Motihari

Sep 11 2019, 17:31

देवापुर संगम तट से एक लाख से अधिक डाक बम ने किया जलबोझी।


बागमति एवं लालबकेया नदी के संगम तट देवापुर से जलबोझी करते है डाक बम, त्रयोदशी तिथि को अरेराज महादेव को चढ़ाते जल।

पताही भाद्रपद माह के अनंत चतुर्दशी के अवसर पर त्रयोदशी तिथि को सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर अरेराज के शिव लिंग पर जलाभिषेक को नेपाल से निकलने वाली बागमति एवं लालबकेया नदी के संगम तट देवापुर पर डाक कावरियों के आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। गेरुआ वस्त्र धारण किये डाक बम कावरियों द्वारा नाचते गाते दोनो नदियों के पवित्र संगम तट पर पहुँच गंगा में डुबकी लगा जलबोझी कर नियम पूर्वक पूजा अर्चना कर बोल बम का नारा लगाते अरेराज मंदिर को बढ़ रहे है। मंगलवार को इस पवित्र संगम घाट से लगभग एक लाख डाक बम कावरियों द्वारा जलबोझी किया गया है। वही खबर लिखे जाने तक डाक बम द्वारा जलबोझी किया जा रहा है। डाक बम कावरिया संगम घाट से अरेराज मंदिर तक 80 किलोमीटर की दूरी 12 घंटे में तय कर बाबा भोलेनाथ को जलाभिषेक करते है । देवापुर नियंत्रण कक्ष से संगम तट तक का क्षेत्र डाक बम कावरियों से खचा खच भरा है, बोल बम के गूंज से पूरा क्षेत्र शिव मय हो गया है, इस वर्ष डाक बम कावरियों में आधा संख्या महिला एवं बच्चे बम का है जो पुरुष डाक बम के साथ कदम से कदम मिलाते बोल बम का नारा लगाते अरेराज मंदिर की ओर प्रस्थान कर रहे है। संगम घाट से नेपाल सहित मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, सहित जिले के सभी क्षेत्रों के डाक बम कावरियों द्वारा इस संगम घाट से जलबोझी किया जा रहा है।

Katihar

Sep 10 2019, 18:22

कटिहार : मोहर्रम के मौके पर सड़को पर दिखा ताजिया का भव्य नजारा।


कटिहार में मोहर्रम के मौके पर सड़को पर ताजिया का भव्य नजारा दिखा, कहीं अपना कटिहार का नजारा दिखा तो कहीं भारतीय सेना के मिसाइल के तर्ज पर बनाये गए नजारों के साथ-साथ तिरंगे से रंगा हुआ ताजिया पुरे शहर वासियो के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा।

Barh

Sep 10 2019, 17:28

गिरजाघरों में भव्य तरीके से मनाया गया मां मरियम का जन्मदिन।
 

बाढ : मां मरियम के जन्मदिन के अवसर पर बाढ़ अनुमंडल में गिरजाघरों को भव्य तरह से सजाया गया और वहीं सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आकर गिरजाघर में प्रार्थना की। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने मां मरियम की मूर्ति के पास प्रार्थना की और मन्नतें मांगी। इसको लेकर गिरजाघर की ओर से विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। जिसमें पुरुष महिला एवं बच्चों ने भाग लिया। मां मरियम ईसा मसीह की मां है। जो ईसाई धर्म के संस्थापक थे। ईसाई धर्म के लोग मां मरियम को विश्व की मां मानते हैं।

Barh

Sep 10 2019, 17:20

गिरजाघरों में भव्य तरीके से मनाया गया मां मरियम का जन्मदिन।
 

बाढ : मां मरियम के जन्मदिन के अवसर पर बाढ़ अनुमंडल में गिरजाघरों को भव्य तरह से सजाया गया और वहीं सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आकर गिरजाघर में प्रार्थना की। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने मां मरियम की मूर्ति के पास प्रार्थना की और मन्नतें मांगी। इसको लेकर गिरजाघर की ओर से विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। जिसमें पुरुष महिला एवं बच्चों ने भाग लिया। मां मरियम ईसा मसीह की मां है। जो ईसाई धर्म के संस्थापक थे। ईसाई धर्म के लोग मां मरियम को विश्व की मां मानते हैं।

