डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की 23वीं मौलिक कृति 'गांडीव के पार' (खंडकाव्य) प्रकाशित, विद्वतजनों में हर्ष
संजीव सिंह बलिया!लब्धप्रतिष्ठ दार्शनिक व आध्यात्मिक साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की 23वीं कृति 'गांडीव के पार' (खंडकाव्य) इन्कसाइट पब्लिकेशन, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से प्रकाशित हो गई है।महाभारत के महासमर के बाद उपजे गहन मौन की अनकही व्याख्या करने वाला यह खंडकाव्य अर्जुन को केंद्र में रखकर रचा गया है। यह उस एक रात्रि का जीवंत वृत्तांत है, जब हिमालय की ओर प्रस्थान से पूर्व वयोवृद्ध अर्जुन अपने पौत्र परीक्षित के जिज्ञासु प्रश्नों का उत्तर देते हैं। मात्र काव्य नहीं, यह कृष्ण के उपदेशों की अर्जुन द्वारा अनुभूतिजन्य व्याख्या है, जो सत्ता, धर्म और आत्म-साक्षात्कार के सूक्ष्म अंतर स्पष्ट करती है।कृति महाभारत के उपेक्षित पात्र कणिक की कुटिल नीतियों के माध्यम से आधुनिक राजनीति के लोकलुभावन छल पर प्रहार करती है। लेखक कुशलता से प्रतिपादित करते हैं कि प्रजा को अन्न-कर्मकांडों में उलझाकर सत्ता सुरक्षित रखना आज भी प्रासंगिक है। साथ ही, यह कड़वा सच उजागर करता है कि अधर्म जितना विनाशकारी नहीं, उतना धर्म के पक्ष में विलंब और योग्यजनों का मौन घातक है। गांडीव को मात्र धनुष नहीं, बल्कि मानवीय अहंकार का प्रतीक बताया गया है—जिसके विसर्जन से ही परमात्मा के 'पार' पहुंचा जा सकता है।साहित्यिक शिल्प में अनूठा: लगभग 350 वर्षों के अंतराल के बाद सर्वतोभद्र, गतप्रत्यागत, अनुलोम-विलोम जैसे दुरूह शास्त्रीय छंदों का निर्दोष प्रयोग। त्रि-खंडीय संरचना और चम्पू शैली में अनुष्टुप, शार्दूलविक्रीड़ित, हरिगीतिका, घनाक्षरी, सवैया सहित 18+ छंदों का अद्भुत समन्वय। गद्य-पद्य का संगम युद्ध के कोलाहल और दार्शनिक गांभीर्य को मधुर संगीत देता है।विद्वत समाज ने इसे सनातन चिंतन और आधुनिक बोध का सशक्त सेतु मानकर हर्ष व्यक्त किया है। बधाई हो, डॉ. उपाध्याय जी!
27 min ago
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