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Homeo Doctor in Hyderabad for Hearing Loss: Holistic Support for Better Hearing

Looking for a trusted homeo doctor in Hyderabad for hearing loss? Spiritual Homeopathy provides personalized homeopathic care focused on long-term hearing wellness.

Hearing loss is a condition that can affect people of all ages, making it difficult to communicate effectively and participate confidently in everyday activities. Whether it develops gradually due to aging or occurs because of infections, injuries, or prolonged noise exposure, hearing loss deserves timely attention. Consulting an experienced homeo doctor in Hyderabad can help you understand the possible causes and receive personalized homeopathic care tailored to your health needs.

The early signs of hearing loss are often overlooked. You may find it difficult to hear conversations in crowded places, frequently ask others to repeat themselves, or notice ringing sounds in your ears. Some people also experience reduced sound clarity or depend on higher volumes while using televisions or mobile devices. Seeking advice from a qualified homeo doctor in Hyderabad at the first sign of these symptoms can help ensure appropriate evaluation and guidance.

Hearing loss can result from several factors, including age-related changes, repeated exposure to loud sounds, recurrent ear infections, hereditary conditions, ear injuries, excessive earwax, and certain chronic illnesses. Since no two patients have the same medical history, a detailed assessment is essential. A skilled homeo doctor in Hyderabad carefully evaluates your symptoms, lifestyle, and overall health before preparing a personalized treatment plan.

Homeopathy follows an individualized approach that focuses on the person rather than only the condition. A homeo doctor in Hyderabad considers your physical health, emotional well-being, and personal medical history to develop a customized treatment strategy. Regular follow-up consultations allow the treatment plan to be reviewed and adjusted according to your progress. This holistic approach supports the body's natural healing ability while promoting overall wellness.

Spiritual Homeopathy is committed to providing patient-centered care through detailed consultations and individualized treatment plans. The clinic focuses on understanding each patient's unique concerns and delivering compassionate support throughout the treatment journey. With branches in KPHB, Dilsukhnagar, Chandanagar, and Nallagandla, Spiritual Homeopathy is a preferred choice for individuals searching for a dependable homeo doctor in Hyderabad.

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माफी काफी नहीं है', एनसीईआरटी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त बरकरार, सीजेआई ने लगाई फटकार

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एनसीईआरटी ने कक्षा 8 की सोशल साइंस के ज्यूडिशियरी से जुड़े चैप्टर पर विवाद बढ़ गया है। किताब में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाले अंश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रूख अपनाया है। विवाद पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में एनसीईआरटी का माफी मांगना पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने पूछा- इसके पीछे कौन?

सीजेआई की फटकार के बाद एनसीईआरटी ने ‘ज्यूडिशियल करप्शन’ वाले चैप्टर को हटाने का फैसला किया है। उसने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी गलती मानी है और इसके लिए माफी मांगी है।सीजेआई सूर्यकांत ने फटकार लगाते हुए कहा है कि बस माफी मांगना या चैप्टर हटाना काफी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी से कहा है कि वे बताए इसके पीछे कौन हैं, पूरी बात सामने आने तक सुनवाई जारी रहेगी।

एनसीईआरटी के निदेशक को कारण बताना होगा

सुनवाई के दौरान एनसीईआरटी ने कहा कि वे बिना शर्त माफी मांगने को तैयार हैं। किताब से विवादित अंश को भी हटा दिया जाएगा। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि केवल माफी मांगना और किताब से आपत्तिजनक अंशों को हटाना पर्याप्त नहीं है। एनसीईआरटी के निदेशक को कारण बताना होगा। ये सोच-समझकर उठाया गया कदम है। अदालत ने सवाल किया कि इस मामले को अवमानना क्यों न माना जाए? चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने ऑनलाइन प्रतियों को भी तत्काल हटाने के निर्देश दिए।

क्या है मामला?

दरअसल, NCERT ने क्लास 8 की सोशल साइंस की नई किताब जारी की। किताब में पहली बार ज्यूडिशियरी में करप्शन पर एक सेक्शन जोड़ा गया। बुक का अपडेटेड एडिशन पहले के एडिशन से अलग है। बुक में एक चैप्टर का नाम है हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों और लंबित मामलों के बारे में बताया गया है।

चैप्टर में क्या?

किताब में इस समस्या के बड़े पैमाने को साफ-साफ बताया गया है। इसमें अलग-अलग कोर्ट में लगभग 53,321,000 पेंडिंग केस बताए गए हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट में 81,000, पूरे भारत के हाई कोर्ट में 62.4 लाख (62,40,000) और डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट में लगभग 4.7 करोड़ (4,70,00,000) केस हैं। चैप्टर में लोगों की सोच और चिंताओं का भी जिक्र है। चैप्टर में लिखा है, लोग ज्यूडिशियरी के अलग-अलग लेवल पर करप्शन का अनुभव करते हैं। गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए न्याय तक पहुंच आसान नहीं है। भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बी आर गवई का जिक्र करते हुए, बुक में कहा गया है कि करप्शन और गलत काम लोगों के भरोसे को नुकसान पहुंचाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

पुस्तक में जोड़े गए इस हिस्से को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया गया है। अदालत ने भरोसा दिलाया कि उचित और कानूनी कदम उठाए जाएंगे। सीजेआई ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

उन्नाव रेप कांड पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, सेंगर की उम्रकैद निलंबन पर होगा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट में आज की दिन अहम है। उन्नाव रेप कांड के दोषी पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस केस में कुलदीप सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने का आदेश दिया था। इसी राहत के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की याचिका

सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट के 23 दिसंबर के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिसमें सेंगर की अपील पेंडिंग रहने तक सजा सस्पेंड करने की अर्जी मंजूर की गई थी। इससे पहले, यह जानकारी सामने आई थी कि सीबीआई और पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का इरादा जताया था।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन

उन्नाव गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई से पहले अदालत के बाहर माहौल गरमा गया। पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग को लेकर बड़ी संख्या में महिला कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया। इस दौरान कांग्रेस की महिला कार्यकर्ता और आम महिलाएं भी शामिल रहीं। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए सभी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर मौके से हटा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर बढ़ाई गई सुरक्षा

बता दें कि सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता के परिवार ने दिल्ली में धरना प्रदर्शन किया था। इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

पीड़िता की मां ने जताया न्याय का भरोसा

इससे पहले उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता और उसकी मां ने रविवार को जंतर मंतर पर कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में हाथों में बैनर व तख्तियां लिए पहुंचे। पीड़िता की मां ने बताया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है और उन्हें उम्मीद है कि वहां से उन्हें न्याय मिलेगा। उन्होंने बताया कि उनपर केस वापस लेने का दवाब बनाया जा रहा है। हम बिना किसी डर के अपनी कानूनी लड़ाई लड़ना चाहती है और इसके लिए उसे सुरक्षा की जरूरत है। पीड़िता ने कहा मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील करती हूं कि मुझे इस तरह सुरक्षा दी जाए, जिससे मैं निडर होकर अपनी लड़ाई लड़ सकूं।

भारत धर्मशाला नहीं, घुसपैठियों के लिए ‘रेड कार्पेट’ नहीं बिछा सकते, सीजेआई सूर्यकांत की दो टूक

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार का दिन रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर बेहद गर्म रहा। पाँच रोहिंग्या नागरिकों के कथित हिरासत में गायब होने (कस्टोडियल डिसअपीयरेंस) को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाया। याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने की मांग की थी, लेकिन सीजेआई की पीठ ने इस मांग को साफ तौर पर खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर कड़ा रुख अपनाया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सीधा सवाल किया कि क्या भारत सरकार ने रोहिंग्याओं को कभी ‘शरणार्थी’ माना है। उन्होंने साफ कहा कि ‘शरणार्थी’ एक कानूनी शब्द है। सीजेआई ने टिप्पणी की कि जो लोग अवैध तरीके से देश में घुसते हैं, उनके लिए हम रेड कार्पेट नहीं बिछा सकते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे गंभीर

सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, आप जानते हैं कि ये लोग घुसपैठिए हैं। नॉर्थ-ईस्ट की सीमा बेहद संवेदनशील है। उन्होंने आगे कहा, देश में क्या-क्या हो रहा है, आप जानते हैं? अगर कोई गैरकानूनी तरीके से आता है। वो सुरंगों से घुस आते हैं, तब भी आप उनके लिए रेड कार्पेट चाहते हैं। आप कह रहे हैं कि उन्हें खाना, आश्रय, बच्चों के लिए शिक्षा… क्या कानून को इतना खींच दें?अदालत ने साफ कर दिया कि जहाँ मानवाधिकार महत्व रखते हैं, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे भी उतने ही गंभीर हैं।

याचिकाकर्ता के तर्क पर कोर्ट का रुख

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बताया कि वे रोहिंग्याओं के लिए कोई विशेष अधिकार नहीं माँग रहे हैं। उनकी बस यही माँग है कि अगर उन्हें उनके देश वापस भेजा जाए तो यह काम कानून के हिसाब से होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि रोहिंग्याओं का कानूनी दर्जा तय हुए बिना उनके अधिकारों पर बात नहीं हो सकती। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि भारत दुनिया की ‘धर्मशाला नहीं बन सकता’ जहाँ से चाहे शरणार्थी आ जाएँ। 

16 दिसंबर तक टली सुनवाई

इस मामले को अब अन्य रोहिंग्या मामलों के साथ ही सुना जाएगा। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर तक के लिए टाल दी है। उसी दिन रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़े अन्य मामलों की भी सुनवाई होगी।

पश्चिम बंगाल में 23 बीएलओ की मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, चुनाव आयोग से मांगा जवाब

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पश्चिम बंगाल वोटरलिस्ट के पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सियासत गर्म हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान काम के कथित दबाव से बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) की मौतें एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर मामले में 23 बीएलओ की मौत के आरोपों पर गंभीर चिंता जताई। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार की ओर से पेश वकील ने इस संबंध में जानकारी दी, जिसके बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा।

एक दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट में आज चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग से संबंधित विभिन्न मामलों पर सुनवाई हुई, जिसमें वोटर लिस्ट संशोधन, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौतों और केरल व तमिलनाडु के मुद्दों पर राजनीतिक दलों और एडीआर ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग दोनों को 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौत के संबंध में भी राज्य चुनाव कार्यालय से 1 दिसंबर तक जवाब तलब किया गया है।

23 बीएलओ की मौत के बाद बढ़ी चिंता

वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया के दौरान अब तक कई राज्यों में बीएलओ की मौत के मामले सामने आए हैं। सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही 23 बीएलओ की मौत हो चुकी है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि केरल राज्य चुनाव आयोग को भी जवाब दाखिल करने की अनुमति दी जाए। इस पर सीजेआई ने सहमति जताई। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि केरल मामले में भी 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करना होगा।

*Three unknown facts about Ramayana*

Desk: Ramayana is not just about the story of the war between Ram and Ravana. This story contains various pictures of the life of the people of that era. Naturally, many anecdotes have been created - most of which are unknown to us. Three such facts are -

1) Bali of the Ramayana is the hunter named Jara of the Mahabharata who was responsible for the killing of Krishna during the Dwapara Yuga.

