9/10 सितंबर 2026 को होगी, एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा
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अज्ञात धूमकेतु से उत्पन्न, एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा होगी ख़ास।
जानें,उल्का वर्षा से संबंधित सभी ख़ास रोचक जानकारियां।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल प्रेमियों के लिए 9/10 सितंबर 2026 को एक विशेष दुर्लभ एवं ख़ास खगोलीय नज़ारा देखने को मिलेगा, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगस्त में होने वाली प्रसिद्ध पर्सिड उल्का वर्षा भले ही समाप्त हो गई हो, लेकिन पर्सियस अभी भी टूटते तारे पैदा करना बंद नहीं कर रहा है,क्योंकि सितंबर में एक कम ज्ञात उल्का वर्षा आ रही है और 2026 में इसे देखने के लिए आसमान में असामान्य रूप से अंधेरा भी रहेगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सितंबर में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिड उल्का वर्षा 9 सितंबर, 2026 को अपने चरम पर होगी, जिससे मानसून (वर्षा ऋतु) के अंतिम चरण के अंत में आकाश में तेज़ गति से चलने वाले उल्का वृष्टि दिखाई देगी लेकिन यह प्रसिद्ध अगस्त पर्सिड उल्का वर्षा की तुलना में काफी छोटी है, फिर भी इस वर्ष इसका एक बड़ा लाभ यह है कि इस उल्का वृष्टि के दौरान चंद्रमा की रोशनी लगभग नहीं के बराबर होगी ।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर आपको लगता था कि उल्का वृष्टि का मौसम अगस्त में होने वाले शानदार पर्सिड्स उल्कापिंडों के साथ समाप्त हो गया है, तो आसमान की ओर देखने का एक और कारण है, सितंबर में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा जिसमें आकाश में तेज़ गति से चलने वाली उल्काएं दिखाई देंगी और सितम्बर 2026 में खगोलविदों के ध्यान देने का एक और भी कारण है कि खगोलीय गणनाओं से पता चलता है कि पृथ्वी 10 सितंबर की सुबह/ भोर में धूमकेतुओं के मलबे की एक पुरानी लकीर से वायुमंडलीय घर्षण कर सकती है,जिससे संभवतः उल्का गतिविधि में संक्षिप्त वृद्धि हो सकती है, लेकिन यह पूरी तरीके से निश्चित नहीं है, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इससे इस वर्ष सितंबर की उल्का वर्षा सामान्य से अधिक रोचक हो सकती है।
सितंबर में एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का देखने का सबसे अच्छा समय एवं चरम समय क्या होगा।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वर्षा को देखने के लिए 9 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि से 10 सितंबर 2026 की सुबह/भोर तक सबसे ज्यादा अच्छा रह सकता है क्योंकि उस दौरान इसका चरम सक्रिय समय भी रहेगा।
इस दौरान कितनी उल्काएं देख सकते हैं
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैसे तो यह एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वर्षा, लगभग 5 से 21 सितंबर 2026 तक सक्रिय रहेगी लेकिन 9 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि से 10 सितम्बर की भोर को इसका चरम समय होने के कारण आदर्श परिस्थितियों में इसकी अनुमानित दर लगभग 5 से 8 उल्काएं प्रति घंटा तक हो सकती है लेकिन सामान्य दर कई वर्षों में लगभग 5 उल्कापिंड प्रति घंटा ही रही है,और अगर हम इसकी गति की बात करें तो पाते हैं कि एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का की गति लगभग 64 किमी प्रति सेकंड से लेकर 70 किलोमीटर प्रति सेकंड तक भी हो सकती है, इस सितंबर 2026 में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि भारत के लिए देखने का सबसे अच्छा समय 9 सितंबर, 2026 को आधी रात के बाद से सुबह तक रहेगा और भोर से पहले के घंटे में यह उल्का वृष्टि सबसे अधिक प्रकाशमान बिंदु प्रदान कर सकती हैं, साथ ही आदर्श अंधेरे आसमान की स्थिति में उत्तरपूर्वी क्षितिज की ओर, पर्सियस तारामंडल के पास सबसे अच्छा दिखाई देंगी और साथ ही लगभग अमावस्या के चांद के कारण आसमान में उत्कृष्ट अंधेरा भी रहेगा इसीलिए बस मौसम साफ़ और शहर के प्रकाश प्रदूषण की रोशनी से दूर एक सुंदर,साफ़, संपूर्ण सुरक्षित एवं पूर्ण सावधानी पूर्वक एक आदर्श अंधेरी जगह ढूंढ लेंगे तो परिस्थितियां और भी सर्वश्रेष्ठ हो सकती हैं।
