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चीन-अमेरिका में ट्रैरिफ वार, अब ड्रैगन ने अमेरिकी उत्पादों पर लगाया 34 फीसदी जवाबी टैक्स

#chinaimposes34taxonamericanproducts

अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ वार शुरू हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर लगाए गए टैरिफ के बाद बिजिंग और वाशिंगटन से भिड़ंत हो गयी है। ट्रंप ने 2 अप्रैल को चीन सहित कई देशों पर रेसीप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। ट्रंप के इस फैसले का चीन ने विरोध भी किया था। अब चीन ने अमेरिका को उसकी की भाषा में जवाब दिया है। दरअसल, चीन ने सभी अमेरिकी उत्पादों पर 34 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है।

चीन ने शुक्रवार को सभी अमेरिकी वस्तुओं पर 10 अप्रैल से एक्स्ट्रा टैरिफ बढ़ाने का ऐलान किया है। इतना ही नहीं चीन ने यह भी कहा कि वे अमेरिका से आने वाले मेडिकल सीटी एक्स-रे ट्यूबों की जांच शुरू करेंगे और दो अमेरिकी कंपनियों से पोल्ट्री उत्पादों के आयात पर रोक लगाएंगे।

गैडोलीनियम और यिट्रियम जैसी धातुओं के निर्यात पर भी सख्ती

इसके अलावा चीन ने कहा कि वह 11 अमेरिकी कंपनियों को अपनी “अविश्वसनीय संस्थाओं” की लिस्ट में शामिल कर रहा है। जो उन्हें चीन में या चीनी कंपनियों के साथ व्यापार करने से रोकती हैं। इतना ही नहीं, चीन ने बेशकीमती गैडोलीनियम और यिट्रियम समेत कुछ अन्य धातुओं के निर्यात पर भी सख्ती बरतने का संकेत दिया है। खास बात यह है कि इन सभी धातुओं का खनन चीन में सबसे ज्यादा किया जाता है। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक कारों से लेकर स्मार्ट बमों तक हर चीज में होता है।

पहले अमेरिका ने चलाया टैरिफ वाला चाबुक

अमेरिका ने चीन द्वारा जवाबी टैक्स का ऐलान करने से पहले भारत और चीन समेत अन्य देशों पर 2 अप्रैल से भारी-भरकम टैरिफ लागू किया था। इसमें चीन से आने वाले सामान पर 34% आयात कर लगाने का ऐलान किया था। वहीं यूरोपीय यूनियन से आयात पर 20 फीसदी, दक्षिण कोरियाई के उत्पादों पर 25 फीसदी,ताइवान के उत्पादों पर 32 फीसदी और जापानी उत्पादों पर 24 फीसदी टैक्स लागू करने का ऐलान किया था। इसके अलावा सभी विदेशी ऑटोमोबाइल पर 25 फीसदी का टैरिफ लगाया है। इसके पीछे ट्रंप का तर्क था कि हम सभी देशों के व्यापार और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने को कदम उठाते हैं। उनकी सेना समेत अन्य कामों के लिए खर्चा देते हैं, लेकिन वह हम पर भारी टैरिफ लगाते हैं। अब ऐसा नहीं चलेगा। हम किसी के लिए इतना सब कुछ क्यों करेंगे।

20 जवानों की शहादत का सेलिब्रेशन...”विक्रम मिस्री के चीनी दूतावास जानें पर जमकर बरसे राहुल गांधी

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संसद में इन दिनों वक्फ संशोधन बिल को लेकर बवाल मचा हुआ है। इस बीच गुरूवार को लोकसभा में शून्यकाल के दौरान कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चीनी कब्जे का मुद्दा उठाया। राहुल गांधी ने चीन के राजदूत के साथ विदेश सचिव के केक काटने को लेकर केंद्र सरकार पर जोरदार हमला बोला। लोकसभा में राहुल गांधी ने सवाल दागा कि चीनी दूतावास में क्या हमारे सैनिकों की शहादत का केक काटने गए थे विक्रम मिसरी।

राहुल गांधी ने कहा, चीन ने चार हजार किलोमीटर ले लिए, बीस जवान शहीद हुए, लेकिन विदेश सचिव चीन के राजदूत के साथ केक काट रहे हैं। चीनी दूतावास में क्या हमारे सैनिकों की शहादत का केक काटने गए थे विक्रम मिसरी। बता दें कि केक काटने वाली एक फोटो चीन के एंबेसडर ने 1 अप्रैल को पोस्ट की थी।

एलएसी की स्थिति पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, यथास्थिति बनी रहनी चाहिए और हमें अपनी जमीन वापस मिलनी चाहिए। मुझे यह भी पता चला है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने चीन को पत्र लिखा है। हमें यह बात अपने लोगों से नहीं बल्कि चीनी राजदूत से पता चल रही है जो यह बात कह रहे हैं।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाया और दावा किया कि चीन ने भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है, जिस पर सरकार चुप्पी साधे हुए है। इससे सदन में तीखी बहस छिड़ गई। राहुल का बयान उस संदर्भ में है, जब हाल ही में भारत और चीन के संबंध के 75 साल पूरे हुए और इसके अवसर पर चीनी दूतावास में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें भारत की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिस्री शामिल हुए थे।

“कौन चीन के अधिकारियों के साथ चाइनीज सूप पी रहा था?”

वहीं, अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए कहा कि अक्साई चिन किसकी सरकार में चीन के पास गया है। तब हिंदी चीनी भाई-भाई कहते रहे और आपकी पीठ में छुरा खोंपा गया। डोकलाम की घटना के समय कौन चीन के अधिकारियों के साथ चाइनीज सूप पी रहा था और सेना के जवान के साथ खड़े नहीं हुए।

राजीव गांधी फाउंडेशन पर भी उठाया सवाल

अनुराग ठाकुर ने आगे कहा, जिस संस्था ने चीन के अधिकारियों से पैसा लिया था, क्या राजीव गांधी फाउंडेशन ने पैसा नहीं लिया है, क्यों लिया गया वो पैसा। डोकलाम के समय में चीन को मुंह तोड़ जबाव दिया गया था और रक्षामंत्री के साथ साथ पीएम भी सीमा के जवानों के साथ खड़े थे। हम कह सकते हैं कि एक इंच जमीन भी पीएम मोदी के समय में चीन के हाथ में नहीं गई है। इन लोगों को जवाब देना होगा कि राजीव फाउंडेशन ने पैसा क्यों लिया था?

ट्रंप के टैरिफ के बीच जिनपिंग को आई भारत की याद, चीनी राष्ट्रपति ने क्यों किया ड्रैगन और हाथी का जिक्र?


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हाल के दिनों में भारत और चीन के बीच फिर से रिश्तों में गरमाहट बढ़ती दिख रही है। भारत-चीन राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ पर भी दोनों देशों के बीच दूरियां मिटती दिखीं। भारत-चीन राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर भारत में चीनी राजदूत जू फेइहोंग ने दोनों देशों के भविष्य के बारे में सकारात्मक आशा व्यक्त की। इस दौरान चीनी राजदूत जू ने कहा कि चीन और भारत के नेताओं ने इस खास मौके पर बधाई संदेशों का आदान-प्रदान किया।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के 75 साल के राजनयिक रिश्तों पर एक लेटर लिखा। अपने संदेश में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि चीन और भारत के संबंधों को "ड्रैगन-हाथी टैंगो" का रूप लेना चाहिए। टैंगो इन दोनों प्रतीकात्मक जानवरों के बीच का एक चीनी नृत्य है।

भारतीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से बातचीत करते हुए उन्होंने यह बात कही। भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति मुर्मु को बधाई दी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों को अपने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। साथ ही दोनों देशों को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, आपसी विश्वास और आपसी लाभ की दिशा में आम विकास के लिए साथ आने के तरीके तलाशने चाहिए। 

भारत और चीन को प्राचीन सभ्यताएं बताते हुए शी जिनपिंग ने कहा कि दोनों देश प्रमुख विकासशील देश हैं और ग्लोबल साउथ के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश अपने-अपने आधुनिकीकरण प्रयासों के महत्वपूर्ण चरण में हैं।

