तमिलनाडु सरकार ने बदला दिया रुपये का प्रतीक चिन्ह, जानिए क्या है नियम?

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देश में भाषा को लेकर बहस चल रही है। इस बीच डीएमके की अगुआई वाली तमिलनाडु सरकार ने भाषा विवाद को और भड़का दिया है। राज्य सरकार ने अपने बजट 2025-26 से रुपये के आधिकारिक प्रतीक (₹) को बदल कर आग में घी डालने का काम किया है। तमिलनाडु सरकार ने अपने राज्य बजट के लोगो के रूप में आधिकारिक भारतीय रुपये के प्रतीक '₹' को तमिल अक्षर 'ரூ' से बदल दिया है।ऐसा पहली बार हुआ है जब देश में किसी राज्य ने रुपये के चिह्न को बदला हो। तमिलनाडु सीएम एमके स्टालिन के इस कदम को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।सवाल है कि क्या राज्य के पास इस तरह रुपये के चिह्न में बदलाव करने का अधिकार है?

तमिलनाडु द्वारा रुपये के चिह्न में बदलाव का यह अपनी तरह का पहला मामला है। इसके पहले किसी भी राज्य सरकार ने इस तरह का कदम नहीं उठाया। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल है कि क्या देश भर में मान्य इस रुपये के चिह्न को राज्य सरकार बदल सकती है?

बता दें कि केंद्र की तरफ से रुपये के चिह्न में बदलाव को लेकर कोई स्पष्ट नियम या निर्देश नहीं हैं। ऐसे में तमिलनाडु सरकार की तरफ से उठाया गया यह कदम कानून का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है। यह जरूर है कि इस कदम को अदालत में चुनौती देकर स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है।

यदि रुपये को राष्ट्रीय चिह्न के रूप में मान्यता मिली होती तो इसमें किसी तरह का बदलाव करने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास रहता। राष्ट्रीय चिह्न की सूची में रुपये का चिह्न नहीं है। राष्ट्रीय चिह्न में बदलाव के संबंध में भारतीय राष्ट्रीय चिन्ह (दुरुपयोग की रोकथाम) एक्ट 2005 बना हुआ है। बाद में इस कानून को 2007 में अपडेट किया जा चुका है। एक्ट के सेक्शन 6(2)(f) में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों की डिजाइन में बदलाव कर सकती है।

चीन के बाहर पैदा होगा मेरा उत्तराधिकारी” दलाई लामा ने चीन को दे डाली चुनौती

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तिब्बती बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने अपनी नई किताब में कहा है कि उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर पैदा होगा। करीब छह दशक पहले चीन छोड़कर भारत में शरण लेने वाले दलाई लामा की इस किताब वॉयस ऑफ द वॉयसलेस का मंगलवार को लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्र तिब्बत पर नियंत्रण को लेकर चीन के साथ उनकी तनातनी एक बार फिर बढ़ गई है।

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दलाई लामा ने ‘वायस फॉर द वायसलेस’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा कि दुनिया भर के तिब्बती चाहते हैं दलाई लामा नामक संस्था उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहे। इस किताब में दलाई लामा ने पहली बार विशिष्ट रूप से साफ किया है कि उनका उत्तराधिकारी ‘स्वतंत्र दुनिया‘ में जन्म लेगा, जो चीन के बाहर है।

दलाई लामा लिखते हैं, "चूंकि पुनर्जन्म का उद्देश्य पूर्ववर्ती के कार्य को आगे बढ़ाना है, इसलिए नए दलाई लामा का जन्म मुक्त विश्व में होगा, ताकि दलाई लामा का पारंपरिक मिशन - यानी सार्वभौमिक करुणा की आवाज बनना, तिब्बती बौद्ध धर्म का आध्यात्मिक नेता और तिब्बती लोगों की आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने वाला तिब्बत का प्रतीक बनना - जारी रहे।"

तिब्बती परंपरा का मानना है कि जब एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु का निधन हो जाता है, तो उसकी आत्मा एक बच्चे के शरीर में पुनर्जन्म लेती है। वर्तमान दलाई लामा, जिन्हें दो साल की उम्र में अपने पूर्ववर्ती के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी गई थी, ने पहले उल्लेख किया था कि आध्यात्मिक नेताओं का वंश उनके साथ समाप्त हो सकता है। लेकिन अपनी किताब में स्पष्ट किया है कि उनके उत्तराधिकारी का जन्म चीन से बाहर होगा।

