मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
मोहनलालगंज दोहरा हत्याकांड: मुठभेड़ में गिरफ्तार हुआ हत्यारोपी किशन रावत, पैर में गोली लगने से दबोचा
लखनऊ। राजधानी के मोहनलालगंज क्षेत्र में मां-बेटे की सनसनीखेज हत्या करने वाले आरोपी को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया। सिसेंडी गांव निवासी आरोपी किशन रावत को पुलिस ने बुधवार रात बाजखेड़ा–हुलासखेड़ा ईंट भट्ठे के पास से घेराबंदी कर दबोचा। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी के पैर में गोली लग गई, जिसके बाद उसे घायल अवस्था में हिरासत में लेकर अस्पताल भेजा गया। आरोपी के कब्जे से 315 बोर का अवैध तमंचा, दो कारतूस और एक कारतूस तमंचे में फंसा हुआ बरामद हुआ है।

सोमवार की रात मां-बेटे की कर दी गई थी हत्या

पुलिस के मुताबिक, सोमवार रात मोहनलालगंज थाना क्षेत्र के सिसेंडी गांव में 50 वर्षीय रेशमा बानो और उनके 18 वर्षीय दृष्टिहीन बेटे शादाब की गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बदमाश की तलाश में चार पुलिस टीमों का गठन किया गया।डीसीपी दक्षिणी निपुण अग्रवाल ने बताया कि जांच और साक्ष्य जुटाने के दौरान स्थानीय निवासी किशन रावत का नाम सामने आया। इसके बाद इंस्पेक्टर मोहनलालगंज ब्रजेश कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में पुलिस टीम आरोपी की तलाश में जुट गई।

आरोपी लखनऊ से बाहर भागने की फिराक में था

बुधवार को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपी हुलासखेड़ा से खुजौली की ओर नहर किनारे रास्ते से भागने की फिराक में है। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और घेराबंदी कर आरोपी को पकड़ने का प्रयास किया। इस दौरान बदमाश ने पुलिस टीम पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी, जिससे एक सिपाही घायल हो गया। पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की, जिसमें आरोपी किशन रावत के पैर में गोली लग गई और वह घायल होकर गिर पड़ा।पुलिस ने आरोपी को मौके से गिरफ्तार कर लिया और घायल सिपाही व आरोपी को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोहनलालगंज भेजा गया। पुलिस के अनुसार आरोपी के पास से घटना में प्रयुक्त अवैध तमंचा और कारतूस बरामद किए गए हैं।

सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी की हुई पहचान

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी सोमवार रात घर में घुस गया था और रेशमा बानो पर गलत नजर डालने लगा। इस दौरान महिला और उसके दृष्टिहीन बेटे शादाब ने विरोध किया। पहचान उजागर होने के डर से आरोपी ने दोनों की गला घोंटकर हत्या कर दी और मौके से फरार हो गया।घटना के बाद पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, जिसमें आरोपी का चेहरा कैद हो गया। इसी फुटेज के आधार पर पुलिस ने आरोपी की पहचान कर उसका पीछा किया और आखिरकार मुठभेड़ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया।इस मामले में पीड़िता के भाई की तहरीर पर थाना मोहनलालगंज में मुकदमा संख्या 92/26 धारा 103(1) बीएनएस के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस आरोपी के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई कर रही है।
चैत्र नवरात्रि को लेकर समय से पूर्ण करें सभी तैयारीः मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलरामपुर मंडल की समीक्षा बैठक कर दिए आवश्यक निर्देश* 

*बोले- देवीपाटन शक्तिपीठ में उमड़ते हैं श्रद्धालु, सुरक्षा-सुविधा, स्वच्छता पर रहे विशेष जोर* 

*सभी अधिकारी प्रतिदिन करें जनसुनवाई, आमजन की समस्याओं एवं शिकायतों का समयसीमा के अंदर हो उचित निस्तारणः मा० मुख्यमंत्री जी*

*सुनिश्चित हो-छांगुर जैसा कोई व्यक्ति दोबारा न पनपे, ग्राम चौकीदारों को किया जाए सक्रिय, सभी जानकारी की जाए साझाः मा० सीएम*



बलरामपुर ।मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश शासन योगी आदित्यनाथ जी ने बुधवार को जनपद में समीक्षा बैठक की। मा० मुख्यमंत्री जी ने विकास कार्यों, कानून व्यवस्था एवं चैत्र नवरात्रि मेला की तैयारियों को लेकर आवश्यक निर्देश भी दिए। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ होने जा रही है। चैत्र नवरात्रि मेले में देवीपाटन मंदिर शक्तिपीठ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आमगन होता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुगम दर्शन, पेयजल, स्वच्छता, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिए कि नवरात्र पर मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों के आसपास विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाए तथा आवश्यकतानुसार अतिरिक्त स्वच्छताकर्मी तैनात किए जाएं। मा० मुख्यमंत्री जी ने जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से तैयारियों की जानकारी भी प्राप्त की।

*मा० मुख्यमत्री जी का सख्त निर्देश- छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कानून व्यवस्था की समीक्षा के दौरान कहा कि हर थाना क्षेत्र में संस्थाओं के आसपास एंटी रोमियो स्क्वॉड तैनात रहे। शोहदों, चेन स्नेचरों आदि के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। ऐसे लोगों की फोटो सार्वजनिक स्थलों और सोशल मीडिया पर लगाई जाए। बॉर्डर एरिया पर पुलिस एवं बीएसएफ की संयुक्त निगरानी हो। नवधनाढ्यों की संपत्ति की जांच कराई जाए। मा० मुख्यमत्री जी ने प्रशासन व पुलिस को सख्त निर्देश दिया कि छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे। ग्राम चौकीदारों को सक्रिय किया जाए, सभी जानकारी साझा की जाए। जिला मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक नियमित हो। सभी अपराधियों को कानून के तहत सजा दिलाई जाए, जिससे उनमें कानून का भय हो।

*अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जाए सरकार की योजनाएं*
मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मां पाटेश्वरी राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण में तेजी लाकर इसे मई तक पूर्ण किया जाए। यूनिवर्सिटी को रिसर्च सेंटर के तौर पर भी विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में थारू जनजाति एवं अन्य परिवार को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से संतृप्त किया जाए। थारू जनजाति क्षेत्र में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं को पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत प्रशिक्षण कराया जाए। राजस्व वादों, पैमाइश एवं विरासत के निस्तारण में तेजी लाई जाए।

*प्राथमिकता से हो व्यापारियों की समस्याओं का निस्तारण*
मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मेडिकल कॉलेज में सभी औपचारिकता पूर्ण करते हुए नए सत्र में  पढ़ाई के लिए आवेदन करें। शीघ्र मेडिकल की पढ़ाई शुरू कराई जाएगी। बाढ़ से बचाव के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी जाए।  नदियों,  पहाड़ी नालों के ड्रेनेज-चैनलाइज का कार्य समय से पूर्ण किया जाए। महिलाओं एवं बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही विशेष योजनाओं (मातृ वंदना योजना,  कन्या सुमंगला योजना, सामूहिक विवाह आदि) का लाभ हर पात्र को मिलना चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि जिला उद्योग बंधु एवं व्यापारी बंधुओं की नियमित बैठकें हों और उनकी समस्याओं का प्राथमिकता से निस्तारण किया जाए।

