फाइलों पर ‘रेट’ के आरोप! ₹2 हजार से शुरू हुआ खेल, ₹15 हजार पर अटकी रिपोर्ट; दूसरी फाइल में ₹7,500 का दावा
चकरोट की रिपोर्ट के नाम पर रकम लेने का आरोप, कृषक दुर्घटना बीमा की फाइल में भी लेन-देन का दावा; तहसील सभागार में अधिकारियों के सामने फूट-फूटकर रोया पीड़ित
अमृतपुर फर्रुखाबाद
अमृतपुर तहसील में राजस्व विभाग से जुड़ी दो अलग-अलग फाइलों को लेकर सामने आए कथित लेन-देन के आरोपों ने तहसील की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मामले में चकरोट की रिपोर्ट लगाने के नाम पर ₹2 हजार लेने और बाद में अंतिम रिपोर्ट के लिए ₹15 हजार मांगने का आरोप है। वहीं, कृषक दुर्घटना बीमा की फाइल में ₹7,500 लिए जाने का दावा सामने आया है। फाइल निरस्त होने के बाद रकम वापस मांगने पहुंचे पीड़ित की फरियाद उस समय भावुक हो गई, जब वह तहसील सभागार में अधिकारियों के सामने फूट-फूटकर रो पड़ा।
पहला मामला अमैयापुर गांव के मजरा कन्हई की मड़ैया निवासी मूलचंद पुत्र रामभरोसे से जुड़ा है। मुख्यमंत्री पोर्टल पर की गई शिकायत में उन्होंने बताया कि ग्राम पंचायत बड़ागांव परतापुर के चकरोट के लिए नक्शा दुरुस्तीकरण की फाइल लगाई थी। आरोप है कि संबंधित लेखपाल गौरव यादव ने रिपोर्ट लगाने के नाम पर ₹2 हजार लिए, लेकिन रिपोर्ट नहीं लगाई। रकम वापस मांगने पर कानूनगो से संपर्क करने को कहा गया। मूलचंद का आरोप है कि कानूनगो से संपर्क करने पर अंतिम रिपोर्ट लगाने के लिए ₹15 हजार की मांग की गई।
दूसरा मामला कुतूलूपुर निवासी श्रीदेवी पत्नी सुरेंद्र शर्मा के परिवार से जुड़ा है। उनके पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद कृषक दुर्घटना बीमा योजना के तहत सहायता के लिए फाइल लगाई गई थी। परिवार का आरोप है कि संबंधित लेखपाल धीरेन ने फाइल के सिलसिले में रकम ली। पीड़ित के अनुसार, ब्याज पर रुपये लेकर पहले ₹5 हजार, फिर ₹2 हजार और फाइल फीडिंग के नाम पर ₹500 दिए गए।
बाद में बटाईदार होने के आधार पर फाइल निरस्त होने की जानकारी मिली। इसके बाद पीड़ित तहसील पहुंचा और कथित तौर पर दिए गए रुपये वापस मांगने लगा। मामला तहसील सभागार तक पहुंचा तो पीड़ित अधिकारियों के सामने अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते रो पड़ा। उसकी गुहार थी—“साहब, योजना का लाभ नहीं मिला तो हमारे पैसे ही वापस करा दो।”
घटनाक्रम के दौरान पीड़ित को हवालात में बंद किए जाने के निर्देश दिए जाने की बात भी सामने आई। पीड़ित का कहना था कि वह किसी विवाद के लिए नहीं, बल्कि कथित तौर पर दिए गए अपने रुपये वापस मांगने अधिकारियों के पास आया था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ऐसे आरोप तहसील दिवस से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक पहुंच रहे हैं तो तहसील स्तर पर इन शिकायतों को लेकर तत्काल और निष्पक्ष संज्ञान क्यों नहीं लिया जाता? शिकायतें उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी स्पष्ट कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं करते?
यदि आरोप निराधार हैं तो जांच कर शिकायतकर्ताओं के सामने स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जाती और यदि आरोपों में प्रथम दृष्टया सच्चाई है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी? आखिर सरकारी योजनाओं और राजस्व संबंधी कार्यों की फाइलों के निस्तारण के बीच कथित रकम के आरोप बार-बार क्यों सामने आ रहे हैं?
सवाल यह भी है कि उच्च अधिकारी आखिर किस बात पर मौन हैं—शिकायतों की जांच का इंतजार है या फिर फाइलों के साथ ये आरोप भी किसी दूसरी जांच फाइल में दबकर रह जाएंगे?
Sep 09 2026, 15:32
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