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सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बड़ी सिफारिश, जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती बनेंगे तेलंगाना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस

*नई दिल्ली, 27 अक्टूबर:* सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने देश के 4 हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर बड़ा फैसला लिया है। कॉलेजियम ने कलकत्ता हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती को तेलंगाना हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की है।

सोमवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक के बाद यह सिफारिश की गई। कॉलेजियम द्वारा जारी सूची के अनुसार कुल 4 हाईकोर्ट में नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है।

*किसे कहाँ भेजने की सिफारिश?*

1.  *जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती:* वर्तमान में कलकत्ता हाईकोर्ट में कार्यरत हैं, इन्हें *तेलंगाना हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।
2.  *जस्टिस सुधीर सिंह:* पटना हाईकोर्ट के जज हैं, इन्हें *उत्तराखंड हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।
3.  *जस्टिस मानस रंजन पाठक:* वर्तमान में गुजरात हाईकोर्ट में कार्यरत हैं, इन्हें *गुजरात हाईकोर्ट का ही चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।
4.  *जस्टिस पी. साम कोशि:* तेलंगाना हाईकोर्ट के जज हैं, इन्हें *दिल्ली हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।

*कलकत्ता हाईकोर्ट से पुराना नाता*

गौरतलब है कि जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती कलकत्ता हाईकोर्ट के एक अनुभवी और वरिष्ठ न्यायाधीश हैं। वर्तमान चीफ जस्टिस रविन्द्र वी. घुगे के स्थायी चीफ जस्टिस के तौर पर नियुक्त होने से पहले, जस्टिस चक्रवर्ती ने कई महीनों तक कलकत्ता हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting Chief Justice) के रूप में कार्यभार संभाला था। उनके कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले आए थे।
भारत के लोकतंत्र में 'CJP मॉडल' का आंदोलन अप्रासंगिक, पीछे विदेशी ताकतों की छाया !
अमित दास
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र की नींव कोई आयातित सिद्धांत नहीं है, इसकी नींव हजारों साल की सहिष्णुता, सह-अस्तित्व और संवैधानिक मूल्यों पर टिकी है। हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में Citizens for Justice and Peace या CJP के नाम पर जिस तरह के आंदोलन, प्रचार और न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है, उस पर गंभीरता से सोचने का समय आ गया है। क्या इस मॉडल का आंदोलन वास्तव में भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए प्रासंगिक है? या इसके पीछे किसी बड़ी विदेशी ताकत की सोची-समझी साजिश काम कर रही है?
सबसे पहले यह समझना होगा कि CJP मॉडल क्या है? इस मॉडल की मुख्य विशेषता है - एक विशेष समुदाय को 'विक्टिम' के रूप में स्थापित करना, राज्य को हमेशा 'अत्याचारी' के रूप में पेश करना, देश की आंतरिक सामाजिक समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाकर भारत की छवि खराब करना और विदेशी अनुदान से पोषित होकर देश की न्याय व्यवस्था और प्रशासन पर लगातार दबाव बनाना। ये सीधे जनता के बीच जाकर काम नहीं करते, ये काम करते हैं कुछ अंग्रेजी जानने वाले एनजीओ, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विदेशी लॉबी के माध्यम से।