*प्रशासन का जनप्रतिनिधियों से हो बेहतर संवाद, प्रतिदिन सुनी जाए आमजन की समस्याएं*
मा० मुख्यमंत्री जी ने समीक्षा बैठक में कहा कि गोवंश संरक्षण स्थल को और सुदृढ़ किया जाए। सभी स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हों और गोवंश की नियमित गणना हो। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विधानसभा तुलसीपुर और गैसड़ी में सीएम कंपोजिट विद्यालय दिए जाएंगे। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधियों, आमजन, विभिन्न संस्थाओं से प्रशासन का बेहतर संवाद हो। सभी अधिकारी प्रतिदिन जनसुनवाई करें एवं आमजन की समस्या एवं शिकायत का समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित करें।

*स्कूल चलो अभियान की तैयारी में जुटें, बच्चों को मिल जाए ड्रेस, बैग, किताब*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ हो रहा है। सभी बच्चों को ड्रेस, बैग, किताबें, जूते-मोजे आदि उपलब्ध करा दिया जाए और स्कूल चलो अभियान की तैयारियां से समय से पूर्ण कर ली जाएं। आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर व्यवस्था हो।  शिक्षा एवं स्वास्थ्य में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर हो। मरीजों को जनपद में ही बेहतर इलाज मिले, उन्हें अन्य जनपदों में न जाना पड़े।

मुख्यमंत्री  ने सभी विभागों की समीक्षा कर जानी प्रगति*
मा० मुख्यमंत्री जी को जनपद में महिलाओं एवं बच्चों के पोषण सुधार के लिए प्रोजेक्ट संवर्धन, असंक्रमणीय भूमि को संक्रमणीय भूमिधर घोषित किए जाने के अभियान, अवैध अतिक्रमण, थारू जनजाति क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर विद्युतीकरण एवं संपर्क मार्ग बनाए जाने, आगामी सीजन हेतु सहकारी समितियां पर ऑनलाइन माध्यम से उर्वरक वितरण, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के उन्नयन,  जारवा ईको टूरिज्म के विकास आदि के बारे में अवगत कराया गया। मा ०मुख्यमंत्री जी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान, सीएम युवा स्वरोजगार योजना, नए औद्योगिक क्षेत्र के विकास, जल जीवन मिशन,  निर्माणाधीन परियोजनाओं, रिंग रोड का निर्माण, 100 बेड के क्रिटिकल केयर यूनिट, नगर पालिका में एसटीपी का निर्माण, सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायत पेयजल पुनर्गठन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, सीमावर्ती क्षेत्र में थारू जनजाति एवं अन्य परिवारों को योजनाओं से संतृप्त किए जाने, एनआरएलएम, ऑपरेशन कायाकल्प, गो संरक्षण,  टीकाकरण,  ईयर टैगिंग, पौधरोपण, आईजीआरएस समेत समस्त बिंदुओं पर समीक्षा की गई।

