मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
केवल पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और आदर्श भी बने शिक्षक:BSA मनीष कुमार सिंह
संजीव कुमार सिंह बलिया!राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण के प्रथम बैच का उद्घाटन करते हुए प्राचार्य /उप शिक्षा निदेशक मनीष कुमार सिंह द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारंभ किया गया। इस प्रशिक्षण में शिक्षा क्षेत्र बेलहरी,बैरिया, मनियर, पंदह,मुरली छपरा,,रेवती,बेरुअरबारी और नगरा के 12-12 शिक्षकों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है जो आज दिनांक 11 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 13 मार्च 2026 तक आयोजित होना है। सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण के प्रभारी डायट प्रवक्ता डॉक्टर मृत्युंजय सिंह एवं इस प्रशिक्षण के नोडल रवि रंजन खरे द्वारा पंजीकरण के उपरांत शिक्षकों को पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। प्रवक्ता जानू राम द्वारा अपने उद्बोधन में बताया गया कि शिक्षा केवल ज्ञान या सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मानव निर्माण की एक सतत श्रृंखला है। यदि शिक्षा में मूल्य का समावेश नहीं होता तो यह केवल कौशल और तकनीकी दक्षता तक ही सीमित रह जाती, ऐसे में समाज की भौतिक प्रगति तो होती किंतु नैतिक पतन और संवेदनहीनता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है ।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब वह विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ ही भावनात्मक एवं नैतिक विकास में भी योगदान करें। प्रशिक्षण के नोडल रविरंजन खरे द्वारा आह्वान किया गया कि आज का समय वैज्ञानिक प्रगति, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण की है ।विद्यार्थियों के सामने और असंख्य अवसर तो आते हैं परंतु जीवन में तनाव ,नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं ।ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि जीवन को सार्थक और संतुलित बनाना भी होना चाहिए ।मूल्य आधारित इस प्रशिक्षण में हम सभी मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नैतिक शक्ति को प्राप्त कर सकेंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। डायट प्रवक्ता किरण सिंह द्वारा शिक्षकों के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक होने की बात बताई गई जिसमें शिक्षण में मूल्य का समावेश करने ,उनका दृष्टिकोण और अधिक समानुभूतिपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने की दिशा में समय-समय पर मूल्य आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया। डायट प्रवक्ता अविनाश सिंह द्वारा कंप्यूटर का शिक्षा में प्रयोग तथा उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की गई और बताया गया की शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनाती है ।यह एक ऐसे प्रकाश पुंज के समान है जो मनुष्य के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण करते हुए एक जिम्मेदार नैतिक एवं मूल्य आधारित नागरिक बनाती है जिससे देश और समाज की उन्नति एवं विकास में अपना अहम योगदान दिया जा सके। इस प्रशिक्षण में प्रतिभाग़ कर रहे बेलहरी शिक्षा क्षेत्र के अध्यापक, पूर्व एकेडमिक पर्सन डॉक्टर शशि भूषण मिश्र द्वारा बताया गया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय ,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है जिन्हें