भारत का लोकतंत्र इस मॉडल के बिल्कुल विपरीत है। यहां 140 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व है। यहां सुप्रीम कोर्ट से लेकर ग्राम पंचायत तक हर स्तर पर जवाबदेही की व्यवस्था है। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसके लिए संविधान द्वारा दिया गया रास्ता है - थाना, अदालत, मानवाधिकार आयोग। CJP जैसे संगठन उस संवैधानिक रास्ते पर भरोसा न करके सीधे विदेशी संसद, अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्ट या जिनेवा की मानवाधिकार परिषद में भारत के खिलाफ शिकायत करते हैं। क्या यह देश की न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास नहीं है?
दूसरे, इस आंदोलन की अर्थव्यवस्था को देखिए। कई जांचों में सामने आया है कि इस तरह के संगठनों का अधिकांश पैसा फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन जैसी विदेशी संस्थाओं से आता है, जिनका भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप का इतिहास बहुत पुराना है। जब किसी आंदोलन का खर्च विदेशी ताकतें चलाती हैं, तो उसका एजेंडा भी विदेश में ही तय होता है। भारत जैसे एक संप्रभु राष्ट्र में, जहां चुनावों के माध्यम से सरकार बदलती है, वहां विदेशी पैसे से पोषित होकर सरकार के खिलाफ जनमत बनाने की कोशिश लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
तीसरे, यह CJP मॉडल भारत की सामाजिक वास्तविकता को नकारता है। भारत में समस्याएं हैं, दंगे, जात-पात, भेदभाव है - हम इनकार नहीं करते। लेकिन भारत का समाधान भी भारत की मिट्टी से ही निकलता है। रामकृष्ण-विवेकानंद से लेकर गांधीजी, अंबेडकर से लेकर आज के सुप्रीम कोर्ट तक - भारत ने अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही किया है। बाहर से 'जस्टिस' और 'पीस' का ज्ञान आयात करने की हमें जरूरत नहीं है। CJP मॉडल भारत को हमेशा एक कमजोर, विभाजित राष्ट्र के रूप में दिखाना चाहता है, जो 75 साल के लोकतांत्रिक भारत की सफलता को नकारता है।
याद रखना होगा, भारत के लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार सभी को है। किसान आंदोलन हुआ है, छात्र आंदोलन हुआ है - वे मिट्टी के आंदोलन थे, देश के लोगों के आंदोलन थे। लेकिन CJP का आंदोलन मिट्टी का नहीं है, यह डॉक्यूमेंट और डॉलर का आंदोलन है। ये गांव में जाकर लोगों के साथ खड़े नहीं होते, ये दिल्ली के पांच सितारा होटलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं।
इसलिए, अब यह सवाल उठाने का समय आ गया है - जो लोग भारत के लोकतंत्र को कमजोर दिखाना चाहते हैं, क्या वे ही भारत के उदय से डर रहे हैं? जो भारत आज G-20 की अध्यक्षता कर रहा है, चांद पर जा रहा है, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है, उसे रोकने के लिए क्या मानवाधिकारों के मुखौटे के पीछे इस CJP मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है?
भारत की जनता जागरूक है। वह बाहरी उकसावे में भ्रमित नहीं होगी। सरकार को भी चाहिए कि FCRA कानून को और सख्ती से लागू करे और इस तरह के विदेशी अनुदान से चलने वाले संगठनों की पारदर्शिता सुनिश्चित करे। लोकतंत्र में आलोचना तो रहेगी ही, लेकिन वह आलोचना देश के हितों को बेचकर, विदेशी ताकतों की कठपुतली बनकर नहीं की जा सकती।
( यह लेखक के अपने विचार हैं।)
जस्टिस एसपी शर्मा कौन हैं, क्यों हटाने की मांग, जानें क्या बोले-CJI सूर्य कांत?

#justicespsharmarajasthanhighcourtallegationscjisuryakantstand

राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के भीतर उठे सवाल अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत से राजस्थान हाई कोर्ट में तत्काल किसी दूसरे राज्य से नियमित मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का आग्रह किया है। उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा पर गंभीर प्रशासनिक अनियमितताओं, मामलों की सेलेक्टिव लिस्टिंग और प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग के आरोप लगाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने लगाए गंभीर आरोप

