कैसे पता चलेगा, कुत्ता काटने के मूड में है या नहीं? कपिल सिब्बल की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी

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आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। इस दौरान आवारा कुत्तों और पशु-प्रेम को लेकर एक रोचक बहस देखने को मिली। सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता वंदना जैन की एक दलील पर टिप्पणी की, 'जब हम पशु प्रेमियों की बात करते हैं, तो इसमें सभी जानवर शामिल होते हैं। मैं अपने घर में कोई जानवर रखना चाहता हूं या नहीं, यह मेरा विवेक है।

कोर्ट ने पूछा-सोसाइटी में भैंस पालना चाहे तो क्या होगा?

आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणियां की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गेटेड कम्युनिटी में कुत्ते को घूमने देना चाहिए या नहीं, यह समुदाय को तय करना होगा। मान लीजिए, 90 प्रतिशत निवासियों को लगता है कि यह बच्चों के लिए खतरनाक होगा, लेकिन 10 फीसदी कुत्ते रखने पर जोर देते हैं। कोई कल भैंस ला सकता है। वे कह सकते हैं कि मुझे भैंस का दूध चाहिए।

शीर्ष अदालत ने सिब्बल को लगाई फटकार

आवारा कुत्तों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आज वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को लताड़ भी लगाई। दरअसल, बहस के दौरान सिब्बल ने कहा कि कुत्ते सड़कों पर नहीं होते हैं बल्कि परिसरों में रहते हैं। इसी दलील पर शीर्ष अदालत ने सिब्बल पर नाराजगी जताई।

शेल्टर में मौजूद कुत्तों को खाना खिलाने की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों पर सवाल करते हुए कहा, क्या कुत्तों को यह सिखाया जा सकता है कि वे किसी को न काटें? किसी को कैसे पता चलेगा कि कौन सा कुत्ता काटने के मूड में है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पशुप्रेमियों को शेल्टर में मौजूद कुत्तों को खाना खिलाना चाहिए।

उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, दिल्ली दंगा केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

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उमर खालिद और शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ी बड़ी साजिश के मामले में कोर्ट ने इन दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अन्य पांच आरोपियों गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दोनों को बेल नहीं दी जा सकती है। यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के केस की तुलना दूसरे आरोपियों से नहीं की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हर आरोपी की जमानत याचिका की जांच अलग-अलग करनी होगी, क्योंकि सातों आरोपी अपराध के मामले में एक समान स्थिति में नहीं हैं।

मुकदमे के ट्रायल में देरी जमानत का आधार नहीं

कोर्ट ने साफ किया कि मुकदमे के ट्रायल में हो रही देरी को 'ट्रंप कार्ड' की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा करने से वैधानिक सुरक्षा उपाय स्वतः ही निरस्त होने का खतरा है। अदालत ने कहा कि दोनों के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर हैं, इसलिए इस स्तर पर दोनों को राहत नहीं दी जा सकती।

उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका गंभीर

सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी भी की कि कुछ आरोपियों की ‘केंद्रीय भूमिका’ होती है, जबकि कुछ की भूमिका केवल सहायक या मददगार की होती है। इन दोनों के बीच फर्क किए बिना फैसला करना अपने आप में मनमाना होगा। कोर्ट ने माना कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका बाकी आरोपियों से अलग और अधिक गंभीर प्रकृति की प्रतीत होती है।

दिल्ली दंगे का मास्टरमाइंड होने का आरोप

बता दें कि उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद पर फरवरी 2020 की हिंसा के 'मास्टरमाइंड' होने का आरोप है, जिसमें यूएपीए और कई दूसरी धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। यह हिंसा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और प्रस्तावित नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स के विरोध प्रदर्शनों के बीच भड़की थी। इसमें 53 लोग मारे गए और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

अरावली पर सुप्रीम कोर्ट ने पलटा अपना ही फैसला, जानें अदालत ने क्या कहा

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अरावली हिल रेंज की परिभाषा को लेकर उठे सवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार 29 दिसंबर को बड़ा निर्णय देते हुए अपने ही पूर्व के फैसले के अमल पर रोक लगा दी है। सरकार से स्पष्ट जवाब मांगते हुए शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा, इस मामले में स्पष्टीकरण जरूरी है। इस मामले पर अब अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी।

कोर्ट ने कहा- कुछ मुद्दों पर स्पष्टीकरण आवश्यक

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने उस आदेश को फिलहाल स्थगित (अबेअन्स में) कर दिया है जिसमें अरावली की पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव संबंधित रिपोर्ट को स्वीकार कर ली गई थी और पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था। अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा नए सिरे से तय किए जाने के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 20 नवंबर के फैसले में दिए गए निर्देशों को स्थगित रखा जाएगा। अपने आदेश में अदालत ने कहा, इसमें कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर स्पष्टीकरण आवश्यक हैं। 

एक्‍सपर्ट कमेटी बनाने का दिया सुझाव

जस्टिस सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने पर्यावरण से जुड़े इस मामले पर अहम सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। शीर्ष अदालत ने उन्‍हें इस मामले में कोर्ट की सहायता करने को कहा है। सोमवार को भी इस मामले में एसजी तुषार मेहता ने पहले इस मामले में पक्ष रखा। उनकी दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट अरावली मामले से जुड़े विवाद को लेकर एक्‍सपर्ट कमेटी बनाने का भी सुझाव दिया है। कमेटी की रिपोर्ट आने तक अब 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिया गया फैसला प्रभावी नहीं होगा। 

अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी को

शीर्ष अदालत ने यह चिंता जताई कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और न्यायालय की टिप्पणियों की गलत व्याख्या की जा रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत , जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने कहा कि रिपोर्ट या न्यायालय के निर्देशों को लागू करने से पहले और अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है। बेंच ने खुद संज्ञान लेकर मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी की तारीख तय की है।

सुप्रीम कोर्ट ने 5 सवाल तय किए

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट अरावली मामले से जुड़े विवाद को लेकर 5 सवाल तय किए हैं।

1. क्या अरावली की परिभाषा को केवल 500 मीटर के क्षेत्र तक सीमित करना एक ऐसा संरचनात्मक विरोधाभास पैदा करता है, जिससे संरक्षण का दायरा संकुचित हो जाता है?