दलाई लामा का ये बयान टीन की बौखलाहट बढ़ाने वाला है। चीन की बैचेनी की वजह ये है कि 14वें दलाई लामा ने पुष्टि की है कि अगले दलाई लामा का जन्म ‘स्वतंत्र दुनिया’ में होगा। जिससे यह सुनिश्चित होगा कि संस्था चीनी नियंत्रण से परे तिब्बती अधिकारों और आध्यात्मिक नेतृत्व की वकालत करने की अपनी पारंपरिक भूमिका जारी रखेगी। यह बयान बीजिंग के लिए एक सीधी चुनौती है, जो लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि अगले दलाई लामा को मान्यता देने का अंतिम अधिकार उसके पास है। चीन ने तिब्बती नेता की घोषणाओं को खारिज करते हुए जोर दिया है कि किसी भी उत्तराधिकारी को बीजिंग की मंजूरी लेनी होगी।

बता दें कि चीन ने 1950 में तिब्बत पर नियंत्रण हासिल कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप तनाव और प्रतिरोध हुआ। 1959 में, 23 साल की उम्र में, 14वें दलाई लामा, तेनजिन ग्यात्सो, माओत्से तुंग के कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ एक विफल विद्रोह के बाद हजारों तिब्बतियों के साथ भारत भाग गए। चीन दलाई लामा को "अलगाववादी" कहता है और दावा करता है कि वह उनके उत्तराधिकारी का चयन करेगा। हालांकि, 89 वर्षीय ने कहा है कि चीन द्वारा चुने गए किसी भी उत्तराधिकारी को सम्मानित नहीं किया जाएगा।

पाकिस्तान से क्यों अलग होना चाहते हैं बलूच? आजादी की लड़ाई नाजुक मोड़ पर

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बलूचिस्तान में जाफर एक्सप्रेस ट्रेन हाईजैकिंग कांड ने बलूचियों और पाकिस्तानियों के बीच के पुराने संघर्ष को उजागर कर दिया है। अपने खोए अस्‍तित्‍व वापस पाने के लिए बलूचिस्‍तान लिब्रेशन आर्मी (बीएलए) ने एक बार फिर पाकिस्‍तानी सेना के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। बलूचों ने ठान लिया है कि वो आजादी हासिल करके रहेंगे। जबरन पाकिस्‍तान मिलाने का दर्द उस वक्‍त बलूचियों के लिए नासूर बना गया, जब पाकिस्‍तान ने उनकी प्राकृतिक संपदा का दोहन शुरू कर दिया।

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पाकिस्तान का सबसे संपन्न लेकिन पिछड़ा राज्य

बलूचिस्तान, पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है और 44 फीसदी हिस्सा कवर करता है। जर्मनी के आकार का होने का बावजूद यहां की आबादी सिर्फ डेढ़ करोड़ है, जर्मनी से 7 करोड़ कम। बलूचिस्तान तेल, सोना, तांबा और अन्य खदानों से सम्पन्न है। इन संसाधनों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान अपनी जरूरतें पूरी करता है। इसके बाद भी ये इलाका सबसे पिछड़ा है। यही वजह है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ नफरत बढ़ रही है।

आधुनिक बलूचिस्तान की कहानी

बलूचिस्तान कभी भी पाकिस्तान का अंग नहीं बनना चाहता था। जबरन पाकिस्‍तान मिलाने का दर्द बलूचियों के लिए नासूर बना गया है। अब बलूचों की आजादी की लड़ाई नाजुक मोड़ पर पहुंच गई है। आधुनिक बलूचिस्तान की कहानी 1876 से शुरू होती है। तब बलूचिस्तान पर कलात रियासत का शासन था। भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश हुकूमत शासन कर रही थी। इसी साल ब्रिटिश सरकार और कलात के बीच संधि हुई।

संधि के मुताबिक अंग्रेजों ने कलात को सिक्किम और भूटान की तरह प्रोटेक्टोरेट स्टेट का दर्जा दिया। यानी भूटान और सिक्किम की तरह कलात के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश सरकार का दखल नहीं था, लेकिन विदेश और रक्षा मामलों पर उसका नियंत्रण था

भारत-पाक की तरह कलात में भी आजादी की मांग

1947 में भारतीय उपमहाद्वीप में आजादी की प्रक्रिया की शुरुआत हुई। भारत और पाकिस्तान की तरह कलात में भी आजादी की मांग तेज हो गई। जब 1946 में ये तय हो गया कि अंग्रेज भारत छोड़ रहे हैं, तब कलात के खान यानी शासक मीर अहमद खान ने अंग्रेजों के सामने अपना पक्ष रखने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को सरकारी वकील बनाया। बलूचिस्तान नाम से एक नया देश बनाने के लिए 4 अगस्त 1947 को दिल्ली में एक बैठक बुलाई गई। इसमें मीर अहमद खान के साथ जिन्ना और जवाहर लाल नेहरू भी शामिल हुए। बैठक में जिन्ना ने कलात की आजादी की वकालत की।

