इंडी गठबंधन की बैठक में अखिलेश को बुलाया तक नहीं गया, कांग्रेस-सपा की कलह पर सुभाष यदुवंश का तंज
- 'इनको वोट देना अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद करना है’, सुभाष यदुवंश का अखिलेश-राहुल पर हमला
- बीजेपी MLC ने कहा- 'राजतंत्र और परिवारतंत्र में विश्वास करते हैं राहुल और अखिलेश’

लखनऊ, 08 अक्टूबर। बीजेपी के विधान परिषद सदस्य (MLC) सुभाष यदुवंश ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला है। दिल्ली में बुधवार को कांग्रेस की ओर से आयोजित इंडी गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव को नहीं बुलाए जाने का जिक्र करते हुए यदुवंश ने दोनों नेताओं को ‘राजकुमार’ बताया और कहा कि वे एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
सुभाष यदुवंश ने कहा, 'इंडी गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव जी को बुलाया ही नहीं गया।' उन्होंने कहा कि जब अखिलेश यादव लखनऊ आ गए, तब राहुल गांधी के किसी ‘शिष्य’ का फोन उनके पास आया। यदुवंश ने कहा कि कुछ दिन पहले अखिलेश यादव के इशारे पर ही एक सपाई सांसद ने कहा कि कांग्रेस की हैसियत तो 10 सीटों की भी नहीं है।
*'चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए दोनों राजकुमार'*
यदुवंश ने अखिलेश यादव और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, 'ये जो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए दोनों राजकुमार हैं, ये सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।' यदुवंश ने कहा कि इन दोनों नेताओं में अनुशासन नहीं है, टीम भावना नहीं है और समन्वय नहीं है। अखिलेश और राहुल दोनों ही किसी व्यवस्था को चला नहीं सकते।
*'डेढ़ साल मंच पर पूरा परिवार लड़ता रहा'*
अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए सुभाष यदुवंश ने कहा कि जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के ‘युवराज’ को सत्ता मिली, तो डेढ़ साल तक मंच पर पूरा परिवार लड़ता रहा। उन्होंने कहा कि इस दौरान उत्तर प्रदेश को 'सिरफुटौव्वल का अड्डा' बना दिया गया।
*'राजतंत्र पर भरोसा करते हैं राहुल गांधी'*
राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए यदुवंश ने कहा कि जब कांग्रेस के ‘युवराज’ को सत्ता मिली थी, तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का तैयार किया हुआ मसौदा राहुल गांधी ने फाड़ दिया था। उन्होंने कहा, 'युवराज ने मसौदा फाड़ करके बताया कि देखो, मैं राजतंत्र में बिलीव करता हूं, संविधान मानता नहीं हूं, संविधान को जेब में रख करके चलता हूं।'
बता दें कि 2013 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा दोषी सांसदों-विधायकों को तत्काल अयोग्यता से बचाने के लिए लाए गए जनप्रतिनिधित्व संशोधन अध्यादेश को राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘पूरी तरह बकवास’ बताते हुए सार्वजनिक रूप से फाड़ दिया था।
अखिलेश यादव और राहुल गांधी पर हमला करते हुए सुभाष यदुवंश ने कहा कि इन पर भरोसा करना, इनको वोट देना अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद करना है। ये दोनों परिवारतंत्र पर भरोसा करने वाले नेता हैं।
*सीएम हेमंत सोरेन की माता के निधन पर सियासी जगत में शोक की लहर, मंत्री-सांसद और पूर्व CM अर्जुन मुंडा समेत कई दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि

मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन की माता एवं स्वर्गीय श्रीमती रूपी सोरेन के निधन पर आज मोरहाबादी स्थित आवास पर राज्य सरकार के मंत्री श्री चमरा लिंडा, मंत्री श्रीमती दीपिका पांडेय सिंह, सांसद श्री विजय हांसदा,

सांसद श्री ढुल्लू महतो, पूर्व मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री श्री चम्पाई सोरेन, पूर्व उपमुख्यमंत्री श्री सुदेश महतो, विधायकगण, पूर्व मंत्रीगण, प्रशासनिक अधिकारीगण एवं बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने स्वर्गीय श्रीमती रूपी सोरेन के पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर उपस्थित सभी लोगों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति तथा शोकाकुल परिजनों को इस अपार एवं विकट दुःख को सहन करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करने की प्रार्थना की।_*

झामुमो के मिलन समारोह में सैकड़ों लोगों ने थामा पार्टी का दामन, रंजीत राम के नेतृत्व में हुआ सदस्यता ग्रहण

हजारीबाग के हीराबाग चौक स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) जिला कार्यालय में मंगलवार को मिलन समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से जुड़े बड़ी संख्या में लोगों ने झामुमो की सदस्यता ग्रहण की।

सदर विधानसभा क्षेत्र के विधायक के पूर्व सदर प्रतिनिधि और पूर्व जिला परिषद सदस्य रंजीत राम के नेतृत्व में लोगों ने झामुमो में शामिल होने की घोषणा की। इस दौरान नए सदस्यों ने मुख्यमंत्री और झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन के नेतृत्व तथा पार्टी की नीतियों में विश्वास जताया।

झामुमो जिलाध्यक्ष संजीव कुमार बेदिया ने रंजीत राम समेत नए सदस्यों को माला और पार्टी का पट्टा पहनाकर स्वागत किया। कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं ने पार्टी में शामिल हुए लोगों का गर्मजोशी से अभिनंदन किया।

इस दौरान खतियानी परिवार के जिला अध्यक्ष अशोक राम, रामचंद्र राम, कार्तिक सिन्हा, भीखू राम, आलोक वर्मा, कुलदीप राम, नरेश प्रजापति, अधिवक्ता पिंटू प्रकाश, अधिवक्ता पारस राव अंबेडकर, अधिवक्ता अमन कुमार, भीम आर्मी के जिला मीडिया प्रभारी बादल कुमार, वार्ड सदस्य सुरेंद्र कुमार, पूर्व पंचायत समिति सदस्य राम शरण राम, रजक समाज हजारीबाग के जिला महामंत्री बालेश्वर रजक समेत कई लोगों ने पार्टी की सदस्यता ली।

अल्पसंख्यक मोर्चा के जिला कोषाध्यक्ष के नेतृत्व में मुख्तार अहमद, सुशील केरकेट्टा, अनुपम विशाल, रिचर्ड एंथोनी बैचमेन, बसंत परेया, रोबिन रॉय और कुमुद दास समेत कई अन्य लोगों के भी पार्टी में शामिल होने की बात कही गई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिलाध्यक्ष संजीव कुमार बेदिया ने कहा कि झामुमो आम लोगों, गरीबों, आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और युवाओं के मुद्दों को उठाता रहा है। उन्होंने नए सदस्यों का स्वागत करते हुए संगठन में उन्हें सम्मान और जिम्मेदारी देने की बात कही।

जिला सचिव नीलकंठ महतो ने झामुमो को झारखंड के अधिकार, अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़ा आंदोलन बताया। वहीं केंद्रीय सदस्य सह अल्पसंख्यक मोर्चा के जिला अध्यक्ष यासीन खान ने कहा कि पार्टी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के अधिकार और सम्मान की बात करती है।

केंद्रीय सदस्य विकास राणा और सुनील शर्मा ने भी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर दिया। जिला प्रवक्ता कुणाल यादव ने कहा कि विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से लोगों का पार्टी से जुड़ना संगठन के विस्तार को दर्शाता है।

झामुमो में शामिल होने के बाद रंजीत राम ने कहा कि उन्होंने अपने समर्थकों से विचार-विमर्श के बाद पार्टी की सदस्यता लेने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड और आम लोगों के मुद्दों को उठाए जाने से प्रभावित होकर उन्होंने झामुमो के साथ जुड़ने का निर्णय लिया है। उन्होंने आगे पार्टी को मजबूत करने और जनता के बीच सक्रिय रूप से काम करने की बात कही।

कार्यक्रम में केंद्रीय सदस्य इजहार अंसारी, जिला उपाध्यक्ष रंजीत मेहता, विकास बेदिया, युवा मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष सत्येंद्र मेहता, जिला कोषाध्यक्ष मो. अख्तर, श्रमिक संघ के जिला अध्यक्ष सह बड़कागांव प्रखंड अध्यक्ष संजय सिंह, दारू प्रखंड अध्यक्ष नारायण दास सहित बड़ी संख्या में पार्टी के पदाधिकारी, कार्यकर्ता और समर्थक मौजूद रहे।

2026 में भौतिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार पर विशेष विज्ञान लेख



*भौतिकी का नोबेल 2026: फ्रांसिस हाल्जेन और 'भूतिया कणों' की खोज।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि नोबेल पुरस्कार समिति की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 6 अक्टूबर 2026 को रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने भौतिकी का नोबेल पुरस्कार बेल्जियम मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को घोषित किया है। उन्हें यह सम्मान "आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी में निर्णायक योगदान और ब्रह्मांडीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज" के लिए दिया गया है।
नोबेल समिति ने इन न्यूट्रिनो कणों को "अंतरिक्ष से आने वाले भूतिया संदेश" (Ghostly messages from space) करार दिया है,जो ब्रह्मांड के सबसे रौद्र और रहस्यमयी हिस्सों से सीधी सूचना लेकर आते हैं।

