“घोषणाओं की सरकार, जवाबों से भागते मुख्यमंत्री, किसानों के साथ खुला अन्याय”

भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के हालिया किसान संबोधन पर तीखी और आक्रामक प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह भाषण केवल घोषणाओं का पुलिंदा था, जिसमें किसानों के ज्वलंत सवालों से सुनियोजित तरीके से बचने की कोशिश की गई।
श्री पटवारी ने कहा कि मुख्यमंत्री ने बिजली, स्लॉट बुकिंग, खरीदी लक्ष्य, दुग्ध, सोलर पंप, भावांतर, दलहन-तिलहन उत्पादन बढ़ाने जैसे कई विषयों पर लंबी-चौड़ी बातें कीं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। उन्होंने सवाल उठाया कि स्लॉट बुकिंग की तारीख 30 अप्रैल से बढ़ाकर 9 मई करना क्या सरकार की नाकाम व्यवस्था का प्रमाण नहीं है? छोटे, मझोले और बड़े किसानों पर लगी पाबंदियों को हटाना भी सरकार की मजबूरी को दर्शाता है, न कि कोई संवेदनशील निर्णय।
सरकार की गेहूं खरीदी व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हो रही है। 14 दिनों में केवल 9.5 लाख मैट्रिक टन खरीदी से साफ है कि इस रफ्तार पर 100 लाख मैट्रिक टन का लक्ष्य पूरा करने में करीब 140 दिन लगेंगे। अब जब छोटे, मझोले और बड़े सभी किसान एक साथ तुलाई के लिए आएंगे, तो यह अव्यवस्था और बढ़ेगी तथा किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।
बिजली आपूर्ति पर हमला करते हुए श्री पटवारी ने कहा कि 23 वर्षों तक किसानों को रात में बिजली देकर परेशान करने वाली सरकार आज दिन में बिजली देने की बात कर रही है। यह नीतिगत विफलता की स्वीकारोक्ति है, न कि कोई उपलब्धि। कृषक मित्र योजना को लेकर उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार 90% सब्सिडी का दावा कर रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि किसानों से 10% राशि जमा कराकर उनके नाम पर 90% कर्ज डाला जा रहा है। दस्तावेजों में मात्र 30% सब्सिडी का उल्लेख है—ऐसे में शेष 60% की सच्चाई क्या है? और जब कर्ज किसान के नाम पर होगा, तो उसकी किस्त कौन भरेगा—सरकार या किसान?
सोयाबीन किसानों के मुद्दे पर श्री पटवारी ने कहा कि “मोदी गारंटी” के तहत ₹6000 प्रति क्विंटल पर खरीद का वादा किया गया था, लेकिन हकीकत में किसान को ₹2750 प्रति क्विंटल के भाव पर फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। जब मंडी मॉडल रेट ₹4000 था, तब भी किसानों को उसका लाभ नहीं मिला। उन्होंने सवाल किया कि इस भारी अंतर का जवाब कौन देगा और क्या सरकार किसानों के नुकसान की भरपाई करेगी?
इसी क्रम में उन्होंने गेहूं खरीदी में भारी अव्यवस्था का आरोप लगाते हुए कहा कि लगभग 50% किसानों ने खरीदी में देरी और कुप्रबंधन के चलते अपना गेहूं ओपन मार्केट में बेचा, जहां मंडियों में खुली लूट के कारण उन्हें ₹1800 से ₹2000 प्रति क्विंटल के भाव मिले। उन्होंने पूछा कि क्या सरकार इन किसानों के नुकसान की भरपाई करेगी या उन्हें यूं ही बाजार के हवाले छोड़ दिया गया है?