बैठक में मा० विधायक बलरामपुर पल्टूराम, मा० विधायक तुलसीपुर श्री कैलाश नाथ शुक्ल, मा० विधायक उतरौला श्री राम प्रताप वर्मा, मा० जिला पंचायत अध्यक्ष सुश्री आरती तिवारी, मा० विधान परिषद सदस्य श्री साकेत मिश्र, श्री अवधेश कुमार सिंह, मा० चेयरमैन नगर पालिका बलरामपुर श्री धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धीरू’, जिलाध्यक्ष श्री रवि मिश्रा, अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष, कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह, आयुक्त श्री शशि भूषण लाल सुशील, एडीजी श्री अशोक मुथा जैन, जिलाधिकारी श्री विपिन कुमार जैन, मुख्य विकास अधिकारी श्री हिमांशु गुप्ता, पुलिस अधीक्षक श्री विकास कुमार व अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
केवल पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और आदर्श भी बने शिक्षक:BSA मनीष कुमार सिंह
संजीव कुमार सिंह बलिया!राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण के प्रथम बैच का उद्घाटन करते हुए प्राचार्य /उप शिक्षा निदेशक मनीष कुमार सिंह द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारंभ किया गया। इस प्रशिक्षण में शिक्षा क्षेत्र बेलहरी,बैरिया, मनियर, पंदह,मुरली छपरा,,रेवती,बेरुअरबारी और नगरा के 12-12 शिक्षकों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है जो आज दिनांक 11 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 13 मार्च 2026 तक आयोजित होना है। सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण के प्रभारी डायट प्रवक्ता डॉक्टर मृत्युंजय सिंह एवं इस प्रशिक्षण के नोडल रवि रंजन खरे द्वारा पंजीकरण के उपरांत शिक्षकों को पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। प्रवक्ता जानू राम द्वारा अपने उद्बोधन में बताया गया कि शिक्षा केवल ज्ञान या सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मानव निर्माण की एक सतत श्रृंखला है। यदि शिक्षा में मूल्य का समावेश नहीं होता तो यह केवल कौशल और तकनीकी दक्षता तक ही सीमित रह जाती, ऐसे में समाज की भौतिक प्रगति तो होती किंतु नैतिक पतन और संवेदनहीनता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है ।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब वह विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ ही भावनात्मक एवं नैतिक विकास में भी योगदान करें। प्रशिक्षण के नोडल रविरंजन खरे द्वारा आह्वान किया गया कि आज का समय वैज्ञानिक प्रगति, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण की है ।विद्यार्थियों के सामने और असंख्य अवसर तो आते हैं परंतु जीवन में तनाव ,नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं ।ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि जीवन को सार्थक और संतुलित बनाना भी होना चाहिए ।मूल्य आधारित इस प्रशिक्षण में हम सभी मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नैतिक शक्ति को प्राप्त कर सकेंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। डायट प्रवक्ता किरण सिंह द्वारा शिक्षकों के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक होने की बात बताई गई जिसमें शिक्षण में मूल्य का समावेश करने ,उनका दृष्टिकोण और अधिक समानुभूतिपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने की दिशा में समय-समय पर मूल्य आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया। डायट प्रवक्ता अविनाश सिंह द्वारा कंप्यूटर का शिक्षा में प्रयोग तथा उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की गई और बताया गया की शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनाती है ।यह एक ऐसे प्रकाश पुंज के समान है जो मनुष्य के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण करते हुए एक जिम्मेदार नैतिक एवं मूल्य आधारित नागरिक बनाती है जिससे देश और समाज की उन्नति एवं विकास में अपना अहम योगदान दिया जा सके। इस प्रशिक्षण में प्रतिभाग़ कर रहे बेलहरी शिक्षा क्षेत्र के अध्यापक, पूर्व एकेडमिक पर्सन डॉक्टर शशि भूषण मिश्र द्वारा बताया गया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय ,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है जिन्हें अपनाकर शिक्षक अपने आप में सशक्त बन सकता है तथा कक्षाओं में आत्मसात कराकर समाज की नई रूप रेखा का निर्माण कर सकता है जिस पर आगे चलकर सहिष्णुतापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक वातावरण का सृजन किया जा सकता है। डायट प्रवक्ता डॉ जितेंद्र गुप्ता द्वारा बताया गया कि शिक्षक भविष्य निर्माता है तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों में रोपित मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बनकर हमारे समाज को मानवीय गरिमा एवं न्याय की शीतल छाव प्रदान करेगा। तकनीकी सहयोग अमित कुमार चौहान तथा चंदन मिश्रा द्वारा प्रदान किया गया।
कल्पा पंचायत के बाजार टाली गांव में निशुल्क नेत्र जांच शिविर, 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को मिला मुफ्त चश्मा
जहानाबाद। जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत कल्पा पंचायत के बाजार टाली गांव में ग्लासेस फॉर लाइवलीहुड प्रोजेक्ट के तहत निशुल्क नेत्र जांच एवं चश्मा वितरण शिविर का आयोजन किया गया। यह शिविर डीबीएस और पीसीआई के सहयोग से प्रयत्न नारी शक्ति महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड द्वारा आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ पुनीता कुमारी, संघ की अध्यक्ष नीतू कुमारी तथा समिति के प्रबंधक संदीप कुमार ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। शिविर में करीब 350 महिलाओं ने भाग लेकर अपनी आंखों की जांच करवाई। इस मौके पर समिति के एफडीई संतोष कुमार ने बताया कि इस शिविर का मुख्य उद्देश्य 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं की आंखों की जांच कर उन्हें मुफ्त चश्मा उपलब्ध कराना है। जांच के बाद जिन महिलाओं को देखने में समस्या पाई गई, उन्हें मौके पर ही निशुल्क चश्मा दिया गया, जिससे महिलाओं के बीच खुशी का माहौल देखा गया।
उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाएं घरेलू कामकाज में व्यस्त रहने के कारण अपनी सेहत, खासकर आंखों की समस्या को नजरअंदाज कर देती हैं। अक्सर महिलाएं धुंधला दिखाई देने या आंखों की कमजोरी को सामान्य थकान समझकर अनदेखा कर देती हैं और समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पातीं। संस्था द्वारा ऐसे ही महिलाओं की मदद के लिए गांव-गांव में शिविर लगाकर उनकी आंखों की जांच की जाती है और जरूरतमंद महिलाओं को मुफ्त चश्मा उपलब्ध कराया जाता है। यदि किसी महिला की आंखों में गंभीर समस्या पाई जाती है, तो उसे आगे की जांच के लिए जहानाबाद सदर अस्पताल जाने की सलाह दी जाती है। संस्था का उद्देश्य महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। इसके साथ ही यह संगठन महिलाओं को बकरी पालन, मुर्गी पालन, सिलाई-कढ़ाई और ब्यूटीशियन प्रशिक्षण जैसे छोटे-छोटे रोजगार से जोड़ने का भी काम कर रहा है, ताकि महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। इस शिविर में समिति की लेखपाल रुक्मिणी देवी, चंद्रकांत, दीपक कुमार, गायत्री देवी, नीलू देवी, बसंती देवी, चिंता देवी सहित कई लोग मौजूद रहे और कार्यक्रम के सफल संचालन में सहयोग किया। ग्रामीण महिलाओं ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के शिविर से उन्हें काफी लाभ मिल रहा है और अब वे अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हो रही हैं।
लखनऊ में कमर्शियल गैस का संकट गहराया, बड़े होटल-रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में कमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी का असर अब होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है। गैस की आपूर्ति बाधित होने के कारण कई बड़े होटल और रेस्टोरेंट संचालकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही गैस उपलब्ध नहीं हुई तो उन्हें अपने प्रतिष्ठान बंद करने पड़ सकते हैं।
रेस्टोरेंट संचालकों का कहना है कि गैस एजेंसियों पर सिलेंडर उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एजेंसी संचालकों के अनुसार फिलहाल कमर्शियल गैस की आपूर्ति नहीं हो पा रही है, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है।
होटल और रेस्टोरेंट मालिकों का कहना है कि बिना गैस के रसोई चलाना संभव नहीं है। उनका कहना है, “गैस ही नहीं मिल रही है तो रेस्टोरेंट कैसे खोलेंगे।” कई संचालकों ने आशंका जताई है कि यदि यही हाल रहा तो कल से कई रेस्टोरेंट अस्थायी रूप से बंद करने पड़ सकते हैं।
व्यापारियों ने सरकार से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि गैस की आपूर्ति जल्द बहाल नहीं हुई तो होटल और रेस्टोरेंट उद्योग को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। साथ ही हजारों कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ने की आशंका है।
रामराज चौकी का चार्ज संभालते ही एक्शन में चौकी प्रभारी आशीष कुमार, बोले— अपराध पर लगेगा सख्त अंकुश
मेरठ/बहसूमा। थाना बहसूमा क्षेत्र की रामराज पुलिस चौकी का चार्ज संभालते ही नव नियुक्त चौकी प्रभारी आशीष कुमार एक्शन मोड में नजर आने लगे हैं। पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अपराध, अवैध गतिविधि या असामाजिक तत्वों की हरकत बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कानून व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना उनकी पहली प्राथमिकता होगी और आम जनता की सुरक्षा के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

चौकी प्रभारी आशीष कुमार ने बताया कि क्षेत्र में पुलिस द्वारा लगातार गश्त बढ़ाई जाएगी और संदिग्ध गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जाएगी। उन्होंने कहा कि अपराधियों और असामाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, ताकि क्षेत्र में शांति और सुरक्षा का माहौल बना रहे। साथ ही बाजारों और संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी।

उन्होंने क्षेत्र की जनता से भी सहयोग की अपील करते हुए कहा कि यदि कहीं भी कोई संदिग्ध गतिविधि या गलत काम दिखाई दे तो तुरंत पुलिस को सूचना दें। पुलिस हर सूचना पर तुरंत और गंभीरता से कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि पुलिस और जनता के आपसी सहयोग से ही क्षेत्र में बेहतर कानून व्यवस्था कायम रखी जा सकती है और अपराध पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकता है।

चौकी प्रभारी आशीष कुमार इससे पहले थाना सरूरपुर में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं, जहां उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कड़ी कार्यशैली और बेहतर पुलिसिंग से पहचान बनाई थी। उनकी ईमानदार और सख्त कार्यशैली की क्षेत्र में पहले से ही मिसाल दी जाती है।

क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि आशीष कुमार के नेतृत्व में रामराज चौकी क्षेत्र में अपराध पर लगाम लगेगी और कानून व्यवस्था पहले स�
*दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास ड्रोन हमला, एक भारतीय समेत 4 लोग घायल

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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच दुबई से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दुबई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (डीएक्सबी) के पास दो ड्रोन गिराए जाने की घटना सामने आई है। इस घटना में एक भारतीय नागरिक सहित कुल चार लोग घायल हो गए।

दुबई मीडिया ऑफिस ने एक्स पर एक बयान में कहा, "दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास अधिकारियों ने दो ड्रोन रोके, जिसमें एक भारतीय नागरिक समेत चार लोग घायल हो गए। इसमें आगे कहा गया, “एयर ट्रैफिक नॉर्मल तरीके से चल रहा है।"