*विजेता और पुरस्कार का कारण क्या है।* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि नोबेल पुरस्कार समिति की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार फ्रांसिस हाल्जेन वर्तमान में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में प्रोफेसर हैं। उनका जन्म 1944 में बेल्जियम के टिएनेन शहर में हुआ था एवं
आधिकारिक घोषणा के अनुसार, हाल्जेन को यह पुरस्कार उनके उस अभूतपूर्व विचार और वैज्ञानिक नेतृत्व के लिए मिला है जिसके तहत उन्होंने दक्षिणी ध्रुव (अंटार्कटिका) की बर्फ का उपयोग न्यूट्रिनो कणों को पकड़ने के लिए किया।  नोबेल समिति के अध्यक्ष मार्क पियर्स ने कहा, "फ्रांसिस हाल्जेन ने शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया है जिसने हमें एक शानदार उपकरण दिया है। उनकी दृढ़ता और वैज्ञानिक दृष्टि ने एक नए प्रकार के खगोल विज्ञान का मार्ग प्रशस्त किया है।" और इस वर्ष भौतिकी की नोबेल पुरस्कार राशि 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर (लगभग 1.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर) है, जो पूरी तरह से हाल्जेन को दी जाएगी क्योंकि इस वर्ष यह पुरस्कार केवल एक ही वैज्ञानिक को दिया गया है।
*क्या होते हैं,न्यूट्रिनो: ब्रह्मांड के 'भूतिया कण'।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि न्यूट्रिनो, ब्रह्मांड के सबसे बुनियादी और रहस्यमयी उप-परमाणु कणों में से एक हैं। इन्हें 'घोस्ट पार्टिकल्स' (Ghost Particles या भूतिया कण) भी कहा जाता है क्योंकि इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता और इनका द्रव्यमान लगभग न के बराबर होता है।
ये कण सुदूर अंतरिक्ष में होने वाली भीषण घटनाओं (जैसे सुपरनोवा विस्फोट, ब्लैक होल, सक्रिय आकाशगंगाओं के केंद्र) से पैदा होते हैं और प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं। चूंकि ये सामान्य पदार्थ के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं, या कुछ यूं कहें कि बिल्कुल भी नहीं के बराबर प्रतिक्रिया करते हैं इसलिए ये बिना रुके पृथ्वी, इंसानों, चट्टानों,पहाड़ों और ग्रहों आदि के पार निकल जाते हैं। और यह तक भी पता नहीं चलता कि कब यह कण उनको पार कर रहे हैं। और यह भी जानना ज़रूरी है कि हर सेकंड अरबों-खरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर और पृथ्वी से होकर गुजरते रहते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश बिना किसी क्रिया के निकल जाते हैं, इसी वजह से इन्हें सामान्य टेलिस्कोप से देख पाना या पकड़ पाना नामुमकिन था।
*क्या है,आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी: बर्फ का विशाल दूरबीन* ।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि नोबेल पुरस्कार समिति के अनुसार फ्रांसिस हाल्जेन ने 1988 में एक अभूतपूर्व विचार रखा कि अंतरिक्ष से आने वाले इन रहस्यमयी कणों को पकड़ने के लिए दक्षिणी ध्रुव (South Pole, अंटार्कटिका) की विशाल बर्फ का उपयोग किया जा सकता है।उनके इसी दृष्टिकोण के कारण अंटार्कटिका की गहराई में बर्फ के नीचे 1 क्यूबिक किलोमीटर के दायरे में दुनिया का पहला विशालकाय न्यूट्रिनो डिटेक्टर बनाया गया, जिसे आइसक्यूब (IceCube) कहा जाता है। *आइसक्यूब कैसे काम करता है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी की आधिकारिक सूची के अनुसार आइसक्यूब में बर्फ के अंदर हजारों बेहद संवेदनशील लाइट सेंसर्स (प्रकाश डिटेक्टर या Digital Optical Modules) लगाए गए हैं, जिन्हें लगभग 1,450 से 2,450 मीटर की गहराई पर बर्फ में लगाया गया है।
जब कोई,उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो बर्फ के परमाणुओं से टकराता है, तो एक हल्की नीली रोशनी जिसे खगोलविज्ञान में (Cherenkov radiation) चेरेनकोव विकिरण कहा जाता है। यह तब उत्पन्न होता है जब कोई आवेशित कण (जैसे इलेक्ट्रॉन) किसी माध्यम (जैसे पानी या काँच) में लगभग प्रकाश की गति से यात्रा करता है। इसके कारण आमतौर पर पानी के भीतर एक चमकदार नीली रोशनी दिखाई देती है,(Cherenkov radiation) पैदा होती है, जिसे ये सेंसर रिकॉर्ड कर लेते हैं। फिर वैज्ञानिक उस सिग्नल से पता लगाते हैं कि कण कहाँ से आया, उसकी दिशा क्या थी, उसकी ऊर्जा कितनी थी और संभवतः वह किस खगोलीय स्रोत से आया। साथ ही यह भी जानना ज़रूरी है कि दक्षिणी ध्रुव की बर्फ का उपयोग करने के कई फायदे हैं जैसे कि यह बर्फ विभिन्न प्रकार के हस्तक्षेप से मुक्त है और यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से स्थिर है, यहाँ कोई भूकंप नहीं आते। अगर हम इस आइसक्यूब के निर्माण की बात करें तो पाते हैं कि आइसक्यूब का निर्माण दिसंबर 2010 में पूरा हुआ था और इसकी कुल लागत लगभग 279 मिलियन डॉलर थी।
*2013 की ऐतिहासिक खोज और महत्व क्या है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला (IceCube Neutrino Observatory)  की आधिकारिक विश्व वैज्ञानिक समुदाय की पुष्टि के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक 2013 में उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो (high-energy astrophysical neutrinos) का पहली बार स्पष्ट अवलोकन था।
इनमें कुछ न्यूट्रिनो की ऊर्जा पेटाइलेक्ट्रॉनवोल्ट Petaelectronvolt (PeV) स्तर तक थी,(पेटाइलेक्ट्रॉनवोल्ट (Petaelectronvolt) ऊर्जा को मापने की एक अत्यंत विशाल इकाई (यूनिट) है)।अर्थात अत्यंत विशाल ऊर्जा। इस खोज ने यह प्रमाणित किया कि हमारे ब्रह्मांड में ऐसे प्राकृतिक स्रोत मौजूद हैं जो अत्यधिक ऊर्जावान न्यूट्रिनो उत्पन्न करते हैं। *इस खोज का विज्ञान की दुनिया में क्या महत्व है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि फ्रांसिस हाल्जेन के इस काम ने खगोल विज्ञान (Astronomy) के एक बिल्कुल नए युग की शुरुआत की है। इस खोज से आगे आने वाले समय में ब्रह्मांड के कई अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठ सकता है क्योंकि न्यूट्रिनो अंतरिक्ष के उन सुदूर और रौद्र एवं अज्ञात कोनों की जानकारी लाते हैं, जहाँ से प्रकाश भी बाहर नहीं आ पाता (जैसे कि एक्टिव गैलेक्टिक न्यूक्लिआई या विशाल ब्लैक होल)। अब अगर हम बात करें पारंपरिक दूरबीनों एवं अन्य विधाओं की तो पाते हैं कि उनसे न्यूट्रिनों को पूरी तरीके से समझना आसान नहीं था या इसको और भी आसान भाषा में समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि अछूते ब्रह्मांड को देखने के साथ ही पारंपरिक टेलिस्कोप केवल प्रकाश या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणों को देख सकते हैं, लेकिन आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी की मदद से वैज्ञानिक अब उन अनदेखी घटनाओं का अध्ययन कर पा रहे हैं जो अरबों प्रकाश वर्ष दूर उस काले घने अंधकारमय ब्रह्मांडीय गुफाओं में घटित हो रही हैं। साथ ही इसे मल्टी-मैसेंजर एस्ट्रोनॉमी के व्यापक विकास के संदर्भ में भी देखा जा सकता है,जहाँ प्रकाश, गुरूत्वीय तरंगें ( gravitational waves), कॉस्मिक रेज (cosmic rays)और न्यूट्रिनों (neutrinos) जैसे अलग-अलग ब्रह्मांडीय संदेशबाहकों (cosmic messengers) से ब्रह्मांड की जानकारी प्राप्त की जाती है। साथ ही यह भी ज्ञात हो कि 2018 में,आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी ने एक अत्यंत उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो को TXS 0506+056 नामक ब्लेज़र (blazar) तक ट्रेस किया,जो ओरायन तारामंडल की दिशा में 3.7 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। यह पहली बार था जब किसी न्यूट्रिनो को उसके विशिष्ट खगोलीय स्रोत से जोड़ा गया।
*क्यों इतना अनोखा है, न्यूट्रिनो और इन्हें खोजना भी इतना मुश्किल क्यों था* ?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि न्यूट्रिनो,ब्रह्मांड के सबसे बुनियादी और रहस्यमयी उप-परमाणु कणों (Subatomic particles) में से एक हैं। इन्हें 'घोस्ट पार्टिकल्स' (Ghost Particles या भूतिया कण) भी कहा जाता है, इन कणों पर कोई विद्युत आवेश (Charge) नहीं होता और इनका द्रव्यमान (Mass) लगभग न के बराबर ही होता है या कुछ यूं कहें कि लगभग कोई द्रव्यमान नहीं है और ये कण सुदूर अंतरिक्ष में होने वाली उग्र घटनाओं (जैसे सुपरनोवा विस्फोट, ब्लैक होल आदि) से पैदा होते हैं और प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं चूंकि ये सामान्य पदार्थ के साथ कोई प्रतिक्रिया भी प्रदर्शित नहीं करते हैं इसलिए ये बिना रुके पृथ्वी, इंसानों, चट्टानों ,पहाड़ों और ग्रहों आदि के पार निकल जाते हैं, इसी वजह से इन्हें सामान्य टेलिस्कोप से देख पाना या पकड़ पाना नामुमकिन था, इसलिए इसमें बर्फ के अंदर हजारों बेहद संवेदनशील लाइट सेंसर्स (प्रकाश डिटेक्टर) लगाए गए हैं। जब कोई उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो बर्फ के परमाणुओं से टकराता है, तो एक हल्की नीली रोशनी पैदा होती है, जिसे ये सेंसर रिकॉर्ड कर लेते हैं। इसीलिए इन उच्च ऊर्जा यूट्रिनो को खोजना इतना अनोखा और इतना मुश्किल एवं चुनौतीपूर्ण था। और यही कार्य एवं इनकी खोज करने के लिए बर्ष 2026 का भौतिकी (फिजिक्स) का नोबेल पुरस्कार वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को अंतरिक्षीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो (high-energy neutrinos of astrophysical origin) की खोज और आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी (IceCube Neutrino Observatory) में उनके निर्णायक योगदान के लिए देने की घोषणा की गई है। उन्होंने अंतरिक्ष से धरती तक आने वाले बेहद ताकतवर और मायावी कणों न्यूट्रिनो को पकड़ने और उनका पता लगाने का तरीका खोजा है एवं आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी जहां उन्होंने दक्षिण ध्रुव (Antarctic) की गहरी बर्फ में हजारों लाइट सेंसर लगाकर दुनिया की पहली विशाल न्यूट्रिनो वेधशाला की नींव रखी, जिससे ब्रह्मांड की ऊर्जावान प्रक्रियाओं का अध्ययन संभव हुआ। साथ ही नई प्रकार की खगोल विज्ञान को भी जन्म दिया है या कुछ यूं कहें कि इस खोज ने खगोल विज्ञान (Astronomy) की एक बिल्कुल नई विधा का मार्ग प्रशस्त किया है, जिससे दूरस्थ आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने में मदद मिलती है।

*क्या है न्यूट्रिनो (Neutrino) कण की कहानी ? ।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि न्यूट्रिनो (Neutrino) कण का सबसे पहले सैद्धांतिक अनुमान वर्ष 1930 में वोल्फगैंग पाउली (Wolfgang Pauli) ने लगाया था,जबकि वर्ष 1956 में क्लाइड कोवान (Clyde Cowan) और फ्रेडरिक रेइन्स (Frederick Reines) ने इसका प्रयोगात्मक रूप से पता लगाया (खोज की) अब अगर हम बात करें न्यूट्रिनो से जुड़े मुख्य तथ्य सैद्धांतिक प्रस्ताव की तो पाते हैं कि 1930 में वोल्फगैंग पाउली ने बीटा क्षय (beta decay) में ऊर्जा संरक्षण के नियम को समझाने के लिए इस काल्पनिक कण का सुझाव दिया था एवं इसके नामकरण की बात करें तो पाते हैं कि इसका नामकरण एक इतालवी भौतिक विज्ञानी एनरिको फर्मी ने इस कण का नाम 'न्यूट्रिनो' रखा, जिसका अर्थ "छोटा उदासीन कण" है। साथ ही इसके प्रयोगात्मक खोज की बात करें तो पाते हैं कि 1956 में क्लाइड कोवान और फ्रेडरिक रेइन्स ने परमाणु रिएक्टर का उपयोग करके पहली बार न्यूट्रिनो का प्रायोगिक प्रमाण प्राप्त किया। इस खोज के लिए फ्रेडरिक रेइन्स को 1995 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला  और अब वर्ष 2026 की बात करें तो पाते हैं कि 2026 का भौतिकी (फिजिक्स) का नोबेल पुरस्कार वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को अंतरिक्षीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो (high-energy neutrinos of astrophysical origin) की खोज और आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी (IceCube Neutrino Observatory) में उनके निर्णायक योगदान के लिए दिया गया है,क्योंकि उन्होंने अंतरिक्ष से धरती तक आने वाले बेहद ताकतवर और मायावी कणों जिन्हें न्यूट्रिनो कहा जाता है को पकड़ने और उनका पता लगाने का तरीका खोजा।

