नेपाल में 5 मार्च को चुनाव, भारत के लिए क्यों है अहम?
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भारत से सटे देश नेपाल में 5 मार्च को राष्ट्रीय चुनाव होने जा रहा है। यह चुनाव युवाओं के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के छह महीने बाद हो रहा है, जिन्होंने मार्क्सवादी नेता केपी शर्मा ओली के प्रशासन को गिरा दिया था। इस प्रदर्शन के दौरान दर्जनों लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों पर हमला किया था और पुलिस ने गोलीबारी की थी।
तय होगी भारत-नेपाल संबंध की दिशा
इस बार के चुनाव में मुख्य मुकाबला केपी शर्मा ओली और काठमांडू के पूर्व मेयर और राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी के युवा चेहरे बालेंद्र शाह के बीच है। पड़ोसी देश होने के नाते इस चुनाव के परिणाम का सीधा असर भारत पर भी पड़ेगा। काठमांडू की सत्ता में कौन बैठेगा, यह तय करेगा कि आने वाले समय में भारत-नेपाल संबंध किस दिशा में आगे बढ़ेंगे।
लिखित इतिहास से भी पुराना भारत-नेपाल संबंध
भारत के लिए नेपाल केवल एक पड़ोसी नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच 'रोटी-बेटी' का पुराना नाता है। दोनों देशों के बीच का संबंध लिखित इतिहास से भी पुराना बताया जाता है, जिसकी छवि आज भी खुली सीमाओं में नजर आती है। इसलिए नेपाल से जुड़ा हर अहम विषय भारत को बहुत ही गहराई से प्रभावित करता है।
1,850 किमी लंबी खुली सीमा की चिंता
भारत और नेपाल के बीच 1,850 किलोमीटर से अधिक लंबी खुली सीमा है। नेपाल में राजनीतिक स्थिरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। अगर नेपाल में एक मजबूत और भारत-समर्थक सरकार बनती है, तो सीमा पार से होने वाली तस्करी, जाली नोटों के कारोबार और घुसपैठ जैसी समस्याओं पर लगाम लगाना आसान हो जाता है।
भारत के लिए स्थिर नेपाल जरूरी
भारत की अपने संबंधों के भविष्य के लिहाज से नेपाल के चुनाव पर नजर लगी हुई है। भारत को एक शांतिपूर्ण पड़ोस की आवश्यकता है। अशांति से ग्रस्त पड़ोस भारत की ऊर्जा को सोख लेगा। इसलिए पड़ोस भारत के अपने विकास, क्षेत्रीय और वैश्विक भूमिका, और राजनीतिक और भू-रणनीतिक भूमिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नेपाल में बढ़ी चीन की दखल
वहीं, पिछले कुछ वर्षों में नेपाल की राजनीति में चीन की दखलंदाजी तेजी से बढ़ी है। बीजिंग लगातार बुनियादी ढांचे और निवेश के जरिए काठमांडू को लुभाने की कोशिश कर रहा है। नेपाल के चुनावों में अक्सर वामपंथी गठबंधन (जिनका झुकाव कभी-कभी चीन की तरफ होता है) और लोकतांत्रिक ताकतों (जो भारत के करीब माने जाते हैं) के बीच कड़ी टक्कर होती है। नई दिल्ली की नजर इस बात पर है कि चुनाव जीतकर आने वाली नई सरकार का कूटनीतिक झुकाव किस तरफ होगा।
चीन की दखल भारत के लिए चिंता का विषय
बता दें कि नेपाल की खुली सीमा तीन दिशाओं में भारत के पाँच अलग-अलग राज्यों से जुड़ी है। उत्तर में तिब्बत के पठार से सीमा जुड़ने के कारण नेपाल की रणनीतिक भू-राजनीतिक स्थिति और यहाँ बढ़ते दिख रहे चीनी प्रभाव को लेकर पश्चिमी देश भी रुचि दिखाते रहे हैं। साल 2017 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल की सरकार के दौरान नेपाल चीन की परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव (बीआरआई) में शामिल हुआ था। बाद में 2024 के अंत में के पी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल ने बीआरआई कार्यान्वयन ढांचे पर हस्ताक्षर किए। चीन के सहयोग से नेपाल में रेलमार्ग निर्माण पर भारत को कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन यदि नेपाल द्वारा दी गई कोई भी रियायत भारत की सुरक्षा को प्रभावित करती है, तो वहीं हमारी चिंता शुरू होगी।




3 hours ago
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