Katihar

Sep 09 2019, 18:41

कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिंदुओ द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम।
 


पूर्वजो द्वारा किये गये वादे को निभाते हुए कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिन्दू के द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम, हसनगंज प्रखंड के मोहमदिया हरिपुर गांव के सौहार्द के मिसाल पेश करता इस मोहर्रम की चर्चा पुरे बिहार में है, एक रिपोर्ट ,,,,,

झरनी के गीत और तमाम रीत के साथ मोहर्रम मनाते यह हिन्दू समुदाय के लोग है, बड़ी बात यह है की लगभग 5 किलो मीटर के आबादी तक इस गांव में एक भी अल्पसंख्यक परिवार नहीं है, मगर 100 सालो से भी अधिक समय से इस गांव में हर साल मातम का पर्व मोहर्रम पुरे रीत रिवाज के साथ मनाया जाता है, स्वर्गीय छेदी साह के मजार से जुड़े इस मोहर्रम की कहानी भी बड़ी ही दिलचस्प है, ग्रामीणों की माने तो यह जमीन वकाली मियाँ का था, मगर बीमारी से उनके बेटो के मौत के बाद वह इस जमीन को छोड़ कर जाने लगे लेकिन उससे पहले छेदी साह को जमीन देते हुए उन्होंने वादा लिया की ग्रामीण मोहर्रम के दौरान पुरे रीत रिवाज के साथ मोहर्रम मनायेगे, बस पूर्वजो के इसी वायदे को पूरा करते हुए आज भी इस गांव में हिन्दू समुदाय के लोगों के द्वारा मोहर्रम मनाया जाता है। ग्रामीण महिला द्रोपदी देवी कहती है की जब से शादी हो कर वह इस गांव में आई है तब से वह इसमें रीत रिवाज निभाने में सहयोग करती है, अब नव विवाहिता भी गांव के इस रीत को निभाने के लिए आगे आने लगी है, जो काफी सुखद है।

ग्रामीण प्रतिनिधि भी इस मोहर्रम को पुरे बिहार के लिए सौहार्द का मिसाल पेश करता एक उम्दा उदहारण मानते है, उनलोगो की माने तो इससे आपसी सौहार्द बढ़ने के साथ -साथ गावं सुख, शांति और समृद्धि भी आई है।

सौहार्द का मिसाल पेश करता यह मोहर्रम वाकई बेहद खास है, एक तरफ जहां इसमें अपने पूर्वजो द्वारा किये गए वादे को निभाने के लिए लोगों की भावना की झलक दिखती है वहीं दूसरे धर्म के परंपराओं का सम्मान करने की सिख भी मिलती है।

RailRestro

Sep 05 2019, 15:47

Let’s dedicate our Ganesh Chaturthi to conserve the atmosphere by “Go Green Ganesha” concept. Lord Ganesha is symbol of wisdom and prosperity. Every year people celebrate birth anniversary of Ganesha as “Ganesh Chaturthi”. Mostly this festival is celebrated in Maharashtra for 10 days as birthday celebration of Ganesha. Read our blog to know more about Ganesh Chaturthi.
http://bit.ly/32z41QS

Muzaffarpur

Aug 14 2019, 16:16

जानिए क्यों मनाते हैं रक्षाबंधन का त्योहार? 
#Festival

कथा, महत्व, इतिहास सबकुछ जानें पंडित विनय पाठक प्रधानपुजारी बाबा गरीबनाथ मंदिर से।

भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मजबूत प्रेम पूर्ण आधार देता है रक्षाबंधन का त्योहार। श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले इस पर्व का ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक और राष्ट्रीय महत्व भी है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर रेशम का धागा बांधती है तथा उसके दीर्घायु जीवन एवं सुरक्षा की कामना करती है। बहन के इस स्नेह से बंधकर भाई उसकी रक्षा के लिए कृत संकल्प लेता है। हालांकि रक्षाबंधन की व्यापकता इससे भी कहीं ज्यादा है। राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, धर्म की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है।