अपनाकर शिक्षक अपने आप में सशक्त बन सकता है तथा कक्षाओं में आत्मसात कराकर समाज की नई रूप रेखा का निर्माण कर सकता है जिस पर आगे चलकर सहिष्णुतापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक वातावरण का सृजन किया जा सकता है। डायट प्रवक्ता डॉ जितेंद्र गुप्ता द्वारा बताया गया कि शिक्षक भविष्य निर्माता है तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों में रोपित मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बनकर हमारे समाज को मानवीय गरिमा एवं न्याय की शीतल छाव प्रदान करेगा। तकनीकी सहयोग अमित कुमार चौहान तथा चंदन मिश्रा द्वारा प्रदान किया गया।
शिक्षकों की संवेदनशीलता: दिवंगत रसोइया विद्यावती के पुत्र को दी 25 हजार की आर्थिक सहायता
संजीव सिंह बलिया! सीयर: शिक्षा क्षेत्र सीयर के शिक्षकों ने मानवीयता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए प्राथमिक विद्यालय तिरनई खुर्द की दिवंगत रसोइया विद्यावती देवी के पुत्र अवधेश को आपसी सहयोग से एकत्रित 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की।विद्यावती देवी का निधन 3 मार्च को हो गया था, जिससे विद्यालय परिवार और क्षेत्रीय शिक्षकगण शोकाकुल हो गए थे। उनकी स्मृति में और परिवार की सहायता के लिए शिक्षकों ने यह राशि सौंपी।इस पुण्य कार्य में खंड शिक्षा अधिकारी सीयर, प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष अशोक कुमार यादव, उदय प्रताप यादव, जय प्रकाश यादव, देवेन्द्र कुमार वर्मा, दिलीप कुशवाहा, प्रधानाध्यापक आलोक कुमार यादव, शाह आलम, जितेन्द्र कुमार यादव, प्रवीण सहित बड़ी संख्या में शिक्षक उपस्थित रहे। सभी ने दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना की और परिवार को हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सेठ एम.आर. जयपुरिया स्कूल रसड़ा में भव्य समारोह, प्रमुख अतिथियों ने किया सम्मानित
संजीव सिंह बलिया। रसड़ा: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रविवार, 8 मार्च को सेठ एम.आर. जयपुरिया स्कूल, रसरा में एक आकर्षक समारोह का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में महिलाओं के सामाजिक और शैक्षिक योगदान को रेखांकित किया गया।कार्यक्रम की शुरुआत महिला दिवस पर आधारित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता, "पिक द चिट" गेम और कविता पाठ जैसी रोचक गतिविधियों से हुई, जिसमें छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।प्रधानाचार्य संजीव सिंह चौहान ने सभा को संबोधित करते हुए महिलाओं के समाज और शिक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि महिलाएं राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं।स्कूल को विशेष सम्मान प्रदान करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया, दिल्ली कार्यालय के वरिष्ठ मुख्य राजनीतिक संपादक अखिलेश सिंह सेंगर तथा लखनऊ विश्वविद्यालय के सरवजीत सिंह विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। इनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भव्यता प्रदान की।समारोह का समापन शिक्षकों के साथ सामूहिक दोपहर भोजन के साथ हुआ। अंत में प्रधानाचार्य ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका आभार व्यक्त किया।
बलिया: TET अनिवार्यता के खिलाफ(JTFI) शिक्षक संगठनों की एकजुट हुंकार, 9-15 मार्च तक पोस्टकार्ड-ईमेल अभियान का ऐलान
