कौशल से सशक्त युवा– सपनो को मिला मेजा ऊर्जा के सहयोग से नई उड़ान का आसमान।

संजय द्विवेदी प्रयागराज।मेजा ऊर्जा निगम द्वारा नैगम सामाजिक दायित्व (CSR) के अन्तर्गत कौशल विकास पहल के तहत सीपेट (CIPET) लखनऊ में प्रशिक्षित युवक एवं युवतियो के लिए कार्यक्रम का आयोजन सेंट जोसफ स्कूल सभागार में किया गया। जिसमें 40 प्रशिक्षार्थियो को प्रमाण पत्र एवं नियुक्ति पत्र प्रदान किए गए।

मेजा ऊर्जा निगम द्वारा नैगम सामाजिक दायित्व (CSR) के अंतर्गत सीपेट (CIPET) लखनऊ के सहयोग से युवाओ को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें रोजगार से जोड़ने का सफल प्रयास किया गया है। 40 प्रशिक्षार्थियों को सीपेट लखनऊ में चार माह का निःशुल्क आवासीय प्रशिक्षण मशीन ऑपरेटर–टूल रूम ट्रेड में प्रदान किया गया जिसके उपरांत 100 प्रतिशत प्लेसमेंट दिया गया।प्रशिक्षित युवाओं को गुजरात और हरियाणा राज्यो की विभिन्न अग्रणी कंपनियों में नियुक्तियां भी प्राप्त हुई हैं।

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, मुख्य कार्यकारी अधिकारी जी श्रीनिवास राव ने अपने संबोधन में कहा“युवा शक्ति देश का भविष्य है।उन्हे सही प्रशिक्षण और अवसर देकर हम एक विकसित और आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव रख सकते हैं। कौशल विकास ही राष्ट्र निर्माण की वास्तविक शक्ति है।”एवं उन्होंने सभी प्रशिक्षार्थियो को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ दी और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।इस अवसर पर सभी बच्चों ने मेजा ऊर्जा निगम और सीपेट को अपना उज्ज्वल भविष्य बनाने के लिए आभार प्रकट किया।

इस अवसर पर नरेन्द्र नाथ सिन्हा (महाप्रबंधक प्रचालन एवं अनुरक्षण)अशोक कुमार सामल (महाप्रबंधक अनुरक्षण)विवेक चन्द्र (अपर महाप्रबंधक मानव संसाधन) डॉ ए के चौधरी (मुख्य चिकित्सा अधिकारी) नवाब अंसारी(अपर महाप्रबन्धक सतर्कता)यूनियन एवं एसोसिएशन के पदाधिकारीगण सहित सीपेट के अधिकारी एवं अभिभावक उपस्थित रहे।

जिलाधिकारी ने की पेट्रोलियम पदार्थों के व्यवस्थापन के संबंध में संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक

बैठक में जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि जनपद के किसी एजेंसियों के द्वारा गैस का ब्लैक/ गलत वितरण किया गया तो होगी एफआईआर


गोण्डा। 12 मार्च, 2026
जिला पंचायत सभागार, गोण्डा में जिलाधिकारी  प्रियंका निरंजन की अध्यक्षता में पेट्रोलियम पदार्थों के व्यवस्थापन एवं सुचारु वितरण के संबंध में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ-साथ गैस एजेंसियों एवं पेट्रोल पंप संचालकों के पदाधिकारियों ने भाग लिया। बैठक का उद्देश्य जनपद में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा उनके वितरण में पारदर्शिता बनाए रखना था।

बैठक के दौरान जिलाधिकारी  प्रियंका निरंजन ने सभी संबंधित एजेंसियों के पदाधिकारियों एवं अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि जनपद में पेट्रोलियम पदार्थों के वितरण में किसी भी प्रकार की अनियमितता या कालाबाजारी (ब्लैक मार्केटिंग) किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि किसी भी गैस एजेंसी द्वारा गलत तरीके से गैस वितरण या कालाबाजारी की शिकायत प्राप्त होती है तो संबंधित एजेंसी के विरुद्ध तत्काल एफआईआर दर्ज कराते हुए कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

जिलाधिकारी ने जिला पूर्ति अधिकारी को निर्देशित किया कि जनपद की सभी गैस एजेंसियों के कनेक्शनों का विवरण तथा गैस बुकिंग से संबंधित सभी आवश्यक डिटेल्स तत्काल उपलब्ध कराई जाएं, जिससे वितरण प्रणाली की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि सभी एजेंसियां निर्धारित नियमों एवं मानकों के अनुसार ही कार्य करें तथा उपभोक्ताओं को समय पर गैस सिलेंडर उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें।

बैठक के दौरान पेट्रोल पंप संचालकों के पदाधिकारियों ने जिलाधिकारी को अवगत कराया कि जनपद में पेट्रोल एवं डीजल की पर्याप्त उपलब्धता है और किसी प्रकार की कमी नहीं है। इस संबंध में जिलाधिकारी ने आमजन से अपील की कि वे किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दें और अनावश्यक रूप से पेट्रोलियम पदार्थों का संग्रहण न करें।

जिलाधिकारी ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि जनपद में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता एवं वितरण व्यवस्था पर सतत निगरानी बनाए रखी जाए, ताकि आमजन को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि प्रशासन जनपद में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

बैठक के दौरान अपर जिलाधिकारी आलोक कुमार, अपर पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार रावत, नगर मजिस्ट्रेट पंकज वर्मा, उपजिलाधिकारी सदर, उपजिलाधिकारी करनैलगंज, उपजिलाधिकारी तरबगंज, पुलिस क्षेत्राधिकारी मनकापुर, पुलिस क्षेत्राधिकारी सदर, जिला पूर्ति अधिकारी सहित सभी एजेंसियों के पदाधिकारी उपस्थित रहे।
अपर पुलिस अधीक्षक गोण्डा द्वारा पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षा के दृष्टिगत परीक्षा केन्द्रों का किया गया निरीक्षण
गोण्डा। आज  12.03.2026 को पुलिस अधीक्षक गोण्डा  विनीत जायसवाल के निर्देशन में अपर पुलिस अधीक्षक गोण्डा  मनोज कुमार रावत द्वारा आगामी 14 व 15 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड, लखनऊ द्वारा आयोजित पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षा को निष्पक्ष, पारदर्शी एवं शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के दृष्टिगत जनपद के विभिन्न परीक्षा केन्द्रों का निरीक्षण किया गया।

निरीक्षण के दौरान अपर पुलिस अधीक्षक द्वारा परीक्षा कक्षों, सीसीटीवी कैमरों, प्रवेश द्वार, अभ्यर्थियों की चेकिंग व्यवस्था तथा सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया गया। इस दौरान केन्द्र व्यवस्थापकों, सेक्टर मजिस्ट्रेटों एवं ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों/कर्मचारियों को परीक्षा को शुचितापूर्ण, सकुशल एवं शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।
साथ ही निर्देशित किया गया कि परीक्षा केन्द्रों पर अभ्यर्थियों की सघन चेकिंग की जाए तथा किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि पर सतर्क दृष्टि रखी जाए।

