भारत के लोकतंत्र में 'CJP मॉडल' का आंदोलन अप्रासंगिक, पीछे विदेशी ताकतों की छाया !
अमित दास
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र की नींव कोई आयातित सिद्धांत नहीं है, इसकी नींव हजारों साल की सहिष्णुता, सह-अस्तित्व और संवैधानिक मूल्यों पर टिकी है। हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में Citizens for Justice and Peace या CJP के नाम पर जिस तरह के आंदोलन, प्रचार और न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है, उस पर गंभीरता से सोचने का समय आ गया है। क्या इस मॉडल का आंदोलन वास्तव में भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए प्रासंगिक है? या इसके पीछे किसी बड़ी विदेशी ताकत की सोची-समझी साजिश काम कर रही है?
सबसे पहले यह समझना होगा कि CJP मॉडल क्या है? इस मॉडल की मुख्य विशेषता है - एक विशेष समुदाय को 'विक्टिम' के रूप में स्थापित करना, राज्य को हमेशा 'अत्याचारी' के रूप में पेश करना, देश की आंतरिक सामाजिक समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाकर भारत की छवि खराब करना और विदेशी अनुदान से पोषित होकर देश की न्याय व्यवस्था और प्रशासन पर लगातार दबाव बनाना। ये सीधे जनता के बीच जाकर काम नहीं करते, ये काम करते हैं कुछ अंग्रेजी जानने वाले एनजीओ, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विदेशी लॉबी के माध्यम से।
भारत का लोकतंत्र इस मॉडल के बिल्कुल विपरीत है। यहां 140 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व है। यहां सुप्रीम कोर्ट से लेकर ग्राम पंचायत तक हर स्तर पर जवाबदेही की व्यवस्था है। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसके लिए संविधान द्वारा दिया गया रास्ता है - थाना, अदालत, मानवाधिकार आयोग। CJP जैसे संगठन उस संवैधानिक रास्ते पर भरोसा न करके सीधे विदेशी संसद, अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्ट या जिनेवा की मानवाधिकार परिषद में भारत के खिलाफ शिकायत करते हैं। क्या यह देश की न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास नहीं है?
दूसरे, इस आंदोलन की अर्थव्यवस्था को देखिए। कई जांचों में सामने आया है कि इस तरह के संगठनों का अधिकांश पैसा फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन जैसी विदेशी संस्थाओं से आता है, जिनका भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप का इतिहास बहुत पुराना है। जब किसी आंदोलन का खर्च विदेशी ताकतें चलाती हैं, तो उसका एजेंडा भी विदेश में ही तय होता है। भारत जैसे एक संप्रभु राष्ट्र में, जहां चुनावों के माध्यम से सरकार बदलती है, वहां विदेशी पैसे से पोषित होकर सरकार के खिलाफ जनमत बनाने की कोशिश लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
तीसरे, यह CJP मॉडल भारत की सामाजिक वास्तविकता को नकारता है। भारत में समस्याएं हैं, दंगे, जात-पात, भेदभाव है - हम इनकार नहीं करते। लेकिन भारत का समाधान भी भारत की मिट्टी से ही निकलता है। रामकृष्ण-विवेकानंद से लेकर गांधीजी, अंबेडकर से लेकर आज के सुप्रीम कोर्ट तक - भारत ने अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही किया है। बाहर से 'जस्टिस' और 'पीस' का ज्ञान आयात करने की हमें जरूरत नहीं है। CJP मॉडल भारत को हमेशा एक कमजोर, विभाजित राष्ट्र के रूप में दिखाना चाहता है, जो 75 साल के लोकतांत्रिक भारत की सफलता को नकारता है।
याद रखना होगा, भारत के लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार सभी को है। किसान आंदोलन हुआ है, छात्र आंदोलन हुआ है - वे मिट्टी के आंदोलन थे, देश के लोगों के आंदोलन थे। लेकिन CJP का आंदोलन मिट्टी का नहीं है, यह डॉक्यूमेंट और डॉलर का आंदोलन है। ये गांव में जाकर लोगों के साथ खड़े नहीं होते, ये दिल्ली के पांच सितारा होटलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं।
इसलिए, अब यह सवाल उठाने का समय आ गया है - जो लोग भारत के लोकतंत्र को कमजोर दिखाना चाहते हैं, क्या वे ही भारत के उदय से डर रहे हैं? जो भारत आज G-20 की अध्यक्षता कर रहा है, चांद पर जा रहा है, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है, उसे रोकने के लिए क्या मानवाधिकारों के मुखौटे के पीछे इस CJP मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है?
भारत की जनता जागरूक है। वह बाहरी उकसावे में भ्रमित नहीं होगी। सरकार को भी चाहिए कि FCRA कानून को और सख्ती से लागू करे और इस तरह के विदेशी अनुदान से चलने वाले संगठनों की पारदर्शिता सुनिश्चित करे। लोकतंत्र में आलोचना तो रहेगी ही, लेकिन वह आलोचना देश के हितों को बेचकर, विदेशी ताकतों की कठपुतली बनकर नहीं की जा सकती।
( यह लेखक के अपने विचार हैं।)
Oct 12 2026, 16:29
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