संजीव सिंह बलिया, 8 मार्च 2026: अखिल भारतीय शिक्षक महासंघ (JTFI) के तत्वावधान में विशिष्ट बीटीसी के संरक्षक भैया अरुण सिंह के नेतृत्व में जनपद बलिया में TET अनिवार्यता के विरोध में घटक संगठनों की महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक में प्रमुख शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रदेश नेतृत्व के आह्वान पर एकजुट होकर आगामी कार्यक्रमों को सफल बनाने का संकल्प लिया।बैठक के प्रमुख बिंदु:प्राथमिक शिक्षक संघ (अजय सिंह, अध्यक्ष), अटेवा (समीर कुमार पांडेय, जिला संयोजक), विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन (घनश्याम चौबे, अध्यक्ष), राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (राजेश सिंह, जिला संयोजक), TSCT (सतीश सिंह, अध्यक्ष), प्राथमिक शिक्षक संघ 1160 (सतेंद्र राय, अध्यक्ष), माध्यमिक शिक्षक संघ एकजुट (लाल साहब यादव), शिक्षा मित्र संघ (पंकज सिंह, अध्यक्ष), प्रा शि संघ पंजीकृत 1160 (निर्भय नारायण सिंह), एसटी/एससी बेसिक संघ (अंजनी कुमार मुकुल, अध्यक्ष) समेत अन्य संगठनों ने भागीदारी की।उपस्थित पदाधिकारियों ने नियुक्ति के समय मानकों पर खरे उतरे शिक्षकों के भविष्य को 'अंधेरे में धकेलने' के खिलाफ आवाज बुलंद की।9 से 15 मार्च तक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष को पोस्टकार्ड, ईमेल और ट्विटर अभियान चलाने पर जोर दिया गया।अन्य संगठनों से एकजुटता का आह्वान किया गया।उपस्थित प्रमुख प्रतिनिधि: विनय राय (वरिष्ठ उपाध्यक्ष), गोपाल जी पाठक, इरफान अहमद (जिला उपाध्यक्ष), नित्यानंद पांडेय (कोषाध्यक्ष), अनिल सिंह (ब्लॉक अध्यक्ष, चिलकहर), राजेश सिंह (अध्यक्ष, बांसडीह), धर्मेंद्र जी आदि।शिक्षक एकता जिंदाबाद! लड़ेंगे और जीतेंगे। #NoTetBeforeRteActसंजीव कुमार सिंह (जिला मीडिया प्रभारी, JTFI, अटेवा)
कस्तूरबा गांधी बैरिया की छात्राओं का शैक्षणिक भ्रमण: सारनाथ, रामनगर किला सहित वाराणसी भ्रमण पर उत्साह
संजीव सिंह बलिया। बैरिया:  कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय बैरिया की छात्राओं का शैक्षणिक भ्रमण वाराणसी के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों पर सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस भ्रमण में सारनाथ, रामनगर किला सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थानों का दौरा किया गया, जहां छात्राओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला।खंड शिक्षा अधिकारी  पंकज मिश्र ने हरी झंडी दिखाकर टीम को रवाना किया। भ्रमण टीम में वार्डन वंदना सिंह, नीतू पांडेय, निशा पांडेय, रिकी यादव, सरिता गुप्ता, सतीश चौरसिया, जयशंकर प्रसाद, प्रधानाध्यापिका कविता सिंह, रसोइया सहित कुल 85 छात्राएं शामिल रहीं।यह भ्रमण छात्राओं को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था, जो शिक्षा विभाग की पहल को दर्शाता है
बासडीह विधायक केतकी सिंह ने शिक्षामित्रों को किया संबोधित, योगी सरकार के फैसलों पर जताया आभार
संजीव सिंह बलिया!बासडीह, 2 मार्च 2026: बलिया जिले के बासडीह विधायक केतकी सिंह ने आज अपने निजी आवास पर शिक्षामित्रों को संबोधित करते हुए कहा कि योगी सरकार उत्तर प्रदेश के हर नागरिक के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। इसका प्रमाण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षामित्रों का मानदेय बढ़ाकर 18,000 रुपये कर दिया, जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे।