मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
मोहनलालगंज दोहरा हत्याकांड: मुठभेड़ में गिरफ्तार हुआ हत्यारोपी किशन रावत, पैर में गोली लगने से दबोचा
लखनऊ। राजधानी के मोहनलालगंज क्षेत्र में मां-बेटे की सनसनीखेज हत्या करने वाले आरोपी को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया। सिसेंडी गांव निवासी आरोपी किशन रावत को पुलिस ने बुधवार रात बाजखेड़ा–हुलासखेड़ा ईंट भट्ठे के पास से घेराबंदी कर दबोचा। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी के पैर में गोली लग गई, जिसके बाद उसे घायल अवस्था में हिरासत में लेकर अस्पताल भेजा गया। आरोपी के कब्जे से 315 बोर का अवैध तमंचा, दो कारतूस और एक कारतूस तमंचे में फंसा हुआ बरामद हुआ है।

सोमवार की रात मां-बेटे की कर दी गई थी हत्या

पुलिस के मुताबिक, सोमवार रात मोहनलालगंज थाना क्षेत्र के सिसेंडी गांव में 50 वर्षीय रेशमा बानो और उनके 18 वर्षीय दृष्टिहीन बेटे शादाब की गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बदमाश की तलाश में चार पुलिस टीमों का गठन किया गया।डीसीपी दक्षिणी निपुण अग्रवाल ने बताया कि जांच और साक्ष्य जुटाने के दौरान स्थानीय निवासी किशन रावत का नाम सामने आया। इसके बाद इंस्पेक्टर मोहनलालगंज ब्रजेश कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में पुलिस टीम आरोपी की तलाश में जुट गई।

आरोपी लखनऊ से बाहर भागने की फिराक में था

बुधवार को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपी हुलासखेड़ा से खुजौली की ओर नहर किनारे रास्ते से भागने की फिराक में है। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और घेराबंदी कर आरोपी को पकड़ने का प्रयास किया। इस दौरान बदमाश ने पुलिस टीम पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी, जिससे एक सिपाही घायल हो गया। पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की, जिसमें आरोपी किशन रावत के पैर में गोली लग गई और वह घायल होकर गिर पड़ा।पुलिस ने आरोपी को मौके से गिरफ्तार कर लिया और घायल सिपाही व आरोपी को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोहनलालगंज भेजा गया। पुलिस के अनुसार आरोपी के पास से घटना में प्रयुक्त अवैध तमंचा और कारतूस बरामद किए गए हैं।

सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी की हुई पहचान

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी सोमवार रात घर में घुस गया था और रेशमा बानो पर गलत नजर डालने लगा। इस दौरान महिला और उसके दृष्टिहीन बेटे शादाब ने विरोध किया। पहचान उजागर होने के डर से आरोपी ने दोनों की गला घोंटकर हत्या कर दी और मौके से फरार हो गया।घटना के बाद पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, जिसमें आरोपी का चेहरा कैद हो गया। इसी फुटेज के आधार पर पुलिस ने आरोपी की पहचान कर उसका पीछा किया और आखिरकार मुठभेड़ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया।इस मामले में पीड़िता के भाई की तहरीर पर थाना मोहनलालगंज में मुकदमा संख्या 92/26 धारा 103(1) बीएनएस के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस आरोपी के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई कर रही है।
प्रताप सिंह बने मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष, क्षेत्र में खुशी की लहर
मेरठ/बहसूमा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति पर जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से मवाना पश्चिम मंडल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। थाना क्षेत्र के गांव मीरपुर निवासी प्रताप सिंह पुत्र टिड्डा सिंह को मवाना पश्चिम का मंडल अध्यक्ष बनाया गया है।

प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने की खबर से क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। क्षेत्र के लोगों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें फोन कर बधाई दी और उज्ज्वल कार्यकाल की कामना की।

बताया गया कि सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम के आह्वान पर तथा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति एवं जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में हस्तिनापुर क्षेत्रीय अध्यक्ष पश्चिम सत्येंद्र सिसोदिया ने प्रताप सिंह को मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने से पार्टी को मजबूती मिलेगी और वह भाजपा की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने का काम करेंगे।

प्रताप सिंह के मनोनयन पर भारतीय गौ सेवा संघ के मेरठ जिला उपाध्यक्ष परविंदर उर्फ जैन साहब ने भी उन्हें बधाई दी। इसके अलावा डॉ. अनिल कुमार, जोगिंदर चौधरी, जोगिंदर, नीरज कुमार, मनोज कुमार, अजय कुमार सहित कई लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
गढ़वा: बंडा पहाड़ पर गूंजा 'हर-हर महादेव', नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन संपन्न

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गढ़वा :- गढ़वा के ग्राम जोबरईया के बंडा पहाड़ स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन भगवान शंकर के रुद्राभिषेक से प्रारंभ हुआ। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार संध्या काल में पावन श्री राम कथा में अयोध्या धाम से पधारे हुए परम पूज्य आचार्य पंकज शांडिल्य जी महाराज ने कथा के तृतीय दिवस में भगवान के पावन जन्म की कथा श्रवण कराया। कथा व्यास जी ने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार पापाचार बढ़ता है, दुष्ट आताताइयो का आतंक बढ़ता है प्रभु विभिन्न स्वरूपों में आकर के राक्षसों का विनाश कर धरती के भार को हल्का करते हैं। परमात्मा निराकार है लेकिन भक्त के भावना के अनुसार समय-समय पर सगुण साकार रूप रखकर इस धरती पर आते हैं। भगवान को धरती पर आने के कई कारण है मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है विप्र,धेनु,सुर,संत हित लीन्ह मनुज अवतार l कार्यक्रम में संगीतमय प्रस्तुतिकरण हेतु साथ दे रहे संगीतकारों ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं का मन मोह लिया। कथा के अंत में वृंदावन से पधारे हुए कलाकारों के

द्वारा सुंदर झांकियां की प्रस्तुति हुई। जिसमें राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के साथ बाल शाखाओं की टोली की प्रस्तुतीकरण ने उपस्थित दर्शकों का मनमोहन लिया। महायज्ञ के यज्ञाधीश आचार्य श्री श्री आशीष वैद्य जी महाराज जी ने कथा व्यास के प्रस्तुतीकरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि व्यास जी एक उद्भट्ट विद्वान है। कथा करने की इनकी गायन शैली काफी रोचक और झांकियां काफी मनोरम है। प्रधान संयोजक श्री राकेश पाल जी ने कहा कि यह महायज्ञ इस धरा धाम को पवित्र करने वाली है इस क्षेत्र के लिए परम सौभाग्य की बात है कि यहां नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का आयोजन हो रहा है।

श्री रुद्र महायज्ञ के अध्यक्ष श्री जितेंद्र कुमार पाल ने अपने सभी सदस्यों को काफी सजग होकर भक्तों के सभी आवश्यक सुविधाओं के प्रति सचेत रहने का सुझाव दिया।

वहीं संपूर्ण कथा के दौरान आज के अतिथि के रूप में गढ़वा प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री नरेंद्र नारायण जी गढ़वा से प्रमुख समाजसेवी पिंटू केसरी जी, विजय केसरीजी कथा मंडपम में विशेष रूप से उपस्थित थे।।

बौद्धिक संपदा के लिए  छात्रों में जागरुकता उत्पन्न करें विश्वविद्यालय-न्यायमूर्ति सुधीर नारायण
मुफ्त विश्वविद्यालय में आईपीआर पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