सम्मान और आस्था के लिए भी बांधते हैं रक्षा सूत्र।
विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस पर्व पर बंग भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था। रक्षा सूत्र सम्मान और आस्था प्रकट करने के लिए भी बांधा जाता है। रक्षाबंधन का महत्व आज के परिपे्रक्ष्य में इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि आज मूल्यों के क्षरण के कारण सामाजिकता सिमटती जा रही है और प्रेम व सम्मान की भावना में भी कमी आ रही है। यह पर्व आत्मीय बंधन को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ हमारे भीतर सामाजिकता का विकास करता है। इतना ही नहीं यह त्योहार परिवार, समाज, देश और विश्व के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति हमारी जागरूकता भी बढ़ाता है।

राखी पूर्णिमा को कजरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। लोग इस दिन 'बागवती देवी' की भी पूजा करते हैं। रक्षाबंधन को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे विष तारक यानी विष को नष्ट करने वाला, पुण्य प्रदायक यानी पुण्य देने वाला आदि।
ऐसे हुई रक्षाबंधन की शुरुआत
ऐसी मान्यता है कि श्रावणी पूर्णिमा या संक्रांति तिथि को राखी बांधने से बुरे ग्रह कटते हैं। श्रावण की अधिष्ठात्री देवी द्वारा ग्रह दृष्टि-निवारण के लिए महर्षि दुर्वासा ने रक्षाबंधन का विधान किया।

इंद्राणी ने इंद्र को बांधा था रक्षा सूत्र।
एक और पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवों एवं दैत्यों में बारह वर्ष तक युद्ध रोक देने का निश्चय किया, किंतु इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने पति की रक्षा एवं विजय के लिए उनके हाथ में वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांधा। इसके बाद इंद्र के साथ सभी देवता विजयी हुए। तभी से इस पर्व को रक्षा के प्रतीक रूप में मनाया जाता है।

इस बार का रक्षाबंधन इसलिए है खास, जानें शुभ मुहूर्त एवं मंत्र  

राखी के दिन होता है श्रावणी उपाकर्म, इस दिन बन रहा है सौभाग्य एवं पंचांग योग
इतिहास में राखी का महत्व
इतिहास में राखी के महत्व के अनेक उल्लेख मिलते हैं। मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा-याचना की थी। हुमायूं ने भी राखी

  • Muzaffarpur
     @Muzaffarpur  लाज रखी।
    कहते हैं, सिकंदर की पत्नी ने पति के हिंदू शत्रु पुरू को राखी बांध कर उसे अपना भाई बनाया था और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया था। पुरू ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया था। इसी राखी के लिए महाराजा राजसिंह ने रूपनगर की राजकुमारी का उद्धार कर औरंगजेब के छक्के छुड़ाए। महाभारत में भी विभिन्न प्रसंग रक्षाबंधन के पर्व के संबंध में उल्लिखित हैं।
    जैन परंपरा में रक्षाबंधन
    जैन परंपरा में भी रक्षाबंधन मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन जैन मंदिरों में श्रावक-श्राविकाएं धर्म और संस्कृति की रक्षा के संकल्प पूर्वक रक्षासूत्र बांधते हैं और रक्षाबंधन पूजन करते हैं।
India

May 02 2019, 17:48

About Pradosha Festival

D K Hari and D K Hema Hari
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Pradosha is a festival that is primarily dedicated to Lord Shiva, and also to Lord Narasimha.

Pradosha is an important day for the devotees of Shiva. It is on this day the popular Pradosha Vrat is undertaken. Pradosha is observed on Trayodashi, the 13th day of both Shukla Paksha, the waxing phase of moon and Krishna Paksha, the waning phase of Moon, every month, in Indian calendar.

This day is thus observed twice every month. This day of Pradosha is observed in a grand manner, across all Shiva temples.

Pradosha means dusk, the evening twilight. The hours before and after the dusk on Pradosha, is the most important period on Pradosha, wherein ardent worship, puja of Shiva is carried out across houses and temples.

Pradosh also means corrupt. In his everyday life, man accumulates many negative karma. Pradosa is an occasion wipe out these Karmas by observing the Pradosha Vrat, dedicated to Bhagavan Shiva and Devi Parvati.