दुबई एयरपोर्ट के नजदीक पहले भी हुआ हमला

अभी तक ये साफ नहीं हुआ है कि ड्रोन ईरान से आए थे या किसी और वजह से गिरे, लेकिन जंग के चलते इलाके में ईरानी ड्रोन और मिसाइल अटैक्स की वजह से सिक्योरिटी अलर्ट बहुत हाई है। यूएई के एयर डिफेंस सिस्टम ने पिछले कुछ घंटों में कई ड्रोन और मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया है। दरअसल, ईरान ने पहले भी दुबई एयरपोर्ट के नजदीक हमले किए थे। इसके अलावा शहर के रिहायशी इलाकों में हमले हुए थे।

ईरान ने गल्फ देशों में काउंटर अटैक्स

ये घटना ऐसे समय पर हुई है जब ईरान ने गल्फ देशों यानी यूएई, सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत पर काउंटर अटैक्स तेज कर दिए हैं। अबू धाबी के रुवैस रिफाइनरी में भी ड्रोन हमले से आग लगी थी और उसे बंद करना पड़ा था। ईरान ने अपने इलाके में यूएस और इजरायल के हमलों का जवाब यूनाइटेड अरब अमीरात, बहरीन, कतर और दूसरे खाड़ी देशों पर मिसाइलों और ड्रोन की बौछार करके दिया है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हुआ है और तेल प्रोडक्शन में रुकावट आई है।

यूएई में भारतीयों के लिए एडवाइजरी

भारत सरकार ने यूएई में रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी भी जारी की है। दुबई और अबू धाबी में रहने वाले भारतीयों को अलर्ट रहने और लोकल अथॉरिटीज के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी जा रही है। अगर कोई भारतीय नागरिक प्रभावित हुआ है, तो भारतीय दूतावास दुबई (+971-4-3971222) या अबू धाबी (+971-2-4492700) से संपर्क करें।

मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच गहराया LPG का संकट, देशभर से सिलेंडर सप्‍लाई प्रभावित

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अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान की जंग का असर भारत के करोड़ों लोगों पर पड़ता दिख रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर अब भारत में एलपीजी और गैस सप्लाई पर भी दिखाई देने लगा है। पश्चिम एशिया में जारी इस युद्ध के बीच उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर तेलंगाना और तमिलनाडु तक लाखों लोग एलपीजी सिलेंडर की किल्लत से जूझ रहे हैं।

कई राज्यों में एलपीजी की किल्लत

अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के कारण राजधानी दिल्ली, यूपी और हरियाणा सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में एलपीजी की किल्लत होने लगी है। गैस सिलेंडर भरवाने को लेकर मारामारी शुरू हो गई है। लखनऊ समेत कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं।

गैस सिलेंडर भरवाकर जमा करने लगे लोग

कई जगह घरेलू आपूर्ति तो अभी सामान्य है, लेकिन वाणिज्यिक गैस सिलेंडरों को लेकर परेशानी बढ़ रही है। यह स्थिति इसलिए भी है कि लोग आशंका में पहले से ही गैस सिलेंडर भरवाकर जमा करने लगे हैं। व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति सीमित होने से दिल्ली में 50 हजार से अधिक रेस्तरां, पब, बार और होटलों के संचालन में दिक्कतें आने लगी हैं।

गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लेकर अधिसूचना

पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण भारत की एक-तिहाई गैस आपूर्ति बाधित होने के बीच पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक गजट अधिसूचना जारी कर गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को मिलने वाली गैस प्रमुख उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं और परिवहन क्षेत्र के लिए निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक गैस के आवंटन में बदलाव किया है। इसके तहत एलपीजी उत्पादन, सीएनजी और पाइप से मिलने वाली रसोई गैस (पीएनजी) को अन्य सभी क्षेत्रों पर प्राथमिकता दी जाएगी।

गैस की परेशानी से रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को करोड़ों का नुकसान

देश में एलपीजी की किल्लत के कारण रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को जबरदस्त नुकसान हो रहा है। कई रेस्टोरेंट अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं। नेशनल रेस्टोरेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष और रेस्टोरेंट कारोबारी जोरावर कालरा ने कहा कि अगर एलपीजी सिलेंडरआपूर्ति में कमी जारी रही तो रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को रोजाना 1200 से 1300 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।

भारत में एलपीजी की कितनी खपत?

बता दें कि भारत एलपीजी का बड़ा उपभोक्ता है। देश में हर साल लगभग 31.2 मिलियन टन (करीब 3.13 करोड़ टन) एलपीजी की खपत होती है। इसमें से लगभग 60 प्रतिशत गैस का आयात किया जाता है, जबकि करीब 40 प्रतिशत यानी लगभग 12.4 मिलियन टन एलपीजी का उत्पादन देश में ही किया जाता है। घरेलू उपयोग में 14 किलोग्राम वाले सिलेंडर की हिस्सेदारी लगभग 87 प्रतिशत है, जबकि कमर्शियल सेक्टर में 19 किलोग्राम वाले सिलेंडर की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत है।

किन देशों से आता है एलपीजी?

भारत की एलपीजी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। कुल आयात में लगभग 80 प्रतिशत गैस इसी क्षेत्र से मिलती है। यूएई से लगभग 26 प्रतिशत, कतर से 22 प्रतिशत और सउदी अबर से करीब 22 प्रतिशत एलपीजी आती है, जबकि बाकी 33 प्रतिशत अन्य देशों से आयात की जाती है। भारत में कितने उपभोक्ता मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 33.08 करोड़ सक्रिय एलपीजी उपभोक्ता हैं।

ईरान युद्ध की वजह से सप्लाई चेन प्रभावित

ईरान युद्ध की वजह से भारत में पेट्रोलियम पदार्थों का सप्लाई चेन प्रभावित हो रहा है। केंद्र सरकार घरेलू गैस और ईंधन की सप्लाई चेन बरकरार रखने के लिए कई तरह के सकारात्मक और सख्त कदम उठा रही है। आम जनता पर इसका सीधा असर न पड़े इसके लिए वह आवश्यत वस्तु अधिनियन (ईसीए) भी लागू कर चुकी है। फिर भी एलएनजी और एलपीजी की किल्लत से देश में ऑद्योगिक क्षेत्र प्रभावित होने लगे हैं।

स्नेहा दुबे पंडित ने विधानसभा में उठाए वसई के विकास के महत्वपूर्ण मुद्दे
मुंबई । महाराष्ट्र विधानसभा में वर्ष 2025–26 के बजट पर चर्चा के दौरान वसई की विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने सक्रिय भागीदारी करते हुए क्षेत्र के विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में प्रस्तुत बजट आम जनता के विकास को नई दिशा देने वाला है।इस दौरान उन्होंने वसई में MIDC और IT हब की स्थापना, वसई उपजिला अस्पताल के लिए 114 करोड़ रुपये की मंजूरी, पंचायत समिति भवन के लिए 24 करोड़ रुपये, पुलिस क्वार्टर्स और प्रशासनिक भवन निर्माण की मांग की। साथ ही वसई की सड़कों के लिए 25 करोड़ रुपये और नायगांव पुल के लिए 5 करोड़ रुपये की निधि मंजूर करने पर सरकार का आभार जताया।विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने कहा कि यह बजट किसानों, महिलाओं, युवाओं और आम नागरिकों के विकास को गति देने वाला है।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
मोहनलालगंज दोहरा हत्याकांड: मुठभेड़ में गिरफ्तार हुआ हत्यारोपी किशन रावत, पैर में गोली लगने से दबोचा
लखनऊ। राजधानी के मोहनलालगंज क्षेत्र में मां-बेटे की सनसनीखेज हत्या करने वाले आरोपी को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया। सिसेंडी गांव निवासी आरोपी किशन रावत को पुलिस ने बुधवार रात बाजखेड़ा–हुलासखेड़ा ईंट भट्ठे के पास से घेराबंदी कर दबोचा। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी के पैर में गोली लग गई, जिसके बाद उसे घायल अवस्था में हिरासत में लेकर अस्पताल भेजा गया। आरोपी के कब्जे से 315 बोर का अवैध तमंचा, दो कारतूस और एक कारतूस तमंचे में फंसा हुआ बरामद हुआ है।