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत को तीन अलग-अलग चिट्ठियां लिखकर जस्टिस शर्मा के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। इन पत्रों में प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग से लेकर केस लिस्टिंग में हेरफेर तक के आरोप हैं। जस्टिस मेहता ने 2, 10 और 17 अगस्त को लिखी चिट्ठियों में जस्टिस शर्मा के कामकाज को लेकर कई चिंताएं जताईं। उन्होंने दावा किया कि राजस्थान हाईकोर्ट के कुछ जजों ने उनसे मुलाकात के दौरान जस्टिस शर्मा के व्यवहार को लेकर अपनी नाराजगी और चिंता जाहिर की थी। आरोपों में साथी जजों को ट्रांसफर जैसी कार्रवाई की कथित धमकी देने और सीजेआई से करीबी का दावा करने जैसी बातें भी शामिल हैं। एक शिकायत में हाईकोर्ट में नियुक्तियों और केस लिस्टिंग से जुड़े फैसलों पर भी सवाल उठाए गए हैं।

फैसला मीडिया के जरिए नहीं दिया जा सकता-सीजेआई

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत ने कल बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता की ओर से राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा पर लगाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हमने चिंताओं पर ध्यान दिया है। पद पर मौजूद जज के खिलाफ ऐसे आरोपों से “स्थापित संस्थागत प्रक्रियाओं के जरिए सख्ती से” निपटा जाना चाहिए। साथ ही यह भी कहा कि कोई भी फैसला मीडिया के जरिए नहीं दिया जा सकता है।

कौन हैं चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा

जस्टिस शर्मा नवंबर 2016 में राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस बने थे। जनवरी 2022 में उनका तबादला पटना हाई कोर्ट किया गया। राजस्थान वापसी का उनका अनुरोध मार्च 2023 में कॉलेजियम ने स्वीकार नहीं किया और उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट भेजा गया। बाद में मई 2025 में कॉलेजियम ने उनकी राजस्थान वापसी की सिफारिश की। सितंबर 2025 से न्यायमूर्ति शर्मा कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। वह सितंबर 2025 से इस पद पर हैं और अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

CJI सूर्यकांत ने UAPA कानून पर कही बड़ी बात, उमर खालिद जैसे मामलों मे देरी पर दिया ये जवाब

#cjijusticesuryakantonuapadelhiriotscase

दिल्ली दंगों और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत जेल में बंद उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों के ट्रायल में हो रही देरी के बीच सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बड़ा बयान दिया है।

यूएपीए मामले पर न्यायिक स्तर पर ध्यान देने की जरूरत

चीफ जस्टिस सूर्यकांत शनिवार को राजधानी दिल्ली में भारतीय मध्यस्थता एवं सुलह संस्थान के रजत जयंती समारोह में बोल रहे थे। इस दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने UAPA के साथ ही सुनवाई में लेट-लतीफी पर अपनी राय रखी। किसी खास मामले या आरोपी का जिक्र किए बिना, सीजेआई ने कहा कि यूएपीए एक ऐसा मामला है जिस पर न्यायिक स्तर पर ध्यान देने की जरूरत है।

मामलों का शीघ्र निपटारा ही विवाद का प्रभावी समाधान-सीजेआई

देश में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत दर्ज मामलों के लंबा खिंचने पर अक्‍सर ही सवाल उठते रहते हैं। खासकर दिल्ली दंगा मामलों में लंबित ट्रायल और लंबे समय से विचाराधीन कैदियों को जमानत नहीं मिलने को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठे हैं। इन सबके बीच सीजेआई सूर्यकांत ने कहा है कि ऐसे मामलों का शीघ्र निपटारा ही इस विवाद का सबसे प्रभावी समाधान है।

विशेष अदालतों से बढ़ी उम्मीदें

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि इस समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। उन्होंने बताया कि न्यायिक प्रक्रिया के जरिये केंद्र सरकार को यूएपीए, पीएमएलए और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टेंसेज (एनडीपीएस) कानून से जुड़े मामलों की सुवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने के लिए प्रेरित किया गया है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने इस दिशा में सहमति जताई है और इन कानूनों के तहत मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सीजेआई के अनुसार, यदि इन अदालतों के माध्यम से मुकदमों का निपटारा एक वर्ष के भीतर या यथासंभव शीघ्र किया जा सके, तो लंबे समय तक विचाराधीन कैद और जमानत से जुड़े विवाद स्वतः समाप्त हो जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बड़ी सिफारिश, जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती बनेंगे तेलंगाना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस

*नई दिल्ली, 27 अक्टूबर:* सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने देश के 4 हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर बड़ा फैसला लिया है। कॉलेजियम ने कलकत्ता हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती को तेलंगाना हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की है।

सोमवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक के बाद यह सिफारिश की गई। कॉलेजियम द्वारा जारी सूची के अनुसार कुल 4 हाईकोर्ट में नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है।

*किसे कहाँ भेजने की सिफारिश?*

1.  *जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती:* वर्तमान में कलकत्ता हाईकोर्ट में कार्यरत हैं, इन्हें *तेलंगाना हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।
2.  *जस्टिस सुधीर सिंह:* पटना हाईकोर्ट के जज हैं, इन्हें *उत्तराखंड हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।
3.  *जस्टिस मानस रंजन पाठक:* वर्तमान में गुजरात हाईकोर्ट में कार्यरत हैं, इन्हें *गुजरात हाईकोर्ट का ही चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।
4.  *जस्टिस पी. साम कोशि:* तेलंगाना हाईकोर्ट के जज हैं, इन्हें *दिल्ली हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस* बनाने की सिफारिश।

*कलकत्ता हाईकोर्ट से पुराना नाता*

गौरतलब है कि जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती कलकत्ता हाईकोर्ट के एक अनुभवी और वरिष्ठ न्यायाधीश हैं। वर्तमान चीफ जस्टिस रविन्द्र वी. घुगे के स्थायी चीफ जस्टिस के तौर पर नियुक्त होने से पहले, जस्टिस चक्रवर्ती ने कई महीनों तक कलकत्ता हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting Chief Justice) के रूप में कार्यभार संभाला था। उनके कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले आए थे।
भारत के लोकतंत्र में 'CJP मॉडल' का आंदोलन अप्रासंगिक, पीछे विदेशी ताकतों की छाया !
अमित दास
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र की नींव कोई आयातित सिद्धांत नहीं है, इसकी नींव हजारों साल की सहिष्णुता, सह-अस्तित्व और संवैधानिक मूल्यों पर टिकी है। हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में Citizens for Justice and Peace या CJP के नाम पर जिस तरह के आंदोलन, प्रचार और न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है, उस पर गंभीरता से सोचने का समय आ गया है। क्या इस मॉडल का आंदोलन वास्तव में भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए प्रासंगिक है? या इसके पीछे किसी बड़ी विदेशी ताकत की सोची-समझी साजिश काम कर रही है?
सबसे पहले यह समझना होगा कि CJP मॉडल क्या है? इस मॉडल की मुख्य विशेषता है - एक विशेष समुदाय को 'विक्टिम' के रूप में स्थापित करना, राज्य को हमेशा 'अत्याचारी' के रूप में पेश करना, देश की आंतरिक सामाजिक समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाकर भारत की छवि खराब करना और विदेशी अनुदान से पोषित होकर देश की न्याय व्यवस्था और प्रशासन पर लगातार दबाव बनाना। ये सीधे जनता के बीच जाकर काम नहीं करते, ये काम करते हैं कुछ अंग्रेजी जानने वाले एनजीओ, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विदेशी लॉबी के माध्यम से।
भारत का लोकतंत्र इस मॉडल के बिल्कुल विपरीत है। यहां 140 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व है। यहां सुप्रीम कोर्ट से लेकर ग्राम पंचायत तक हर स्तर पर जवाबदेही की व्यवस्था है। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसके लिए संविधान द्वारा दिया गया रास्ता है - थाना, अदालत, मानवाधिकार आयोग। CJP जैसे संगठन उस संवैधानिक रास्ते पर भरोसा न करके सीधे विदेशी संसद, अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्ट या जिनेवा की मानवाधिकार परिषद में भारत के खिलाफ शिकायत करते हैं। क्या यह देश की न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास नहीं है?