विधायक ने कहा कि शिक्षामित्र अपनी लगन और मेहनत से कार्य सुचारु रूप से कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि वे आगे भी ऐसा ही करते रहेंगे तथा सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोग करेंगे। साथ ही, सरकार ने कैशलेस मेडिकल सुविधा देने की घोषणा भी की है। केतकी सिंह ने आश्वासन दिया कि वे शिक्षामित्रों की आवाज को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में लाती रहेंगी।इस अवसर पर संगठन के जिला अध्यक्ष पंकज सिंह, उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षामित्र संघ के प्रांतीय मंत्री अखिलेश पांडे, राकेश पांडेय, हरेराम यादव, मंजूर हुसैन, अरुण सिंह, देव प्रकाश पांडे, निर्भय नारायण राय, साकिर अंसारी, सुधीर शुक्ला, नीरज सिंह आदि ने विधायक के प्रति आभार व्यक्त किया तथा योगी सरकार को धन्यवाद दिया।
बलिया में 100% सफलता: राष्ट्रीय आय-योग्यता छात्रवृत्ति परीक्षा में 251 में से 251 बच्चों का चयन, बीएसए मनीष सिंह की प्रेरणा से रचा इतिहास
संजीव सिंह बलिया, 2 मार्च 2026: जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष सिंह के प्रेरणादायक एवं कुशल मार्गदर्शन में जनपद बलिया ने एक बार फिर अपनी छाप छोड़ी। विगत वर्षों की तर्ज पर इस वर्ष भी राष्ट्रीय आय एवं योग्यता आधारित छात्रवृत्ति परीक्षा में जनपद के लिए निर्धारित 251 सीटों के सापेक्ष शत-प्रतिशत 251 बच्चों का चयन हो गया।इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष सिंह ने सभी चयनित बच्चों के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए हार्दिक शुभकामनाएं दीं। साथ ही, शिक्षकों के सराहनीय कार्य के लिए उन्हें बधाई दी।इस सफलता पर जिला समन्वयक प्रशिक्षण ओम प्रकाश सिंह, एसआरजी आशुतोष तोमर, संतोष चंद्र तिवारी, चित्रलेखा सिंह, पूर्व एकेडमिक रिसोर्स पर्सन डॉ. शशि भूषण मिश्र, डॉ. भवतोष कुमार पांडे, विजय कुमार, जितेंद्र सिंह (जिला अध्यक्ष, प्राथमिक शिक्षक संघ बलिया), शिक्षक उमेश सिंह, अजीत सिंह, प्रतिमा उपाध्याय, संतोष चौबे, विनय कुमार, जयप्रकाश आदि ने बच्चों को शुभकामनाएं दीं और शिक्षकों को दिल से बधाई दी।यह उपलब्धि जनपद की बेसिक शिक्षा व्यवस्था की मजबूती और शिक्षकों की मेहनत का प्रतीक है, जो बच्चों के भविष्य को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।
बलिया की सांस्कृतिक परंपरा पर जोर दिया।बलिया के सुल्तानीपुर में नव कुंडीय सहस्र चंडी महायज्ञ: आठवें दिन भरत-राम मिलाप कथा से श्रद्धालु भावविभोर,
संजीव सिंह बलिया : जिले के सुल्तानीपुर गांव में आयोजित भव्य नव दिवसीय नव कुंडीय सहस्र चंडी महायज्ञ के आठवें दिन श्रद्धालुओं का अपार जनसैलाब उमड़ पड़ा। यज्ञ स्थल पर नव कुंडों में आहुतियां चढ़ रही थीं, तो कथा स्थल पर तिल रखने की भी जगह नहीं बची। हजारों भक्तों ने यज्ञ मंडप की परिक्रमा की, जबकि आचार्यगणों के उद्घोषित वैदिक मंत्रों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कथा वाचिका पंडित गौरी गौरंगी ने भरत-राम मिलाप प्रसंग को इतने मार्मिक ढंग से सुनाया कि श्रद्धालु भावविभोर हो रो पड़े।भरत-राम मिलाप: त्याग और भक्ति का अनुपम प्रसंगकथा में पंडित गौरी गौरंगी ने विस्तार से सुनाया कि भरत अपने मामा के घर से लौटे तो उन्हें भ्राता राम और भाभी सीता के 14 वर्ष के वनवास की दर्दनाक खबर पता चली। मूर्छित होकर गिर पड़े भरत ने होश आने पर माता कैकेयी को कठोर शब्दों में कोसा, "आज तक सुना था पुत्र कुपुत्र हो सकता है, माता कुमाता नहीं। लेकिन तुमने सिद्ध कर दिया कि माता भी कुमाता हो सकती है।" भरत ने कहा कि प्रजा उन्हें छल-कपट का दोषी ठहराएगी, फिर भी वे राम को लाने अयोध्या से चित्रकूट रवाना हो गए।