The story of the origin of Samudra Manthan is attached to the popular Samudra Manthan legends.

As per the legend of Samudra Manthan, the pot of immortal nectar, Amrit came out of the Milky Ocean, when the Devas and Asuras, churned the milky ocean with a snake, Vasuki as a rope.

During this churning, along with the pot of immortal nectar, all the good and bad in the Universe were also produced. Poison, the Halahala, also appeared. This Halahala, which represent collective Karma was powerful enough to destroy all lives in the universe. The Devas couldn’t endure the poisonous fumes that were spreading everywhere and took refuge in Shiva.

Lord Shiva in his kindness drank the poison, saving the universe. This is symbolic of Shiva absolving us form the fruits of all our wrong actions on Pradosha day.

Devi Parvati pressed Shiva’s neck, so that the poison stopped in the neck, forming a blue spot.

  • India
     @India  From thereon Shiva came to be known as Nilakanta, the blue-throated One, which was on a Trayodasi Day.
    
    All the Devas and Asuras praised, and in response, Shiva being pleased by their devotion, performed His Ananda Tandava, the Divine Dance of Bliss, standing in between the horns of Nandi, His Vahana. This blissful dance of Shiva happened on a Trayodasi Day. The significance of this is that when we are free from the ill-effetcs of our karma, then there is Ananda, and only Ananda, bliss.
    
    Shiva is also called as Nataraja. Natana or Natya means dance and Raja is King. Nataraja is the Lord of Dance.
    
    The Nrttya, dance form of Nataraja is called Tandava Nrttya and it is from this dance that the dance forms of India have drawn inspiration. There are many types of Tandava Nrttya, the prominent ones being Ananda Tandavam or Blissful dance and Rudra Tandavam or a fierce dance.
    
    Shiva is a Universal phenomenon, a formless phenomenon, a Cosmic Form and the body of the cosmos itself. His dance has therefore got to be nothing but the dance of the cosmos itself. The Tandava Nrttya is thus a cosmic dance, a dance of the cosmos and based on the state of the cosmos is called Ananda Tandavam or Rudra Tandavam.Nandi, the Vahana of Shiva denotes the natural, physical body which needs to be tuned with the mind, and once this union is achieved, then our body acts as a support through which the bliss of realization can be experienced. Nandi then becomes the stage and Shiva is then said to dance between the horns of the Nandi.
    
    Pradosha is as occasion to contemplate on this Cosmic Dance of Shiva, which has a Universal Significance.
     
SanatanDharm

Nov 07 2018, 09:33

 @SanatanDharm Deepavali Fireworks 
 
Bridging Worlds Thru Knowledge Page 21 of 42 www.bharathgyan.com  
 
Bhoja Fireworks – 1000 CE, 1000 Years Ago Around 1000 CE, the vast region of Malwa in Central India was ruled by Raja Bhoja, who was an accomplished scientist, engineer as well as able administrator. The present day city of Bhopal and the 1000 year old dam there, in good working condition even today, owe their name and fame to his technological and administrative skills. 
 
Raja Bhoja     Malwa kingdom 
Bhoja had devised new engineering devices based on mechanics and thermodynamics for protection, defence, comfort as well as for fun. 
His work Samarangana Sutradhara describes how fire and certain chemicals could be used in a controlled manner to create objects that could lift off into the sky, create a blast, display lights and sound. 
Spectators used to gather to watch him set off such displays  
Fireworks at Temple Festivals – 1000s CE, 1000 Years Ago Pooram is one of the prominent festivals of Kerala and procession of the deity forms an important part of this festival. Fireworks, called Vedikettu, at the time of the procession of the deity is the hallmark of the festivities of this temple. 
The Pooram as a festival is traced to over 1000 years ago.  
There are many Pooram festivals across Kerala, of which Trissur Pooram is the highlight in recent times since 1700s. Prior to that, Arattapuzha Pooram was the largest Pooram. Many other Poorams continue to be held in many villages of Kerala even today.  

