धर्मांतरण
आज देश मे धर्म को राजनीति का अंग बना दिया गया है और धर्मांतरण को मुद्दा। जहां धर्म के ठेकेदार शाशक और भक्त (जनता) शोषित होते है। धर्मतंत्र और लोकतंत्र एक साथ नही चल सकते। इसके बावजूद देश को धर्मतंत्र के हिसाब से चलाने की कोशिश जारी है। किसी भगवान को मानने के लिए धर्म का होना जरूरी नही है। भगवान धर्म के मोहताज नही है और न ही धर्म के कारण भगवान है। पहले भगवान है न कि धर्म। धर्म ने ही भगवान को बांटा, समाज को बांटा, लोगो को बांटा। धर्म का निर्माण धूर्त लोगो ने किया ताकि वे लोगो पर धार्मिक रूप से शाशन कर उन्हें धर्मिक एवम मानसिक गुलाम बना सके। धार्मिक कट्टरता ऐसा ज़हर है जो लोगो को मारता नही है बल्कि उन्हें धार्मिक और मानसिक ग़ुलाम बना देता है। धार्मिक कट्टर लोग मानव बम की तरह होते है। जो अपने साथ हजारो लोगो को धार्मिक और मानसिक ग़ुलाम बना देते है। धर्म ना भी हो तब भी हम जी सकते है। धर्म कोई चीज नही। धर्म कोई बहुत बड़ा तोप नही। पर उसे तोप बना दिया गया। मनुष्य का परंपरा,रीति-रिवाज तथा उसके जीवन जीने का दर्शन ही धर्म है। जिसे आप कोई भी नाम दे दे। मसलन हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,जैन,पारसी इत्यादि। इससे इतर धर्म कुछ भी नही। कोई भी धर्म बुरा नही होता। बल्कि धर्म को मानने वाले लोग बुरे होते होते है। हर मजहब में अच्छे लोग भी होते है और बुरे लोग भी।मजहब उन्ही कुछ बुरे लोगो के चलते ही बद्नाम होता है। कुछ मजहबी लोग अपने मजहब को श्रेष्ट घोषित करने के चक्कर में, दूसरे धर्म को घटिया बताते है। जबकि, सभी धर्मी का मूल एक ही है- इंसानियत। और सभी धर्मों का आखरी चैप्टर भी इंसानियत पर आकर ही खत्म होता है। हर धर्म की अपनी फिलॉसफी होती है। जैसे हर व्यक्ति के जीवन जीने की अपनी-अपनी फिलॉसफी होती है। यदि आप किसी धर्म को मानते है मतलब,आपको उस धर्म की फिलॉसफी अच्छी लगती है। पर यह कतई जरूरी नही की,आप जिस धर्म मे पैदा हुए उस धर्म की फिलॉसफी आपको पसंद ही आए। इसलिए हमारा संविधन हमें अपना धर्म चुनने का अधिकार देता है। 2014 के बाद से देश मे धर्मांतरण का मुद्दा काफी जोड़ पकड़े हुए है। और ऐसा होना तय था। क्योंकि,बीजेपी के एजेंडे में धर्मांतरण एक प्रमुख मुद्दा रहा है। देश मे जब बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है तो,धर्मांतरण का मुद्दा उठना लाजिमी था। और इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है,राजनीतिक लाभ। देश मे हिन्दू मेजोरिटी(लगभग 80%) है और बीजेपी हिंदुत्व विचारधारा वाली पार्टी मानी जाती है। ऐसे में अगर बीजेपी को हिन्दुओ के सारे वोट हासिल हो जाते है तो,उन्हें किसी और के वोट की जरूरत ही नही रह जायेगी। और इसतरह बीजेपी सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रह सकती है। इसलिए बीजेपी हिन्दुराष्ट्र और धर्मांतरण को मुद्दा बना कर,हिन्दुओ को अपने पाले में रखना चाहती है। ताकि उसके वोट बैंक में सेंध न लग सके। मेरी समझ मे धर्मांतरण के मुख्य चार कारण है -
1.सामाजिक असमानता
2.गरीबी
3.आस्था
4.दर्शन
