सोमनाथ, 1026 से 2026: ग्लानि से गौरव तक के हजार वर्ष
✍️डॉ. विद्यासागर उपाध्याय
संजीव सिंह बलिया!समय गवाह है कि तलवारों की धार से
संजीव सिंह बलिया!समय गवाह है कि तलवारों की धार से मंदिरों की दीवारें तो गिराई जा सकती हैं, लेकिन राष्ट्र की चेतना को कभी कुचला नहीं जा सकता। 1026 में सोमनाथ के खंडहरों पर खड़ा होकर महमूद जिस जीत का अट्टहास कर रहा था, 2026 के कालखंड ने उसे इतिहास की धूल में मिला दिया है। आज सोमनाथ का स्वर्ण-शिखर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि इस सत्य की उद्घोषणा है कि—अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, सूर्य का उदय अटल है। अफगानिस्तान की उन अभेद्य और धूसर पर्वत कंदराओं के मध्य स्थित गजनी की गोद में, सन् 971 ईस्वी में महमूद का प्रादुर्भाव हुआ। नियति ने उसके अंतस में पिता सुबुक्तगीन से विरासत में मिली साम्राज्यवादी पिपासा और मजहबी कट्टरता के हलाहल का सम्मिश्रण कर दिया था। सिंहासनारूढ़ होते ही उसकी महत्वाकांक्षी दृष्टि ने मध्य एशिया के क्षितिज पर स्वयं को एक अप्रतिम सुल्तान के रूप में स्थापित करने का स्वप्न बुना। किंतु इस महात्वाकांक्षा के स्वर्ण-महल को निर्मित करने हेतु जिस अपार वैभव की आधारशिला चाहिए थी, उसकी प्राप्ति हेतु उसने एक विनाशकारी मार्ग चुना। उस युग का आर्यावर्त अपनी समृद्धि की पराकाष्ठा पर था—एक ऐसी 'स्वर्णमयी चिड़िया', जिसके देवालयों के शिखर सूर्य की रश्मियों से स्पर्धा करते थे और जिनकी अंतहीन मणियाँ विश्व को चकाचौंध करने हेतु पर्याप्त थीं। भारत के इसी अतुलनीय और अलौकिक वैभव ने महमूद की लुटेरी वृत्ति को एक हिंसक शिकारी की भाँति उकसाया। उसने आर्यावर्त की पवित्र धरा को लहूलुहान करने का एक वीभत्स संकल्प लिया। सन् 1000 से 1027 ईस्वी का वह कालखंड गवाह है, जब उसने भारत के हृदय पर एक-दो नहीं, अपितु सत्रह बार भीषण प्रहार किए। ये आक्रमण मात्र भौगोलिक विजय की लालसा नहीं थे, अपितु सभ्यता और संस्कृति पर बर्बरता का वह नंगा नाच था, जिसने इतिहास के पन्नों को सदा के लिए रक्तरंजित कर दिया। जब महमूद की बर्बर सेना ने कृष्ण की पावन क्रीड़ास्थली मथुरा की परिधि में प्रवेश किया, तो वहां की स्थापत्य कला की दिव्यता देख वह पाषाण-हृदय लुटेरा भी एक क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। यमुना के तट पर स्थित वे गगनचुंबी देवालय और उनमें जड़ित नीलमणि एवं हीरक खंड उसे स्वर्ग की साक्षात उपस्थिति जान पड़े। स्वयं महमूद ने इस नगर की उपमा देते हुए स्वीकार किया था— 'यदि कोई इस सदृश नगर का निर्माण करना चाहे, तो उसे एक लाख स्वर्ण दीनार व्यय करने होंगे और इसमें दो शताब्दी का समय लगेगा।' किंतु, उसकी मजहबी कट्टरता ने शीघ्र ही इस सराहना को विनाशकारी उन्माद में बदल दिया। मथुरा की वे गलियां, जहाँ कभी दिव्य वेणु-नाद गूंजता था, वहां अब केवल तलवारों की पैशाचिक खनक और निहत्थे नागरिकों का कारुणिक क्रंदन शेष