SanatanDharm

Nov 06 2018, 17:55

A similar case is the instance of Ravana, who, even after being mortally wounded by Rama, offered to teach Rama’s brother Lakshmana, all that he knew about the principles of good management. 
Celebration through Crackers The use of crackers as a part of the celebration also brings out this noble feeling for sharing through sound and light with one’s bandhu and mitra i.e. those with whom we have a bond - our family, our Bandhu (similar to bond) and friends in the neighbourhood, far and near.  It is an activity to also increase the bonding further.   
Deepavali And Fireworks Association The above, continuous tradition of Naraka Chaturdasi ties fire and firecrackers to Deepavali festivities inseparably. 
From this celebration, the idea of using firecrackers to celebrate all victories, happy occasions, other festivals and so on came to be sparked.  
Let us now trace back the knowhow and displays of firework in India, across the land and across times.  
 “BURSTING” MYTHS AROUND ORIGIN OF FIREWORKS 
Saltpetre – the Key Spark One of the main constituents of fireworks, pyrotechnics is Potassium Nitrate (KNO3), commonly called SaltPetre, but more popular as Bengal SaltPetre, though in recent times it is also replaced by Barium and other Nitrates for greens and other colours. Some even refer to this salt as Chinese Salt or Chinese Snow, attributing its origin to China. 
It is a form of potash found organically in soil rich in nitrogen. The knowledge, usage and trade of this salt has a long history in both India and China.  
Commonly Held History of Fireworks  In international circles it is widely believed that the technology for producing Saltpetre which is key to Fireworks and Gunpowder, was discovered in China. This perception has come about mainly due to the works of British Sinologists such as Joseph Needham.  
  continue  part6

Motihari

Sep 11 2019, 17:31

देवापुर संगम तट से एक लाख से अधिक डाक बम ने किया जलबोझी।


बागमति एवं लालबकेया नदी के संगम तट देवापुर से जलबोझी करते है डाक बम, त्रयोदशी तिथि को अरेराज महादेव को चढ़ाते जल।

पताही भाद्रपद माह के अनंत चतुर्दशी के अवसर पर त्रयोदशी तिथि को सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर अरेराज के शिव लिंग पर जलाभिषेक को नेपाल से निकलने वाली बागमति एवं लालबकेया नदी के संगम तट देवापुर पर डाक कावरियों के आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। गेरुआ वस्त्र धारण किये डाक बम कावरियों द्वारा नाचते गाते दोनो नदियों के पवित्र संगम तट पर पहुँच गंगा में डुबकी लगा जलबोझी कर नियम पूर्वक पूजा अर्चना कर बोल बम का नारा लगाते अरेराज मंदिर को बढ़ रहे है। मंगलवार को इस पवित्र संगम घाट से लगभग एक लाख डाक बम कावरियों द्वारा जलबोझी किया गया है। वही खबर लिखे जाने तक डाक बम द्वारा जलबोझी किया जा रहा है। डाक बम कावरिया संगम घाट से अरेराज मंदिर तक 80 किलोमीटर की दूरी 12 घंटे में तय कर बाबा भोलेनाथ को जलाभिषेक करते है । देवापुर नियंत्रण कक्ष से संगम तट तक का क्षेत्र डाक बम कावरियों से खचा खच भरा है, बोल बम के गूंज से पूरा क्षेत्र शिव मय हो गया है, इस वर्ष डाक बम कावरियों में आधा संख्या महिला एवं बच्चे बम का है जो पुरुष डाक बम के साथ कदम से कदम मिलाते बोल बम का नारा लगाते अरेराज मंदिर की ओर प्रस्थान कर रहे है। संगम घाट से नेपाल सहित मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, सहित जिले के सभी क्षेत्रों के डाक बम कावरियों द्वारा इस संगम घाट से जलबोझी किया जा रहा है।

Katihar

Sep 10 2019, 18:22

कटिहार : मोहर्रम के मौके पर सड़को पर दिखा ताजिया का भव्य नजारा।


कटिहार में मोहर्रम के मौके पर सड़को पर ताजिया का भव्य नजारा दिखा, कहीं अपना कटिहार का नजारा दिखा तो कहीं भारतीय सेना के मिसाइल के तर्ज पर बनाये गए नजारों के साथ-साथ तिरंगे से रंगा हुआ ताजिया पुरे शहर वासियो के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा।