जनपद स्तर पर स्थापित कंट्रोल रूम द्वारा भी सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से परीक्षा के दौरान लगातार निगरानी रखी जाएगी तथा सोशल मीडिया सेल द्वारा विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर भी सतत् मॉनिटरिंग की जा रही है।
गोण्डा पुलिस द्वारा जनपद के समस्त थानों में यक्ष-एप के माध्यम से अपराधियों का वृहद सत्यापन अभियान चलाया गया, कुल 7872 अपराधियों का किया गया सत्य

गोण्डा। पुलिस अधीक्षक गोण्डा के कुशल निर्देशन में जनपद में अपराध नियंत्रण एवं कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाये रखने के उद्देश्य से एक विशेष सत्यापन अभियान चलाया गया। उक्त अभियान के अंतर्गत जनपद के समस्त थानों द्वारा चिन्हित अपराधियों एवं अभियुक्तों का मौके पर जाकर यक्ष-एप (Yaksh App) के माध्यम से भौतिक सत्यापन किया गया।

*यक्ष-एप (Yaksh App)-* उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा विकसित एक आधुनिक डिजिटल एप्लीकेशन है, जिसके माध्यम से अपराधियों, हिस्ट्रीशीटरों तथा वांछित अभियुक्तों का त्वरित सत्यापन, उनकी वर्तमान स्थिति का अद्यतन रिकॉर्ड तथा उनकी गतिविधियों की निगरानी ऑनलाइन की जाती है। इस एप के माध्यम से पुलिस कर्मी मौके पर ही अपराधियों की पहचान, फोटो, लोकेशन व अन्य विवरण को अपडेट कर सकते हैं, जिससे अपराधियों पर प्रभावी निगरानी रखना, उनकी गतिविधियों का विश्लेषण करना तथा आवश्यक होने पर त्वरित पुलिस कार्रवाई करना अधिक सरल एवं प्रभावी हो जाता है। यह व्यवस्था पुलिस कार्य को अधिक पारदर्शी, त्वरित एवं तकनीक आधारित बनाती है।

इस अभियान के दौरान जनपद के विभिन्न थानों द्वारा कुल *7872* अपराधियों का सत्यापन किया जा चुका है। थाना वार सत्यापन का विवरण निम्नवत है—
• कोतवाली नगर – 880
• कोतवाली देहात – 861
• खरगूपुर – 426
• इटियाथोक – 498
• मोतीगंज – 389
• धानेपुर – 490
• मनकापुर – 549
• छपिया – 350
• खोड़ारे – 260
• कर्नलगंज – 553
• कटरा बाजार – 394
• परसपुर – 426
• कौड़िया – 262
• तरबगंज – 359
• नवाबगंज – 446
• वजीरगंज – 487
• उमरीबेगमगंज – 242
पुलिस अधीक्षक गोण्डा के निर्देशानुसार यह अभियान निरंतर जारी है। समस्त थानों द्वारा शेष चिन्हित अपराधियों का सत्यापन कार्य भी तीव्र गति से कराया जा रहा है। इस कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य अपराधियों की वर्तमान स्थिति एवं गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर उन पर प्रभावी निगरानी रखना है, जिससे जनपद में शांति, कानून एवं सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
बलिया: AIJTF की 'शिक्षक की पाती' से TET अनिवार्यता पर जबरदस्त हमला, 1 लाख पोस्टकार्ड-ईमेल का लक्ष्य

संजीव सिंह बलिया! अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ (A.I.J.T.F.) के केन्द्रीय एवं प्रदेश नेतृत्व के निर्देश के क्रम में जनपद बलिया के सभी प्रमुख घटक संगठनों के पदाधिकारियों द्वारा टेट अनिवार्यता के विरोध में आंदोलन के प्रथम चरण 9 मार्च से 15 मार्च तक प्रस्तावित *शिक्षक की पाती* कार्यक्रम के अंतर्गत महामहिम राष्ट्रपति महोदया, माननीय प्रधानमंत्री , मुख्य न्यायाधीश महोदय,माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश,नेता प्रतिपक्ष भारत एवं उत्तर प्रदेश आदि प्रमुख गणमान्य प्रतिनिधियों को 1100 पोस्ट कार्ड एवं ईमेल भेजकर शिक्षक प्रतिनिधियों की ओर से जनपद में कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर उपस्थित समस्त शिक्षक एवं कर्मचारी साथियों ने जनपद से 1 लाख से अधिक पोस्ट कार्ड/ईमेल/ट्वीट भेजना का लक्ष्य निर्धारित किया। सभी शिक्षक प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि यह लड़ाई शिक्षकों के अस्तित्व की लड़ाई है इसे हमें हर मोर्चे पर लड़ना होगा। इस लड़ाई में हम सभी शिक्षक एक साथ हैं, और साथ मिलकर हर मोर्चे पर इस लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार है। वक्ताओं ने समवेत स्वर में यह भी कहा कि RTE Act लागू होने से पूर्व नियुक्त एवं टेट से छूट प्राप्त शिक्षकों के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दि0 01/09/25 को टेट अनिवार्यता के लिए आदेश किया जाना पूर्व से स्थापित शिक्षक भर्ती नियमों एवं परंपरा के विपरीत है। इस आदेश पर सरकार की चुप्पी के कारण वर्ष 2011 से पूर्व नियुक्त देश के लाखों-लाख शिक्षकों एवं उनके परिवारों के साथ नौनिहालों का भी भविष्य एवं अस्तित्व पर संकट आ गया है। अतः सरकार से यह अपेक्षा है कि वह आवश्यक कार्यवाही कर आदेश को शिक्षक एवं राष्ट्र हित में निरस्त कराने की दिशा में सार्थक पहल करे। उपस्थित सभी शिक्षक एवं कर्मचारी प्रतिनिधियों ने जनपद से इस अवसर पर अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ जनपद बलिया के संयोजक गण सर्व श्री अजय सिंह(प्राथमिक शिक्षक संघ),समीर कुमार पाण्डेय(अटेवा),सतीश सिंह(TSCT), घनश्याम चौबे(विशिष्ट बीटीसी),राजेश सिंह(RSM),एवं घटक संगठनों के जिला एवं ब्लॉक पदाधिकारी गण सर्व श्री राकेश कुमार मौर्य,विनय राय,राधेश्याम पाण्डेय, अभिषेक राय,संजीव कुमार सिंह,संजय पाण्डेय,मलय पाण्डेय,मुकेश सिंह,नारायण जी,रजनीश चौबे,राजेश सिंह,अनिल सिंह,हरेराम सिंह, डॉक्टर आशुतोष शुक्ला,सुरेश वर्मा,नंदलाल मौर्य,राकेश कुमार सिंह,नित्यानंद पांडेय,राजीव नयन पाण्डेय,रवींद्र तिवारी,विवेक सिंह, सिद्धार्थ सिंह,रमेश तिवारी,उपेंद्र नारायण सिंह,संदीप सिंह,जितेंद्र पाण्डेय,योगेंद्र नाथ वर्मा,सतीश वर्मा,रमाकांत जी, मंदाकिनी द्विवेदी,लक्ष्मी पंडित, राजकुमार गुप्ता,संजय सिंह,राजेश गुप्ता,राज बहादुर, मोइनुद्दीन अंसारी, राजू रहमान, शशिकांत, अनूप कुमार, धर्मेंद्र कुमार, श्री भगवान जी, कमलेश सिंह जी, पवन सिंह जी विनय सिंह बिसेन जी, प्रदीप जी ,अनूप कुमार,जहांगीर आलम आदि शिक्षक एवं कर्मचारी साथी उपस्थित रहे। मीडिया टीम_AIJTF,बलिया
बिंद समाज विकास संघ द्वारा होली स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह संपन्न
सुरत। बिंद समाज विकास संघ सूरत गुजरात इकाई द्वारा पिछले सप्ताह जय अंबे मां ब्यूटी पार्लर के सामने देवेंद्र नगर गेट नंबर चार पांडेसरा सूरत गुजरात में, महिला प्रदेश अध्यक्ष बिंदु बिंद एवं जिला प्रदेश के कार्यकर्ताओं एवं सहयोगियों द्वारा होली स्नेह सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें सूरत के अलग-अलग हिस्सों से समाज के स्वजातिय बंधुओ ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया हजारों की संख्या में आए हुए तमाम वक्तागणों ने अपना अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि बिंद समाज विकास संघ सभी स्वजातिय संगठनों में सर्वश्रेष्ठ संगठन है जो बेहतरीन स्वास्थ्य, शिक्षा, जागरूकता,महिला सशक्तिकरण, रोटी बेटी, रोजी रोटी तमाम विषयों पर काम कर रहा है।