दुनियां में और भारत में दृश्यता क्या और कैसी रहेगी ।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में आता है और यह उल्का बौछार मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के देशों में ही दिखाई देगी, इसीलिए इसका मुख्य पीक 9 सितंबर 2026 की रात से लेकर 10 सितंबर 2026 के तड़के सुबह (pre-dawn hours) तक रहेगा,भारत में इसे देखने का सबसे सही समय 9 सितंबर की रात 11:00 बजे के बाद से लेकर अगले दिन सुबह सूरज निकलने से पहले तक है। खगोलविद अमर पाल ने बताया कि चाँद की स्थिति की बात करें तो पाते हैं कि यह (सबसे अच्छी बात) है इस साल 9 सितंबर को चंद्रमा 'न्यू मून' (अमावस्या) के बेहद करीब होगा, जिससे आसमान में चाँद की रोशनी का व्यवधान नहीं रहेगा साथ ही में घना अंधेरा होने के कारण हल्के और बेहद तेज़ तैरते हुए उल्कापिंड भी आसानी से देखे जा सकेंगे,लेकिन लाइट पॉल्यूशन से पूरी तरीके से दूर जाएं क्योंकि शहरों की तेज़ रोशनी और प्रदूषण के कारण ये वैसे ही कम दिखने वाले उल्कापिंड बिल्कुल गायब भी हो सकते हैं साथ ही
मानसून का खलल भी हो सकता है चूंकि भारत में सितंबर की शुरुआत में कई हिस्सों में मानसूनी बादल छाए रहते हैं, इसलिए यदि आपके इलाके में आसमान पूरी तरह साफ़ (Clear Sky) रहता है, तभी आप इसे देख पाएंगे।
किस तारामण्डल क्षेत्र में दिखाई देंगी एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि के दीप्तिमान तारामंडल की बात करें तो पाते हैं कि यह उत्तर-पूर्वी क्षितिज की ओर,पर्सियस तारामंडल क्षेत्र से आती हुई दिखाई देंगी,या कुछ यूं कहें कि पर्सियस तारामंडल क्षेत्र में इस एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि का रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु होगा।
क्या होता है रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि क्योंकि किसी भी तारामंडल क्षेत्र से आती हुई उल्काओं का दिखना केवल एक दृष्टि प्रभाव ही होता है इसीलिए यह एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि भी पर्सियस तारामंडल की तरफ़ से दिखना केवल एक दृष्टि प्रभाव ही होगा,लेकिन इसको कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे की अगर आप कहीं खाली पड़ी हुईं रेलगाड़ियों की पटरियों को देखते हैं तो आपको दूर सामने देखने पर वह आगे एक दूर जगह पर एक दूसरे से मिलती हुईं नज़र आती हैं ठीक वैसे ही आकाश में नज़र करने पर जिस तारामंडल क्षेत्र की तरफ़ से कोई भी उल्का वृष्टि दिखाई देती है उसी के आधार पर उस उल्का वर्षा का नाम रखा गया है और उस बिंदु जिस तरफ़ से आती हुई दिखाई देती हैं उसको खगोल विज्ञान में रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु के नाम से जाना जाता है, लेकिन वैसे तो यह रात्रि आकाश के किसी भी हिस्से में दिखाई दे सकती हैं इसीलिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः बचकर संपूर्ण आकाश में नज़र डालकर खोजने का प्रयास करना चाहिए और इसके चरम की बात करें तो पाते हैं कि भारत में 9–10 सितंबर 2026 की रात को अपने चरम (Peak) पर होगी क्योंकि यह एक छोटी (minor) उल्का वर्षा है, जिसमें आकाश में टूटते तारे दिखाई देते हैं। इसीलिए 9 सितंबर 2026 (रात से अगली सुबह तक) उत्तम समय रहेगा या कुछ यूं कहें कि 9 की आधी रात के बाद और सुबह होने से पहले के साफ और अंधेरे आसमान में लगभग 5 से 10 उल्काएं प्रति घंटा भी नज़र आ सकती हैं लेकिन इनको ठीक से देखने के लिए आपको शहर की तेज रोशनी (Light pollution) से दूर किसी शांत,साफ़ एवं स्वच्छ रात्रि बाली जगह का चुनाव करना होगा साथ ही इस दौरान आसमान को देखने के लिए किसी विशेष टेलीस्कोप या दूरबीन की भी जरूरत नहीं है, इसे खुली आंखों से देखा जा सकता है लेकिन अपनी आंखों को अंधेरे के अनुकूल ढलने के लिए कम से कम 30 मिनट का समय दें क्योंकि यह खास, एप्सिलॉन परर्सीड्स उल्का बौछारें उस दौरान अपने चरम पर होंगी इसीलिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः दूर,साफ मौसम में नग्न आंखों के साथ ही इसका दीदार हो सकेगा।
किस धूमकेतु के कारण घटित होगी यह एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वर्षा।?