Barh

Sep 10 2019, 17:28

गिरजाघरों में भव्य तरीके से मनाया गया मां मरियम का जन्मदिन।
 

बाढ : मां मरियम के जन्मदिन के अवसर पर बाढ़ अनुमंडल में गिरजाघरों को भव्य तरह से सजाया गया और वहीं सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आकर गिरजाघर में प्रार्थना की। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने मां मरियम की मूर्ति के पास प्रार्थना की और मन्नतें मांगी। इसको लेकर गिरजाघर की ओर से विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। जिसमें पुरुष महिला एवं बच्चों ने भाग लिया। मां मरियम ईसा मसीह की मां है। जो ईसाई धर्म के संस्थापक थे। ईसाई धर्म के लोग मां मरियम को विश्व की मां मानते हैं।

Barh

Sep 10 2019, 17:20

गिरजाघरों में भव्य तरीके से मनाया गया मां मरियम का जन्मदिन।
 

बाढ : मां मरियम के जन्मदिन के अवसर पर बाढ़ अनुमंडल में गिरजाघरों को भव्य तरह से सजाया गया और वहीं सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आकर गिरजाघर में प्रार्थना की। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने मां मरियम की मूर्ति के पास प्रार्थना की और मन्नतें मांगी। इसको लेकर गिरजाघर की ओर से विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। जिसमें पुरुष महिला एवं बच्चों ने भाग लिया। मां मरियम ईसा मसीह की मां है। जो ईसाई धर्म के संस्थापक थे। ईसाई धर्म के लोग मां मरियम को विश्व की मां मानते हैं।

Katihar

Sep 09 2019, 18:41

कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिंदुओ द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम।
 


पूर्वजो द्वारा किये गये वादे को निभाते हुए कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिन्दू के द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम, हसनगंज प्रखंड के मोहमदिया हरिपुर गांव के सौहार्द के मिसाल पेश करता इस मोहर्रम की चर्चा पुरे बिहार में है, एक रिपोर्ट ,,,,,

झरनी के गीत और तमाम रीत के साथ मोहर्रम मनाते यह हिन्दू समुदाय के लोग है, बड़ी बात यह है की लगभग 5 किलो मीटर के आबादी तक इस गांव में एक भी अल्पसंख्यक परिवार नहीं है, मगर 100 सालो से भी अधिक समय से इस गांव में हर साल मातम का पर्व मोहर्रम पुरे रीत रिवाज के साथ मनाया जाता है, स्वर्गीय छेदी साह के मजार से जुड़े इस मोहर्रम की कहानी भी बड़ी ही दिलचस्प है, ग्रामीणों की माने तो यह जमीन वकाली मियाँ का था, मगर बीमारी से उनके बेटो के मौत के बाद वह इस जमीन को छोड़ कर जाने लगे लेकिन उससे पहले छेदी साह को जमीन देते हुए उन्होंने वादा लिया की ग्रामीण मोहर्रम के दौरान पुरे रीत रिवाज के साथ मोहर्रम मनायेगे, बस पूर्वजो के इसी वायदे को पूरा करते हुए आज भी इस गांव में हिन्दू समुदाय के लोगों के द्वारा मोहर्रम मनाया जाता है। ग्रामीण महिला द्रोपदी देवी कहती है की जब से शादी हो कर वह इस गांव में आई है तब से वह इसमें रीत रिवाज निभाने में सहयोग करती है, अब नव विवाहिता भी गांव के इस रीत को निभाने के लिए आगे आने लगी है, जो काफी सुखद है।

ग्रामीण प्रतिनिधि भी इस मोहर्रम को पुरे बिहार के लिए सौहार्द का मिसाल पेश करता एक उम्दा उदहारण मानते है, उनलोगो की माने तो इससे आपसी सौहार्द बढ़ने के साथ -साथ गावं सुख, शांति और समृद्धि भी आई है।