दूसरे, इस आंदोलन की अर्थव्यवस्था को देखिए। कई जांचों में सामने आया है कि इस तरह के संगठनों का अधिकांश पैसा फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन जैसी विदेशी संस्थाओं से आता है, जिनका भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप का इतिहास बहुत पुराना है। जब किसी आंदोलन का खर्च विदेशी ताकतें चलाती हैं, तो उसका एजेंडा भी विदेश में ही तय होता है। भारत जैसे एक संप्रभु राष्ट्र में, जहां चुनावों के माध्यम से सरकार बदलती है, वहां विदेशी पैसे से पोषित होकर सरकार के खिलाफ जनमत बनाने की कोशिश लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
तीसरे, यह CJP मॉडल भारत की सामाजिक वास्तविकता को नकारता है। भारत में समस्याएं हैं, दंगे, जात-पात, भेदभाव है - हम इनकार नहीं करते। लेकिन भारत का समाधान भी भारत की मिट्टी से ही निकलता है। रामकृष्ण-विवेकानंद से लेकर गांधीजी, अंबेडकर से लेकर आज के सुप्रीम कोर्ट तक - भारत ने अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही किया है। बाहर से 'जस्टिस' और 'पीस' का ज्ञान आयात करने की हमें जरूरत नहीं है। CJP मॉडल भारत को हमेशा एक कमजोर, विभाजित राष्ट्र के रूप में दिखाना चाहता है, जो 75 साल के लोकतांत्रिक भारत की सफलता को नकारता है।
याद रखना होगा, भारत के लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार सभी को है। किसान आंदोलन हुआ है, छात्र आंदोलन हुआ है - वे मिट्टी के आंदोलन थे, देश के लोगों के आंदोलन थे। लेकिन CJP का आंदोलन मिट्टी का नहीं है, यह डॉक्यूमेंट और डॉलर का आंदोलन है। ये गांव में जाकर लोगों के साथ खड़े नहीं होते, ये दिल्ली के पांच सितारा होटलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं।
इसलिए, अब यह सवाल उठाने का समय आ गया है - जो लोग भारत के लोकतंत्र को कमजोर दिखाना चाहते हैं, क्या वे ही भारत के उदय से डर रहे हैं? जो भारत आज G-20 की अध्यक्षता कर रहा है, चांद पर जा रहा है, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है, उसे रोकने के लिए क्या मानवाधिकारों के मुखौटे के पीछे इस CJP मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है?
भारत की जनता जागरूक है। वह बाहरी उकसावे में भ्रमित नहीं होगी। सरकार को भी चाहिए कि FCRA कानून को और सख्ती से लागू करे और इस तरह के विदेशी अनुदान से चलने वाले संगठनों की पारदर्शिता सुनिश्चित करे। लोकतंत्र में आलोचना तो रहेगी ही, लेकिन वह आलोचना देश के हितों को बेचकर, विदेशी ताकतों की कठपुतली बनकर नहीं की जा सकती।
( यह लेखक के अपने विचार हैं।)
जस्टिस एसपी शर्मा कौन हैं, क्यों हटाने की मांग, जानें क्या बोले-CJI सूर्य कांत?

#justicespsharmarajasthanhighcourtallegationscjisuryakantstand

राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के भीतर उठे सवाल अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत से राजस्थान हाई कोर्ट में तत्काल किसी दूसरे राज्य से नियमित मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का आग्रह किया है। उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा पर गंभीर प्रशासनिक अनियमितताओं, मामलों की सेलेक्टिव लिस्टिंग और प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग के आरोप लगाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने लगाए गंभीर आरोप