*भारत के शोधकर्ताओं के लिए इस खोज का क्या महत्व हो सकता है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारतीय छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह खोज विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह दर्शाती है कि कैसे एक साधारण विचार (दक्षिणी ध्रुव की बर्फ का उपयोग) और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों को सुलझाया जा सकता है।
आइसक्यूब एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग है, जिसमें लगभग 450 भौतिक विज्ञानी, 58 संस्थान और 14 देश शामिल हैं। साथ ही अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित IceCube Neutrino Observatory (आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला) के संदर्भ में भारत का महत्व भी कुछ मुख्य बिंदुओं से समझा जा सकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि आइसक्यूब एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परियोजना है, लेकिन वैसे तो भारत का इस वेधशाला से प्रत्यक्ष या सीधे तौर पर संबंध नहीं है, लेकिन भारतीय वैज्ञानिक, शोधकर्ता और संस्थान वैश्विक स्तर पर इस प्रयोग के डेटा विश्लेषण, कोडिंग और इसके माध्यम से की जाने वाली ब्रह्मांडीय खोजों (जैसे "घोस्ट पार्टिकल्स" या न्यूट्रिनो की पहचान) में अनुसंधान के ओपन-सोर्स डेटा का विश्लेषण करते हैं।और साथ में यह भी जानना आवश्यक है कि भारत भी अपना न्यूट्रिनो प्रोजेक्ट  INO (India-based Neutrino Observatory) बनाने के लिए प्रयास कर रहा है इसीलिए जब भी विज्ञान में आइस क्यूब ऑब्जर्वेटरी (IceCube Observatory) की बात होती है, तो उसके समानांतर भारत के अपने प्रोजेक्ट INO (इंडिया-बेस्ड न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी) की चर्चा जरूर होती है। लेकिन दोनों में अंतर क्या है? यह भी जानना ज़रूरी है,जहाँ आइस क्यूब अंटार्कटिका की गहरी बर्फ (Ice) के नीचे न्यूट्रिनो ढूंढता है, वहीं भारत का आई०एन० ओ०,(INO)  प्रोजेक्ट तमिलनाडु के थेनी जिले की बोदी पश्चिम पहाड़ियों में जमीन के नीचे एक विशाल प्रयोगशाला बनाने की योजना है एवं इसके लोकेशन के महत्व की बात करें तो पाते हैं कि भारत की भौगोलिक स्थिति भूमध्य रेखा (Equator) के पास है,यहाँ बनाई जाने वाली ऑब्जर्वेटरी से वैज्ञानिकों को उन न्यूट्रिनो कणों का भी अध्ययन करने में मदद मिल मिलेगी जो पृथ्वी के कोर (केंद्र) से होकर गुजरते हैं साथ ही यह डेटा,आइस क्यूब जैसी ध्रुवीय (Polar) ऑब्जर्वेटरी के पूरक के रूप में काम आ सकता है। लेकिन अभी तो इस प्रोजेक्ट की संपूर्ण स्थापना को कई चुनौतियों से निबटना बाकी है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अब हम पुनः संक्षेप में फ्रांसिस हाल्जेन एवं आइस क्यूब ऑब्जर्वेटरी की बात करें तो पाते हैं कि फ्रांसिस हाल्जेन ने अंटार्कटिका की बर्फ को एक अनोखी विशाल दूरबीन में बदल दिया, जिसने विज्ञान को ब्रह्मांड के उन सबसे रहस्यमयी 'भूतिया कणों' को पकड़ने और समझने की शक्ति दी,जो अब तक इंसान की पहुंच से पूरी तरह बाहर थे। इसीलिए यह भी समझना ज़रूरी है कि यह नोबेल पुरस्कार केवल किसी एक व्यक्ति द्वारा अकेले किए गए प्रयोग के लिए नहीं है बल्कि हाल्जेन का सम्मान उनके निर्णायक वैज्ञानिक योगदान, दृष्टि और आइसक्यूब के नेतृत्व तथा उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो की खोज से जुड़ा है। जो निश्चित तौर पर यह दर्शाता है कि अगर टीम भावना से एवं समग्र रूप से दृढ़ संकल्प और सकारात्मकता से लगातार कोई भी कार्य किया जाता है तो एक दिन उन अच्छे कार्यों का फल और किसी भी समस्या का हल भी अवश्य ही प्राप्त होता है।और इसी को सार्थक होता हुआ देख सकते है कि नोबेल पुरस्कार समिति द्वारा 2026 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार को देने की घोषणा, फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को की गई है।
संजय चावला की फिल्म ‘मिलो जो तुम’ में नजर आएंगे रॉक स्टार संगीत मासूम
मुंबई। हिंदी सिनेमा में नई प्रतिभाओं और मनोरंजक विषयों को लेकर लगातार सक्रिय जाने-माने फिल्म निर्माता संजय चावला अब अपनी आगामी फिल्म ‘मिलो जो तुम’ को लेकर चर्चा में हैं। कॉमेडी, रोमांस और भरपूर मनोरंजन से सजी इस फिल्म की शूटिंग शीघ्र शुरू होने जा रही है। फिल्म की लोकेशन फाइनल कर ली गई है और इसका प्रमुख हिस्सा मध्य प्रदेश की खूबसूरत राजधानी भोपाल में फिल्माया जाएगा।
फिल्म का निर्देशन अनुभवी एवं प्रतिभाशाली निर्देशक मृत्युंजय किचम्बरे कर रहे हैं। निर्माता संजय चावला और निर्देशक मृत्युंजय किचम्बरे ने बताया कि फिल्म की तैयारियां अंतिम चरण में हैं और जल्द ही पूरी यूनिट भोपाल में शूटिंग शुरू करेगी। मिलो जो तुम’ की एक खास बात इसकी मजबूत संगीत और साहित्यिक पृष्ठभूमि भी है। फिल्म के गीत प्रसिद्ध साहित्यकार एवं गीतकार दुर्गा प्रसाद उपाध्याय ‘अभिराज’ ने लिखे हैं। निर्माताओं के अनुसार उन्होंने फिल्म की कहानी, भावनाओं और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बेहद खूबसूरत और प्रभावशाली गीतों की रचना की है, जो फिल्म के कथानक को और अधिक जीवंत बनाएंगे।
फिल्म की स्टारकास्ट में सबसे चर्चित नाम उभरते अभिनेता और रॉक स्टार संगीत मासूम का है। निर्माता संजय चावला ने संगीत मासूम की प्रतिभा पर भरोसा जताते हुए उन्हें अपनी इस महत्वाकांक्षी फिल्म के लिए साइन किया है। फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि ‘मिलो जो तुम’ संगीत मासूम के अभिनय करियर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकती है।
संगीत मासूम तेजी से बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बना रहे युवा कलाकारों में शामिल हैं। अभिनय, स्क्रीन प्रेजेंस और डांसिंग स्किल्स के कारण वह विशेष रूप से नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। प्रतिष्ठित रोशन तनेजा एक्टिंग एकेडमी से अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ ही उन्होंने प्रसिद्ध कोरियोग्राफर सरोज खान से नृत्य की बारीकियां भी सीखी हैं। कई साल थिएटर को दिए हैँ। यही प्रशिक्षण उनके अभिनय और ऑन-स्क्रीन व्यक्तित्व को एक अलग धार देता है। संगीत मासूम अब तक कई चर्चित म्यूजिक प्रोजेक्ट्स में अपने अभिनय का प्रभाव छोड़ चुके हैं। पद्म भूषण उदित नारायण, पद्मश्री अनूप जलोटा, अगम कुमार निगम, समीर खान, कृष्णा बेउरा और हरमन नाजिम जैसे जाने-माने गायकों के गीतों में वह अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुके हैं। विभिन्न संगीत वीडियो के माध्यम से उन्होंने युवा दर्शकों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
म्यूजिक वीडियोज के अलावा संगीत मासूम ने कई शॉर्ट फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी है। इन दिनों वह फिल्म ‘प्रेमांजलि’ में भी काम कर रहे हैं। ऐसे समय में निर्माता संजय चावला द्वारा उन्हें ‘मिलो जो तुम’ जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए चुना जाना उनके करियर के लिए एक और बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
निर्माता संजय चावला का कहना है कि ‘मिलो जो तुम’ केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि हास्य, भावनाओं, रिश्तों और मनोरंजन का ऐसा खूबसूरत संगम होगी, जिसमें हर आयु और हर वर्ग के दर्शकों के लिए कुछ न कुछ खास होगा।उन्होंने विश्वास जताया कि फिल्म की कहानी, निर्देशन, संगीत और कलाकारों का शानदार तालमेल इसे दर्शकों के लिए एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनाएगा। संजय चावला के शब्दों में, ‘मिलो जो तुम’ मनोरंजन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाएगी और दर्शकों के दिलों तक पहुंचेगी। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले ही संगीत मासूम की मौजूदगी ने ‘मिलो जो तुम’ को लेकर उत्सुकता बढ़ा दी है। अभिनय और संगीत की दुनिया में लगातार आगे बढ़ रहे इस युवा कलाकार के लिए यह फिल्म नए अवसरों के द्वार खोल सकती है। जिस तेजी से संगीत मासूम अपने अभिनय और व्यक्तित्व से दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले समय में सिनेमा के आकाश पर संगीत मासूम का सितारा और भी अधिक चमकता नजर आएगा।
मानसून की वापसी के बीच बिगड़ेगा मौसम का मिजाज, दिल्ली-एनसीआर से यूपी-बिहार तक अलर्ट

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देश भर में मौसम का मिजाज अब तेजी से बदलने लगा है। दक्षिण-पश्चिम मानसून उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों से विदा हो चुका है। हालांकि, दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में अभी भी बारिश का दौर जारी है। इस बीच भारतीय मौसम विभाग ने दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत करीब 12 राज्यों के लिए नया अपडेट जारी किया है।बंगाल की खाड़ी में नया सिस्‍टम बनने की प्रबल संभावना के बीच मौसम के तेवर के तल्‍ख होने का अनुमान है।

बारिश के साथ आंधी-बिजली गिरने की आशंका

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, अलग-अलग स्तरों पर बनी कई मौसम प्रणालियों के प्रभाव से उत्तर-पश्चिम, मध्य, पूर्व, पूर्वोत्तर, पश्चिमी और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कई हिस्सों में बारिश, गरज-चमक और तेज हवाएं चल सकती हैं। दिल्ली-एनसीआर समेत हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में 6 से 11 अक्टूबर 2026 के बीच हल्की से मध्यम बारिश के साथ आंधी और बिजली गिरने की संभावना जताई गई है। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी बारिश होने का पूर्वानुमान है।

60 किमी की रफ्तार से चलेगी हवा

मौसम विभाग ने 15 से 16 राज्‍यों में आंधी-तूफान के साथ बारिश होने की संभावना जताई है। इस दौरान 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने का भी पूर्वानुमान है। पूर्वी भारत के कई हिस्सों में गरज-चमक और बिजली गिरने की घटनाएं हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को मौसम का अपडेट देखकर ही यात्रा करने की सलाह दी गई है।

युवा सपा नेता अतुल वर्मा ने झंडी दिखाकर यात्रा का किया शुभारंभ
कमलेश मेहरोत्रा लहरपुर (सीतापुर)।  क्षेत्र के ग्राम उमरा कलां  से एक  साईकिल यात्रा सैफई के लिए  रवाना। युवा सपा नेता अतुल वर्मा ने झंडी दिखाकर यात्रा का किया शुभारंभ। रविवार को क्षेत्र के ग्राम उमरा कलां स्थित समाजवादी पार्टी कार्यालय पर क्षेत्र के युवा सपा कार्यकर्ताओं का सपा  नेता अतुल वर्मा ने स्वागत करते हुए उनका उत्साह वर्धन किया और सभी को समाजवादी पार्टी का पटका व पहचान पत्र पहनाया। इस मौके पर उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं का उत्साह वर्धन किया और कहा कि आप सभी पार्टी के एक मजबूत स्तंभ है उन्होंने छह दिवसीय पीडीए साइकिल यात्रा को  हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

साइकिल यात्रा के संयोजक अविनेश यादव व नीरज यादव ने बताया कि, रविवार से प्रारंभ हुई पीडीए साइकिल यात्रा आगामी 10 अक्टूबर को सैफई पहुंचकर स्वर्गीय  नेता मुलायम सिंह की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगी, उन्होंने बताया कि  साइकिल यात्रा जगह-जगह लोगों को समाजवादी पार्टी की कल्याणकारी नीतियों की जानकारी देते हुए एक बार फिर सपा का परचम लहराने के लिए लोगों को जागरूक करेगी।  इस मौके पर प्रमुख रूप से जिला अध्यक्ष महिला सभा ज्ञानवती, विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रतापसिंह,राजेंद्र यादव, रफीक , प्रधान सेतुबंध यादव, डॉक्टर इस्माइल, भागीरथ मौर्य ,गौरव सहित साइकिल यात्री  गौतम कुमार यादव, अवनेश यादव, मालतीभार्गव, नीरज यादव, संदीप यादव, नीरज यादव, संतोष कुमार यादव, रामबाबू, बबलू कुमार, अतुलमिश्रा सहित 25 सदस्य उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री जी के निर्देशों के क्रम में देवीपाटन मंडल के समस्त जनपदों में प्रमुखता से हो रहा कार्य

*आईजीआरएस पर देवीपाटन मंडल का दबदबा कायम, लगातार सातवीं बार प्रदेश में प्रथम*

*सितंबर माह में 91.82 प्रतिशत अंक के साथ प्रदेश में शीर्ष स्थान*

*मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की सघन मॉनिटरिंग और शिकायतकर्ताओं से सीधा संवाद बना प्रभावी निस्तारण का आधार*

*‘मां पाटेश्वरी शक्ति संवाद’ के जरिए महिलाओं की शिकायतों के त्वरित समाधान पर विशेष जोर एवं वाद मुक्त देवीपाटन:से संवाद इसकी अतिरिक्त अन्य और योजनाओं को गहन समीक्षा के उपरान्त*
*मण्डलायुक्त  की पहल को समस्त जिलाधिकारी फॉलो एवं निगरानी करें*

*गोण्डा, 04 अक्टूबर 2026।* जनशिकायतों के त्वरित, पारदर्शी एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण की दिशा में देवीपाटन मंडल ने एक बार फिर प्रदेश में अपनी उत्कृष्ट कार्यशैली का परचम लहराया है। आईजीआरएस (समन्वित शिकायत निवारण प्रणाली) की सितंबर 2026 की रैंकिंग में देवीपाटन मंडल ने  91.82 प्रतिशत के साथ प्रदेश में प्रथम स्थान हासिल किया है।

मंडल की यह उपलब्धि जनशिकायतों के निस्तारण में अपनाई जा रही प्रभावी मॉनिटरिंग व्यवस्था, अधिकारियों की जवाबदेही, शिकायतकर्ताओं से सीधे फीडबैक तथा प्रकरणों के वास्तविक समाधान पर दिए जा रहे विशेष जोर का परिणाम है।

शिकायत का निस्तारण नहीं, समस्या का समाधान है प्राथमिकता

मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के निर्देशन में मंडल के चारों जनपदों—गोण्डा, बहराइच, श्रावस्ती एवं बलरामपुर—में आईजीआरएस पर प्राप्त शिकायतों के निस्तारण की नियमित एवं गहन समीक्षा की जा रही है।

मंडलायुक्त द्वारा अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि आईजीआरएस पर किसी शिकायत का केवल औपचारिक अथवा कागजी निस्तारण पर्याप्त नहीं है। शिकायतकर्ता की समस्या का वास्तविक एवं संतोषजनक समाधान ही निस्तारण का आधार होना चाहिए।

इसी उद्देश्य से मंडलायुक्त द्वारा स्वयं प्रत्येक माह रैंडम आधार पर शिकायतकर्ताओं से फोन पर संवाद कर फीडबैक लिया जाता है। शिकायतकर्ता से यह जानकारी प्राप्त की जाती है कि उसकी समस्या का वास्तविक समाधान हुआ है अथवा नहीं। फीडबैक में यदि किसी प्रकरण में औपचारिक निस्तारण अथवा समस्या का समाधान न होना सामने आता है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं।