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर उत्तर प्रदेश भारत के खगोलविद् अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलीय दृष्टि से 9 सितंबर 2026 को होने वाला यह विशेष एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का है इसके मुख्य जनक यानी कि एप्सिलोन परर्सीड्स उल्काओं का निर्माण करने वाले धूमकेतु की खोज खगोल वैज्ञानिक आज तक निश्चित रूप से नहीं कर पाए हैं, लेकिन ये अंतरिक्ष में घूम रहे धूल और मलबे के कण होते हैं, जो 64 से लेकर 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की अत्यधिक रफ्तार से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही जल जाते हैं,इनको ही वैसे तो साधारण भाषा में टूटते हुए तारे या शूटिंग स्टार्स भी कहा जाता हैं,लेकिन खगोल विज्ञान की भाषा में कहें तो उल्का (Meteor) अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में अत्यधिक वेग से प्रवेश करने वाले छोटे चट्टानी या धात्विक पिंड होते होते हैं एवं उल्काओं की उत्पत्ति की बात करें तो पाते हैं कि ये क्षुद्रग्रहों (Asteroids) के टूटे हुए टुकड़े या ज़्यादातर धूमकेतुओं (Comets) द्वारा छोड़े गए धूल और गैस के कण ही होते हैं जो तेज गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं,तो वायुमण्डल के साथ घर्षण (Friction) के कारण अत्यधिक गर्मी पैदा होती है इससे ये छड़ भर के लिए तीव्र वेग से जल उठते हैं और आकाश में प्रकाश की एक चमकीली धारी या लकीर के रूप में दिखाई देते हैं, लेकिन खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह भी जानना आवश्यक है कि उल्का और उल्कापिंड में अंतर यह होता है कि अधिकांश उल्काएँ वायुमंडल में पूरी तरह जलकर नष्ट हो जाती हैं, या कुछ यूं कहें कि जब यह पृथ्वी के वायुमंडल में रगड़ या घर्षण से जलती हुईं लकीरें बनाती हुई दिखाई देती हैं उस अवस्था को उल्का या उल्का वृष्टि या उल्का वर्षा कहा जाता है, लेकिन जो इनके अंतरिक्षीय टुकड़े आकार में बड़े होने के कारण पूरी तरह जल नहीं पाते हैं और ठोस छोटी- बड़ी चट्टानों के रूप में छोटे एवं बड़े टुकड़ों के रूप में पृथ्वी के वायुमंडलीय झंझावातों को पार करते हुए सीधे पृथ्वी की सतह पर आ कर गिरते हैं, उन्हें ही उल्कापिंड (Meteorites) कहा जाता है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अब अगर विशेष रूप से हम बात करें इस 9 सितंबर 2026 में होने वाली इस ख़ास एप्सिलॉन परर्सीड्स उल्का वृष्टि की तो इसके बारे में कुछ बड़ी ही रोचक जानकारियां भी सामने आती हैं जैसे कि वैज्ञानिक आज तक एप्सिलॉन परसिड्स (September Epsilon Perseids) उल्का बौछार के लिए जिम्मेदार मूल धूमकेतु (Parent Comet) की पूरी तरीके से खोज नहीं कर पाए हैं,लेकिन इस दिशा में विश्व वैज्ञानिक समुदाय की लगातार खोंजे जारी हैं,साथ ही खगोलविद अमर पाल सिंह के विचार प्रयोग परिकल्पना (Thought Experiments Hypothesis) के अनुसार भी इस उल्का बौछार से जुड़े मुख्य तथ्यों में से अज्ञात मूल धूमकेतु के लिए विचार प्रयोग वैज्ञानिक अनुमान है कि इसके लिए जिम्मेदार कोई बड़ा पिंड एक अज्ञात दीर्घ-अवधि (unknonwn long-period) वाला धूमकेतु है, जिसे सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में हजारों साल लगते हैं और उसकी कक्षा भी अति दीर्घवृत्ताकार होगी, क्योंकि दीर्घ-आवर्तकाल वाले धूमकेतु, ऊर्ट बादल (Oort cloud) से उत्पन्न होने वाले खगोलीय पिंड हैं, लेकिन कुछ दीर्घ-अवधि वाले धूमकेतु/ (कॉमेट) या