संजय द्विवेदी प्रयागराज।उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज में बुधवार को आयोजित बौद्धिक संपदा अधिकार पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं जागरूकता कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति सुधीर नारायण ने कहा कि बौद्धिक संपदा को वैश्विक स्तर पर सुरक्षित करने के लिए बड़े कानूनी बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि भारत में बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में जो भी नियम लागू हैं वह वैश्विक स्तर पर मान्य नही है।न्यायमूर्ति नारायण ने बौद्धिक संपदा अधिकार को विधिक परिपेक्ष्य में समझाते हुए बताया कि आईपीआर को लेकर भारत में अभी किसी अधिनियम का निर्माण नहीं किया गया।जिस प्रकार कॉपीराइट एक्ट की व्यवस्था है वैसी कोई व्यवस्था आईपीआर को लेकर नही है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को बौद्धिक संपदा अधिकार के सम्बन्ध में बड़े कदम उठाने चाहिए जिससे कि छात्रों के बीच जागरूकता उत्पन्न की जा सके।मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की विधि विद्या शाखा की प्रो.मानसी शर्मा ने कहा कि बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में व्यापक पैमाने पर जागरूकता की आवश्यकता है।मनुष्यो द्वारा प्रतिपादित कोई भी मौलिक रचना सृजन उसकी बौद्धिक सम्पदा के अन्तर्गत आती है।इस संपदा को विधिक संरक्षण के द्वारा ही सुरक्षित करना आईपीआर का मुख्य उद्देश्य है।प्रो.शर्मा ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी अपनी बौद्धिक सम्पदा को संरक्षित करे और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करे।हमें अपने परंपरागत एवं अर्जित ज्ञान रचना निर्माण आदि को डिजिटल माध्यम में सुरक्षित करना चाहिए।अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि बौद्धिक सम्पदा कभी अर्थपरक नहीं थी वरन् वह भारत में जनकल्याण के लिए हमेशा प्रयोग में लाई जाती रही।हमारे ऋषि मुनियों के पास बौद्धिक संपदा थी ज्ञान था लेकिन उसका सम्बंध व्यवसाय से नहीं था। पश्चिमी सभ्यता में व्यवसाय महत्वपूर्ण हुआ। वह विद्या से जुड़ा बौद्धिकता से जुड़ा और उसका विस्तार हो गया।प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि नवीन तकनीक और उनके उपभोग एवं प्रयोग के सम्बन्ध में आईपीआर को और सशक्त एवं व्यापक बनाया जाए। इसके साथ ही कृतिम बुद्धिमत्ता के दौर में बौद्धिक संपदा को सुरक्षित करने के लिए निहित कानून एवं नियमों का पालन करते हुए हमें उनको संदर्भित अवश्य करना चाहिए।उद्घाटन सत्र में अतिथियों का वाचिक स्वागत प्रो.सत्यपाल तिवारी तथा विषय प्रवर्तन प्रो.जे पी यादव ने किया। कार्यशाला का संचालन डॉ गौरव संकल्प एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ सतीश चन्द्र जैसल ने किया। कार्यशाला के अन्तय तकनीकी सत्रों में प्रतिभागियो ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
चैत्र नवरात्रि को लेकर समय से पूर्ण करें सभी तैयारीः मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलरामपुर मंडल की समीक्षा बैठक कर दिए आवश्यक निर्देश* 

*बोले- देवीपाटन शक्तिपीठ में उमड़ते हैं श्रद्धालु, सुरक्षा-सुविधा, स्वच्छता पर रहे विशेष जोर* 

*सभी अधिकारी प्रतिदिन करें जनसुनवाई, आमजन की समस्याओं एवं शिकायतों का समयसीमा के अंदर हो उचित निस्तारणः मा० मुख्यमंत्री जी*

*सुनिश्चित हो-छांगुर जैसा कोई व्यक्ति दोबारा न पनपे, ग्राम चौकीदारों को किया जाए सक्रिय, सभी जानकारी की जाए साझाः मा० सीएम*



बलरामपुर ।मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश शासन योगी आदित्यनाथ जी ने बुधवार को जनपद में समीक्षा बैठक की। मा० मुख्यमंत्री जी ने विकास कार्यों, कानून व्यवस्था एवं चैत्र नवरात्रि मेला की तैयारियों को लेकर आवश्यक निर्देश भी दिए। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ होने जा रही है। चैत्र नवरात्रि मेले में देवीपाटन मंदिर शक्तिपीठ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आमगन होता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुगम दर्शन, पेयजल, स्वच्छता, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिए कि नवरात्र पर मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों के आसपास विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाए तथा आवश्यकतानुसार अतिरिक्त स्वच्छताकर्मी तैनात किए जाएं। मा० मुख्यमंत्री जी ने जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से तैयारियों की जानकारी भी प्राप्त की।

*मा० मुख्यमत्री जी का सख्त निर्देश- छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कानून व्यवस्था की समीक्षा के दौरान कहा कि हर थाना क्षेत्र में संस्थाओं के आसपास एंटी रोमियो स्क्वॉड तैनात रहे। शोहदों, चेन स्नेचरों आदि के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। ऐसे लोगों की फोटो सार्वजनिक स्थलों और सोशल मीडिया पर लगाई जाए। बॉर्डर एरिया पर पुलिस एवं बीएसएफ की संयुक्त निगरानी हो। नवधनाढ्यों की संपत्ति की जांच कराई जाए। मा० मुख्यमत्री जी ने प्रशासन व पुलिस को सख्त निर्देश दिया कि छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे। ग्राम चौकीदारों को सक्रिय किया जाए, सभी जानकारी साझा की जाए। जिला मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक नियमित हो। सभी अपराधियों को कानून के तहत सजा दिलाई जाए, जिससे उनमें कानून का भय हो।

*अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जाए सरकार की योजनाएं*
मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मां पाटेश्वरी राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण में तेजी लाकर इसे मई तक पूर्ण किया जाए। यूनिवर्सिटी को रिसर्च सेंटर के तौर पर भी विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में थारू जनजाति एवं अन्य परिवार को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से संतृप्त किया जाए। थारू जनजाति क्षेत्र में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं को पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत प्रशिक्षण कराया जाए। राजस्व वादों, पैमाइश एवं विरासत के निस्तारण में तेजी लाई जाए।

*प्राथमिकता से हो व्यापारियों की समस्याओं का निस्तारण*
मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मेडिकल कॉलेज में सभी औपचारिकता पूर्ण करते हुए नए सत्र में  पढ़ाई के लिए आवेदन करें। शीघ्र मेडिकल की पढ़ाई शुरू कराई जाएगी। बाढ़ से बचाव के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी जाए।  नदियों,  पहाड़ी नालों के ड्रेनेज-चैनलाइज का कार्य समय से पूर्ण किया जाए। महिलाओं एवं बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही विशेष योजनाओं (मातृ वंदना योजना,  कन्या सुमंगला योजना, सामूहिक विवाह आदि) का लाभ हर पात्र को मिलना चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि जिला उद्योग बंधु एवं व्यापारी बंधुओं की नियमित बैठकें हों और उनकी समस्याओं का प्राथमिकता से निस्तारण किया जाए।

*प्रशासन का जनप्रतिनिधियों से हो बेहतर संवाद, प्रतिदिन सुनी जाए आमजन की समस्याएं*
मा० मुख्यमंत्री जी ने समीक्षा बैठक में कहा कि गोवंश संरक्षण स्थल को और सुदृढ़ किया जाए। सभी स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हों और गोवंश की नियमित गणना हो। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विधानसभा तुलसीपुर और गैसड़ी में सीएम कंपोजिट विद्यालय दिए जाएंगे। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधियों, आमजन, विभिन्न संस्थाओं से प्रशासन का बेहतर संवाद हो। सभी अधिकारी प्रतिदिन जनसुनवाई करें एवं आमजन की समस्या एवं शिकायत का समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित करें।