इस व्यवस्था से जनशिकायतों के निस्तारण में गुणवत्ता, पारदर्शिता एवं जवाबदेही को और मजबूती मिली है।

*‘मां पाटेश्वरी शक्ति संवाद’ से महिलाओं को मिला सीधा प्रशासनिक मंच वाद मुक्त:से समाधान देवीपाटन मंडल के सभी महिलाओं की समस्याओं का हो रहा निदान*

महिलाओं एवं बेटियों की समस्याओं के त्वरित एवं प्रभावी समाधान के लिए मंडल में संचालित ‘मां पाटेश्वरी शक्ति संवाद’ पहल भी जनशिकायत निस्तारण व्यवस्था को नई गति दे रही है।

गोण्डा, बहराइच, श्रावस्ती एवं बलरामपुर में संचालित इस पहल के माध्यम से महिलाओं की समस्याओं को प्राथमिकता के साथ सुना जा रहा है तथा संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के निर्देश दिए जा रहे हैं।

इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को अपनी समस्याएं सीधे प्रशासन के समक्ष रखने का सहज एवं प्रभावी मंच उपलब्ध कराना है, जिससे उन्हें त्वरित राहत मिल सके और प्रशासन के प्रति उनका विश्वास और अधिक मजबूत हो।

लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन का सिलसिला जारी

देवीपाटन मंडल का आईजीआरएस पर उत्कृष्ट प्रदर्शन लगातार जारी है। मार्च 2026 में प्रथम, अप्रैल में प्रथम, मई में द्वितीय तथा जून, जुलाई, अगस्त एवं सितंबर 2026 में पुनः प्रथम स्थान प्राप्त कर मंडल ने जनशिकायतों के निस्तारण में निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन दर्ज किया है।

लगातार शीर्ष स्थान प्राप्त करना मंडल में शिकायतों की नियमित समीक्षा, लंबित प्रकरणों की सघन मॉनिटरिंग, शिकायतकर्ताओं से सीधे संवाद और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रभावी व्यवस्था को दर्शाता है।

जनविश्वास को मजबूत करना प्रशासन की प्राथमिकता

मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने इस उपलब्धि के लिए मंडल के सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को बधाई देते हुए कहा कि आईजीआरएस पर प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त करना केवल एक रैंकिंग नहीं, बल्कि जनसमस्याओं के प्रति प्रशासन की संवेदनशीलता, जवाबदेही और प्रतिबद्धता का परिणाम है।

उन्होंने कहा कि जनशिकायतों का समयबद्ध, निष्पक्ष एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। प्रत्येक अधिकारी यह सुनिश्चित करे कि शिकायतकर्ता को केवल निस्तारण की सूचना न मिले, बल्कि उसकी समस्या का वास्तविक समाधान भी हो।
4 अक्टूबर 2026 की रात्रि में बलयों के राजा, शनि ग्रह की विपरीत स्थिति (Opposition) एवं अन्य खगोलीय पिंडों की भी दृश्यता

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 4 अक्टूबर 2026 को शनि ग्रह अपनी विपरीत स्थिति (Opposition) में पहुँच रहा है, जो वर्ष 2026 का सबसे चमकीला और स्पष्ट दृश्य होगा। इस खगोलीय घटना के दौरान पृथ्वी,सूर्य और शनि के बीच से गुजरेगी, जिससे शनि हमारे आकाश में सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में दिखाई देगा। यह स्थिति खगोल प्रेमियों के लिए एक अनोखा अवसर है क्योंकि शनि इस समय अपनी अधिकतम चमक और सबसे बड़े आकार में दिखाई देगा, और इसे पूरी रात आसानी से देखा जा सकेगा।

*क्या होता है खगोल विज्ञान में शनि ग्रह की विपरीत स्थिति का अर्थ और महत्व ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विपरीत स्थिति (Opposition) एक ऐसी खगोलीय स्थिति है जब पृथ्वी सूर्य और किसी बाहरी ग्रह (जैसे शनि, बृहस्पति, मंगल) के बीच से गुजरती है। इस स्थिति में ग्रह,सूर्य के विपरीत दिशा में होता है,अर्थात सूर्य अस्त होने पर ग्रह उदय होता है और सूर्य उदय होने पर अस्त होता है। अगर हम बात करें शनि ग्रह की तो पाते हैं कि शनि की विपरीत स्थिति लगभग 378 दिनों (या 54 सप्ताह) के अंतराल पर आती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 1 वर्ष लगता है, जबकि शनि को अपनी कक्षा में एक चक्कर लगाने में 29.4 पृथ्वी वर्ष लगते हैं। इसलिए, हर साल पृथ्वी को शनि को "पकड़ने" और उससे आगे निकलने के लिए अपनी कक्षा में थोड़ी अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है, जिसके कारण शनि की विपरीत स्थिति प्रत्येक वर्ष लगभग दो सप्ताह बाद आती है।
*क्या है 4 अक्टूबर 2026 की विशेष खगोलीय घटना ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए बताया कि समय, स्थान और तारीख की बात करें तो पाते हैं कि शनि की विपरीत स्थिति 4 अक्टूबर 2026 को भारतीय समयानुसार शाम 5:30 बजे पर होगी। लेकिन शनि ग्रह को सूर्यास्त के बाद से लेकर पूरी रात भर देखा जा सकता है।

*किस दिशा और तारामण्डल में दिखाई देगा शनि ग्रह ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस दौरान शनि ग्रह, सीट्स (Cetus) तारामंडल में स्थित होगा। जोकि पूर्वी क्षितिज से थोड़ा सा उत्तर दिशा की तरफ से ऊपर आते हुए दिखाई देगा या कुछ यूं कहें कि दृश्यता की बात करें तो पाते हैं कि शनि ग्रह ,सूर्यास्त के समय पूर्वी क्षितिज से उदय होगा और पूरी रात आकाश में दिखाई देता रहेगा, और सूर्योदय के समय पश्चिमी क्षितिज पर अस्त होगा।

*दूरी और चमक (मैग्नीट्यूड) कितना होगा ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विपरीत स्थिति में शनि की चमक प्लस 0.32 मैग्नीट्यूड तक पहुँच जाएगी, जो इसे आकाश के चमकीले तारों के बराबर बनाती है। यह सामान्य दिनों की तुलना में थोड़ा अधिक चमकीला होगा और साथ ही पृथ्वी से इसकी दूरी की बात करें तो पाते हैं कि बाहरी ग्रह विपरीत स्थिति वाले वर्ष में पृथ्वी के सबसे निकट होते हैं। 2026 में, शनि ग्रह ,पृथ्वी से लगभग 784 मिलियन मील (1.26 बिलियन किलोमीटर) दूर होगा। यह दूरी लगभग 8.43 खगोलीय इकाई (AU) या 70 प्रकाश-मिनट के बराबर होती है।और यह भी जानना आवश्यक है कि डिस्क का आकार क्या होगा तो पता चलता है कि दूरबीन से देखने वालों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि विपरीत स्थिति में शनि की डिस्क का आकार सबसे बड़ा होता है। अपने सबसे बड़े आकार में, शनि दूरबीनों से 19.7 आर्कसेकंड व्यास का दिखाई देगा। इस दौरान शनि के वलयों का काफ़ी झुकाव एक प्रमुख आकर्षण होगा और यह भी समझने में सहूलियत होती है कि कैसे शनि ग्रह अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा के दौरान शनि के छल्लों का दिखना कैसा होता है।जैसे कि खगोलप्रेमियों देखा था कि मार्च 2025 में शनि के वलय तल (Ring Plane) से गुजरा था, जब वलय पृथ्वी से लगभग किनारे-किनारे (edge-on) दिखाई दे रहे थे और छोटी दूरबीनों में अदृश्य से हो गए थे।और अक्टूबर 2026 में, वलय फिर से देखने पर धीरे धीरे से खुलने(दृश्यमान) होने लगे हैं और पृथ्वी से देखने वालों के सापेक्ष शनि के वलय माइनस 7.5 डिग्री दक्षिण की ओर झुके हुए होंगे। हालांकि यह झुकाव 2017 जैसे अधिकतम खुले वलयों (27 डिग्री) जितना नहीं है,लेकिन फ़िर भी यह छोटी दूरबीनों में वलयों को स्पष्ट रूप से देखने के लिए पर्याप्त है। *4 अक्टूबर की रात से 7 अक्टूबर 2026 की रात्रि का खगोलीय दृश्य कैसा होगा?।*

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश,भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया 4 अक्टूबर से 7 अक्टूबर 2026 तक की रात आकाश में एक सुंदर एवं खगोलीय जिज्ञासा बढ़ाने वाला खगोलीय दृश्य देखने को मिलेगा, जिसमें शनि के अलावा अन्य ग्रह, तारे और चंद्रमा भी शामिल होंगे। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 4 अक्टूबर 2026 की रात्रि में शनि ग्रह की बात करें तो पाते हैं कि  यह शाम को लगभग 5:50 बजे के बाद से पूर्वी क्षितिज से ऊपर आते हुए रात भर आकाश के सीट्स तारामंडल में प्लस 0.32 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ चमकीला खगोलीय पिंड होगा।और चंद्रमा रात लगभग 12:30 बजे पूर्वी क्षितिज पर थोड़ा उत्तर दिशा में कर्क (Cancer) तारामंडल में लगभग माइनस 9.57 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ उदय होगा। और उसी दिशा में दो सुंदर तारों की बात करें तो पाते हैं कि चंद्रमा के ऊपर कैस्टर (Castor) और पोलैक्स (Pollux) तारे चमकते हुए दिखाई देंगे। अब अगर मंगल ग्रह की बात करें तो पाते हैं कि उसी दिशा से निकलते हुए मंगल ग्रह लगभग 12:50 बजे पूर्वी क्षितिज पर थोड़ा सा उत्तर दिशा में ऊपर आना शुरू करेगा और चंद्रमा के काफी नीचे कर्क तारामंडल क्षेत्र में ही मंगल ग्रह लगभग प्लस 1.10 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ दिखाई देगा। एवं इसी कड़ी में ब्रहस्पति ग्रह की भी बात करें तो पाते हैं कि बृहस्पति ग्रह भी रात लगभग 2:05 बजे, सिंह (Leo) तारामंडल में लगभग माइनस 1.74 मैग्नीट्यूड की चमक लिए उदय होगा और उसी दिशा क्षेत्र में रेगुलस तारा भी अपनी चमक बिखेरते हुए रात लगभग 2:50 बजे, ठीक उसी पूर्वी क्षितिज से थोड़ा उत्तर दिशा में सिंह तारामंडल क्षेत्र में रेगुलस तारा लगभग प्लस 1.40 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ दिखाई देगा।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह सुंदर खगोलीय दृश्य 4 अक्टूबर से लेकर 7 अक्टूबर 2026 तक थोड़े सा समय में भी बदलाव करते हुए एवं आगे-पीछे दिखते और मैग्नीट्यूड में थोड़ा सा परिवर्तन के साथ दिखाई देते रहेंगे। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विशेष रूप से, 7 अक्टूबर को रात में लगभग 2:40 बजे के बाद क्षितिज से ऊपर चंद्रमा और रेगुलस तारे की एक शानदार युति  (Conjunction) भी दिखाई देगी, जहाँ वे काफी पास-पास दिखाई देंगे।
इसी दौरान खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष व्याख्या करते हुए समायोचित रूप में बताया कि हमारे समाज में शनि ग्रह को लेकर फैले हुए भ्रम से बचने की भी अति आवश्यकता है क्योंकि बिना जाने एवं देखे, जांचे,परखे और बिना विश्व वैज्ञानिक प्रमाण आधारित तथ्यों के कुछ भी यूँ ही नहीं मानना चाहिए, इसीलिए पहले ठीक से जानना चाहिए तभी मानना चाहिए और तभी किसी समाज में व्याप्त अंधविश्वासों का निवारण किया जा सकता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं सर्वांगीण वैज्ञानिक वातावरण से उत्पन्न वैज्ञानिक चेतना का विकास हो सकता है एवं तभी किसी समाज और देश का भला भी हो सकता है, इसीलिए खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि शनि के छल्लों और चंद्रमाओं की दुनिया की बात करें तो पाते हैं कि शनि, सूर्य से बाहर की ओर स्थित छठा ग्रह है। प्राचीन काल में लोग इसे स्थिर तारों के बीच घूमने वाले एक सुनहरे "तारे" या 'घुमक्कड़' के रूप में देखते थे। लेकिन उन्होंने बाद में जाना कि यह कोई तारा नहीं है बल्कि यही है शनि ग्रह। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि शनि के वलयों की बात करें तो पाते हैं कि 17वीं शताब्दी में दूरबीनों के आविष्कार के बाद ही इसके छल्ले दिखाई देने लगे। साथ ही बाद में अंतरिक्ष यानों ने भी खुलासा किया कि शनि के कई पतले, बारीक और अति सुंदर वलय हैं जो बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़ों से बने हैं। और यही छल्ले इसकी खूबसूरती का राज़ हैं जो इसे सुंदरता में अन्य से ज़्यादा सम्मान दिलाते हैं, इसीलिए इसको वलयों का सम्राट भी कहा जाता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अब अगर हम शनि ग्रह के चंद्रमाओं की बात करें तो पाते हैं कि शनि के कम से कम 293 चंद्रमा हैं जिनकी कक्षाएँ सिद्ध हो चुकी हैं। इनमें से केवल 13 चंद्रमाओं का व्यास 30 मील (लगभग 50 किलोमीटर) से अधिक है।