था। महमूद के आदेश पर उन कलात्मक विग्रहों को हथौड़ों से खंडित किया गया, जिनके दर्शन मात्र से भक्त कृतार्थ हो जाते थे। समकालीन इतिहासकार अल-उतबी लिखता है कि— 'सुल्तान ने आदेश दिया कि सभी मंदिरों को जला दिया जाए और उन्हें भूमिसात कर दिया जाए।' मंदिरों के वे गर्भगृह, जो कभी चंदन और पारिजात की सुगंध से महकते थे, अब निर्दोष ब्राह्मणों और रक्षार्थ खड़े योद्धाओं के तप्त रक्त की गंध से भर गए। उस मुख्य भव्य मंदिर को, जिसकी सुंदरता का गुणगान सुल्तान ने स्वयं किया था, निर्दयतापूर्वक अग्नि के हवाले कर दिया गया। स्वर्णमयी प्रतिमाओं को गलियों में घसीटा गया और उनकी आँखों में जड़े बहुमूल्य रत्नों को क्रूरता से उखाड़ लिया गया। वह पावन नगरी, जो सहस्रों वर्षों से भारतीय संस्कृति का प्रखर दीप-स्तंभ थी, कुछ ही प्रहरों में धुएं और भस्म के ढेर में परिवर्तित कर दी गई। अल-उतबी के अनुसार, उस दिन पाँच हजार स्वर्ण की मूर्तियाँ और अनगिनत स्वर्ण-मुद्राएं लूट ली गईं। यमुना का जल, जो कभी नील वर्ण का था, उस दिन अपने पुत्रों के रक्त से लाल होकर बह रहा था। मथुरा का वह ध्वंस मात्र एक नगर की लूट नहीं थी, बल्कि एक जीवंत सभ्यता के हृदय पर किया गया सबसे वीभत्स और अमिट आघात था। सन् 1026 की वह शीतल प्रभात, जब अरब सागर की लहरें सोमनाथ के चरणों को पखार रही थीं, क्षितिज पर महमूद की बर्बर सेना के धूल के बादल मँडराने लगे। मंदिर की प्राचीर पर खड़े योद्धाओं ने जब शत्रु की विशाल वाहिनी को देखा, तो उनके मुख से केवल एक ही उद्घोष निकला— 'हर-हर महादेव!'। वह युद्ध मात्र दो सेनाओं का संघर्ष नहीं था, वह आततायी की राक्षसी प्रवृत्ति और भक्त की अडिग आस्था के मध्य एक धर्मयुद्ध था। गुजरात के दुर्गम पथों से होता हुआ जब महमूद मंदिर के सिंहद्वार तक पहुँचा, तो उसे उस प्रतिरोध का सामना करना पड़ा जिसकी उसने कल्पना भी न की थी। राजा भीमदेव प्रथम और उनके नेतृत्व में एकत्र हुए राजपूत योद्धाओं ने शौर्य की वह पराकाष्ठा दिखाई, जिसे देख शत्रु के दांत खट्टे हो गए। इतिहास साक्षी है कि मंदिर की रक्षा हेतु पचास सहस्र से अधिक निहत्थे ब्राह्मणों, संन्यासियों और वीर योद्धाओं ने स्वयं को वेदी पर अर्पित कर दिया। मंदिर के प्रांगण में रक्त की सरिता प्रवाहित होने लगी, किंतु एक भी शीश श्रद्धा के पथ से विचलित नहीं हुआ। सोमनाथ की अभेद्य प्रतीत होने वाली प्राचीरें केवल महमूद गजनवी के बाहरी प्रहारों से नहीं, बल्कि आंतरिक विश्वासघात और रणनीतिक क्षरण के आत्मघाती प्रहारों से ढह गई थीं, जिसका विवरण अल-बिरूनी और समकालीन इतिहासकारों ने अत्यंत पैनी दृष्टि से किया है। इस पतन की पटकथा में पहला प्रहार 'रणनीतिक चूक' के रूप में हुआ, जहाँ मंदिर के प्रबंधकों और पुजारियों के भीतर घर कर गई इस अव्यवहारिक और अति-धार्मिक धारणा ने कि देवता स्वयं प्रकट होकर म्लेच्छों का संहार करेंगे, वास्तविक सैन्य मोर्चाबंदी और सुरक्षा तैयारियों को पूरी तरह कुंद कर दिया। इसके