2. क्या इससे गैर-अरावली क्षेत्रों का दायरा बढ़ गया है, जहां नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है?

3. यदि दो अरावली क्षेत्र 100 मीटर या उससे अधिक के हों और उनके बीच 700 मीटर का अंतर (गैप) हो, तो क्या उस अंतर वाले क्षेत्र में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जानी चाहिए?

4. पर्यावरणीय निरंतरता (इकोलॉजिकल कंटिन्यूटी) को सुरक्षित कैसे रखा जाए?

5. यदि नियमों में कोई बड़ा कानूनी या नियामक खालीपन सामने आता है, तो क्या अरावली पर्वतमाला की संरचनात्मक मजबूती बनाए रखने के लिए विस्तृत आकलन की आवश्यकता होगी?

कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से झटका, जमानत पर हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे

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सुप्रीम कोर्ट में आज उन्नाव दुष्कर्म मामले में दोषी पाए गए भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के मुकदमे पर सुनवाई हुई। कुलदीप सेंगर की उन्नाव रेप मामले में आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।

उन्नाव रेप केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर की आजीवन कारावास की सजा निलंबित कर दी थी और सशर्त जमानत भी दे दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले को सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई की। चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रारंभिक रूप से, हम इस आदेश पर रोक लगाने के पक्ष में हैं।

चीफ जस्टिस ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें यह प्रतीत होता है कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण लीगल सवाल उठे हैं। हम इस तथ्य से अवगत हैं कि जब किसी दोषी या विचाराधीन कैदी को रिहा कर दिया गया हो, तो इस न्यायालय द्वारा संबंधित व्यक्ति को सुने बिना ऐसे आदेशों पर रोक नहीं लगाई जाती। लेकिन इस मामले के विशिष्ट तथ्यों को देखते हुए कि जहां दोषी एक अलग अपराध में भी सजा काट रहा है हम दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर 2025 के आदेश के संचालन पर रोक लगाते हैं।

1 हफ्ते में मांगा जवाब

याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। इसके लिए पूर्व विधायक को 1 हफ्ते का समय दिया गया है। कुलदीप सेंगर को अगले 7 दिन में जवाब दाखिल करना होगा

दिल्ली हाईकोर्ट ने निलंबित की थी सजा

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित कर दी थी, जिसके बाद सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया। इस मामले में अधिवक्ता अंजलि पटेल और पूजा शिल्पकार की ओर से दायर याचिकाओं पर भी सुनवाई होनी है। उन्नाव दुष्कर्म मामला देश के सबसे संवेदनशील और चर्चित मामलों में से एक रहा है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद अहम माना जा रहा है।

उन्नाव रेप कांड पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, सेंगर की उम्रकैद निलंबन पर होगा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट में आज की दिन अहम है। उन्नाव रेप कांड के दोषी पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस केस में कुलदीप सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने का आदेश दिया था। इसी राहत के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की याचिका

सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट के 23 दिसंबर के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिसमें सेंगर की अपील पेंडिंग रहने तक सजा सस्पेंड करने की अर्जी मंजूर की गई थी। इससे पहले, यह जानकारी सामने आई थी कि सीबीआई और पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का इरादा जताया था।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन

उन्नाव गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई से पहले अदालत के बाहर माहौल गरमा गया। पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग को लेकर बड़ी संख्या में महिला कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया। इस दौरान कांग्रेस की महिला कार्यकर्ता और आम महिलाएं भी शामिल रहीं। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए सभी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर मौके से हटा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर बढ़ाई गई सुरक्षा

बता दें कि सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता के परिवार ने दिल्ली में धरना प्रदर्शन किया था। इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

पीड़िता की मां ने जताया न्याय का भरोसा

इससे पहले उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता और उसकी मां ने रविवार को जंतर मंतर पर कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में हाथों में बैनर व तख्तियां लिए पहुंचे। पीड़िता की मां ने बताया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है और उन्हें उम्मीद है कि वहां से उन्हें न्याय मिलेगा। उन्होंने बताया कि उनपर केस वापस लेने का दवाब बनाया जा रहा है। हम बिना किसी डर के अपनी कानूनी लड़ाई लड़ना चाहती है और इसके लिए उसे सुरक्षा की जरूरत है। पीड़िता ने कहा मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील करती हूं कि मुझे इस तरह सुरक्षा दी जाए, जिससे मैं निडर होकर अपनी लड़ाई लड़ सकूं।

सुप्रीम कोर्ट ने BLO की मौत पर जताई चिंता, कहा-काम का बोझ कम करें, दिए कई बड़े निर्देश