*शनि को देखने का सबसे अच्छा समय कौनसा होता है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि शनि ग्रह को देखने के लिए सबसे अच्छा समय, विपरीत स्थिति होती है जो वर्ष के उस सर्वोत्तम समय के मध्य में होती है जब किसी बाहरी ग्रह को देखना संभव होता है। एवं बिना किसी दूरबीन/ टेलीस्कोप या विनोकुलर आदि उपकरण की सहायता से भी आप नंगी आँखों से ही शनि ग्रह को आसानी से देख कर पहचान सकते हैं क्योंकि शनि ग्रह भी एक चमकीला ग्रह है और जब यह हमारे क्षितिज के ऊपर होता है, तो यह बिना किसी उपकरण के आसानी से दिखाई देता है। लेकिन अगर आप इसके छल्लों को अच्छे से देखना चाहते हैं तो आप किसी भी अच्छी दूरबीन, जिसे स्थिर रूप से पकड़ा जाए या तिपाई पर लगाया जाए, तब शनि को एक चमकदार अंडाकार डिस्क के रूप में प्रदर्शित करेगी। वहीं, यदि आप छोटी दूरबीन को भी अच्छे से समान्तरण कर सकें और प्रकाश प्रदूषण नहीं हो एवं साथ ही सटीक दिशा का ज्ञान और पहचान होने पर मौसम साफ़ हो तो किसी भी 6 इंच के छोटे घरेलू दूरबीन से भी इसके सुंदर छल्ले आसानी से दिखाई दे सकते हैं ।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 4 अक्टूबर 2026 की रात शनि को देखने के लिए एक बेहतरीन मौका है। इस दौरान आप साधारण आँखों से ही इसे देख सकते हैं और यह न केवल वर्ष का सबसे चमकीला शनि होगा,बल्कि इस रात्रि में चंद्रमा, मंगल, बृहस्पति और कैस्टर,पोलक्स और रेगुलस तारे के साथ बना खगोलीय दृश्य भी दर्शनीय होगा। और अंत में खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष ज़ोर देते हुए यह भी बताया कि खगोल/अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बिना एक्सपर्ट के जानकारी दिए ऐसे ही किसी की भी आदि अधूरी और अप्रमाणित सूचनाओं के साथ ही भ्रामक जानकारियों एवं अंधविश्वासों से पूरी तरीके से दूर रहें, इसीलिए खगोलविद अमर पाल सिंह हमेशा ही कहते हैं कि सही ज्ञान, सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान।
इसी के साथ खगोलविद अमर पाल सिंह ने यह भी बताया कि अगर 4 अक्टूबर 2026 की रात को आप उपरोक्त तारों, ग्रहों और चंद्रमा को किसी कारणवश नहीं देख पाएं तो भी उतना निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि शनि की विपरीत स्थिति का दृश्य छोड़कर उपरोक्त खगोलीय पिण्डों का दिखना जैसे चंद्रमा, ग्रहों और तारों का दृश्य संयोजन दूरी में आगे पीछे एवं समय और थोड़ा सा मैग्नीट्यूड और दिशा आदि में भी परिवर्तन के साथ आकाश में दिखाई देते हुए 7 अक्टूबर तक सुंदर दृश्य रूप में दिखाई देंगे।
     
युजवेंद्र चहल ने क्रिकेट के इस फॉर्मेट से लिया संन्यास, इंस्टाग्राम पर लिखा भावुक मैसेज

#yuzvendrachahalannouncedhisretirementfromfirstclasscricket

भारतीय स्पिनर युजवेंद्र चहल ने रेड बॉल क्रिकेट फॉर्मेट यानी फर्स्ट क्लास क्रिकेट से संन्यास का एलान कर दिया है। चहल ने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिये फर्स्ट क्लास क्रिकेट को अलविदा कहने की घोषणा की। हालांकि, उन्होंने भारत के लिए खेलने की इच्छा जाहिर की है। उन्होंने अपना आखिरी रेड-बॉल मैच हाल ही में लॉर्ड्स में नॉर्थम्पटनशायर के लिए खेला था। अब व्हाइट-बॉल क्रिकेट खेलना जारी रखेंगे।

युजवेंद्र चहल का भावुक पोस्ट

न्यास का ऐलान करते हुए युजवेंद्र चहल ने भावुक पोस्ट शेयर किया। चहल ने इंस्टाग्राम पोस्ट पर लिखते हुए कहा- मैंने जो पहली क्रिकेट बॉल पकड़ी थी, वह लाल रंग की थी। तब मैं 10 साल का था और मुझे अंदाजा भी नहीं था कि मुझे इस खेल से इतना गहरा लगाव हो जाएगा। मेरे लिए रेड-बॉल क्रिकेट कभी भी सिर्फ एक और फॉर्मेट नहीं था। इसी खेल ने मुझे सब्र, कैरेक्टर, मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत और घंटों तक मैदान पर डटे रहकर हर रन और हर विकेट के लिए संघर्ष करने की असली खुशी का मतलब सिखाया।

मेरा सफर खत्म नहीं हुआ-चहल

उन्होंने आगे लिखा, मैंने अपना आखिरी प्रथम श्रेणी मैच लॉर्ड्स में खेला। यह कहते हुए भावुकता महसूस होती है क्योंकि टेस्ट कैप पाना हमेशा से मेरा सपना रहा था, जिसे मैंने कई वर्षों तक संजोकर रखा था। भले ही वह सपना पूरा न हो सका, लेकिन मैं अपने इस सफर से सचमुच संतुष्ट हूं और इस प्रारूप में मिले हर मौके के लिए बेहद शुक्रगुजार हूं। रेड बॉल ने मुझे मेरी जिंदगी की कुछ सबसे खूबसूरत यादें दी हैं और कोई भी मुझसे वे यादें कभी नहीं छीन सकता। लेकिन मेरा सफर अभी खत्म नहीं हुआ है।

एक भी टेस्ट खेलने का मौका नहीं मिला

वह लंबे समय से टीम इंडिया से भी बाहर चल रहे है। अगस्त 2023 में भारत के लिए आखिरी बार वेस्टइंडीज के खिलाफ खेलते नजर आए थे। 36 साल के चहल ने भारत के लिए 72 वनडे और 80 टी-20 इंटरनेशनल खेले हैं, लेकिन उन्हें एक भी टेस्ट खेलने का मौका नहीं मिला। यानी रेड बॉल में उन्होंने कभी कोई इंटरनेशनल मैच नहीं खेला।

भारत के लिए कभी नहीं खेला टेस्ट

चहल ने लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड पर नॉर्थम्प्टनशायर के लिए रेड बॉल प्रारूप में अपना आखिरी मैच खेला। चहल ने अपने करियर में 49 प्रथम श्रेणी मैच खेले, जिसमें उन्होंने 32.27 की औसत से 148 विकेट लिए। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 6/25 रहा। हाल ही में उन्होंने नॉर्थम्प्टनशायर के लिए काउंटी क्रिकेट खेला और लॉर्ड्स में मिडलसेक्स के खिलाफ अपने आखिरी मैच में दो विकेट लिए। 2026-27 सीजन में 36 वर्षीय खिलाड़ी ने काउंटी चैंपियनशिप में पांच मैच खेले और 21 विकेट लिए। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन डरहम के खिलाफ रहा, जहां उन्होंने कुल नौ विकेट लिए जिसमें पहली पारी में पांच विकेट लेना भी शामिल था।

इंडी गठबंधन की बैठक में अखिलेश को बुलाया तक नहीं गया, कांग्रेस-सपा की कलह पर सुभाष यदुवंश का तंज
- 'इनको वोट देना अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद करना है’, सुभाष यदुवंश का अखिलेश-राहुल पर हमला
- बीजेपी MLC ने कहा- 'राजतंत्र और परिवारतंत्र में विश्वास करते हैं राहुल और अखिलेश’

लखनऊ, 08 अक्टूबर। बीजेपी के विधान परिषद सदस्य (MLC) सुभाष यदुवंश ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला है। दिल्ली में बुधवार को कांग्रेस की ओर से आयोजित इंडी गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव को नहीं बुलाए जाने का जिक्र करते हुए यदुवंश ने दोनों नेताओं को ‘राजकुमार’ बताया और कहा कि वे एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
सुभाष यदुवंश ने कहा, 'इंडी गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव जी को बुलाया ही नहीं गया।' उन्होंने कहा कि जब अखिलेश यादव लखनऊ आ गए, तब राहुल गांधी के किसी ‘शिष्य’ का फोन उनके पास आया। यदुवंश ने कहा कि कुछ दिन पहले अखिलेश यादव के इशारे पर ही एक सपाई सांसद ने कहा कि कांग्रेस की हैसियत तो 10 सीटों की भी नहीं है।
*'चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए दोनों राजकुमार'*
यदुवंश ने अखिलेश यादव और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, 'ये जो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए दोनों राजकुमार हैं, ये सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।' यदुवंश ने कहा कि इन दोनों नेताओं में अनुशासन नहीं है, टीम भावना नहीं है और समन्वय नहीं है। अखिलेश और राहुल दोनों ही किसी व्यवस्था को चला नहीं सकते।
*'डेढ़ साल मंच पर पूरा परिवार लड़ता रहा'*
अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए सुभाष यदुवंश ने कहा कि जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के ‘युवराज’ को सत्ता मिली, तो डेढ़ साल तक मंच पर पूरा परिवार लड़ता रहा। उन्होंने कहा कि इस दौरान उत्तर प्रदेश को 'सिरफुटौव्वल का अड्डा' बना दिया गया।
*'राजतंत्र पर भरोसा करते हैं राहुल गांधी'*
राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए यदुवंश ने कहा कि जब कांग्रेस के ‘युवराज’ को सत्ता मिली थी, तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का तैयार किया हुआ मसौदा राहुल गांधी ने फाड़ दिया था। उन्होंने कहा, 'युवराज ने मसौदा फाड़ करके बताया कि देखो, मैं राजतंत्र में बिलीव करता हूं, संविधान मानता नहीं हूं, संविधान को जेब में रख करके चलता हूं।'
बता दें कि 2013 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा दोषी सांसदों-विधायकों को तत्काल अयोग्यता से बचाने के लिए लाए गए जनप्रतिनिधित्व संशोधन अध्यादेश को राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘पूरी तरह बकवास’ बताते हुए सार्वजनिक रूप से फाड़ दिया था।
अखिलेश यादव और राहुल गांधी पर हमला करते हुए सुभाष यदुवंश ने कहा कि इन पर भरोसा करना, इनको वोट देना अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद करना है। ये दोनों परिवारतंत्र पर भरोसा करने वाले नेता हैं।
*सीएम हेमंत सोरेन की माता के निधन पर सियासी जगत में शोक की लहर, मंत्री-सांसद और पूर्व CM अर्जुन मुंडा समेत कई दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि

मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन की माता एवं स्वर्गीय श्रीमती रूपी सोरेन के निधन पर आज मोरहाबादी स्थित आवास पर राज्य सरकार के मंत्री श्री चमरा लिंडा, मंत्री श्रीमती दीपिका पांडेय सिंह, सांसद श्री विजय हांसदा,

सांसद श्री ढुल्लू महतो, पूर्व मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री श्री चम्पाई सोरेन, पूर्व उपमुख्यमंत्री श्री सुदेश महतो, विधायकगण, पूर्व मंत्रीगण, प्रशासनिक अधिकारीगण एवं बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने स्वर्गीय श्रीमती रूपी सोरेन के पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर उपस्थित सभी लोगों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति तथा शोकाकुल परिजनों को इस अपार एवं विकट दुःख को सहन करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करने की प्रार्थना की।_*

झामुमो के मिलन समारोह में सैकड़ों लोगों ने थामा पार्टी का दामन, रंजीत राम के नेतृत्व में हुआ सदस्यता ग्रहण

हजारीबाग के हीराबाग चौक स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) जिला कार्यालय में मंगलवार को मिलन समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से जुड़े बड़ी संख्या में लोगों ने झामुमो की सदस्यता ग्रहण की।

सदर विधानसभा क्षेत्र के विधायक के पूर्व सदर प्रतिनिधि और पूर्व जिला परिषद सदस्य रंजीत राम के नेतृत्व में लोगों ने झामुमो में शामिल होने की घोषणा की। इस दौरान नए सदस्यों ने मुख्यमंत्री और झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन के नेतृत्व तथा पार्टी की नीतियों में विश्वास जताया।