*स्कूल चलो अभियान की तैयारी में जुटें, बच्चों को मिल जाए ड्रेस, बैग, किताब*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ हो रहा है। सभी बच्चों को ड्रेस, बैग, किताबें, जूते-मोजे आदि उपलब्ध करा दिया जाए और स्कूल चलो अभियान की तैयारियां से समय से पूर्ण कर ली जाएं। आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर व्यवस्था हो।  शिक्षा एवं स्वास्थ्य में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर हो। मरीजों को जनपद में ही बेहतर इलाज मिले, उन्हें अन्य जनपदों में न जाना पड़े।

मुख्यमंत्री  ने सभी विभागों की समीक्षा कर जानी प्रगति*
मा० मुख्यमंत्री जी को जनपद में महिलाओं एवं बच्चों के पोषण सुधार के लिए प्रोजेक्ट संवर्धन, असंक्रमणीय भूमि को संक्रमणीय भूमिधर घोषित किए जाने के अभियान, अवैध अतिक्रमण, थारू जनजाति क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर विद्युतीकरण एवं संपर्क मार्ग बनाए जाने, आगामी सीजन हेतु सहकारी समितियां पर ऑनलाइन माध्यम से उर्वरक वितरण, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के उन्नयन,  जारवा ईको टूरिज्म के विकास आदि के बारे में अवगत कराया गया। मा ०मुख्यमंत्री जी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान, सीएम युवा स्वरोजगार योजना, नए औद्योगिक क्षेत्र के विकास, जल जीवन मिशन,  निर्माणाधीन परियोजनाओं, रिंग रोड का निर्माण, 100 बेड के क्रिटिकल केयर यूनिट, नगर पालिका में एसटीपी का निर्माण, सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायत पेयजल पुनर्गठन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, सीमावर्ती क्षेत्र में थारू जनजाति एवं अन्य परिवारों को योजनाओं से संतृप्त किए जाने, एनआरएलएम, ऑपरेशन कायाकल्प, गो संरक्षण,  टीकाकरण,  ईयर टैगिंग, पौधरोपण, आईजीआरएस समेत समस्त बिंदुओं पर समीक्षा की गई।

बैठक में मा० विधायक बलरामपुर पल्टूराम, मा० विधायक तुलसीपुर श्री कैलाश नाथ शुक्ल, मा० विधायक उतरौला श्री राम प्रताप वर्मा, मा० जिला पंचायत अध्यक्ष सुश्री आरती तिवारी, मा० विधान परिषद सदस्य श्री साकेत मिश्र, श्री अवधेश कुमार सिंह, मा० चेयरमैन नगर पालिका बलरामपुर श्री धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धीरू’, जिलाध्यक्ष श्री रवि मिश्रा, अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष, कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह, आयुक्त श्री शशि भूषण लाल सुशील, एडीजी श्री अशोक मुथा जैन, जिलाधिकारी श्री विपिन कुमार जैन, मुख्य विकास अधिकारी श्री हिमांशु गुप्ता, पुलिस अधीक्षक श्री विकास कुमार व अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
केवल पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और आदर्श भी बने शिक्षक:BSA मनीष कुमार सिंह
संजीव कुमार सिंह बलिया!राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण के प्रथम बैच का उद्घाटन करते हुए प्राचार्य /उप शिक्षा निदेशक मनीष कुमार सिंह द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारंभ किया गया। इस प्रशिक्षण में शिक्षा क्षेत्र बेलहरी,बैरिया, मनियर, पंदह,मुरली छपरा,,रेवती,बेरुअरबारी और नगरा के 12-12 शिक्षकों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है जो आज दिनांक 11 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 13 मार्च 2026 तक आयोजित होना है। सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण के प्रभारी डायट प्रवक्ता डॉक्टर मृत्युंजय सिंह एवं इस प्रशिक्षण के नोडल रवि रंजन खरे द्वारा पंजीकरण के उपरांत शिक्षकों को पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। प्रवक्ता जानू राम द्वारा अपने उद्बोधन में बताया गया कि शिक्षा केवल ज्ञान या सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मानव निर्माण की एक सतत श्रृंखला है। यदि शिक्षा में मूल्य का समावेश नहीं होता तो यह केवल कौशल और तकनीकी दक्षता तक ही सीमित रह जाती, ऐसे में समाज की भौतिक प्रगति तो होती किंतु नैतिक पतन और संवेदनहीनता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है ।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब वह विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ ही भावनात्मक एवं नैतिक विकास में भी योगदान करें। प्रशिक्षण के नोडल रविरंजन खरे द्वारा आह्वान किया गया कि आज का समय वैज्ञानिक प्रगति, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण की है ।विद्यार्थियों के सामने और असंख्य अवसर तो आते हैं परंतु जीवन में तनाव ,नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं ।ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि जीवन को सार्थक और संतुलित बनाना भी होना चाहिए ।मूल्य आधारित इस प्रशिक्षण में हम सभी मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नैतिक शक्ति को प्राप्त कर सकेंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। डायट प्रवक्ता किरण सिंह द्वारा शिक्षकों के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक होने की बात बताई गई जिसमें शिक्षण में मूल्य का समावेश करने ,उनका दृष्टिकोण और अधिक समानुभूतिपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने की दिशा में समय-समय पर मूल्य आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया। डायट प्रवक्ता अविनाश सिंह द्वारा कंप्यूटर का शिक्षा में प्रयोग तथा उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की गई और बताया गया की शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनाती है ।यह एक ऐसे प्रकाश पुंज के समान है जो मनुष्य के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण करते हुए एक जिम्मेदार नैतिक एवं मूल्य आधारित नागरिक बनाती है जिससे देश और समाज की उन्नति एवं विकास में अपना अहम योगदान दिया जा सके। इस प्रशिक्षण में प्रतिभाग़ कर रहे बेलहरी शिक्षा क्षेत्र के अध्यापक, पूर्व एकेडमिक पर्सन डॉक्टर शशि भूषण मिश्र द्वारा बताया गया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय ,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है जिन्हें अपनाकर शिक्षक अपने आप में सशक्त बन सकता है तथा कक्षाओं में आत्मसात कराकर समाज की नई रूप रेखा का निर्माण कर सकता है जिस पर आगे चलकर सहिष्णुतापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक वातावरण का सृजन किया जा सकता है। डायट प्रवक्ता डॉ जितेंद्र गुप्ता द्वारा बताया गया कि शिक्षक भविष्य निर्माता है तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों में रोपित मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बनकर हमारे समाज को मानवीय गरिमा एवं न्याय की शीतल छाव प्रदान करेगा। तकनीकी सहयोग अमित कुमार चौहान तथा चंदन मिश्रा द्वारा प्रदान किया गया।
विश्व महिला दिवस पर मुफ्त चिकित्सा शिविर का आयोजन
मुंबई। रोटरी क्लब ऑफ बॉम्बे फिल्मसिटी क्रमांक 3141 की ओर से विश्व महिला दिवस के दिन  सांताक्रूज (पूर्व ) के गाँवदेवी मैदान, गांव देवी वाकोला पाईप लाइन के प्रागंण में मुफ़्त चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। आयोजन में जनरल चेकअप और जनरल दवाइयों के साथ फ्री डेंटल चेकअप, फ्री रैंडम शुगर , फ्री बीपी, फ्री सीबीसी (रिपोर्ट नेक्स्ट डे ) कराई गईं। साथ ही पहले 100 मरीज के लिए नेत्र जांच के साथ जरूरतमंदों को मात्र ₹50 में चश्मा उपलब्ध कराया गया। आने वाले पहले 80 मरीजों को इसके साथ ही फ्री बीएमडी (बोन मिनिरल डेंसिटी) हड्डियों के परीक्षण की व्यवस्था भी रखी गई थी। इस चिकित्सा शिविर में
प्रमुख चिकित्सक थे डॉ.सत्यजीत पटनायक ( किडनी विशेषज्ञ एवं सर्जन), डॉ. आशिष कॅस्टलिनो (इ.एन.टी. सर्जन), डॉ.स्वपना डेनिज़ (डेंटल सर्जन ), डॉ. सय्यद मुहम्मद् जिशान (चर्म रोग विशेषज्ञ), डॉ. निखिल बालाकृष्णन (नेत्र विशेषज्ञ), डॉ. पवित्रा बालाकृष्णन(नेत्र विशेषज्ञ), डॉ नयना बालाकृष्णन (स्त्री रोग विशेषज्ञ) और डॉ. अजय पांडेय (जनरल फिजीशियन)।
शिविर में करीब 350 मरीजों ने अपना स्वास्थ्य परीक्षण करवाया। आयोजन को सफल बनाने में रोटरी क्लब ऑफ़ बॉम्बे बांद्रा के अध्यक्ष रिटा. एड. त्रिवनकुमार करनानी के साथ रोटरी क्लब ऑफ़ बॉम्बे फ़िल्म सिटी के सदस्य भुवन कुमार, रमेश व्यास, रवि सावल और ऋतु बुगारा का विशेष योगदान रहा।
राष्ट्रीय सेवा योजना शिविर का तीसरा दिन : योग, ध्यान एवं जागरूकता रैली का आयोजन*
सुलतानपुर। गनपत सहाय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सुलतानपुर की राष्ट्रीय सेवा योजना की सभी इकाइयों के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे सप्त दिवसीय विशेष शिविर के तीसरे दिन विविध शैक्षिक एवं जनजागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्पार्चन कर आशीर्वाद लिया गया इसके पाश्चात्य प्रातःकाल कार्यक्रम की शुरुआत शारीरिक शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. रवींद्र शुक्ला तथा डॉ. विक्रमादित्य यादव द्वारा कराए गए योगाभ्यास से हुई। उन्होंने स्वयंसेवकों एवं स्वयंसेविकाओं को विभिन्न योगासन एवं प्राणायाम का अभ्यास कराते हुए बताया कि नियमित योग और व्यायाम स्वस्थ जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इसके पश्चात प्रातः 9 बजे “योग एवं ध्यान के माध्यम से जीवन का सर्वांगीण विकास” विषय पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इस अवसर पर श्री राम कृष्ण मिशन के प्रशिक्षक अंजनी कुमार दुबे, योग प्रशिक्षक श्नीलम सिंह तथा मनीष कुमार गुप्ता ने हार्टफुलनेस ध्यान की उपयोगिता एवं महत्व विषय पर व्याख्यान दिया तथा स्वयंसेवकों को ध्यानाभ्यास भी कराया। उन्होंने बताया कि ध्यान के माध्यम से मानसिक शांति, सकारात्मक सोच तथा व्यक्तित्व का समग्र विकास संभव है। इसके बाद राष्ट्रीय सेवा योजना की कार्यक्रमाधिकारी डॉ. दीपा सिंह के नेतृत्व में स्वयंसेवकों एवं स्वयंसेविकाओं ने चयनित ग्राम दिखौली का भ्रमण किया तथा “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” एवं “स्वच्छता अभियान” विषय पर जागरूकता रैली निकाली। रैली के माध्यम से स्वयंसेवकों ने ग्रामीणों को बालिका शिक्षा,महिला सम्मान तथा स्वच्छता के प्रति जागरूक किया। इस दौरान स्वयंसेवकों ने ग्राम सभा दिखौली के प्राथमिक विद्यालय का भी भ्रमण किया,जहाँ विद्यालय की प्रधानाध्यापिका श्रीमती रमा देवी मिश्रा एवं श्रीमती बीना देवी,श्रीमती अनीता वर्मा तथा श्रीमती साधना सिंह से भेंट हुई।सभी अध्यापिकाओं ने राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें समाज सेवा के कार्यों में निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।कार्यक्रम में उपस्थित राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रमाधिकारी डॉ.शाहनवाज आलम,डॉ.विष्णु शंकर अग्रहरि, डॉ.देवेन्द्र मिश्र तथा डॉ.भोलानाथ ने भी रैली के नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभाई।उन्होंने स्वयंसेवकों से शिविर की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करते हुए समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का आह्वान किया।इस अवसर पर छात्रों में ज्वाला गुप्ता,शुभी, भूमि सिंह,ख़ुशी शर्मा,निधि,रजिया, फिजा, सोनाली, निश्चल पाण्डेय,करण साहू,आदर्श पाण्डेय,देवेन्द्र,मनमोहन उपाध्याय, कृष्णा,मोहम्मद वारिस आदि का विशेष योगदान रहा।
परिषद विद्यालयों में 16 मार्च से होगी वार्षिक परीक्षा
*1.47 लाख बच्चे देंगे परीक्षा,31 को आएगा परिणाम*