2) According to many Ramayanas other than Valmiki, Surpanakha was married and instigated Ravana to abduct Sita in revenge for Rama killing her husband, the 'evil-minded demon'.

3) In the last war between Rama and Ravana, Bali's son Angad played a huge role in Rama's victory. Ravana was performing a yagna before going to war. Angad and some of the monkey army arrived there to spoil the yagna, but Ravana's attention could not be diverted by anything. Finally, Angad started pulling on Queen Mandodari's braid. Even then, Ravana remained steadfast. But Mandodari taunted Ravana and said that Rama was doing so much for his wife and Ravana was unable to protect his wife from this monkey clan. After hearing this, Ravana broke the yagna and chased away Angad and his army, and needless to say, he was defeated in the war.

Courtesy by: www.machinnamasta.in

जब तक मजबूत केस नहीं, अदालतें हस्तक्षेप नहीं करतीं” वक्फ कानून पर सीजेआई गवई की दो टूक

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सुप्रीम कोर्ट में नए वक्फ अधिनियम, 2025 को लेकर सुनवाई चल रही है. मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाली दो सदस्यों की पीठ मामले की सुनवाई कर रही है। वक्फ (संशोधन)अधिनियम 2025 के मामले पर अंतिम फैसला आने तक संशोधित कानून को लागू करने पर रोक लगाई गई है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने जब तक मजबूत केस नहीं बनता, तब तक अदालतें हस्तक्षेप नहीं करतीं।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि कानून में किसी को भी वक्फ संपत्ति को लेकर आपत्ति जताने का हक दिया गया है और जब तक उस पर विवाद चलेगा तो संपत्ति वक्फ की नहीं रहेगी। उनको आपत्ति है कि 100-200 साल पुराने वक्फ के कागजात कहां से आएंगे और अल्लाह को दान की गई संपत्ति किसी और को ट्रांसफर कैसे की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं की ओर से उन्होंने दलील दी कि यह हमारे डीएनए में हैं। सिब्बल ने कहा कि अगर वक्फ संपत्ति को लेकर कोई विवाद होता है तो उसका फैसला करने वाला भी सरकार का अधिकारी ही होगा। उन्होंने कहा कि नए कानून के अनुसार कोई भी वक्फ संपत्ति पर आपत्ति जता सकता है।।

सिब्बल ने कोर्ट को वक्फ का मतलब समझाते हुए कहा, 'वक्फ क्या है, यह अल्लाह को किया गया दान है, जिसे किसी और को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। एक बार वक्फ की गई संपत्ति वक्फ ही रहती है।' कपिल सिब्बल ने कहा कि वक्फ संपत्ति के मैनेजमेंट का अधिकार लिया जा रहा। सिब्बल ने कहा कि यह अधिनियम सरकार की ओर से वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करने का एक प्रयास है।

इसी दौरान सीजेआई गवई ने कहा, यह मामला संवैधानिकता के बारे में है। अदालतें आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करती हैं, इसलिए जब तक आप एक बहुत मजबूत मामला नहीं बनाते, कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करती है। सीजेआई ने आगे कहा कि औरंगाबाद में वक्फ संपत्तियों को लेकर बहुत सारे विवाद हैं।

अंतरिम आदेश के लिए सुनवाई इन तीन मुद्दों तक ही सीमित रखें, केंद्र की सुप्रीम कोर्ट से अपील

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सुप्रीम कोर्ट, वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस के विनोद के चंद्रन की बेंच सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा कि बेंच ने पहले तीन मुद्दे उठाए थे ⁠स्टे के लिए। हमने इन तीनों पर जवाब दाखिल किया था। लेकिन अब लिखित दलीलों में और भी मुद्दे शामिल हो गए हैं। सिर्फ तीन मुद्दों तक सुनवाई सीमित हो। कपिल सिब्बल ने इसका विरोध किया।

सरकार ने जिन मुद्दों पर सुनवाई सीमित रखने की अपील की है, उनमें एक मुद्दा है अदालत द्वारा घोषित, वक्फ बाय यूजर या वक्फ बाय डीड संपत्ति को डी-नोटिफाई करने का है। दूसरा मुद्दा केंद्रीय और प्रदेश वक्फ बोर्ड के गठन से जुड़ा है, जिनमें गैर मुस्लिमों को शामिल किए जाने का विरोध हो रहा है। तीसरा मुद्दा वक्फ कानून के उस प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें जिलाधिकारी द्वारा जांच और उसकी मंजूरी के बाद ही किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित किया जाएगा।

वक्फ अधिनियम, 2025 के प्रावधानों को चुनौती देने वाले लोगों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी ने इन दलीलों का विरोध किया कि अलग-अलग हिस्सों में सुनवाई नहीं हो सकती। एक मुद्दा अदालत द्वारा वक्फ, वक्फ बाई यूजर या वक्फ बाई डीड घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने के अधिकार का है।

याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाया गया दूसरा मुद्दा राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना से संबंधित है, जहां उनका तर्क है कि पदेन सदस्यों को छोड़कर केवल मुसलमानों को ही इसमें काम करना चाहिए। तीसरा मुद्दा एक प्रावधान से संबंधित है, जिसमें कहा गया है कि जब कलेक्टर यह पता लगाने के लिए जांच करते हैं कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, तो वक्फ संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा।

इससे पहले 17 अप्रैल को हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सुनिश्चित किया था कि वे किसी भी वक्फ संपत्ति को डी-नोटिफाई नहीं करेंगे, इनमें वक्फ बाय यूजर भी शामिल है। साथ ही वक्फ बोर्डों में नई नियुक्ति पर भी कोई नई नियुक्ति न करने की बात कही थी।

