भारत मिलाप की कथा सुनकर भक्त हुए भाव विभोर
फर्रुखाबाद । माँ गायत्री प्रज्ञा पीठ मेरापुर में पंचम दिवस की राम कथा में आचार्य मनोज अवस्थी जी
महाराज ने राम वनवास के प्रसंग का मार्मिक प्रवचन दिया।
अयोध्या में राम के राजतिलक की तैयारी, कैकेयी के कोप भवन में प्रवेश, राजा दशरथ की मनुहार में तीन वरदान देते हुए श्रीराम को वनवास की आज्ञा देना, सीता, लक्ष्मण सहित राम का वन गमन और चित्रकूट में भरत मिलाप के प्रसंग के माध्यम से रामायणकालीन पारिवारिक, सामाजिक व राजनीतिक मूल्यों को बताया। उन्होंने कहा कि राम के वनगमन व कोप भवन के घटनाक्रम की जानकारी बाहर किसी को नहीं थी। कैकेयी अपनी जिद पर अड़ी थी। राजा दशरथ उन्हें समझा रहे थे। राम के निवास के बाहर भारी भीड़ थी। लक्ष्मण भी वहीं थे। महल में पहुंचकर राम ने पिता को प्रणाम किया। फिर पिता से पूछा क्या मुझसे कोई अपराध हुआ है। कोई कुछ बोलता क्यों नहीं। इस पर कैकयी बोली महाराज दशरथ ने मुझे एक बार दो वरदान दिए थे। मैंने कल रात वही दोनों वर मांगे, जिससे वे पीछे हट रहे हैं। यह शास्त्र सम्मत नहीं है। रघुकुल की नीति के विरुद्ध है। कैकेयी ने बोलना जारी रखा, मैं चाहती हूं कि राज्याभिषेक भरत का हो और तुम चौदह वर्ष वन में रहो।
कैकेयी ने राम, लक्ष्मण और सीता को वलकल वस्त्र दिए। सीता को तपस्विनी के वेश में देखना सबसे अधिक दुखदाई था। महर्षि वशिष्ठ अब तक शांत थे। अब उन्हें क्रोध आ गया। उन्होंने कहा कि वन जाएगी तो सब अयोध्यावासी उसके साथ जाएंगे। एक बार फिर राम ने सबसे अनुमति मांगी।
राम, सीता और लक्ष्मण जंगल जाने से पहले पिता का आशीर्वाद लेने गए। महाराज दशरथ दर्द से कराह रहे थे। तीनों रानियां वहीं थीं। मंत्री आसपास थे। मंत्री रानी कैकेयी को अब भी समझा रहे थे। ज्ञान, दर्शन, नीति-रीति, परंपरा सबका हवाला दिया। कैकेयी अड़ी रहीं। राम ने कहा राज्य का लोभ नहीं है।
आचार्य अवस्थी जी इस प्रसंग को भावों के उच्चाकाश पर पहुंचाते हुए सभी श्रोताओं की आँखे नम कर दी।आचार्य अवस्थी ने कहा कि जैसे ही राम महल से निकले माता कौशल्या को कैकेयी भवन का विवरण दिया और अपना निर्णय सुनाया। राम वन जाएंगे। कौशल्या यह सुनकर सुध खो बैठीं। लक्ष्मण अब तक शांत थे पर क्रोध से भरे हुए। राम ने समझाया और उनसे वन जाने की तैयारी के लिए कहा। कौशल्या का मन था कि राम को रोक लें। वन न जाने दें। राजगद्दी छोड़ दें पर वह अयोध्या में रहें, परन्तु राम ने पिता की आज्ञा को सिरोंधार्य कर वन को प्रस्तान किया।
आज की कथा में अपार जनमानस के साथ प्रमुख रूप से विमल शर्मा आईएएस, विजय बहादुर त्रिपाठी उदय चौहान, कुलदीप चौहान प्रधान कांकन, विवेक प्रधान उधत प्रोफेसर डॉ रामबदन पाण्डेय प्राचार्य एकरसानंद संस्कृत विद्यायालय मैनपुरी, डॉ विजय कुमार शुक्ला प्रवक्ता भाव मयी कथा का श्रवण किया।
1 hour and 40 min ago
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