/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs1/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs4/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs5/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs1/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs4/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs5/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs1/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs4/1630055818836552.png/home/streetbuzz1/public_html/ajaydev/system/../storage/avatars/thumbs5/1630055818836552.png StreetBuzz s:vande
वंदे मातरम्' के छंदों पर छिड़ी सियासी लड़ाई, जानें क्या है नौ दशक पुराना 1937 का प्रस्ताव?

#vandemataram2versesvs6verses1937congress_resolution

राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के छंदों पर देश में विवाद मचा हुआ है। विवाद की शुरुआत स्वतंत्रता दिवस के दिन कांग्रेस मुख्यालय में तिंरगा फहराने के बाद इस गीत के गायन से हुई। कार्यक्रम के दौरान सोनिया गांधी के व्यवहार का वीडिया सामने आने के बाद बवाल मच गया। इस वीडियो में दिख रहा है कि गीत की पहली दो लाइनों के गायन के बाद सोनिया गांधी बात करने लगती हैं। जबकि नए नियम के तहत इस पूरे गीत का गायन करना अनिवार्य है। इस बीच कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस पार्टी ने ये फैसला लेते हुए अपने क़रीब नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया है।

1937 के प्रस्ताव को ही मानेगी कांग्रेस

पूरा मामला स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस ऑफिस में झंडोत्तोलन के दौरान पूरा वंदे मातरम् गीत बजने पर शुरू हुआ। जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने इस गीत के दो पैराग्राफ के बाद भी इसे गाते रहने पर आपत्ति जताई। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत का अपमान करने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने जवाब में स्पष्ट किया कि उसके आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी के फैसले को आधार बनाया है। यही पुराना फैसला अब दो पद बनाम छह पद की राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

कांग्रेस का 1937 का प्रस्ताव क्या था?

1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया था। बाकी चार पदों को इस रूप में स्वीकार नहीं किया गया। उस समय गीत के आगे के हिस्से में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों को लेकर आपत्ति सामने आई थी। कांग्रेस का तर्क है कि उस समय महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख नेताओं से जुड़े फैसले के तहत शुरुआती दो पदों को ही अपनाया गया था। इसलिए पार्टी आज भी उसी परंपरा का पालन कर रही है।

'वंदे मातरम्' स्वदेशी आंदोलन के नारों की गूंज

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1875 में संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में 'वंदे मातरम्' गीत की रचना की थी। बाद में इसे उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास 'आनंद मठ' में शामिल किया था। 18वीं सदी के अंतिम दौर की कहानी कहने वाले 'आनंद मठ' उपन्यास की पृष्ठभूमि संन्यासी विद्रोह है। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में शासन के शुरुआती दशकों में इसके ख़िलाफ़ बंगाल में संन्यासी विद्रोह हुआ था। 'वंदे मातरम्' गीत 1905 से 1908 के दौरान हुए स्वदेशी आंदोलन में एक नारे के रूप में भी गूंजा और यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहराई से जुड़ता चला गया। 1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था कि जब भी किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम में वंदे मातरम् गीत को गाया जाए तब सिर्फ़ पहले दो अंतरे ही गाए जाएं। इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि गीत के पहले दो अंतरों में ऐसा कुछ नहीं है जिसे लेकर किसी को आपत्ति हो और बाद के अंतरे बहुत चर्चित नहीं हैं।

वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य

बता दें कि 'वंदे मातरम्' के पूर्ण संस्करण को हाल ही में राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है। इसके तहत सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य किया गया है। केंद्र सरकार ने 28 जनवरी को जारी दिशा-निर्देशों में वंदे मातरम् के सभी छह पदों के गायन की व्यवस्था का उल्लेख किया। जब जन गण मन के साथ वंदे मातरम् बजाया जाएगा, तो पहले राष्ट्रगीत के सभी छह पद गाए जाने की बात कही गई है। इससे पहले शुरुआती दो पदों के इस्तेमाल की व्यवस्था बताई गई थी।

कांग्रेस ने वंदे मारतम् के दो टुकड़े किए...” अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- 1937 वाली नीति नहीं चलेगी

#congresssplitvandemataramintwoamit_shah

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस के रुख पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के दो टुकड़ किए हैं। यह देश विरोधी फैसला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का महान वंदेमातरम गीत के दो ही छंद गाने का फैसला तुष्टिकरण की राजनीति है।