सोमवार की रात मां-बेटे की कर दी गई थी हत्या

पुलिस के मुताबिक, सोमवार रात मोहनलालगंज थाना क्षेत्र के सिसेंडी गांव में 50 वर्षीय रेशमा बानो और उनके 18 वर्षीय दृष्टिहीन बेटे शादाब की गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बदमाश की तलाश में चार पुलिस टीमों का गठन किया गया।डीसीपी दक्षिणी निपुण अग्रवाल ने बताया कि जांच और साक्ष्य जुटाने के दौरान स्थानीय निवासी किशन रावत का नाम सामने आया। इसके बाद इंस्पेक्टर मोहनलालगंज ब्रजेश कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में पुलिस टीम आरोपी की तलाश में जुट गई।

आरोपी लखनऊ से बाहर भागने की फिराक में था

बुधवार को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपी हुलासखेड़ा से खुजौली की ओर नहर किनारे रास्ते से भागने की फिराक में है। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और घेराबंदी कर आरोपी को पकड़ने का प्रयास किया। इस दौरान बदमाश ने पुलिस टीम पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी, जिससे एक सिपाही घायल हो गया। पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की, जिसमें आरोपी किशन रावत के पैर में गोली लग गई और वह घायल होकर गिर पड़ा।पुलिस ने आरोपी को मौके से गिरफ्तार कर लिया और घायल सिपाही व आरोपी को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोहनलालगंज भेजा गया। पुलिस के अनुसार आरोपी के पास से घटना में प्रयुक्त अवैध तमंचा और कारतूस बरामद किए गए हैं।

सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी की हुई पहचान

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी सोमवार रात घर में घुस गया था और रेशमा बानो पर गलत नजर डालने लगा। इस दौरान महिला और उसके दृष्टिहीन बेटे शादाब ने विरोध किया। पहचान उजागर होने के डर से आरोपी ने दोनों की गला घोंटकर हत्या कर दी और मौके से फरार हो गया।घटना के बाद पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, जिसमें आरोपी का चेहरा कैद हो गया। इसी फुटेज के आधार पर पुलिस ने आरोपी की पहचान कर उसका पीछा किया और आखिरकार मुठभेड़ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया।इस मामले में पीड़िता के भाई की तहरीर पर थाना मोहनलालगंज में मुकदमा संख्या 92/26 धारा 103(1) बीएनएस के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस आरोपी के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई कर रही है।
चैत्र नवरात्रि को लेकर समय से पूर्ण करें सभी तैयारीः मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलरामपुर मंडल की समीक्षा बैठक कर दिए आवश्यक निर्देश* 

*बोले- देवीपाटन शक्तिपीठ में उमड़ते हैं श्रद्धालु, सुरक्षा-सुविधा, स्वच्छता पर रहे विशेष जोर* 

*सभी अधिकारी प्रतिदिन करें जनसुनवाई, आमजन की समस्याओं एवं शिकायतों का समयसीमा के अंदर हो उचित निस्तारणः मा० मुख्यमंत्री जी*

*सुनिश्चित हो-छांगुर जैसा कोई व्यक्ति दोबारा न पनपे, ग्राम चौकीदारों को किया जाए सक्रिय, सभी जानकारी की जाए साझाः मा० सीएम*



बलरामपुर ।मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश शासन योगी आदित्यनाथ जी ने बुधवार को जनपद में समीक्षा बैठक की। मा० मुख्यमंत्री जी ने विकास कार्यों, कानून व्यवस्था एवं चैत्र नवरात्रि मेला की तैयारियों को लेकर आवश्यक निर्देश भी दिए। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ होने जा रही है। चैत्र नवरात्रि मेले में देवीपाटन मंदिर शक्तिपीठ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आमगन होता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुगम दर्शन, पेयजल, स्वच्छता, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिए कि नवरात्र पर मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों के आसपास विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाए तथा आवश्यकतानुसार अतिरिक्त स्वच्छताकर्मी तैनात किए जाएं। मा० मुख्यमंत्री जी ने जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से तैयारियों की जानकारी भी प्राप्त की।

*मा० मुख्यमत्री जी का सख्त निर्देश- छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कानून व्यवस्था की समीक्षा के दौरान कहा कि हर थाना क्षेत्र में संस्थाओं के आसपास एंटी रोमियो स्क्वॉड तैनात रहे। शोहदों, चेन स्नेचरों आदि के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। ऐसे लोगों की फोटो सार्वजनिक स्थलों और सोशल मीडिया पर लगाई जाए। बॉर्डर एरिया पर पुलिस एवं बीएसएफ की संयुक्त निगरानी हो। नवधनाढ्यों की संपत्ति की जांच कराई जाए। मा० मुख्यमत्री जी ने प्रशासन व पुलिस को सख्त निर्देश दिया कि छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे। ग्राम चौकीदारों को सक्रिय किया जाए, सभी जानकारी साझा की जाए। जिला मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक नियमित हो। सभी अपराधियों को कानून के तहत सजा दिलाई जाए, जिससे उनमें कानून का भय हो।

*अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जाए सरकार की योजनाएं*
मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मां पाटेश्वरी राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण में तेजी लाकर इसे मई तक पूर्ण किया जाए। यूनिवर्सिटी को रिसर्च सेंटर के तौर पर भी विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में थारू जनजाति एवं अन्य परिवार को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से संतृप्त किया जाए। थारू जनजाति क्षेत्र में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं को पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत प्रशिक्षण कराया जाए। राजस्व वादों, पैमाइश एवं विरासत के निस्तारण में तेजी लाई जाए।

*प्राथमिकता से हो व्यापारियों की समस्याओं का निस्तारण*
मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मेडिकल कॉलेज में सभी औपचारिकता पूर्ण करते हुए नए सत्र में  पढ़ाई के लिए आवेदन करें। शीघ्र मेडिकल की पढ़ाई शुरू कराई जाएगी। बाढ़ से बचाव के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी जाए।  नदियों,  पहाड़ी नालों के ड्रेनेज-चैनलाइज का कार्य समय से पूर्ण किया जाए। महिलाओं एवं बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही विशेष योजनाओं (मातृ वंदना योजना,  कन्या सुमंगला योजना, सामूहिक विवाह आदि) का लाभ हर पात्र को मिलना चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि जिला उद्योग बंधु एवं व्यापारी बंधुओं की नियमित बैठकें हों और उनकी समस्याओं का प्राथमिकता से निस्तारण किया जाए।