समानांतर, 'राजनीतिक भूल' ने राष्ट्र की रीढ़ तोड़ दी, जब उत्तर भारत के शक्तिशाली राजा आपसी द्वेष और संकीर्ण अहम् के कारण राजा भीमदेव प्रथम के आह्वान पर एकजुट नहीं हुए, जिससे महमूद को वह खंडित प्रतिरोध मिला जिसने उसकी राह आसान कर दी। किंतु सबसे मर्मभेदी सत्य वह 'पेशेवर विश्वासघात' था, जिसके तहत महमूद की सेना में 'तिलक' जैसे उच्चपदस्थ हिंदू सेनापति और 'सालार-ए-हिंदुवान' जैसी पेशेवर हिंदू सैनिक टुकड़ियाँ शामिल थीं; ये भारतीय गद्दार भाड़े के सैनिक अपनी ही साझी विरासत और पवित्र देवालय के विरुद्ध मात्र वेतन और लूट के माल के लोभ में तलवारें भांज रहे थे, जो इस ऐतिहासिक त्रासदी को विश्वासघात की एक ऐसी पराकाष्ठा बना देता है जहाँ अपनों के ही हाथों अपनों का ही सर्वस्व विनष्ट हो गया। अंततः, संख्याबल और विश्वासघात की कतरनी ने वीरता के उस कवच को भेद दिया। काज़विनी लिखते हैं, "इस लड़ाई में 50 हज़ार से अधिक स्थानीय लोग मारे गए। इसके बाद महमूद ने मंदिर में प्रवेश किया। पूरा मंदिर लकड़ी के 56 खंभों पर टिका हुआ था, लेकिन स्थापत्य कला का सबसे बड़ा आश्चर्य था मंदिर की मुख्य मूर्ति जो कि बिना किसी सहारे के हवा में लटकी हुई थी। महमूद ने मूर्ति को आश्चर्य से देखा।" अल-बरूनी ने भी मंदिर का वर्णन करते हुए लिखा, "मंदिर के मुख्य भगवान शिव थे। ज़मीन से दो मीटर की ऊँचाई पर पत्थर का शिव लिंग रखा हुआ था.। उसके बग़ल में सोने और चाँदी से बनी कुछ और मूर्तियाँ थीं." महमूद जब गर्भगृह में प्रविष्ट हुआ, तो उसकी आँखों में दानवीय लोलुपता थी। वह दृश्य अत्यंत वीभत्स और हृदयविदारक था—जिस ज्योतिर्लिंग की पूजा युगों से देवता और गंधर्व करते आए थे, उस पर महमूद ने अपनी गदा से प्रहार किया। अल-बिरूनी के साक्ष्य बताते हैं कि लिंग के खंडित होते ही उसके भीतर छिपे बहुमूल्य रत्न बिखर गए। लूट का वह दृश्य मानवीय कल्पना से परे था। मंदिर के स्वर्णद्वार उखाड़ लिए गए, नीलमणि से जड़ित झूमर काट दिए गए और खंभों में जड़े हीरों को बर्बरता से कुरेदा गया। उसने चालीस मन वज़न की सोने की ज़ंजीर, जिससे महाघंट लटकता था तोड़ डाली। किवाड़ों, चौखटों और छत से चाँदी के पत्तर छुड़ा लिए। फिर भी उसे संतोष नहीं हुआ, और उसने गुप्त कोष की तलाश में पूरे गर्भगृह को खुदवा डाला. इतिहासकार सिराज ने 'तबाकत-ए-नासिरी' में लिखा, "महमूद सोमनाथ की मूर्तियों को अपने साथ ग़ज़नी ले गया जहाँ उसे तोड़ कर चार हिस्सों में बाँटा गया। उसका एक हिस्सा जुमे को होने वाली नमाज़ की जगह पर लगाया गया, दूसरा हिस्सा शाही महल के प्रवेश द्वार पर लगाया गया. तीसरे हिस्से को उसने मक्का और चौथे हिस्से को मदीना भिजवा दिया." अल-बिरूनी ने लिखा, "महमूद के हमलों ने भारत में आर्थिक तबाही मचा दी. शुरू के हमलों का मुख्य उद्देश्य मवेशियों को लूटना होता था. बाद में इन हमलों का उद्देश्य शहरी ख़ज़ाने को लूटना और युद्ध बंदी बनाना हो गया ताकि उन्हें ग़ुलामों की तरह बेचा या सेना में भर्ती किया जा सके." अल-उतबी अपनी पुस्तक 'तारीख-ए-यामिनी' में उस वीभत्सता का प्रमाण देते हुए लिखता है कि सोमनाथ, मथुरा और