दुग्ध उत्पादकों के मुद्दे पर उन्होंने कहा प्रदेश के अपने दूध संघ को NDDB को सौंपने के बाद बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन आज तक यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस निर्णय से मध्यप्रदेश के दूध उत्पादक किसानों को वास्तविक लाभ क्या मिला। हाल ही में NDDB के साथ हुई बैठक के परिणामों पर भी मुख्यमंत्री ने कोई पारदर्शिता नहीं दिखाई।
श्री पटवारी ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जो मुख्यमंत्री दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने की बात करते हैं, उन्होंने अपने पूरे भाषण में ग्रीष्मकालीन मूंग खरीदी पर एक शब्द तक नहीं कहा। यह दर्शाता है कि सरकार के पास मूंग उत्पादक किसानों के लिए कोई ठोस योजना नहीं है और उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि आने वाले खरीफ सीजन में किसान धान की बुवाई करेगा, लेकिन मुख्यमंत्री ने “मोदी गारंटी” के तहत ₹3100 प्रति क्विंटल धान खरीद के वादे पर एक शब्द तक नहीं कहा। यह स्पष्ट करता है कि सरकार के पास धान उत्पादक किसानों के लिए कोई ठोस नीति या भरोसेमंद रोडमैप नहीं है।
अंत में श्री पटवारी ने कहा कि मध्यप्रदेश का किसान अब झूठे वादों और खोखली घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होगा। उसे स्पष्ट नीति, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहिए। यदि सरकार शीघ्र ही इन सवालों का ठोस जवाब नहीं देती और व्यवस्थाएं दुरुस्त नहीं करती, तो कांग्रेस प्रदेशभर में किसानों के हक की लड़ाई को और तेज करेगी।
2 hours and 7 min ago
भोपाल। मध्यप्रदेश के सीहोर स्थित वीआईटी विश्वविद्यालय में लगातार सामने आ रही गंभीर अनियमितताओं ने एक बार फिर छात्र-छात्राओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हाल ही में दूषित पानी एवं भोजन के कारण लगभग 300 से अधिक छात्र-छात्राएं गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं, वहीं दो दर्जन से अधिक छात्र-छात्राओं में टाइफाइड संक्रमण की पुष्टि हुई है।
गौरतलब है कि इससे पूर्व भी विश्वविद्यालय में दूषित भोजन के कारण एक छात्रा की मृत्यु हो चुकी है तथा सैकड़ों छात्र-छात्राएं बीमार पड़े थे। उस घटना के बाद आक्रोशित विद्यार्थियों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया था, जिसमें तोड़फोड़ और आगजनी जैसी घटनाएं भी सामने आई थीं। लेकिन इतनी गंभीर घटना के बाद भी प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा कोई ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया, जो अत्यंत चिंताजनक है।
एनएसयूआई प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने कहा कि एनएसयूआई लंबे समय से वीआईटी विश्वविद्यालय में व्याप्त अनियमितताओं, लापरवाही और छात्रों की जान से खिलवाड़ जैसे मामलों को लेकर शासन-प्रशासन को लगातार अवगत कराता रहा है। एनएसयूआई द्वारा इस संबंध में मानव अधिकार आयोग को भी विस्तृत शिकायत प्रस्तुत की गई थी, जिस पर आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव एवं यूजीसी चेयरमैन को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
रवि परमार ने बताया कि मानव अधिकार आयोग ने दो सप्ताह में जवाब मांगा था लेकिन आश्चर्यजनक रूप से तीन सप्ताह बीत जाने के बाद भी संबंधित विभागों द्वारा कोई जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है, जो स्पष्ट रूप से प्रशासनिक उदासीनता और संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। यह भी संदेह उत्पन्न होता है कि शिक्षा माफियाओं के दबाव में मामले को जानबूझकर दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
एनएसयूआई जिलाध्यक्ष अक्षय तोमर ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि शीघ्र ही वीआईटी विश्वविद्यालय के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, दोषियों पर सख्त दंडात्मक कदम नहीं उठाए गए और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो संगठन प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार एवं निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग का घेराव करने के लिए बाध्य होगा।एनएसयूआई छात्रों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करती रहेगी और किसी भी स्थिति में छात्रों के जीवन से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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