*प्रशासन का जनप्रतिनिधियों से हो बेहतर संवाद, प्रतिदिन सुनी जाए आमजन की समस्याएं*
मा० मुख्यमंत्री जी ने समीक्षा बैठक में कहा कि गोवंश संरक्षण स्थल को और सुदृढ़ किया जाए। सभी स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हों और गोवंश की नियमित गणना हो। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विधानसभा तुलसीपुर और गैसड़ी में सीएम कंपोजिट विद्यालय दिए जाएंगे। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधियों, आमजन, विभिन्न संस्थाओं से प्रशासन का बेहतर संवाद हो। सभी अधिकारी प्रतिदिन जनसुनवाई करें एवं आमजन की समस्या एवं शिकायत का समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित करें।

*स्कूल चलो अभियान की तैयारी में जुटें, बच्चों को मिल जाए ड्रेस, बैग, किताब*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ हो रहा है। सभी बच्चों को ड्रेस, बैग, किताबें, जूते-मोजे आदि उपलब्ध करा दिया जाए और स्कूल चलो अभियान की तैयारियां से समय से पूर्ण कर ली जाएं। आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर व्यवस्था हो।  शिक्षा एवं स्वास्थ्य में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर हो। मरीजों को जनपद में ही बेहतर इलाज मिले, उन्हें अन्य जनपदों में न जाना पड़े।

मुख्यमंत्री  ने सभी विभागों की समीक्षा कर जानी प्रगति*
मा० मुख्यमंत्री जी को जनपद में महिलाओं एवं बच्चों के पोषण सुधार के लिए प्रोजेक्ट संवर्धन, असंक्रमणीय भूमि को संक्रमणीय भूमिधर घोषित किए जाने के अभियान, अवैध अतिक्रमण, थारू जनजाति क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर विद्युतीकरण एवं संपर्क मार्ग बनाए जाने, आगामी सीजन हेतु सहकारी समितियां पर ऑनलाइन माध्यम से उर्वरक वितरण, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के उन्नयन,  जारवा ईको टूरिज्म के विकास आदि के बारे में अवगत कराया गया। मा ०मुख्यमंत्री जी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान, सीएम युवा स्वरोजगार योजना, नए औद्योगिक क्षेत्र के विकास, जल जीवन मिशन,  निर्माणाधीन परियोजनाओं, रिंग रोड का निर्माण, 100 बेड के क्रिटिकल केयर यूनिट, नगर पालिका में एसटीपी का निर्माण, सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायत पेयजल पुनर्गठन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, सीमावर्ती क्षेत्र में थारू जनजाति एवं अन्य परिवारों को योजनाओं से संतृप्त किए जाने, एनआरएलएम, ऑपरेशन कायाकल्प, गो संरक्षण,  टीकाकरण,  ईयर टैगिंग, पौधरोपण, आईजीआरएस समेत समस्त बिंदुओं पर समीक्षा की गई।