सौहार्द का मिसाल पेश करता यह मोहर्रम वाकई बेहद खास है, एक तरफ जहां इसमें अपने पूर्वजो द्वारा किये गए वादे को निभाने के लिए लोगों की भावना की झलक दिखती है वहीं दूसरे धर्म के परंपराओं का सम्मान करने की सिख भी मिलती है।

RailRestro

Sep 05 2019, 15:47

Let’s dedicate our Ganesh Chaturthi to conserve the atmosphere by “Go Green Ganesha” concept. Lord Ganesha is symbol of wisdom and prosperity. Every year people celebrate birth anniversary of Ganesha as “Ganesh Chaturthi”. Mostly this festival is celebrated in Maharashtra for 10 days as birthday celebration of Ganesha. Read our blog to know more about Ganesh Chaturthi.
http://bit.ly/32z41QS

Muzaffarpur

Aug 14 2019, 16:16

जानिए क्यों मनाते हैं रक्षाबंधन का त्योहार? 
#Festival

कथा, महत्व, इतिहास सबकुछ जानें पंडित विनय पाठक प्रधानपुजारी बाबा गरीबनाथ मंदिर से।

भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मजबूत प्रेम पूर्ण आधार देता है रक्षाबंधन का त्योहार। श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले इस पर्व का ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक और राष्ट्रीय महत्व भी है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर रेशम का धागा बांधती है तथा उसके दीर्घायु जीवन एवं सुरक्षा की कामना करती है। बहन के इस स्नेह से बंधकर भाई उसकी रक्षा के लिए कृत संकल्प लेता है। हालांकि रक्षाबंधन की व्यापकता इससे भी कहीं ज्यादा है। राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, धर्म की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है।


सम्मान और आस्था के लिए भी बांधते हैं रक्षा सूत्र।
विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस पर्व पर बंग भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था। रक्षा सूत्र सम्मान और आस्था प्रकट करने के लिए भी बांधा जाता है। रक्षाबंधन का महत्व आज के परिपे्रक्ष्य में इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि आज मूल्यों के क्षरण के कारण सामाजिकता सिमटती जा रही है और प्रेम व सम्मान की भावना में भी कमी आ रही है। यह पर्व आत्मीय बंधन को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ हमारे भीतर सामाजिकता का विकास करता है। इतना ही नहीं यह त्योहार परिवार, समाज, देश और विश्व के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति हमारी जागरूकता भी बढ़ाता है।

राखी पूर्णिमा को कजरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। लोग इस दिन 'बागवती देवी' की भी पूजा करते हैं। रक्षाबंधन को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे विष तारक यानी विष को नष्ट करने वाला, पुण्य प्रदायक यानी पुण्य देने वाला आदि।
ऐसे हुई रक्षाबंधन की शुरुआत
ऐसी मान्यता है कि श्रावणी पूर्णिमा या संक्रांति तिथि को राखी बांधने से बुरे ग्रह कटते हैं। श्रावण की अधिष्ठात्री देवी द्वारा ग्रह दृष्टि-निवारण के लिए महर्षि दुर्वासा ने रक्षाबंधन का विधान किया।

इंद्राणी ने इंद्र को बांधा था रक्षा सूत्र।
एक और पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवों एवं दैत्यों में बारह वर्ष तक युद्ध रोक देने का निश्चय किया, किंतु इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने पति की रक्षा एवं विजय के लिए उनके हाथ में वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांधा। इसके बाद इंद्र के साथ सभी देवता विजयी हुए। तभी से इस पर्व को रक्षा के प्रतीक रूप में मनाया जाता है।

इस बार का रक्षाबंधन इसलिए है खास, जानें शुभ मुहूर्त एवं मंत्र  

राखी के दिन होता है श्रावणी उपाकर्म, इस दिन बन रहा है सौभाग्य एवं पंचांग योग
इतिहास में राखी का महत्व
इतिहास में राखी के महत्व के अनेक उल्लेख मिलते हैं। मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा-याचना की थी। हुमायूं ने भी राखी