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विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान के बीएलओ की हुई मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। इन स्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब राज्य सरकारों के लिए निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि बीएलओ के काम के घंटे कम करने के लिए राज्य सरकारें अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती करे। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने संबंधित मौतों और कथित आत्महत्याओं के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराने से इनकार कर दिया है।

राज्य सरकारों को कर्मचारी बढ़ाने का निर्देश

सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव से संबंधित कार्यों के लिए पर्याप्त स्टाफ सुनिश्चित करना पूरी तरह राज्य सरकारों जिम्मेदारी है। न्यायालय ने बीएलओ की मौत और आत्महत्याओं को स्वीकार करे हुए कहा कि चुनावी रोल और संबंधित कार्यों के लिए तैनाती एक कानूनी प्रक्रिया है, और राज्यों को मौजूदा कर्मचारियों पर बोझ कम करने के लिए पर्याप्त जनशक्ति प्रदान करनी चाहिए।

बीमार या असमर्थ कर्मचारियों के बदले वैकल्पिक तैनाती का निर्देश

चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली बेंच ने यह भी आदेश दिया कि जिन लोगों ने चुनाव आयोग की ओर से जारी एसआईआर प्रक्रिया में ड्यूटी से छूट के लिए सही और स्पष्ट वजहें दी हों, उनके अनुरोधों पर राज्य सरकार और सक्षम प्राधिकारी विचार करें और मामलों के आधार पर उन लोगों की जगह दूसरे कर्मियों की तैनाती की जाए। सीजेआई ने कहा, राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि अगर जरूरत है तो वह इस काम के लिए जरूरी कार्यबल मुहैया कराए।

टीवीके ने दायर की है याचिका

बता दें कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी- तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) की ओर से चुनौती दी गई है। तमिलनाडु के राजनीतिक दल टीवीके की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष दलील दी गई कि अब तक देश के अलग अलग राज्यों में 35–40 बीएलओ की मृत्यु काम के अत्यधिक दबाव के कारण हुई है। इसलिए हमने मुआवज़ा देने की मांग की है।

भारत धर्मशाला नहीं, घुसपैठियों के लिए ‘रेड कार्पेट’ नहीं बिछा सकते, सीजेआई सूर्यकांत की दो टूक

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार का दिन रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर बेहद गर्म रहा। पाँच रोहिंग्या नागरिकों के कथित हिरासत में गायब होने (कस्टोडियल डिसअपीयरेंस) को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाया। याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने की मांग की थी, लेकिन सीजेआई की पीठ ने इस मांग को साफ तौर पर खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर कड़ा रुख अपनाया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सीधा सवाल किया कि क्या भारत सरकार ने रोहिंग्याओं को कभी ‘शरणार्थी’ माना है। उन्होंने साफ कहा कि ‘शरणार्थी’ एक कानूनी शब्द है। सीजेआई ने टिप्पणी की कि जो लोग अवैध तरीके से देश में घुसते हैं, उनके लिए हम रेड कार्पेट नहीं बिछा सकते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे गंभीर

सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, आप जानते हैं कि ये लोग घुसपैठिए हैं। नॉर्थ-ईस्ट की सीमा बेहद संवेदनशील है। उन्होंने आगे कहा, देश में क्या-क्या हो रहा है, आप जानते हैं? अगर कोई गैरकानूनी तरीके से आता है। वो सुरंगों से घुस आते हैं, तब भी आप उनके लिए रेड कार्पेट चाहते हैं। आप कह रहे हैं कि उन्हें खाना, आश्रय, बच्चों के लिए शिक्षा… क्या कानून को इतना खींच दें?अदालत ने साफ कर दिया कि जहाँ मानवाधिकार महत्व रखते हैं, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे भी उतने ही गंभीर हैं।

याचिकाकर्ता के तर्क पर कोर्ट का रुख

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बताया कि वे रोहिंग्याओं के लिए कोई विशेष अधिकार नहीं माँग रहे हैं। उनकी बस यही माँग है कि अगर उन्हें उनके देश वापस भेजा जाए तो यह काम कानून के हिसाब से होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि रोहिंग्याओं का कानूनी दर्जा तय हुए बिना उनके अधिकारों पर बात नहीं हो सकती। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि भारत दुनिया की ‘धर्मशाला नहीं बन सकता’ जहाँ से चाहे शरणार्थी आ जाएँ। 

16 दिसंबर तक टली सुनवाई

इस मामले को अब अन्य रोहिंग्या मामलों के साथ ही सुना जाएगा। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर तक के लिए टाल दी है। उसी दिन रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़े अन्य मामलों की भी सुनवाई होगी।

डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सीबीआई को बड़ा आदेश, कहा-देशभर में तुरंत जांच शुरू करे

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डिजिटल अरेस्ट मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने पूरे देश के डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच सीबीआई को सौंप दी है। शीर्ष अदालत ने देश की संघीय जांच एजेंसी से कहा कि वह पहले अखिल भारतीय स्तर पर सामने आ चुके डिजिटल अरेस्ट घोटाले के मामलों की जांच करे।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस ठगी पर सख्ती दिखाई है, जिसमें लोगों को फोन करके ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर करोड़ों रुपए लुटे जा रहे थे। कोर्ट ने साफ कहा कि अब ये मामला सिर्फ राज्यों का नहीं, बल्कि पूरे देश का है। इसलिए इस पूरे गिरोह की जांच सीबीआई करेगी और वो भी देशभर में फैलकर।