बैठक में मा० विधायक बलरामपुर पल्टूराम, मा० विधायक तुलसीपुर श्री कैलाश नाथ शुक्ल, मा० विधायक उतरौला श्री राम प्रताप वर्मा, मा० जिला पंचायत अध्यक्ष सुश्री आरती तिवारी, मा० विधान परिषद सदस्य श्री साकेत मिश्र, श्री अवधेश कुमार सिंह, मा० चेयरमैन नगर पालिका बलरामपुर श्री धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धीरू’, जिलाध्यक्ष श्री रवि मिश्रा, अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष, कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह, आयुक्त श्री शशि भूषण लाल सुशील, एडीजी श्री अशोक मुथा जैन, जिलाधिकारी श्री विपिन कुमार जैन, मुख्य विकास अधिकारी श्री हिमांशु गुप्ता, पुलिस अधीक्षक श्री विकास कुमार व अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
केवल पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और आदर्श भी बने शिक्षक:BSA मनीष कुमार सिंह
संजीव कुमार सिंह बलिया!राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण के प्रथम बैच का उद्घाटन करते हुए प्राचार्य /उप शिक्षा निदेशक मनीष कुमार सिंह द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारंभ किया गया। इस प्रशिक्षण में शिक्षा क्षेत्र बेलहरी,बैरिया, मनियर, पंदह,मुरली छपरा,,रेवती,बेरुअरबारी और नगरा के 12-12 शिक्षकों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है जो आज दिनांक 11 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 13 मार्च 2026 तक आयोजित होना है। सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण के प्रभारी डायट प्रवक्ता डॉक्टर मृत्युंजय सिंह एवं इस प्रशिक्षण के नोडल रवि रंजन खरे द्वारा पंजीकरण के उपरांत शिक्षकों को पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। प्रवक्ता जानू राम द्वारा अपने उद्बोधन में बताया गया कि शिक्षा केवल ज्ञान या सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मानव निर्माण की एक सतत श्रृंखला है। यदि शिक्षा में मूल्य का समावेश नहीं होता तो यह केवल कौशल और तकनीकी दक्षता तक ही सीमित रह जाती, ऐसे में समाज की भौतिक प्रगति तो होती किंतु नैतिक पतन और संवेदनहीनता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है ।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब वह विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ ही भावनात्मक एवं नैतिक विकास में भी योगदान करें। प्रशिक्षण के नोडल रविरंजन खरे द्वारा आह्वान किया गया कि आज का समय वैज्ञानिक प्रगति, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण की है ।विद्यार्थियों के सामने और असंख्य अवसर तो आते हैं परंतु जीवन में तनाव ,नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं ।ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि जीवन को सार्थक और संतुलित बनाना भी होना चाहिए ।मूल्य आधारित इस प्रशिक्षण में हम सभी मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नैतिक शक्ति को प्राप्त कर सकेंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। डायट प्रवक्ता किरण सिंह द्वारा शिक्षकों के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक होने की बात बताई गई जिसमें शिक्षण में मूल्य का समावेश करने ,उनका दृष्टिकोण और अधिक समानुभूतिपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने की दिशा में समय-समय पर मूल्य आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया। डायट प्रवक्ता अविनाश सिंह द्वारा कंप्यूटर का शिक्षा में प्रयोग तथा उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की गई और बताया गया की शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनाती है ।यह एक ऐसे प्रकाश पुंज के समान है जो मनुष्य के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण करते हुए एक जिम्मेदार नैतिक एवं मूल्य आधारित नागरिक बनाती है जिससे देश और समाज की उन्नति एवं विकास में अपना अहम योगदान दिया जा सके। इस प्रशिक्षण में प्रतिभाग़ कर रहे बेलहरी शिक्षा क्षेत्र के अध्यापक, पूर्व एकेडमिक पर्सन डॉक्टर शशि भूषण मिश्र द्वारा बताया गया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय ,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है जिन्हें अपनाकर शिक्षक अपने आप में सशक्त बन सकता है तथा कक्षाओं में आत्मसात कराकर समाज की नई रूप रेखा का निर्माण कर सकता है जिस पर आगे चलकर सहिष्णुतापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक वातावरण का सृजन किया जा सकता है। डायट प्रवक्ता डॉ जितेंद्र गुप्ता द्वारा बताया गया कि शिक्षक भविष्य निर्माता है तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों में रोपित मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बनकर हमारे समाज को मानवीय गरिमा एवं न्याय की शीतल छाव प्रदान करेगा। तकनीकी सहयोग अमित कुमार चौहान तथा चंदन मिश्रा द्वारा प्रदान किया गया।
कल्पा पंचायत के बाजार टाली गांव में निशुल्क नेत्र जांच शिविर, 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को मिला मुफ्त चश्मा
जहानाबाद। जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत कल्पा पंचायत के बाजार टाली गांव में ग्लासेस फॉर लाइवलीहुड प्रोजेक्ट के तहत निशुल्क नेत्र जांच एवं चश्मा वितरण शिविर का आयोजन किया गया। यह शिविर डीबीएस और पीसीआई के सहयोग से प्रयत्न नारी शक्ति महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड द्वारा आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ पुनीता कुमारी, संघ की अध्यक्ष नीतू कुमारी तथा समिति के प्रबंधक संदीप कुमार ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। शिविर में करीब 350 महिलाओं ने भाग लेकर अपनी आंखों की जांच करवाई। इस मौके पर समिति के एफडीई संतोष कुमार ने बताया कि इस शिविर का मुख्य उद्देश्य 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं की आंखों की जांच कर उन्हें मुफ्त चश्मा उपलब्ध कराना है। जांच के बाद जिन महिलाओं को देखने में समस्या पाई गई, उन्हें मौके पर ही निशुल्क चश्मा दिया गया, जिससे महिलाओं के बीच खुशी का माहौल देखा गया।
उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाएं घरेलू कामकाज में व्यस्त रहने के कारण अपनी सेहत, खासकर आंखों की समस्या को नजरअंदाज कर देती हैं। अक्सर महिलाएं धुंधला दिखाई देने या आंखों की कमजोरी को सामान्य थकान समझकर अनदेखा कर देती हैं और समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पातीं। संस्था द्वारा ऐसे ही महिलाओं की मदद के लिए गांव-गांव में शिविर लगाकर उनकी आंखों की जांच की जाती है और जरूरतमंद महिलाओं को मुफ्त चश्मा उपलब्ध कराया जाता है। यदि किसी महिला की आंखों में गंभीर समस्या पाई जाती है, तो उसे आगे की जांच के लिए जहानाबाद सदर अस्पताल जाने की सलाह दी जाती है। संस्था का उद्देश्य महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। इसके साथ ही यह संगठन महिलाओं को बकरी पालन, मुर्गी पालन, सिलाई-कढ़ाई और ब्यूटीशियन प्रशिक्षण जैसे छोटे-छोटे रोजगार से जोड़ने का भी काम कर रहा है, ताकि महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। इस शिविर में समिति की लेखपाल रुक्मिणी देवी, चंद्रकांत, दीपक कुमार, गायत्री देवी, नीलू देवी, बसंती देवी, चिंता देवी सहित कई लोग मौजूद रहे और कार्यक्रम के सफल संचालन में सहयोग किया। ग्रामीण महिलाओं ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के शिविर से उन्हें काफी लाभ मिल रहा है और अब वे अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हो रही हैं।
लखनऊ में कमर्शियल गैस का संकट गहराया, बड़े होटल-रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में कमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी का असर अब होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है। गैस की आपूर्ति बाधित होने के कारण कई बड़े होटल और रेस्टोरेंट संचालकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही गैस उपलब्ध नहीं हुई तो उन्हें अपने प्रतिष्ठान बंद करने पड़ सकते हैं।
रेस्टोरेंट संचालकों का कहना है कि गैस एजेंसियों पर सिलेंडर उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एजेंसी संचालकों के अनुसार फिलहाल कमर्शियल गैस की आपूर्ति नहीं हो पा रही है, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है।
होटल और रेस्टोरेंट मालिकों का कहना है कि बिना गैस के रसोई चलाना संभव नहीं है। उनका कहना है, “गैस ही नहीं मिल रही है तो रेस्टोरेंट कैसे खोलेंगे।” कई संचालकों ने आशंका जताई है कि यदि यही हाल रहा तो कल से कई रेस्टोरेंट अस्थायी रूप से बंद करने पड़ सकते हैं।
व्यापारियों ने सरकार से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि गैस की आपूर्ति जल्द बहाल नहीं हुई तो होटल और रेस्टोरेंट उद्योग को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। साथ ही हजारों कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ने की आशंका है।
रामराज चौकी का चार्ज संभालते ही एक्शन में चौकी प्रभारी आशीष कुमार, बोले— अपराध पर लगेगा सख्त अंकुश
मेरठ/बहसूमा। थाना बहसूमा क्षेत्र की रामराज पुलिस चौकी का चार्ज संभालते ही नव नियुक्त चौकी प्रभारी आशीष कुमार एक्शन मोड में नजर आने लगे हैं। पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अपराध, अवैध गतिविधि या असामाजिक तत्वों की हरकत बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कानून व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना उनकी पहली प्राथमिकता होगी और आम जनता की सुरक्षा के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

चौकी प्रभारी आशीष कुमार ने बताया कि क्षेत्र में पुलिस द्वारा लगातार गश्त बढ़ाई जाएगी और संदिग्ध गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जाएगी। उन्होंने कहा कि अपराधियों और असामाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, ताकि क्षेत्र में शांति और सुरक्षा का माहौल बना रहे। साथ ही बाजारों और संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी।

उन्होंने क्षेत्र की जनता से भी सहयोग की अपील करते हुए कहा कि यदि कहीं भी कोई संदिग्ध गतिविधि या गलत काम दिखाई दे तो तुरंत पुलिस को सूचना दें। पुलिस हर सूचना पर तुरंत और गंभीरता से कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि पुलिस और जनता के आपसी सहयोग से ही क्षेत्र में बेहतर कानून व्यवस्था कायम रखी जा सकती है और अपराध पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकता है।

चौकी प्रभारी आशीष कुमार इससे पहले थाना सरूरपुर में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं, जहां उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कड़ी कार्यशैली और बेहतर पुलिसिंग से पहचान बनाई थी। उनकी ईमानदार और सख्त कार्यशैली की क्षेत्र में पहले से ही मिसाल दी जाती है।

क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि आशीष कुमार के नेतृत्व में रामराज चौकी क्षेत्र में अपराध पर लगाम लगेगी और कानून व्यवस्था पहले स�
*दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास ड्रोन हमला, एक भारतीय समेत 4 लोग घायल

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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच दुबई से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दुबई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (डीएक्सबी) के पास दो ड्रोन गिराए जाने की घटना सामने आई है। इस घटना में एक भारतीय नागरिक सहित कुल चार लोग घायल हो गए।

दुबई मीडिया ऑफिस ने एक्स पर एक बयान में कहा, "दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास अधिकारियों ने दो ड्रोन रोके, जिसमें एक भारतीय नागरिक समेत चार लोग घायल हो गए। इसमें आगे कहा गया, “एयर ट्रैफिक नॉर्मल तरीके से चल रहा है।"