बैठक में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भी माना कि कलात को भारत या पाकिस्तान का हिस्सा बनने की जरूरत नहीं है। तब जिन्ना ने ही ये सुझाव दिया कि चार जिलों- कलात, खरान, लास बेला और मकरान को मिलाकर एक आजाद बलूचिस्तान बनाया जाए

आजादी की घोषणा के एक महीने बाद बदले हालात

11 अगस्त 1947 को कलात और मुस्लिम लीग के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसके साथ ही बलूचिस्तान एक अलग देश बन गया। हालांकि, इसमें एक पेंच ये था कि बलूचिस्तान की सुरक्षा पाकिस्तान के हवाले थी। आखिरकार कलात के खान ने 12 अगस्त को बलूचिस्तान को एक आजाद देश घोषित कर दिया। बलूचिस्तान में मस्जिद से कलात का पारंपरिक झंडा फहराया गया। कलात के शासक मीर अहमद खान के नाम पर खुतबा पढ़ा गया।

लेकिन, आजादी घोषित करने के ठीक एक महीने बाद 12 सितंबर को ब्रिटेन ने एक प्रस्ताव पारित किया और कहा कि बलूचिस्तान एक अलग देश बनने की हालत में नहीं है। वह अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां नहीं उठा सकता।

बलूचिस्तान जबरन पाकिस्‍तान में मिला दिया

कलात के खान ने अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान का दौरा किया। उन्हें उम्मीद थी कि जिन्ना उनकी मदद करेंगे। जब खान कराची पहुंचे तो वहां मौजूद हजारों बलूच लोगों ने उनका स्वागत बलूचिस्तान के राजा की तरह किया, लेकिन उनका स्वागत करने पाकिस्तान का कोई बड़ा अधिकारी नहीं पहुंचा।पाकिस्तान के इरादे में बदलाव का यह बड़ा संकेत था। बलूचिस्तान जबरन पाकिस्‍तान में मिला दिया गया। इसी के साथ पाकिस्‍तान ने उनकी प्राकृतिक संपदा का दोहन शुरू कर दिया। बदले में बलूचिस्‍तान को ना ही विकास मिला और ना ही उनके प्राकृतिक संपदा के दोहन से होने वाले फायदे में कोई हिस्‍सा। देखते ही देखते, बलूचिस्‍तान की प्राकृतिक संपदा पाकिस्‍तान की अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ़ बन चुकी थी, लेकिन बलूचिस्‍तान कंगाली की गर्त में जा गिरा था।

1948 से जारी है विद्रोह

बलूचिस्‍तान की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा शुरू से ही स्वतंत्रता और स्वायत्तता की मांग करता रहा है। उन्होंने 1948 में पाकिस्तान के खिलाफ पहला विद्रोह शुरू किया। पाकिस्तान ने 1948 के विद्रोह को कुचल दिया। विद्रोह को तब भले ही दबा दिया गया, लेकिन ये कभी खत्म नहीं हुआ। बलूचिस्तान की आजादी के लिए शुरू हुए इस विद्रोह को नए नेता मिलते रहे। 1950, 1960 और 1970 के दशक में वे पाकिस्तान सरकार के लिए चुनौती बनते रहे। 2000 तक पाकिस्तान के खिलाफ चार बलूच विद्रोह हुए।

गोल्ड स्मगलिंग केसः रान्या ने यूट्यूब से सीखा सोना छिपाना, पूछताछ में बड़ा खुलासा

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सोना तस्करी के मामले में गिरफ्तार कन्नड़ एक्ट्रेस रान्या राव के केस में बड़ा खुलासा हुआ है। एक्ट्रेस फिलहाल राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) की हिरासत में हैं। डीआरआई) की हिरासत में मौजूद एक्ट्रेस रान्या राव ने पूछताछ के दौरान खुलासा किया कि यह पहली बार था जब उसने दुबई से सोने की तस्करी की थी। साथ ही एक्ट्रेस ने इस बात को भी बता दिया है कि उन्होंने सोना छिपाना कहां से सिखा। रान्या ने बताया है कि उसने यूट्यूब वीडियो देखकर सोने की छड़ें छिपाना सीखा था।