हम सभी को इस संघ के साथ तन मन धन से समाज के हर कार्यों में सहयोग करते हुए ,सूरत महानगर में,जिला इकाई, प्रदेश इकाई, शाखा इकाई, को गठन करके, संघ के नीति और नियमों के आधार पर काम करना होगा।संत रघुवर दास ने कहा कि संघ को हर संभव मदद करने का प्रयास करेंगे।बतौर मुख्य अतिथि बिंद समाज के सामाजिक गुरु डॉ शेषधर बिंद ने कहा कि सभी कार्यकर्ताओं एवं सहयोगियों पदाधिकारियों,आए हुए सभी महिला, पुरुषों को धन्यवाद,देते हुए, उनके सुख दुख में शामिल होकर, देश और समाज के विकास में अपना योगदान देते रहेंगे।

कार्यक्रम में शामिल, जिला अध्यक्ष संजय कुमार बिंद जिला सचिव चंद्रशेखर बिंद, जिला कोषाध्यक्ष राजकुमार बिंद, राकेश कुमार बिंद,सुरेश कुमार बिंद ,भीम केवट फूलचंद बिंद, गुलाबचंद बिंद, दीनानाथ बिंद, जिला जीत बिंद,आर्मी क्राइम ब्रांच में कार्यरत अनिल कुमार बिंद, महिला जिला अध्यक्ष, संजना बिंद, सचिन शाखा अध्यक्ष ज्योति बिंद ,रेखा केवट, सुनीता, शीतल निषाद अर्चना निषाद पूनम बिंद ,पिंकी बिंद, हिरानी बिंद,संगीता बिंद, तमाम महिलाओं पुरुषों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया संघ को सहयोग किया।मुंबई से पहुंचे पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं में मानखुर्द शाखा अध्यक्ष जयकिशन बिंद, राष्ट्रीय सचिव विनोद कुमार बिंद,राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष अध्यक्ष अजय कुमार बिंद, युवासेना अध्यक्ष दिनेश कुमार बिंद, बी एस वी एस रिपोर्टर अरविंद कुमार बिंद,भिवंडी से अशोक कुमार बिंद, उर्मिला बिंद आदि उपस्थित थे।
बिना मान्यता चल रहा ग्रुप चिल्ड्रन्स एकेडमी स्कूल, खंड शिक्षा अधिकारी  ने जारी किया नोटिस

रमेश दुबे,धनघटा संत कबीर नगर।धनघटा क्षेत्र के विकास खंड पौली के अंतर्गत ग्राम अतरौलिया में बिना मान्यता के विद्यालय संचालन का मामला प्रकाश में  आया है। खंड शिक्षा अधिकारी पौली द्वारा ग्रुप चिल्ड्रन्स एकेडमी (कक्षा नर्सरी से 8 तक) की प्रबंधिका को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

मिली जानकारी के अनुसार आईजीआरएस पोर्टल पर ग्राम पौली निवासी मोहम्मद इमरान पुत्र एकराम हुसैन द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई थी कि उक्त विद्यालय बिना मान्यता के संचालित किया जा रहा है। शिकायत के आधार पर खंड शिक्षा अधिकारी अर्जून प्रसाद ने मामले को संज्ञान में लेते हुए विद्यालय प्रबंधिका को नोटिस जारी किया।

जारी आदेश में बताया गया है कि इससे पूर्व भी 24 जुलाई 2025 को विभाग द्वारा विद्यालय को बिना मान्यता संचालन की शिकायत प्राप्त हुई थी शिकायत के संदर्भ में  प्रधान अध्यापिका मोबिना खातून को स्कूल बंद करने की नोटिस जारी कर  तथा छात्रों का नामांकन नजदीकी मान्यता प्राप्त विद्यालय में कराने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद विद्यालय का संचालन जारी रखा गया।

खंड शिक्षा अधिकारी ने अपने आदेश में निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 18 का उल्लेख करते हुए कहा है कि बिना मान्यता के किसी भी विद्यालय का संचालन अवैध है। ऐसे में संबंधित प्रबंधिका से 12 मार्च 2026 तक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने को कहा गया था। अन्यथा प्रधान अध्यापिका के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई करते हुए एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। साथ ही निर्देश दिया गया है कि जब तक विद्यालय को विभाग से मान्यता प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक उसका संचालन तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए तथा छात्रों का नामांकन निकट के मान्यता प्राप्त विद्यालयों में सुनिश्चित किया जाए।