कन्नौज के अभियानों के बाद महमूद लगभग एक लाख भारतीय बंदियों को जंजीरों में जकड़कर गजनी ले गया था। बंदियों की संख्या इतनी अधिक थी कि गजनी के बाजारों में 'गुलामों' की भरमार हो गई और माँग से अधिक आपूर्ति के कारण उनकी कीमत गिरकर मात्र कुछ दिरहम रह गई। यह केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक सभ्यता के अपमान की पराकाष्ठा थी। अफगानिस्तान के गजनी शहर के बाहर स्थित वह विशाल चौक और वहाँ बना वह पत्थर का चबूतरा आज भी उस बर्बरता का मूक गवाह है, जहाँ भारत की मर्यादा को कौड़ियों के भाव तौला गया था। इतिहास की सबसे खौफ़नाक और हृदयविदारक गूँज ''दुख्तरे हिन्दोस्तान.. नीलामे दो दीनार'' (अर्थात् हिंदुस्तान की बेटियाँ, दो दीनार में नीलाम) उसी चौक से उठी थी। वह चबूतरा साक्ष्य है उस दारुण कालखंड का, जब आर्यावर्त के अबलाओं को पशुओं की भाँति सार्वजनिक रूप से खड़ा किया गया और मात्र दो दीनार के तुच्छ मूल्य पर उनकी बोलियाँ लगाई गईं। यह कृत्य केवल एक आर्थिक विनिमय नहीं, बल्कि एक महान प्राचीन सभ्यता को मानसिक और सांस्कृतिक रूप से कुचलने का सुनियोजित प्रयास था। वह चीत्कार आज भी भारतीय इतिहास की सबसे भयावह चेतावनी बनकर गूँजती है कि जब-जब राष्ट्र अपनी आंतरिक एकता और सामरिक शक्ति को खोता है, तब-तब उसकी संतानों को ऐसी अमानवीय और रूह कँपा देने वाली नियति का सामना करना पड़ता है। अल-बिरूनी ने अपनी कालजयी कृति 'किताब-उल-हिंद' में सोमनाथ के ध्वंस और उसके दूरगामी सामाजिक प्रभावों का अत्यंत सूक्ष्म एवं हृदयविदारक चित्रण करते हुए लिखा है कि महमूद के भीषण प्रहारों ने भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि को समूल नष्ट कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप यहाँ का सुसंस्कृत हिंदू समाज भय और असुरक्षा के कारण 'धूल के कणों' की भाँति दिशा-हीन होकर बिखर गया। वह आगे अत्यंत स्पष्टता से स्वीकार करता है कि महमूद की इन पैशाचिक क्रूरताओं और देवालयों के अपमान ने भारतीय जनमानस के अंतस में विदेशी आक्रांताओं के प्रति एक ऐसी अमिट और 'अगाध घृणा' को जन्म दे दिया, जिसे शब्दों की परिधि में बांधना असंभव है, और इसी विद्वेष ने आगे चलकर दोनों संस्कृतियों के मध्य एक कभी न भरने वाली खाई का निर्माण कर दिया। वह ध्वंस केवल पत्थरों का गिरना नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा पर हुआ वह आघात था जिसकी गूँज आज एक सहस्राब्दी बाद भी इतिहास के गलियारों में सुनाई देती है। जिस महमूद ने हज़ारों हँसते-खेलते परिवारों को उजाड़ा, देव-प्रतिमाओं को पैरों तले रौंदा और आर्यावर्त की पवित्र धरा को निर्दोषों के रक्त से सिंचित किया, नियति ने उसके लिए एक ऐसा अंत चुना जो किसी भी नरक की कल्पना से अधिक भयावह था। सन् 1030 ईस्वी के आते-आते