फतेहपुर में बंद कमरे में मां-बेटे और देवर की रहस्यमयी मौत, सुसाइड नोट मिलने से कर्ज का एंगल आया सामने
फतेहपुर। फतेहपुर जिले के Lucknow Bypass Road स्थित एक मकान में मां-बेटे और देवर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से इलाके में सनसनी फैल गई। घटना Sadar Kotwali क्षेत्र की है, जहां सुशील श्रीवास्तव के मकान में रहने वाले परिवार के तीन सदस्यों के शव बंद कमरे में मिले। पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।जानकारी के मुताबिक कमरे में मां और बेटे के शव खून से लथपथ हालत में मिले, जबकि कुछ दूरी पर महिला का देवर गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़ा था। उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी भी मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही इलाके में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुट गई।

व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख का कर्ज हो गया था

बताया जा रहा है कि परिवार मूल रूप से मुराइनटोला का रहने वाला था और कुछ साल पहले ही लखनऊ बाईपास क्षेत्र में मकान बनाकर रहने लगा था। परिवार का इकलौता बेटा अमर श्रीवास्तव सरल स्वभाव का था और कई अखबारों की एजेंसी का काम कर चुका था। हालांकि व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख रुपये का कर्ज हो गया था। कर्ज के दबाव में उसका घर भी बिक गया था और लंबे समय तक परिवार कर्जदारों से बचने के लिए छिपकर रह रहा था।

पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला

परिजनों के अनुसार अमर हाल के दिनों में लोगों से रुपये उधार मांग रहा था। उसने घटना से एक दिन पहले अपने एक दोस्त से 10 हजार रुपये उधार लिए थे और होली के आसपास अपने बहनोई से भी 10 हजार रुपये लिए थे। अमर के बहनोई ने तीनों की मौत को आत्महत्या मानने से इनकार करते हुए हत्या की आशंका जताई है।पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें तीन लोगों के नाम का जिक्र करते हुए आर्थिक तंगी और कर्ज से परेशान होने की बात लिखी गई है। सुसाइड नोट के आधार पर पुलिस उन लोगों की तलाश में जुट गई है। एसओजी और इंटेलिजेंस विंग की टीम भी मामले की जांच कर रही है।मौके से चाय के झूठे गिलास और ब्लेड का पैकेट भी बरामद हुआ है।

तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया

आशंका जताई जा रही है कि तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया और बाद में तड़पने पर ब्लेड से खुद पर वार किया। हालांकि यह भी संभावना जताई जा रही है कि तीनों के बीच आपसी विवाद के बाद हमला हुआ हो, जिसमें देवर ने मां-बेटे की हत्या कर खुद की जान ले ली हो।फिलहाल पुलिस दो पहलुओं—हत्या और सामूहिक आत्महत्या—दोनों को ध्यान में रखकर जांच कर रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि मौत जहर से हुई या ब्लेड से हुए हमले से। सुसाइड नोट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी।
गो रक्षा और सनातन के लिए नई रणनीति, शंकराचार्य ने किया चतुरंगिणी सेना
लखनऊ। गो रक्षा और सनातन धर्म की रक्षा के मुद्दे पर बुधवार को राजधानी लखनऊ के कांशीराम स्मृति सांस्कृतिक स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ा ऐलान किया गया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती  ने ‘गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध’ का शंखनाद करते हुए कहा कि धर्म की रक्षा के लिए शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना का गठन किया जाएगा, जो संत समाज में फैल रही अशास्त्रीयता और अधर्म को दूर करने का कार्य करेगी।देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और गो रक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष शपथ नहीं, बल्कि धर्म की शपथ ही चलेगी। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि परिस्थितियां बनीं तो धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई

कार्यक्रम में उन्होंने संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद के कुछ महंतों और साधुओं ने यह कहा कि वे मुख्यमंत्री के साथ हैं, शंकराचार्य के साथ नहीं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यदि अखाड़े साथ नहीं आते हैं तो अब अलग संगठन और सेना बनाकर धर्म की रक्षा की जाएगी।शंकराचार्य ने प्रयागराज में माघ मेले के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वेद पढ़ने वाले बटुकों के साथ अन्याय हुआ, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि गोहत्या केवल कसाई ही नहीं करता, बल्कि जो इसे अनुमति देता है या मौन रहता है, वह भी उसी पाप का भागी है।

यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी

इस दौरान उन्होंने “समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा” निकालने की भी घोषणा की। यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी। यात्रा की शुरुआत गोरखपुर से होगी और वहीं इसका समापन भी होगा। इसके बाद 24 जुलाई को लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल पर एक बड़ी सभा आयोजित की जाएगी।शंकराचार्य ने कहा कि सनातन धर्म में शंकराचार्य सर्वोच्च धार्मिक प्राधिकरण हैं और गो माता की रक्षा के साथ-साथ सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प भी लेना होगा।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
गढ़वा: बंडा पहाड़ पर गूंजा 'हर-हर महादेव', नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन संपन्न

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गढ़वा :- गढ़वा के ग्राम जोबरईया के बंडा पहाड़ स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन भगवान शंकर के रुद्राभिषेक से प्रारंभ हुआ। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार संध्या काल में पावन श्री राम कथा में अयोध्या धाम से पधारे हुए परम पूज्य आचार्य पंकज शांडिल्य जी महाराज ने कथा के तृतीय दिवस में भगवान के पावन जन्म की कथा श्रवण कराया। कथा व्यास जी ने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार पापाचार बढ़ता है, दुष्ट आताताइयो का आतंक बढ़ता है प्रभु विभिन्न स्वरूपों में आकर के राक्षसों का विनाश कर धरती के भार को हल्का करते हैं। परमात्मा निराकार है लेकिन भक्त के भावना के अनुसार समय-समय पर सगुण साकार रूप रखकर इस धरती पर आते हैं। भगवान को धरती पर आने के कई कारण है मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है विप्र,धेनु,सुर,संत हित लीन्ह मनुज अवतार l कार्यक्रम में संगीतमय प्रस्तुतिकरण हेतु साथ दे रहे संगीतकारों ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं का मन मोह लिया। कथा के अंत में वृंदावन से पधारे हुए कलाकारों के

द्वारा सुंदर झांकियां की प्रस्तुति हुई। जिसमें राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के साथ बाल शाखाओं की टोली की प्रस्तुतीकरण ने उपस्थित दर्शकों का मनमोहन लिया। महायज्ञ के यज्ञाधीश आचार्य श्री श्री आशीष वैद्य जी महाराज जी ने कथा व्यास के प्रस्तुतीकरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि व्यास जी एक उद्भट्ट विद्वान है। कथा करने की इनकी गायन शैली काफी रोचक और झांकियां काफी मनोरम है। प्रधान संयोजक श्री राकेश पाल जी ने कहा कि यह महायज्ञ इस धरा धाम को पवित्र करने वाली है इस क्षेत्र के लिए परम सौभाग्य की बात है कि यहां नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का आयोजन हो रहा है।

श्री रुद्र महायज्ञ के अध्यक्ष श्री जितेंद्र कुमार पाल ने अपने सभी सदस्यों को काफी सजग होकर भक्तों के सभी आवश्यक सुविधाओं के प्रति सचेत रहने का सुझाव दिया।

वहीं संपूर्ण कथा के दौरान आज के अतिथि के रूप में गढ़वा प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री नरेंद्र नारायण जी गढ़वा से प्रमुख समाजसेवी पिंटू केसरी जी, विजय केसरीजी कथा मंडपम में विशेष रूप से उपस्थित थे।।

नगर निगम के सदन में महापौर और नगर आयुक्त ने पुनरीक्षित बजट पेश किया
सभासदो ने अपने क्षेत्रो की समस्याओं को गिनाया