रिपोर्टर - नितेश श्रीवास्तव


भदोही। जिले में परिषदीय विद्यालयों में 16 से 20 मार्च तक परीक्षा होगी। पहली से आठवीं तक के एक लाख 47 हजार बच्चे परीक्षा में शामिल होंगे। जबकि 31 मार्च को परिणाम आएगा। इसके बाद नया शिक्षण सत्र शुरू होगा। बता दें कि जिले में 885 प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और कंपोजिट विद्यालय है। इनमें करीब एक लाख 47 हजार छात्र-छात्राएं हैं। हाईस्कूल, इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा, सीबीएसई और संस्कृत बोर्ड की परीक्षाएं समाप्ति की ओर हैं। ऐसे में शिक्षा निदेशालय ने पहली से आठवीं तक की वार्षिक परीक्षा की समय सारिणी को जारी कर दिया। 16 से 20 मार्च तक परिषदीय विद्यालयों में परीक्षा कराई जाएगी।परीक्षा के लिए मॉडल प्रश्न पत्र जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा तैयार कराकर बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) को दिया जाएगा। बीएसए इसका मुद्रण कराकर विद्यालयों में वितरण कराएंगे। कक्षा एक की वार्षिक परीक्षा मौखिक होगी। कक्षा दो से पांच की परीक्षा लिखित और मौखिक दोनों माध्यम से होगी। दो एवं तीन में इसका अधिभार 50-50 फीसदी होगा। वहीं, कक्षा चार तथा पांच में क्रमश: 70 एवं 30 का होगा। लिखित परीक्षा 50 नंबर की होगी। लिखित परीक्षा दो घंटे की होगी जबकि मौखिक परीक्षा के लिए प्रधानाध्यापक आवश्यकतानुसार समय तय करेंगे।बेसिक शिक्षा निदेशक प्रताप सिंह बघेल का पत्र आते ही बेसिक शिक्षा विभाग ने तैयारी को शुरू कर दिया है। 25 मार्च को कॉपियों को जांचा जाएगा। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी शिवम पांडेय ने कहा कि परीक्षा की समय सारिणी मिली है। बताया कि इस बार परीक्षा में कई बदलाव किए गए हैं। वार्षिक परीक्षा और उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन होने के बाद परीक्षाफल जारी करने के दौरान विद्यार्थियों के अभिभावकों की बैठक होगी। इसमें मूल्यांकन की गई उत्तर पुस्तिकाएं दिखाई जाएंगी। इसके बाद ही परीक्षाफल जारी होगा।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
मोहनलालगंज दोहरा हत्याकांड: मुठभेड़ में गिरफ्तार हुआ हत्यारोपी किशन रावत, पैर में गोली लगने से दबोचा
लखनऊ। राजधानी के मोहनलालगंज क्षेत्र में मां-बेटे की सनसनीखेज हत्या करने वाले आरोपी को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया। सिसेंडी गांव निवासी आरोपी किशन रावत को पुलिस ने बुधवार रात बाजखेड़ा–हुलासखेड़ा ईंट भट्ठे के पास से घेराबंदी कर दबोचा। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी के पैर में गोली लग गई, जिसके बाद उसे घायल अवस्था में हिरासत में लेकर अस्पताल भेजा गया। आरोपी के कब्जे से 315 बोर का अवैध तमंचा, दो कारतूस और एक कारतूस तमंचे में फंसा हुआ बरामद हुआ है।