झामुमो जिलाध्यक्ष संजीव कुमार बेदिया ने रंजीत राम समेत नए सदस्यों को माला और पार्टी का पट्टा पहनाकर स्वागत किया। कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं ने पार्टी में शामिल हुए लोगों का गर्मजोशी से अभिनंदन किया।

इस दौरान खतियानी परिवार के जिला अध्यक्ष अशोक राम, रामचंद्र राम, कार्तिक सिन्हा, भीखू राम, आलोक वर्मा, कुलदीप राम, नरेश प्रजापति, अधिवक्ता पिंटू प्रकाश, अधिवक्ता पारस राव अंबेडकर, अधिवक्ता अमन कुमार, भीम आर्मी के जिला मीडिया प्रभारी बादल कुमार, वार्ड सदस्य सुरेंद्र कुमार, पूर्व पंचायत समिति सदस्य राम शरण राम, रजक समाज हजारीबाग के जिला महामंत्री बालेश्वर रजक समेत कई लोगों ने पार्टी की सदस्यता ली।

अल्पसंख्यक मोर्चा के जिला कोषाध्यक्ष के नेतृत्व में मुख्तार अहमद, सुशील केरकेट्टा, अनुपम विशाल, रिचर्ड एंथोनी बैचमेन, बसंत परेया, रोबिन रॉय और कुमुद दास समेत कई अन्य लोगों के भी पार्टी में शामिल होने की बात कही गई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिलाध्यक्ष संजीव कुमार बेदिया ने कहा कि झामुमो आम लोगों, गरीबों, आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और युवाओं के मुद्दों को उठाता रहा है। उन्होंने नए सदस्यों का स्वागत करते हुए संगठन में उन्हें सम्मान और जिम्मेदारी देने की बात कही।

जिला सचिव नीलकंठ महतो ने झामुमो को झारखंड के अधिकार, अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़ा आंदोलन बताया। वहीं केंद्रीय सदस्य सह अल्पसंख्यक मोर्चा के जिला अध्यक्ष यासीन खान ने कहा कि पार्टी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के अधिकार और सम्मान की बात करती है।

केंद्रीय सदस्य विकास राणा और सुनील शर्मा ने भी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर दिया। जिला प्रवक्ता कुणाल यादव ने कहा कि विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से लोगों का पार्टी से जुड़ना संगठन के विस्तार को दर्शाता है।

झामुमो में शामिल होने के बाद रंजीत राम ने कहा कि उन्होंने अपने समर्थकों से विचार-विमर्श के बाद पार्टी की सदस्यता लेने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड और आम लोगों के मुद्दों को उठाए जाने से प्रभावित होकर उन्होंने झामुमो के साथ जुड़ने का निर्णय लिया है। उन्होंने आगे पार्टी को मजबूत करने और जनता के बीच सक्रिय रूप से काम करने की बात कही।

कार्यक्रम में केंद्रीय सदस्य इजहार अंसारी, जिला उपाध्यक्ष रंजीत मेहता, विकास बेदिया, युवा मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष सत्येंद्र मेहता, जिला कोषाध्यक्ष मो. अख्तर, श्रमिक संघ के जिला अध्यक्ष सह बड़कागांव प्रखंड अध्यक्ष संजय सिंह, दारू प्रखंड अध्यक्ष नारायण दास सहित बड़ी संख्या में पार्टी के पदाधिकारी, कार्यकर्ता और समर्थक मौजूद रहे।

2026 में भौतिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार पर विशेष विज्ञान लेख



*भौतिकी का नोबेल 2026: फ्रांसिस हाल्जेन और 'भूतिया कणों' की खोज।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि नोबेल पुरस्कार समिति की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 6 अक्टूबर 2026 को रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने भौतिकी का नोबेल पुरस्कार बेल्जियम मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को घोषित किया है। उन्हें यह सम्मान "आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी में निर्णायक योगदान और ब्रह्मांडीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज" के लिए दिया गया है।
नोबेल समिति ने इन न्यूट्रिनो कणों को "अंतरिक्ष से आने वाले भूतिया संदेश" (Ghostly messages from space) करार दिया है,जो ब्रह्मांड के सबसे रौद्र और रहस्यमयी हिस्सों से सीधी सूचना लेकर आते हैं।

*विजेता और पुरस्कार का कारण क्या है।* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि नोबेल पुरस्कार समिति की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार फ्रांसिस हाल्जेन वर्तमान में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में प्रोफेसर हैं। उनका जन्म 1944 में बेल्जियम के टिएनेन शहर में हुआ था एवं
आधिकारिक घोषणा के अनुसार, हाल्जेन को यह पुरस्कार उनके उस अभूतपूर्व विचार और वैज्ञानिक नेतृत्व के लिए मिला है जिसके तहत उन्होंने दक्षिणी ध्रुव (अंटार्कटिका) की बर्फ का उपयोग न्यूट्रिनो कणों को पकड़ने के लिए किया।  नोबेल समिति के अध्यक्ष मार्क पियर्स ने कहा, "फ्रांसिस हाल्जेन ने शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया है जिसने हमें एक शानदार उपकरण दिया है। उनकी दृढ़ता और वैज्ञानिक दृष्टि ने एक नए प्रकार के खगोल विज्ञान का मार्ग प्रशस्त किया है।" और इस वर्ष भौतिकी की नोबेल पुरस्कार राशि 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर (लगभग 1.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर) है, जो पूरी तरह से हाल्जेन को दी जाएगी क्योंकि इस वर्ष यह पुरस्कार केवल एक ही वैज्ञानिक को दिया गया है।
*क्या होते हैं,न्यूट्रिनो: ब्रह्मांड के 'भूतिया कण'।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि न्यूट्रिनो, ब्रह्मांड के सबसे बुनियादी और रहस्यमयी उप-परमाणु कणों में से एक हैं। इन्हें 'घोस्ट पार्टिकल्स' (Ghost Particles या भूतिया कण) भी कहा जाता है क्योंकि इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता और इनका द्रव्यमान लगभग न के बराबर होता है।
ये कण सुदूर अंतरिक्ष में होने वाली भीषण घटनाओं (जैसे सुपरनोवा विस्फोट, ब्लैक होल, सक्रिय आकाशगंगाओं के केंद्र) से पैदा होते हैं और प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं। चूंकि ये सामान्य पदार्थ के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं, या कुछ यूं कहें कि बिल्कुल भी नहीं के बराबर प्रतिक्रिया करते हैं इसलिए ये बिना रुके पृथ्वी, इंसानों, चट्टानों,पहाड़ों और ग्रहों आदि के पार निकल जाते हैं। और यह तक भी पता नहीं चलता कि कब यह कण उनको पार कर रहे हैं। और यह भी जानना ज़रूरी है कि हर सेकंड अरबों-खरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर और पृथ्वी से होकर गुजरते रहते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश बिना किसी क्रिया के निकल जाते हैं, इसी वजह से इन्हें सामान्य टेलिस्कोप से देख पाना या पकड़ पाना नामुमकिन था।
*क्या है,आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी: बर्फ का विशाल दूरबीन* ।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि नोबेल पुरस्कार समिति के अनुसार फ्रांसिस हाल्जेन ने 1988 में एक अभूतपूर्व विचार रखा कि अंतरिक्ष से आने वाले इन रहस्यमयी कणों को पकड़ने के लिए दक्षिणी ध्रुव (South Pole, अंटार्कटिका) की विशाल बर्फ का उपयोग किया जा सकता है।उनके इसी दृष्टिकोण के कारण अंटार्कटिका की गहराई में बर्फ के नीचे 1 क्यूबिक किलोमीटर के दायरे में दुनिया का पहला विशालकाय न्यूट्रिनो डिटेक्टर बनाया गया, जिसे आइसक्यूब (IceCube) कहा जाता है। *आइसक्यूब कैसे काम करता है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी की आधिकारिक सूची के अनुसार आइसक्यूब में बर्फ के अंदर हजारों बेहद संवेदनशील लाइट सेंसर्स (प्रकाश डिटेक्टर या Digital Optical Modules) लगाए गए हैं, जिन्हें लगभग 1,450 से 2,450 मीटर की गहराई पर बर्फ में लगाया गया है।
जब कोई,उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो बर्फ के परमाणुओं से टकराता है, तो एक हल्की नीली रोशनी जिसे खगोलविज्ञान में (Cherenkov radiation) चेरेनकोव विकिरण कहा जाता है। यह तब उत्पन्न होता है जब कोई आवेशित कण (जैसे इलेक्ट्रॉन) किसी माध्यम (जैसे पानी या काँच) में लगभग प्रकाश की गति से यात्रा करता है। इसके कारण आमतौर पर पानी के भीतर एक चमकदार नीली रोशनी दिखाई देती है,(Cherenkov radiation) पैदा होती है, जिसे ये सेंसर रिकॉर्ड कर लेते हैं। फिर वैज्ञानिक उस सिग्नल से पता लगाते हैं कि कण कहाँ से आया, उसकी दिशा क्या थी, उसकी ऊर्जा कितनी थी और संभवतः वह किस खगोलीय स्रोत से आया। साथ ही यह भी जानना ज़रूरी है कि दक्षिणी ध्रुव की बर्फ का उपयोग करने के कई फायदे हैं जैसे कि यह बर्फ विभिन्न प्रकार के हस्तक्षेप से मुक्त है और यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से स्थिर है, यहाँ कोई भूकंप नहीं आते। अगर हम इस आइसक्यूब के निर्माण की बात करें तो पाते हैं कि आइसक्यूब का निर्माण दिसंबर 2010 में पूरा हुआ था और इसकी कुल लागत लगभग 279 मिलियन डॉलर थी।
*2013 की ऐतिहासिक खोज और महत्व क्या है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला (IceCube Neutrino Observatory)  की आधिकारिक विश्व वैज्ञानिक समुदाय की पुष्टि के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक 2013 में उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो (high-energy astrophysical neutrinos) का पहली बार स्पष्ट अवलोकन था।
इनमें कुछ न्यूट्रिनो की ऊर्जा पेटाइलेक्ट्रॉनवोल्ट Petaelectronvolt (PeV) स्तर तक थी,(पेटाइलेक्ट्रॉनवोल्ट (Petaelectronvolt) ऊर्जा को मापने की एक अत्यंत विशाल इकाई (यूनिट) है)।अर्थात अत्यंत विशाल ऊर्जा। इस खोज ने यह प्रमाणित किया कि हमारे ब्रह्मांड में ऐसे प्राकृतिक स्रोत मौजूद हैं जो अत्यधिक ऊर्जावान न्यूट्रिनो उत्पन्न करते हैं। *इस खोज का विज्ञान की दुनिया में क्या महत्व है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि फ्रांसिस हाल्जेन के इस काम ने खगोल विज्ञान (Astronomy) के एक बिल्कुल नए युग की शुरुआत की है। इस खोज से आगे आने वाले समय में ब्रह्मांड के कई अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठ सकता है क्योंकि न्यूट्रिनो अंतरिक्ष के उन सुदूर और रौद्र एवं अज्ञात कोनों की जानकारी लाते हैं, जहाँ से प्रकाश भी बाहर नहीं आ पाता (जैसे कि एक्टिव गैलेक्टिक न्यूक्लिआई या विशाल ब्लैक होल)। अब अगर हम बात करें पारंपरिक दूरबीनों एवं अन्य विधाओं की तो पाते हैं कि उनसे न्यूट्रिनों को पूरी तरीके से समझना आसान नहीं था या इसको और भी आसान भाषा में समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि अछूते ब्रह्मांड को देखने के साथ ही पारंपरिक टेलिस्कोप केवल प्रकाश या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणों को देख सकते हैं, लेकिन आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी की मदद से वैज्ञानिक अब उन अनदेखी घटनाओं का अध्ययन कर पा रहे हैं जो अरबों प्रकाश वर्ष दूर उस काले घने अंधकारमय ब्रह्मांडीय गुफाओं में घटित हो रही हैं। साथ ही इसे मल्टी-मैसेंजर एस्ट्रोनॉमी के व्यापक विकास के संदर्भ में भी देखा जा सकता है,जहाँ प्रकाश, गुरूत्वीय तरंगें ( gravitational waves), कॉस्मिक रेज (cosmic rays)और न्यूट्रिनों (neutrinos) जैसे अलग-अलग ब्रह्मांडीय संदेशबाहकों (cosmic messengers) से ब्रह्मांड की जानकारी प्राप्त की जाती है। साथ ही यह भी ज्ञात हो कि 2018 में,आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी ने एक अत्यंत उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो को TXS 0506+056 नामक ब्लेज़र (blazar) तक ट्रेस किया,जो ओरायन तारामंडल की दिशा में 3.7 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। यह पहली बार था जब किसी न्यूट्रिनो को उसके विशिष्ट खगोलीय स्रोत से जोड़ा गया।
*क्यों इतना अनोखा है, न्यूट्रिनो और इन्हें खोजना भी इतना मुश्किल क्यों था* ?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि न्यूट्रिनो,ब्रह्मांड के सबसे बुनियादी और रहस्यमयी उप-परमाणु कणों (Subatomic particles) में से एक हैं। इन्हें 'घोस्ट पार्टिकल्स' (Ghost Particles या भूतिया कण) भी कहा जाता है, इन कणों पर कोई विद्युत आवेश (Charge) नहीं होता और इनका द्रव्यमान (Mass) लगभग न के बराबर ही होता है या कुछ यूं कहें कि लगभग कोई द्रव्यमान नहीं है और ये कण सुदूर अंतरिक्ष में होने वाली उग्र घटनाओं (जैसे सुपरनोवा विस्फोट, ब्लैक होल आदि) से पैदा होते हैं और प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं चूंकि ये सामान्य पदार्थ के साथ कोई प्रतिक्रिया भी प्रदर्शित नहीं करते हैं इसलिए ये बिना रुके पृथ्वी, इंसानों, चट्टानों ,पहाड़ों और ग्रहों आदि के पार निकल जाते हैं, इसी वजह से इन्हें सामान्य टेलिस्कोप से देख पाना या पकड़ पाना नामुमकिन था, इसलिए इसमें बर्फ के अंदर हजारों बेहद संवेदनशील लाइट सेंसर्स (प्रकाश डिटेक्टर) लगाए गए हैं। जब कोई उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो बर्फ के परमाणुओं से टकराता है, तो एक हल्की नीली रोशनी पैदा होती है, जिसे ये सेंसर रिकॉर्ड कर लेते हैं। इसीलिए इन उच्च ऊर्जा यूट्रिनो को खोजना इतना अनोखा और इतना मुश्किल एवं चुनौतीपूर्ण था। और यही कार्य एवं इनकी खोज करने के लिए बर्ष 2026 का भौतिकी (फिजिक्स) का नोबेल पुरस्कार वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को अंतरिक्षीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो (high-energy neutrinos of astrophysical origin) की खोज और आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी (IceCube Neutrino Observatory) में उनके निर्णायक योगदान के लिए देने की घोषणा की गई है। उन्होंने अंतरिक्ष से धरती तक आने वाले बेहद ताकतवर और मायावी कणों न्यूट्रिनो को पकड़ने और उनका पता लगाने का तरीका खोजा है एवं आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी जहां उन्होंने दक्षिण ध्रुव (Antarctic) की गहरी बर्फ में हजारों लाइट सेंसर लगाकर दुनिया की पहली विशाल न्यूट्रिनो वेधशाला की नींव रखी, जिससे ब्रह्मांड की ऊर्जावान प्रक्रियाओं का अध्ययन संभव हुआ। साथ ही नई प्रकार की खगोल विज्ञान को भी जन्म दिया है या कुछ यूं कहें कि इस खोज ने खगोल विज्ञान (Astronomy) की एक बिल्कुल नई विधा का मार्ग प्रशस्त किया है, जिससे दूरस्थ आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने में मदद मिलती है।