इस संबंध में खंड शिक्षा अधिकारी पौली अर्जुन प्रसाद से पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि  ग्राम अतरौलिया, विकासखंड पौली में संचालित ग्रुप चिल्ड्रन एकेडमी की प्रधानाध्यापिका मोबिना खातून को बिना मान्यता विद्यालय चलाए जाने के संबंध में नोटिस जारी किया गया है। उन्होंने बताया कि प्रधान अध्यापिका  को लोटी नोटिस जारी कर दी गई है  और एक सप्ताह के भीतर अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया गया है। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं दिया जाता है तो प्रधान अध्यापिका  के खिलाफ  एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
बीबीडीयू में 'रोड सेफ्टी इवेंट' का भव्य आयोजन: युवाओं को मिला सुरक्षित सफर का मूल मंत्र*
सुल्तानपुर,बीबीडीयू एन.एस.एस. इकाई ने सुजुकी और वैल्यू लाइफ फाउंडेशन के साथ मिलकर जगाई यातायात नियमों की अलख; स्वयंसेवकों ने लिया सुरक्षा की संस्कृति अपनाने का संकल्प_ लखनऊ। 11 मार्च 2026। बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय (बीबीडीयू) की राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) इकाई ने सुजुकी मोटरसाइकिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और वैल्यू लाइफ फाउंडेशन के सहयोग से एक दिवसीय 'सड़क सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम' का भव्य आयोजन किया। यह आयोजन बीबीडी ग्रुप की चेयरपर्सन *श्रीमती अलका दास गुप्ता* और प्रेसिडेंट श्री *विराज सागर दास* एवम वाइस प्रेसिडेंट *सुश्री सोनाक्षी दास गुप्ता* की प्रेरणा से विश्वविद्यालय के डॉ. अखिलेश दास गुप्ता ऑडिटोरियम में संपन्न हुआ। वरिष्ठ पदाधिकारियों का प्रेरणादायक उद्बोधन *प्रो-वाइस चांसलर डॉ. एस. सी. शर्मा* ने अपने संबोधन में युवाओं को जीवन की रफ़्तार और सुरक्षा के बीच का अंतर समझाते हुए एक बेहद प्रभावशाली बात कही। उन्होंने कहा, "ज़िन्दगी में रफ़्तार ज़रूरी है, मगर अपने लक्ष्य को पाने के लिए, न कि बाइक के साथ सड़क पर अपनी जान जोखिम में डालने के लिए।" *डॉ. एस.एम.के. रिज़वी (डीन, स्टूडेंट वेलफेयर एवं चीफ प्रॉक्टर)* ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, "सड़क पर आपकी एक छोटी सी लापरवाही न केवल आपके लिए बल्कि दूसरों के लिए भी जानलेवा हो सकती है। नियम आपकी सुरक्षा के लिए हैं, इन्हें बोझ न समझें। एन.एस.एस. कार्यक्रम समन्वयक प्रो. (डॉ.) प्रभाश चंद्र पाठक ने स्वयंसेवकों का नेतृत्व करते हुए कहा, "सड़क सुरक्षा केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है। कार्यक्रम के दौरान विख्यात सिंह (वरिष्ठ प्रबंधक कार्यक्रम ,VLF) द्वारा सड़क सुरक्षा विषय पर एक महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किया गया, जिसमें युवाओं को यातायात नियमों के पालन, CPR, सुरक्षित दोपहिया वाहन संचालन तथा जिम्मेदार सड़क व्यवहार के प्रति प्रेरित किया गया। ट्रैफिक पुलिस लखनऊ *वेंकटेश सिंह और श्री विकास सिंह* ,ने सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों पर चर्चा करते हुए युवाओं को हेलमेट की अनिवार्यता और गति सीमा के पालन के बारे में समझाया। सुजुकी मोटरसाइकिल इंडिया के श्री गौरव ठाकुर और वैल्यू लाइफ फाउंडेशन की श्रुति ने सुरक्षित ड्राइविंग की उन्नत तकनीकों पर प्रकाश डाला। प्रशिक्षण और रोमांचक गतिविधियाँ एन.एस.एस. स्वयंसेवकों और छात्रों ने अपनी एकाग्रता और संतुलन का प्रदर्शन किया, जिसमें विजेताओं को हेल्मेट और आकर्षक उपहार दिए गए। सभी प्रतिभागियों ने एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सुरक्षित आचरण करने का सामूहिक संकल्प लिया। इस कार्यक्रम की विशेष उपलब्धि विश्वविद्यालय के चार छात्रों का चयन रही। वैल्यू लाइफ फाउंडेशन ने सड़क सुरक्षा के प्रति उनके समर्पण और नेतृत्व को देखते हुए तुषार वर्मा, अंकुश सिंह, अभय सिंह और लक्ष्मण वर्मा को 'रोड सेफ्टी एम्बेसडर' नियुक्त किया। ये एम्बेसडर अब भविष्य में युवाओं के बीच यातायात नियमों के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य करेंगे। कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले स्वयंसेवकों को डिजिटल सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। कार्यक्रम का सफल संचालन एनएसएस कार्यक्रम अधिकारियों के समन्वय में हुआ।
गो रक्षा और सनातन के लिए नई रणनीति, शंकराचार्य ने किया चतुरंगिणी सेना
लखनऊ। गो रक्षा और सनातन धर्म की रक्षा के मुद्दे पर बुधवार को राजधानी लखनऊ के कांशीराम स्मृति सांस्कृतिक स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ा ऐलान किया गया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती  ने ‘गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध’ का शंखनाद करते हुए कहा कि धर्म की रक्षा के लिए शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना का गठन किया जाएगा, जो संत समाज में फैल रही अशास्त्रीयता और अधर्म को दूर करने का कार्य करेगी।देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और गो रक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष शपथ नहीं, बल्कि धर्म की शपथ ही चलेगी। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि परिस्थितियां बनीं तो धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई

कार्यक्रम में उन्होंने संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद के कुछ महंतों और साधुओं ने यह कहा कि वे मुख्यमंत्री के साथ हैं, शंकराचार्य के साथ नहीं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यदि अखाड़े साथ नहीं आते हैं तो अब अलग संगठन और सेना बनाकर धर्म की रक्षा की जाएगी।शंकराचार्य ने प्रयागराज में माघ मेले के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वेद पढ़ने वाले बटुकों के साथ अन्याय हुआ, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि गोहत्या केवल कसाई ही नहीं करता, बल्कि जो इसे अनुमति देता है या मौन रहता है, वह भी उसी पाप का भागी है।

यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी

इस दौरान उन्होंने “समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा” निकालने की भी घोषणा की। यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी। यात्रा की शुरुआत गोरखपुर से होगी और वहीं इसका समापन भी होगा। इसके बाद 24 जुलाई को लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल पर एक बड़ी सभा आयोजित की जाएगी।शंकराचार्य ने कहा कि सनातन धर्म में शंकराचार्य सर्वोच्च धार्मिक प्राधिकरण हैं और गो माता की रक्षा के साथ-साथ सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प भी लेना होगा।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
कौशल से सशक्त युवा– सपनो को मिला मेजा ऊर्जा के सहयोग से नई उड़ान का आसमान।