सोमवार की रात मां-बेटे की कर दी गई थी हत्या

पुलिस के मुताबिक, सोमवार रात मोहनलालगंज थाना क्षेत्र के सिसेंडी गांव में 50 वर्षीय रेशमा बानो और उनके 18 वर्षीय दृष्टिहीन बेटे शादाब की गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बदमाश की तलाश में चार पुलिस टीमों का गठन किया गया।डीसीपी दक्षिणी निपुण अग्रवाल ने बताया कि जांच और साक्ष्य जुटाने के दौरान स्थानीय निवासी किशन रावत का नाम सामने आया। इसके बाद इंस्पेक्टर मोहनलालगंज ब्रजेश कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में पुलिस टीम आरोपी की तलाश में जुट गई।

आरोपी लखनऊ से बाहर भागने की फिराक में था

बुधवार को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपी हुलासखेड़ा से खुजौली की ओर नहर किनारे रास्ते से भागने की फिराक में है। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और घेराबंदी कर आरोपी को पकड़ने का प्रयास किया। इस दौरान बदमाश ने पुलिस टीम पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी, जिससे एक सिपाही घायल हो गया। पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की, जिसमें आरोपी किशन रावत के पैर में गोली लग गई और वह घायल होकर गिर पड़ा।पुलिस ने आरोपी को मौके से गिरफ्तार कर लिया और घायल सिपाही व आरोपी को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोहनलालगंज भेजा गया। पुलिस के अनुसार आरोपी के पास से घटना में प्रयुक्त अवैध तमंचा और कारतूस बरामद किए गए हैं।

सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी की हुई पहचान

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी सोमवार रात घर में घुस गया था और रेशमा बानो पर गलत नजर डालने लगा। इस दौरान महिला और उसके दृष्टिहीन बेटे शादाब ने विरोध किया। पहचान उजागर होने के डर से आरोपी ने दोनों की गला घोंटकर हत्या कर दी और मौके से फरार हो गया।घटना के बाद पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, जिसमें आरोपी का चेहरा कैद हो गया। इसी फुटेज के आधार पर पुलिस ने आरोपी की पहचान कर उसका पीछा किया और आखिरकार मुठभेड़ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया।इस मामले में पीड़िता के भाई की तहरीर पर थाना मोहनलालगंज में मुकदमा संख्या 92/26 धारा 103(1) बीएनएस के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस आरोपी के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई कर रही है।
प्रताप सिंह बने मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष, क्षेत्र में खुशी की लहर
मेरठ/बहसूमा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति पर जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से मवाना पश्चिम मंडल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। थाना क्षेत्र के गांव मीरपुर निवासी प्रताप सिंह पुत्र टिड्डा सिंह को मवाना पश्चिम का मंडल अध्यक्ष बनाया गया है।

प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने की खबर से क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। क्षेत्र के लोगों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें फोन कर बधाई दी और उज्ज्वल कार्यकाल की कामना की।

बताया गया कि सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम के आह्वान पर तथा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की संस्तुति एवं जिलाध्यक्ष हरवीर सिंह के नेतृत्व में हस्तिनापुर क्षेत्रीय अध्यक्ष पश्चिम सत्येंद्र सिसोदिया ने प्रताप सिंह को मवाना पश्चिम मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि प्रताप सिंह के मंडल अध्यक्ष बनने से पार्टी को मजबूती मिलेगी और वह भाजपा की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने का काम करेंगे।

प्रताप सिंह के मनोनयन पर भारतीय गौ सेवा संघ के मेरठ जिला उपाध्यक्ष परविंदर उर्फ जैन साहब ने भी उन्हें बधाई दी। इसके अलावा डॉ. अनिल कुमार, जोगिंदर चौधरी, जोगिंदर, नीरज कुमार, मनोज कुमार, अजय कुमार सहित कई लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
गढ़वा: बंडा पहाड़ पर गूंजा 'हर-हर महादेव', नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन संपन्न

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गढ़वा :- गढ़वा के ग्राम जोबरईया के बंडा पहाड़ स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन भगवान शंकर के रुद्राभिषेक से प्रारंभ हुआ। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार संध्या काल में पावन श्री राम कथा में अयोध्या धाम से पधारे हुए परम पूज्य आचार्य पंकज शांडिल्य जी महाराज ने कथा के तृतीय दिवस में भगवान के पावन जन्म की कथा श्रवण कराया। कथा व्यास जी ने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार पापाचार बढ़ता है, दुष्ट आताताइयो का आतंक बढ़ता है प्रभु विभिन्न स्वरूपों में आकर के राक्षसों का विनाश कर धरती के भार को हल्का करते हैं। परमात्मा निराकार है लेकिन भक्त के भावना के अनुसार समय-समय पर सगुण साकार रूप रखकर इस धरती पर आते हैं। भगवान को धरती पर आने के कई कारण है मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है विप्र,धेनु,सुर,संत हित लीन्ह मनुज अवतार l कार्यक्रम में संगीतमय प्रस्तुतिकरण हेतु साथ दे रहे संगीतकारों ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं का मन मोह लिया। कथा के अंत में वृंदावन से पधारे हुए कलाकारों के

द्वारा सुंदर झांकियां की प्रस्तुति हुई। जिसमें राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के साथ बाल शाखाओं की टोली की प्रस्तुतीकरण ने उपस्थित दर्शकों का मनमोहन लिया। महायज्ञ के यज्ञाधीश आचार्य श्री श्री आशीष वैद्य जी महाराज जी ने कथा व्यास के प्रस्तुतीकरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि व्यास जी एक उद्भट्ट विद्वान है। कथा करने की इनकी गायन शैली काफी रोचक और झांकियां काफी मनोरम है। प्रधान संयोजक श्री राकेश पाल जी ने कहा कि यह महायज्ञ इस धरा धाम को पवित्र करने वाली है इस क्षेत्र के लिए परम सौभाग्य की बात है कि यहां नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का आयोजन हो रहा है।

श्री रुद्र महायज्ञ के अध्यक्ष श्री जितेंद्र कुमार पाल ने अपने सभी सदस्यों को काफी सजग होकर भक्तों के सभी आवश्यक सुविधाओं के प्रति सचेत रहने का सुझाव दिया।

वहीं संपूर्ण कथा के दौरान आज के अतिथि के रूप में गढ़वा प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री नरेंद्र नारायण जी गढ़वा से प्रमुख समाजसेवी पिंटू केसरी जी, विजय केसरीजी कथा मंडपम में विशेष रूप से उपस्थित थे।।

बौद्धिक संपदा के लिए  छात्रों में जागरुकता उत्पन्न करें विश्वविद्यालय-न्यायमूर्ति सुधीर नारायण
मुफ्त विश्वविद्यालय में आईपीआर पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

संजय द्विवेदी प्रयागराज।उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज में बुधवार को आयोजित बौद्धिक संपदा अधिकार पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं जागरूकता कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति सुधीर नारायण ने कहा कि बौद्धिक संपदा को वैश्विक स्तर पर सुरक्षित करने के लिए बड़े कानूनी बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि भारत में बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में जो भी नियम लागू हैं वह वैश्विक स्तर पर मान्य नही है।न्यायमूर्ति नारायण ने बौद्धिक संपदा अधिकार को विधिक परिपेक्ष्य में समझाते हुए बताया कि आईपीआर को लेकर भारत में अभी किसी अधिनियम का निर्माण नहीं किया गया।जिस प्रकार कॉपीराइट एक्ट की व्यवस्था है वैसी कोई व्यवस्था आईपीआर को लेकर नही है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को बौद्धिक संपदा अधिकार के सम्बन्ध में बड़े कदम उठाने चाहिए जिससे कि छात्रों के बीच जागरूकता उत्पन्न की जा सके।मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की विधि विद्या शाखा की प्रो.मानसी शर्मा ने कहा कि बौद्धिक संपदा के सम्बन्ध में व्यापक पैमाने पर जागरूकता की आवश्यकता है।मनुष्यो द्वारा प्रतिपादित कोई भी मौलिक रचना सृजन उसकी बौद्धिक सम्पदा के अन्तर्गत आती है।इस संपदा को विधिक संरक्षण के द्वारा ही सुरक्षित करना आईपीआर का मुख्य उद्देश्य है।प्रो.शर्मा ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी अपनी बौद्धिक सम्पदा को संरक्षित करे और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करे।हमें अपने परंपरागत एवं अर्जित ज्ञान रचना निर्माण आदि को डिजिटल माध्यम में सुरक्षित करना चाहिए।अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि बौद्धिक सम्पदा कभी अर्थपरक नहीं थी वरन् वह भारत में जनकल्याण के लिए हमेशा प्रयोग में लाई जाती रही।हमारे ऋषि मुनियों के पास बौद्धिक संपदा थी ज्ञान था लेकिन उसका सम्बंध व्यवसाय से नहीं था। पश्चिमी सभ्यता में व्यवसाय महत्वपूर्ण हुआ। वह विद्या से जुड़ा बौद्धिकता से जुड़ा और उसका विस्तार हो गया।प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि नवीन तकनीक और उनके उपभोग एवं प्रयोग के सम्बन्ध में आईपीआर को और सशक्त एवं व्यापक बनाया जाए। इसके साथ ही कृतिम बुद्धिमत्ता के दौर में बौद्धिक संपदा को सुरक्षित करने के लिए निहित कानून एवं नियमों का पालन करते हुए हमें उनको संदर्भित अवश्य करना चाहिए।उद्घाटन सत्र में अतिथियों का वाचिक स्वागत प्रो.सत्यपाल तिवारी तथा विषय प्रवर्तन प्रो.जे पी यादव ने किया। कार्यशाला का संचालन डॉ गौरव संकल्प एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ सतीश चन्द्र जैसल ने किया। कार्यशाला के अन्तय तकनीकी सत्रों में प्रतिभागियो ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
चैत्र नवरात्रि को लेकर समय से पूर्ण करें सभी तैयारीः मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलरामपुर मंडल की समीक्षा बैठक कर दिए आवश्यक निर्देश* 

*बोले- देवीपाटन शक्तिपीठ में उमड़ते हैं श्रद्धालु, सुरक्षा-सुविधा, स्वच्छता पर रहे विशेष जोर* 

*सभी अधिकारी प्रतिदिन करें जनसुनवाई, आमजन की समस्याओं एवं शिकायतों का समयसीमा के अंदर हो उचित निस्तारणः मा० मुख्यमंत्री जी*

*सुनिश्चित हो-छांगुर जैसा कोई व्यक्ति दोबारा न पनपे, ग्राम चौकीदारों को किया जाए सक्रिय, सभी जानकारी की जाए साझाः मा० सीएम*



बलरामपुर ।मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश शासन योगी आदित्यनाथ जी ने बुधवार को जनपद में समीक्षा बैठक की। मा० मुख्यमंत्री जी ने विकास कार्यों, कानून व्यवस्था एवं चैत्र नवरात्रि मेला की तैयारियों को लेकर आवश्यक निर्देश भी दिए। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ होने जा रही है। चैत्र नवरात्रि मेले में देवीपाटन मंदिर शक्तिपीठ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आमगन होता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुगम दर्शन, पेयजल, स्वच्छता, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिए कि नवरात्र पर मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों के आसपास विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाए तथा आवश्यकतानुसार अतिरिक्त स्वच्छताकर्मी तैनात किए जाएं। मा० मुख्यमंत्री जी ने जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से तैयारियों की जानकारी भी प्राप्त की।

*मा० मुख्यमत्री जी का सख्त निर्देश- छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कानून व्यवस्था की समीक्षा के दौरान कहा कि हर थाना क्षेत्र में संस्थाओं के आसपास एंटी रोमियो स्क्वॉड तैनात रहे। शोहदों, चेन स्नेचरों आदि के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। ऐसे लोगों की फोटो सार्वजनिक स्थलों और सोशल मीडिया पर लगाई जाए। बॉर्डर एरिया पर पुलिस एवं बीएसएफ की संयुक्त निगरानी हो। नवधनाढ्यों की संपत्ति की जांच कराई जाए। मा० मुख्यमत्री जी ने प्रशासन व पुलिस को सख्त निर्देश दिया कि छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे। ग्राम चौकीदारों को सक्रिय किया जाए, सभी जानकारी साझा की जाए। जिला मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक नियमित हो। सभी अपराधियों को कानून के तहत सजा दिलाई जाए, जिससे उनमें कानून का भय हो।

*अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जाए सरकार की योजनाएं*
मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मां पाटेश्वरी राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण में तेजी लाकर इसे मई तक पूर्ण किया जाए। यूनिवर्सिटी को रिसर्च सेंटर के तौर पर भी विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में थारू जनजाति एवं अन्य परिवार को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से संतृप्त किया जाए। थारू जनजाति क्षेत्र में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं को पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत प्रशिक्षण कराया जाए। राजस्व वादों, पैमाइश एवं विरासत के निस्तारण में तेजी लाई जाए।

*प्राथमिकता से हो व्यापारियों की समस्याओं का निस्तारण*
मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मेडिकल कॉलेज में सभी औपचारिकता पूर्ण करते हुए नए सत्र में  पढ़ाई के लिए आवेदन करें। शीघ्र मेडिकल की पढ़ाई शुरू कराई जाएगी। बाढ़ से बचाव के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी जाए।  नदियों,  पहाड़ी नालों के ड्रेनेज-चैनलाइज का कार्य समय से पूर्ण किया जाए। महिलाओं एवं बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही विशेष योजनाओं (मातृ वंदना योजना,  कन्या सुमंगला योजना, सामूहिक विवाह आदि) का लाभ हर पात्र को मिलना चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि जिला उद्योग बंधु एवं व्यापारी बंधुओं की नियमित बैठकें हों और उनकी समस्याओं का प्राथमिकता से निस्तारण किया जाए।

*प्रशासन का जनप्रतिनिधियों से हो बेहतर संवाद, प्रतिदिन सुनी जाए आमजन की समस्याएं*
मा० मुख्यमंत्री जी ने समीक्षा बैठक में कहा कि गोवंश संरक्षण स्थल को और सुदृढ़ किया जाए। सभी स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हों और गोवंश की नियमित गणना हो। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विधानसभा तुलसीपुर और गैसड़ी में सीएम कंपोजिट विद्यालय दिए जाएंगे। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधियों, आमजन, विभिन्न संस्थाओं से प्रशासन का बेहतर संवाद हो। सभी अधिकारी प्रतिदिन जनसुनवाई करें एवं आमजन की समस्या एवं शिकायत का समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित करें।