*क्या है न्यूट्रिनो (Neutrino) कण की कहानी ? ।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि न्यूट्रिनो (Neutrino) कण का सबसे पहले सैद्धांतिक अनुमान वर्ष 1930 में वोल्फगैंग पाउली (Wolfgang Pauli) ने लगाया था,जबकि वर्ष 1956 में क्लाइड कोवान (Clyde Cowan) और फ्रेडरिक रेइन्स (Frederick Reines) ने इसका प्रयोगात्मक रूप से पता लगाया (खोज की) अब अगर हम बात करें न्यूट्रिनो से जुड़े मुख्य तथ्य सैद्धांतिक प्रस्ताव की तो पाते हैं कि 1930 में वोल्फगैंग पाउली ने बीटा क्षय (beta decay) में ऊर्जा संरक्षण के नियम को समझाने के लिए इस काल्पनिक कण का सुझाव दिया था एवं इसके नामकरण की बात करें तो पाते हैं कि इसका नामकरण एक इतालवी भौतिक विज्ञानी एनरिको फर्मी ने इस कण का नाम 'न्यूट्रिनो' रखा, जिसका अर्थ "छोटा उदासीन कण" है। साथ ही इसके प्रयोगात्मक खोज की बात करें तो पाते हैं कि 1956 में क्लाइड कोवान और फ्रेडरिक रेइन्स ने परमाणु रिएक्टर का उपयोग करके पहली बार न्यूट्रिनो का प्रायोगिक प्रमाण प्राप्त किया। इस खोज के लिए फ्रेडरिक रेइन्स को 1995 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला  और अब वर्ष 2026 की बात करें तो पाते हैं कि 2026 का भौतिकी (फिजिक्स) का नोबेल पुरस्कार वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को अंतरिक्षीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो (high-energy neutrinos of astrophysical origin) की खोज और आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी (IceCube Neutrino Observatory) में उनके निर्णायक योगदान के लिए दिया गया है,क्योंकि उन्होंने अंतरिक्ष से धरती तक आने वाले बेहद ताकतवर और मायावी कणों जिन्हें न्यूट्रिनो कहा जाता है को पकड़ने और उनका पता लगाने का तरीका खोजा।

*भारत के शोधकर्ताओं के लिए इस खोज का क्या महत्व हो सकता है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारतीय छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह खोज विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह दर्शाती है कि कैसे एक साधारण विचार (दक्षिणी ध्रुव की बर्फ का उपयोग) और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों को सुलझाया जा सकता है।
आइसक्यूब एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग है, जिसमें लगभग 450 भौतिक विज्ञानी, 58 संस्थान और 14 देश शामिल हैं। साथ ही अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित IceCube Neutrino Observatory (आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला) के संदर्भ में भारत का महत्व भी कुछ मुख्य बिंदुओं से समझा जा सकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि आइसक्यूब एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परियोजना है, लेकिन वैसे तो भारत का इस वेधशाला से प्रत्यक्ष या सीधे तौर पर संबंध नहीं है, लेकिन भारतीय वैज्ञानिक, शोधकर्ता और संस्थान वैश्विक स्तर पर इस प्रयोग के डेटा विश्लेषण, कोडिंग और इसके माध्यम से की जाने वाली ब्रह्मांडीय खोजों (जैसे "घोस्ट पार्टिकल्स" या न्यूट्रिनो की पहचान) में अनुसंधान के ओपन-सोर्स डेटा का विश्लेषण करते हैं।और साथ में यह भी जानना आवश्यक है कि भारत भी अपना न्यूट्रिनो प्रोजेक्ट  INO (India-based Neutrino Observatory) बनाने के लिए प्रयास कर रहा है इसीलिए जब भी विज्ञान में आइस क्यूब ऑब्जर्वेटरी (IceCube Observatory) की बात होती है, तो उसके समानांतर भारत के अपने प्रोजेक्ट INO (इंडिया-बेस्ड न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी) की चर्चा जरूर होती है। लेकिन दोनों में अंतर क्या है? यह भी जानना ज़रूरी है,जहाँ आइस क्यूब अंटार्कटिका की गहरी बर्फ (Ice) के नीचे न्यूट्रिनो ढूंढता है, वहीं भारत का आई०एन० ओ०,(INO)  प्रोजेक्ट तमिलनाडु के थेनी जिले की बोदी पश्चिम पहाड़ियों में जमीन के नीचे एक विशाल प्रयोगशाला बनाने की योजना है एवं इसके लोकेशन के महत्व की बात करें तो पाते हैं कि भारत की भौगोलिक स्थिति भूमध्य रेखा (Equator) के पास है,यहाँ बनाई जाने वाली ऑब्जर्वेटरी से वैज्ञानिकों को उन न्यूट्रिनो कणों का भी अध्ययन करने में मदद मिल मिलेगी जो पृथ्वी के कोर (केंद्र) से होकर गुजरते हैं साथ ही यह डेटा,आइस क्यूब जैसी ध्रुवीय (Polar) ऑब्जर्वेटरी के पूरक के रूप में काम आ सकता है। लेकिन अभी तो इस प्रोजेक्ट की संपूर्ण स्थापना को कई चुनौतियों से निबटना बाकी है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अब हम पुनः संक्षेप में फ्रांसिस हाल्जेन एवं आइस क्यूब ऑब्जर्वेटरी की बात करें तो पाते हैं कि फ्रांसिस हाल्जेन ने अंटार्कटिका की बर्फ को एक अनोखी विशाल दूरबीन में बदल दिया, जिसने विज्ञान को ब्रह्मांड के उन सबसे रहस्यमयी 'भूतिया कणों' को पकड़ने और समझने की शक्ति दी,जो अब तक इंसान की पहुंच से पूरी तरह बाहर थे। इसीलिए यह भी समझना ज़रूरी है कि यह नोबेल पुरस्कार केवल किसी एक व्यक्ति द्वारा अकेले किए गए प्रयोग के लिए नहीं है बल्कि हाल्जेन का सम्मान उनके निर्णायक वैज्ञानिक योगदान, दृष्टि और आइसक्यूब के नेतृत्व तथा उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो की खोज से जुड़ा है। जो निश्चित तौर पर यह दर्शाता है कि अगर टीम भावना से एवं समग्र रूप से दृढ़ संकल्प और सकारात्मकता से लगातार कोई भी कार्य किया जाता है तो एक दिन उन अच्छे कार्यों का फल और किसी भी समस्या का हल भी अवश्य ही प्राप्त होता है।और इसी को सार्थक होता हुआ देख सकते है कि नोबेल पुरस्कार समिति द्वारा 2026 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार को देने की घोषणा, फ्रांसिस हाल्जेन (Francis Halzen) को की गई है।
संजय चावला की फिल्म ‘मिलो जो तुम’ में नजर आएंगे रॉक स्टार संगीत मासूम
मुंबई। हिंदी सिनेमा में नई प्रतिभाओं और मनोरंजक विषयों को लेकर लगातार सक्रिय जाने-माने फिल्म निर्माता संजय चावला अब अपनी आगामी फिल्म ‘मिलो जो तुम’ को लेकर चर्चा में हैं। कॉमेडी, रोमांस और भरपूर मनोरंजन से सजी इस फिल्म की शूटिंग शीघ्र शुरू होने जा रही है। फिल्म की लोकेशन फाइनल कर ली गई है और इसका प्रमुख हिस्सा मध्य प्रदेश की खूबसूरत राजधानी भोपाल में फिल्माया जाएगा।
फिल्म का निर्देशन अनुभवी एवं प्रतिभाशाली निर्देशक मृत्युंजय किचम्बरे कर रहे हैं। निर्माता संजय चावला और निर्देशक मृत्युंजय किचम्बरे ने बताया कि फिल्म की तैयारियां अंतिम चरण में हैं और जल्द ही पूरी यूनिट भोपाल में शूटिंग शुरू करेगी। मिलो जो तुम’ की एक खास बात इसकी मजबूत संगीत और साहित्यिक पृष्ठभूमि भी है। फिल्म के गीत प्रसिद्ध साहित्यकार एवं गीतकार दुर्गा प्रसाद उपाध्याय ‘अभिराज’ ने लिखे हैं। निर्माताओं के अनुसार उन्होंने फिल्म की कहानी, भावनाओं और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बेहद खूबसूरत और प्रभावशाली गीतों की रचना की है, जो फिल्म के कथानक को और अधिक जीवंत बनाएंगे।
फिल्म की स्टारकास्ट में सबसे चर्चित नाम उभरते अभिनेता और रॉक स्टार संगीत मासूम का है। निर्माता संजय चावला ने संगीत मासूम की प्रतिभा पर भरोसा जताते हुए उन्हें अपनी इस महत्वाकांक्षी फिल्म के लिए साइन किया है। फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि ‘मिलो जो तुम’ संगीत मासूम के अभिनय करियर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकती है।
संगीत मासूम तेजी से बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बना रहे युवा कलाकारों में शामिल हैं। अभिनय, स्क्रीन प्रेजेंस और डांसिंग स्किल्स के कारण वह विशेष रूप से नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। प्रतिष्ठित रोशन तनेजा एक्टिंग एकेडमी से अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ ही उन्होंने प्रसिद्ध कोरियोग्राफर सरोज खान से नृत्य की बारीकियां भी सीखी हैं। कई साल थिएटर को दिए हैँ। यही प्रशिक्षण उनके अभिनय और ऑन-स्क्रीन व्यक्तित्व को एक अलग धार देता है। संगीत मासूम अब तक कई चर्चित म्यूजिक प्रोजेक्ट्स में अपने अभिनय का प्रभाव छोड़ चुके हैं। पद्म भूषण उदित नारायण, पद्मश्री अनूप जलोटा, अगम कुमार निगम, समीर खान, कृष्णा बेउरा और हरमन नाजिम जैसे जाने-माने गायकों के गीतों में वह अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुके हैं। विभिन्न संगीत वीडियो के माध्यम से उन्होंने युवा दर्शकों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
म्यूजिक वीडियोज के अलावा संगीत मासूम ने कई शॉर्ट फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी है। इन दिनों वह फिल्म ‘प्रेमांजलि’ में भी काम कर रहे हैं। ऐसे समय में निर्माता संजय चावला द्वारा उन्हें ‘मिलो जो तुम’ जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए चुना जाना उनके करियर के लिए एक और बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
निर्माता संजय चावला का कहना है कि ‘मिलो जो तुम’ केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि हास्य, भावनाओं, रिश्तों और मनोरंजन का ऐसा खूबसूरत संगम होगी, जिसमें हर आयु और हर वर्ग के दर्शकों के लिए कुछ न कुछ खास होगा।उन्होंने विश्वास जताया कि फिल्म की कहानी, निर्देशन, संगीत और कलाकारों का शानदार तालमेल इसे दर्शकों के लिए एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनाएगा। संजय चावला के शब्दों में, ‘मिलो जो तुम’ मनोरंजन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाएगी और दर्शकों के दिलों तक पहुंचेगी। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले ही संगीत मासूम की मौजूदगी ने ‘मिलो जो तुम’ को लेकर उत्सुकता बढ़ा दी है। अभिनय और संगीत की दुनिया में लगातार आगे बढ़ रहे इस युवा कलाकार के लिए यह फिल्म नए अवसरों के द्वार खोल सकती है। जिस तेजी से संगीत मासूम अपने अभिनय और व्यक्तित्व से दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले समय में सिनेमा के आकाश पर संगीत मासूम का सितारा और भी अधिक चमकता नजर आएगा।
मानसून की वापसी के बीच बिगड़ेगा मौसम का मिजाज, दिल्ली-एनसीआर से यूपी-बिहार तक अलर्ट

