हर साल 9 अगस्त को क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस ? जानिए रोचक इतिहास
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आज पूरी दुनिया में 'विश्व आदिवासी दिवस' मना रही है। आज ही के दिन यानी हर साल 9 अगस्त को झारखंड आदिवासी महोत्सव भी मनाया जाता है। मुख्यधारा से अलग रहने की वजह से आदिवासी समुदाय लंबे समय से आर्थिक और कई सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उनके इन्हीं अधिकारों के विकास और समृद्ध संस्कृति के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। इस खास मौके पर झारखंड आदिवासी महोत्सव का आयोजन होता है।
कोलंबस दिवस से जुड़ा है आदिवासी दिवस
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार 1994 को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी वर्ष घोषित किया था। अमेरिका में 12 अक्टूबर को हर साल कोलंबस दिवस मनाया जाता है और वहां के आदिवासियों का मानना था कि कोलंबस उस उपनिवेशी शासन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके लिए बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ था। इसके बाद फिर कोलंबस दिवस की जगह पर आदिवासी दिवस मनाने की मागं उठी। इसके लिए 1977 में जेनेवा में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया और इस सम्मेलन में कोलंबस दिवस की जगह आदिवासी दिवस मनाने की मांग की गई।
विश्व आदिवासी दिवस मनाने की खास वजह
संयुक्त राष्ट्र ने 2019 में विश्व आदिवासी दिवस मनाने का एलान किया। आज आदिवासी समाज के लोगों को अपना अस्तित्व, संस्कृति और सम्मान बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इसकी एक मुख्य वजह ये है कि ये लोग प्रकृति से समीप रहना ज्यादा पसंद करते हैं और जंगलों में रहते हैं जिसकी वजह से ये मुख्यधारा से कटे रहते हैं। आज जंगल घटते जा रहे हैं जिसकी वजह से इनकी संख्या भी कम होती जा रही है। आदिवासी समाज के लोगों का मुख्य आहार आज भी पेड़-पौधों से जुड़ा है, इनके धर्म-त्योहार भी प्रकृति से जुड़े हैं। दुनिया भर में 500 मिलियन के करीब आदिवासी रहते हैं और 7000 भाषाएं बोलते हैं, 5000 संस्कृतियों के साथ दुनिया के 22 प्रतिशत भूमि पर इनका कब्जा है। इनकी वजह से पर्यावरण संरक्षित है। साल 2016 में 2680 ट्राइबल भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर थीं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र ने इन भाषाओं और इस समाज के लोगों को समझने और समझाने के लिए 2019 में विश्व आदिवासी दिवस मनाने का एलान किया।
विश्व आदिवासी दिवस मनाने का उद्देश्य
विश्व आदिवासी दिवस का उद्देश्य केवल आदिवासी समुदायों की संस्कृति का उत्सव मनाना ही नहीं है, बल्कि उनके उनके अधिकारों, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार से जुड़े जैसे मुद्दों पर समाज के साथ सरकार का ध्यान आकर्षित करना भी है। यह दिन हमें उनकी पहचान और विरासत को संरक्षित करने की याद दिलाता है कि विकास के साथ आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा और प्रकृति से उनके संबंधों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।
भारत में आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी
भारत में भी आदिवासी समुदायों की एक बड़ी आबादी। झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा समेत कई राज्यों में अलग-अलग जनजातीय समुदाय के लोग रहते हैं। मध्य प्रदेश की बात कहें तो यहां 46 आदिवासी जनजातियां रहती हैं, जिसमें एमपी की कुल जनसंख्या के 21 फीसदी लोग आदिवासी समुदाय के हैं। वहीं झारखंड की कुल आबादी का करीब 28 फीसदी आदिवासी समाज के लोग हैं। झारखंड में संथाल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, बिरहोर, पहाड़िया सहित कई जनजातियां हैं। जबकि मध्य प्रदेश में गोंड, भील, बैगा, सहरिया और कोरकू जैसे आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में से एक गोंड है। गोंड एशिया का सबसे बड़ा आदिवासी समूह है, जिनकी संख्या 30 लाख से अधिक है। जो मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में रहते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में संथाल, बंजारा, बिरहोर, चेरो, हो, खोंड, लोहरा, मुंडा, पहाड़िया और उरांव समेत कई अन्य जनजातीय समुदाय अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के साथ जीवन जी रहे हैं।
Aug 09 2026, 10:46
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