वार्डो में अभी तक हुए कार्यो पर हुई चर्चा


संजय द्विवेदी प्रयागराज।नगर निगम में आज महापौर ने बजट पेश किया जिसमें शहर के शहरी क्षेत्र एवं ग्रामीण क्षेत्रो के योजनाओं का लाभ होगा नगर आयुक्त सीलम साई तेजा नगर निगम के अपने अपने सभी विभागों के अधिकारीगण के साथ उपस्थित रहे।सदन में महापौर गणेश केशरवानी और सभी वार्ड के सभासद एवं सभी जोन के अधिकारीगण भी बजट में शामिल हुए इस दौरान नगर निगम के अपने क्षेत्र से आए पार्षदगणों ने अपनी-अपनी बात रखी जिसमें शिकायतो में पेयजल तथा सड़क-नाली निर्माण तथा अतिक्रमण नालो और नालियो की साफ-सफाई  जाम नालियों की समस्या मरम्मत या निर्माण कार्य करने को चबूतरे पेयजल शौचालय/यूरिनल जल की समस्याओ हाउस टैक्स तथा नगर की सड़कों पर सफाई की व्यवस्था किये जाने की चर्चा हुई इसी क्रम में साफ-सफाई मार्ग प्रकाश मलवा अतिक्रमण जैसी समस्या को तत्काल निस्तारण का आदेश को दिया सदन में अपर नगर आयुक्त  दीपेन्द्र यादव अरविन्द कुमार रॉय राजीव कुमार शुक्ला दिनेश चन्द्र सचान मुख्य अभियंता (सिविल)संजय कटियार मुख्य अभियंता (वि./या.)डाo महेश कुमार नगर स्वास्थ्य अधिकारी गौरव कुमार  महाप्रबंधक जलकल संजय मंमगई मुख्य कर निर्धारण अधिकारी डांo विजय अमृत राज पशु चिकित्सा कल्याण विभाग रामपूजन सहायक नगर आयुक्त  अशोक कुमार जोनल अधिकारी जोन 1,  जोनल अधिकारी जोन 2, नवनीत शंखवार जोन 3, विकास जैन जोन 4,अखिलेश त्रिपाठी जोन 5, श्याम कुमार जोन 6,सौरभ यादव जोन 7. सुदर्शन चन्द्र जोन 8 अनिल कुमार मौर्या अधिशासी अभियन्ता एवं सभी जोनल अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहे।
ब्लड प्रेशर और डायबिटीज हैं किडनी के सबसे बड़े दुश्मन— डॉ. सौम्या गुप्ता

संजय द्विवेदी प्रयागराज।विश्व गुर्दा दिवस के अवसर पर मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से संबद्ध स्वरूप रानी नेहरू हॉस्पिटल में किडनी स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश दिया गया।इस अवसर पर नेफ्रोलॉजी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. सौम्या गुप्ता ने कहा कि उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर)और डायबिटीज किडनी के सबसे बड़े दुश्मन है।यदि इन बीमारियों को समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता कम होने लगती है और कई मामलों में मरीज को डायलिसिस की आवश्यकता तक पड़ सकती है।डॉ.गुप्ता ने बताया कि किडनी शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है जो रक्त को शुद्ध करने शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने तथा शरीर में तरल और खनिजों के संतुलन को बनाए रखने का कार्य करती है।उन्होंने कहा कि स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय में बड़ी संख्या में किडनी से संबंधित रोगियों का उपचार किया जाता है तथा जरूरतमन्द मरीजो को डायलिसिस सहित आधुनिक उपचार सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

*किडनी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य*

सामान्य व्यक्ति की दोनो किडनियों का कुल वजन लगभग 250–300 ग्राम होता है।किडनी प्रतिदिन लगभग 180 लीटर रक्त को फिल्टर करती है।भारत में अनुमानतःहर 10 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी स्तर पर क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD)से प्रभावित है।लगभग 60 प्रतिशत किडनी रोगों का कारण डायबिटीज और उच्च रक्तचाप होता है।शुरुआती अवस्था में किडनी रोग के लक्षण स्पष्ट नहीं होते इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी है।

*किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सलाह*

ब्लड प्रेशर और शुगर की नियमित जांच कराएं
नमक और जंक फूड का सेवन कम करें पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं बिना चिकित्सकीय सलाह के दर्द निवारक दवाइयो का अधिक उपयोग न करे
नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली अपनाएं डॉ. सौम्या गुप्ता ने आम जनता से अपील की कि किडनी को स्वस्थ रखने के लिए नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और संतुलित जीवनशैली को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।
पन्द्रह मार्च को महराज भवन कंजासा में लगेगा जमावड़ा, होली मिलन समारोह की तैयारी तेज
पत्रकार संघ के आयोजन में बाहर से बुलाए गए कलाकार, समाजसेवी मुकेश द्विवेदी संभाल रहे व्यवस्था

संजय द्विवेदी प्रयागराज।घूरपुर थाना क्षेत्र के ग्राम कंजासा स्थित महाराज भवन में पन्द्रह मार्च को भव्य होली मिलन समारोह का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम पत्रकार संघ के तत्वावधान में सायं चार बजे से शुरू होगा जिसमें क्षेत्र के पत्रकारो गणमान्य लोगो तथा ग्रामीणों को आमंत्रित किया गया है।आयोजकों के अनुसार इस बार समारोह को बड़े स्तर पर आयोजित करने की तैयारी की जा रही है। कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय भजन गायक मित्र बंधु, प्रसिद्ध गायिका मंजिता त्रिवेदी सहित कई कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे। साथ ही राधा-कृष्ण नृत्य कार्यक्रम भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा।समारोह की तैयारियों में समाजसेवी मुकेश द्विवेदी पत्रकार संघ के पदाधिकारी एवं ग्रामीण कई दिनों से जुटे हुए हैं।आयोजकों का कहना है कि कार्यक्रम में क्षेत्र के कई गांवों से बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना है जिससे कंजासा में होली मिलन समारोह इस बार विशेष रूप से भव्य रूप में दिखाई देगा।
कैच द रेन जल संचय की बैठक डीएम ने ली,20,20 सोक पिट बनवाने के निर्देश

फर्रूखाबाद l जल शक्ति अभियान “कैच द रेन” के अंतर्गत जल संचय जनभागीदारी 2.0 पहल की समीक्षा बैठक  कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी आशुतोष कुमार द्विवेदी की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में मुख्य विकास अधिकारी, उप कृषि निदेशक, सहायक अभियंता लघु सिंचाई, जिला उद्यान अधिकारी, सहायक अभियंता सिंचाई सहित अन्य संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे।
बैठक के दौरान सहायक अभियंता लघु सिंचाई द्वारा अवगत कराया गया कि जल संरक्षण से संबंधित कराए जा रहे कार्यों को भारत सरकार के JSJB 2.0 पोर्टल पर फीड किया जाना है, जिसके अंतर्गत अब तक जनपद में 660 कार्यों की फीडिंग की जा चुकी है।
इस दौरान जिलाधिकारी ने समस्त विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया कि जल संरक्षण से संबंधित कराए गए कार्यों जैसे रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, रिचार्ज शाफ्ट, रिचार्ज पिट, सोक पिट, ट्रेंचेस, चेकडैम, तालाब, मेड़बंदी आदि सभी कार्यों की सूचना तत्काल पोर्टल पर फीड कराई जाए।
जिलाधिकारी ने बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देशित किया कि उनके अधीन संचालित सभी शासकीय, अर्धशासकीय एवं वित्तविहीन विद्यालयों में सोक पिट एवं रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनवाए जाएं।
इसके साथ ही पंचायती राज विभाग को प्रत्येक राजस्व गांव में दो सोक पिट बनवाने के निर्देश दिए गए। समस्त अधिशासी अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र में 20-20 सोक पिट बनवाने के लिए निर्देशित किया गया।
साथ ही वन विभाग को 200 ट्रेंचेस तथा जिला उद्यान अधिकारी को संचालित कोल्ड स्टोरेजों में 200 सोक पिट बनवाने हेतु निर्देशित किया गया।
जिलाधिकारी ने कहा कि जल संरक्षण के लिए सभी विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें तथा अभियान के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यों की नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए, जिससे वर्षा जल का अधिकतम संचयन हो सके और भूजल स्तर में सुधार लाया जा सके।
चैत्र नवरात्रि को लेकर समय से पूर्ण करें सभी तैयारीः मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलरामपुर मंडल की समीक्षा बैठक कर दिए आवश्यक निर्देश* 

*बोले- देवीपाटन शक्तिपीठ में उमड़ते हैं श्रद्धालु, सुरक्षा-सुविधा, स्वच्छता पर रहे विशेष जोर* 

*सभी अधिकारी प्रतिदिन करें जनसुनवाई, आमजन की समस्याओं एवं शिकायतों का समयसीमा के अंदर हो उचित निस्तारणः मा० मुख्यमंत्री जी*

*सुनिश्चित हो-छांगुर जैसा कोई व्यक्ति दोबारा न पनपे, ग्राम चौकीदारों को किया जाए सक्रिय, सभी जानकारी की जाए साझाः मा० सीएम*



बलरामपुर ।मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश शासन योगी आदित्यनाथ जी ने बुधवार को जनपद में समीक्षा बैठक की। मा० मुख्यमंत्री जी ने विकास कार्यों, कानून व्यवस्था एवं चैत्र नवरात्रि मेला की तैयारियों को लेकर आवश्यक निर्देश भी दिए। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ होने जा रही है। चैत्र नवरात्रि मेले में देवीपाटन मंदिर शक्तिपीठ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आमगन होता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुगम दर्शन, पेयजल, स्वच्छता, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिए कि नवरात्र पर मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों के आसपास विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाए तथा आवश्यकतानुसार अतिरिक्त स्वच्छताकर्मी तैनात किए जाएं। मा० मुख्यमंत्री जी ने जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से तैयारियों की जानकारी भी प्राप्त की।