वंदे मातरम के दो टुकड़े कर विभाजन की नींव डाली

तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने 1937 के अपने प्रस्ताव को आधार बनाते हुए वंदे मातरम के केवल दो पद गाने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में मुसलमानों को खुश करने के लिए वंदे मातरम को बांटने का फैसला किया गया था और इससे देश के विभाजन की नींव पड़ी।

1937 के गलत फैसले को 80 साल बाद सुधारा-अमित शाह

अमित शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति में लिए गए फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि देश में तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी। उनके 1937 में लिए गए फैसले को पीएम मोदी ने आजादी के 80 साल बाद सुधारा है। गृह मंत्री ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए कांग्रेस की उस गलती को सुधारा है और इसे कानूनी आधार भी दिया है।

कानून को नकार रही कांग्रेस-अमित शाह

शाह ने कहा कि कांग्रेस एक तरफ अपने 1937 के प्रस्ताव को लागू कर रही है, जबकि दूसरी तरफ संसद द्वारा बनाए गए कानून को नकार रही है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक बार फिर तुष्टिकरण की राजनीति को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा, देश एक बार वंदे मातरम को दो हिस्सों में बंटने देने की गलती कर चुका है और हमने इसके नतीजे भुगते हैं। शाह ने लोगों से कांग्रेस के इस फैसले के खिलाफ एकजुट होने की अपील की

क्या है वंदे मातरम् पर कांग्रेस का फैसला?

दरअसल, कांग्रेस ने बुधवार को कहा था कि वह ‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और उस समय के अन्य प्रमुख नेताओं द्वारा किए गए फैसले का पूरी तरह पालन करेगी। इसी के अनुरूप पार्टी कार्यकर्ता राष्ट्रगीत के सिर्फ दो अंतरे ही गाएंगे। वंदे मातरम् में 6 अंतरा हैं। कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में इसको लेकर चर्चा हुई और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 1937 के सीडब्ल्यूसी के उस प्रस्ताव के कुछ अंश भी पढ़े जो महान नेताओं की मौजूदगी में पारित हुआ था और जिसमें वंदे मातरम् के दो अंतरों के गायन का निर्णय लिया गया था।

एनडीए के 'मंगल मिलन' में पीएम नरेंद्र मोदी ने लहाराया तिरंगा, एकजुटता का दिया संदेश

#ndamangalmilanpmnarendramodivandemataramwave_tiranga

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सांसदों की मंगल बैठक 'वंदे मातरम' नारे के साथ शुरू हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और एनडीए के अन्य नेता तिरंगा लहराते नजर आए।

नई दिल्ली में मंगलवार को संसद पुस्तकालय में ‘मंगल मिलन’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। एनडीए की मंगल मिलन बैठक में अलग ही नजारा देखने को मिला। पीएम मोदी की अगुवाई में वहां मौजूद सभी सांसदों ने तिरंगा लहराया। गृह मंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा, नितिन गडकरी समेत तमाम नेता तिरंगा लहराते नजर आए।

वंदे मातरम् के नारे लगाए गए

इस दौरान वहां वंदे मातरम् के नारे लगाए गए। 15 अगस्त से पहले आखिरी मंगलवार को हुई बैठक में सभी सांसदों ने एक साथ तिरंगा लहराया और वंदे मातरम् के नारे लगाए। पूरा हॉल देशभक्ति से सराबोर दिखाई दे रहा था। बता दें कि देशभर में दस से सत्रह अगस्त तक तिरंगा यात्रा का आयोजन हो रहा है। इस दौरान मंगल मिलन बैठक में भी अनोखा नजारा देखने को मिला।

'मंगल मिलन' बैठक का मकसद क्या है?

'मंगल मिलन' बैठक वास्तव में एनडीए संसदीय दल की साप्ताहिक रणनीति बैठक का बदला हुआ नाम है। इसका मकसद रचनात्मक चर्चा को बढ़ावा देना और गठबंधन के सहयोगियों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना है। संसद सत्र के दौरान रोजाना सदन की रणनीति तैयार करने और अलग-अलग दलों के बीच सहमति बनाने के अलावा, 'मंगल मिलन' बैठक एनडीए के सहयोगी दलों के साथ समन्वय बढ़ाने का माध्यम भी है।

वंदे मातरम्' के छंदों पर छिड़ी सियासी लड़ाई, जानें क्या है नौ दशक पुराना 1937 का प्रस्ताव?