संजय द्विवेदी प्रयागराज।मेजा ऊर्जा निगम द्वारा नैगम सामाजिक दायित्व (CSR) के अन्तर्गत कौशल विकास पहल के तहत सीपेट (CIPET) लखनऊ में प्रशिक्षित युवक एवं युवतियो के लिए कार्यक्रम का आयोजन सेंट जोसफ स्कूल सभागार में किया गया। जिसमें 40 प्रशिक्षार्थियो को प्रमाण पत्र एवं नियुक्ति पत्र प्रदान किए गए।

मेजा ऊर्जा निगम द्वारा नैगम सामाजिक दायित्व (CSR) के अंतर्गत सीपेट (CIPET) लखनऊ के सहयोग से युवाओ को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें रोजगार से जोड़ने का सफल प्रयास किया गया है। 40 प्रशिक्षार्थियों को सीपेट लखनऊ में चार माह का निःशुल्क आवासीय प्रशिक्षण मशीन ऑपरेटर–टूल रूम ट्रेड में प्रदान किया गया जिसके उपरांत 100 प्रतिशत प्लेसमेंट दिया गया।प्रशिक्षित युवाओं को गुजरात और हरियाणा राज्यो की विभिन्न अग्रणी कंपनियों में नियुक्तियां भी प्राप्त हुई हैं।

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, मुख्य कार्यकारी अधिकारी जी श्रीनिवास राव ने अपने संबोधन में कहा“युवा शक्ति देश का भविष्य है।उन्हे सही प्रशिक्षण और अवसर देकर हम एक विकसित और आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव रख सकते हैं। कौशल विकास ही राष्ट्र निर्माण की वास्तविक शक्ति है।”एवं उन्होंने सभी प्रशिक्षार्थियो को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ दी और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।इस अवसर पर सभी बच्चों ने मेजा ऊर्जा निगम और सीपेट को अपना उज्ज्वल भविष्य बनाने के लिए आभार प्रकट किया।

इस अवसर पर नरेन्द्र नाथ सिन्हा (महाप्रबंधक प्रचालन एवं अनुरक्षण)अशोक कुमार सामल (महाप्रबंधक अनुरक्षण)विवेक चन्द्र (अपर महाप्रबंधक मानव संसाधन) डॉ ए के चौधरी (मुख्य चिकित्सा अधिकारी) नवाब अंसारी(अपर महाप्रबन्धक सतर्कता)यूनियन एवं एसोसिएशन के पदाधिकारीगण सहित सीपेट के अधिकारी एवं अभिभावक उपस्थित रहे।

जिलाधिकारी ने की पेट्रोलियम पदार्थों के व्यवस्थापन के संबंध में संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक

बैठक में जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि जनपद के किसी एजेंसियों के द्वारा गैस का ब्लैक/ गलत वितरण किया गया तो होगी एफआईआर


गोण्डा। 12 मार्च, 2026
जिला पंचायत सभागार, गोण्डा में जिलाधिकारी  प्रियंका निरंजन की अध्यक्षता में पेट्रोलियम पदार्थों के व्यवस्थापन एवं सुचारु वितरण के संबंध में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ-साथ गैस एजेंसियों एवं पेट्रोल पंप संचालकों के पदाधिकारियों ने भाग लिया। बैठक का उद्देश्य जनपद में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा उनके वितरण में पारदर्शिता बनाए रखना था।

बैठक के दौरान जिलाधिकारी  प्रियंका निरंजन ने सभी संबंधित एजेंसियों के पदाधिकारियों एवं अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि जनपद में पेट्रोलियम पदार्थों के वितरण में किसी भी प्रकार की अनियमितता या कालाबाजारी (ब्लैक मार्केटिंग) किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि किसी भी गैस एजेंसी द्वारा गलत तरीके से गैस वितरण या कालाबाजारी की शिकायत प्राप्त होती है तो संबंधित एजेंसी के विरुद्ध तत्काल एफआईआर दर्ज कराते हुए कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

जिलाधिकारी ने जिला पूर्ति अधिकारी को निर्देशित किया कि जनपद की सभी गैस एजेंसियों के कनेक्शनों का विवरण तथा गैस बुकिंग से संबंधित सभी आवश्यक डिटेल्स तत्काल उपलब्ध कराई जाएं, जिससे वितरण प्रणाली की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि सभी एजेंसियां निर्धारित नियमों एवं मानकों के अनुसार ही कार्य करें तथा उपभोक्ताओं को समय पर गैस सिलेंडर उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें।

बैठक के दौरान पेट्रोल पंप संचालकों के पदाधिकारियों ने जिलाधिकारी को अवगत कराया कि जनपद में पेट्रोल एवं डीजल की पर्याप्त उपलब्धता है और किसी प्रकार की कमी नहीं है। इस संबंध में जिलाधिकारी ने आमजन से अपील की कि वे किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दें और अनावश्यक रूप से पेट्रोलियम पदार्थों का संग्रहण न करें।

जिलाधिकारी ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि जनपद में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता एवं वितरण व्यवस्था पर सतत निगरानी बनाए रखी जाए, ताकि आमजन को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि प्रशासन जनपद में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

बैठक के दौरान अपर जिलाधिकारी आलोक कुमार, अपर पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार रावत, नगर मजिस्ट्रेट पंकज वर्मा, उपजिलाधिकारी सदर, उपजिलाधिकारी करनैलगंज, उपजिलाधिकारी तरबगंज, पुलिस क्षेत्राधिकारी मनकापुर, पुलिस क्षेत्राधिकारी सदर, जिला पूर्ति अधिकारी सहित सभी एजेंसियों के पदाधिकारी उपस्थित रहे।
अपर पुलिस अधीक्षक गोण्डा द्वारा पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षा के दृष्टिगत परीक्षा केन्द्रों का किया गया निरीक्षण
गोण्डा। आज  12.03.2026 को पुलिस अधीक्षक गोण्डा  विनीत जायसवाल के निर्देशन में अपर पुलिस अधीक्षक गोण्डा  मनोज कुमार रावत द्वारा आगामी 14 व 15 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड, लखनऊ द्वारा आयोजित पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती परीक्षा को निष्पक्ष, पारदर्शी एवं शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के दृष्टिगत जनपद के विभिन्न परीक्षा केन्द्रों का निरीक्षण किया गया।

निरीक्षण के दौरान अपर पुलिस अधीक्षक द्वारा परीक्षा कक्षों, सीसीटीवी कैमरों, प्रवेश द्वार, अभ्यर्थियों की चेकिंग व्यवस्था तथा सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया गया। इस दौरान केन्द्र व्यवस्थापकों, सेक्टर मजिस्ट्रेटों एवं ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों/कर्मचारियों को परीक्षा को शुचितापूर्ण, सकुशल एवं शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।
साथ ही निर्देशित किया गया कि परीक्षा केन्द्रों पर अभ्यर्थियों की सघन चेकिंग की जाए तथा किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि पर सतर्क दृष्टि रखी जाए।