*मा० मुख्यमत्री जी का सख्त निर्देश- छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कानून व्यवस्था की समीक्षा के दौरान कहा कि हर थाना क्षेत्र में संस्थाओं के आसपास एंटी रोमियो स्क्वॉड तैनात रहे। शोहदों, चेन स्नेचरों आदि के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। ऐसे लोगों की फोटो सार्वजनिक स्थलों और सोशल मीडिया पर लगाई जाए। बॉर्डर एरिया पर पुलिस एवं बीएसएफ की संयुक्त निगरानी हो। नवधनाढ्यों की संपत्ति की जांच कराई जाए। मा० मुख्यमत्री जी ने प्रशासन व पुलिस को सख्त निर्देश दिया कि छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे। ग्राम चौकीदारों को सक्रिय किया जाए, सभी जानकारी साझा की जाए। जिला मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक नियमित हो। सभी अपराधियों को कानून के तहत सजा दिलाई जाए, जिससे उनमें कानून का भय हो।

*अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जाए सरकार की योजनाएं*
मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मां पाटेश्वरी राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण में तेजी लाकर इसे मई तक पूर्ण किया जाए। यूनिवर्सिटी को रिसर्च सेंटर के तौर पर भी विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में थारू जनजाति एवं अन्य परिवार को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से संतृप्त किया जाए। थारू जनजाति क्षेत्र में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं को पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत प्रशिक्षण कराया जाए। राजस्व वादों, पैमाइश एवं विरासत के निस्तारण में तेजी लाई जाए।

*प्राथमिकता से हो व्यापारियों की समस्याओं का निस्तारण*
मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मेडिकल कॉलेज में सभी औपचारिकता पूर्ण करते हुए नए सत्र में  पढ़ाई के लिए आवेदन करें। शीघ्र मेडिकल की पढ़ाई शुरू कराई जाएगी। बाढ़ से बचाव के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी जाए।  नदियों,  पहाड़ी नालों के ड्रेनेज-चैनलाइज का कार्य समय से पूर्ण किया जाए। महिलाओं एवं बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही विशेष योजनाओं (मातृ वंदना योजना,  कन्या सुमंगला योजना, सामूहिक विवाह आदि) का लाभ हर पात्र को मिलना चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि जिला उद्योग बंधु एवं व्यापारी बंधुओं की नियमित बैठकें हों और उनकी समस्याओं का प्राथमिकता से निस्तारण किया जाए।

*प्रशासन का जनप्रतिनिधियों से हो बेहतर संवाद, प्रतिदिन सुनी जाए आमजन की समस्याएं*
मा० मुख्यमंत्री जी ने समीक्षा बैठक में कहा कि गोवंश संरक्षण स्थल को और सुदृढ़ किया जाए। सभी स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हों और गोवंश की नियमित गणना हो। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विधानसभा तुलसीपुर और गैसड़ी में सीएम कंपोजिट विद्यालय दिए जाएंगे। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधियों, आमजन, विभिन्न संस्थाओं से प्रशासन का बेहतर संवाद हो। सभी अधिकारी प्रतिदिन जनसुनवाई करें एवं आमजन की समस्या एवं शिकायत का समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित करें।

*स्कूल चलो अभियान की तैयारी में जुटें, बच्चों को मिल जाए ड्रेस, बैग, किताब*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ हो रहा है। सभी बच्चों को ड्रेस, बैग, किताबें, जूते-मोजे आदि उपलब्ध करा दिया जाए और स्कूल चलो अभियान की तैयारियां से समय से पूर्ण कर ली जाएं। आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर व्यवस्था हो।  शिक्षा एवं स्वास्थ्य में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर हो। मरीजों को जनपद में ही बेहतर इलाज मिले, उन्हें अन्य जनपदों में न जाना पड़े।

मुख्यमंत्री  ने सभी विभागों की समीक्षा कर जानी प्रगति*
मा० मुख्यमंत्री जी को जनपद में महिलाओं एवं बच्चों के पोषण सुधार के लिए प्रोजेक्ट संवर्धन, असंक्रमणीय भूमि को संक्रमणीय भूमिधर घोषित किए जाने के अभियान, अवैध अतिक्रमण, थारू जनजाति क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर विद्युतीकरण एवं संपर्क मार्ग बनाए जाने, आगामी सीजन हेतु सहकारी समितियां पर ऑनलाइन माध्यम से उर्वरक वितरण, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के उन्नयन,  जारवा ईको टूरिज्म के विकास आदि के बारे में अवगत कराया गया। मा ०मुख्यमंत्री जी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान, सीएम युवा स्वरोजगार योजना, नए औद्योगिक क्षेत्र के विकास, जल जीवन मिशन,  निर्माणाधीन परियोजनाओं, रिंग रोड का निर्माण, 100 बेड के क्रिटिकल केयर यूनिट, नगर पालिका में एसटीपी का निर्माण, सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायत पेयजल पुनर्गठन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, सीमावर्ती क्षेत्र में थारू जनजाति एवं अन्य परिवारों को योजनाओं से संतृप्त किए जाने, एनआरएलएम, ऑपरेशन कायाकल्प, गो संरक्षण,  टीकाकरण,  ईयर टैगिंग, पौधरोपण, आईजीआरएस समेत समस्त बिंदुओं पर समीक्षा की गई।

बैठक में मा० विधायक बलरामपुर पल्टूराम, मा० विधायक तुलसीपुर श्री कैलाश नाथ शुक्ल, मा० विधायक उतरौला श्री राम प्रताप वर्मा, मा० जिला पंचायत अध्यक्ष सुश्री आरती तिवारी, मा० विधान परिषद सदस्य श्री साकेत मिश्र, श्री अवधेश कुमार सिंह, मा० चेयरमैन नगर पालिका बलरामपुर श्री धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धीरू’, जिलाध्यक्ष श्री रवि मिश्रा, अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष, कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह, आयुक्त श्री शशि भूषण लाल सुशील, एडीजी श्री अशोक मुथा जैन, जिलाधिकारी श्री विपिन कुमार जैन, मुख्य विकास अधिकारी श्री हिमांशु गुप्ता, पुलिस अधीक्षक श्री विकास कुमार व अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
केवल पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और आदर्श भी बने शिक्षक:BSA मनीष कुमार सिंह
संजीव कुमार सिंह बलिया!राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण के प्रथम बैच का उद्घाटन करते हुए प्राचार्य /उप शिक्षा निदेशक मनीष कुमार सिंह द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारंभ किया गया। इस प्रशिक्षण में शिक्षा क्षेत्र बेलहरी,बैरिया, मनियर, पंदह,मुरली छपरा,,रेवती,बेरुअरबारी और नगरा के 12-12 शिक्षकों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है जो आज दिनांक 11 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 13 मार्च 2026 तक आयोजित होना है। सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण के प्रभारी डायट प्रवक्ता डॉक्टर मृत्युंजय सिंह एवं इस प्रशिक्षण के नोडल रवि रंजन खरे द्वारा पंजीकरण के उपरांत शिक्षकों को पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। प्रवक्ता जानू राम द्वारा अपने उद्बोधन में बताया गया कि शिक्षा केवल ज्ञान या सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मानव निर्माण की एक सतत श्रृंखला है। यदि शिक्षा में मूल्य का समावेश नहीं होता तो यह केवल कौशल और तकनीकी दक्षता तक ही सीमित रह जाती, ऐसे में समाज की भौतिक प्रगति तो होती किंतु नैतिक पतन और संवेदनहीनता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है ।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब वह विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ ही भावनात्मक एवं नैतिक विकास में भी योगदान करें। प्रशिक्षण के नोडल रविरंजन खरे द्वारा आह्वान किया गया कि आज का समय वैज्ञानिक प्रगति, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण की है ।विद्यार्थियों के सामने और असंख्य अवसर तो आते हैं परंतु जीवन में तनाव ,नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं ।ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि जीवन को सार्थक और संतुलित बनाना भी होना चाहिए ।मूल्य आधारित इस प्रशिक्षण में हम सभी मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नैतिक शक्ति को प्राप्त कर सकेंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। डायट प्रवक्ता किरण सिंह द्वारा शिक्षकों के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक होने की बात बताई गई जिसमें शिक्षण में मूल्य का समावेश करने ,उनका दृष्टिकोण और अधिक समानुभूतिपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने की दिशा में समय-समय पर मूल्य आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया। डायट प्रवक्ता अविनाश सिंह द्वारा कंप्यूटर का शिक्षा में प्रयोग तथा उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की गई और बताया गया की शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनाती है ।यह एक ऐसे प्रकाश पुंज के समान है जो मनुष्य के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण करते हुए एक जिम्मेदार नैतिक एवं मूल्य आधारित नागरिक बनाती है जिससे देश और समाज की उन्नति एवं विकास में अपना अहम योगदान दिया जा सके। इस प्रशिक्षण में प्रतिभाग़ कर रहे बेलहरी शिक्षा क्षेत्र के अध्यापक, पूर्व एकेडमिक पर्सन डॉक्टर शशि भूषण मिश्र द्वारा बताया गया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय ,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है जिन्हें अपनाकर शिक्षक अपने आप में सशक्त बन सकता है तथा कक्षाओं में आत्मसात कराकर समाज की नई रूप रेखा का निर्माण कर सकता है जिस पर आगे चलकर सहिष्णुतापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक वातावरण का सृजन किया जा सकता है। डायट प्रवक्ता डॉ जितेंद्र गुप्ता द्वारा बताया गया कि शिक्षक भविष्य निर्माता है तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों में रोपित मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बनकर हमारे समाज को मानवीय गरिमा एवं न्याय की शीतल छाव प्रदान करेगा। तकनीकी सहयोग अमित कुमार चौहान तथा चंदन मिश्रा द्वारा प्रदान किया गया।
फतेहपुर में बंद कमरे में मां-बेटे और देवर की रहस्यमयी मौत, सुसाइड नोट मिलने से कर्ज का एंगल आया सामने
फतेहपुर। फतेहपुर जिले के Lucknow Bypass Road स्थित एक मकान में मां-बेटे और देवर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से इलाके में सनसनी फैल गई। घटना Sadar Kotwali क्षेत्र की है, जहां सुशील श्रीवास्तव के मकान में रहने वाले परिवार के तीन सदस्यों के शव बंद कमरे में मिले। पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।जानकारी के मुताबिक कमरे में मां और बेटे के शव खून से लथपथ हालत में मिले, जबकि कुछ दूरी पर महिला का देवर गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़ा था। उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी भी मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही इलाके में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुट गई।