#vandemataram2versesvs6verses1937congress_resolution

राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के छंदों पर देश में विवाद मचा हुआ है। विवाद की शुरुआत स्वतंत्रता दिवस के दिन कांग्रेस मुख्यालय में तिंरगा फहराने के बाद इस गीत के गायन से हुई। कार्यक्रम के दौरान सोनिया गांधी के व्यवहार का वीडिया सामने आने के बाद बवाल मच गया। इस वीडियो में दिख रहा है कि गीत की पहली दो लाइनों के गायन के बाद सोनिया गांधी बात करने लगती हैं। जबकि नए नियम के तहत इस पूरे गीत का गायन करना अनिवार्य है। इस बीच कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस पार्टी ने ये फैसला लेते हुए अपने क़रीब नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया है।

1937 के प्रस्ताव को ही मानेगी कांग्रेस

पूरा मामला स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस ऑफिस में झंडोत्तोलन के दौरान पूरा वंदे मातरम् गीत बजने पर शुरू हुआ। जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने इस गीत के दो पैराग्राफ के बाद भी इसे गाते रहने पर आपत्ति जताई। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत का अपमान करने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने जवाब में स्पष्ट किया कि उसके आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी के फैसले को आधार बनाया है। यही पुराना फैसला अब दो पद बनाम छह पद की राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

कांग्रेस का 1937 का प्रस्ताव क्या था?

1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया था। बाकी चार पदों को इस रूप में स्वीकार नहीं किया गया। उस समय गीत के आगे के हिस्से में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों को लेकर आपत्ति सामने आई थी। कांग्रेस का तर्क है कि उस समय महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख नेताओं से जुड़े फैसले के तहत शुरुआती दो पदों को ही अपनाया गया था। इसलिए पार्टी आज भी उसी परंपरा का पालन कर रही है।

'वंदे मातरम्' स्वदेशी आंदोलन के नारों की गूंज

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1875 में संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में 'वंदे मातरम्' गीत की रचना की थी। बाद में इसे उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास 'आनंद मठ' में शामिल किया था। 18वीं सदी के अंतिम दौर की कहानी कहने वाले 'आनंद मठ' उपन्यास की पृष्ठभूमि संन्यासी विद्रोह है। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में शासन के शुरुआती दशकों में इसके ख़िलाफ़ बंगाल में संन्यासी विद्रोह हुआ था। 'वंदे मातरम्' गीत 1905 से 1908 के दौरान हुए स्वदेशी आंदोलन में एक नारे के रूप में भी गूंजा और यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहराई से जुड़ता चला गया। 1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था कि जब भी किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम में वंदे मातरम् गीत को गाया जाए तब सिर्फ़ पहले दो अंतरे ही गाए जाएं। इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि गीत के पहले दो अंतरों में ऐसा कुछ नहीं है जिसे लेकर किसी को आपत्ति हो और बाद के अंतरे बहुत चर्चित नहीं हैं।

वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य

बता दें कि 'वंदे मातरम्' के पूर्ण संस्करण को हाल ही में राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है। इसके तहत सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य किया गया है। केंद्र सरकार ने 28 जनवरी को जारी दिशा-निर्देशों में वंदे मातरम् के सभी छह पदों के गायन की व्यवस्था का उल्लेख किया। जब जन गण मन के साथ वंदे मातरम् बजाया जाएगा, तो पहले राष्ट्रगीत के सभी छह पद गाए जाने की बात कही गई है। इससे पहले शुरुआती दो पदों के इस्तेमाल की व्यवस्था बताई गई थी।

कांग्रेस ने वंदे मारतम् के दो टुकड़े किए...” अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- 1937 वाली नीति नहीं चलेगी

#congresssplitvandemataramintwoamit_shah

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस के रुख पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के दो टुकड़ किए हैं। यह देश विरोधी फैसला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का महान वंदेमातरम गीत के दो ही छंद गाने का फैसला तुष्टिकरण की राजनीति है।