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत को तीन अलग-अलग चिट्ठियां लिखकर जस्टिस शर्मा के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। इन पत्रों में प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग से लेकर केस लिस्टिंग में हेरफेर तक के आरोप हैं। जस्टिस मेहता ने 2, 10 और 17 अगस्त को लिखी चिट्ठियों में जस्टिस शर्मा के कामकाज को लेकर कई चिंताएं जताईं। उन्होंने दावा किया कि राजस्थान हाईकोर्ट के कुछ जजों ने उनसे मुलाकात के दौरान जस्टिस शर्मा के व्यवहार को लेकर अपनी नाराजगी और चिंता जाहिर की थी। आरोपों में साथी जजों को ट्रांसफर जैसी कार्रवाई की कथित धमकी देने और सीजेआई से करीबी का दावा करने जैसी बातें भी शामिल हैं। एक शिकायत में हाईकोर्ट में नियुक्तियों और केस लिस्टिंग से जुड़े फैसलों पर भी सवाल उठाए गए हैं।

फैसला मीडिया के जरिए नहीं दिया जा सकता-सीजेआई

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत ने कल बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता की ओर से राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा पर लगाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हमने चिंताओं पर ध्यान दिया है। पद पर मौजूद जज के खिलाफ ऐसे आरोपों से “स्थापित संस्थागत प्रक्रियाओं के जरिए सख्ती से” निपटा जाना चाहिए। साथ ही यह भी कहा कि कोई भी फैसला मीडिया के जरिए नहीं दिया जा सकता है।

कौन हैं चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा

जस्टिस शर्मा नवंबर 2016 में राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस बने थे। जनवरी 2022 में उनका तबादला पटना हाई कोर्ट किया गया। राजस्थान वापसी का उनका अनुरोध मार्च 2023 में कॉलेजियम ने स्वीकार नहीं किया और उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट भेजा गया। बाद में मई 2025 में कॉलेजियम ने उनकी राजस्थान वापसी की सिफारिश की। सितंबर 2025 से न्यायमूर्ति शर्मा कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। वह सितंबर 2025 से इस पद पर हैं और अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

CJI सूर्यकांत ने UAPA कानून पर कही बड़ी बात, उमर खालिद जैसे मामलों मे देरी पर दिया ये जवाब

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दिल्ली दंगों और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत जेल में बंद उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों के ट्रायल में हो रही देरी के बीच सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बड़ा बयान दिया है।

यूएपीए मामले पर न्यायिक स्तर पर ध्यान देने की जरूरत

चीफ जस्टिस सूर्यकांत शनिवार को राजधानी दिल्ली में भारतीय मध्यस्थता एवं सुलह संस्थान के रजत जयंती समारोह में बोल रहे थे। इस दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने UAPA के साथ ही सुनवाई में लेट-लतीफी पर अपनी राय रखी। किसी खास मामले या आरोपी का जिक्र किए बिना, सीजेआई ने कहा कि यूएपीए एक ऐसा मामला है जिस पर न्यायिक स्तर पर ध्यान देने की जरूरत है।

मामलों का शीघ्र निपटारा ही विवाद का प्रभावी समाधान-सीजेआई

देश में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत दर्ज मामलों के लंबा खिंचने पर अक्‍सर ही सवाल उठते रहते हैं। खासकर दिल्ली दंगा मामलों में लंबित ट्रायल और लंबे समय से विचाराधीन कैदियों को जमानत नहीं मिलने को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठे हैं। इन सबके बीच सीजेआई सूर्यकांत ने कहा है कि ऐसे मामलों का शीघ्र निपटारा ही इस विवाद का सबसे प्रभावी समाधान है।

विशेष अदालतों से बढ़ी उम्मीदें

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि इस समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। उन्होंने बताया कि न्यायिक प्रक्रिया के जरिये केंद्र सरकार को यूएपीए, पीएमएलए और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टेंसेज (एनडीपीएस) कानून से जुड़े मामलों की सुवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने के लिए प्रेरित किया गया है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने इस दिशा में सहमति जताई है और इन कानूनों के तहत मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सीजेआई के अनुसार, यदि इन अदालतों के माध्यम से मुकदमों का निपटारा एक वर्ष के भीतर या यथासंभव शीघ्र किया जा सके, तो लंबे समय तक विचाराधीन कैद और जमानत से जुड़े विवाद स्वतः समाप्त हो जाएंगे।