व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख का कर्ज हो गया था

बताया जा रहा है कि परिवार मूल रूप से मुराइनटोला का रहने वाला था और कुछ साल पहले ही लखनऊ बाईपास क्षेत्र में मकान बनाकर रहने लगा था। परिवार का इकलौता बेटा अमर श्रीवास्तव सरल स्वभाव का था और कई अखबारों की एजेंसी का काम कर चुका था। हालांकि व्यापार में घाटे के कारण उस पर करीब 50 लाख रुपये का कर्ज हो गया था। कर्ज के दबाव में उसका घर भी बिक गया था और लंबे समय तक परिवार कर्जदारों से बचने के लिए छिपकर रह रहा था।

पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला

परिजनों के अनुसार अमर हाल के दिनों में लोगों से रुपये उधार मांग रहा था। उसने घटना से एक दिन पहले अपने एक दोस्त से 10 हजार रुपये उधार लिए थे और होली के आसपास अपने बहनोई से भी 10 हजार रुपये लिए थे। अमर के बहनोई ने तीनों की मौत को आत्महत्या मानने से इनकार करते हुए हत्या की आशंका जताई है।पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें तीन लोगों के नाम का जिक्र करते हुए आर्थिक तंगी और कर्ज से परेशान होने की बात लिखी गई है। सुसाइड नोट के आधार पर पुलिस उन लोगों की तलाश में जुट गई है। एसओजी और इंटेलिजेंस विंग की टीम भी मामले की जांच कर रही है।मौके से चाय के झूठे गिलास और ब्लेड का पैकेट भी बरामद हुआ है।

तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया

आशंका जताई जा रही है कि तीनों ने पहले चाय में सल्फास मिलाकर पीया और बाद में तड़पने पर ब्लेड से खुद पर वार किया। हालांकि यह भी संभावना जताई जा रही है कि तीनों के बीच आपसी विवाद के बाद हमला हुआ हो, जिसमें देवर ने मां-बेटे की हत्या कर खुद की जान ले ली हो।फिलहाल पुलिस दो पहलुओं—हत्या और सामूहिक आत्महत्या—दोनों को ध्यान में रखकर जांच कर रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि मौत जहर से हुई या ब्लेड से हुए हमले से। सुसाइड नोट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी।
गो रक्षा और सनातन के लिए नई रणनीति, शंकराचार्य ने किया चतुरंगिणी सेना
लखनऊ। गो रक्षा और सनातन धर्म की रक्षा के मुद्दे पर बुधवार को राजधानी लखनऊ के कांशीराम स्मृति सांस्कृतिक स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ा ऐलान किया गया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती  ने ‘गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध’ का शंखनाद करते हुए कहा कि धर्म की रक्षा के लिए शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना का गठन किया जाएगा, जो संत समाज में फैल रही अशास्त्रीयता और अधर्म को दूर करने का कार्य करेगी।देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और गो रक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष शपथ नहीं, बल्कि धर्म की शपथ ही चलेगी। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि परिस्थितियां बनीं तो धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई

कार्यक्रम में उन्होंने संत समाज में बढ़ रही विकृतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद के कुछ महंतों और साधुओं ने यह कहा कि वे मुख्यमंत्री के साथ हैं, शंकराचार्य के साथ नहीं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यदि अखाड़े साथ नहीं आते हैं तो अब अलग संगठन और सेना बनाकर धर्म की रक्षा की जाएगी।शंकराचार्य ने प्रयागराज में माघ मेले के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वेद पढ़ने वाले बटुकों के साथ अन्याय हुआ, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि गोहत्या केवल कसाई ही नहीं करता, बल्कि जो इसे अनुमति देता है या मौन रहता है, वह भी उसी पाप का भागी है।

यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी

इस दौरान उन्होंने “समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा” निकालने की भी घोषणा की। यह यात्रा 3 मई से 23 जुलाई तक चलेगी। यात्रा की शुरुआत गोरखपुर से होगी और वहीं इसका समापन भी होगा। इसके बाद 24 जुलाई को लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल पर एक बड़ी सभा आयोजित की जाएगी।शंकराचार्य ने कहा कि सनातन धर्म में शंकराचार्य सर्वोच्च धार्मिक प्राधिकरण हैं और गो माता की रक्षा के साथ-साथ सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प भी लेना होगा।
मानवता का युगांतकारी निर्णय: भारत में पहली बार इच्छामृत्यु और देह की विधिक मुक्ति
संजीव सिंह बलिया! मानवीय अस्तित्व का संपूर्ण विस्तार प्रथम श्वास के ग्रहण और अंतिम श्वास के त्याग की लघु देहरी के मध्य ही सिमटा हुआ है, जहाँ जीवन अपनी समस्त कोलाहलपूर्ण जीवंतता के साथ स्पंदित होता है। मेरे दार्शनिक ग्रंथों 'मृत्यु मीमांसा: जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के बाद' तथा 'अथातो मृत्यु जिज्ञासा' का केंद्रीय विमर्श भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि चेतना का एक अनिवार्य पड़ाव है। प्रायः संसार मृत्यु को शोक, संताप और विछोह के विषादपूर्ण चश्मे से ही देखता आया है, किंतु दार्शनिक परिपक्वता उस बिंदु पर जागृत होती है जहाँ मृत्यु एक अपरिहार्य और श्रेयस्कर अनुष्ठान बन जाती है। जब देह चेतना का साथ छोड़ दे और मात्र यंत्रवत यंत्रणा का पर्याय बन जाए, तब स्वयं व्यक्ति, उसका परिवेश और संपूर्ण समाज भी उस मौन मुक्ति की करुणापूर्ण याचना करने लगता है, जिसे नियति कभी-कभी मशीनों के शोर में उलझाकर विस्मृत कर देती है। ऐसे में यह बोध अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि जीवन की सार्थकता मात्र उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा में निहित है, और कभी-कभी शांतिपूर्ण महाप्रयाण ही उस जीवन का सबसे पावन और आवश्यक उपहार सिद्ध होता है। मानवीय अस्तित्व की गरिमा और विधिक सीमाओं के मध्य संतुलन साधने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय एक युगांतकारी हस्तक्षेप है। न्याय के मंदिर में निसृत हुआ यह निर्णय केवल एक विधिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवता के क्रंदन और करुणा के गहन अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक मार्मिक दस्तावेज है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश, जो उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान करता है, इक्कीसवीं सदी के भारत में जीवन, मृत्यु और मानवीय अस्मिता के द्वंद्व को नए और अत्यंत संवेदनशील आयाम दे रहा है। लगभग 13 वर्षों की दीर्घ और जड़वत प्रतीक्षा के पश्चात, जब एक पुत्र की देह केवल चिकित्सा विज्ञान की हठधर्मिता और मशीनों के शोर के बीच अटकी हो, तब न्यायालय का यह हस्तक्षेप उस 'अश्रुपूरित सन्नाटे' को स्वर देने जैसा है, जिसे केवल एक विवश माता-पिता ही अनुभव कर सकते थे। यहां इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान करना केवल एक परिवार की अंतहीन वेदना का समाधान मात्र नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा मानव गरिमा, करुणा और चिकित्सा-नैतिकता के त्रिकोण पर स्थापित एक नया अध्याय है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की शुष्कता जब संवेदना के धरातल पर उतरती है, तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि यंत्रणा से मुक्ति का एक पावन मार्ग बन जाती है। यह प्रकरण हमें इस मौलिक प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए विवश भी करता है कि क्या मात्र मशीनों के सहारे अनिश्चित काल तक साँसों की गिनती को बढ़ाते जाना ही वास्तविक जीवन है, या जीवन की सार्थकता उसकी गुणवत्ता, चेतना और मानवीय गरिमा में निहित है। जब देह केवल एक यंत्र बनकर रह जाए और चेतना का उससे संपर्क विच्छेद हो जाए, तो वह अस्तित्व नहीं बल्कि नियति का एक क्रूर परिहास बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान का आदिम और पावन संकल्प सदैव से जीवन की रक्षा करना रहा है, जिसे 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्राप्त है। चिकित्सा का दर्शन मूलतः पीड़ा के निवारण और जीवन की पुनर्स्थापना पर आधारित है। किंतु आधुनिक तकनीक के इस युग में जब विज्ञान अपनी ही प्रगति के पाश में इस प्रकार बंध जाए कि वह केवल दैहिक उपस्थिति तो बनाए रख सके पर चेतना, अनुभूति और बोध को लौटाने में सर्वथा असमर्थ हो, तब एक गहरा नैतिक और दार्शनिक शून्य उत्पन्न होता है। हरीश राणा का मामला इसी शून्य का एक विदारक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ 2013 की एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने एक ऊर्जावान युवक को कोमा के उस अंधकूप में धकेल दिया जहाँ से वापसी के समस्त द्वार बंद हो चुके थे। यहाँ भारतीय मनीषा और उपनिषदों का वह शाश्वत चिंतन पुनः प्रासंगिक हो जाता है जो शरीर को केवल एक नश्वर वस्त्र और चेतना का वाहन मानता है। यदि वह वाहन इतना जर्जर और अक्षम हो जाए कि वह आत्मा की अभिव्यक्ति या सांसारिक व्यवहार का माध्यम न बन सके, तो उसे कृत्रिम ऊर्जा के माध्यम से खींचते रहना न केवल उस देह का अपमान है, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक विधान के विरुद्ध एक हठ भी है। न्यायालय ने अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता से यह अनुभव किया है कि चिकित्सा का पावन उद्देश्य जीवन को यातना के कारागार में बंदी बनाना कदापि नहीं होना चाहिए। संवैधानिक और विधिक धरातल पर देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जैविक अस्तित्व को बचाए रखने का आश्वासन नहीं देता, बल्कि यह 'मानवीय गरिमा के साथ जीने' के अधिकार का प्रबल उद्घोष करता है। भारतीय न्यायपालिका ने विगत दशकों में अरुणा रामचंद्र शानबाग से लेकर कॉमन कॉज (2018) तक के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से निरंतर यह प्रतिपादित किया है कि 'गरिमामय मृत्यु' वास्तव में 'जीने के अधिकार' का ही एक अनिवार्य और अंतिम सोपान है। यह विधिक विकास इस सत्य को स्वीकार करता है कि जब उपचार की समस्त वैज्ञानिक संभावनाएं समाप्त हो जाएं और चिकित्सा विज्ञान स्वयं को असहाय पाकर केवल पीड़ा के विस्तार का माध्यम बन जाए, तब रोगी को शांतिपूर्ण प्रस्थान की अनुमति देना राज्य की निर्दयता नहीं, बल्कि उसका उच्चतम मानवीय और संवैधानिक दायित्व है। कानून और करुणा के बीच का यह सूक्ष्म संतुलन ही एक परिपक्व और संवेदनशील न्याय प्रणाली की पहचान है, जहाँ नियमों की कठोरता मानवता के आंसुओं के सामने झुकने का साहस रखती है। इस निर्णय के सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी अत्यंत व्यापक और विचारणीय हैं, जो भारतीय समाज की वास्तविक विषमताओं को उजागर करते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकांश व्यय सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से होता है, एक असाध्य रोगी की वर्षों तक सघन चिकित्सा देखभाल करना किसी भी मध्यमवर्गीय या निर्धन परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक आत्मदाह के समान है। यह स्थिति न केवल परिवार की संचित पूंजी को समाप्त कर उन्हें ऋण के दलदल में धकेलती है, बल्कि घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर 'केयरगिवर्स' के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और भविष्य की संभावनाओं को भी पूरी तरह सोख लेती है। एक ऐसे समाज में जहाँ संसाधनों का अभाव है, वहाँ 'डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस' का सिद्धांत यह तर्क भी प्रस्तुत करता है कि वेंटिलेटर और गहन चिकित्सा इकाइयों जैसे सीमित संसाधनों का उपयोग उन जीवनों को बचाने के लिए प्राथमिकता पर होना चाहिए जिनमें पुनः स्वस्थ होने की किंचित संभावना शेष हो। इस दृष्टिकोण से, सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख न केवल एक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, बल्कि एक संपूर्ण परिवार को आर्थिक और मानसिक विनाश से बचाते हुए सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। इच्छामृत्यु की कानूनी बहस से इतर, मानव इतिहास और साहित्य में ऐसे अनेक 'करुण दृष्टांत' मिलते हैं, जहाँ कानून की धाराओं के बजाय मानवीय संवेदना, विवशता और अपार पीड़ा ने मृत्यु को एक 'वरदान' बना दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कभी-कभी मृत्यु का वरण करना जीवन के प्रति घृणा नहीं, बल्कि असहनीय यातना से मुक्ति की एक करुण पुकार होती है। मुंशी प्रेमचंद के अमर उपन्यास 'गोदान' के अंतिम दृश्य में होरी की मृत्यु का प्रसंग भले ही इच्छामृत्यु का विधिक मामला न हो, पर वह एक 'आर्थिक और शारीरिक यातना' से मुक्ति का करुणतम उदाहरण है। जब होरी लू और अत्यधिक श्रम से टूटकर मरणासन्न होता है, तो उसकी पत्नी धनिया, जो उसे बचाने के लिए जीवन भर लड़ी, अंततः उसकी पीड़ा को देखकर उस मृत्यु को स्वीकार कर लेती है। वह जानती है कि इस व्यवस्था में होरी का जीवित रहना केवल और अधिक अपमान और पीड़ा को सहना है। यहाँ मृत्यु एक 'करुण विश्राम' बन जाती है। भारतीय लोक-कथाओं और कुछ ऐतिहासिक वृत्तांतों में अकाल के समय के ऐसे अनेक वृत्तांत मिलते हैं, जहाँ घर के वृद्ध सदस्य स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर देते थे (अनशन)। उनका उद्देश्य यह होता था कि उनके हिस्से का अन्न उनके पोते-पोतियों या युवा सदस्यों को मिल सके ताकि वंश जीवित रहे। यह कोई कानूनी मांग नहीं थी, बल्कि एक 'करुणामय आत्मत्याग' था, जहाँ मृत्यु को इसलिए चुना गया ताकि दूसरे जी सकें। इसमें पीड़ा का अंत और भविष्य का सृजन दोनों निहित थे। इतिहास के युद्धों में ऐसे अनगिनत अनामित दृष्टांत हैं, जहाँ भीषण रूप से घायल सैनिक, जिसके बचने की कोई संभावना नहीं होती थी और जिसकी देह क्षत-विक्षत हो चुकी होती थी, अपने ही साथी से उसे 'अंतिम प्रहार' (Coupe de grâce) करने की याचना करता था। वह साथी, जो उसे प्राणों से प्रिय मानता था, कांपते हाथों से उसे मृत्यु देता था ताकि उसे शत्रुओं की बर्बरता या तड़प-तड़प कर मरने की यातना से बचाया जा सके। यह कृत्य किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि 'युद्ध की विभीषिका' और 'मित्रता की करुणा' के बीच का एक अत्यंत दुखद समझौता होता था। अनेक व्यक्तिगत संस्मरणों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ कैंसर या न्यूरोलॉजिकल विकारों के अंतिम चरणों में रोगी, जो कभी परिवार का आधार था, केवल अपनी आँखों के इशारे से या हाथ दबाकर अपने प्रियजनों से मशीनों को बंद करने की मूक प्रार्थना करता है। कानून भले ही उसे अनुमति न दे, पर वह 'मूक संवाद' जिसमें रोगी की आँखें 'अब बस' कह रही होती हैं, मानवता के इतिहास का सबसे भारी क्षण होता है। यहाँ परिवार का सदस्य कानून की जटिलताओं के बीच उस 'मौन याचना' को पढ़कर ईश्वर से उसकी मृत्यु की प्रार्थना करने लगता है—यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम, मृत्यु की मांग करने लगता है। प्राचीन कथाओं में ऐसे दृष्टांत मिलते हैं (जैसे दशरथ का वियोग या अनसूया की कथाएं), जहाँ व्यक्ति किसी प्रियजन के शोक में या उसके बिना जीवन की निरर्थकता को देखते हुए अपने प्राण स्वतः त्याग देता है। यह किसी बाहरी हस्तक्षेप या दवा से नहीं, बल्कि 'संकल्प और विरह' की उस स्थिति से होता था जहाँ शरीर मन की आज्ञा मानकर धड़कना बंद कर देता था। इसे 'इच्छामृत्यु' का आध्यात्मिक और अत्यंत करुण स्वरूप माना जा सकता है, जहाँ जीने की इच्छा का समाप्त होना ही मृत्यु का कारण बनता था। ये दृष्टांत सिद्ध करते हैं कि कानून भले ही तर्क और नियमों पर चलता हो, किंतु मनुष्य का हृदय 'मृत्यु' को तब एक पवित्र शरणस्थली मानने लगता है जब 'जीवन' अपनी गरिमा खोकर केवल एक अंतहीन चीख बन जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को कभी भी दो विपरीत ध्रुवों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही चेतना के विस्तार और निरंतर चक्र के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाप्रयाण, संथारा और भीष्म पितामह को प्राप्त इच्छामृत्यु के वरदान के दृष्टांत इस सत्य के गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने मृत्यु को भय या निषेध की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे समय की पूर्णता पर शालीनता से वर्ण करने योग्य एक पड़ाव माना। हरीश राणा के माता-पिता का अपनी ही संतान के लिए मशीनों से मुक्ति की याचना करना, उनके पुत्र-मोह के उच्चतर परित्याग और उस अगाध करुणा का प्रमाण है जो संकीर्ण भावनाओं से कहीं ऊपर उठ चुकी है। वे उन आधुनिक ऋषियों के समान हैं जो यह स्वीकार कर चुके हैं कि जीवन का सौंदर्य केवल लंबी आयु में नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्त प्रस्थान में भी निहित हो सकता है। उनके लिए यह निर्णय अपने पुत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसकी उस अनंत यात्रा के प्रारंभ का मार्ग प्रशस्त करना है जहाँ न कोई व्याधि है, न सुइयां और न ही अस्पतालों की वह गंध जो जीवन को प्रतिपल डसती है। भविष्य की दिशा निर्धारित करते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि न्यायपालिका के इन ऐतिहासिक निर्णयों को अब एक स्पष्ट, सुदृढ़ और व्यापक विधायी कानून (Statutory Law) का रूप दिया जाए। यद्यपि 'लिविंग विल' और 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' जैसे प्रावधान विधिक रूप से मान्य हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इनकी जटिलताओं को दूर करना आवश्यक है ताकि एक सामान्य नागरिक भी अपनी पूर्ण चेतना की अवस्था में अपनी अंतिम इच्छा को विधिक स्वरूप दे सके। इसके लिए जिला स्तर पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्डों का सशक्तिकरण, प्रक्रिया का सरलीकरण और चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 'एंड ऑफ लाइफ केयर' जैसे मानवीय विषयों को प्रमुखता देना समय की मांग है। अंततः सभ्यता का उत्कर्ष इस बात से नहीं नापा जाता कि हमने कितनी गगनचुंबी इमारतें बनाईं या कितने शक्तिशाली अस्त्र जुटाए, बल्कि इस बात से नापा जाता है कि हम अपने सर्वाधिक असहाय और पीड़ाग्रस्त सदस्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं। हरीश राणा का मामला एक विधिक नजीर से कहीं अधिक एक नैतिक दर्पण है। यह हमें सिखाता है कि कभी-कभी 'पकड़कर रखना' स्वार्थ हो सकता है और 'मुक्त कर देना' ही वास्तविक प्रेम। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस 'करुणामय न्याय' की स्थापना है, जहाँ कानून की शुष्कता मानवीय संवेदनाओं की ओस से भीगकर शीतल हो गई है। जीवन यदि एक उत्सव है, तो उसकी पूर्णाहुति भी गरिमामयी और शांत होनी चाहिए। यही प्राकृतिक न्याय है और यही मानवता का धर्म। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय राष्ट्रीय पार्षद - शंकराचार्य परिषद
गढ़वा: बंडा पहाड़ पर गूंजा 'हर-हर महादेव', नौ दिवसीय श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन संपन्न