*स्कूल चलो अभियान की तैयारी में जुटें, बच्चों को मिल जाए ड्रेस, बैग, किताब*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ हो रहा है। सभी बच्चों को ड्रेस, बैग, किताबें, जूते-मोजे आदि उपलब्ध करा दिया जाए और स्कूल चलो अभियान की तैयारियां से समय से पूर्ण कर ली जाएं। आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर व्यवस्था हो।  शिक्षा एवं स्वास्थ्य में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर हो। मरीजों को जनपद में ही बेहतर इलाज मिले, उन्हें अन्य जनपदों में न जाना पड़े।

मुख्यमंत्री  ने सभी विभागों की समीक्षा कर जानी प्रगति*
मा० मुख्यमंत्री जी को जनपद में महिलाओं एवं बच्चों के पोषण सुधार के लिए प्रोजेक्ट संवर्धन, असंक्रमणीय भूमि को संक्रमणीय भूमिधर घोषित किए जाने के अभियान, अवैध अतिक्रमण, थारू जनजाति क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर विद्युतीकरण एवं संपर्क मार्ग बनाए जाने, आगामी सीजन हेतु सहकारी समितियां पर ऑनलाइन माध्यम से उर्वरक वितरण, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के उन्नयन,  जारवा ईको टूरिज्म के विकास आदि के बारे में अवगत कराया गया। मा ०मुख्यमंत्री जी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान, सीएम युवा स्वरोजगार योजना, नए औद्योगिक क्षेत्र के विकास, जल जीवन मिशन,  निर्माणाधीन परियोजनाओं, रिंग रोड का निर्माण, 100 बेड के क्रिटिकल केयर यूनिट, नगर पालिका में एसटीपी का निर्माण, सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायत पेयजल पुनर्गठन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, सीमावर्ती क्षेत्र में थारू जनजाति एवं अन्य परिवारों को योजनाओं से संतृप्त किए जाने, एनआरएलएम, ऑपरेशन कायाकल्प, गो संरक्षण,  टीकाकरण,  ईयर टैगिंग, पौधरोपण, आईजीआरएस समेत समस्त बिंदुओं पर समीक्षा की गई।

बैठक में मा० विधायक बलरामपुर पल्टूराम, मा० विधायक तुलसीपुर श्री कैलाश नाथ शुक्ल, मा० विधायक उतरौला श्री राम प्रताप वर्मा, मा० जिला पंचायत अध्यक्ष सुश्री आरती तिवारी, मा० विधान परिषद सदस्य श्री साकेत मिश्र, श्री अवधेश कुमार सिंह, मा० चेयरमैन नगर पालिका बलरामपुर श्री धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धीरू’, जिलाध्यक्ष श्री रवि मिश्रा, अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष, कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह, आयुक्त श्री शशि भूषण लाल सुशील, एडीजी श्री अशोक मुथा जैन, जिलाधिकारी श्री विपिन कुमार जैन, मुख्य विकास अधिकारी श्री हिमांशु गुप्ता, पुलिस अधीक्षक श्री विकास कुमार व अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
केवल पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और आदर्श भी बने शिक्षक:BSA मनीष कुमार सिंह
संजीव कुमार सिंह बलिया!राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण के प्रथम बैच का उद्घाटन करते हुए प्राचार्य /उप शिक्षा निदेशक मनीष कुमार सिंह द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारंभ किया गया। इस प्रशिक्षण में शिक्षा क्षेत्र बेलहरी,बैरिया, मनियर, पंदह,मुरली छपरा,,रेवती,बेरुअरबारी और नगरा के 12-12 शिक्षकों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है जो आज दिनांक 11 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 13 मार्च 2026 तक आयोजित होना है। सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण के प्रभारी डायट प्रवक्ता डॉक्टर मृत्युंजय सिंह एवं इस प्रशिक्षण के नोडल रवि रंजन खरे द्वारा पंजीकरण के उपरांत शिक्षकों को पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। प्रवक्ता जानू राम द्वारा अपने उद्बोधन में बताया गया कि शिक्षा केवल ज्ञान या सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मानव निर्माण की एक सतत श्रृंखला है। यदि शिक्षा में मूल्य का समावेश नहीं होता तो यह केवल कौशल और तकनीकी दक्षता तक ही सीमित रह जाती, ऐसे में समाज की भौतिक प्रगति तो होती किंतु नैतिक पतन और संवेदनहीनता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है ।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब वह विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ ही भावनात्मक एवं नैतिक विकास में भी योगदान करें। प्रशिक्षण के नोडल रविरंजन खरे द्वारा आह्वान किया गया कि आज का समय वैज्ञानिक प्रगति, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण की है ।विद्यार्थियों के सामने और असंख्य अवसर तो आते हैं परंतु जीवन में तनाव ,नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं ।ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि जीवन को सार्थक और संतुलित बनाना भी होना चाहिए ।मूल्य आधारित इस प्रशिक्षण में हम सभी मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नैतिक शक्ति को प्राप्त कर सकेंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। डायट प्रवक्ता किरण सिंह द्वारा शिक्षकों के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक होने की बात बताई गई जिसमें शिक्षण में मूल्य का समावेश करने ,उनका दृष्टिकोण और अधिक समानुभूतिपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने की दिशा में समय-समय पर मूल्य आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया। डायट प्रवक्ता अविनाश सिंह द्वारा कंप्यूटर का शिक्षा में प्रयोग तथा उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की गई और बताया गया की शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनाती है ।यह एक ऐसे प्रकाश पुंज के समान है जो मनुष्य के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण करते हुए एक जिम्मेदार नैतिक एवं मूल्य आधारित नागरिक बनाती है जिससे देश और समाज की उन्नति एवं विकास में अपना अहम योगदान दिया जा सके। इस प्रशिक्षण में प्रतिभाग़ कर रहे बेलहरी शिक्षा क्षेत्र के अध्यापक, पूर्व एकेडमिक पर्सन डॉक्टर शशि भूषण मिश्र द्वारा बताया गया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय ,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है जिन्हें अपनाकर शिक्षक अपने आप में सशक्त बन सकता है तथा कक्षाओं में आत्मसात कराकर समाज की नई रूप रेखा का निर्माण कर सकता है जिस पर आगे चलकर सहिष्णुतापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक वातावरण का सृजन किया जा सकता है। डायट प्रवक्ता डॉ जितेंद्र गुप्ता द्वारा बताया गया कि शिक्षक भविष्य निर्माता है तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों में रोपित मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बनकर हमारे समाज को मानवीय गरिमा एवं न्याय की शीतल छाव प्रदान करेगा। तकनीकी सहयोग अमित कुमार चौहान तथा चंदन मिश्रा द्वारा प्रदान किया गया।
विश्व महिला दिवस पर मुफ्त चिकित्सा शिविर का आयोजन
मुंबई। रोटरी क्लब ऑफ बॉम्बे फिल्मसिटी क्रमांक 3141 की ओर से विश्व महिला दिवस के दिन  सांताक्रूज (पूर्व ) के गाँवदेवी मैदान, गांव देवी वाकोला पाईप लाइन के प्रागंण में मुफ़्त चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। आयोजन में जनरल चेकअप और जनरल दवाइयों के साथ फ्री डेंटल चेकअप, फ्री रैंडम शुगर , फ्री बीपी, फ्री सीबीसी (रिपोर्ट नेक्स्ट डे ) कराई गईं। साथ ही पहले 100 मरीज के लिए नेत्र जांच के साथ जरूरतमंदों को मात्र ₹50 में चश्मा उपलब्ध कराया गया। आने वाले पहले 80 मरीजों को इसके साथ ही फ्री बीएमडी (बोन मिनिरल डेंसिटी) हड्डियों के परीक्षण की व्यवस्था भी रखी गई थी। इस चिकित्सा शिविर में
प्रमुख चिकित्सक थे डॉ.सत्यजीत पटनायक ( किडनी विशेषज्ञ एवं सर्जन), डॉ. आशिष कॅस्टलिनो (इ.एन.टी. सर्जन), डॉ.स्वपना डेनिज़ (डेंटल सर्जन ), डॉ. सय्यद मुहम्मद् जिशान (चर्म रोग विशेषज्ञ), डॉ. निखिल बालाकृष्णन (नेत्र विशेषज्ञ), डॉ. पवित्रा बालाकृष्णन(नेत्र विशेषज्ञ), डॉ नयना बालाकृष्णन (स्त्री रोग विशेषज्ञ) और डॉ. अजय पांडेय (जनरल फिजीशियन)।
शिविर में करीब 350 मरीजों ने अपना स्वास्थ्य परीक्षण करवाया। आयोजन को सफल बनाने में रोटरी क्लब ऑफ़ बॉम्बे बांद्रा के अध्यक्ष रिटा. एड. त्रिवनकुमार करनानी के साथ रोटरी क्लब ऑफ़ बॉम्बे फ़िल्म सिटी के सदस्य भुवन कुमार, रमेश व्यास, रवि सावल और ऋतु बुगारा का विशेष योगदान रहा।
राष्ट्रीय सेवा योजना शिविर का तीसरा दिन : योग, ध्यान एवं जागरूकता रैली का आयोजन*
सुलतानपुर। गनपत सहाय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सुलतानपुर की राष्ट्रीय सेवा योजना की सभी इकाइयों के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे सप्त दिवसीय विशेष शिविर के तीसरे दिन विविध शैक्षिक एवं जनजागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्पार्चन कर आशीर्वाद लिया गया इसके पाश्चात्य प्रातःकाल कार्यक्रम की शुरुआत शारीरिक शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. रवींद्र शुक्ला तथा डॉ. विक्रमादित्य यादव द्वारा कराए गए योगाभ्यास से हुई। उन्होंने स्वयंसेवकों एवं स्वयंसेविकाओं को विभिन्न योगासन एवं प्राणायाम का अभ्यास कराते हुए बताया कि नियमित योग और व्यायाम स्वस्थ जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इसके पश्चात प्रातः 9 बजे “योग एवं ध्यान के माध्यम से जीवन का सर्वांगीण विकास” विषय पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इस अवसर पर श्री राम कृष्ण मिशन के प्रशिक्षक अंजनी कुमार दुबे, योग प्रशिक्षक श्नीलम सिंह तथा मनीष कुमार गुप्ता ने हार्टफुलनेस ध्यान की उपयोगिता एवं महत्व विषय पर व्याख्यान दिया तथा स्वयंसेवकों को ध्यानाभ्यास भी कराया। उन्होंने बताया कि ध्यान के माध्यम से मानसिक शांति, सकारात्मक सोच तथा व्यक्तित्व का समग्र विकास संभव है। इसके बाद राष्ट्रीय सेवा योजना की कार्यक्रमाधिकारी डॉ. दीपा सिंह के नेतृत्व में स्वयंसेवकों एवं स्वयंसेविकाओं ने चयनित ग्राम दिखौली का भ्रमण किया तथा “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” एवं “स्वच्छता अभियान” विषय पर जागरूकता रैली निकाली। रैली के माध्यम से स्वयंसेवकों ने ग्रामीणों को बालिका शिक्षा,महिला सम्मान तथा स्वच्छता के प्रति जागरूक किया। इस दौरान स्वयंसेवकों ने ग्राम सभा दिखौली के प्राथमिक विद्यालय का भी भ्रमण किया,जहाँ विद्यालय की प्रधानाध्यापिका श्रीमती रमा देवी मिश्रा एवं श्रीमती बीना देवी,श्रीमती अनीता वर्मा तथा श्रीमती साधना सिंह से भेंट हुई।सभी अध्यापिकाओं ने राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें समाज सेवा के कार्यों में निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।कार्यक्रम में उपस्थित राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रमाधिकारी डॉ.शाहनवाज आलम,डॉ.विष्णु शंकर अग्रहरि, डॉ.देवेन्द्र मिश्र तथा डॉ.भोलानाथ ने भी रैली के नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभाई।उन्होंने स्वयंसेवकों से शिविर की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करते हुए समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का आह्वान किया।इस अवसर पर छात्रों में ज्वाला गुप्ता,शुभी, भूमि सिंह,ख़ुशी शर्मा,निधि,रजिया, फिजा, सोनाली, निश्चल पाण्डेय,करण साहू,आदर्श पाण्डेय,देवेन्द्र,मनमोहन उपाध्याय, कृष्णा,मोहम्मद वारिस आदि का विशेष योगदान रहा।
परिषद विद्यालयों में 16 मार्च से होगी वार्षिक परीक्षा
*1.47 लाख बच्चे देंगे परीक्षा,31 को आएगा परिणाम*