जनपद स्तर पर स्थापित कंट्रोल रूम द्वारा भी सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से परीक्षा के दौरान लगातार निगरानी रखी जाएगी तथा सोशल मीडिया सेल द्वारा विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर भी सतत् मॉनिटरिंग की जा रही है।
गोण्डा पुलिस द्वारा जनपद के समस्त थानों में यक्ष-एप के माध्यम से अपराधियों का वृहद सत्यापन अभियान चलाया गया, कुल 7872 अपराधियों का किया गया सत्य

गोण्डा। पुलिस अधीक्षक गोण्डा के कुशल निर्देशन में जनपद में अपराध नियंत्रण एवं कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाये रखने के उद्देश्य से एक विशेष सत्यापन अभियान चलाया गया। उक्त अभियान के अंतर्गत जनपद के समस्त थानों द्वारा चिन्हित अपराधियों एवं अभियुक्तों का मौके पर जाकर यक्ष-एप (Yaksh App) के माध्यम से भौतिक सत्यापन किया गया।

*यक्ष-एप (Yaksh App)-* उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा विकसित एक आधुनिक डिजिटल एप्लीकेशन है, जिसके माध्यम से अपराधियों, हिस्ट्रीशीटरों तथा वांछित अभियुक्तों का त्वरित सत्यापन, उनकी वर्तमान स्थिति का अद्यतन रिकॉर्ड तथा उनकी गतिविधियों की निगरानी ऑनलाइन की जाती है। इस एप के माध्यम से पुलिस कर्मी मौके पर ही अपराधियों की पहचान, फोटो, लोकेशन व अन्य विवरण को अपडेट कर सकते हैं, जिससे अपराधियों पर प्रभावी निगरानी रखना, उनकी गतिविधियों का विश्लेषण करना तथा आवश्यक होने पर त्वरित पुलिस कार्रवाई करना अधिक सरल एवं प्रभावी हो जाता है। यह व्यवस्था पुलिस कार्य को अधिक पारदर्शी, त्वरित एवं तकनीक आधारित बनाती है।

इस अभियान के दौरान जनपद के विभिन्न थानों द्वारा कुल *7872* अपराधियों का सत्यापन किया जा चुका है। थाना वार सत्यापन का विवरण निम्नवत है—
• कोतवाली नगर – 880
• कोतवाली देहात – 861
• खरगूपुर – 426
• इटियाथोक – 498
• मोतीगंज – 389
• धानेपुर – 490
• मनकापुर – 549
• छपिया – 350
• खोड़ारे – 260
• कर्नलगंज – 553
• कटरा बाजार – 394
• परसपुर – 426
• कौड़िया – 262
• तरबगंज – 359
• नवाबगंज – 446
• वजीरगंज – 487
• उमरीबेगमगंज – 242
पुलिस अधीक्षक गोण्डा के निर्देशानुसार यह अभियान निरंतर जारी है। समस्त थानों द्वारा शेष चिन्हित अपराधियों का सत्यापन कार्य भी तीव्र गति से कराया जा रहा है। इस कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य अपराधियों की वर्तमान स्थिति एवं गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर उन पर प्रभावी निगरानी रखना है, जिससे जनपद में शांति, कानून एवं सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
बलिया: AIJTF की 'शिक्षक की पाती' से TET अनिवार्यता पर जबरदस्त हमला, 1 लाख पोस्टकार्ड-ईमेल का लक्ष्य

संजीव सिंह बलिया! अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ (A.I.J.T.F.) के केन्द्रीय एवं प्रदेश नेतृत्व के निर्देश के क्रम में जनपद बलिया के सभी प्रमुख घटक संगठनों के पदाधिकारियों द्वारा टेट अनिवार्यता के विरोध में आंदोलन के प्रथम चरण 9 मार्च से 15 मार्च तक प्रस्तावित *शिक्षक की पाती* कार्यक्रम के अंतर्गत महामहिम राष्ट्रपति महोदया, माननीय प्रधानमंत्री , मुख्य न्यायाधीश महोदय,माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश,नेता प्रतिपक्ष भारत एवं उत्तर प्रदेश आदि प्रमुख गणमान्य प्रतिनिधियों को 1100 पोस्ट कार्ड एवं ईमेल भेजकर शिक्षक प्रतिनिधियों की ओर से जनपद में कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर उपस्थित समस्त शिक्षक एवं कर्मचारी साथियों ने जनपद से 1 लाख से अधिक पोस्ट कार्ड/ईमेल/ट्वीट भेजना का लक्ष्य निर्धारित किया। सभी शिक्षक प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि यह लड़ाई शिक्षकों के अस्तित्व की लड़ाई है इसे हमें हर मोर्चे पर लड़ना होगा। इस लड़ाई में हम सभी शिक्षक एक साथ हैं, और साथ मिलकर हर मोर्चे पर इस लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार है। वक्ताओं ने समवेत स्वर में यह भी कहा कि RTE Act लागू होने से पूर्व नियुक्त एवं टेट से छूट प्राप्त शिक्षकों के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दि0 01/09/25 को टेट अनिवार्यता के लिए आदेश किया जाना पूर्व से स्थापित शिक्षक भर्ती नियमों एवं परंपरा के विपरीत है। इस आदेश पर सरकार की चुप्पी के कारण वर्ष 2011 से पूर्व नियुक्त देश के लाखों-लाख शिक्षकों एवं उनके परिवारों के साथ नौनिहालों का भी भविष्य एवं अस्तित्व पर संकट आ गया है। अतः सरकार से यह अपेक्षा है कि वह आवश्यक कार्यवाही कर आदेश को शिक्षक एवं राष्ट्र हित में निरस्त कराने की दिशा में सार्थक पहल करे। उपस्थित सभी शिक्षक एवं कर्मचारी प्रतिनिधियों ने जनपद से इस अवसर पर अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ जनपद बलिया के संयोजक गण सर्व श्री अजय सिंह(प्राथमिक शिक्षक संघ),समीर कुमार पाण्डेय(अटेवा),सतीश सिंह(TSCT), घनश्याम चौबे(विशिष्ट बीटीसी),राजेश सिंह(RSM),एवं घटक संगठनों के जिला एवं ब्लॉक पदाधिकारी गण सर्व श्री राकेश कुमार मौर्य,विनय राय,राधेश्याम पाण्डेय, अभिषेक राय,संजीव कुमार सिंह,संजय पाण्डेय,मलय पाण्डेय,मुकेश सिंह,नारायण जी,रजनीश चौबे,राजेश सिंह,अनिल सिंह,हरेराम सिंह, डॉक्टर आशुतोष शुक्ला,सुरेश वर्मा,नंदलाल मौर्य,राकेश कुमार सिंह,नित्यानंद पांडेय,राजीव नयन पाण्डेय,रवींद्र तिवारी,विवेक सिंह, सिद्धार्थ सिंह,रमेश तिवारी,उपेंद्र नारायण सिंह,संदीप सिंह,जितेंद्र पाण्डेय,योगेंद्र नाथ वर्मा,सतीश वर्मा,रमाकांत जी, मंदाकिनी द्विवेदी,लक्ष्मी पंडित, राजकुमार गुप्ता,संजय सिंह,राजेश गुप्ता,राज बहादुर, मोइनुद्दीन अंसारी, राजू रहमान, शशिकांत, अनूप कुमार, धर्मेंद्र कुमार, श्री भगवान जी, कमलेश सिंह जी, पवन सिंह जी विनय सिंह बिसेन जी, प्रदीप जी ,अनूप कुमार,जहांगीर आलम आदि शिक्षक एवं कर्मचारी साथी उपस्थित रहे। मीडिया टीम_AIJTF,बलिया
बिंद समाज विकास संघ द्वारा होली स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह संपन्न
सुरत। बिंद समाज विकास संघ सूरत गुजरात इकाई द्वारा पिछले सप्ताह जय अंबे मां ब्यूटी पार्लर के सामने देवेंद्र नगर गेट नंबर चार पांडेसरा सूरत गुजरात में, महिला प्रदेश अध्यक्ष बिंदु बिंद एवं जिला प्रदेश के कार्यकर्ताओं एवं सहयोगियों द्वारा होली स्नेह सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें सूरत के अलग-अलग हिस्सों से समाज के स्वजातिय बंधुओ ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया हजारों की संख्या में आए हुए तमाम वक्तागणों ने अपना अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि बिंद समाज विकास संघ सभी स्वजातिय संगठनों में सर्वश्रेष्ठ संगठन है जो बेहतरीन स्वास्थ्य, शिक्षा, जागरूकता,महिला सशक्तिकरण, रोटी बेटी, रोजी रोटी तमाम विषयों पर काम कर रहा है।