रान्या ने बताया कि सोना दो प्लास्टिक से ढके पैकेट में था। मैंने एयरपोर्ट के बाथरूम में सोने की छड़ें अपने शरीर से चिपका लीं थी। मैंने सोने को अपनी जींस और जूतों में छिपा लिया। मैंने यूट्यूब वीडियो से यह करना सीखा। रान्या राव ने खुलासा किया कि उन्होंने एयरपोर्ट पर क्रेप पट्टियां और कैंची खरीदीं और एयरपोर्ट के वॉशरूम में सोने के बार अपने शरीर में छिपाए।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, एक्ट्रेस रान्या ने कहा, मुझे किसी विदेशी नंबर से 1 मार्च को कॉल आया था। पिछले 2 हफ्ते से लगातार मुझे विदेशी नंबरों से फोन आ रहे थे। मुझे दुबई एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 के गेट ए में जाने के लिए कहा गया था। मुझ से कहा गया था कि मैं दुबई एयरपोर्ट से सोना ले कर उसको बेंगलुरू में डिलीवर कर दूं। उन्होंने कहा, यह पहली बार है कि जब मैंने दुबई से गोल्ड की तस्करी कर के बेंगलुरू लेकर आई हूं। इससे पहले मैंने कभी दुबई से सोना नहीं खरीदा है और मैं कभी सोना लेकर नहीं आई हूं।

जब एक्टर से सवाल किया गया कि क्या आप बता सकती है कि आपको किसके पास से कॉल आया था, उस शख्स की पहचान जानती हैं तो उन्होंने कहा, मुझे पूरी तरह से नहीं पता है कि मुझे किसने कॉल किया था। जिस शख्स ने मुझे कॉल किया था उसके बात करने का तरीका अफ्रीकी- अमेरिकी था। एयरपोर्ट पर उसने सिक्योरिटी चेक होने के बाद मुझे गोल्ड बार दिए और उसी के फौरन बाद वो चला गया। मैं कभी दोबारा उससे नहीं मिली और मैंने कभी दोबारा उसको नहीं देखा। वो शख्स 6 फीट लंबा था और काफी गौरा था।

बता दे कि रान्या कर्नाटक के डीजीपी के रामचन्द्र राव की सौतेली बेटी हैं। एक्ट्रेस को बेंगलुरू एयरपोर्ट से अरेस्ट किया गया था। उन्हें 14.2 किलोग्राम सोने की तस्करी करने के आरोप में पकड़ा गया। इस सोने की कीमत 12.56 करोड़ है, जिसको उन्होंने अपने शरीर में छिपाया हुआ था।

परिसीमन पर स्टालिन को मिला तेलंगाना सीएम का साथ, रेवंत रेड्डी ने केन्द्र पर लगाया साज़िश करने का आरोप

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दक्षिण के राज्यों में परिसीमन को लेकर घमाशान मचा हुआ है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस पर विरोध जताया है। परिसीमन और ट्राई लैंग्वेज पॉलिसी के विरोध में स्टालिन ने 5 मार्च तमिलनाडु में सर्वदलीय की थी। बैठक में जॉइंट एक्शन कमेटी बनाने का फैसला हुआ था, ताकि इन मुद्दों पर साझा रणनीति बनाई जा सके। स्टालिन ने परिसीमन मामले में 7 मार्च को अन्य राज्यों के मौजूदा और पूर्व मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने 22 मार्च को होने वाली जॉइंट एक्शन कमेटी (जेएसी) की पहली बैठक में अपने प्रतिनिधि भेजने का अनुरोध किया था। इस बीच स्टालिन का एक प्रतिनिधिमंडल तेलंगाना पहुंचा है। ये लोग परिसीमन के मुद्दे पर बुलाई गई मीटिंग के लिए तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी को आमंत्रित करने पहुंचे।

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बीजेपी बदले की कार्रवाई कर रही-रेवंत रेड्डी

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने प्रतिनिधिमंडल से मिलने के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा, बीजेपी-एनडीए के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार दक्षिण भारत के राज्यों के साथ साज़िश कर रही है। यह परिसीमन नहीं है, बल्कि दक्षिणी राज्यों को सीमित करना है। हम इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, बीजेपी दक्षिण भारत के लोगों के साथ अपना स्कोर सेट करने के लिए यह सब कर रही है क्योंकि यहां लोग कभी भी बीजेपी को आगे नहीं बढ़ने देते। बीजेपी बदले की कार्रवाई कर रही है। मैं इस मुद्दे पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के साथ खड़ा हूं।