रिपोर्टर - नितेश श्रीवास्तव


भदोही। जिले में परिषदीय विद्यालयों में 16 से 20 मार्च तक परीक्षा होगी। पहली से आठवीं तक के एक लाख 47 हजार बच्चे परीक्षा में शामिल होंगे। जबकि 31 मार्च को परिणाम आएगा। इसके बाद नया शिक्षण सत्र शुरू होगा। बता दें कि जिले में 885 प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और कंपोजिट विद्यालय है। इनमें करीब एक लाख 47 हजार छात्र-छात्राएं हैं। हाईस्कूल, इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा, सीबीएसई और संस्कृत बोर्ड की परीक्षाएं समाप्ति की ओर हैं। ऐसे में शिक्षा निदेशालय ने पहली से आठवीं तक की वार्षिक परीक्षा की समय सारिणी को जारी कर दिया। 16 से 20 मार्च तक परिषदीय विद्यालयों में परीक्षा कराई जाएगी।परीक्षा के लिए मॉडल प्रश्न पत्र जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा तैयार कराकर बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) को दिया जाएगा। बीएसए इसका मुद्रण कराकर विद्यालयों में वितरण कराएंगे। कक्षा एक की वार्षिक परीक्षा मौखिक होगी। कक्षा दो से पांच की परीक्षा लिखित और मौखिक दोनों माध्यम से होगी। दो एवं तीन में इसका अधिभार 50-50 फीसदी होगा। वहीं, कक्षा चार तथा पांच में क्रमश: 70 एवं 30 का होगा। लिखित परीक्षा 50 नंबर की होगी। लिखित परीक्षा दो घंटे की होगी जबकि मौखिक परीक्षा के लिए प्रधानाध्यापक आवश्यकतानुसार समय तय करेंगे।बेसिक शिक्षा निदेशक प्रताप सिंह बघेल का पत्र आते ही बेसिक शिक्षा विभाग ने तैयारी को शुरू कर दिया है। 25 मार्च को कॉपियों को जांचा जाएगा। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी शिवम पांडेय ने कहा कि परीक्षा की समय सारिणी मिली है। बताया कि इस बार परीक्षा में कई बदलाव किए गए हैं। वार्षिक परीक्षा और उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन होने के बाद परीक्षाफल जारी करने के दौरान विद्यार्थियों के अभिभावकों की बैठक होगी। इसमें मूल्यांकन की गई उत्तर पुस्तिकाएं दिखाई जाएंगी। इसके बाद ही परीक्षाफल जारी होगा।