वह महाबली सुल्तान, जिसका नाम सुनकर कभी सीमाएँ कांपती थीं, स्वयं अपनी ही काया के भीतर कैद होकर रह गया। वह शरीर, जिसने कभी युद्ध की प्रत्यंचा चढ़ाई थी, अब तपेदिक (टीबी) और पक्षाघात (Paralysis) की अग्नि में तिल-तिल कर जल रहा था। प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार स्टेनली लेनपूल ने अपनी चर्चित कृति 'मिडीवल इंडिया' (Medieval India) में महमूद के अंतिम क्षणों की वह मर्मस्पर्शी और दुःखद झाँकी प्रस्तुत की है, जो 'बुरा काम का बुरा नतीजा' का जीवंत साक्ष्य है। लेनपूल लिखते हैं कि मृत्यु से मात्र दो दिन पूर्व, जब सुल्तान को यह आभास हुआ कि 'मलकुल-मौत' (मौत का फरिश्ता) उसके प्राण हरने हेतु द्वार पर आ खड़ा है, तब उसने एक अत्यंत विचित्र और हृदयविदारक आज्ञा दी। उसने आदेश दिया कि मथुरा, कन्नौज और सोमनाथ के पवित्र मंदिरों से लूटा गया वह समस्त स्वर्ण, मणिक्य और हीरकों का अथाह भंडार उसके शयनकक्ष के सम्मुख बिछा दिया जाए। लेनपूल के अनुसार, जब वह सारा वैभव उसकी आँखों के सामने चमक रहा था, तब वह विजेता का गर्व करने के बजाय एक निरीह अपराधी की भाँति फूट-फूट कर रोने लगा। वह दृश्य चीख-चीख कर कह रहा था कि जिस रक्त-रंजित दौलत के लिए उसने मानवता का संहार किया, वही दौलत उसे कब्र के उस सन्नाटे और ईश्वर के न्याय से बचाने में लेशमात्र भी सहायक नहीं थी। इतिहासकार अल-उतबी के संकेतों और बाद के वृत्तांतों के अनुसार, जब वह अथाह स्वर्ण-राशि उसके सामने सूर्य की भांति चमक रही थी, तब महमूद विजेता की मुस्कान नहीं, बल्कि एक पराजित अपराधी की चीखें मार रहा था। वह बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अपनी आँखों से उन रत्नों को देख रहा था और फूट-फूट कर रो रहा था। वह रो रहा था क्योंकि वह जान चुका था कि—जिस संपत्ति के लिए उसने हज़ारों माँओं की गोद सूनी की, हज़ारों सुहागिनों का सिंदूर पोंछा और पवित्र मंदिरों को अपवित्र किया, वह दौलत उसे मौत के दर्द से एक क्षण की भी मुक्ति नहीं दिला सकती थी। इतिहासकार अबुल फजल बैहाकी ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'तारीख-ए-बैहाकी' में महमूद गजनवी के जीवन के अंतिम कालखंड का अत्यंत मार्मिक और वीभत्स विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि अपने अंतिम दिनों में सुल्तान शारीरिक व्याधियों और मानसिक संताप के कारण अत्यंत एकाकी, हताश और चिड़चिड़ा हो गया था। बैहाकी, जो उस समय के राजकीय घटनाक्रमों का सूक्ष्म दृष्टा था, उल्लेख करता है कि वह क्रूर विजेता रातों की नींद खो चुका था और अक्सर एकांत कक्ष में अपनी लूटी हुई धन-संपदा तथा बेशकीमती रत्नों के ढेरों को निहारते हुए स्वयं से ही बड़बड़ाता था। उस समय उसकी आँखों में जीत का गर्व नहीं, बल्कि एक गहरी रिक्तता और बेबसी झलकती थी। 