शी जिनपिंग और द्रौपदी मुर्मू के अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने भी एक दूसरे को बधाई और शुभकामना संदेश भेजे हैं। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान इस बात पर प्रकाश डाला कि दोनों देश प्राचीन सभ्यताएं हैं और वैश्विक दक्षिण के भीतर महत्वपूर्ण विकासशील देश हैं, जो वर्तमान में महत्वपूर्ण आधुनिकीकरण चरणों से गुजर रहे हैं।

बता दें कि चीन को अक्सर ड्रैगन से जोड़ा जाता है, क्योंकि चीनी संस्कृति में ड्रैगन को एक शक्तिशाली, भाग्यशाली और शुभ जीव माना जाता है, जो शक्ति, भाग्य और सफलता का प्रतीक है।

दूसरी ओर, हाथी को भारत से धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक वजहों से जोड़ा जाता है। वहीं, टैंगो एक अंग्रेजी शब्द है। जिसका मतलब दोस्ताना रिश्ता या नृत्य होता है। शी जिनपिंग का कहना था कि वो भारत के साथ रिश्तों को बेहतर करना चाहते हैं।

मोहम्मद यूनुस ने जल प्रबंधन के लिए चीन से मांगा 50 साल का मास्टर प्लान, भारत के लिए चिंता का विषय

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बांग्लादेश के नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस ने देश के जल प्रबंधन संकट को हल करने के लिए चीन से 50 साल का मास्टर प्लान तैयार करने में मदद मांगी है। इसमें तीस्ता नदी का जल प्रबंधन भी शामिल है। उन्होंने चीन को 'जल प्रबंधन का मास्टर' बताते हुए कहा कि वे चीन से सीखना चाहते हैं कि जल संसाधनों को लोगों के लिए अधिक उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है।

यूनुस चार दिवसीय चीन दौरे पर हैं और शुक्रवार को उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। सरकारी समाचार एजेंसी बांग्लादेश संगबाद संघ (बीएसएस) के मुताबिक, यूनुस ने चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग से मुलाकात के दौरान चीन की बाढ़ और जल प्रबंधन प्रणाली की सराहना की। उन्होंने कहा, हमारे देश में भी वहीं समस्याएं हैं, जो चीन में हैं। इसलिए अगर आप हमारे साथ अपने अनुभव साझा करें, तो हमें खुशी होगी।

उन्होंने तीस्ता नदी से जुड़े मुद्दों पर खास फोकस किया लेकिन यह भी कहा कहा कि बांग्लादेश की समस्या एक नदी तक सीमित नहीं बल्कि, पूरी जल प्रणाली से जुड़ी है। बीएसएस के मुताबिक, चीनी मंत्री इस बात को माना कि चीन और बांग्लादेश दोनों को जल प्रबंधन से जुड़ी समान चुनौतियों का सामना करना पड़ता। उन्होंने बांग्लादेश को तकनीकी सहयोग देने का आश्वासन दिया।

इससे पहले, यूनुस ने जिनपिंग के साथ बैठक की। जिसके बाद दोनों देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया। इसमें कहा गया कि दोनों देश जल विज्ञान पूर्वानुमान, बाढ़ रोकथाम, आपदा प्रबंधन, नदी की खुदाई और जल संसाधन प्रबंधन में सहयोग बढ़ाएंगे। संयुक्त बयान में कहा गया कि बांग्लादेश सरकार ने तीस्ता नदी के समग्र प्रबंधन और पुनरुद्धा परियोजना (टीआरसीएमआरपी) में चीनी कंपनियों की भागीदारी का स्वागत किया है।

बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने अपनी नई दिल्ली यात्रा के दौरान 22 जून, 2024 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में तीस्ता नदी जल प्रबंधन का काम भारत को देने का वादा किया था। दोनों नेताओ में सहमति बनी थी कि जल्द ही एक भारतीय टीम ढाका का दौरा करेगी जो तीस्ता जल प्रबंधन की भावी योजना की रूपरेखा तैयार करेगी। अब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने चीन की कंपनियों को भारत के लिए बेहद संवेदनशील इस नदी परियोजना का काम देने का वादा किया है।

चीन पहले से ही बांग्लादेश में कई इंफ्रास्ट्रक्चर और जल परियोजनाओं में निवेश कर रहा है, जिससे उसकी इस क्षेत्र में पकड़ मजबूत होती जा रही है। यदि चीन बांग्लादेश के जल संसाधन प्रबंधन में प्रमुख भूमिका निभाता है, तो इससे भारत की जल कूटनीति और रणनीतिक हितों पर असर पड़ सकता है। भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर पहले ही मतभेद रहे हैं, और चीन की बढ़ती भागीदारी से यह मुद्दा और जटिल हो सकता है। यदि बांग्लादेश चीन पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तो इससे भारत और बांग्लादेश के बीच जल समझौतों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि भारत अभी स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

कितना अहम है मोहम्मद यूनुस का चीन दौरा, बांग्लादेश को क्या उम्मीदें?

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राजधानी ढाका में सेना की तैनाती, सैन्य अधिकारियों की इमरजेंसी बैठक, छात्रों का विरोध सहित कई अन्य कारणों से बांग्लादेश में फिर से तख्तापलट की चर्चा शुरू हो गई है। इस बीच बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस चीन के दौरे पर हैं। मोहम्मद यूनुस 26 मार्च को चीन पहुंचे हैं। इस दौरान वो हैनान प्रांत में होने वाले बोआओ फोरम में हिस्सा लेंगे, जिसमें एशिया के कई देश हिस्सा ले रहे हैं। इस फोरम में भाग लेने के बाद वो चीन सरकार से मिले आधिकारिक निमंत्रण पर बीजिंग का दौरा करेंगे और 28 मार्च को राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक होगी।

जिनपिंग और मोहम्मद यूनुस के बीच की द्विपक्षीय बैठक करीब 30 मिनट तक चलेगी। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच आमने-सामने की बातचीत होगी। वहीं इस द्विपक्षीय बैठक को वजन देने के लिए अब दोनों ही पक्षों की तरफ से 12-12 अधिकारियों का डेलीगेशन इसमें मौजूद रहेगा। यानि इस द्विपक्षीय बैठक में दोनों राष्ट्राध्यक्षों को मिलाकर 13-13 लोग शामिल होंगे। इस बैठक का मतलब ये है कि चीन, बांग्लादेश को काफी महत्वपूर्ण देश की तरह भाव दे रहा है। जाहिर तौर पर वो भारत के ऊपर बांग्लादेश में कूटनीतिक बढ़त हासिल करना चाहता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बैठक को औपचारिक रूप देकर चीन ने इसके महत्व को बढ़ा दिया है।

दोनों देशों के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक से बांग्लादेश और चीन के संबंध ना सिर्फ काफी मजबूत होने की संभावना है, बल्कि दोनों देशों के बीच नये अवसरों के भी खुलने की संभावना होगी। बांग्लादेशी एक्सपर्ट्स इस बात पर जोर दे रहे हैं कि चीन के साथ संबंध मजबूत होने से वैश्विक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। जाहिर तौर पर उनका इशारा भारत को लेकर है।

भू-राजनीति संतुलन

अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्लेषकों का कहना है कि खासतौर पर अंतरिम सरकार के उच्चतम स्तर का पहला द्विपक्षीय दौरा होने की वजह से यह बैठक बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मुख्य सलाहकार की यात्रा से भू-राजनीति को संतुलित करने में मदद मिल सकती है।

अवामी लीग के सत्ता से बेदखल होने के बाद से बांग्लादेश के पड़ोसी भारत के साथ राजनयिक संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं। दूसरी ओर, अमेरिका के पिछले बाइडन प्रशासन के साथ तो अंतरिम सरकार का मैत्रीपूर्ण संबंध देखने को मिला था। लेकिन इस बारे में मौजूदा ट्रंप प्रशासन की नीति अब भी स्पष्ट नहीं हो सकी है।

विश्लेषकों का कहना है कि एक ओर भारत और चीन के बीच क्षेत्रीय प्रभुत्व के सवाल पर तनातनी चल रही है। दूसरी ओर, वैश्विक स्तर पर चीन और अमेरिका के बीच की खींचतान किसी से छिपी नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट और बढ़ी है। इन वजहों से इस मुद्दे पर भी चर्चा हो रही है कि मोहम्मद यूनुस की चीन यात्रा से बांग्लादेश के पड़ोसी भारत और अमेरिका के साथ संबंधों पर असर पड़ेगा।

आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में उम्मीद

वहीं, विश्लेषकों का ये भी मानना है कि मुख्य सलाहकार के इस दौरे से बांग्लादेश को आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में फायदा मिलने की संभावना ही ज़्यादा है। इस दौरे के दौरान विशेष रूप से व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय विकास के क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से उच्च स्तरीय चर्चा की उम्मीद है।

प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने ऐसे समय में बांग्लादेश की बागडोर संभाली है जब देश की अर्थव्यवस्था कई किस्म के दबावों से जूझ रही है। ऐसे में आर्थिक स्थिति को सुधारना ही उनकी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। विश्लेषकों का कहना है कि देश की मौजूदा आर्थिक परिस्थिति में चीन जैसे बड़े और स्थिर आर्थिक साझेदार के सकारात्मक समर्थन की जरूरत है।

विदेश मंत्रालय के सलाहकार तौहीद अहमद ने बीते रविवार को पत्रकारों को बताया कि मुख्य सलाहकार के इस दौरे के दौरान चीन के साथ किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। लेकिन कुछ सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर ज़रूर किए जा सकते हैं।तौहीद अहमद ने स्थानीय पत्रकारों से कहा था कि चीन के साथ आपसी संबंधों में बांग्लादेश वाणिज्य और निवेश को ही सबसे ज़्यादा अहमियत देगा।

चीन ने वर्ष 1975 में बांग्लादेश को मान्यता देकर राजनयिक संबंध कायम किया था। इस साल दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 50 साल पूरे होने जा रहे हैं। ढाका में चीन के राजदूत याओ वेन के मुताबिक, राजनयिक संबंधों को 50 साल पूरे होने के संदर्भ में प्रोफ़ेसर यूनुस का चीन दौरा मील का पत्थर साबित होगा।

चीन जाने से पहले भारत आना चाहते थे युनूस, दिल्ली ने दिखा दी औकात

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बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस चीन के दौरे पर हैं। खबरों की मानें तो वो चीन से पहले भारत की यात्रा करना चाहते थे। इसके लिए उन्हें अनुरोध भी भेजा गया था, लेकिन भारत सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं मिलने के बाद उन्होंने चीन जाने का फैसला किया।

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक मोहम्मद यूनुस पहले दिल्ली आना चाहते थे और इसके लिए अनुरोध भेजा गया था लेकिन भारत सरकार से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद उन्होंने चीन का दौरा चुनने का फैसला किया। द हिंदू ने मोहम्मद यूनुस के प्रेस सचिव शफीकुल आलम के हवाले से इसकी जानकारी दी है। आलम ने कहा, हमने भारत दौरे में रुचि दिखाई थी। पिछले साल दिसंबर में ही भारतीय पक्ष से मुख्य सलाहकार प्रोफेसर यूनुस की भारत में द्विपक्षीय यात्रा के लिए कहा गया था। यह उनकी चीन यात्रा को अंतिम रूप दिए जाने से कुछ सप्ताह पहले किया गया था। दुर्भाग्य से, हमें कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।

रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि मोहम्मद यूनुस भारत के साथ मधुर द्विपक्षीय संबंध चाहते हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख प्रेस सचिव आलम ने कहा है कि चीन से लौटने के बाद मोहम्मद यूनुस 3 से 4 अप्रैल को बैंकॉक में आयोजित होने वाले बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। उन्होंने कहा कि हमने थाईलैंड में आयोजित होने वाले आगामी बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान प्रोफेसर यूनुस और प्रधानमंत्री मोदी के बीच बैठक के लिए एक और अनुरोध किया है और हम भारत के जवाब मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

बता दें कि मोहम्मद यूनुस 26-29 मार्च तक चीन यात्रा पर हैं। अपने दौरे के दौरान मोहम्मद यूनुस प्रमुख चीनी निवेशकों के साथ बैठक करेंगे। इस दौरान वो चीनी निवेशकों को बांग्लादेश में आमंत्रित करेंगे और चीनी कारोबारियों के लिए बांग्लादेश में एक अनुकूल माहौल बनाने का ऑफर देंगे। ताकि चीनी कंपनियों के लिए बांग्लादेश में कारोबार के लिए एक अच्छा माहौल बनाया जा सके।

चीन-पाक को लेकर सेना प्रमुख का बड़ा बयान, जानें क्या कहा?

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भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चीन और पाकिस्तान को लेकर बड़ा बयान दिया है। सेना प्रमुख ने चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियों को लेकर कहा कि आज उनकी मिलीभगत ने खतरा और बढ़ा दिया है। साथ ही उन्होंने चीन के एक प्रमुख आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरने से जटिलता के बढ़ने की बात कही है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन नियम-आधारित व्यवस्था को चुनौती दे रहा है और विघटनकारी गतिविधियों में आगे बढ़ रहा है।

सेना प्रमुख ने दिल्ली में जनरल बिपिन रावत मेमोरियल लेक्चर में यह बात कही।जनरल द्विवेदी ने कहा,देश कई तरह के प्रयासों के साथ काम कर रहा है, हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सुरक्षा के क्षेत्र में ‘किसी उभरती शक्ति द्वारा किसी मौजूदा शक्ति को हटाने के लिए युद्ध की आशंका’ में फंसना बहुत आसान है। उन्होंने कहा, क्या हम सामाजिक क्षेत्र में अनिवार्य आवश्यकताओं वाले देश के रूप में इस आशंका में फंसने का जोखिम उठा सकते हैं? साथ ही, क्या हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर सकते हैं कि हम एक बेहद अस्थिर पड़ोस में रहते।

सेना प्रमुख ने कहा, जैसा कि जनरल रावत ने कहा था कि जब आपके उत्तर और पश्चिम में अस्थिर सीमाएं होती हैं, तो आप नहीं जानते कि लड़ाई किस तरफ से शुरू होगी और कहां खत्म होगी। इसलिए, आपको दोनों मोर्चों के लिए तैयार रहना चाहिए। आज, उच्च स्तर पर मिलीभगत ने खतरे को और बढ़ा दिया है।

जनरल द्विवेदी ने चीन की गतिविधियों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि चीन मौजूदा विश्व व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। उन्होंने कहा कि चीन के एक प्रमुख आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरने से जटिलता बढ़ रही है, प्रतिस्पर्धा पैदा हो रही और ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने के भारत के प्रयासों में बाधा आ रही है।

इससे पहले आठ मार्च को भी जनरल द्विवेदी ने चीन और पाकिस्तान की करीबी का जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच काफी हद तक मिलीभगत है। इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि चीन और पाकिस्तान की करीबी का मतलब है कि दोनों मोर्चों पर वास्तविक खतरा है। पाकिस्तान में अधिकांश उपकरण चीनी मूल के हैं। इसलिए यह दो-मोर्चे का खतरा और एक वास्तविकता है।

चीन के बाहर पैदा होगा मेरा उत्तराधिकारी” दलाई लामा ने चीन को दे डाली चुनौती

#dalai_lama_said_my_successor_will_be_born_outside_china

तिब्बती बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने अपनी नई किताब में कहा है कि उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर पैदा होगा। करीब छह दशक पहले चीन छोड़कर भारत में शरण लेने वाले दलाई लामा की इस किताब वॉयस ऑफ द वॉयसलेस का मंगलवार को लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्र तिब्बत पर नियंत्रण को लेकर चीन के साथ उनकी तनातनी एक बार फिर बढ़ गई है।

दलाई लामा ने ‘वायस फॉर द वायसलेस’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा कि दुनिया भर के तिब्बती चाहते हैं दलाई लामा नामक संस्था उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहे। इस किताब में दलाई लामा ने पहली बार विशिष्ट रूप से साफ किया है कि उनका उत्तराधिकारी ‘स्वतंत्र दुनिया‘ में जन्म लेगा, जो चीन के बाहर है।