तेलंगाना में भी होगी एक सर्वदलीय बैठक

रेवंत रेड्डी ने बताया है, सीएम स्टालिन की बुलाई बैठक में शामिल होने के लिए मुझे अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से अनुमति लेनी है। पर सैद्धांतिक तौर पर मैं स्टालिन की मांग से सहमत हूं। हम स्टालिन के प्रयास का स्वागत करते हैं। कांग्रेस पार्टी इस बैठक में जाने को तैयार हो गई है लेकिन मैं शीर्ष नेतृत्व की अनुमति से जाऊंगा। तमिलनाडु जाने से पहले हम तेलंगाना में एक सर्वदलीय बैठक आयोजित करेंगे।

लोकसभा में दक्षिण की हिस्सेदारी कम होने की आशंका

सीएम रेड्डी ने कहा कि हम किशन रेड्डी को भी तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित करेंगे। यह एक ऐसा निर्णय है जो हमारे मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। किशन रेड्डी को इस बैठक में जरूर आना चाहिए। इस पर हम सभी की ओर से कैबिनेट में सवाल उठाया जाना चाहिए। दक्षिण के राज्यों को इस बात का डर सता रहा है कि परिसीमन के बाद कहीं लोकसभा की सीटें कम न हो जाएं। दक्षिण के राज्यों को इस बात का डर है कि परिसीमन के बात लोकसभा में दक्षिण की हिस्सेदारी कम हो सकती है। वहीं, नॉर्थ इंडिया में सीटों की संख्या बढ़ सकती है। जनसंख्या

परिसीमन क्या है

लोकसभा और विधानसभा सीट की सीमा नए तरह से तय करने की प्रक्रिया को परिसीमन कहते हैं। इसके लिए आयोग बनता है। परिसीमन के लिए 1952, 1963, 1973 और 2002 में आयोग गठित हो चुके हैं। आखिरी बार परिसीमन आयोग अधिनियम, 2002 के तहत साल 2008 में परिसीमन हुआ था। लोकसभा सीटों को लेकर परिसीमन प्रक्रिया की शुरुआत 2026 से हो सकती है। इससे 2029 के चुनाव में करीब 78 सीटें बढ़ सकती हैं। दक्षिणी राज्य जनसंख्या आधारित परिसीमन का विरोध कर रहे हैं। इस वजह से सरकार समानुपातिक परिसीमन पर विचार कर रही है।

समानुपातिक परिसीमन क्या है

उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। वहीं, तमिलनाडु-पुडुचेरी में इसकी आधी यानी 40 सीटें हैं। अगर उत्तर प्रदेश की 14 सीटें बढ़ती हैं तो इसकी आधी यानी 7 सीटें तमिलनाडु-पुडुचेरी में बढ़ाना समानुपातिक प्रतिनिधित्व है। आबादी के आधार पर जितनी सीटें हिंदी पट्‌टी में बढ़ेंगी, उसी अनुपात में जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों में भी सीटें बढ़ेगी। हिंदी पट्टी के किसी राज्य की सीट में 20 लाख की आबादी पर एक सांसद होगा तो दक्षिणी राज्य में 10-12 लाख की आबादी पर एक सांसद होगा।

केंद्र और तमिलनाडु में विवाद और गहराया, स्टालिन सरकार ने बजट में हटाया रुपये का चिन्ह

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केन्द्र सरकार और तमिलनाडु के स्टालिन सरकार के बीच विवाद गहराता जा रहा है। भाषा विवाद के बीच तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने करेंसी सिम्बल (₹) पर बड़ा फैसला लिया है। एमके स्टालिन सरकार ने राज्य सरकार के बजट 2025-26 से रुपये (₹) का प्रतीक चिह्न हटा दिया है। इसकी जगह अब तमिल लिपि का इस्तेमाल किया जाएगा। इस तरह तमिलनाडु सरकार ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) के विरोध में अपना रुख और मजबूत किया है।

केंद्र सरकार और द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम यानी डीएमके के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार के बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 में प्रस्तावित त्रिभाषा फॉर्मूला राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। तमिलनाडु सरकार ने एनईपी व त्रिभाषा फॉर्मूले को लागू करने से मना कर दिया है। इसके चलते केंद्र सरकार ने समग्र शिक्षा अभियान (एसएसए) के तहत मिलने वाली 573 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता रोक दी है। एसएसए फंडिंग पाने के लिए राज्यों को एनईपी के दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। फंड रोके जाने से सीएम स्टालिन बिफरे हुए हैं। उन्होंने दक्षिणी राज्यों में हिंदी थोपने का आरोप लगाया है।