सभी राज्यों को सीबीआई को अनुमति देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने विपक्षी राजनीतिक दलों के शासन वाले राज्यों से भी डिजिटल अरेस्ट के मामलों की जांच के लिए सीबीआई को अनुमति देने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना सहित अन्य राज्यों से भी डिजिटल अरेस्ट के मामलों की जांच के लिए सीबीआई को अनुमति देने को कहा।

इंटरपोल की सहायता लेने का भी निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े मध्यस्थों को भी निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों से संबंधित घटनाओं की जांच में सीबीआई को पूरा विवरण मुहैया कराएं और सहयोग भी प्रदान करें। कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि जांच एजेंसी टैक्स के पनाहगाह विदेशी ठिकानों और देशों से संचालित साइबर अपराधियों तक पहुंचने के लिए इंटरपोल की सहायता ले।

आरबीआई को भी नोटिस जारी

साइबर अपराध और डिजिटल अरेस्ट के इस अतिसंवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को भी नोटिस जारी किया। शीर्ष अदालत ने पूछा कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में इस्तेमाल किए गए बैंक खातों को फ्रीज करने के लिए एआई या मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?

एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का विपक्ष को झटका, कहा- चुनाव आयोग के अधिकारों को चुनौती नहीं दी जा सकती

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सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता पर बहस शुरू हुई। देश के 12 राज्यों में चल रहे एसआईआर पर विपक्ष को तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट से साफ कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके पास ऐसा करने का पूरा संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रिया को रोकने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि अगर इसमें कोई अनियमितता सामने आई तो वह तुरंत सुधार के आदेश देगा।

सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें एसआईआर की वैधता को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एसआईआर के खिलाफ दायर तमिलनाडु, बंगाल और केरल की याचिका पर सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने बुधवार को पहले केरल का मुद्दा उठा, जहां स्थानीय निकाय चुनाव होने के आधार पर फिलहाल एसआइआर टालने की मांग की गई है। कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए दो दिसंबर की तारीख तय कर दी। फिर तमिलनाडु का मुद्दा उठा, जहां कई याचिकाओं के जरिये एसआइआर को चुनौती दी गई है। इस पर और बंगाल के मामले में भी आयोग को जवाब देने का निर्देश देते हुए नौ दिसंबर की तारीख तय की गई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस की शुरुआत करते हुए कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी डालने पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि देश में लाखों-करोड़ों लोग निरक्षर हैं जो फॉर्म नहीं भर सकते। उनका कहना था कि मतदाता गणना फॉर्म भरवाना ही अपने आप में लोगों को सूची से बाहर करने का हथियार बन गया है। सिब्बल ने कोर्ट से सवाल किया कि मतदाता को गणना फॉर्म भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है? चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार किसने दिया कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं? आधार कार्ड में जन्म तिथि और निवास स्थान दर्ज है। 18 साल से ऊपर कोई व्यक्ति अगर स्व-घोषणा कर दे कि वह भारतीय नागरिक है तो उसे मतदाता सूची में शामिल करने के लिए यही काफी होना चाहिए।

“मतदाता सूची को शुद्ध-अपडेट रखना आयोग का संवैधानिक दायित्व”

इस पर सीजेआई सूर्याकांत ने कहा कि आपने दिल्ली में चुनाव लड़ा है, वहां बहुत लोग वोट डालने नहीं आते. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव त्योहार की तरह मनाया जाता है। वहां हर व्यक्ति को पता होता है कि गांव का निवासी कौन है और कौन नहीं। वहां अधिकतम मतदान होता है और लोग अपने वोट को लेकर बहुत सजग रहते हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मतदाता सूची को शुद्ध और अपडेट रखना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है और इसके लिए वह जरूरी कदम उठा सकता है।

“एसआईआर को लेकर कोई ठोस शिकायत नहीं”

बेंच ने स्पष्ट किया कि एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर कोई ठोस शिकायत अभी तक सामने नहीं आई है, इसलिए इसे रोकने का कोई आधार नहीं बनता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि अगर कोई वास्तविक शिकायत या अनियमितता सामने आती है तो वह तुरंत हस्तक्षेप करेगा और सुधार के आदेश देगा।

पश्चिम बंगाल में 23 बीएलओ की मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, चुनाव आयोग से मांगा जवाब

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पश्चिम बंगाल वोटरलिस्ट के पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सियासत गर्म हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान काम के कथित दबाव से बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) की मौतें एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर मामले में 23 बीएलओ की मौत के आरोपों पर गंभीर चिंता जताई। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार की ओर से पेश वकील ने इस संबंध में जानकारी दी, जिसके बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा।

एक दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट में आज चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग से संबंधित विभिन्न मामलों पर सुनवाई हुई, जिसमें वोटर लिस्ट संशोधन, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौतों और केरल व तमिलनाडु के मुद्दों पर राजनीतिक दलों और एडीआर ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग दोनों को 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौत के संबंध में भी राज्य चुनाव कार्यालय से 1 दिसंबर तक जवाब तलब किया गया है।

23 बीएलओ की मौत के बाद बढ़ी चिंता

वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया के दौरान अब तक कई राज्यों में बीएलओ की मौत के मामले सामने आए हैं। सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही 23 बीएलओ की मौत हो चुकी है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि केरल राज्य चुनाव आयोग को भी जवाब दाखिल करने की अनुमति दी जाए। इस पर सीजेआई ने सहमति जताई। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि केरल मामले में भी 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करना होगा।

कैसे पता चलेगा, कुत्ता काटने के मूड में है या नहीं? कपिल सिब्बल की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी

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आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। इस दौरान आवारा कुत्तों और पशु-प्रेम को लेकर एक रोचक बहस देखने को मिली। सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता वंदना जैन की एक दलील पर टिप्पणी की, 'जब हम पशु प्रेमियों की बात करते हैं, तो इसमें सभी जानवर शामिल होते हैं। मैं अपने घर में कोई जानवर रखना चाहता हूं या नहीं, यह मेरा विवेक है।

कोर्ट ने पूछा-सोसाइटी में भैंस पालना चाहे तो क्या होगा?

आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणियां की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गेटेड कम्युनिटी में कुत्ते को घूमने देना चाहिए या नहीं, यह समुदाय को तय करना होगा। मान लीजिए, 90 प्रतिशत निवासियों को लगता है कि यह बच्चों के लिए खतरनाक होगा, लेकिन 10 फीसदी कुत्ते रखने पर जोर देते हैं। कोई कल भैंस ला सकता है। वे कह सकते हैं कि मुझे भैंस का दूध चाहिए।

शीर्ष अदालत ने सिब्बल को लगाई फटकार

आवारा कुत्तों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आज वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को लताड़ भी लगाई। दरअसल, बहस के दौरान सिब्बल ने कहा कि कुत्ते सड़कों पर नहीं होते हैं बल्कि परिसरों में रहते हैं। इसी दलील पर शीर्ष अदालत ने सिब्बल पर नाराजगी जताई।

शेल्टर में मौजूद कुत्तों को खाना खिलाने की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों पर सवाल करते हुए कहा, क्या कुत्तों को यह सिखाया जा सकता है कि वे किसी को न काटें? किसी को कैसे पता चलेगा कि कौन सा कुत्ता काटने के मूड में है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पशुप्रेमियों को शेल्टर में मौजूद कुत्तों को खाना खिलाना चाहिए।

उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, दिल्ली दंगा केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

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उमर खालिद और शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ी बड़ी साजिश के मामले में कोर्ट ने इन दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अन्य पांच आरोपियों गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दोनों को बेल नहीं दी जा सकती है। यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के केस की तुलना दूसरे आरोपियों से नहीं की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हर आरोपी की जमानत याचिका की जांच अलग-अलग करनी होगी, क्योंकि सातों आरोपी अपराध के मामले में एक समान स्थिति में नहीं हैं।

मुकदमे के ट्रायल में देरी जमानत का आधार नहीं

कोर्ट ने साफ किया कि मुकदमे के ट्रायल में हो रही देरी को 'ट्रंप कार्ड' की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा करने से वैधानिक सुरक्षा उपाय स्वतः ही निरस्त होने का खतरा है। अदालत ने कहा कि दोनों के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर हैं, इसलिए इस स्तर पर दोनों को राहत नहीं दी जा सकती।

उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका गंभीर

सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी भी की कि कुछ आरोपियों की ‘केंद्रीय भूमिका’ होती है, जबकि कुछ की भूमिका केवल सहायक या मददगार की होती है। इन दोनों के बीच फर्क किए बिना फैसला करना अपने आप में मनमाना होगा। कोर्ट ने माना कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका बाकी आरोपियों से अलग और अधिक गंभीर प्रकृति की प्रतीत होती है।

दिल्ली दंगे का मास्टरमाइंड होने का आरोप

बता दें कि उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद पर फरवरी 2020 की हिंसा के 'मास्टरमाइंड' होने का आरोप है, जिसमें यूएपीए और कई दूसरी धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। यह हिंसा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और प्रस्तावित नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स के विरोध प्रदर्शनों के बीच भड़की थी। इसमें 53 लोग मारे गए और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

अरावली पर सुप्रीम कोर्ट ने पलटा अपना ही फैसला, जानें अदालत ने क्या कहा

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अरावली हिल रेंज की परिभाषा को लेकर उठे सवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार 29 दिसंबर को बड़ा निर्णय देते हुए अपने ही पूर्व के फैसले के अमल पर रोक लगा दी है। सरकार से स्पष्ट जवाब मांगते हुए शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा, इस मामले में स्पष्टीकरण जरूरी है। इस मामले पर अब अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी।

कोर्ट ने कहा- कुछ मुद्दों पर स्पष्टीकरण आवश्यक

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने उस आदेश को फिलहाल स्थगित (अबेअन्स में) कर दिया है जिसमें अरावली की पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव संबंधित रिपोर्ट को स्वीकार कर ली गई थी और पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था। अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा नए सिरे से तय किए जाने के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 20 नवंबर के फैसले में दिए गए निर्देशों को स्थगित रखा जाएगा। अपने आदेश में अदालत ने कहा, इसमें कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर स्पष्टीकरण आवश्यक हैं। 

एक्‍सपर्ट कमेटी बनाने का दिया सुझाव

जस्टिस सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने पर्यावरण से जुड़े इस मामले पर अहम सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। शीर्ष अदालत ने उन्‍हें इस मामले में कोर्ट की सहायता करने को कहा है। सोमवार को भी इस मामले में एसजी तुषार मेहता ने पहले इस मामले में पक्ष रखा। उनकी दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट अरावली मामले से जुड़े विवाद को लेकर एक्‍सपर्ट कमेटी बनाने का भी सुझाव दिया है। कमेटी की रिपोर्ट आने तक अब 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिया गया फैसला प्रभावी नहीं होगा। 

अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी को

शीर्ष अदालत ने यह चिंता जताई कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और न्यायालय की टिप्पणियों की गलत व्याख्या की जा रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत , जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने कहा कि रिपोर्ट या न्यायालय के निर्देशों को लागू करने से पहले और अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है। बेंच ने खुद संज्ञान लेकर मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी की तारीख तय की है।

सुप्रीम कोर्ट ने 5 सवाल तय किए

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट अरावली मामले से जुड़े विवाद को लेकर 5 सवाल तय किए हैं।

1. क्या अरावली की परिभाषा को केवल 500 मीटर के क्षेत्र तक सीमित करना एक ऐसा संरचनात्मक विरोधाभास पैदा करता है, जिससे संरक्षण का दायरा संकुचित हो जाता है?

2. क्या इससे गैर-अरावली क्षेत्रों का दायरा बढ़ गया है, जहां नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है?

3. यदि दो अरावली क्षेत्र 100 मीटर या उससे अधिक के हों और उनके बीच 700 मीटर का अंतर (गैप) हो, तो क्या उस अंतर वाले क्षेत्र में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जानी चाहिए?

4. पर्यावरणीय निरंतरता (इकोलॉजिकल कंटिन्यूटी) को सुरक्षित कैसे रखा जाए?

5. यदि नियमों में कोई बड़ा कानूनी या नियामक खालीपन सामने आता है, तो क्या अरावली पर्वतमाला की संरचनात्मक मजबूती बनाए रखने के लिए विस्तृत आकलन की आवश्यकता होगी?

कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से झटका, जमानत पर हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे

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सुप्रीम कोर्ट में आज उन्नाव दुष्कर्म मामले में दोषी पाए गए भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के मुकदमे पर सुनवाई हुई। कुलदीप सेंगर की उन्नाव रेप मामले में आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।

उन्नाव रेप केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर की आजीवन कारावास की सजा निलंबित कर दी थी और सशर्त जमानत भी दे दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले को सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई की। चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रारंभिक रूप से, हम इस आदेश पर रोक लगाने के पक्ष में हैं।

चीफ जस्टिस ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें यह प्रतीत होता है कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण लीगल सवाल उठे हैं। हम इस तथ्य से अवगत हैं कि जब किसी दोषी या विचाराधीन कैदी को रिहा कर दिया गया हो, तो इस न्यायालय द्वारा संबंधित व्यक्ति को सुने बिना ऐसे आदेशों पर रोक नहीं लगाई जाती। लेकिन इस मामले के विशिष्ट तथ्यों को देखते हुए कि जहां दोषी एक अलग अपराध में भी सजा काट रहा है हम दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर 2025 के आदेश के संचालन पर रोक लगाते हैं।

1 हफ्ते में मांगा जवाब

याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। इसके लिए पूर्व विधायक को 1 हफ्ते का समय दिया गया है। कुलदीप सेंगर को अगले 7 दिन में जवाब दाखिल करना होगा

दिल्ली हाईकोर्ट ने निलंबित की थी सजा

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित कर दी थी, जिसके बाद सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया। इस मामले में अधिवक्ता अंजलि पटेल और पूजा शिल्पकार की ओर से दायर याचिकाओं पर भी सुनवाई होनी है। उन्नाव दुष्कर्म मामला देश के सबसे संवेदनशील और चर्चित मामलों में से एक रहा है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद अहम माना जा रहा है।

उन्नाव रेप कांड पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, सेंगर की उम्रकैद निलंबन पर होगा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट में आज की दिन अहम है। उन्नाव रेप कांड के दोषी पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस केस में कुलदीप सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने का आदेश दिया था। इसी राहत के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की याचिका

सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट के 23 दिसंबर के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिसमें सेंगर की अपील पेंडिंग रहने तक सजा सस्पेंड करने की अर्जी मंजूर की गई थी। इससे पहले, यह जानकारी सामने आई थी कि सीबीआई और पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का इरादा जताया था।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन

उन्नाव गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई से पहले अदालत के बाहर माहौल गरमा गया। पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग को लेकर बड़ी संख्या में महिला कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया। इस दौरान कांग्रेस की महिला कार्यकर्ता और आम महिलाएं भी शामिल रहीं। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए सभी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर मौके से हटा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर बढ़ाई गई सुरक्षा

बता दें कि सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता के परिवार ने दिल्ली में धरना प्रदर्शन किया था। इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

पीड़िता की मां ने जताया न्याय का भरोसा

इससे पहले उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता और उसकी मां ने रविवार को जंतर मंतर पर कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में हाथों में बैनर व तख्तियां लिए पहुंचे। पीड़िता की मां ने बताया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है और उन्हें उम्मीद है कि वहां से उन्हें न्याय मिलेगा। उन्होंने बताया कि उनपर केस वापस लेने का दवाब बनाया जा रहा है। हम बिना किसी डर के अपनी कानूनी लड़ाई लड़ना चाहती है और इसके लिए उसे सुरक्षा की जरूरत है। पीड़िता ने कहा मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील करती हूं कि मुझे इस तरह सुरक्षा दी जाए, जिससे मैं निडर होकर अपनी लड़ाई लड़ सकूं।

सुप्रीम कोर्ट ने BLO की मौत पर जताई चिंता, कहा-काम का बोझ कम करें, दिए कई बड़े निर्देश