जिन्हें साधारण भाषा में पुच्छल तारा भी कहा जाता है वह अज्ञात ही हैं खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर प्रकाश डालते हुए साथ ही इसकी अपने विचार प्रयोग परिकल्पना की खगोलीय व्याख्या करते हुए अपने ही शब्दों में बताया कि अज्ञात (Unknown) होने के कई और कारण भी हो सकते हैं ,जैसे कि चूंकि ऐसे कई धूमकेतु मानव इतिहास में केवल एक बार या हजारों साल पहले दिखे होते हैं, इसलिए खगोलविदों के पास इनका कई हजारों साल पहले का कोई भी सीधा प्रत्यक्ष पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता है, लेकिन जब ये अचानक से कभी भी पृथ्वी या सूर्य के करीब आते हैं, तभी इनकी खोज हो पाती है, इसलिए इन्हें "अज्ञात" माना जाता है, इसीलिये वह अज्ञात धूमकेतु भी अभी तक हमारे विश्व वैज्ञानिक समुदाय की भी दूरबीनों की नजर में नहीं आया है,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि दुनियां में आगे आने वाले समय में विशेष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एवं अंतरिक्ष आधारित विभिन्न प्रकार की दूरबीनों आदि के माध्यम से लगातार खोजों का आधार एवं दायरा बढ़ता ही जा रहा है जो की अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए विशेष ज़रूरी एवं हमेशा आवश्यक भी है, हालांकि अभी तक तो एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वृष्टि के लिए ख़ास जिम्मेदार वाला मूल धूमकेतु नहीं मिला है, लेकिन पृथ्वी हर साल सितंबर की शुरुआत में अंतरिक्ष में उस अज्ञात धूमकेतु (जो कभी विशालकाय रूप में उस काले घने अंधकारमय अनजाने सुनसान एवं ख़ामोशी युक्त अकेले शांत रास्ते पर चला करता होगा) के द्वारा छोड़े गए मलबे (धूल और बर्फ के कणों) की पट्टी से गुजरती है,तब उसके द्वारा अपने पीछे छोड़े हुए ये कण आज भी जब हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो घर्षण के कारण चमक उठते हैं, जिससे हमें यह ख़ास उल्का बौछार दिखाई देती है। लेकिन इसके (एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वृष्टि) के नियमित अवलोकन और इसकी कक्षा (orbit) के खगोल गणितीय आकलन से विश्व वैज्ञानिक समुदाय के खगोल वैज्ञानिकों ने इसे एक अलग उल्का बौछार के रूप में दर्ज किया है। इसीलिए खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष ज़ोर देते हुए बताया है कि भ्रम से ज़रूर बचें क्योंकि जैसा कि खगोलविद अमर पाल सिंह हमेशा ही अपने मूल कथन में बताते हैं कि सही ज्ञान सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान। इसीलिए यह भी जानना ज़रूरी है कि (अगस्त और सितंबर के परसिड्स में बहुत अंतर होता है) क्योंकि अक्सर तमाम लोग इसे अगस्त में दिखने वाली प्रसिद्ध परसिड्स (Perseids) उल्का बौछार समझ लेते हैं,अगस्त वाली मुख्य परसिड्स उल्का बौछार के धूमकेतु की खोज की जा चुकी है, जिसका नाम स्विफ्ट-टटल (Comet 109P/Swift-Tuttle) है। लेकिन सितंबर में दिखने वाली एप्सिलॉन परसिड्स एक बिल्कुल अलग उल्का धारा है और इसके मूल धूमकेतु का पता लगाया जाना अभी भी बाकी ही है, इसीलिए तब तक,प्राप्त ज्ञान की शक्ति का प्रयोग करते हुए ही इस एप्सिलॉन परसिड्स उल्का वृष्टि का विहंगम दृश्य ग्रामीण इलाकों से बेहतर परिणाम दे सकता है।








There are athletes who chase medals, and there are athletes who build a movement. In Jammu & Kashmir, Faheem Masood Shah has quietly become both.


Sep 29 2026, 14:21
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