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गढ़वा :- गढ़वा के ग्राम जोबरईया के बंडा पहाड़ स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का तीसरा दिन भगवान शंकर के रुद्राभिषेक से प्रारंभ हुआ। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार संध्या काल में पावन श्री राम कथा में अयोध्या धाम से पधारे हुए परम पूज्य आचार्य पंकज शांडिल्य जी महाराज ने कथा के तृतीय दिवस में भगवान के पावन जन्म की कथा श्रवण कराया। कथा व्यास जी ने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार पापाचार बढ़ता है, दुष्ट आताताइयो का आतंक बढ़ता है प्रभु विभिन्न स्वरूपों में आकर के राक्षसों का विनाश कर धरती के भार को हल्का करते हैं। परमात्मा निराकार है लेकिन भक्त के भावना के अनुसार समय-समय पर सगुण साकार रूप रखकर इस धरती पर आते हैं। भगवान को धरती पर आने के कई कारण है मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है विप्र,धेनु,सुर,संत हित लीन्ह मनुज अवतार l कार्यक्रम में संगीतमय प्रस्तुतिकरण हेतु साथ दे रहे संगीतकारों ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं का मन मोह लिया। कथा के अंत में वृंदावन से पधारे हुए कलाकारों के

द्वारा सुंदर झांकियां की प्रस्तुति हुई। जिसमें राजा दशरथ और महारानी कौशल्या के साथ बाल शाखाओं की टोली की प्रस्तुतीकरण ने उपस्थित दर्शकों का मनमोहन लिया। महायज्ञ के यज्ञाधीश आचार्य श्री श्री आशीष वैद्य जी महाराज जी ने कथा व्यास के प्रस्तुतीकरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि व्यास जी एक उद्भट्ट विद्वान है। कथा करने की इनकी गायन शैली काफी रोचक और झांकियां काफी मनोरम है। प्रधान संयोजक श्री राकेश पाल जी ने कहा कि यह महायज्ञ इस धरा धाम को पवित्र करने वाली है इस क्षेत्र के लिए परम सौभाग्य की बात है कि यहां नौ दिवसीय विराट श्री रुद्र महायज्ञ का आयोजन हो रहा है।

श्री रुद्र महायज्ञ के अध्यक्ष श्री जितेंद्र कुमार पाल ने अपने सभी सदस्यों को काफी सजग होकर भक्तों के सभी आवश्यक सुविधाओं के प्रति सचेत रहने का सुझाव दिया।

वहीं संपूर्ण कथा के दौरान आज के अतिथि के रूप में गढ़वा प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री नरेंद्र नारायण जी गढ़वा से प्रमुख समाजसेवी पिंटू केसरी जी, विजय केसरीजी कथा मंडपम में विशेष रूप से उपस्थित थे।।

नगर निगम के सदन में महापौर और नगर आयुक्त ने पुनरीक्षित बजट पेश किया
सभासदो ने अपने क्षेत्रो की समस्याओं को गिनाया

वार्डो में अभी तक हुए कार्यो पर हुई चर्चा


संजय द्विवेदी प्रयागराज।नगर निगम में आज महापौर ने बजट पेश किया जिसमें शहर के शहरी क्षेत्र एवं ग्रामीण क्षेत्रो के योजनाओं का लाभ होगा नगर आयुक्त सीलम साई तेजा नगर निगम के अपने अपने सभी विभागों के अधिकारीगण के साथ उपस्थित रहे।सदन में महापौर गणेश केशरवानी और सभी वार्ड के सभासद एवं सभी जोन के अधिकारीगण भी बजट में शामिल हुए इस दौरान नगर निगम के अपने क्षेत्र से आए पार्षदगणों ने अपनी-अपनी बात रखी जिसमें शिकायतो में पेयजल तथा सड़क-नाली निर्माण तथा अतिक्रमण नालो और नालियो की साफ-सफाई  जाम नालियों की समस्या मरम्मत या निर्माण कार्य करने को चबूतरे पेयजल शौचालय/यूरिनल जल की समस्याओ हाउस टैक्स तथा नगर की सड़कों पर सफाई की व्यवस्था किये जाने की चर्चा हुई इसी क्रम में साफ-सफाई मार्ग प्रकाश मलवा अतिक्रमण जैसी समस्या को तत्काल निस्तारण का आदेश को दिया सदन में अपर नगर आयुक्त  दीपेन्द्र यादव अरविन्द कुमार रॉय राजीव कुमार शुक्ला दिनेश चन्द्र सचान मुख्य अभियंता (सिविल)संजय कटियार मुख्य अभियंता (वि./या.)डाo महेश कुमार नगर स्वास्थ्य अधिकारी गौरव कुमार  महाप्रबंधक जलकल संजय मंमगई मुख्य कर निर्धारण अधिकारी डांo विजय अमृत राज पशु चिकित्सा कल्याण विभाग रामपूजन सहायक नगर आयुक्त  अशोक कुमार जोनल अधिकारी जोन 1,  जोनल अधिकारी जोन 2, नवनीत शंखवार जोन 3, विकास जैन जोन 4,अखिलेश त्रिपाठी जोन 5, श्याम कुमार जोन 6,सौरभ यादव जोन 7. सुदर्शन चन्द्र जोन 8 अनिल कुमार मौर्या अधिशासी अभियन्ता एवं सभी जोनल अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहे।
ब्लड प्रेशर और डायबिटीज हैं किडनी के सबसे बड़े दुश्मन— डॉ. सौम्या गुप्ता