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विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान के बीएलओ की हुई मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। इन स्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब राज्य सरकारों के लिए निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि बीएलओ के काम के घंटे कम करने के लिए राज्य सरकारें अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती करे। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने संबंधित मौतों और कथित आत्महत्याओं के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराने से इनकार कर दिया है।

राज्य सरकारों को कर्मचारी बढ़ाने का निर्देश

सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव से संबंधित कार्यों के लिए पर्याप्त स्टाफ सुनिश्चित करना पूरी तरह राज्य सरकारों जिम्मेदारी है। न्यायालय ने बीएलओ की मौत और आत्महत्याओं को स्वीकार करे हुए कहा कि चुनावी रोल और संबंधित कार्यों के लिए तैनाती एक कानूनी प्रक्रिया है, और राज्यों को मौजूदा कर्मचारियों पर बोझ कम करने के लिए पर्याप्त जनशक्ति प्रदान करनी चाहिए।

बीमार या असमर्थ कर्मचारियों के बदले वैकल्पिक तैनाती का निर्देश

चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली बेंच ने यह भी आदेश दिया कि जिन लोगों ने चुनाव आयोग की ओर से जारी एसआईआर प्रक्रिया में ड्यूटी से छूट के लिए सही और स्पष्ट वजहें दी हों, उनके अनुरोधों पर राज्य सरकार और सक्षम प्राधिकारी विचार करें और मामलों के आधार पर उन लोगों की जगह दूसरे कर्मियों की तैनाती की जाए। सीजेआई ने कहा, राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि अगर जरूरत है तो वह इस काम के लिए जरूरी कार्यबल मुहैया कराए।

टीवीके ने दायर की है याचिका

बता दें कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी- तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) की ओर से चुनौती दी गई है। तमिलनाडु के राजनीतिक दल टीवीके की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष दलील दी गई कि अब तक देश के अलग अलग राज्यों में 35–40 बीएलओ की मृत्यु काम के अत्यधिक दबाव के कारण हुई है। इसलिए हमने मुआवज़ा देने की मांग की है।

भारत धर्मशाला नहीं, घुसपैठियों के लिए ‘रेड कार्पेट’ नहीं बिछा सकते, सीजेआई सूर्यकांत की दो टूक

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार का दिन रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर बेहद गर्म रहा। पाँच रोहिंग्या नागरिकों के कथित हिरासत में गायब होने (कस्टोडियल डिसअपीयरेंस) को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाया। याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने की मांग की थी, लेकिन सीजेआई की पीठ ने इस मांग को साफ तौर पर खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर कड़ा रुख अपनाया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सीधा सवाल किया कि क्या भारत सरकार ने रोहिंग्याओं को कभी ‘शरणार्थी’ माना है। उन्होंने साफ कहा कि ‘शरणार्थी’ एक कानूनी शब्द है। सीजेआई ने टिप्पणी की कि जो लोग अवैध तरीके से देश में घुसते हैं, उनके लिए हम रेड कार्पेट नहीं बिछा सकते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे गंभीर

सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, आप जानते हैं कि ये लोग घुसपैठिए हैं। नॉर्थ-ईस्ट की सीमा बेहद संवेदनशील है। उन्होंने आगे कहा, देश में क्या-क्या हो रहा है, आप जानते हैं? अगर कोई गैरकानूनी तरीके से आता है। वो सुरंगों से घुस आते हैं, तब भी आप उनके लिए रेड कार्पेट चाहते हैं। आप कह रहे हैं कि उन्हें खाना, आश्रय, बच्चों के लिए शिक्षा… क्या कानून को इतना खींच दें?अदालत ने साफ कर दिया कि जहाँ मानवाधिकार महत्व रखते हैं, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे भी उतने ही गंभीर हैं।

याचिकाकर्ता के तर्क पर कोर्ट का रुख

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बताया कि वे रोहिंग्याओं के लिए कोई विशेष अधिकार नहीं माँग रहे हैं। उनकी बस यही माँग है कि अगर उन्हें उनके देश वापस भेजा जाए तो यह काम कानून के हिसाब से होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि रोहिंग्याओं का कानूनी दर्जा तय हुए बिना उनके अधिकारों पर बात नहीं हो सकती। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि भारत दुनिया की ‘धर्मशाला नहीं बन सकता’ जहाँ से चाहे शरणार्थी आ जाएँ। 

16 दिसंबर तक टली सुनवाई

इस मामले को अब अन्य रोहिंग्या मामलों के साथ ही सुना जाएगा। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर तक के लिए टाल दी है। उसी दिन रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़े अन्य मामलों की भी सुनवाई होगी।

डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सीबीआई को बड़ा आदेश, कहा-देशभर में तुरंत जांच शुरू करे

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डिजिटल अरेस्ट मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने पूरे देश के डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच सीबीआई को सौंप दी है। शीर्ष अदालत ने देश की संघीय जांच एजेंसी से कहा कि वह पहले अखिल भारतीय स्तर पर सामने आ चुके डिजिटल अरेस्ट घोटाले के मामलों की जांच करे।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस ठगी पर सख्ती दिखाई है, जिसमें लोगों को फोन करके ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर करोड़ों रुपए लुटे जा रहे थे। कोर्ट ने साफ कहा कि अब ये मामला सिर्फ राज्यों का नहीं, बल्कि पूरे देश का है। इसलिए इस पूरे गिरोह की जांच सीबीआई करेगी और वो भी देशभर में फैलकर।