एनईपी पर चल रहे विवाद के बीच स्टालिन सरकार ने ये अहम कदम उठाया है। यह पहली बार है जब किसी राज्य ने नेशनल करेंसी सिम्बल को अस्वीकार कर दिया है। बजट 2025 के लोगो वाली तस्वीर सामने आई है। इसमें साफ दिख रहा है कि बजट से रुपए का चिह्न (₹) गायब है। उसकी जगह पर तमिल लिपी का इस्तेमाल किया गया है। अब तक किसी भी राज्य ने भाषा के आधार पर इस तरह का फैसला नहीं लिया था।

बता दें कि रुपये का चिन्ह ₹ आधिकारिक तौर पर 15 जुलाई, 2010 को अपनाया गया था। 5 मार्च, 2009 को सरकार द्वारा घोषित एक डिजाइन प्रतियोगिता के बाद ये हुआ था। 2010 के बजट के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने एक ऐसा प्रतीक पेश करने की घोषणा की थी जो भारतीय लोकाचार और संस्कृति को प्रतिबिंबित और समाहित करेगा। इस घोषणा के बाद एक सार्वजनिक प्रतियोगिता शुरू हुई, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान डिज़ाइन का चयन किया गया।

अंतरिक्ष में इसरो की एक और छलांग, स्पैडेक्स उपग्रह सफलतापूर्वक अनडॉक, जानें क्या होगा फायदा

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अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक नया आयाम कायम किया है।इसरो ने स्पेडेक्स मिशन में अनडॉकिंग को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया है। इसके साथ ही चंद्रयान-4 के लिए रास्ता साफ हो गया है। दरअसल, अंतरिक्ष को उपग्रहों को एक साथ जोड़ने की प्रक्रिया को डॉकिंग और अलग करने की प्रक्रिया को अनडॉकिंग कहते हैं। मिशन की लॉन्चिंग के बाद 2 अलग-अलग सेटेलाइट्स को स्पेस में आपस मे जोड़कर इसरो ने इतिहास लिखा था। आपस में जुड़े इन दो सेटेलाइट्स को आज फिर से सफलता पूर्वक अलग कर दिया गया।

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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने इस कामयाबी के लिए इसरों को बधाई दी। उन्होंने 'एक्स' पर पोस्ट किया, 'इसरो टीम को बधाई। यह हर भारतीय के लिए खुशी की बात है। स्पैडेक्स उपग्रहों ने अविश्वसनीय डी-डॉकिंग को पूरा कर लिया गया है। इससे भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, चंद्रयान 4 और गगनयान समेत भविष्य के महत्वाकांक्षी मिशनों में काफी मदद मिलेगी। इन मिशनों को आगे बढ़ाने का मार्ग भी इससे प्रशस्त होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निरंतर संरक्षण इस उत्साह को बढ़ाता है।'

इसरो ने 30 दिसंबर 2024 की रात 10 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र यानी शार से स्पेस डॉकिंग एक्सपेरीमेंट (स्पैडेक्स) लॉन्च किया था।16 जनवरी को भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और लंबी छलांग लगाकर विश्व के चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल हो गया था।

इसरो ने स्पेस डॉकिंग एक्सपेरीमेंट’ (स्पेडेक्स) के तहत उपग्रहों की ‘डॉकिंग’ सफलतापूर्वक की थी। इसरो ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा था, 'भारत ने अंतरिक्ष इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया है। सुप्रभात भारत, इसरो के स्पेडेक्स मिशन ने ‘डॉकिंग’ में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। इस क्षण का गवाह बनकर गर्व महसूस हो रहा है।' इसके साथ ही अमेरिका, रूस, चीन के बाद भारत यह उपलब्धि हासिल करने वाला चौथा देश बन गया था।

स्पेडेक्स मिशन पीएसएलवी द्वारा लॉन्च किए गए दो छोटे अंतरिक्ष यान का उपयोग करके अंतरिक्ष में डॉकिंग के प्रदर्शन के लिए एक लागत प्रभावी प्रौद्योगिकी प्रदर्शक मिशन है। यह टेक्नोलॉजी भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं, जैसे चंद्रमा पर भारतीय के जोन, चंद्रमा से नमूना वापसी, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएएस) के निर्माण और संचालन आदि के लिए जरूरी है। जब सामान्य मिशन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई रॉकेटों के लॉन्चिंग की आवश्यकता होती है, तब इन-स्पेस डॉकिंग टेक्नोलॉजी अनिवार्य होती है।

हरियाणा में कांग्रेस का सूपड़ा साफ, और मजबूत हुआ भाजपा का गढ़, क्यों छूट रहा “हाथ” का साथ