संजय द्विवेदी प्रयागराज।विश्व गुर्दा दिवस के अवसर पर मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से संबद्ध स्वरूप रानी नेहरू हॉस्पिटल में किडनी स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश दिया गया।इस अवसर पर नेफ्रोलॉजी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. सौम्या गुप्ता ने कहा कि उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर)और डायबिटीज किडनी के सबसे बड़े दुश्मन है।यदि इन बीमारियों को समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता कम होने लगती है और कई मामलों में मरीज को डायलिसिस की आवश्यकता तक पड़ सकती है।डॉ.गुप्ता ने बताया कि किडनी शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है जो रक्त को शुद्ध करने शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने तथा शरीर में तरल और खनिजों के संतुलन को बनाए रखने का कार्य करती है।उन्होंने कहा कि स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय में बड़ी संख्या में किडनी से संबंधित रोगियों का उपचार किया जाता है तथा जरूरतमन्द मरीजो को डायलिसिस सहित आधुनिक उपचार सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

*किडनी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य*

सामान्य व्यक्ति की दोनो किडनियों का कुल वजन लगभग 250–300 ग्राम होता है।किडनी प्रतिदिन लगभग 180 लीटर रक्त को फिल्टर करती है।भारत में अनुमानतःहर 10 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी स्तर पर क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD)से प्रभावित है।लगभग 60 प्रतिशत किडनी रोगों का कारण डायबिटीज और उच्च रक्तचाप होता है।शुरुआती अवस्था में किडनी रोग के लक्षण स्पष्ट नहीं होते इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी है।

*किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सलाह*

ब्लड प्रेशर और शुगर की नियमित जांच कराएं
नमक और जंक फूड का सेवन कम करें पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं बिना चिकित्सकीय सलाह के दर्द निवारक दवाइयो का अधिक उपयोग न करे
नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली अपनाएं डॉ. सौम्या गुप्ता ने आम जनता से अपील की कि किडनी को स्वस्थ रखने के लिए नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और संतुलित जीवनशैली को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।
पन्द्रह मार्च को महराज भवन कंजासा में लगेगा जमावड़ा, होली मिलन समारोह की तैयारी तेज
पत्रकार संघ के आयोजन में बाहर से बुलाए गए कलाकार, समाजसेवी मुकेश द्विवेदी संभाल रहे व्यवस्था

संजय द्विवेदी प्रयागराज।घूरपुर थाना क्षेत्र के ग्राम कंजासा स्थित महाराज भवन में पन्द्रह मार्च को भव्य होली मिलन समारोह का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम पत्रकार संघ के तत्वावधान में सायं चार बजे से शुरू होगा जिसमें क्षेत्र के पत्रकारो गणमान्य लोगो तथा ग्रामीणों को आमंत्रित किया गया है।आयोजकों के अनुसार इस बार समारोह को बड़े स्तर पर आयोजित करने की तैयारी की जा रही है। कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय भजन गायक मित्र बंधु, प्रसिद्ध गायिका मंजिता त्रिवेदी सहित कई कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे। साथ ही राधा-कृष्ण नृत्य कार्यक्रम भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा।समारोह की तैयारियों में समाजसेवी मुकेश द्विवेदी पत्रकार संघ के पदाधिकारी एवं ग्रामीण कई दिनों से जुटे हुए हैं।आयोजकों का कहना है कि कार्यक्रम में क्षेत्र के कई गांवों से बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना है जिससे कंजासा में होली मिलन समारोह इस बार विशेष रूप से भव्य रूप में दिखाई देगा।
कैच द रेन जल संचय की बैठक डीएम ने ली,20,20 सोक पिट बनवाने के निर्देश

फर्रूखाबाद l जल शक्ति अभियान “कैच द रेन” के अंतर्गत जल संचय जनभागीदारी 2.0 पहल की समीक्षा बैठक  कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी आशुतोष कुमार द्विवेदी की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में मुख्य विकास अधिकारी, उप कृषि निदेशक, सहायक अभियंता लघु सिंचाई, जिला उद्यान अधिकारी, सहायक अभियंता सिंचाई सहित अन्य संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे।
बैठक के दौरान सहायक अभियंता लघु सिंचाई द्वारा अवगत कराया गया कि जल संरक्षण से संबंधित कराए जा रहे कार्यों को भारत सरकार के JSJB 2.0 पोर्टल पर फीड किया जाना है, जिसके अंतर्गत अब तक जनपद में 660 कार्यों की फीडिंग की जा चुकी है।
इस दौरान जिलाधिकारी ने समस्त विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया कि जल संरक्षण से संबंधित कराए गए कार्यों जैसे रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, रिचार्ज शाफ्ट, रिचार्ज पिट, सोक पिट, ट्रेंचेस, चेकडैम, तालाब, मेड़बंदी आदि सभी कार्यों की सूचना तत्काल पोर्टल पर फीड कराई जाए।
जिलाधिकारी ने बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देशित किया कि उनके अधीन संचालित सभी शासकीय, अर्धशासकीय एवं वित्तविहीन विद्यालयों में सोक पिट एवं रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनवाए जाएं।
इसके साथ ही पंचायती राज विभाग को प्रत्येक राजस्व गांव में दो सोक पिट बनवाने के निर्देश दिए गए। समस्त अधिशासी अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र में 20-20 सोक पिट बनवाने के लिए निर्देशित किया गया।
साथ ही वन विभाग को 200 ट्रेंचेस तथा जिला उद्यान अधिकारी को संचालित कोल्ड स्टोरेजों में 200 सोक पिट बनवाने हेतु निर्देशित किया गया।
जिलाधिकारी ने कहा कि जल संरक्षण के लिए सभी विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें तथा अभियान के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यों की नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए, जिससे वर्षा जल का अधिकतम संचयन हो सके और भूजल स्तर में सुधार लाया जा सके।
चैत्र नवरात्रि को लेकर समय से पूर्ण करें सभी तैयारीः मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलरामपुर मंडल की समीक्षा बैठक कर दिए आवश्यक निर्देश* 

*बोले- देवीपाटन शक्तिपीठ में उमड़ते हैं श्रद्धालु, सुरक्षा-सुविधा, स्वच्छता पर रहे विशेष जोर* 

*सभी अधिकारी प्रतिदिन करें जनसुनवाई, आमजन की समस्याओं एवं शिकायतों का समयसीमा के अंदर हो उचित निस्तारणः मा० मुख्यमंत्री जी*

*सुनिश्चित हो-छांगुर जैसा कोई व्यक्ति दोबारा न पनपे, ग्राम चौकीदारों को किया जाए सक्रिय, सभी जानकारी की जाए साझाः मा० सीएम*



बलरामपुर ।मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश शासन योगी आदित्यनाथ जी ने बुधवार को जनपद में समीक्षा बैठक की। मा० मुख्यमंत्री जी ने विकास कार्यों, कानून व्यवस्था एवं चैत्र नवरात्रि मेला की तैयारियों को लेकर आवश्यक निर्देश भी दिए। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ होने जा रही है। चैत्र नवरात्रि मेले में देवीपाटन मंदिर शक्तिपीठ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आमगन होता है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुगम दर्शन, पेयजल, स्वच्छता, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और भीड़ प्रबंधन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिए कि नवरात्र पर मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों के आसपास विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाए तथा आवश्यकतानुसार अतिरिक्त स्वच्छताकर्मी तैनात किए जाएं। मा० मुख्यमंत्री जी ने जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से तैयारियों की जानकारी भी प्राप्त की।

*मा० मुख्यमत्री जी का सख्त निर्देश- छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कानून व्यवस्था की समीक्षा के दौरान कहा कि हर थाना क्षेत्र में संस्थाओं के आसपास एंटी रोमियो स्क्वॉड तैनात रहे। शोहदों, चेन स्नेचरों आदि के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। ऐसे लोगों की फोटो सार्वजनिक स्थलों और सोशल मीडिया पर लगाई जाए। बॉर्डर एरिया पर पुलिस एवं बीएसएफ की संयुक्त निगरानी हो। नवधनाढ्यों की संपत्ति की जांच कराई जाए। मा० मुख्यमत्री जी ने प्रशासन व पुलिस को सख्त निर्देश दिया कि छांगुर जैसा व्यक्ति दोबारा न पनपे। ग्राम चौकीदारों को सक्रिय किया जाए, सभी जानकारी साझा की जाए। जिला मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक नियमित हो। सभी अपराधियों को कानून के तहत सजा दिलाई जाए, जिससे उनमें कानून का भय हो।

*अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जाए सरकार की योजनाएं*
मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मां पाटेश्वरी राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण में तेजी लाकर इसे मई तक पूर्ण किया जाए। यूनिवर्सिटी को रिसर्च सेंटर के तौर पर भी विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में थारू जनजाति एवं अन्य परिवार को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से संतृप्त किया जाए। थारू जनजाति क्षेत्र में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं को पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत प्रशिक्षण कराया जाए। राजस्व वादों, पैमाइश एवं विरासत के निस्तारण में तेजी लाई जाए।

*प्राथमिकता से हो व्यापारियों की समस्याओं का निस्तारण*
मा० मुख्यमंत्री जी ने निर्देश दिया कि मेडिकल कॉलेज में सभी औपचारिकता पूर्ण करते हुए नए सत्र में  पढ़ाई के लिए आवेदन करें। शीघ्र मेडिकल की पढ़ाई शुरू कराई जाएगी। बाढ़ से बचाव के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी जाए।  नदियों,  पहाड़ी नालों के ड्रेनेज-चैनलाइज का कार्य समय से पूर्ण किया जाए। महिलाओं एवं बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही विशेष योजनाओं (मातृ वंदना योजना,  कन्या सुमंगला योजना, सामूहिक विवाह आदि) का लाभ हर पात्र को मिलना चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि जिला उद्योग बंधु एवं व्यापारी बंधुओं की नियमित बैठकें हों और उनकी समस्याओं का प्राथमिकता से निस्तारण किया जाए।

*प्रशासन का जनप्रतिनिधियों से हो बेहतर संवाद, प्रतिदिन सुनी जाए आमजन की समस्याएं*
मा० मुख्यमंत्री जी ने समीक्षा बैठक में कहा कि गोवंश संरक्षण स्थल को और सुदृढ़ किया जाए। सभी स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हों और गोवंश की नियमित गणना हो। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विधानसभा तुलसीपुर और गैसड़ी में सीएम कंपोजिट विद्यालय दिए जाएंगे। मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधियों, आमजन, विभिन्न संस्थाओं से प्रशासन का बेहतर संवाद हो। सभी अधिकारी प्रतिदिन जनसुनवाई करें एवं आमजन की समस्या एवं शिकायत का समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित करें।

*स्कूल चलो अभियान की तैयारी में जुटें, बच्चों को मिल जाए ड्रेस, बैग, किताब*
मा० मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ हो रहा है। सभी बच्चों को ड्रेस, बैग, किताबें, जूते-मोजे आदि उपलब्ध करा दिया जाए और स्कूल चलो अभियान की तैयारियां से समय से पूर्ण कर ली जाएं। आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर व्यवस्था हो।  शिक्षा एवं स्वास्थ्य में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर हो। मरीजों को जनपद में ही बेहतर इलाज मिले, उन्हें अन्य जनपदों में न जाना पड़े।

मुख्यमंत्री  ने सभी विभागों की समीक्षा कर जानी प्रगति*
मा० मुख्यमंत्री जी को जनपद में महिलाओं एवं बच्चों के पोषण सुधार के लिए प्रोजेक्ट संवर्धन, असंक्रमणीय भूमि को संक्रमणीय भूमिधर घोषित किए जाने के अभियान, अवैध अतिक्रमण, थारू जनजाति क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर विद्युतीकरण एवं संपर्क मार्ग बनाए जाने, आगामी सीजन हेतु सहकारी समितियां पर ऑनलाइन माध्यम से उर्वरक वितरण, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के उन्नयन,  जारवा ईको टूरिज्म के विकास आदि के बारे में अवगत कराया गया। मा ०मुख्यमंत्री जी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान, सीएम युवा स्वरोजगार योजना, नए औद्योगिक क्षेत्र के विकास, जल जीवन मिशन,  निर्माणाधीन परियोजनाओं, रिंग रोड का निर्माण, 100 बेड के क्रिटिकल केयर यूनिट, नगर पालिका में एसटीपी का निर्माण, सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायत पेयजल पुनर्गठन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, सीमावर्ती क्षेत्र में थारू जनजाति एवं अन्य परिवारों को योजनाओं से संतृप्त किए जाने, एनआरएलएम, ऑपरेशन कायाकल्प, गो संरक्षण,  टीकाकरण,  ईयर टैगिंग, पौधरोपण, आईजीआरएस समेत समस्त बिंदुओं पर समीक्षा की गई।

बैठक में मा० विधायक बलरामपुर पल्टूराम, मा० विधायक तुलसीपुर श्री कैलाश नाथ शुक्ल, मा० विधायक उतरौला श्री राम प्रताप वर्मा, मा० जिला पंचायत अध्यक्ष सुश्री आरती तिवारी, मा० विधान परिषद सदस्य श्री साकेत मिश्र, श्री अवधेश कुमार सिंह, मा० चेयरमैन नगर पालिका बलरामपुर श्री धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धीरू’, जिलाध्यक्ष श्री रवि मिश्रा, अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष, कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह, आयुक्त श्री शशि भूषण लाल सुशील, एडीजी श्री अशोक मुथा जैन, जिलाधिकारी श्री विपिन कुमार जैन, मुख्य विकास अधिकारी श्री हिमांशु गुप्ता, पुलिस अधीक्षक श्री विकास कुमार व अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
केवल पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और आदर्श भी बने शिक्षक:BSA मनीष कुमार सिंह
संजीव कुमार सिंह बलिया!राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण के प्रथम बैच का उद्घाटन करते हुए प्राचार्य /उप शिक्षा निदेशक मनीष कुमार सिंह द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारंभ किया गया। इस प्रशिक्षण में शिक्षा क्षेत्र बेलहरी,बैरिया, मनियर, पंदह,मुरली छपरा,,रेवती,बेरुअरबारी और नगरा के 12-12 शिक्षकों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है जो आज दिनांक 11 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 13 मार्च 2026 तक आयोजित होना है। सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण के प्रभारी डायट प्रवक्ता डॉक्टर मृत्युंजय सिंह एवं इस प्रशिक्षण के नोडल रवि रंजन खरे द्वारा पंजीकरण के उपरांत शिक्षकों को पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। प्रवक्ता जानू राम द्वारा अपने उद्बोधन में बताया गया कि शिक्षा केवल ज्ञान या सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मानव निर्माण की एक सतत श्रृंखला है। यदि शिक्षा में मूल्य का समावेश नहीं होता तो यह केवल कौशल और तकनीकी दक्षता तक ही सीमित रह जाती, ऐसे में समाज की भौतिक प्रगति तो होती किंतु नैतिक पतन और संवेदनहीनता की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है ।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब वह विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ ही भावनात्मक एवं नैतिक विकास में भी योगदान करें। प्रशिक्षण के नोडल रविरंजन खरे द्वारा आह्वान किया गया कि आज का समय वैज्ञानिक प्रगति, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण की है ।विद्यार्थियों के सामने और असंख्य अवसर तो आते हैं परंतु जीवन में तनाव ,नैतिक द्वंद्व और सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं ।ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि जीवन को सार्थक और संतुलित बनाना भी होना चाहिए ।मूल्य आधारित इस प्रशिक्षण में हम सभी मिलकर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नैतिक शक्ति को प्राप्त कर सकेंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। डायट प्रवक्ता किरण सिंह द्वारा शिक्षकों के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक होने की बात बताई गई जिसमें शिक्षण में मूल्य का समावेश करने ,उनका दृष्टिकोण और अधिक समानुभूतिपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने की दिशा में समय-समय पर मूल्य आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया। डायट प्रवक्ता अविनाश सिंह द्वारा कंप्यूटर का शिक्षा में प्रयोग तथा उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की गई और बताया गया की शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनाती है ।यह एक ऐसे प्रकाश पुंज के समान है जो मनुष्य के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण करते हुए एक जिम्मेदार नैतिक एवं मूल्य आधारित नागरिक बनाती है जिससे देश और समाज की उन्नति एवं विकास में अपना अहम योगदान दिया जा सके। इस प्रशिक्षण में प्रतिभाग़ कर रहे बेलहरी शिक्षा क्षेत्र के अध्यापक, पूर्व एकेडमिक पर्सन डॉक्टर शशि भूषण मिश्र द्वारा बताया गया कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय ,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों का प्रयोग किया गया है जिन्हें अपनाकर शिक्षक अपने आप में सशक्त बन सकता है तथा कक्षाओं में आत्मसात कराकर समाज की नई रूप रेखा का निर्माण कर सकता है जिस पर आगे चलकर सहिष्णुतापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक वातावरण का सृजन किया जा सकता है। डायट प्रवक्ता डॉ जितेंद्र गुप्ता द्वारा बताया गया कि शिक्षक भविष्य निर्माता है तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों में रोपित मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बनकर हमारे समाज को मानवीय गरिमा एवं न्याय की शीतल छाव प्रदान करेगा। तकनीकी सहयोग अमित कुमार चौहान तथा चंदन मिश्रा द्वारा प्रदान किया गया।