दलाई लामा लिखते हैं, "चूंकि पुनर्जन्म का उद्देश्य पूर्ववर्ती के कार्य को आगे बढ़ाना है, इसलिए नए दलाई लामा का जन्म मुक्त विश्व में होगा, ताकि दलाई लामा का पारंपरिक मिशन - यानी सार्वभौमिक करुणा की आवाज बनना, तिब्बती बौद्ध धर्म का आध्यात्मिक नेता और तिब्बती लोगों की आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने वाला तिब्बत का प्रतीक बनना - जारी रहे।"

तिब्बती परंपरा का मानना है कि जब एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु का निधन हो जाता है, तो उसकी आत्मा एक बच्चे के शरीर में पुनर्जन्म लेती है। वर्तमान दलाई लामा, जिन्हें दो साल की उम्र में अपने पूर्ववर्ती के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी गई थी, ने पहले उल्लेख किया था कि आध्यात्मिक नेताओं का वंश उनके साथ समाप्त हो सकता है। लेकिन अपनी किताब में स्पष्ट किया है कि उनके उत्तराधिकारी का जन्म चीन से बाहर होगा।

दलाई लामा का ये बयान टीन की बौखलाहट बढ़ाने वाला है। चीन की बैचेनी की वजह ये है कि 14वें दलाई लामा ने पुष्टि की है कि अगले दलाई लामा का जन्म ‘स्वतंत्र दुनिया’ में होगा। जिससे यह सुनिश्चित होगा कि संस्था चीनी नियंत्रण से परे तिब्बती अधिकारों और आध्यात्मिक नेतृत्व की वकालत करने की अपनी पारंपरिक भूमिका जारी रखेगी। यह बयान बीजिंग के लिए एक सीधी चुनौती है, जो लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि अगले दलाई लामा को मान्यता देने का अंतिम अधिकार उसके पास है। चीन ने तिब्बती नेता की घोषणाओं को खारिज करते हुए जोर दिया है कि किसी भी उत्तराधिकारी को बीजिंग की मंजूरी लेनी होगी।

बता दें कि चीन ने 1950 में तिब्बत पर नियंत्रण हासिल कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप तनाव और प्रतिरोध हुआ। 1959 में, 23 साल की उम्र में, 14वें दलाई लामा, तेनजिन ग्यात्सो, माओत्से तुंग के कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ एक विफल विद्रोह के बाद हजारों तिब्बतियों के साथ भारत भाग गए। चीन दलाई लामा को "अलगाववादी" कहता है और दावा करता है कि वह उनके उत्तराधिकारी का चयन करेगा। हालांकि, 89 वर्षीय ने कहा है कि चीन द्वारा चुने गए किसी भी उत्तराधिकारी को सम्मानित नहीं किया जाएगा।

पाक के बाद चीन के करीब हो रहा बांग्लादेश, भारत के बिगड़ते संबंधों के बीच मोहम्मद यूनुस का चीन दौरा

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शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश के दोस्तो की फेहरिस्त बदल रही है। कभी शेख हसीना के लिए भारत सबसे करीबी दोस्त हुआ करता था। मोहम्मद यूनुस के मुख्य सलाहकार बनते ही यही भारत बांग्लादेश की आंखों को खटकने लगा है। मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान से गलबहियां करने के बाद अब ढाका को बीजिंग के करीब ले जाने में जुट गए हैं। इसी क्रम में मोहम्मद यूनुस चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। मुहम्मद यूनुस द्विपक्षीय बैठक के लिए 26 मार्च को चीन का दौरा करेंगे। यूनुस 26 से 29 मार्च तक चीन के दौरो पर रहेंगे।

नोबेल पुरस्कार विजेता, जिन्होंने शेख हसीना के जाने के बाद बांग्लादेश के अंतरिम नेता के रूप में पदभार संभाला था।7 अगस्त, 2024 को पदभार संभालने के बाद यूनुस की यह पहली चीन यात्रा होगी। रिपोर्ट के अनुसार, 28 मार्च को बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात कर सकते हैं। यूनुस सबसे पहले 25 मार्च को हैनान प्रांत में बोआओ फोरम फॉर एशिया (बीएफए) सम्मेलन में भाग लेंगे। बीएफए के महासचिव झांग जून ने मुख्य सलाहकार को चीन में सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। बाद में, चीनी अधिकारियों ने दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 50 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में बीजिंग में यूनुस की मेजबानी करने का प्रस्ताव रखा।

रविवार को द डेली स्टार को ढाका में एक राजनयिक सूत्र ने बताया, हम मुख्य सलाहकार के दौरे की तैयारी कर रहे हैं और सहयोग के संभावित क्षेत्रों की तलाश में हैं, जिसमें द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर की संभावना भी शामिल हैष बीएफए सम्मेलन, जिसे अक्सर ‘एशियन दावोस’ कहा जाता है, चीन के दक्षिणी हैनान प्रांत के बोआओ में होता है। प्रोफेसर यूनुस को बीएफए के महासचिव झांग जुन से निमंत्रण मिला है और वह 26 मार्च की शाम को चीनी अधिकारियों की ओर से आयोजित विशेष उड़ान से हैनान जाएंगे। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, पिछले सप्ताह, ढाका में चीनी दूतावास ने विदेश मंत्रालय को पुष्टि की कि राष्ट्रपति शी के साथ बैठक निर्धारित है। इसके बाद, मुख्य सलाहकार ने अपनी भागीदारी की पुष्टि की।

नई दिल्ली चीन और पाकिस्तान के साथ ढाका के बढ़ते संबंधों पर कड़ी नज़र रख रही है। हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद, बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते खराब हो गए हैं।अभी दो दिन पहले, भारत ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में आरोप लगाया था कि बांग्लादेश पर संयुक्त राष्ट्र की तथ्य-खोजी रिपोर्ट ने “अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ बदले की हिंसा” की अवधारणा को “मुख्यधारा में ला दिया है।”

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बांग्लादेश को तेजी से चीन के करीब ले जा रही है। इसके पहले यूनुस सरकार ने तीस्ता नदी के प्रबंधन के लिए चीन की तरफ हाथ बढ़ाया था। इसके लिए चीन की सरकारी कंपनी को इस साल दिसम्बर तक कॉन्सेप्ट नोट और 2026 के आखिर तक रिसर्च तैयार करने को कहा गया है। यह वही प्रोजेक्ट है, जिसे पूर्व पीएम शेख हसीना की सरकार भारत के साथ आगे बढ़ाना चाहती थी। अब 1 अरब डॉलर की इस परियोजना को लेकर यूनुस सरकार चीन के साथ आगे बढ़ी है।

चीन ने जापान को धमकायाःदिलाई हिरोशिमा-नागासाकी की याद, एटम बम गिराने की दी धमकी

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दुनिया के दो युद्ध पहले से ही जारी है। इस बीच चीन की अकड़ बढ़ती ही जा रही है। ताइवान से बढ़ते तनाव के बीच चीन ने जापान को बड़ी धमकी दी है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने जापान पर एटम हमले की धमकी दी है। ही नहीं, ड्रैगन ने जापान का पुराना जख्म भी कुरेदने की कोशिश भी की है। चीनी विदेश मंत्री ने जापान को हिरोशिमा और नागासाकी की तबाही की याद दिलाई है।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी टैरिफ पर बात करते हुए चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि जापान जल्द ही हिरोशिमा-नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के 80 साल पूरे करने वाला है। हम इस पर संवेदना जाहिर कर रहे हैं। लेकिन समय रहते जापान नहीं सुधरा तो हम 'हिरोशिमा-नागासाकी' से ज्यादा दर्द दे सकते हैं।

चीन के विदेश मंत्री ने कहा कि ताइवान हमारा हिस्सा है। टोक्यो के शह पर उसके लोग उड़ रहे हैं। जापान जानबूझकर चीन में अस्थिरता पैदा करना चाह रहा है।दरअसल, चीन को लगता है कि जापान ताइवान का समर्थन करके उसे कमजोर करने में लगा हुआ है।

ये पहली बार नहीं है जब चीन ने जापान को धमकी दी है।पिछले दिनों चीन ने जापान को डराने के लिए उसके सीमा में फाइटर जेट और जंगी जहाज भेज दिया, जिसके बाद जापान के अधिकारी हरकत में आ गए। जापान ने चीन पर उकसावे का आरोप लगाया।