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हरियाणा के निकाय चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली है। 10 नगर निगमों में से कांग्रेस एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई। बीजेपी ने 10 में से 9 सीटों पर जीत दर्ज की है। एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया है. कांग्रेस खाता खोलने में भी नाकामयाब रही।

हरियान में मिली इस बड़ी शिकस्त के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि बीजेपी पहले भी जीत चुकी है। इसमें नया क्या है? हमने कभी नहीं कहा कि हमने ये चुनाव गंभीरता से लड़ा। जब मैं मुख्यमंत्री था, तब भी मैंने कभी पंचायत चुनावों में हिस्सा नहीं लिया। इन चुनावों में सिर्फ भाईचारा काम करता है। अगर हमारे पास (स्थानीय निकायों में) एक सीट होती और हम हार जाते तो नतीजा हमारे लिए नुकसानदेह होता। इन चुनावों में ज्यादातर निर्दलीय उम्मीदवार खड़े होते हैं।साथ ही हुड्डा ने कहा कि इन चुनाव नतीजों से कांग्रेस विधायक दल नेता के चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कांग्रेस को भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गढ़ रोहतक में भी हार मिली है।

सूबे के विधानसभा चुनाव में करारी मात खाने के साढ़े पांच महीने बाद निकाय चुनाव में भी कांग्रेस जीरो पर सिमट गई है जबकि बीजेपी ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने में सफल रही। सीएम नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में शहरी निकाय चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस को शिकस्त देकर नगर निगम, नगर परिषद और नगरपालिका में ‘कमल’ खिलाने में कामयाब रही। वहीं, कांग्रेस के हाथ खाली रहे।

हरियाणा निकाय चुनाव में शहरी मतदाताओं ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भाजपा उनकी सबसे पसंदीदा पार्टी है। इस चुनाव में कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले रोहतक और सोनीपत नगर निगम के मेयर पद पर भी हुड्डा गुट जीत हासिल नहीं कर सका। बिना संगठन के चुनाव मैदान में उतरी कांग्रेस का निगम चुनाव में इस बार सूपड़ा ही साफ हो गया। लचर प्रबंधन के साथ मैदान में उतरी कांग्रेस कहीं भी एकजुट नजर नहीं आई। कांग्रेस का प्रचार भी बेहद कमजोर रहा।

कांग्रेस की हार के ये हैं बड़े कारणः-

• इस हार की सबसे बड़ी वजह राज्य में कांग्रेस का संगठन न होना माना जा रहा है। हाईकमान भी अभी तक संगठन बनाने में कामयाब नहीं हो पाया है।

• हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी पूरी तरह से हावी है। एक ही पार्टी के नेता एक-दूसरे के उम्मीदवारों को हराने में जुटे थे। इस निकाय चुनाव में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।

• पिछले एक साल से हरियाणा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व इसी में उलझा हुआ है।

• हरियाणा निकाय चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने अपने प्रत्याशियों के लिए प्रचार तो किया, लेकिन चुनाव प्रचार में वो धार नहीं दिखी, जो कांग्रेस को अपने कार्यकताओं का उत्साह बढ़ाने में दिखाना चाहिए था।

• हरियाणा निकाय चुनाव में टिकटों के गलत वितरण का भी आरोप लगा है, जिससे कांग्रेसियों में नाराजगी नजर आई और हार का कारण भी बना।

अश्विनी वैष्णव ने स्टारलिंक का किया स्वागत, फिर डिलीट क्यों किया पोस्ट

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भारत के सबसे बड़े टेलीकॉम ऑपरेटर और इंटरनेट प्रोवाइडर एयरटेल और जियो ने सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाओं की पेशकश करने के लिए स्टारलिंक के साथ समझौतों पर साइन किया है। इस बीच, रेल, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारतीय बाजार में प्रवेश करने की तैयारी कर रहे स्पेसएक्स के स्टारलिंक का स्वागत किया। अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को सोशल मीडिया साइट पर एलन मस्क की कंपनी स्‍टारलिंक का भारत में स्वागत किया, हालांकि, फिर पोस्ट डिलीट कर दी।

सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म 'एक्‍स' पर पोस्ट में रेल मंत्री वैष्णव ने लिखा, 'स्‍टारलिंक भारत में आपका स्वागत है! दूर-दराज के रेलवे प्रोजेक्ट्स के लिए उपयोगी होगा।' लगभग एक घंटे बाद पोस्ट हटा दी गई। ऐसा उस वक्त हुआ, जब देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों एयरटेल और जियो ने स्‍टारलिंक के साथ करार किए हैं। ये करार स्‍टारलिंक की सैटेलाइट-आधारित इंटरनेट सेवाएं देने के लिए हैं। हालांकि, अब तक सरकार से इसकी मंजूरी मिली नहीं है।