वक्फ मालमे में आज भी नहीं आया फैसला, अगली तारीख 15 मई तय, नए सीजेआई करेंगे सुनवाई

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सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई 15 मई तक के लिए स्थगित कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई नए न्यायमूर्ति बीआर गवई के समक्ष निर्धारित की है। बीआर गवई देश के अगले मुख्य न्यायधीश होंगे। ऐसे में याचिका अब उनके सामने ही रखी जाएगी। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कहा कि इस मामले में विस्तार से सुनवाई की जरूरत है। अब अगले चीफ जस्टिस भूषण रामाकृष्ण गवई के सामने मामला लगेगा।

वक्फ संशोधन कानून पर देश के मुख्य न्यायधीश संजीव खन्ना, जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ इस मामले को सुन रही है। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ जैसे ही सुनवाई के लिए बैठी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अगले हफ्ते तक सुनवाई टालने के लिए पीठ से आग्रह किया। पीठ उनकी मांग पर राजी हो गई।

केंद्र के हलफनामे पर क्या बोले सीजेआई?

आज की सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायधीश संजीव खन्ना ने कहा कि वह हलफनामे में बहुत गहराई में नहीं गए, लेकिन उसमें वक्फ बाय यूजर के रजिस्ट्रेशन को लेकर कुछ पॉइंट उठाए गए हैं और कुछ विवादित आंकड़े भी दिए गए हैं, जिन पर विचार करने की जरूरत है कि कुछ ऐसे पहलू हैं, जिनसे आप (केंद्र) निपट चुके हैं, लेकिन उस पर स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। अदालत ने कहा कि रजिस्ट्रेशन और कुछ आंकड़ों के आधार पर मुद्दे उठाए गए हैं, जिन पर याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है। अदालत ने कहा कि चूंकि सीजेआई खन्ना के रिटायरमेंट के दिन नजदीक हैं, वो अंतिम चरण में भी कोई निर्णय या आदेश सुरक्षित नहीं रखना चाहते। ऐसे में, अब इस मामले को अगले गुरूवार को देश के सीजेआई होने जा रहे जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनेगी।

केस दूसरी पीठ के समक्ष रखा

बता दें कि सीजेआई संजीव खन्ना 13 मई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और इसी को देखते हुए उन्होंने कहा कि वे कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आदेश सुरक्षित नहीं रखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने ये केस दूसरी पीठ के समक्ष रखा है। पिछली सुनवाई 17 अप्रैल को हुई थी, जिसमें कोर्ट ने सरकार से कहा था कि पहले से पंजीकृत या अधिसूचना के माध्यम से घोषित वक्फ संपत्तियों, जिनमें वक्फ बाय यूजर भी शामिल है, को अगली सुनवाई की तारीख तक न तो छेड़ा जाएगा और न ही गैर अधिसूचित किया जाएगा, साथ ही वक्फ बोर्ड में कोई नई नियुक्ति न हो।

वक्फ कानून के बारे में

वक्फ संपत्तियों को रेगुलेट और मैनेज करने के लिए सरकार ने 1995 के वक्फ कानून में कुछ संशोधन किया था। जिसको धार्मिक और मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी पार्टियों और मुस्लिम संगठनों ने याचिका दायर किया है। इस कानून को लोकसभा से तीन अप्रैल को जबकि राज्यसभा से चार अप्रैल को पारित कराया गया। 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की सहमति मिल जाने के बाद संशोधन लागू हो गया। इसके बाद कई राजनीतिक दल जैसे डीएमके, वाईएसआरसीपी, एआईएमआईएम, वामपंथी दल समेत कई एनजीओ, मुस्लिम निकाय और अन्य ने अधिनियम की वैधता को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था।

सुप्रीम कोर्ट में नए वक्फ कानून पर आज सुनवाई, सांविधानिक वैधता मामले में हो सकता है फैसला

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सुप्रीम कोर्ट आज वक्फ (संशोधन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। पिछली सुनवाई में अदालत ने कानून के दो मुख्य पहलुओं पर रोक लगा दी थी। पिछली सुनवाई में अदालत ने कानून के दो मुख्य पहलुओं पर रोक लगा दी थी। 17 अप्रैल को सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार व जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ को केंद्र की ओर से आश्वासन दिया गया था कि वह 5 मई तक न तो वक्फ बाय यूजर समेत वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करेगा, न ही केंद्रीय वक्फ परिषद व बोर्डों में कोई नियुक्ति करेगा।

याचिकाओं पर हो सकती है अंतिम सुनवाई

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच इस मामले की अंतिम सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट आज यह तय करेगा कि वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोई अंतरिम आदेश जारी किया जाए या नहीं। सीजेआई संजीव खन्ना 13 मई को रिटायर होने वाले हैं, इसलिए उनके पास समय कम है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार की ओर से कई वकीलों को सुनना होगा।

वक्फ संपत्तियों में 20 लाख एकड़ से ज्यादा के इजाफा का दावा

केंद्र सरकार ने याचिकाओं के जवाब में 1,300 पेज का हलफनामा दाखिल किया है। केंद्र ने 25 अप्रैल को दायर हलफनामे में कहा कि कानून पूरी तरह संवैधानिक है। यह संसद से पास हुआ है, इसलिए इस पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। हलफनामे में सरकार ने दावा किया 2013 के बाद से वक्फ संपत्तियों में 20 लाख एकड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ। इस वजह से कई बार निजी और सरकारी जमीनों पर विवाद हुआ। वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार के आंकड़ों को गलत बताया और कोर्ट से झूठा हलफनामा देने वाले वाले अधिकारी पर कार्रवाई की मांग की।