सभी राज्यों को सीबीआई को अनुमति देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने विपक्षी राजनीतिक दलों के शासन वाले राज्यों से भी डिजिटल अरेस्ट के मामलों की जांच के लिए सीबीआई को अनुमति देने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना सहित अन्य राज्यों से भी डिजिटल अरेस्ट के मामलों की जांच के लिए सीबीआई को अनुमति देने को कहा।

इंटरपोल की सहायता लेने का भी निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े मध्यस्थों को भी निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों से संबंधित घटनाओं की जांच में सीबीआई को पूरा विवरण मुहैया कराएं और सहयोग भी प्रदान करें। कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि जांच एजेंसी टैक्स के पनाहगाह विदेशी ठिकानों और देशों से संचालित साइबर अपराधियों तक पहुंचने के लिए इंटरपोल की सहायता ले।

आरबीआई को भी नोटिस जारी

साइबर अपराध और डिजिटल अरेस्ट के इस अतिसंवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को भी नोटिस जारी किया। शीर्ष अदालत ने पूछा कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में इस्तेमाल किए गए बैंक खातों को फ्रीज करने के लिए एआई या मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?

एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का विपक्ष को झटका, कहा- चुनाव आयोग के अधिकारों को चुनौती नहीं दी जा सकती

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सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता पर बहस शुरू हुई। देश के 12 राज्यों में चल रहे एसआईआर पर विपक्ष को तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट से साफ कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके पास ऐसा करने का पूरा संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रिया को रोकने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि अगर इसमें कोई अनियमितता सामने आई तो वह तुरंत सुधार के आदेश देगा।

सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें एसआईआर की वैधता को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एसआईआर के खिलाफ दायर तमिलनाडु, बंगाल और केरल की याचिका पर सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने बुधवार को पहले केरल का मुद्दा उठा, जहां स्थानीय निकाय चुनाव होने के आधार पर फिलहाल एसआइआर टालने की मांग की गई है। कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए दो दिसंबर की तारीख तय कर दी। फिर तमिलनाडु का मुद्दा उठा, जहां कई याचिकाओं के जरिये एसआइआर को चुनौती दी गई है। इस पर और बंगाल के मामले में भी आयोग को जवाब देने का निर्देश देते हुए नौ दिसंबर की तारीख तय की गई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस की शुरुआत करते हुए कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी डालने पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि देश में लाखों-करोड़ों लोग निरक्षर हैं जो फॉर्म नहीं भर सकते। उनका कहना था कि मतदाता गणना फॉर्म भरवाना ही अपने आप में लोगों को सूची से बाहर करने का हथियार बन गया है। सिब्बल ने कोर्ट से सवाल किया कि मतदाता को गणना फॉर्म भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है? चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार किसने दिया कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं? आधार कार्ड में जन्म तिथि और निवास स्थान दर्ज है। 18 साल से ऊपर कोई व्यक्ति अगर स्व-घोषणा कर दे कि वह भारतीय नागरिक है तो उसे मतदाता सूची में शामिल करने के लिए यही काफी होना चाहिए।

“मतदाता सूची को शुद्ध-अपडेट रखना आयोग का संवैधानिक दायित्व”

इस पर सीजेआई सूर्याकांत ने कहा कि आपने दिल्ली में चुनाव लड़ा है, वहां बहुत लोग वोट डालने नहीं आते. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव त्योहार की तरह मनाया जाता है। वहां हर व्यक्ति को पता होता है कि गांव का निवासी कौन है और कौन नहीं। वहां अधिकतम मतदान होता है और लोग अपने वोट को लेकर बहुत सजग रहते हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मतदाता सूची को शुद्ध और अपडेट रखना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है और इसके लिए वह जरूरी कदम उठा सकता है।

“एसआईआर को लेकर कोई ठोस शिकायत नहीं”

बेंच ने स्पष्ट किया कि एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर कोई ठोस शिकायत अभी तक सामने नहीं आई है, इसलिए इसे रोकने का कोई आधार नहीं बनता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि अगर कोई वास्तविक शिकायत या अनियमितता सामने आती है तो वह तुरंत हस्तक्षेप करेगा और सुधार के आदेश देगा।

पश्चिम बंगाल में 23 बीएलओ की मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, चुनाव आयोग से मांगा जवाब

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पश्चिम बंगाल वोटरलिस्ट के पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सियासत गर्म हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान काम के कथित दबाव से बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) की मौतें एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर मामले में 23 बीएलओ की मौत के आरोपों पर गंभीर चिंता जताई। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार की ओर से पेश वकील ने इस संबंध में जानकारी दी, जिसके बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा।

एक दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट में आज चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग से संबंधित विभिन्न मामलों पर सुनवाई हुई, जिसमें वोटर लिस्ट संशोधन, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौतों और केरल व तमिलनाडु के मुद्दों पर राजनीतिक दलों और एडीआर ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग दोनों को 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौत के संबंध में भी राज्य चुनाव कार्यालय से 1 दिसंबर तक जवाब तलब किया गया है।

23 बीएलओ की मौत के बाद बढ़ी चिंता

वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया के दौरान अब तक कई राज्यों में बीएलओ की मौत के मामले सामने आए हैं। सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही 23 बीएलओ की मौत हो चुकी है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि केरल राज्य चुनाव आयोग को भी जवाब दाखिल करने की अनुमति दी जाए। इस पर सीजेआई ने सहमति जताई। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि केरल मामले में भी 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करना होगा।