कोई सामाजिक असमानता (जातिगत भेद भाव) के कारण अपना धर्म बदलता है। तो कोई गरीबी से उबरने के लिए उस धर्म को अपना लेता है,जो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का भरोसा दिलाता है। जब कोई व्यक्ति अपनी बिकट परिस्थितियों से तंग आकर किसी दूसरे धर्म के धार्मिक स्थलों पर माथा टेकता है और जब उसकी समस्याओं का हल निकल जाता है तो उसकी आस्था उस धर्म मे हो जाती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि,लोग दूसरे धर्म के दर्शन से इतने प्रभावित होते है कि,अपना धर्म परिवर्तन कर लेते है।
आपने कभी किसी सवर्ण को धर्म परिवर्तन करते सुना है। नही! धर्मांतरण केवल दलित/आदिवासी या पिछड़े समुदाय के लोग ही करते है। सवाल है आखिर क्यूँ? क्योकि, हिन्दू धर्म को सवर्ण अपनी जागीर समझते है। धर्म पर उनका शुरू से अधिपत्य रहा है। दलित/आदिवासी सिर्फ नाम के लिए हिन्दू है। इनके साथ हर जगह भेद-भाव होता है। मंदिर से लेकर मंच तक। इन्ही भेद-भाव और छुआ-छूत के कारण आदिवासी,दलित तथा अन्य पिछड़ी जातियों ने अपना रुख धीरे-धीरे दूसरे धर्मो की तरफ कर लिया। तथाकथित ब्राह्मणों या सवर्णो ने कभी इस बात पर चिंतन या मंथन नही किया कि,आखिर दलित/आदिवासी समाज के लोग हिन्दू धर्म छोड़ कर दूसरे धर्मो में क्यो जा रहे? जाहिर सी बात है कि,आपने कभी उन्हें अपना समझा ही नही। उन्हें कभी वो मान-सम्मान दिया ही नही। जिसके वो हकदार है। आज भी सवर्ण दलित/आदिवासियों को जानवरों से भी नीच समझते है। कुत्ते-बिल्ली को गोद मे बिठाते है पर दलित/आदिवासी से इन्हें घिन आती है। अति हिंदूवादी लोग दूसरे धर्मों पर अक्सर यह इल्ज़ाम लगाते है कि,'वे लोग हमारे लोगो (दलित/आदिवासी) का धर्म परिवर्तन करा कर मुस्लिम और ईसाई बना रहे है।' जो कि सरासर गलत और तथ्यहीन बात है। दलित/आदिवासी लोग सवर्णो से जलील और प्रताड़ित होकर दूसरे धर्म को अपनाने के लिए मजबूर है। आज कोई भी तलवार या बंदूक की नोक पर किसी का धर्मांतरण नही करा सकता। क्योकि,न तो आज देश मे मुगल है, न अंग्रेज और न ही राजतंत्र है।
ज्यादातर लोग सामाजिक असमानता (जातिगत भेद भाव) से आजिज हो कर धर्मांतरण कर रहे है। मैंने वैसे लोगो को भी देखा है जो सिर्फ अपनी जाति छुपाने के लिए ईसाई बन गए। अगर कोई दलित/आदिवासी समुदाय का व्यक्ति जैन,बौद्ध,सिख या कोई दूसरा धर्म अपनाता है तब इन ब्राह्मणवादियों को कोई प्रॉब्लम नही। इन्हें प्रॉब्लम सिर्फ ईसाई और मुस्लिम धर्म से है। जब लोगो की आस्था आसाराम बापू और राम-रहीम जैसे लोगो मे हो सकती है तो,फिर किसी का किसी धर्म मे आस्था होना गलत या गुनाह कैसे हो गया? ब्राह्मणवादी लोगो मे दलितों/आदिवासियों के धर्मांतरण को लेकर खलबली मची हुईं है। उन्हें लगता है कि अगर दलित/आदिवासियों ने हिन्दू धर्म त्याग दिया तो,इनकी जी हजूरी कौन करेगा? इन्हें डर है कि,इनकी ब्राह्मणवादी विचारधारा खत्म हो जाएगी और कल ये सामाजिक वर्चस्व से बेदखल हो जाएंगे। जिस कारण ये तथाकथित ब्राह्मणवादी विचारधारा के लोग धर्मांतरण को मुद्दा बना कर इस पर रोक लगाने के लिए सरकार से गुहार लगा रहे है। धर्मांतरण पर रोक नही,बल्कि जबरन धर्मांतरण पर रोक लगनी चाहिए।
आज के संदर्भ में जबरन धर्मांतरण संभव नही। किसी को स्वेछा से धर्मांतरण करने से रोकना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है। लोग अपनी मर्जी से अपना धर्म चुनने के लिए स्वतंत्र है।
1 hour and 55 min ago
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