नए कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 70 से ज्यादा याचिकाएं दायर

बता दें कि पांच अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलने के बाद केंद्र ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को पिछले महीने अधिसूचित किया था। वक्फ (संशोधन) विधेयक को लोकसभा ने 288 सदस्यों के समर्थन से पारित किया, जबकि 232 सांसद इसके खिलाफ थे। राज्यसभा में इसके पक्ष में 128 और इसके खिलाफ 95 सदस्यों ने मतदान किया। वहीं, इसके पास होने के बाद कई राजनीतिक दलों और मुस्लिम संगठनों ने अधिनियम की वैधता को शीर्ष अदालत में चुनौती दिया था। नए वक्फ कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 70 से ज्यादा याचिकाएं दायर हुई हैं, लेकिन कोर्ट सिर्फ पांच मुख्य याचिकाओं पर ही सुनवाई करेगा। याचिकाओं के इस समूह में एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी द्वारा दायर एक याचिका भी शामिल है।

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माफी काफी नहीं है', एनसीईआरटी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त बरकरार, सीजेआई ने लगाई फटकार

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एनसीईआरटी ने कक्षा 8 की सोशल साइंस के ज्यूडिशियरी से जुड़े चैप्टर पर विवाद बढ़ गया है। किताब में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाले अंश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रूख अपनाया है। विवाद पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में एनसीईआरटी का माफी मांगना पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने पूछा- इसके पीछे कौन?

सीजेआई की फटकार के बाद एनसीईआरटी ने ‘ज्यूडिशियल करप्शन’ वाले चैप्टर को हटाने का फैसला किया है। उसने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी गलती मानी है और इसके लिए माफी मांगी है।सीजेआई सूर्यकांत ने फटकार लगाते हुए कहा है कि बस माफी मांगना या चैप्टर हटाना काफी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी से कहा है कि वे बताए इसके पीछे कौन हैं, पूरी बात सामने आने तक सुनवाई जारी रहेगी।

एनसीईआरटी के निदेशक को कारण बताना होगा

सुनवाई के दौरान एनसीईआरटी ने कहा कि वे बिना शर्त माफी मांगने को तैयार हैं। किताब से विवादित अंश को भी हटा दिया जाएगा। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि केवल माफी मांगना और किताब से आपत्तिजनक अंशों को हटाना पर्याप्त नहीं है। एनसीईआरटी के निदेशक को कारण बताना होगा। ये सोच-समझकर उठाया गया कदम है। अदालत ने सवाल किया कि इस मामले को अवमानना क्यों न माना जाए? चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने ऑनलाइन प्रतियों को भी तत्काल हटाने के निर्देश दिए।

क्या है मामला?

दरअसल, NCERT ने क्लास 8 की सोशल साइंस की नई किताब जारी की। किताब में पहली बार ज्यूडिशियरी में करप्शन पर एक सेक्शन जोड़ा गया। बुक का अपडेटेड एडिशन पहले के एडिशन से अलग है। बुक में एक चैप्टर का नाम है हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों और लंबित मामलों के बारे में बताया गया है।

चैप्टर में क्या?

किताब में इस समस्या के बड़े पैमाने को साफ-साफ बताया गया है। इसमें अलग-अलग कोर्ट में लगभग 53,321,000 पेंडिंग केस बताए गए हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट में 81,000, पूरे भारत के हाई कोर्ट में 62.4 लाख (62,40,000) और डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट में लगभग 4.7 करोड़ (4,70,00,000) केस हैं। चैप्टर में लोगों की सोच और चिंताओं का भी जिक्र है। चैप्टर में लिखा है, लोग ज्यूडिशियरी के अलग-अलग लेवल पर करप्शन का अनुभव करते हैं। गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए न्याय तक पहुंच आसान नहीं है। भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बी आर गवई का जिक्र करते हुए, बुक में कहा गया है कि करप्शन और गलत काम लोगों के भरोसे को नुकसान पहुंचाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

पुस्तक में जोड़े गए इस हिस्से को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया गया है। अदालत ने भरोसा दिलाया कि उचित और कानूनी कदम उठाए जाएंगे। सीजेआई ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

उन्नाव रेप कांड पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, सेंगर की उम्रकैद निलंबन पर होगा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट में आज की दिन अहम है। उन्नाव रेप कांड के दोषी पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस केस में कुलदीप सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने का आदेश दिया था। इसी राहत के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की याचिका

सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट के 23 दिसंबर के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिसमें सेंगर की अपील पेंडिंग रहने तक सजा सस्पेंड करने की अर्जी मंजूर की गई थी। इससे पहले, यह जानकारी सामने आई थी कि सीबीआई और पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का इरादा जताया था।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन

उन्नाव गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई से पहले अदालत के बाहर माहौल गरमा गया। पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग को लेकर बड़ी संख्या में महिला कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया। इस दौरान कांग्रेस की महिला कार्यकर्ता और आम महिलाएं भी शामिल रहीं। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए सभी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर मौके से हटा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर बढ़ाई गई सुरक्षा

बता दें कि सेंगर को मिली इस राहत के खिलाफ देशभर में आक्रोश है। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता के परिवार ने दिल्ली में धरना प्रदर्शन किया था। इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

पीड़िता की मां ने जताया न्याय का भरोसा

इससे पहले उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता और उसकी मां ने रविवार को जंतर मंतर पर कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में हाथों में बैनर व तख्तियां लिए पहुंचे। पीड़िता की मां ने बताया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है और उन्हें उम्मीद है कि वहां से उन्हें न्याय मिलेगा। उन्होंने बताया कि उनपर केस वापस लेने का दवाब बनाया जा रहा है। हम बिना किसी डर के अपनी कानूनी लड़ाई लड़ना चाहती है और इसके लिए उसे सुरक्षा की जरूरत है। पीड़िता ने कहा मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील करती हूं कि मुझे इस तरह सुरक्षा दी जाए, जिससे मैं निडर होकर अपनी लड़ाई लड़ सकूं।

भारत धर्मशाला नहीं, घुसपैठियों के लिए ‘रेड कार्पेट’ नहीं बिछा सकते, सीजेआई सूर्यकांत की दो टूक

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार का दिन रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर बेहद गर्म रहा। पाँच रोहिंग्या नागरिकों के कथित हिरासत में गायब होने (कस्टोडियल डिसअपीयरेंस) को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाया। याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने की मांग की थी, लेकिन सीजेआई की पीठ ने इस मांग को साफ तौर पर खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर कड़ा रुख अपनाया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सीधा सवाल किया कि क्या भारत सरकार ने रोहिंग्याओं को कभी ‘शरणार्थी’ माना है। उन्होंने साफ कहा कि ‘शरणार्थी’ एक कानूनी शब्द है। सीजेआई ने टिप्पणी की कि जो लोग अवैध तरीके से देश में घुसते हैं, उनके लिए हम रेड कार्पेट नहीं बिछा सकते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे गंभीर

सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, आप जानते हैं कि ये लोग घुसपैठिए हैं। नॉर्थ-ईस्ट की सीमा बेहद संवेदनशील है। उन्होंने आगे कहा, देश में क्या-क्या हो रहा है, आप जानते हैं? अगर कोई गैरकानूनी तरीके से आता है। वो सुरंगों से घुस आते हैं, तब भी आप उनके लिए रेड कार्पेट चाहते हैं। आप कह रहे हैं कि उन्हें खाना, आश्रय, बच्चों के लिए शिक्षा… क्या कानून को इतना खींच दें?अदालत ने साफ कर दिया कि जहाँ मानवाधिकार महत्व रखते हैं, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़े मुद्दे भी उतने ही गंभीर हैं।

याचिकाकर्ता के तर्क पर कोर्ट का रुख

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बताया कि वे रोहिंग्याओं के लिए कोई विशेष अधिकार नहीं माँग रहे हैं। उनकी बस यही माँग है कि अगर उन्हें उनके देश वापस भेजा जाए तो यह काम कानून के हिसाब से होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि रोहिंग्याओं का कानूनी दर्जा तय हुए बिना उनके अधिकारों पर बात नहीं हो सकती। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि भारत दुनिया की ‘धर्मशाला नहीं बन सकता’ जहाँ से चाहे शरणार्थी आ जाएँ। 

16 दिसंबर तक टली सुनवाई

इस मामले को अब अन्य रोहिंग्या मामलों के साथ ही सुना जाएगा। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर तक के लिए टाल दी है। उसी दिन रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़े अन्य मामलों की भी सुनवाई होगी।

पश्चिम बंगाल में 23 बीएलओ की मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, चुनाव आयोग से मांगा जवाब

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पश्चिम बंगाल वोटरलिस्ट के पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सियासत गर्म हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान काम के कथित दबाव से बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) की मौतें एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर मामले में 23 बीएलओ की मौत के आरोपों पर गंभीर चिंता जताई। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार की ओर से पेश वकील ने इस संबंध में जानकारी दी, जिसके बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा।

एक दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट में आज चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग से संबंधित विभिन्न मामलों पर सुनवाई हुई, जिसमें वोटर लिस्ट संशोधन, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौतों और केरल व तमिलनाडु के मुद्दों पर राजनीतिक दलों और एडीआर ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग दोनों को 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में बीएलओ की मौत के संबंध में भी राज्य चुनाव कार्यालय से 1 दिसंबर तक जवाब तलब किया गया है।

23 बीएलओ की मौत के बाद बढ़ी चिंता

वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया के दौरान अब तक कई राज्यों में बीएलओ की मौत के मामले सामने आए हैं। सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही 23 बीएलओ की मौत हो चुकी है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि केरल राज्य चुनाव आयोग को भी जवाब दाखिल करने की अनुमति दी जाए। इस पर सीजेआई ने सहमति जताई। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि केरल मामले में भी 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करना होगा।

*Three unknown facts about Ramayana*

Desk: Ramayana is not just about the story of the war between Ram and Ravana. This story contains various pictures of the life of the people of that era. Naturally, many anecdotes have been created - most of which are unknown to us. Three such facts are -

1) Bali of the Ramayana is the hunter named Jara of the Mahabharata who was responsible for the killing of Krishna during the Dwapara Yuga.

2) According to many Ramayanas other than Valmiki, Surpanakha was married and instigated Ravana to abduct Sita in revenge for Rama killing her husband, the 'evil-minded demon'.

3) In the last war between Rama and Ravana, Bali's son Angad played a huge role in Rama's victory. Ravana was performing a yagna before going to war. Angad and some of the monkey army arrived there to spoil the yagna, but Ravana's attention could not be diverted by anything. Finally, Angad started pulling on Queen Mandodari's braid. Even then, Ravana remained steadfast. But Mandodari taunted Ravana and said that Rama was doing so much for his wife and Ravana was unable to protect his wife from this monkey clan. After hearing this, Ravana broke the yagna and chased away Angad and his army, and needless to say, he was defeated in the war.

Courtesy by: www.machinnamasta.in

जब तक मजबूत केस नहीं, अदालतें हस्तक्षेप नहीं करतीं” वक्फ कानून पर सीजेआई गवई की दो टूक

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सुप्रीम कोर्ट में नए वक्फ अधिनियम, 2025 को लेकर सुनवाई चल रही है. मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाली दो सदस्यों की पीठ मामले की सुनवाई कर रही है। वक्फ (संशोधन)अधिनियम 2025 के मामले पर अंतिम फैसला आने तक संशोधित कानून को लागू करने पर रोक लगाई गई है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने जब तक मजबूत केस नहीं बनता, तब तक अदालतें हस्तक्षेप नहीं करतीं।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि कानून में किसी को भी वक्फ संपत्ति को लेकर आपत्ति जताने का हक दिया गया है और जब तक उस पर विवाद चलेगा तो संपत्ति वक्फ की नहीं रहेगी। उनको आपत्ति है कि 100-200 साल पुराने वक्फ के कागजात कहां से आएंगे और अल्लाह को दान की गई संपत्ति किसी और को ट्रांसफर कैसे की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं की ओर से उन्होंने दलील दी कि यह हमारे डीएनए में हैं। सिब्बल ने कहा कि अगर वक्फ संपत्ति को लेकर कोई विवाद होता है तो उसका फैसला करने वाला भी सरकार का अधिकारी ही होगा। उन्होंने कहा कि नए कानून के अनुसार कोई भी वक्फ संपत्ति पर आपत्ति जता सकता है।।

सिब्बल ने कोर्ट को वक्फ का मतलब समझाते हुए कहा, 'वक्फ क्या है, यह अल्लाह को किया गया दान है, जिसे किसी और को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। एक बार वक्फ की गई संपत्ति वक्फ ही रहती है।' कपिल सिब्बल ने कहा कि वक्फ संपत्ति के मैनेजमेंट का अधिकार लिया जा रहा। सिब्बल ने कहा कि यह अधिनियम सरकार की ओर से वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करने का एक प्रयास है।

इसी दौरान सीजेआई गवई ने कहा, यह मामला संवैधानिकता के बारे में है। अदालतें आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करती हैं, इसलिए जब तक आप एक बहुत मजबूत मामला नहीं बनाते, कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करती है। सीजेआई ने आगे कहा कि औरंगाबाद में वक्फ संपत्तियों को लेकर बहुत सारे विवाद हैं।

अंतरिम आदेश के लिए सुनवाई इन तीन मुद्दों तक ही सीमित रखें, केंद्र की सुप्रीम कोर्ट से अपील

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सुप्रीम कोर्ट, वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस के विनोद के चंद्रन की बेंच सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा कि बेंच ने पहले तीन मुद्दे उठाए थे ⁠स्टे के लिए। हमने इन तीनों पर जवाब दाखिल किया था। लेकिन अब लिखित दलीलों में और भी मुद्दे शामिल हो गए हैं। सिर्फ तीन मुद्दों तक सुनवाई सीमित हो। कपिल सिब्बल ने इसका विरोध किया।

सरकार ने जिन मुद्दों पर सुनवाई सीमित रखने की अपील की है, उनमें एक मुद्दा है अदालत द्वारा घोषित, वक्फ बाय यूजर या वक्फ बाय डीड संपत्ति को डी-नोटिफाई करने का है। दूसरा मुद्दा केंद्रीय और प्रदेश वक्फ बोर्ड के गठन से जुड़ा है, जिनमें गैर मुस्लिमों को शामिल किए जाने का विरोध हो रहा है। तीसरा मुद्दा वक्फ कानून के उस प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें जिलाधिकारी द्वारा जांच और उसकी मंजूरी के बाद ही किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित किया जाएगा।

वक्फ अधिनियम, 2025 के प्रावधानों को चुनौती देने वाले लोगों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी ने इन दलीलों का विरोध किया कि अलग-अलग हिस्सों में सुनवाई नहीं हो सकती। एक मुद्दा अदालत द्वारा वक्फ, वक्फ बाई यूजर या वक्फ बाई डीड घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने के अधिकार का है।

याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाया गया दूसरा मुद्दा राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना से संबंधित है, जहां उनका तर्क है कि पदेन सदस्यों को छोड़कर केवल मुसलमानों को ही इसमें काम करना चाहिए। तीसरा मुद्दा एक प्रावधान से संबंधित है, जिसमें कहा गया है कि जब कलेक्टर यह पता लगाने के लिए जांच करते हैं कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, तो वक्फ संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा।

इससे पहले 17 अप्रैल को हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सुनिश्चित किया था कि वे किसी भी वक्फ संपत्ति को डी-नोटिफाई नहीं करेंगे, इनमें वक्फ बाय यूजर भी शामिल है। साथ ही वक्फ बोर्डों में नई नियुक्ति पर भी कोई नई नियुक्ति न करने की बात कही थी।

वक्फ मालमे में आज भी नहीं आया फैसला, अगली तारीख 15 मई तय, नए सीजेआई करेंगे सुनवाई

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सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई 15 मई तक के लिए स्थगित कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई नए न्यायमूर्ति बीआर गवई के समक्ष निर्धारित की है। बीआर गवई देश के अगले मुख्य न्यायधीश होंगे। ऐसे में याचिका अब उनके सामने ही रखी जाएगी। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कहा कि इस मामले में विस्तार से सुनवाई की जरूरत है। अब अगले चीफ जस्टिस भूषण रामाकृष्ण गवई के सामने मामला लगेगा।

वक्फ संशोधन कानून पर देश के मुख्य न्यायधीश संजीव खन्ना, जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ इस मामले को सुन रही है। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ जैसे ही सुनवाई के लिए बैठी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अगले हफ्ते तक सुनवाई टालने के लिए पीठ से आग्रह किया। पीठ उनकी मांग पर राजी हो गई।

केंद्र के हलफनामे पर क्या बोले सीजेआई?

आज की सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायधीश संजीव खन्ना ने कहा कि वह हलफनामे में बहुत गहराई में नहीं गए, लेकिन उसमें वक्फ बाय यूजर के रजिस्ट्रेशन को लेकर कुछ पॉइंट उठाए गए हैं और कुछ विवादित आंकड़े भी दिए गए हैं, जिन पर विचार करने की जरूरत है कि कुछ ऐसे पहलू हैं, जिनसे आप (केंद्र) निपट चुके हैं, लेकिन उस पर स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। अदालत ने कहा कि रजिस्ट्रेशन और कुछ आंकड़ों के आधार पर मुद्दे उठाए गए हैं, जिन पर याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है। अदालत ने कहा कि चूंकि सीजेआई खन्ना के रिटायरमेंट के दिन नजदीक हैं, वो अंतिम चरण में भी कोई निर्णय या आदेश सुरक्षित नहीं रखना चाहते। ऐसे में, अब इस मामले को अगले गुरूवार को देश के सीजेआई होने जा रहे जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनेगी।

केस दूसरी पीठ के समक्ष रखा

बता दें कि सीजेआई संजीव खन्ना 13 मई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और इसी को देखते हुए उन्होंने कहा कि वे कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आदेश सुरक्षित नहीं रखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने ये केस दूसरी पीठ के समक्ष रखा है। पिछली सुनवाई 17 अप्रैल को हुई थी, जिसमें कोर्ट ने सरकार से कहा था कि पहले से पंजीकृत या अधिसूचना के माध्यम से घोषित वक्फ संपत्तियों, जिनमें वक्फ बाय यूजर भी शामिल है, को अगली सुनवाई की तारीख तक न तो छेड़ा जाएगा और न ही गैर अधिसूचित किया जाएगा, साथ ही वक्फ बोर्ड में कोई नई नियुक्ति न हो।

वक्फ कानून के बारे में

वक्फ संपत्तियों को रेगुलेट और मैनेज करने के लिए सरकार ने 1995 के वक्फ कानून में कुछ संशोधन किया था। जिसको धार्मिक और मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी पार्टियों और मुस्लिम संगठनों ने याचिका दायर किया है। इस कानून को लोकसभा से तीन अप्रैल को जबकि राज्यसभा से चार अप्रैल को पारित कराया गया। 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की सहमति मिल जाने के बाद संशोधन लागू हो गया। इसके बाद कई राजनीतिक दल जैसे डीएमके, वाईएसआरसीपी, एआईएमआईएम, वामपंथी दल समेत कई एनजीओ, मुस्लिम निकाय और अन्य ने अधिनियम की वैधता को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था।

सुप्रीम कोर्ट में नए वक्फ कानून पर आज सुनवाई, सांविधानिक वैधता मामले में हो सकता है फैसला

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सुप्रीम कोर्ट आज वक्फ (संशोधन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। पिछली सुनवाई में अदालत ने कानून के दो मुख्य पहलुओं पर रोक लगा दी थी। पिछली सुनवाई में अदालत ने कानून के दो मुख्य पहलुओं पर रोक लगा दी थी। 17 अप्रैल को सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार व जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ को केंद्र की ओर से आश्वासन दिया गया था कि वह 5 मई तक न तो वक्फ बाय यूजर समेत वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करेगा, न ही केंद्रीय वक्फ परिषद व बोर्डों में कोई नियुक्ति करेगा।

याचिकाओं पर हो सकती है अंतिम सुनवाई

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच इस मामले की अंतिम सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट आज यह तय करेगा कि वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोई अंतरिम आदेश जारी किया जाए या नहीं। सीजेआई संजीव खन्ना 13 मई को रिटायर होने वाले हैं, इसलिए उनके पास समय कम है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार की ओर से कई वकीलों को सुनना होगा।

वक्फ संपत्तियों में 20 लाख एकड़ से ज्यादा के इजाफा का दावा

केंद्र सरकार ने याचिकाओं के जवाब में 1,300 पेज का हलफनामा दाखिल किया है। केंद्र ने 25 अप्रैल को दायर हलफनामे में कहा कि कानून पूरी तरह संवैधानिक है। यह संसद से पास हुआ है, इसलिए इस पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। हलफनामे में सरकार ने दावा किया 2013 के बाद से वक्फ संपत्तियों में 20 लाख एकड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ। इस वजह से कई बार निजी और सरकारी जमीनों पर विवाद हुआ। वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार के आंकड़ों को गलत बताया और कोर्ट से झूठा हलफनामा देने वाले वाले अधिकारी पर कार्रवाई की मांग की।

नए कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 70 से ज्यादा याचिकाएं दायर

बता दें कि पांच अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलने के बाद केंद्र ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को पिछले महीने अधिसूचित किया था। वक्फ (संशोधन) विधेयक को लोकसभा ने 288 सदस्यों के समर्थन से पारित किया, जबकि 232 सांसद इसके खिलाफ थे। राज्यसभा में इसके पक्ष में 128 और इसके खिलाफ 95 सदस्यों ने मतदान किया। वहीं, इसके पास होने के बाद कई राजनीतिक दलों और मुस्लिम संगठनों ने अधिनियम की वैधता को शीर्ष अदालत में चुनौती दिया था। नए वक्फ कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 70 से ज्यादा याचिकाएं दायर हुई हैं, लेकिन कोर्ट सिर्फ पांच मुख्य याचिकाओं पर ही सुनवाई करेगा। याचिकाओं के इस समूह में एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी द्वारा दायर एक याचिका भी शामिल है।