हम सभी को इस संघ के साथ तन मन धन से समाज के हर कार्यों में सहयोग करते हुए ,सूरत महानगर में,जिला इकाई, प्रदेश इकाई, शाखा इकाई, को गठन करके, संघ के नीति और नियमों के आधार पर काम करना होगा।संत रघुवर दास ने कहा कि संघ को हर संभव मदद करने का प्रयास करेंगे।बतौर मुख्य अतिथि बिंद समाज के सामाजिक गुरु डॉ शेषधर बिंद ने कहा कि सभी कार्यकर्ताओं एवं सहयोगियों पदाधिकारियों,आए हुए सभी महिला, पुरुषों को धन्यवाद,देते हुए, उनके सुख दुख में शामिल होकर, देश और समाज के विकास में अपना योगदान देते रहेंगे।

कार्यक्रम में शामिल, जिला अध्यक्ष संजय कुमार बिंद जिला सचिव चंद्रशेखर बिंद, जिला कोषाध्यक्ष राजकुमार बिंद, राकेश कुमार बिंद,सुरेश कुमार बिंद ,भीम केवट फूलचंद बिंद, गुलाबचंद बिंद, दीनानाथ बिंद, जिला जीत बिंद,आर्मी क्राइम ब्रांच में कार्यरत अनिल कुमार बिंद, महिला जिला अध्यक्ष, संजना बिंद, सचिन शाखा अध्यक्ष ज्योति बिंद ,रेखा केवट, सुनीता, शीतल निषाद अर्चना निषाद पूनम बिंद ,पिंकी बिंद, हिरानी बिंद,संगीता बिंद, तमाम महिलाओं पुरुषों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया संघ को सहयोग किया।मुंबई से पहुंचे पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं में मानखुर्द शाखा अध्यक्ष जयकिशन बिंद, राष्ट्रीय सचिव विनोद कुमार बिंद,राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष अध्यक्ष अजय कुमार बिंद, युवासेना अध्यक्ष दिनेश कुमार बिंद, बी एस वी एस रिपोर्टर अरविंद कुमार बिंद,भिवंडी से अशोक कुमार बिंद, उर्मिला बिंद आदि उपस्थित थे।
बिना मान्यता चल रहा ग्रुप चिल्ड्रन्स एकेडमी स्कूल, खंड शिक्षा अधिकारी  ने जारी किया नोटिस

रमेश दुबे,धनघटा संत कबीर नगर।धनघटा क्षेत्र के विकास खंड पौली के अंतर्गत ग्राम अतरौलिया में बिना मान्यता के विद्यालय संचालन का मामला प्रकाश में  आया है। खंड शिक्षा अधिकारी पौली द्वारा ग्रुप चिल्ड्रन्स एकेडमी (कक्षा नर्सरी से 8 तक) की प्रबंधिका को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

मिली जानकारी के अनुसार आईजीआरएस पोर्टल पर ग्राम पौली निवासी मोहम्मद इमरान पुत्र एकराम हुसैन द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई थी कि उक्त विद्यालय बिना मान्यता के संचालित किया जा रहा है। शिकायत के आधार पर खंड शिक्षा अधिकारी अर्जून प्रसाद ने मामले को संज्ञान में लेते हुए विद्यालय प्रबंधिका को नोटिस जारी किया।

जारी आदेश में बताया गया है कि इससे पूर्व भी 24 जुलाई 2025 को विभाग द्वारा विद्यालय को बिना मान्यता संचालन की शिकायत प्राप्त हुई थी शिकायत के संदर्भ में  प्रधान अध्यापिका मोबिना खातून को स्कूल बंद करने की नोटिस जारी कर  तथा छात्रों का नामांकन नजदीकी मान्यता प्राप्त विद्यालय में कराने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद विद्यालय का संचालन जारी रखा गया।

खंड शिक्षा अधिकारी ने अपने आदेश में निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 18 का उल्लेख करते हुए कहा है कि बिना मान्यता के किसी भी विद्यालय का संचालन अवैध है। ऐसे में संबंधित प्रबंधिका से 12 मार्च 2026 तक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने को कहा गया था। अन्यथा प्रधान अध्यापिका के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई करते हुए एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। साथ ही निर्देश दिया गया है कि जब तक विद्यालय को विभाग से मान्यता प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक उसका संचालन तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए तथा छात्रों का नामांकन निकट के मान्यता प्राप्त विद्यालयों में सुनिश्चित किया जाए।