निषादराज से मार्ग मार्गदर्शन प्राप्त कर चित्रकूट पहुंचे भरत राम के चरणों में गिरे और क्षमा मांगी। निस्वार्थ प्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक भरत ने राम से अयोध्या लौटने की विनती की, किंतु राम ने वचनबद्धता का हवाला देकर इंकार कर दिया। लंबे अनुरोध के बाद भरत सहमत हुए कि अयोध्या का राजा राम ही रहेंगे। उन्होंने राम की चरण पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर 14 वर्ष तक निष्ठापूर्वक राज्य संभाला।कथा समापन पर गौरंगी गौरी जी ने कहा, "आज के युग में स्वार्थ के लिए भाई भाई से छल करता है। राम-भरत प्रसंग भाइयों के प्रेम को मजबूत करने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। यह हमें त्याग और भक्ति का संदेश देता है।"यज्ञ का भव्य स्वरूप और आयोजनयह महायज्ञ सुल्तानीपुर के प्रमुख धार्मिक आयोजन के रूप में जाना जाता है, जिसमें नव कुंडों में सहस्र चंडी पाठ हो रहा है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु विभिन्न जिलों से आ रहे हैं। कथा के बाद प्रसाद वितरण हुआ, जिसमें भक्तों ने उत्साह से भाग लिया। मुख्य यजमान गोविंद नारायण सिंह ने बताया, "यह यज्ञ मां दुर्गा की कृपा और राम भक्ति के लिए समर्पित है। नवें दिन महायज्ञ का समापन धूमधाम से होगा।"प्रमुख आयोजक और उपस्थित जनमुख्य आयोजक गोविंद नारायण सिंह के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष शक्ति सिंह, ऋषिराज सिंह, कृष्णा राज सिंह, श्रीमती मीरा सिंह, आशुतोष पांडेय सहित हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे। स्थानीय ग्रामीणों ने इसे गांव की सांस्कृतिक धरोहर बताया। 9वेदिन विशेष पूजन और हवन होगा।सुल्तानीपुर महायज्ञ न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी बन गया है।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. उपाध्याय ने 'बीज वक्ता' के रूप में बढ़ाया बलिया का मान
संजीव सिंह बलिया!बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'बुंदेलखंड के साहित्य, समाज और संस्कृति में श्रीराम' में जनपद के लब्धप्रतिष्ठित विद्वान और प्रखर विचारक डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने अंतरराष्ट्रीय फलक पर जिले का मान बढ़ाया। डॉ. उपाध्याय को इस वैचारिक महाकुंभ में विशिष्ट अतिथि एवं 'बीज वक्ता' के रूप में आमंत्रित किया गया, जहाँ उन्होंने सनातन संस्कृति और रामकथा के अंतर्संबंधों का अत्यंत गंभीर और तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत किया। इस वैश्विक मंच पर डॉ. उपाध्याय ने रामायण के एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए श्रीराम के 'आतंकवाद विरोधी' स्वरूप की एक नवीन व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि जब श्रीराम ने ऋषियों की हड्डियों का विशाल पहाड़ देखा और अपने गुरु से इसका कारण पूछा, तब उन्हें ज्ञात हुआ कि ये उन महान ऋषियों के अवशेष हैं जिन्हें राक्षसों ने क्रूरतापूर्वक मार डाला था। डॉ. उपाध्याय ने इसके गहरे दार्शनिक अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि उस युग में ज्ञान 'श्रुति परंपरा' अर्थात सुनकर याद रखने पर आधारित था, क्योंकि तब कागज और कलम की खोज नहीं हुई थी। ऐसे में ज्ञान प्रदान करने वाले एक भी ऋषि की हत्या का अर्थ केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की उस संचित ज्ञान परंपरा की हत्या थी जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती थी। असंख्य ऋषियों की हत्या के माध्यम से ज्ञान के इस समूल विनाश को देखकर श्रीराम