उद्धव ठाकरे की शिवसेना में दरार, संसदीय दल की बैठक से सांसद नदारद, 9 में से 6 ने दिया धोखा
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महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) एक बार फिर गहरे संकट में है। उद्धव ठाकरे को कुछ ही वर्षों के अंदर दूसरा जोरदार झटका लगने के आसार काफी बढ़ गए हैं। उद्धव ने पार्टी में बगावत की खबरों के बीच शिवसेना-यूबीटी के लोकसभा सांसदों की गुरुवार को नई दिल्ली में बैठक बुलाई थी। इसमें सभी 9 सांसदों को अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने को कहा गया था। पार्टी हाईकमान के आदेशों के बावजूद 9 में से सिर्फ 3 सांसद ही बैठक में शामिल हुए।
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गैरहाजिर सांसदों से होगा जवाब तलब
बगावत और कुछ सांसदों के पार्टी बैठक से गैरहाजिर रहने के बीच पार्टी ने सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। पार्टी नेता अनिल देसाई ने कहा कि बैठक में शामिल नहीं होने वाले सांसदों को नोटिस जारी किया जाएगा। उन्होंने बताया कि लोकसभा में पार्टी के नेता अरविंद सावंत गैरहाजिर सांसदों से जवाब तलब करेंगे। अनिल देसाई ने कहा कि पार्टी की बैठक की सूचना सभी सांसदों को पहले से दी गई थी और विधिवत व्हिप भी जारी किया गया था। इसके बावजूद कुछ सांसद बैठक में नहीं पहुंचे, जिसे पार्टी विरोधी गतिविधि माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि संबंधित सांसदों से पूछा जाएगा कि नोटिस और व्हिप जारी होने के बावजूद वे बैठक में क्यों नहीं आए।
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सदस्यता रद्द करने पर होगा विचार-संजय राउत
बैठक में शामिल नहीं होने वाले सांसद नागेश आष्टीकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे हैं। इन सभी के पार्टी से अलग गुट बनाने की चर्चा है। बैठक में तीन लोकसभा सांसद- अरविंद सावंत, राजभाऊ वाजे और अनिल देसाई शामिल हुए। संजय राउत खुद राज्यसभा सदस्य के तौर पर इस बैठक में मौजूद थे। राउत ने साफ तौर पर कहा कि जो सांसद इस बैठक में नहीं आए, उन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया है। पार्टी ने अब इन सांसदों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके जवाब मांगा जाएगा। उन्होंने कहा पार्टी उनकी सदस्यता रद्द करने पर भी विचार करेंगी।
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शिवसेना में टूट का इतिहास
महाराष्ट्र की राजनीति में खुद को बाघ के रूप में पेश करने वाली शिवसेना में टूट का इतिहास बनता जा रहा है। शिवसेना के स्थापना काल के बाद पार्टी में पहली बार 1991 में छगन भुजबल ने 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़ी थी। भुजबल ने बालासाहेब ठाकरे की कार्यशैली और पार्टी में अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए बगावत की थी। तब भुजबल ने कांग्रेस का दामन थामा था जो शिवसेना के इतिहास का पहला बड़ा राजनीतिक विद्रोह था। लेकिन, 2003 में उद्धव ठाकरे के शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी चार बार टूटी। 2005 में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने उद्धव को पार्टी का उत्तराधिकारी बनाने का विरोध किया और पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
असली झटका जून 2022 में लगा
दूसरा विद्रोह 2006 में हुआ था जब चचेरे भाई राज ठाकरे ने अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की स्थापना की थी। असली झटका जून 2022 में लगा, जब एकनाथ शिंदे ने 40 विधायकों के साथ बगावत की थी। इस विद्रोह से उद्धव का सीएम पद, पार्टी का नाम और चुनाव निशान भी छिन गया। इस टूट के बाद ही उद्धव की शिवसेना (यूबीटी) लोकसभा चुनाव में 9 और विधानसभा चुनाव में 20 सीटों तक ही सिमट कर रह गई।






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6 hours ago
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