Sambhal सुन्नी बिलाल मस्जिद मुंबई में शरीयत की सुरक्षा और समान नागरिक संहिता के विरोध में अहम बैठक
“समान नागरिक संहिता का लागू होना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के खिलाफ है। मौलाना सैयद मोइन मियां
“इस कानून के लागू होने से देश के नागरिकों की धार्मिक आज़ादी प्रभावित होगी।” — हाजी मोहम्मद सईद नूरी
(स्टाफ रिपोर्टर)
मुंबई के डोंगरी, दो टंकी स्थित सुन्नी मस्जिद बिलाल में इस्लामी शरीयत की सुरक्षा और समान नागरिक संहिता (UCC) के विरोध में एक अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता और *सरपरस्ती पीर-ए-तरीकत, क़ाइद-ए-अहले सुन्नत हज़रत अल्लामा मौलाना हाजी शाह सैयद मोइनुद्दीन अशरफ अशरफी जिलानी* ने की। वहीं, रज़ा एकेडमी के संस्थापक *हाजी मोहम्मद सईद नूरी* ने बैठक का नेतृत्व किया।
इस बैठक में उलमा-ए-किराम, बुद्धिजीवियों, सामाजिक और मिल्ली संगठनों से जुड़े लोगों तथा अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों ने हिस्सा लिया। बैठक में समान नागरिक संहिता के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई और इसके संभावित नकारात्मक प्रभावों पर विचार किया गया।
धार्मिक आज़ादी और संविधान पर चर्चा
हज़रत मौलाना सैयद मोइनुद्दीन अशरफ अशरफी जिलानी ने कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जहां अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग रहते हैं। यहां हर नागरिक को अपने धर्म पर चलने, धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने और संविधान के दायरे में अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने का हक प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि मुसलमानों के लिए निकाह, तलाक, विरासत और दूसरे पारिवारिक मामलों में इस्लामी शरीयत की बहुत अहमियत है। इसलिए समान नागरिक संहिता से जुड़े किसी भी कानून पर विचार करते समय धार्मिक आज़ादी और संवैधानिक अधिकारों का ध्यान रखना जरूरी है।
शरीयत में दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा: सईद नूरी
रज़ा एकेडमी के संस्थापक हाजी मोहम्मद सईद नूरी ने कहा कि समान नागरिक संहिता को रोकने के लिए हर संभव कोशिश की जाएगी।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि यह कानून सभी नागरिकों के लिए समान है, तो आदिवासी समुदायों को इससे अलग क्यों रखा गया है? उन्होंने कहा कि मुसलमानों की धार्मिक मान्यताओं और शरीयत से जुड़े मामलों का सम्मान किया जाना चाहिए।
मौलाना फैजान अशरफ हामिदी ने कहा कि मुसलमान अपनी शरीयत के मामलों में किसी भी तरह का दखल स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर सभी उलमा को मिलकर अपनी बात रखनी चाहिए।
जागरूकता और कानूनी जानकारी पर जोर
बैठक में शामिल लोगों ने कहा कि समान नागरिक संहिता से जुड़े किसी भी कानून या नीति पर विचार करते समय भारतीय संविधान, धार्मिक आज़ादी, नागरिकों के मौलिक अधिकारों और विभिन्न धर्मों के पारिवारिक कानूनों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
इस बात पर भी जोर दिया गया कि इस विषय में सही जानकारी लोगों तक पहुंचाई जाए और आम जनता को इसके कानूनी तथा संवैधानिक पहलुओं से परिचित कराया जाए। धार्मिक मामलों में उलमा और मुफ्तियान-ए-किराम से मार्गदर्शन लेने की जरूरत भी बताई गई।
बैठक में मौजूद लोगों ने कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर भावनाओं में बहने के बजाय ज्ञान, समझदारी, दलील और शांतिपूर्ण संवैधानिक तरीकों से अपनी बात रखनी चाहिए। साथ ही देश में आपसी भाईचारे, एकता, सम्मान और राष्ट्रीय एकजुटता को मजबूत बनाने के लिए काम करते रहना चाहिए।
उलमा और जिम्मेदार लोगों से आगे आने की अपील
बैठक के अंत में इस बात पर सहमति बनी कि इस्लामी शरीयत की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए संगठित रूप से काम किया जाएगा। इसके लिए उलमा, बुद्धिजीवियों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से सकारात्मक भूमिका निभाने की अपील की गई।
इन प्रमुख लोगों ने की शिरकत
इस बैठक में विशेष रूप से *मौलाना ज़फरुद्दीन रिज़वी, मौलाना फैज़ान अशरफ हामिदी (संभल),मौलाना अब्बास रिजवी,मुफ्ती अब्दुल माजिद रिज़वी, मौलाना आस मोहम्मद बरकाती, मुफ्ती जुबैर मिस्बाही, मौलाना अरबाज़ रज़ा, मौलाना शम्सुल हुदा रिज़वी, मौलाना इनामुल हक बरकाती, कारी मुश्ताक तेगी, कारी गुलज़ार, हाफिज़ ज़ियाउल हक सहित अन्य उलमा और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
4 hours ago
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