चीन-अमेरिका में ट्रैरिफ वार, अब ड्रैगन ने अमेरिकी उत्पादों पर लगाया 34 फीसदी जवाबी टैक्स

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अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ वार शुरू हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर लगाए गए टैरिफ के बाद बिजिंग और वाशिंगटन से भिड़ंत हो गयी है। ट्रंप ने 2 अप्रैल को चीन सहित कई देशों पर रेसीप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। ट्रंप के इस फैसले का चीन ने विरोध भी किया था। अब चीन ने अमेरिका को उसकी की भाषा में जवाब दिया है। दरअसल, चीन ने सभी अमेरिकी उत्पादों पर 34 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है।

चीन ने शुक्रवार को सभी अमेरिकी वस्तुओं पर 10 अप्रैल से एक्स्ट्रा टैरिफ बढ़ाने का ऐलान किया है। इतना ही नहीं चीन ने यह भी कहा कि वे अमेरिका से आने वाले मेडिकल सीटी एक्स-रे ट्यूबों की जांच शुरू करेंगे और दो अमेरिकी कंपनियों से पोल्ट्री उत्पादों के आयात पर रोक लगाएंगे।

गैडोलीनियम और यिट्रियम जैसी धातुओं के निर्यात पर भी सख्ती

इसके अलावा चीन ने कहा कि वह 11 अमेरिकी कंपनियों को अपनी “अविश्वसनीय संस्थाओं” की लिस्ट में शामिल कर रहा है। जो उन्हें चीन में या चीनी कंपनियों के साथ व्यापार करने से रोकती हैं। इतना ही नहीं, चीन ने बेशकीमती गैडोलीनियम और यिट्रियम समेत कुछ अन्य धातुओं के निर्यात पर भी सख्ती बरतने का संकेत दिया है। खास बात यह है कि इन सभी धातुओं का खनन चीन में सबसे ज्यादा किया जाता है। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक कारों से लेकर स्मार्ट बमों तक हर चीज में होता है।

पहले अमेरिका ने चलाया टैरिफ वाला चाबुक

अमेरिका ने चीन द्वारा जवाबी टैक्स का ऐलान करने से पहले भारत और चीन समेत अन्य देशों पर 2 अप्रैल से भारी-भरकम टैरिफ लागू किया था। इसमें चीन से आने वाले सामान पर 34% आयात कर लगाने का ऐलान किया था। वहीं यूरोपीय यूनियन से आयात पर 20 फीसदी, दक्षिण कोरियाई के उत्पादों पर 25 फीसदी,ताइवान के उत्पादों पर 32 फीसदी और जापानी उत्पादों पर 24 फीसदी टैक्स लागू करने का ऐलान किया था। इसके अलावा सभी विदेशी ऑटोमोबाइल पर 25 फीसदी का टैरिफ लगाया है। इसके पीछे ट्रंप का तर्क था कि हम सभी देशों के व्यापार और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने को कदम उठाते हैं। उनकी सेना समेत अन्य कामों के लिए खर्चा देते हैं, लेकिन वह हम पर भारी टैरिफ लगाते हैं। अब ऐसा नहीं चलेगा। हम किसी के लिए इतना सब कुछ क्यों करेंगे।

20 जवानों की शहादत का सेलिब्रेशन...”विक्रम मिस्री के चीनी दूतावास जानें पर जमकर बरसे राहुल गांधी

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संसद में इन दिनों वक्फ संशोधन बिल को लेकर बवाल मचा हुआ है। इस बीच गुरूवार को लोकसभा में शून्यकाल के दौरान कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चीनी कब्जे का मुद्दा उठाया। राहुल गांधी ने चीन के राजदूत के साथ विदेश सचिव के केक काटने को लेकर केंद्र सरकार पर जोरदार हमला बोला। लोकसभा में राहुल गांधी ने सवाल दागा कि चीनी दूतावास में क्या हमारे सैनिकों की शहादत का केक काटने गए थे विक्रम मिसरी।

राहुल गांधी ने कहा, चीन ने चार हजार किलोमीटर ले लिए, बीस जवान शहीद हुए, लेकिन विदेश सचिव चीन के राजदूत के साथ केक काट रहे हैं। चीनी दूतावास में क्या हमारे सैनिकों की शहादत का केक काटने गए थे विक्रम मिसरी। बता दें कि केक काटने वाली एक फोटो चीन के एंबेसडर ने 1 अप्रैल को पोस्ट की थी।

एलएसी की स्थिति पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, यथास्थिति बनी रहनी चाहिए और हमें अपनी जमीन वापस मिलनी चाहिए। मुझे यह भी पता चला है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने चीन को पत्र लिखा है। हमें यह बात अपने लोगों से नहीं बल्कि चीनी राजदूत से पता चल रही है जो यह बात कह रहे हैं।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाया और दावा किया कि चीन ने भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है, जिस पर सरकार चुप्पी साधे हुए है। इससे सदन में तीखी बहस छिड़ गई। राहुल का बयान उस संदर्भ में है, जब हाल ही में भारत और चीन के संबंध के 75 साल पूरे हुए और इसके अवसर पर चीनी दूतावास में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें भारत की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिस्री शामिल हुए थे।

“कौन चीन के अधिकारियों के साथ चाइनीज सूप पी रहा था?”

वहीं, अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए कहा कि अक्साई चिन किसकी सरकार में चीन के पास गया है। तब हिंदी चीनी भाई-भाई कहते रहे और आपकी पीठ में छुरा खोंपा गया। डोकलाम की घटना के समय कौन चीन के अधिकारियों के साथ चाइनीज सूप पी रहा था और सेना के जवान के साथ खड़े नहीं हुए।

राजीव गांधी फाउंडेशन पर भी उठाया सवाल

अनुराग ठाकुर ने आगे कहा, जिस संस्था ने चीन के अधिकारियों से पैसा लिया था, क्या राजीव गांधी फाउंडेशन ने पैसा नहीं लिया है, क्यों लिया गया वो पैसा। डोकलाम के समय में चीन को मुंह तोड़ जबाव दिया गया था और रक्षामंत्री के साथ साथ पीएम भी सीमा के जवानों के साथ खड़े थे। हम कह सकते हैं कि एक इंच जमीन भी पीएम मोदी के समय में चीन के हाथ में नहीं गई है। इन लोगों को जवाब देना होगा कि राजीव फाउंडेशन ने पैसा क्यों लिया था?

ट्रंप के टैरिफ के बीच जिनपिंग को आई भारत की याद, चीनी राष्ट्रपति ने क्यों किया ड्रैगन और हाथी का जिक्र?


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हाल के दिनों में भारत और चीन के बीच फिर से रिश्तों में गरमाहट बढ़ती दिख रही है। भारत-चीन राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ पर भी दोनों देशों के बीच दूरियां मिटती दिखीं। भारत-चीन राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर भारत में चीनी राजदूत जू फेइहोंग ने दोनों देशों के भविष्य के बारे में सकारात्मक आशा व्यक्त की। इस दौरान चीनी राजदूत जू ने कहा कि चीन और भारत के नेताओं ने इस खास मौके पर बधाई संदेशों का आदान-प्रदान किया।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के 75 साल के राजनयिक रिश्तों पर एक लेटर लिखा। अपने संदेश में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि चीन और भारत के संबंधों को "ड्रैगन-हाथी टैंगो" का रूप लेना चाहिए। टैंगो इन दोनों प्रतीकात्मक जानवरों के बीच का एक चीनी नृत्य है।

भारतीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से बातचीत करते हुए उन्होंने यह बात कही। भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति मुर्मु को बधाई दी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों को अपने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। साथ ही दोनों देशों को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, आपसी विश्वास और आपसी लाभ की दिशा में आम विकास के लिए साथ आने के तरीके तलाशने चाहिए। 

भारत और चीन को प्राचीन सभ्यताएं बताते हुए शी जिनपिंग ने कहा कि दोनों देश प्रमुख विकासशील देश हैं और ग्लोबल साउथ के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश अपने-अपने आधुनिकीकरण प्रयासों के महत्वपूर्ण चरण में हैं।

शी जिनपिंग और द्रौपदी मुर्मू के अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने भी एक दूसरे को बधाई और शुभकामना संदेश भेजे हैं। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान इस बात पर प्रकाश डाला कि दोनों देश प्राचीन सभ्यताएं हैं और वैश्विक दक्षिण के भीतर महत्वपूर्ण विकासशील देश हैं, जो वर्तमान में महत्वपूर्ण आधुनिकीकरण चरणों से गुजर रहे हैं।

बता दें कि चीन को अक्सर ड्रैगन से जोड़ा जाता है, क्योंकि चीनी संस्कृति में ड्रैगन को एक शक्तिशाली, भाग्यशाली और शुभ जीव माना जाता है, जो शक्ति, भाग्य और सफलता का प्रतीक है।

दूसरी ओर, हाथी को भारत से धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक वजहों से जोड़ा जाता है। वहीं, टैंगो एक अंग्रेजी शब्द है। जिसका मतलब दोस्ताना रिश्ता या नृत्य होता है। शी जिनपिंग का कहना था कि वो भारत के साथ रिश्तों को बेहतर करना चाहते हैं।

मोहम्मद यूनुस ने जल प्रबंधन के लिए चीन से मांगा 50 साल का मास्टर प्लान, भारत के लिए चिंता का विषय

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बांग्लादेश के नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस ने देश के जल प्रबंधन संकट को हल करने के लिए चीन से 50 साल का मास्टर प्लान तैयार करने में मदद मांगी है। इसमें तीस्ता नदी का जल प्रबंधन भी शामिल है। उन्होंने चीन को 'जल प्रबंधन का मास्टर' बताते हुए कहा कि वे चीन से सीखना चाहते हैं कि जल संसाधनों को लोगों के लिए अधिक उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है।

यूनुस चार दिवसीय चीन दौरे पर हैं और शुक्रवार को उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। सरकारी समाचार एजेंसी बांग्लादेश संगबाद संघ (बीएसएस) के मुताबिक, यूनुस ने चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग से मुलाकात के दौरान चीन की बाढ़ और जल प्रबंधन प्रणाली की सराहना की। उन्होंने कहा, हमारे देश में भी वहीं समस्याएं हैं, जो चीन में हैं। इसलिए अगर आप हमारे साथ अपने अनुभव साझा करें, तो हमें खुशी होगी।

उन्होंने तीस्ता नदी से जुड़े मुद्दों पर खास फोकस किया लेकिन यह भी कहा कहा कि बांग्लादेश की समस्या एक नदी तक सीमित नहीं बल्कि, पूरी जल प्रणाली से जुड़ी है। बीएसएस के मुताबिक, चीनी मंत्री इस बात को माना कि चीन और बांग्लादेश दोनों को जल प्रबंधन से जुड़ी समान चुनौतियों का सामना करना पड़ता। उन्होंने बांग्लादेश को तकनीकी सहयोग देने का आश्वासन दिया।

इससे पहले, यूनुस ने जिनपिंग के साथ बैठक की। जिसके बाद दोनों देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया। इसमें कहा गया कि दोनों देश जल विज्ञान पूर्वानुमान, बाढ़ रोकथाम, आपदा प्रबंधन, नदी की खुदाई और जल संसाधन प्रबंधन में सहयोग बढ़ाएंगे। संयुक्त बयान में कहा गया कि बांग्लादेश सरकार ने तीस्ता नदी के समग्र प्रबंधन और पुनरुद्धा परियोजना (टीआरसीएमआरपी) में चीनी कंपनियों की भागीदारी का स्वागत किया है।

बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने अपनी नई दिल्ली यात्रा के दौरान 22 जून, 2024 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में तीस्ता नदी जल प्रबंधन का काम भारत को देने का वादा किया था। दोनों नेताओ में सहमति बनी थी कि जल्द ही एक भारतीय टीम ढाका का दौरा करेगी जो तीस्ता जल प्रबंधन की भावी योजना की रूपरेखा तैयार करेगी। अब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने चीन की कंपनियों को भारत के लिए बेहद संवेदनशील इस नदी परियोजना का काम देने का वादा किया है।

चीन पहले से ही बांग्लादेश में कई इंफ्रास्ट्रक्चर और जल परियोजनाओं में निवेश कर रहा है, जिससे उसकी इस क्षेत्र में पकड़ मजबूत होती जा रही है। यदि चीन बांग्लादेश के जल संसाधन प्रबंधन में प्रमुख भूमिका निभाता है, तो इससे भारत की जल कूटनीति और रणनीतिक हितों पर असर पड़ सकता है। भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर पहले ही मतभेद रहे हैं, और चीन की बढ़ती भागीदारी से यह मुद्दा और जटिल हो सकता है। यदि बांग्लादेश चीन पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तो इससे भारत और बांग्लादेश के बीच जल समझौतों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि भारत अभी स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

कितना अहम है मोहम्मद यूनुस का चीन दौरा, बांग्लादेश को क्या उम्मीदें?

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राजधानी ढाका में सेना की तैनाती, सैन्य अधिकारियों की इमरजेंसी बैठक, छात्रों का विरोध सहित कई अन्य कारणों से बांग्लादेश में फिर से तख्तापलट की चर्चा शुरू हो गई है। इस बीच बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस चीन के दौरे पर हैं। मोहम्मद यूनुस 26 मार्च को चीन पहुंचे हैं। इस दौरान वो हैनान प्रांत में होने वाले बोआओ फोरम में हिस्सा लेंगे, जिसमें एशिया के कई देश हिस्सा ले रहे हैं। इस फोरम में भाग लेने के बाद वो चीन सरकार से मिले आधिकारिक निमंत्रण पर बीजिंग का दौरा करेंगे और 28 मार्च को राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक होगी।

जिनपिंग और मोहम्मद यूनुस के बीच की द्विपक्षीय बैठक करीब 30 मिनट तक चलेगी। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच आमने-सामने की बातचीत होगी। वहीं इस द्विपक्षीय बैठक को वजन देने के लिए अब दोनों ही पक्षों की तरफ से 12-12 अधिकारियों का डेलीगेशन इसमें मौजूद रहेगा। यानि इस द्विपक्षीय बैठक में दोनों राष्ट्राध्यक्षों को मिलाकर 13-13 लोग शामिल होंगे। इस बैठक का मतलब ये है कि चीन, बांग्लादेश को काफी महत्वपूर्ण देश की तरह भाव दे रहा है। जाहिर तौर पर वो भारत के ऊपर बांग्लादेश में कूटनीतिक बढ़त हासिल करना चाहता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बैठक को औपचारिक रूप देकर चीन ने इसके महत्व को बढ़ा दिया है।

दोनों देशों के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक से बांग्लादेश और चीन के संबंध ना सिर्फ काफी मजबूत होने की संभावना है, बल्कि दोनों देशों के बीच नये अवसरों के भी खुलने की संभावना होगी। बांग्लादेशी एक्सपर्ट्स इस बात पर जोर दे रहे हैं कि चीन के साथ संबंध मजबूत होने से वैश्विक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। जाहिर तौर पर उनका इशारा भारत को लेकर है।

भू-राजनीति संतुलन

अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्लेषकों का कहना है कि खासतौर पर अंतरिम सरकार के उच्चतम स्तर का पहला द्विपक्षीय दौरा होने की वजह से यह बैठक बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मुख्य सलाहकार की यात्रा से भू-राजनीति को संतुलित करने में मदद मिल सकती है।

अवामी लीग के सत्ता से बेदखल होने के बाद से बांग्लादेश के पड़ोसी भारत के साथ राजनयिक संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं। दूसरी ओर, अमेरिका के पिछले बाइडन प्रशासन के साथ तो अंतरिम सरकार का मैत्रीपूर्ण संबंध देखने को मिला था। लेकिन इस बारे में मौजूदा ट्रंप प्रशासन की नीति अब भी स्पष्ट नहीं हो सकी है।

विश्लेषकों का कहना है कि एक ओर भारत और चीन के बीच क्षेत्रीय प्रभुत्व के सवाल पर तनातनी चल रही है। दूसरी ओर, वैश्विक स्तर पर चीन और अमेरिका के बीच की खींचतान किसी से छिपी नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट और बढ़ी है। इन वजहों से इस मुद्दे पर भी चर्चा हो रही है कि मोहम्मद यूनुस की चीन यात्रा से बांग्लादेश के पड़ोसी भारत और अमेरिका के साथ संबंधों पर असर पड़ेगा।

आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में उम्मीद

वहीं, विश्लेषकों का ये भी मानना है कि मुख्य सलाहकार के इस दौरे से बांग्लादेश को आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में फायदा मिलने की संभावना ही ज़्यादा है। इस दौरे के दौरान विशेष रूप से व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय विकास के क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से उच्च स्तरीय चर्चा की उम्मीद है।

प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने ऐसे समय में बांग्लादेश की बागडोर संभाली है जब देश की अर्थव्यवस्था कई किस्म के दबावों से जूझ रही है। ऐसे में आर्थिक स्थिति को सुधारना ही उनकी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। विश्लेषकों का कहना है कि देश की मौजूदा आर्थिक परिस्थिति में चीन जैसे बड़े और स्थिर आर्थिक साझेदार के सकारात्मक समर्थन की जरूरत है।

विदेश मंत्रालय के सलाहकार तौहीद अहमद ने बीते रविवार को पत्रकारों को बताया कि मुख्य सलाहकार के इस दौरे के दौरान चीन के साथ किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। लेकिन कुछ सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर ज़रूर किए जा सकते हैं।तौहीद अहमद ने स्थानीय पत्रकारों से कहा था कि चीन के साथ आपसी संबंधों में बांग्लादेश वाणिज्य और निवेश को ही सबसे ज़्यादा अहमियत देगा।

चीन ने वर्ष 1975 में बांग्लादेश को मान्यता देकर राजनयिक संबंध कायम किया था। इस साल दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 50 साल पूरे होने जा रहे हैं। ढाका में चीन के राजदूत याओ वेन के मुताबिक, राजनयिक संबंधों को 50 साल पूरे होने के संदर्भ में प्रोफ़ेसर यूनुस का चीन दौरा मील का पत्थर साबित होगा।

चीन जाने से पहले भारत आना चाहते थे युनूस, दिल्ली ने दिखा दी औकात

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बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस चीन के दौरे पर हैं। खबरों की मानें तो वो चीन से पहले भारत की यात्रा करना चाहते थे। इसके लिए उन्हें अनुरोध भी भेजा गया था, लेकिन भारत सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं मिलने के बाद उन्होंने चीन जाने का फैसला किया।

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक मोहम्मद यूनुस पहले दिल्ली आना चाहते थे और इसके लिए अनुरोध भेजा गया था लेकिन भारत सरकार से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद उन्होंने चीन का दौरा चुनने का फैसला किया। द हिंदू ने मोहम्मद यूनुस के प्रेस सचिव शफीकुल आलम के हवाले से इसकी जानकारी दी है। आलम ने कहा, हमने भारत दौरे में रुचि दिखाई थी। पिछले साल दिसंबर में ही भारतीय पक्ष से मुख्य सलाहकार प्रोफेसर यूनुस की भारत में द्विपक्षीय यात्रा के लिए कहा गया था। यह उनकी चीन यात्रा को अंतिम रूप दिए जाने से कुछ सप्ताह पहले किया गया था। दुर्भाग्य से, हमें कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।

रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि मोहम्मद यूनुस भारत के साथ मधुर द्विपक्षीय संबंध चाहते हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख प्रेस सचिव आलम ने कहा है कि चीन से लौटने के बाद मोहम्मद यूनुस 3 से 4 अप्रैल को बैंकॉक में आयोजित होने वाले बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। उन्होंने कहा कि हमने थाईलैंड में आयोजित होने वाले आगामी बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान प्रोफेसर यूनुस और प्रधानमंत्री मोदी के बीच बैठक के लिए एक और अनुरोध किया है और हम भारत के जवाब मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

बता दें कि मोहम्मद यूनुस 26-29 मार्च तक चीन यात्रा पर हैं। अपने दौरे के दौरान मोहम्मद यूनुस प्रमुख चीनी निवेशकों के साथ बैठक करेंगे। इस दौरान वो चीनी निवेशकों को बांग्लादेश में आमंत्रित करेंगे और चीनी कारोबारियों के लिए बांग्लादेश में एक अनुकूल माहौल बनाने का ऑफर देंगे। ताकि चीनी कंपनियों के लिए बांग्लादेश में कारोबार के लिए एक अच्छा माहौल बनाया जा सके।

चीन-पाक को लेकर सेना प्रमुख का बड़ा बयान, जानें क्या कहा?

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भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चीन और पाकिस्तान को लेकर बड़ा बयान दिया है। सेना प्रमुख ने चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियों को लेकर कहा कि आज उनकी मिलीभगत ने खतरा और बढ़ा दिया है। साथ ही उन्होंने चीन के एक प्रमुख आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरने से जटिलता के बढ़ने की बात कही है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन नियम-आधारित व्यवस्था को चुनौती दे रहा है और विघटनकारी गतिविधियों में आगे बढ़ रहा है।

सेना प्रमुख ने दिल्ली में जनरल बिपिन रावत मेमोरियल लेक्चर में यह बात कही।जनरल द्विवेदी ने कहा,देश कई तरह के प्रयासों के साथ काम कर रहा है, हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सुरक्षा के क्षेत्र में ‘किसी उभरती शक्ति द्वारा किसी मौजूदा शक्ति को हटाने के लिए युद्ध की आशंका’ में फंसना बहुत आसान है। उन्होंने कहा, क्या हम सामाजिक क्षेत्र में अनिवार्य आवश्यकताओं वाले देश के रूप में इस आशंका में फंसने का जोखिम उठा सकते हैं? साथ ही, क्या हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर सकते हैं कि हम एक बेहद अस्थिर पड़ोस में रहते।

सेना प्रमुख ने कहा, जैसा कि जनरल रावत ने कहा था कि जब आपके उत्तर और पश्चिम में अस्थिर सीमाएं होती हैं, तो आप नहीं जानते कि लड़ाई किस तरफ से शुरू होगी और कहां खत्म होगी। इसलिए, आपको दोनों मोर्चों के लिए तैयार रहना चाहिए। आज, उच्च स्तर पर मिलीभगत ने खतरे को और बढ़ा दिया है।

जनरल द्विवेदी ने चीन की गतिविधियों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि चीन मौजूदा विश्व व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। उन्होंने कहा कि चीन के एक प्रमुख आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरने से जटिलता बढ़ रही है, प्रतिस्पर्धा पैदा हो रही और ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने के भारत के प्रयासों में बाधा आ रही है।

इससे पहले आठ मार्च को भी जनरल द्विवेदी ने चीन और पाकिस्तान की करीबी का जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच काफी हद तक मिलीभगत है। इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि चीन और पाकिस्तान की करीबी का मतलब है कि दोनों मोर्चों पर वास्तविक खतरा है। पाकिस्तान में अधिकांश उपकरण चीनी मूल के हैं। इसलिए यह दो-मोर्चे का खतरा और एक वास्तविकता है।

चीन के बाहर पैदा होगा मेरा उत्तराधिकारी” दलाई लामा ने चीन को दे डाली चुनौती

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तिब्बती बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने अपनी नई किताब में कहा है कि उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर पैदा होगा। करीब छह दशक पहले चीन छोड़कर भारत में शरण लेने वाले दलाई लामा की इस किताब वॉयस ऑफ द वॉयसलेस का मंगलवार को लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्र तिब्बत पर नियंत्रण को लेकर चीन के साथ उनकी तनातनी एक बार फिर बढ़ गई है।

दलाई लामा ने ‘वायस फॉर द वायसलेस’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा कि दुनिया भर के तिब्बती चाहते हैं दलाई लामा नामक संस्था उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहे। इस किताब में दलाई लामा ने पहली बार विशिष्ट रूप से साफ किया है कि उनका उत्तराधिकारी ‘स्वतंत्र दुनिया‘ में जन्म लेगा, जो चीन के बाहर है।