दुबई एयरपोर्ट के नजदीक पहले भी हुआ हमला

अभी तक ये साफ नहीं हुआ है कि ड्रोन ईरान से आए थे या किसी और वजह से गिरे, लेकिन जंग के चलते इलाके में ईरानी ड्रोन और मिसाइल अटैक्स की वजह से सिक्योरिटी अलर्ट बहुत हाई है। यूएई के एयर डिफेंस सिस्टम ने पिछले कुछ घंटों में कई ड्रोन और मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया है। दरअसल, ईरान ने पहले भी दुबई एयरपोर्ट के नजदीक हमले किए थे। इसके अलावा शहर के रिहायशी इलाकों में हमले हुए थे।

ईरान ने गल्फ देशों में काउंटर अटैक्स

ये घटना ऐसे समय पर हुई है जब ईरान ने गल्फ देशों यानी यूएई, सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत पर काउंटर अटैक्स तेज कर दिए हैं। अबू धाबी के रुवैस रिफाइनरी में भी ड्रोन हमले से आग लगी थी और उसे बंद करना पड़ा था। ईरान ने अपने इलाके में यूएस और इजरायल के हमलों का जवाब यूनाइटेड अरब अमीरात, बहरीन, कतर और दूसरे खाड़ी देशों पर मिसाइलों और ड्रोन की बौछार करके दिया है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हुआ है और तेल प्रोडक्शन में रुकावट आई है।

यूएई में भारतीयों के लिए एडवाइजरी

भारत सरकार ने यूएई में रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी भी जारी की है। दुबई और अबू धाबी में रहने वाले भारतीयों को अलर्ट रहने और लोकल अथॉरिटीज के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी जा रही है। अगर कोई भारतीय नागरिक प्रभावित हुआ है, तो भारतीय दूतावास दुबई (+971-4-3971222) या अबू धाबी (+971-2-4492700) से संपर्क करें।

मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच गहराया LPG का संकट, देशभर से सिलेंडर सप्‍लाई प्रभावित

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अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान की जंग का असर भारत के करोड़ों लोगों पर पड़ता दिख रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर अब भारत में एलपीजी और गैस सप्लाई पर भी दिखाई देने लगा है। पश्चिम एशिया में जारी इस युद्ध के बीच उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर तेलंगाना और तमिलनाडु तक लाखों लोग एलपीजी सिलेंडर की किल्लत से जूझ रहे हैं।

कई राज्यों में एलपीजी की किल्लत

अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के कारण राजधानी दिल्ली, यूपी और हरियाणा सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में एलपीजी की किल्लत होने लगी है। गैस सिलेंडर भरवाने को लेकर मारामारी शुरू हो गई है। लखनऊ समेत कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं।

गैस सिलेंडर भरवाकर जमा करने लगे लोग

कई जगह घरेलू आपूर्ति तो अभी सामान्य है, लेकिन वाणिज्यिक गैस सिलेंडरों को लेकर परेशानी बढ़ रही है। यह स्थिति इसलिए भी है कि लोग आशंका में पहले से ही गैस सिलेंडर भरवाकर जमा करने लगे हैं। व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति सीमित होने से दिल्ली में 50 हजार से अधिक रेस्तरां, पब, बार और होटलों के संचालन में दिक्कतें आने लगी हैं।

गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लेकर अधिसूचना

पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण भारत की एक-तिहाई गैस आपूर्ति बाधित होने के बीच पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक गजट अधिसूचना जारी कर गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को मिलने वाली गैस प्रमुख उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं और परिवहन क्षेत्र के लिए निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक गैस के आवंटन में बदलाव किया है। इसके तहत एलपीजी उत्पादन, सीएनजी और पाइप से मिलने वाली रसोई गैस (पीएनजी) को अन्य सभी क्षेत्रों पर प्राथमिकता दी जाएगी।

गैस की परेशानी से रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को करोड़ों का नुकसान

देश में एलपीजी की किल्लत के कारण रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को जबरदस्त नुकसान हो रहा है। कई रेस्टोरेंट अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं। नेशनल रेस्टोरेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष और रेस्टोरेंट कारोबारी जोरावर कालरा ने कहा कि अगर एलपीजी सिलेंडरआपूर्ति में कमी जारी रही तो रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को रोजाना 1200 से 1300 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।

भारत में एलपीजी की कितनी खपत?

बता दें कि भारत एलपीजी का बड़ा उपभोक्ता है। देश में हर साल लगभग 31.2 मिलियन टन (करीब 3.13 करोड़ टन) एलपीजी की खपत होती है। इसमें से लगभग 60 प्रतिशत गैस का आयात किया जाता है, जबकि करीब 40 प्रतिशत यानी लगभग 12.4 मिलियन टन एलपीजी का उत्पादन देश में ही किया जाता है। घरेलू उपयोग में 14 किलोग्राम वाले सिलेंडर की हिस्सेदारी लगभग 87 प्रतिशत है, जबकि कमर्शियल सेक्टर में 19 किलोग्राम वाले सिलेंडर की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत है।

किन देशों से आता है एलपीजी?

भारत की एलपीजी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। कुल आयात में लगभग 80 प्रतिशत गैस इसी क्षेत्र से मिलती है। यूएई से लगभग 26 प्रतिशत, कतर से 22 प्रतिशत और सउदी अबर से करीब 22 प्रतिशत एलपीजी आती है, जबकि बाकी 33 प्रतिशत अन्य देशों से आयात की जाती है। भारत में कितने उपभोक्ता मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 33.08 करोड़ सक्रिय एलपीजी उपभोक्ता हैं।

ईरान युद्ध की वजह से सप्लाई चेन प्रभावित

ईरान युद्ध की वजह से भारत में पेट्रोलियम पदार्थों का सप्लाई चेन प्रभावित हो रहा है। केंद्र सरकार घरेलू गैस और ईंधन की सप्लाई चेन बरकरार रखने के लिए कई तरह के सकारात्मक और सख्त कदम उठा रही है। आम जनता पर इसका सीधा असर न पड़े इसके लिए वह आवश्यत वस्तु अधिनियन (ईसीए) भी लागू कर चुकी है। फिर भी एलएनजी और एलपीजी की किल्लत से देश में ऑद्योगिक क्षेत्र प्रभावित होने लगे हैं।

स्नेहा दुबे पंडित ने विधानसभा में उठाए वसई के विकास के महत्वपूर्ण मुद्दे
मुंबई । महाराष्ट्र विधानसभा में वर्ष 2025–26 के बजट पर चर्चा के दौरान वसई की विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने सक्रिय भागीदारी करते हुए क्षेत्र के विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में प्रस्तुत बजट आम जनता के विकास को नई दिशा देने वाला है।इस दौरान उन्होंने वसई में MIDC और IT हब की स्थापना, वसई उपजिला अस्पताल के लिए 114 करोड़ रुपये की मंजूरी, पंचायत समिति भवन के लिए 24 करोड़ रुपये, पुलिस क्वार्टर्स और प्रशासनिक भवन निर्माण की मांग की। साथ ही वसई की सड़कों के लिए 25 करोड़ रुपये और नायगांव पुल के लिए 5 करोड़ रुपये की निधि मंजूर करने पर सरकार का आभार जताया।विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने कहा कि यह बजट किसानों, महिलाओं, युवाओं और आम नागरिकों के विकास को गति देने वाला है।