की करुणा 'महाक्रोध' में परिवर्तित हो गई और उन्होंने उसी क्षण यह दृढ़ प्रण लिया कि लंका विजय तो बाद की बात है, वह पहले अपने घर में बैठे इन आततायी राक्षसों और ज्ञान-विरोधी 'आतंकवादियों' का वध करेंगे। डॉ. उपाध्याय ने रेखांकित किया कि राम का यह संकल्प वास्तव में वैश्विक सभ्यता और ज्ञान-संस्कृति को बचाने का विश्व इतिहास का पहला बड़ा सुरक्षा अभियान था। मुख्य व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए डॉ. उपाध्याय ने प्रतिपादित किया कि बुंदेलखंड की माटी में राम केवल एक आराध्य देव भर नहीं हैं, बल्कि वे यहाँ की संपूर्ण जीवन पद्धति के आधार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ओरछा के 'रामराजा' सरकार से लेकर गाँवों की चौपालों पर गाई जाने वाली 'फाग' और 'आल्हा' तक, राम बुंदेली समाज के प्रत्येक संस्कार और सांसों में रचे-बसे हैं। बुंदेलखंड के समृद्ध साहित्य ने राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को लोक-भाषा के माध्यम से जन-जन के हृदय तक पहुँचाने का महती कार्य किया है। उनके अनुसार राम के आदर्शों और बुंदेली संस्कृति का पावन संगम ही वह अटूट सूत्र है, जो इस अंचल के समाज को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी नैतिकता, मर्यादा और धैर्य की शक्ति प्रदान करता है। डॉ. उपाध्याय का यह उद्बोधन न केवल अकादमिक दृष्टि से उत्कृष्ट रहा, बल्कि इसने अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के सम्मुख बुंदेलखंड की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चेतना को भी मजबूती से रखा। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की भव्यता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें भारत के विभिन्न राज्यों सहित विश्व के दस प्रमुख देशों के दिग्गज विद्वानों ने श्रीराम के आदर्शों और बुंदेली संस्कृति के अंतर्संबंधों पर गहन मंथन किया। परिचर्चा में नार्वे से डॉ. शरद आलोक, बुल्गारिया से डॉ. मौना कौशिक, ऑस्ट्रेलिया से डॉ. भावना कुँअर, कुवैत से संगीता चौबे 'पंखुड़ी', दुबई से डॉ. आरती लोकेश, नीदरलैंड से डॉ. ऋतु शर्मा नन्नन पाण्डेय, न्यूज़ीलैंड से डॉ. सुनीता शर्मा, नेपाल से डॉ. श्वेता दीप्ति और सूरीनाम से लालाराम लैलावती एवं श्री धीरज कंधई जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वानों ने अपने विचार साझा किए। इस वैचारिक समागम में विभिन्न सत्रों के दौरान लगभग 100 शोध पत्रों का वाचन किया गया, जिससे रामकथा के वैश्विक और स्थानीय आयामों पर नई रोशनी पड़ी। आयोजन की गरिमा को बढ़ाते हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रामायण केंद्र भोपाल के निदेशक प्रो. राजेश श्रीवास्तव एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय ने की। इस ऐतिहासिक आयोजन की सफलता के मुख्य सूत्रधार कला संकाय के अधिष्ठाता एवं संयोजक प्रो. (डॉ.) पुनीत बिसारिया, कुलसचिव ज्ञानेंद्र कुमार, वित्त अधिकारी प्रमोद कुमार सिंह एवं परीक्षा नियंत्रक राज बहादुर रहे, जिनके प्रयासों से यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस वैश्विक मंच पर मुख्य वक्ता के रूप में सम्मानित होते देख जनपद के साहित्यकारों, शिक्षाविदों और शुभचिंतकों में हर्ष की लहर दौड़ गई है। डॉ. गणेश पाठक, डॉ. जनार्दन राय, डॉ. अशोक कुमार सिंह, डॉ. धनंजय पाण्डेय, डॉ. मदन राम, करुणानिधि तिवारी, राधेश्याम यादव, हरेंद्र नाथ मिश्र और लल्लन पाण्डेय आदि ने डॉ. उपाध्याय को बधाई देते हुए इस उपलब्धि को समूचे क्षेत्र के लिए एक गौरवशाली क्षण बताया है।