  • Muzaffarpur
     @Muzaffarpur  लाज रखी।
    कहते हैं, सिकंदर की पत्नी ने पति के हिंदू शत्रु पुरू को राखी बांध कर उसे अपना भाई बनाया था और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया था। पुरू ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया था। इसी राखी के लिए महाराजा राजसिंह ने रूपनगर की राजकुमारी का उद्धार कर औरंगजेब के छक्के छुड़ाए। महाभारत में भी विभिन्न प्रसंग रक्षाबंधन के पर्व के संबंध में उल्लिखित हैं।
    जैन परंपरा में रक्षाबंधन
    जैन परंपरा में भी रक्षाबंधन मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन जैन मंदिरों में श्रावक-श्राविकाएं धर्म और संस्कृति की रक्षा के संकल्प पूर्वक रक्षासूत्र बांधते हैं और रक्षाबंधन पूजन करते हैं।
India

May 02 2019, 17:48

About Pradosha Festival

D K Hari and D K Hema Hari
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Pradosha is a festival that is primarily dedicated to Lord Shiva, and also to Lord Narasimha.

Pradosha is an important day for the devotees of Shiva. It is on this day the popular Pradosha Vrat is undertaken. Pradosha is observed on Trayodashi, the 13th day of both Shukla Paksha, the waxing phase of moon and Krishna Paksha, the waning phase of Moon, every month, in Indian calendar.

This day is thus observed twice every month. This day of Pradosha is observed in a grand manner, across all Shiva temples.

Pradosha means dusk, the evening twilight. The hours before and after the dusk on Pradosha, is the most important period on Pradosha, wherein ardent worship, puja of Shiva is carried out across houses and temples.

Pradosh also means corrupt. In his everyday life, man accumulates many negative karma. Pradosa is an occasion wipe out these Karmas by observing the Pradosha Vrat, dedicated to Bhagavan Shiva and Devi Parvati.

The story of the origin of Samudra Manthan is attached to the popular Samudra Manthan legends.

As per the legend of Samudra Manthan, the pot of immortal nectar, Amrit came out of the Milky Ocean, when the Devas and Asuras, churned the milky ocean with a snake, Vasuki as a rope.

During this churning, along with the pot of immortal nectar, all the good and bad in the Universe were also produced. Poison, the Halahala, also appeared. This Halahala, which represent collective Karma was powerful enough to destroy all lives in the universe. The Devas couldn’t endure the poisonous fumes that were spreading everywhere and took refuge in Shiva.

Lord Shiva in his kindness drank the poison, saving the universe. This is symbolic of Shiva absolving us form the fruits of all our wrong actions on Pradosha day.

Devi Parvati pressed Shiva’s neck, so that the poison stopped in the neck, forming a blue spot.

  • India
     @India  From thereon Shiva came to be known as Nilakanta, the blue-throated One, which was on a Trayodasi Day.
    
    All the Devas and Asuras praised, and in response, Shiva being pleased by their devotion, performed His Ananda Tandava, the Divine Dance of Bliss, standing in between the horns of Nandi, His Vahana. This blissful dance of Shiva happened on a Trayodasi Day. The significance of this is that when we are free from the ill-effetcs of our karma, then there is Ananda, and only Ananda, bliss.
    
    Shiva is also called as Nataraja. Natana or Natya means dance and Raja is King. Nataraja is the Lord of Dance.
    
    The Nrttya, dance form of Nataraja is called Tandava Nrttya and it is from this dance that the dance forms of India have drawn inspiration. There are many types of Tandava Nrttya, the prominent ones being Ananda Tandavam or Blissful dance and Rudra Tandavam or a fierce dance.
    
    Shiva is a Universal phenomenon, a formless phenomenon, a Cosmic Form and the body of the cosmos itself. His dance has therefore got to be nothing but the dance of the cosmos itself. The Tandava Nrttya is thus a cosmic dance, a dance of the cosmos and based on the state of the cosmos is called Ananda Tandavam or Rudra Tandavam.Nandi, the Vahana of Shiva denotes the natural, physical body which needs to be tuned with the mind, and once this union is achieved, then our body acts as a support through which the bliss of realization can be experienced. Nandi then becomes the stage and Shiva is then said to dance between the horns of the Nandi.
    
    Pradosha is as occasion to contemplate on this Cosmic Dance of Shiva, which has a Universal Significance.