इस संबंध में खंड शिक्षा अधिकारी पौली अर्जुन प्रसाद से पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि  ग्राम अतरौलिया, विकासखंड पौली में संचालित ग्रुप चिल्ड्रन एकेडमी की प्रधानाध्यापिका मोबिना खातून को बिना मान्यता विद्यालय चलाए जाने के संबंध में नोटिस जारी किया गया है। उन्होंने बताया कि प्रधान अध्यापिका  को लोटी नोटिस जारी कर दी गई है  और एक सप्ताह के भीतर अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया गया है। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं दिया जाता है तो प्रधान अध्यापिका  के खिलाफ  एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
बीबीडीयू में 'रोड सेफ्टी इवेंट' का भव्य आयोजन: युवाओं को मिला सुरक्षित सफर का मूल मंत्र*
सुल्तानपुर,बीबीडीयू एन.एस.एस. इकाई ने सुजुकी और वैल्यू लाइफ फाउंडेशन के साथ मिलकर जगाई यातायात नियमों की अलख; स्वयंसेवकों ने लिया सुरक्षा की संस्कृति अपनाने का संकल्प_ लखनऊ। 11 मार्च 2026। बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय (बीबीडीयू) की राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) इकाई ने सुजुकी मोटरसाइकिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और वैल्यू लाइफ फाउंडेशन के सहयोग से एक दिवसीय 'सड़क सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम' का भव्य आयोजन किया। यह आयोजन बीबीडी ग्रुप की चेयरपर्सन *श्रीमती अलका दास गुप्ता* और प्रेसिडेंट श्री *विराज सागर दास* एवम वाइस प्रेसिडेंट *सुश्री सोनाक्षी दास गुप्ता* की प्रेरणा से विश्वविद्यालय के डॉ. अखिलेश दास गुप्ता ऑडिटोरियम में संपन्न हुआ। वरिष्ठ पदाधिकारियों का प्रेरणादायक उद्बोधन *प्रो-वाइस चांसलर डॉ. एस. सी. शर्मा* ने अपने संबोधन में युवाओं को जीवन की रफ़्तार और सुरक्षा के बीच का अंतर समझाते हुए एक बेहद प्रभावशाली बात कही। उन्होंने कहा, "ज़िन्दगी में रफ़्तार ज़रूरी है, मगर अपने लक्ष्य को पाने के लिए, न कि बाइक के साथ सड़क पर अपनी जान जोखिम में डालने के लिए।" *डॉ. एस.एम.के. रिज़वी (डीन, स्टूडेंट वेलफेयर एवं चीफ प्रॉक्टर)* ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, "सड़क पर आपकी एक छोटी सी लापरवाही न केवल आपके लिए बल्कि दूसरों के लिए भी जानलेवा हो सकती है। नियम आपकी सुरक्षा के लिए हैं, इन्हें बोझ न समझें। एन.एस.एस. कार्यक्रम समन्वयक प्रो. (डॉ.) प्रभाश चंद्र पाठक ने स्वयंसेवकों का नेतृत्व करते हुए कहा, "सड़क सुरक्षा केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है। कार्यक्रम के दौरान विख्यात सिंह (वरिष्ठ प्रबंधक कार्यक्रम ,VLF) द्वारा सड़क सुरक्षा विषय पर एक महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किया गया, जिसमें युवाओं को यातायात नियमों के पालन, CPR, सुरक्षित दोपहिया वाहन संचालन तथा जिम्मेदार सड़क व्यवहार के प्रति प्रेरित किया गया। ट्रैफिक पुलिस लखनऊ *वेंकटेश सिंह और श्री विकास सिंह* ,ने सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों पर चर्चा करते हुए युवाओं को हेलमेट की अनिवार्यता और गति सीमा के पालन के बारे में समझाया। सुजुकी मोटरसाइकिल इंडिया के श्री गौरव ठाकुर और वैल्यू लाइफ फाउंडेशन की श्रुति ने सुरक्षित ड्राइविंग की उन्नत तकनीकों पर प्रकाश डाला। प्रशिक्षण और रोमांचक गतिविधियाँ एन.एस.एस. स्वयंसेवकों और छात्रों ने अपनी एकाग्रता और संतुलन का प्रदर्शन किया, जिसमें विजेताओं को हेल्मेट और आकर्षक उपहार दिए गए। सभी प्रतिभागियों ने एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सुरक्षित आचरण करने का सामूहिक संकल्प लिया। इस कार्यक्रम की विशेष उपलब्धि विश्वविद्यालय के चार छात्रों का चयन रही। वैल्यू लाइफ फाउंडेशन ने सड़क सुरक्षा के प्रति उनके समर्पण और नेतृत्व को देखते हुए तुषार वर्मा, अंकुश सिंह, अभय सिंह और लक्ष्मण वर्मा को 'रोड सेफ्टी एम्बेसडर' नियुक्त किया। ये एम्बेसडर अब भविष्य में युवाओं के बीच यातायात नियमों के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य करेंगे। कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले स्वयंसेवकों को डिजिटल सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। कार्यक्रम का सफल संचालन एनएसएस कार्यक्रम अधिकारियों के समन्वय में हुआ।
गो रक्षा और सनातन के लिए नई रणनीति, शंकराचार्य ने किया चतुरंगिणी सेना
लखनऊ। गो रक्षा और सनातन धर्म की रक्षा के मुद्दे पर बुधवार को राजधानी लखनऊ के कांशीराम स्मृति सांस्कृतिक स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ा ऐलान किया गया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती  ने ‘गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध’ का शंखनाद करते हुए कहा कि धर्म की रक्षा के लिए शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना का गठन किया जाएगा, जो संत समाज में फैल रही अशास्त्रीयता और अधर्म को दूर करने का कार्य करेगी।देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और गो रक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष शपथ नहीं, बल्कि धर्म की शपथ ही चलेगी। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि परिस्थितियां बनीं तो धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई

कार्यक्रम में उन्होंने संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद के कुछ महंतों और साधुओं ने यह कहा कि वे मुख्यमंत्री के साथ हैं, शंकराचार्य के साथ नहीं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यदि अखाड़े साथ नहीं आते हैं तो अब अलग संगठन और सेना बनाकर धर्म की रक्षा की जाएगी।शंकराचार्य ने प्रयागराज में माघ मेले के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वेद पढ़ने वाले बटुकों के साथ अन्याय हुआ, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि गोहत्या केवल कसाई ही नहीं करता, बल्कि जो इसे अनुमति देता है या मौन रहता है, वह भी उसी पाप का भागी है।

यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी

इस दौरान उन्होंने “समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा” निकालने की भी घोषणा की। यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी। यात्रा की शुरुआत गोरखपुर से होगी और वहीं इसका समापन भी होगा। इसके बाद 24 जुलाई को लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल पर एक बड़ी सभा आयोजित की जाएगी।शंकराचार्य ने कहा कि सनातन धर्म में शंकराचार्य सर्वोच्च धार्मिक प्राधिकरण हैं और गो माता की रक्षा के साथ-साथ सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प भी लेना होगा।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद