बच्चे भागते नहीं, उनका मन कहीं पीछे छूट जाता है…
रमेश दूबे
कहानी है संत कबीर नगर जनपद की महुली थाने पर परिस्थितियों से भाग कर बस्ती जनपद से संत कबीर नगर पहुंचे एक 7 वर्ष के मासूम की।
जिस पर उपनिरीक्षक प्रभारी निरीक्षक थाना महुली दुर्गेश पांडे की शानदार लाइन सामने आई।
हर बार जब कोई बच्चा घर छोड़कर चला जाता है, तो यह केवल एक "गुमशुदगी" की घटना नहीं होती। यह उस मासूम मन की एक खामोश पुकार होती है, जिसे समय रहते शायद कोई सुन नहीं पाया।
हाल ही में एक ऐसा ही बच्चा, जिसके माता-पिता रोजगार के लिए बेंगलुरु चले गए थे और उसे उसकी बुआ के घर छोड़ दिया गया था, अपने परिचित वातावरण से निकलकर जिले की सीमाएँ पार करते हुए दूसरे जनपद तक पहुँच गया। यह कदम किसी शरारत का परिणाम नहीं था, बल्कि उसके भीतर लंबे समय से चल रहे भावनात्मक संघर्ष का संकेत था। पढ़ाई का दबाव, अपनों की कमी, अकेलेपन का एहसास और मन की बातें किसी से न कह पाने की पीड़ा धीरे-धीरे उसके भीतर घर करती रही। अंततः उसका मन उसे वहाँ से दूर ले गया।
यह घटना हम सभी के लिए एक गहरा संदेश छोड़ती है।
बच्चों के मन में क्या चल रहा है, इसे केवल उनके अंक, उनकी पढ़ाई या उनके व्यवहार से नहीं समझा जा सकता। कई बार वे मुस्कुराते रहते हैं, लेकिन भीतर से टूट रहे होते हैं। वे चुप रहते हैं, पर उनका मौन बहुत कुछ कह रहा होता है। वे डाँट नहीं, अपनापन चाहते हैं; आदेश नहीं, संवाद चाहते हैं।
आज के समय में माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए दूर-दराज़ शहरों में नौकरी करने को मजबूर हैं। यह त्याग भी आवश्यक है, लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि बच्चों को केवल आर्थिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा भी मिले। प्रतिदिन कुछ मिनट का स्नेहपूर्ण संवाद, उनकी बातें धैर्य से सुनना और यह एहसास दिलाना कि "हम तुम्हारे साथ हैं"—यही उनके आत्मविश्वास की सबसे बड़ी ताकत बनता है।
कल्पना कीजिए, यदि यह बच्चा किसी गलत व्यक्ति के संपर्क में आ जाता, मानव तस्करी, बाल श्रम या किसी अन्य अपराध का शिकार हो जाता, तो यह केवल एक परिवार का दुख नहीं होता, बल्कि पूरे समाज और प्रशासन के लिए अत्यंत गंभीर चुनौती बन जाता। एक छोटी-सी भावनात्मक उपेक्षा कभी-कभी बहुत बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
सौभाग्य से इस घटना में थाना पुलिस ने संवेदनशीलता, धैर्य और मानवता का परिचय दिया। बच्चे को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि उसे सुरक्षा, विश्वास और अपनापन दिया गया। उसके परिजनों तक सूचना पहुँचाने और सुरक्षित मिलान की प्रक्रिया तत्काल प्रारंभ की गई। यही पुलिस का मानवीय स्वरूप है—जहाँ कानून के साथ संवेदना भी चलती है।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें अच्छा वातावरण, भरोसा, संवाद और प्रेम देना भी उतना ही आवश्यक है।
आइए, हम सभी एक संकल्प लें—
- प्रतिदिन अपने बच्चों से कुछ समय खुलकर बात करेंगे।
- उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास करेंगे।
- उन्हें डाँटने से पहले उनकी बात सुनेंगे।
- उन्हें यह विश्वास दिलाएँगे कि कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं कि घर छोड़ना पड़े।
क्योंकि बच्चे रास्ता नहीं भूलते, वे अक्सर उस अपनापन की तलाश में निकल पड़ते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि कोई उन्हें समझेगा।
याद रखिए—एक बच्चे का सुरक्षित भविष्य केवल परिवार की नहीं, पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। जब बच्चे मुस्कुराते हैं, तभी समाज का भविष्य सुरक्षित होता है।
हालांकि मासूम को एडिशनल एसपी एडीएम की मौजूदगी में उसके वर्तमान के गार्जियन को सौंप दिया गया लेकिन कारण ,निवारण, समस्या, समाधान,जागरूकता इन संबंधों पर प्रभारी निरीक्षक महुली दुर्गेश पांडे की लाइन आज के समय में प्रासंगिक है।
Jul 29 2026, 16:48
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