इससे पहले मंगलवार को एयरटेल ने स्‍पेसएक्‍स के साथ समझौते की घोषणा की। स्‍पेसएक्‍स एलन मस्क की कंपनी है। इससे स्‍टारलिंक की सेवाएं भारत में आएंगी। दूर-दराज के इलाकों में स्कूल, अस्पताल और संस्थान जुड़ सकेंगे। भारती एयरटेल लिमिटेड के एमडी और वाइस चेयरमैन गोपाल विट्टल ने कहा, 'स्‍पेसएक्‍स के साथ मिलकर एयरटेल ग्राहकों को स्‍टारलिंक देना एक बड़ी उपलब्धि है। यह अगली पीढ़ी की सैटेलाइट कनेक्टिविटी के प्रति हमारी प्रतिबद्धता दिखाता है।' भारती एंटरप्राइजेज के संस्थापक और चेयरमैन सुनील भारती मित्तल ने कहा, '4G, 5G और आगे 6G की तरह अब हमारे पास एक और तकनीक होगी, यानी SAT-G।'

बुधवार को जियो प्‍लेटफॉर्म्‍स लिमिटेड ने स्‍टारलिंक के साथ अपने समझौते की घोषणा की। रिलायंस जियो ग्रुप के सीईओ मैथ्यू ओमन ने कहा, 'स्‍पेसएक्‍स के साथ हमारा सहयोग स्‍टारलिंक को भारत लाने के हमारे संकल्प को मजबूत करता है। यह सभी के लिए निर्बाध ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम है।' उन्होंने आगे कहा, 'स्‍टारलिंक को जियो के ब्रॉडबैंड सिस्टम में जोड़कर हम अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। इस AI युग में हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड की विश्वसनीयता और उपलब्धता बेहतर कर रहे हैं। देश भर के समुदायों और व्यवसायों को सशक्त बना रहे हैं।'

वहीं, स्‍पेसएक्‍स की अध्यक्ष और सीओओ ग्वेने शॉटवेल ने कहा कि कंपनी भारत सरकार से मंजूरी मिलने का इंतजार कर रही है। उन्होंने कहा, 'हम भारत की कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाने के लिए जियो की प्रतिबद्धता की सराहना करते हैं। हम जियो के साथ काम करने और भारत सरकार से अधिक लोगों, संगठनों और व्यवसायों को स्‍टारलिंक की हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने के लिए प्राधिकरण प्राप्त करने के लिए तत्पर हैं।'

कैंसर फैला रहा संघ परिवार...' महात्मा गांधी के पोते के बयान से बवाल

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महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को लेकर विवादास्पद बयान दिया है। तुषार गांधी ने देश की आत्मा को कैंसर से पीड़ित करने जौसा गंभीर आरप संघ परिवार पर लगाया है। तुषार गांधी के इस बयान के बाद बवाल मच गया। आरएसएस और बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने बुधवार को केरल के नेय्याट्टिनकारा में तुषार गांधी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध उस समय किया गया जब तुषार गांधी टीबी जंक्शन स्थित उनके आवास पर गांधीवादी नेता गोपीनाथन नायर की प्रतिमा का अनावरण कर रहे थे।

केरल के तिरुवनंतपुरम ज़िले के नेय्याट्टिंकारा में बुधवार शाम को महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी टीबी जंक्शन पर गांधीवादी प्रतिनिधि गोपीनाथ नायर की प्रतिमा का अनावरण करने गए थे। इस दौरान तुषार गांधी ने एक स्पीच दी। उन्होंने कहा, देश की आत्मा कैंसर से पीड़ित है और संघ परिवार इसे फैला रहा है।आरएसएस और बीजेपी कार्यकर्ताओं ने तुषार गांधी से माफ़ी मांगने को कहा। लेकिन तुषार गांधी अपने बयान पर अड़े रहे। उन्होंने 'गांधी की जय' के नारे लगाए और वहां से जाने लगे।

विरोध करने वालों ने नारेबाज़ी की और उनकी गाड़ी रोकने की कोशिश की, लेकिन तुषार गांधी माफी नहीं मांगी। वो 'आरएसएस मुर्दाबाद' और 'गांधी की जय' के नारे लगाते हुए वहां से चले गए। इस घटना के बाद कांग्रेस ने आरएसएस-बीजेपी कार्यकर्ताओं की निंदा की है।