दलाई लामा लिखते हैं, "चूंकि पुनर्जन्म का उद्देश्य पूर्ववर्ती के कार्य को आगे बढ़ाना है, इसलिए नए दलाई लामा का जन्म मुक्त विश्व में होगा, ताकि दलाई लामा का पारंपरिक मिशन - यानी सार्वभौमिक करुणा की आवाज बनना, तिब्बती बौद्ध धर्म का आध्यात्मिक नेता और तिब्बती लोगों की आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने वाला तिब्बत का प्रतीक बनना - जारी रहे।"

तिब्बती परंपरा का मानना है कि जब एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु का निधन हो जाता है, तो उसकी आत्मा एक बच्चे के शरीर में पुनर्जन्म लेती है। वर्तमान दलाई लामा, जिन्हें दो साल की उम्र में अपने पूर्ववर्ती के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी गई थी, ने पहले उल्लेख किया था कि आध्यात्मिक नेताओं का वंश उनके साथ समाप्त हो सकता है। लेकिन अपनी किताब में स्पष्ट किया है कि उनके उत्तराधिकारी का जन्म चीन से बाहर होगा।

दलाई लामा का ये बयान टीन की बौखलाहट बढ़ाने वाला है। चीन की बैचेनी की वजह ये है कि 14वें दलाई लामा ने पुष्टि की है कि अगले दलाई लामा का जन्म ‘स्वतंत्र दुनिया’ में होगा। जिससे यह सुनिश्चित होगा कि संस्था चीनी नियंत्रण से परे तिब्बती अधिकारों और आध्यात्मिक नेतृत्व की वकालत करने की अपनी पारंपरिक भूमिका जारी रखेगी। यह बयान बीजिंग के लिए एक सीधी चुनौती है, जो लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि अगले दलाई लामा को मान्यता देने का अंतिम अधिकार उसके पास है। चीन ने तिब्बती नेता की घोषणाओं को खारिज करते हुए जोर दिया है कि किसी भी उत्तराधिकारी को बीजिंग की मंजूरी लेनी होगी।

बता दें कि चीन ने 1950 में तिब्बत पर नियंत्रण हासिल कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप तनाव और प्रतिरोध हुआ। 1959 में, 23 साल की उम्र में, 14वें दलाई लामा, तेनजिन ग्यात्सो, माओत्से तुंग के कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ एक विफल विद्रोह के बाद हजारों तिब्बतियों के साथ भारत भाग गए। चीन दलाई लामा को "अलगाववादी" कहता है और दावा करता है कि वह उनके उत्तराधिकारी का चयन करेगा। हालांकि, 89 वर्षीय ने कहा है कि चीन द्वारा चुने गए किसी भी उत्तराधिकारी को सम्मानित नहीं किया जाएगा।

पाक के बाद चीन के करीब हो रहा बांग्लादेश, भारत के बिगड़ते संबंधों के बीच मोहम्मद यूनुस का चीन दौरा

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शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश के दोस्तो की फेहरिस्त बदल रही है। कभी शेख हसीना के लिए भारत सबसे करीबी दोस्त हुआ करता था। मोहम्मद यूनुस के मुख्य सलाहकार बनते ही यही भारत बांग्लादेश की आंखों को खटकने लगा है। मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान से गलबहियां करने के बाद अब ढाका को बीजिंग के करीब ले जाने में जुट गए हैं। इसी क्रम में मोहम्मद यूनुस चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। मुहम्मद यूनुस द्विपक्षीय बैठक के लिए 26 मार्च को चीन का दौरा करेंगे। यूनुस 26 से 29 मार्च तक चीन के दौरो पर रहेंगे।

नोबेल पुरस्कार विजेता, जिन्होंने शेख हसीना के जाने के बाद बांग्लादेश के अंतरिम नेता के रूप में पदभार संभाला था।7 अगस्त, 2024 को पदभार संभालने के बाद यूनुस की यह पहली चीन यात्रा होगी। रिपोर्ट के अनुसार, 28 मार्च को बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात कर सकते हैं। यूनुस सबसे पहले 25 मार्च को हैनान प्रांत में बोआओ फोरम फॉर एशिया (बीएफए) सम्मेलन में भाग लेंगे। बीएफए के महासचिव झांग जून ने मुख्य सलाहकार को चीन में सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। बाद में, चीनी अधिकारियों ने दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 50 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में बीजिंग में यूनुस की मेजबानी करने का प्रस्ताव रखा।

रविवार को द डेली स्टार को ढाका में एक राजनयिक सूत्र ने बताया, हम मुख्य सलाहकार के दौरे की तैयारी कर रहे हैं और सहयोग के संभावित क्षेत्रों की तलाश में हैं, जिसमें द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर की संभावना भी शामिल हैष बीएफए सम्मेलन, जिसे अक्सर ‘एशियन दावोस’ कहा जाता है, चीन के दक्षिणी हैनान प्रांत के बोआओ में होता है। प्रोफेसर यूनुस को बीएफए के महासचिव झांग जुन से निमंत्रण मिला है और वह 26 मार्च की शाम को चीनी अधिकारियों की ओर से आयोजित विशेष उड़ान से हैनान जाएंगे। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, पिछले सप्ताह, ढाका में चीनी दूतावास ने विदेश मंत्रालय को पुष्टि की कि राष्ट्रपति शी के साथ बैठक निर्धारित है। इसके बाद, मुख्य सलाहकार ने अपनी भागीदारी की पुष्टि की।

नई दिल्ली चीन और पाकिस्तान के साथ ढाका के बढ़ते संबंधों पर कड़ी नज़र रख रही है। हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद, बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते खराब हो गए हैं।अभी दो दिन पहले, भारत ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में आरोप लगाया था कि बांग्लादेश पर संयुक्त राष्ट्र की तथ्य-खोजी रिपोर्ट ने “अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ बदले की हिंसा” की अवधारणा को “मुख्यधारा में ला दिया है।”

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बांग्लादेश को तेजी से चीन के करीब ले जा रही है। इसके पहले यूनुस सरकार ने तीस्ता नदी के प्रबंधन के लिए चीन की तरफ हाथ बढ़ाया था। इसके लिए चीन की सरकारी कंपनी को इस साल दिसम्बर तक कॉन्सेप्ट नोट और 2026 के आखिर तक रिसर्च तैयार करने को कहा गया है। यह वही प्रोजेक्ट है, जिसे पूर्व पीएम शेख हसीना की सरकार भारत के साथ आगे बढ़ाना चाहती थी। अब 1 अरब डॉलर की इस परियोजना को लेकर यूनुस सरकार चीन के साथ आगे बढ़ी है।

चीन ने जापान को धमकायाःदिलाई हिरोशिमा-नागासाकी की याद, एटम बम गिराने की दी धमकी

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दुनिया के दो युद्ध पहले से ही जारी है। इस बीच चीन की अकड़ बढ़ती ही जा रही है। ताइवान से बढ़ते तनाव के बीच चीन ने जापान को बड़ी धमकी दी है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने जापान पर एटम हमले की धमकी दी है। ही नहीं, ड्रैगन ने जापान का पुराना जख्म भी कुरेदने की कोशिश भी की है। चीनी विदेश मंत्री ने जापान को हिरोशिमा और नागासाकी की तबाही की याद दिलाई है।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी टैरिफ पर बात करते हुए चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि जापान जल्द ही हिरोशिमा-नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के 80 साल पूरे करने वाला है। हम इस पर संवेदना जाहिर कर रहे हैं। लेकिन समय रहते जापान नहीं सुधरा तो हम 'हिरोशिमा-नागासाकी' से ज्यादा दर्द दे सकते हैं।

चीन के विदेश मंत्री ने कहा कि ताइवान हमारा हिस्सा है। टोक्यो के शह पर उसके लोग उड़ रहे हैं। जापान जानबूझकर चीन में अस्थिरता पैदा करना चाह रहा है।दरअसल, चीन को लगता है कि जापान ताइवान का समर्थन करके उसे कमजोर करने में लगा हुआ है।

ये पहली बार नहीं है जब चीन ने जापान को धमकी दी है।पिछले दिनों चीन ने जापान को डराने के लिए उसके सीमा में फाइटर जेट और जंगी जहाज भेज दिया, जिसके बाद जापान के अधिकारी हरकत में आ गए। जापान ने चीन पर उकसावे का आरोप लगाया।