पिंटू केसरी जी, विजय केसरीजी कथा मंडपम में विशेष रूप से उपस्थित थे।।

नगर निगम के सदन में महापौर और नगर आयुक्त ने पुनरीक्षित बजट पेश किया
सभासदो ने अपने क्षेत्रो की समस्याओं को गिनाया

वार्डो में अभी तक हुए कार्यो पर हुई चर्चा


संजय द्विवेदी प्रयागराज।नगर निगम में आज महापौर ने बजट पेश किया जिसमें शहर के शहरी क्षेत्र एवं ग्रामीण क्षेत्रो के योजनाओं का लाभ होगा नगर आयुक्त सीलम साई तेजा नगर निगम के अपने अपने सभी विभागों के अधिकारीगण के साथ उपस्थित रहे।सदन में महापौर गणेश केशरवानी और सभी वार्ड के सभासद एवं सभी जोन के अधिकारीगण भी बजट में शामिल हुए इस दौरान नगर निगम के अपने क्षेत्र से आए पार्षदगणों ने अपनी-अपनी बात रखी जिसमें शिकायतो में पेयजल तथा सड़क-नाली निर्माण तथा अतिक्रमण नालो और नालियो की साफ-सफाई  जाम नालियों की समस्या मरम्मत या निर्माण कार्य करने को चबूतरे पेयजल शौचालय/यूरिनल जल की समस्याओ हाउस टैक्स तथा नगर की सड़कों पर सफाई की व्यवस्था किये जाने की चर्चा हुई इसी क्रम में साफ-सफाई मार्ग प्रकाश मलवा अतिक्रमण जैसी समस्या को तत्काल निस्तारण का आदेश को दिया सदन में अपर नगर आयुक्त  दीपेन्द्र यादव अरविन्द कुमार रॉय राजीव कुमार शुक्ला दिनेश चन्द्र सचान मुख्य अभियंता (सिविल)संजय कटियार मुख्य अभियंता (वि./या.)डाo महेश कुमार नगर स्वास्थ्य अधिकारी गौरव कुमार  महाप्रबंधक जलकल संजय मंमगई मुख्य कर निर्धारण अधिकारी डांo विजय अमृत राज पशु चिकित्सा कल्याण विभाग रामपूजन सहायक नगर आयुक्त  अशोक कुमार जोनल अधिकारी जोन 1,  जोनल अधिकारी जोन 2, नवनीत शंखवार जोन 3, विकास जैन जोन 4,अखिलेश त्रिपाठी जोन 5, श्याम कुमार जोन 6,सौरभ यादव जोन 7. सुदर्शन चन्द्र जोन 8 अनिल कुमार मौर्या अधिशासी अभियन्ता एवं सभी जोनल अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहे।
बौद्धिक संपदा के लिए  छात्रों में जागरुकता उत्पन्न करें विश्वविद्यालय-न्यायमूर्ति सुधीर नारायण
मुफ्त विश्वविद्यालय में आईपीआर पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

संजय द्विवेदी प्रयागराज।उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज में बुधवार को आयोजित बौद्धिक संपदा अधिकार पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं जागरूकता कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति सुधीर नारायण ने कहा कि बौद्धिक संपदा को वैश्विक स्तर पर सुरक्षित करने के लिए बड़े कानूनी बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि भारत में बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में जो भी नियम लागू हैं वह वैश्विक स्तर पर मान्य नही है।न्यायमूर्ति नारायण ने बौद्धिक संपदा अधिकार को विधिक परिपेक्ष्य में समझाते हुए बताया कि आईपीआर को लेकर भारत में अभी किसी अधिनियम का निर्माण नहीं किया गया।जिस प्रकार कॉपीराइट एक्ट की व्यवस्था है वैसी कोई व्यवस्था आईपीआर को लेकर नही है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को बौद्धिक संपदा अधिकार के सम्बन्ध में बड़े कदम उठाने चाहिए जिससे कि छात्रों के बीच जागरूकता उत्पन्न की जा सके।मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की विधि विद्या शाखा की प्रो.मानसी शर्मा ने कहा कि बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में व्यापक पैमाने पर जागरूकता की आवश्यकता है।मनुष्यो द्वारा प्रतिपादित कोई भी मौलिक रचना सृजन उसकी बौद्धिक सम्पदा के अन्तर्गत आती है।इस संपदा को विधिक संरक्षण के द्वारा ही सुरक्षित करना आईपीआर का मुख्य उद्देश्य है।प्रो.शर्मा ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी अपनी बौद्धिक सम्पदा को संरक्षित करे और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करे।हमें अपने परंपरागत एवं अर्जित ज्ञान रचना निर्माण आदि को डिजिटल माध्यम में सुरक्षित करना चाहिए।अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि बौद्धिक सम्पदा कभी अर्थपरक नहीं थी वरन् वह भारत में जनकल्याण के लिए हमेशा प्रयोग में लाई जाती रही।हमारे ऋषि मुनियों के पास बौद्धिक संपदा थी ज्ञान था लेकिन उसका सम्बंध व्यवसाय से नहीं था। पश्चिमी सभ्यता में व्यवसाय महत्वपूर्ण हुआ। वह विद्या से जुड़ा बौद्धिकता से जुड़ा और उसका विस्तार हो गया।प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि नवीन तकनीक और उनके उपभोग एवं प्रयोग के सम्बन्ध में आईपीआर को और सशक्त एवं व्यापक बनाया जाए। इसके साथ ही कृतिम बुद्धिमत्ता के दौर में बौद्धिक संपदा को सुरक्षित करने के लिए निहित कानून एवं नियमों का पालन करते हुए हमें उनको संदर्भित अवश्य करना चाहिए।उद्घाटन सत्र में अतिथियों का वाचिक स्वागत प्रो.सत्यपाल तिवारी तथा विषय प्रवर्तन प्रो.जे पी यादव ने किया। कार्यशाला का संचालन डॉ गौरव संकल्प एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ सतीश चन्द्र जैसल ने किया। कार्यशाला के अन्तय तकनीकी सत्रों में प्रतिभागियो ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।