'तारीख-ए-बैहाकी' के ये पन्ने उस अहंकारी सत्ता के पतन का साक्षात प्रमाण हैं, जहाँ महमूद को अपनी ढलती सांसों के साथ यह कटु बोध हो रहा था कि जिस वैभव हेतु उसने रक्तपात का तांडव रचा, वह उसकी आत्मा को शांति देने और मृत्यु के पाश से मुक्त कराने में सर्वथा असमर्थ था। उसकी पीड़ा इतनी असहनीय थी कि वह हमेशा कराहता रहता था, लेकिन उसका साथ देने वाला कोई न था। वह एकाकीपन का दंश झेल रहा था। वह धन जिसे उसने अपना खुदा माना था, वही उसकी आँखों के सामने एक मौन बोझ बन गया था। इतिहासकारों के अनुसार, उसने उन रत्नों को अंतिम विदा देते हुए कहा था— 'हाय! यह सब यहीं रह जाएगा और मैं अपने साथ केवल अपने कुकर्मों का बोझ लेकर जा रहा हूँ।' अंततः, 30 अप्रैल 1030 को, वह अत्यंत अपमानजनक और कष्टप्रद स्थिति में मृत्यु को प्राप्त हुआ। महमूद गजनवी की कब्र अफ़ग़ानिस्तान के ग़ज़नी शहर के पास रौज़ा गाँव में खोदी गई, जिसे फ़िरोज़ी बाग़ के नाम से भी जाना जाता था,उसका अंत चीख-चीख कर कह रहा था कि प्रकृति का न्याय भले ही देर से आए, परंतु वह निष्पक्ष और अत्यंत कठोर होता है। जो वैभव रक्त की नींव पर खड़ा होता है, उसका अंत अंततः राख और आँसुओं के सागर में ही होता है। इतिहास का चक्र अनवरत घूमता है और समय हर अन्याय का हिसाब चुकता करता है। महमूद गजनवी का वह क्रूर अट्टहास, जिसने 1026 में सोमनाथ की दीवारों को हिला दिया था, आज 2026 की गूँज में विलीन हो चुका है। महमूद ने सोचा था कि वह मूर्तियों को तोड़कर एक संस्कृति का अंत कर देगा, किंतु वह भूल गया था कि भारत की आत्मा पत्थरों में नहीं, उसके जन-मानस की अटूट श्रद्धा में बसती है। आज वर्ष 2026 में, महमूद के उस आक्रमण के एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर, दृश्य पूरी तरह बदल चुका है। जहाँ गजनी आज अपने ही कर्मों के मलबे के नीचे दरिद्रता और अशांति की धूल फांक रहा है, वहीं भारत विश्वपटल पर एक अजेय आर्थिक और सामरिक महाशक्ति के रूप में उभर चुका है। सरदार वल्लभभाई पटेल के उस कालजयी संकल्प से निर्मित आज का सोमनाथ मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारत के स्वाभिमान का पुनर्जन्म है। समुद्र की लहरें आज भी सोमनाथ के चरणों को पखारती हैं, लेकिन अब उनमें पराजय का क्रंदन नहीं, बल्कि 'नए भारत' की विजय का गर्जन है। वह स्वर्ण-शिखर, जिसे महमूद ने कभी लूटा था, आज पहले से कहीं अधिक भव्यता के साथ सूर्य की किरणों को परावर्तित कर रहा है। सोमनाथ की यह गाथा हमें स्मरण कराती है कि सभ्यताएं शस्त्रों से नहीं, संस्कारों और धैर्य से जीवित रहती हैं। आतातायी आते हैं और धूल में मिल जाते हैं, लेकिन जो संस्कृति 'सत्य' और 'शिव' पर आधारित है, वह सदैव अजेय रहती है। आज का सशक्त भारत अपनी विरासत का रक्षक भी है और भविष्य का निर्माता भी। 'सोमनाथ 1026 से 2026' की यह यात्रा साक्ष्य है कि सत्य को प्रताड़ित किया जा सकता है, पराजित नहीं। गजनी का पतन और सोमनाथ का यह गौरवशाली उत्थान ही नियति का अंतिम और पूर्ण न्याय है।
Jan 05 2026, 22:46
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