नागरी प्रचारिणी सभा ने अलंकृत किया डॉ. विद्यासागर उपाध्याय, प्राप्त किया 'तुलसी सारस्वत सम्मान-2026'
संजीव सिंह बलिया!हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए जनपद के ख्यातिलब्ध शिक्षाविद् एवं साहित्य मर्मज्ञ डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को ऐतिहासिक नागरी प्रचारिणी सभा (आर्यभाषा पुस्तकालय एवं वाचनालय) देवरिया की ओर से ‘नागरी तुलसी सारस्वत सम्मान-2026’ से अलंकृत किया गया। तुलसी जयंती के अवसर पर आयोजित वार्षिक समारोह में हिंदी भाषा की सेवा, साहित्य-सर्जना तथा भाषा-साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उन्हें प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिह्न, अंगवस्त्र, पुष्पहार एवं उत्तरीय सहित यह प्रदान किया गया। समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘तुलसी जयंती क्यों मनाई जाए’ विषय पर विचार रखते हुए कहा कि तुलसीदास ने वेद, निगम और आगम से चली आ रही गंभीर एवं दुरूह ज्ञान-परंपरा को लोकभाषा के माध्यम से सहज, सरल और जनसुलभ बनाया। तुलसी केवल कवि नहीं, बल्कि युगद्रष्टा संत थे। उन्होंने कहा कि आज समाज में दिखाई दे रही अनेक विकृतियों और विसंगतियों की कल्पना तुलसी ने लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व ही कर ली थी। डॉ. उपाध्याय ने कहा कि तुलसी का चिंतन मूलतः लोकमंगल का चिंतन है। उनका विश्वास था कि गृहस्थ और किसान समृद्ध होंगे, तभी समाज और राष्ट्र वास्तविक अर्थों में उन्नति कर सकेंगे। उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि यदि संत और शासक समृद्ध होते जाएं तथा किसान गरीब होता जाए तो यह स्थिति तुलसी के लोकमंगल दर्शन के अनुरूप नहीं कही जा सकती। तुलसी ने इसी व्यापक उद्देश्य से लोकभाषा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और धर्म, दर्शन, नीति तथा जीवन-मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने कहा, “यदि लंका में कोई तुलसी होता तो वह लंका, लंका न होकर अयोध्या हो गई होती।” तुलसी का साहित्य समाज को विवेक, मर्यादा, नीति और लोकमंगल की दिशा देता है। इसी कारण बदलते समय में भी तुलसी की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हो सकती। समारोह में मुख्य रूप से करौली इनायती रियासत राजस्थान के राजघराने के वर्तमान उत्तराधिकारी एवं वरिष्ठ साहित्यकार राव शिवराज पाल, बरहज आश्रम के महंत स्वामी आंजनेय दास, सभा के मंत्री डॉ. अनिल कुमार त्रिपाठी, प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.दयाशंकर कुशवाहा, डॉ. रंजीता श्रीवास्तव, डॉ. अभय द्विवेदी, डॉ. संजय शंकर मिश्र, डॉ. सरोज कुमार पाण्डेय, डॉ. इन्द्र कुमार दीक्षित, डॉ. दिनेश कुमार त्रिपाठी, अधिवक्ता बृजेश पांडेय सहित विभिन्न महाविद्यालयों से जुड़े सैकड़ों साहित्यकारों, शिक्षाविदों और गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही। सन् 1915 ईस्वी में स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया हिंदी भाषा और साहित्य के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रचार-प्रसार की दृष्टि से महत्वपूर्ण संस्था रही है। संस्था की साहित्यिक गतिविधियों से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामदरश मिश्र, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, सेठ गोविंद दास और पं. कमलापति त्रिपाठी जैसी साहित्यिक एवं सार्वजनिक जीवन की विभूतियों का संबंध रहा है। इसके अतिरिक्त डॉ. मुरली मनोहर जोशी, प्रो. राजबली पांडेय, चंद्रबली पांडेय, प्रो. गिरीश्वर मिश्र, डॉ. रामदेव धुरंधर, तेजेंद्र शर्मा, डॉ. पुष्पिता अवस्थी, सरन घई, डॉ. स्वदेश भारती और सत्यदेव त्रिपाठी जैसे राष्ट्रीय, अकादमिक एवं प्रवासी हिंदी जगत के प्रमुख व्यक्तित्व भी संस्था की साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। तुलसी जयंती के अवसर पर संस्था द्वारा आयोजित व्याख्यान एवं सम्मान समारोह इसी समृद्ध साहित्यिक परंपरा की निरंतरता है। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को मिले सम्मान से बलिया के साहित्यिक एवं विद्वत समाज में प्रसन्नता है। डॉ. गणेश पाठक, करुणानिधि तिवारी, हरेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ. जनार्दन राय, डॉ. अशोक पाण्डेय, डॉ. मणिकर्णिका, डॉ. विजया वर्मा, डॉ. प्रतिभा त्रिपाठी, लल्लन पाण्डेय, संतोष दीक्षित, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. जितेंद्र यादव और डॉ. अशोक कुमार सिंह सहित अनेक साहित्यकारों एवं विद्वानों ने उन्हें बधाई दी और उनके साहित्यिक एवं शैक्षिक योगदान की सराहना की।
Aug 20 2026, 10:43
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