Katihar

Sep 09 2019, 18:41

कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिंदुओ द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम।
 


पूर्वजो द्वारा किये गये वादे को निभाते हुए कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिन्दू के द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम, हसनगंज प्रखंड के मोहमदिया हरिपुर गांव के सौहार्द के मिसाल पेश करता इस मोहर्रम की चर्चा पुरे बिहार में है, एक रिपोर्ट ,,,,,

झरनी के गीत और तमाम रीत के साथ मोहर्रम मनाते यह हिन्दू समुदाय के लोग है, बड़ी बात यह है की लगभग 5 किलो मीटर के आबादी तक इस गांव में एक भी अल्पसंख्यक परिवार नहीं है, मगर 100 सालो से भी अधिक समय से इस गांव में हर साल मातम का पर्व मोहर्रम पुरे रीत रिवाज के साथ मनाया जाता है, स्वर्गीय छेदी साह के मजार से जुड़े इस मोहर्रम की कहानी भी बड़ी ही दिलचस्प है, ग्रामीणों की माने तो यह जमीन वकाली मियाँ का था, मगर बीमारी से उनके बेटो के मौत के बाद वह इस जमीन को छोड़ कर जाने लगे लेकिन उससे पहले छेदी साह को जमीन देते हुए उन्होंने वादा लिया की ग्रामीण मोहर्रम के दौरान पुरे रीत रिवाज के साथ मोहर्रम मनायेगे, बस पूर्वजो के इसी वायदे को पूरा करते हुए आज भी इस गांव में हिन्दू समुदाय के लोगों के द्वारा मोहर्रम मनाया जाता है। ग्रामीण महिला द्रोपदी देवी कहती है की जब से शादी हो कर वह इस गांव में आई है तब से वह इसमें रीत रिवाज निभाने में सहयोग करती है, अब नव विवाहिता भी गांव के इस रीत को निभाने के लिए आगे आने लगी है, जो काफी सुखद है।

ग्रामीण प्रतिनिधि भी इस मोहर्रम को पुरे बिहार के लिए सौहार्द का मिसाल पेश करता एक उम्दा उदहारण मानते है, उनलोगो की माने तो इससे आपसी सौहार्द बढ़ने के साथ -साथ गावं सुख, शांति और समृद्धि भी आई है।

सौहार्द का मिसाल पेश करता यह मोहर्रम वाकई बेहद खास है, एक तरफ जहां इसमें अपने पूर्वजो द्वारा किये गए वादे को निभाने के लिए लोगों की भावना की झलक दिखती है वहीं दूसरे धर्म के परंपराओं का सम्मान करने की सिख भी मिलती है।

Katihar

Sep 09 2019, 18:41

कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिंदुओ द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम।
 


पूर्वजो द्वारा किये गये वादे को निभाते हुए कटिहार में 100 सालो से भी अधिक समय से हिन्दू के द्वारा मनाया जा रहा है मातम का पर्व मुहर्रम, हसनगंज प्रखंड के मोहमदिया हरिपुर गांव के सौहार्द के मिसाल पेश करता इस मोहर्रम की चर्चा पुरे बिहार में है, एक रिपोर्ट ,,,,,

झरनी के गीत और तमाम रीत के साथ मोहर्रम मनाते यह हिन्दू समुदाय के लोग है, बड़ी बात यह है की लगभग 5 किलो मीटर के आबादी तक इस गांव में एक भी अल्पसंख्यक परिवार नहीं है, मगर 100 सालो से भी अधिक समय से इस गांव में हर साल मातम का पर्व मोहर्रम पुरे रीत रिवाज के साथ मनाया जाता है, स्वर्गीय छेदी साह के मजार से जुड़े इस मोहर्रम की कहानी भी बड़ी ही दिलचस्प है, ग्रामीणों की माने तो यह जमीन वकाली मियाँ का था, मगर बीमारी से उनके बेटो के मौत के बाद वह इस जमीन को छोड़ कर जाने लगे लेकिन उससे पहले छेदी साह को जमीन देते हुए उन्होंने वादा लिया की ग्रामीण मोहर्रम के दौरान पुरे रीत रिवाज के साथ मोहर्रम मनायेगे, बस पूर्वजो के इसी वायदे को पूरा करते हुए आज भी इस गांव में हिन्दू समुदाय के लोगों के द्वारा मोहर्रम मनाया जाता है। ग्रामीण महिला द्रोपदी देवी कहती है की जब से शादी हो कर वह इस गांव में आई है तब से वह इसमें रीत रिवाज निभाने में सहयोग करती है, अब नव विवाहिता भी गांव के इस रीत को निभाने के लिए आगे आने लगी है, जो काफी सुखद है।

ग्रामीण प्रतिनिधि भी इस मोहर्रम को पुरे बिहार के लिए सौहार्द का मिसाल पेश करता एक उम्दा उदहारण मानते है, उनलोगो की माने तो इससे आपसी सौहार्द बढ़ने के साथ -साथ गावं सुख, शांति और समृद्धि भी आई है।

सौहार्द का मिसाल पेश करता यह मोहर्रम वाकई बेहद खास है, एक तरफ जहां इसमें अपने पूर्वजो द्वारा किये गए वादे को निभाने के लिए लोगों की भावना की झलक दिखती है वहीं दूसरे धर्म के परंपराओं का सम्मान करने की सिख भी मिलती है।