'टीबी की राजधानी' से कंट्रोल मॉडल बना यूपी, देश के टॉप-6 राज्यों में बनाई जगह
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दीपक कुमार
लखनऊ । उत्तर प्रदेश में देश के सबसे ज्यादा टीबी (क्षय रोग) के मरीज हैं। भारत का हर पांचवां टीबी मरीज यूपी से है। इसलिए उत्तर प्रदेश को 'टीबी की राजधानी' भी कहा जाता है। हालांकि, सबसे ज्यादा मरीज होने के बावजूद राज्य में टीबी पर काबू पाने में लगातार कामयाबी मिल रही है। टीबी की समय पर पहचान, जांच, इलाज और मरीजों को पोषण सहायता मुहैया कराने सहित विभिन्न मानकों पर बेहतर काम के आधार पर उत्तर प्रदेश टीबी पर नियंत्रण के मामले में देश के शीर्ष छह राज्यों में शामिल हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि कि टीबी को पूरी तरह खत्म करने के लिए ज्यादा से ज्यादा मरीजों की पहचान और दवाइयों का पूरा कोर्स करना सबसे कारगर उपाय है।
टीबी मरीजों के ग्राफ में उतार-चढ़ाव
केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में उत्तर प्रदेश में करीब पांच लाख टीबी के मरीज थे। 2023 में इनकी संख्या बढ़कर 6.24 लाख हो गई। 2024 में 6.73 लाख के ज्यादा टीबी के मरीजों की पहचान की गई। जो 2024 के केन्द्रीय टीबी प्रभाग के लक्ष्य से 6.5 लाख से ज्यादा थे। इसके बाद टीबी के मरीजों की संख्या में कमी आई। सात दिसम्बर 2024 से 19 अक्टूबर 2025 के बीच उच्च जोखिम वाले 2.38 करोड़ लोगों की जांच की गई। इसमें 5.14 लाख लोगों में टीबी की पुष्टि हुई।
इस साल टीबी के मरीज घटने का दावा
राज्य क्षय रोग अधिकारी (एसटीओ) डॉ. ऋषि कुमार सक्सेना ने बताया कि उत्तर प्रदेश में इस साल 24 मार्च से जुलाई के पहले हफ्ते तक 31 लाख से अधिक लोगों की टीबी जांच करायी गयी। इसके लिए 25,821 आयुष्मान आरोग्य शिविरों लगाए गए। उच्च जोखिम वाले 26 हजार से अधिक गांवों और वार्डों में से 24 हजार से अधिक क्षेत्रों को कवर किया गया। अभी तक राज्य में टीबी के 1.85 लाख नए मरीज खोजे गए हैं। डॉ.सक्सेना के अनुसार, वर्ष 2025 से अभी तक के आंकड़ों से साबित होता है कि इस साल (2026) भी टीबी के मरीज घटेंगे।
हवाई अड्डों पर यात्रियों की हुई टीबी जांच
एसटीओ ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर टीबी की जांच करने वाला उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है। चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लखनऊ), नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर), लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (वाराणसी) और महायोगी गोरखनाथ हवाई अड्डा (गोरखपुर) पर हैंड हेल्ड एक्स-रे मशीनों से 800 लोगों की टीबी की जांच की गई।
अभियान में जनप्रतिनिधि शामिल
डॉ. सक्सेना के अनुसार, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के करीब 212 मंत्रियों ने 100 दिवसीय गहन टीबी उन्मूलन अभियान में हिस्सा लिया। यूपी समेत देश भर के 182 सांसद, 909 विधायक और विधान परिषद सदस्य, राज्य के 8458 स्कूलों के चार लाख छात्र-छात्राएं, पांच हजार महाविद्यालयों के माध्यम से तीन लाख से अधिक युवा टीबी के खिलाफ चलाए गए जनजागरूकता अभियान से जुड़े।
2.06 लाख से अधिक पोषण किट वितरित
इस दौरान नौ हजार नगरीय निकाय प्रतिनिधियों और 34 हजार पंचायती राज जनप्रतिनिधियों ने गांव-गांव जाकर लोगों को टीबी के बारे में जागरूक किया। वहीं, 13302 टीबी विजेताओं (टीबी से ठीक हो चुके लोगों) ने भी अपने—अपने क्षेत्रों में लोगों को टीबी के प्रति जागरूक किया। उन्होंने बताया कि मरीजों को पोषण और सामाजिक सहायता देने के लिए 5 हजार से अधिक नए निक्षय मित्रों का पंजीकरण किया गया। इनकी मदद से अब तक 2.06 लाख से अधिक पोषण किट वितरित की जा चुकी हैं।
शरीर के हर अंग में हो सकती है टीबी
बलरामपुर अस्पताल के वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आनंद कुमार गुप्ता ने बताया कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है। यह माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु से होती है। उन्होंने बताया कि बाल और नाखून को छोड़कर शरीर के किसी भी हिस्से में टीबी हो सकती है। लगभग 90 प्रतिशत मामलों में टीबी फेफड़ों में होती है, जिसे पल्मोनरी टीबी कहा जाता है। टीबी का जीवाणु फेफड़ों की जगह शरीर के अन्य अन्य अंगों को प्रभावित करता है तो यह एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (EPTB) कहलाती है।
हर संक्रमित व्यक्ति नहीं होता टीबी मरीज
डॉ. गुप्ता के मुताबिक, टीबी के जीवाणु से संक्रमित हर व्यक्ति बीमार नहीं पड़ता। संक्रमण और बीमारी अलग—अलग हैं। जब टीबी का जीवाणु शरीर में जाने पर निष्क्रिय (सुप्त) रहता है, वह लेटेंट टीबी होती है। इसमें कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ महसूस करता है और उसे कोई बीमारी नहीं होती। रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर जीवाणु शरीर में पनपने पर फेफड़ों या अन्य अंगों को प्रभावित करता है। उन्होंने बताया कि केवल 10 प्रतिशत लोगोंं को ही सक्रिय टीबी होती हैं। टीबी के इलाज में लापरवाही से यह बीमारी घातक हो सकती है।
अधूरा इलाज खतरनाक
क्षय रोग विशेषज्ञ ने बताया कि टीबी का मरीज जब छींकता, खांसता, हंसता या थूकता है, तो हवा में ड्रापलेट से टीबी के जीवाणु फैलते हैं। जीवाणुओं के साथ हवा में सांस लेने वाला कोई भी व्यक्ति संक्रमित हो सकता है। उन्होंने बताया कि टीबी का इलाज पूरी तरह संभव है। बशर्ते मरीज छह महीने तक नियमित दवाइयां लें। बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बंद करने से बीमारी दोबारा और ज्यादा गंभीर रूप एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट) टीबी में लौट सकती है। रिकार्ड के अनुसार, बलरामपुर अस्पताल की ओपीडी में रोजाना सात से आठ टीबी के मरीज आ रहे हैं।![]()


दीपक कुमार

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Jul 13 2026, 17:18
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