वंदे मातरम के दो टुकड़े कर विभाजन की नींव डाली

तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने 1937 के अपने प्रस्ताव को आधार बनाते हुए वंदे मातरम के केवल दो पद गाने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में मुसलमानों को खुश करने के लिए वंदे मातरम को बांटने का फैसला किया गया था और इससे देश के विभाजन की नींव पड़ी।

1937 के गलत फैसले को 80 साल बाद सुधारा-अमित शाह

अमित शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति में लिए गए फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि देश में तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी। उनके 1937 में लिए गए फैसले को पीएम मोदी ने आजादी के 80 साल बाद सुधारा है। गृह मंत्री ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए कांग्रेस की उस गलती को सुधारा है और इसे कानूनी आधार भी दिया है।

कानून को नकार रही कांग्रेस-अमित शाह

शाह ने कहा कि कांग्रेस एक तरफ अपने 1937 के प्रस्ताव को लागू कर रही है, जबकि दूसरी तरफ संसद द्वारा बनाए गए कानून को नकार रही है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक बार फिर तुष्टिकरण की राजनीति को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा, देश एक बार वंदे मातरम को दो हिस्सों में बंटने देने की गलती कर चुका है और हमने इसके नतीजे भुगते हैं। शाह ने लोगों से कांग्रेस के इस फैसले के खिलाफ एकजुट होने की अपील की

क्या है वंदे मातरम् पर कांग्रेस का फैसला?

दरअसल, कांग्रेस ने बुधवार को कहा था कि वह ‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और उस समय के अन्य प्रमुख नेताओं द्वारा किए गए फैसले का पूरी तरह पालन करेगी। इसी के अनुरूप पार्टी कार्यकर्ता राष्ट्रगीत के सिर्फ दो अंतरे ही गाएंगे। वंदे मातरम् में 6 अंतरा हैं। कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में इसको लेकर चर्चा हुई और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 1937 के सीडब्ल्यूसी के उस प्रस्ताव के कुछ अंश भी पढ़े जो महान नेताओं की मौजूदगी में पारित हुआ था और जिसमें वंदे मातरम् के दो अंतरों के गायन का निर्णय लिया गया था।

एनडीए के 'मंगल मिलन' में पीएम नरेंद्र मोदी ने लहाराया तिरंगा, एकजुटता का दिया संदेश

#ndamangalmilanpmnarendramodivandemataramwave_tiranga

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सांसदों की मंगल बैठक 'वंदे मातरम' नारे के साथ शुरू हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और एनडीए के अन्य नेता तिरंगा लहराते नजर आए।

नई दिल्ली में मंगलवार को संसद पुस्तकालय में ‘मंगल मिलन’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। एनडीए की मंगल मिलन बैठक में अलग ही नजारा देखने को मिला। पीएम मोदी की अगुवाई में वहां मौजूद सभी सांसदों ने तिरंगा लहराया। गृह मंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा, नितिन गडकरी समेत तमाम नेता तिरंगा लहराते नजर आए।

वंदे मातरम् के नारे लगाए गए

इस दौरान वहां वंदे मातरम् के नारे लगाए गए। 15 अगस्त से पहले आखिरी मंगलवार को हुई बैठक में सभी सांसदों ने एक साथ तिरंगा लहराया और वंदे मातरम् के नारे लगाए। पूरा हॉल देशभक्ति से सराबोर दिखाई दे रहा था। बता दें कि देशभर में दस से सत्रह अगस्त तक तिरंगा यात्रा का आयोजन हो रहा है। इस दौरान मंगल मिलन बैठक में भी अनोखा नजारा देखने को मिला।

'मंगल मिलन' बैठक का मकसद क्या है?

'मंगल मिलन' बैठक वास्तव में एनडीए संसदीय दल की साप्ताहिक रणनीति बैठक का बदला हुआ नाम है। इसका मकसद रचनात्मक चर्चा को बढ़ावा देना और गठबंधन के सहयोगियों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना है। संसद सत्र के दौरान रोजाना सदन की रणनीति तैयार करने और अलग-अलग दलों के बीच सहमति बनाने के अलावा, 'मंगल मिलन' बैठक एनडीए के सहयोगी दलों के साथ समन्वय बढ़ाने का माध्यम भी है।