235 पेड़ों को बचाने सड़क पर उतरी गांधीगिरी
इंदौर के रीगल चौराहे पर 16 दिन से जारी है शांतिपूर्ण धरना
इंदौर। विकास के नाम पर लगातार सिमटती हरियाली के बीच इंदौर में पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी और प्रेरक मिसाल सामने आई है। शहर के व्यस्ततम रीगल चौराहे पर मेट्रो परियोजना के तहत प्रस्तावित पेड़ कटाई के विरोध में जागरूक नागरिकों ने गांधीगिरी का रास्ता अपनाते हुए पिछले 16 दिनों से लगातार धरना शुरू कर रखा है। प्रदर्शनकारी पेड़ों के बीच ही बिस्तर बिछाकर दिन-रात उनकी निगरानी कर रहे हैं, ताकि उन्हें किसी भी समय काटा न जा सके।
देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में हरियाली का दायरा घटकर महज 9 प्रतिशत रह गया है। इसके बावजूद मेट्रो रेल परियोजना के अंतर्गत रीगल चौराहे के रानी सराय क्षेत्र में प्रस्तावित अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशन के लिए यहां मौजूद 235 हरे-भरे पेड़ों को काटने की तैयारी की जा रही है। खास बात यह है कि इन पेड़ों पर प्रतिदिन शाम को हजारों तोते बसेरा करते हैं, जिनके जीवन पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
पेड़ों को बचाने की इस मुहिम की अगुवाई जनहित पार्टी के अभय जैन कर रहे हैं। उन्होंने जिला प्रशासन, नगर निगम और मेट्रो रेल प्रबंधन को कई बार ज्ञापन सौंपे, लेकिन जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो 1 जनवरी से शांतिपूर्ण धरना शुरू कर दिया। उनके साथ कई पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय नागरिक लगातार डटे हुए हैं। अब इस आंदोलन को उन राहगीरों का भी समर्थन मिलने लगा है, जो किसी अन्य कार्य से यहां आते हैं लेकिन पेड़ों को बचाने के उद्देश्य से जुड़ रहे हैं।
धरना स्थल पर 235 पेड़ों का विस्तृत पंचनामा तैयार किया गया है, जिसमें उनकी प्रजाति, पर्यावरणीय उपयोगिता और उन्हें न काटने की अपील दर्ज की गई है। पूरे क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े स्लोगन और जागरूकता संदेश लिखे गए हैं, जो लोगों का ध्यान इस आंदोलन की ओर आकर्षित कर रहे हैं।
अभय जैन का कहना है:
“सभी जिम्मेदार अधिकारियों को ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं। इसके साथ ही इंदौर हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दाखिल की गई है, जिसकी सुनवाई शीघ्र होगी। 16 दिन और 16 रात से धरना इसलिए जारी है ताकि पेड़ दिन या रात किसी भी समय चोरी-छिपे न काटे जा सकें और हजारों तोतों की जान बचाई जा सके।”
वहीं मेट्रो रेल कंपनी के जनसंपर्क अधिकारी हिमांशु ग्रोवर का कहना है कि,
“इस विषय में कोई भी निर्णय शीर्ष प्रबंधन स्तर पर ही लिया जा सकता है।”
पर्यावरणविदों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि जयपुर, कानपुर, लखनऊ और पुणे जैसे शहरों में मेट्रो परियोजनाओं पर भारी निवेश के बावजूद यात्री संख्या अपेक्षा से कम रही है। इसके बावजूद हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लेकर ऐसी योजनाएं लागू की जा रही हैं, जिनकी कीमत शहरों को अपनी हरियाली गंवाकर चुकानी पड़ रही है।
पर्यावरणविद मनीष काले का कहना है:
“मेट्रो जैसी परियोजनाएं अब फैशन आइकॉन बनती जा रही हैं। यह पश्चिमी विकास मॉडल है, जो कर्ज पर आधारित है। इसके बदले पेड़-पौधों का विनाश भविष्य में गंभीर संकट खड़ा करेगा। दिल्ली में सांसों का संकट इसका उदाहरण है। यदि इंदौर में भी हरियाली खत्म हुई, तो आने वाले समय में यहां भी वही हालात बन सकते हैं।”
फिलहाल रीगल चौराहे पर जारी यह गांधीगिरी विकास बनाम पर्यावरण के सवाल को एक बार फिर केंद्र में ले आई है और यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या विकास की कीमत प्रकृति की बलि देकर चुकाई जानी चाहिए।
4 min ago
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