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देश भर में मौसम का मिजाज अब तेजी से बदलने लगा है। दक्षिण-पश्चिम मानसून उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों से विदा हो चुका है। हालांकि, दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में अभी भी बारिश का दौर जारी है। इस बीच भारतीय मौसम विभाग ने दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत करीब 12 राज्यों के लिए नया अपडेट जारी किया है।बंगाल की खाड़ी में नया सिस्‍टम बनने की प्रबल संभावना के बीच मौसम के तेवर के तल्‍ख होने का अनुमान है।

बारिश के साथ आंधी-बिजली गिरने की आशंका

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, अलग-अलग स्तरों पर बनी कई मौसम प्रणालियों के प्रभाव से उत्तर-पश्चिम, मध्य, पूर्व, पूर्वोत्तर, पश्चिमी और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कई हिस्सों में बारिश, गरज-चमक और तेज हवाएं चल सकती हैं। दिल्ली-एनसीआर समेत हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में 6 से 11 अक्टूबर 2026 के बीच हल्की से मध्यम बारिश के साथ आंधी और बिजली गिरने की संभावना जताई गई है। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी बारिश होने का पूर्वानुमान है।

60 किमी की रफ्तार से चलेगी हवा

मौसम विभाग ने 15 से 16 राज्‍यों में आंधी-तूफान के साथ बारिश होने की संभावना जताई है। इस दौरान 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने का भी पूर्वानुमान है। पूर्वी भारत के कई हिस्सों में गरज-चमक और बिजली गिरने की घटनाएं हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को मौसम का अपडेट देखकर ही यात्रा करने की सलाह दी गई है।

युवा सपा नेता अतुल वर्मा ने झंडी दिखाकर यात्रा का किया शुभारंभ
कमलेश मेहरोत्रा लहरपुर (सीतापुर)।  क्षेत्र के ग्राम उमरा कलां  से एक  साईकिल यात्रा सैफई के लिए  रवाना। युवा सपा नेता अतुल वर्मा ने झंडी दिखाकर यात्रा का किया शुभारंभ। रविवार को क्षेत्र के ग्राम उमरा कलां स्थित समाजवादी पार्टी कार्यालय पर क्षेत्र के युवा सपा कार्यकर्ताओं का सपा  नेता अतुल वर्मा ने स्वागत करते हुए उनका उत्साह वर्धन किया और सभी को समाजवादी पार्टी का पटका व पहचान पत्र पहनाया। इस मौके पर उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं का उत्साह वर्धन किया और कहा कि आप सभी पार्टी के एक मजबूत स्तंभ है उन्होंने छह दिवसीय पीडीए साइकिल यात्रा को  हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

साइकिल यात्रा के संयोजक अविनेश यादव व नीरज यादव ने बताया कि, रविवार से प्रारंभ हुई पीडीए साइकिल यात्रा आगामी 10 अक्टूबर को सैफई पहुंचकर स्वर्गीय  नेता मुलायम सिंह की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगी, उन्होंने बताया कि  साइकिल यात्रा जगह-जगह लोगों को समाजवादी पार्टी की कल्याणकारी नीतियों की जानकारी देते हुए एक बार फिर सपा का परचम लहराने के लिए लोगों को जागरूक करेगी।  इस मौके पर प्रमुख रूप से जिला अध्यक्ष महिला सभा ज्ञानवती, विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रतापसिंह,राजेंद्र यादव, रफीक , प्रधान सेतुबंध यादव, डॉक्टर इस्माइल, भागीरथ मौर्य ,गौरव सहित साइकिल यात्री  गौतम कुमार यादव, अवनेश यादव, मालतीभार्गव, नीरज यादव, संदीप यादव, नीरज यादव, संतोष कुमार यादव, रामबाबू, बबलू कुमार, अतुलमिश्रा सहित 25 सदस्य उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री जी के निर्देशों के क्रम में देवीपाटन मंडल के समस्त जनपदों में प्रमुखता से हो रहा कार्य

*आईजीआरएस पर देवीपाटन मंडल का दबदबा कायम, लगातार सातवीं बार प्रदेश में प्रथम*

*सितंबर माह में 91.82 प्रतिशत अंक के साथ प्रदेश में शीर्ष स्थान*

*मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की सघन मॉनिटरिंग और शिकायतकर्ताओं से सीधा संवाद बना प्रभावी निस्तारण का आधार*

*‘मां पाटेश्वरी शक्ति संवाद’ के जरिए महिलाओं की शिकायतों के त्वरित समाधान पर विशेष जोर एवं वाद मुक्त देवीपाटन:से संवाद इसकी अतिरिक्त अन्य और योजनाओं को गहन समीक्षा के उपरान्त*
*मण्डलायुक्त  की पहल को समस्त जिलाधिकारी फॉलो एवं निगरानी करें*

*गोण्डा, 04 अक्टूबर 2026।* जनशिकायतों के त्वरित, पारदर्शी एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण की दिशा में देवीपाटन मंडल ने एक बार फिर प्रदेश में अपनी उत्कृष्ट कार्यशैली का परचम लहराया है। आईजीआरएस (समन्वित शिकायत निवारण प्रणाली) की सितंबर 2026 की रैंकिंग में देवीपाटन मंडल ने  91.82 प्रतिशत के साथ प्रदेश में प्रथम स्थान हासिल किया है।

मंडल की यह उपलब्धि जनशिकायतों के निस्तारण में अपनाई जा रही प्रभावी मॉनिटरिंग व्यवस्था, अधिकारियों की जवाबदेही, शिकायतकर्ताओं से सीधे फीडबैक तथा प्रकरणों के वास्तविक समाधान पर दिए जा रहे विशेष जोर का परिणाम है।

शिकायत का निस्तारण नहीं, समस्या का समाधान है प्राथमिकता

मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के निर्देशन में मंडल के चारों जनपदों—गोण्डा, बहराइच, श्रावस्ती एवं बलरामपुर—में आईजीआरएस पर प्राप्त शिकायतों के निस्तारण की नियमित एवं गहन समीक्षा की जा रही है।

मंडलायुक्त द्वारा अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि आईजीआरएस पर किसी शिकायत का केवल औपचारिक अथवा कागजी निस्तारण पर्याप्त नहीं है। शिकायतकर्ता की समस्या का वास्तविक एवं संतोषजनक समाधान ही निस्तारण का आधार होना चाहिए।

इसी उद्देश्य से मंडलायुक्त द्वारा स्वयं प्रत्येक माह रैंडम आधार पर शिकायतकर्ताओं से फोन पर संवाद कर फीडबैक लिया जाता है। शिकायतकर्ता से यह जानकारी प्राप्त की जाती है कि उसकी समस्या का वास्तविक समाधान हुआ है अथवा नहीं। फीडबैक में यदि किसी प्रकरण में औपचारिक निस्तारण अथवा समस्या का समाधान न होना सामने आता है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं।

इस व्यवस्था से जनशिकायतों के निस्तारण में गुणवत्ता, पारदर्शिता एवं जवाबदेही को और मजबूती मिली है।

*‘मां पाटेश्वरी शक्ति संवाद’ से महिलाओं को मिला सीधा प्रशासनिक मंच वाद मुक्त:से समाधान देवीपाटन मंडल के सभी महिलाओं की समस्याओं का हो रहा निदान*

महिलाओं एवं बेटियों की समस्याओं के त्वरित एवं प्रभावी समाधान के लिए मंडल में संचालित ‘मां पाटेश्वरी शक्ति संवाद’ पहल भी जनशिकायत निस्तारण व्यवस्था को नई गति दे रही है।

गोण्डा, बहराइच, श्रावस्ती एवं बलरामपुर में संचालित इस पहल के माध्यम से महिलाओं की समस्याओं को प्राथमिकता के साथ सुना जा रहा है तथा संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के निर्देश दिए जा रहे हैं।

इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को अपनी समस्याएं सीधे प्रशासन के समक्ष रखने का सहज एवं प्रभावी मंच उपलब्ध कराना है, जिससे उन्हें त्वरित राहत मिल सके और प्रशासन के प्रति उनका विश्वास और अधिक मजबूत हो।

लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन का सिलसिला जारी

देवीपाटन मंडल का आईजीआरएस पर उत्कृष्ट प्रदर्शन लगातार जारी है। मार्च 2026 में प्रथम, अप्रैल में प्रथम, मई में द्वितीय तथा जून, जुलाई, अगस्त एवं सितंबर 2026 में पुनः प्रथम स्थान प्राप्त कर मंडल ने जनशिकायतों के निस्तारण में निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन दर्ज किया है।

लगातार शीर्ष स्थान प्राप्त करना मंडल में शिकायतों की नियमित समीक्षा, लंबित प्रकरणों की सघन मॉनिटरिंग, शिकायतकर्ताओं से सीधे संवाद और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रभावी व्यवस्था को दर्शाता है।

जनविश्वास को मजबूत करना प्रशासन की प्राथमिकता

मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने इस उपलब्धि के लिए मंडल के सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को बधाई देते हुए कहा कि आईजीआरएस पर प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त करना केवल एक रैंकिंग नहीं, बल्कि जनसमस्याओं के प्रति प्रशासन की संवेदनशीलता, जवाबदेही और प्रतिबद्धता का परिणाम है।

उन्होंने कहा कि जनशिकायतों का समयबद्ध, निष्पक्ष एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। प्रत्येक अधिकारी यह सुनिश्चित करे कि शिकायतकर्ता को केवल निस्तारण की सूचना न मिले, बल्कि उसकी समस्या का वास्तविक समाधान भी हो।
4 अक्टूबर 2026 की रात्रि में बलयों के राजा, शनि ग्रह की विपरीत स्थिति (Opposition) एवं अन्य खगोलीय पिंडों की भी दृश्यता

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 4 अक्टूबर 2026 को शनि ग्रह अपनी विपरीत स्थिति (Opposition) में पहुँच रहा है, जो वर्ष 2026 का सबसे चमकीला और स्पष्ट दृश्य होगा। इस खगोलीय घटना के दौरान पृथ्वी,सूर्य और शनि के बीच से गुजरेगी, जिससे शनि हमारे आकाश में सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में दिखाई देगा। यह स्थिति खगोल प्रेमियों के लिए एक अनोखा अवसर है क्योंकि शनि इस समय अपनी अधिकतम चमक और सबसे बड़े आकार में दिखाई देगा, और इसे पूरी रात आसानी से देखा जा सकेगा।

*क्या होता है खगोल विज्ञान में शनि ग्रह की विपरीत स्थिति का अर्थ और महत्व ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विपरीत स्थिति (Opposition) एक ऐसी खगोलीय स्थिति है जब पृथ्वी सूर्य और किसी बाहरी ग्रह (जैसे शनि, बृहस्पति, मंगल) के बीच से गुजरती है। इस स्थिति में ग्रह,सूर्य के विपरीत दिशा में होता है,अर्थात सूर्य अस्त होने पर ग्रह उदय होता है और सूर्य उदय होने पर अस्त होता है। अगर हम बात करें शनि ग्रह की तो पाते हैं कि शनि की विपरीत स्थिति लगभग 378 दिनों (या 54 सप्ताह) के अंतराल पर आती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 1 वर्ष लगता है, जबकि शनि को अपनी कक्षा में एक चक्कर लगाने में 29.4 पृथ्वी वर्ष लगते हैं। इसलिए, हर साल पृथ्वी को शनि को "पकड़ने" और उससे आगे निकलने के लिए अपनी कक्षा में थोड़ी अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है, जिसके कारण शनि की विपरीत स्थिति प्रत्येक वर्ष लगभग दो सप्ताह बाद आती है।
*क्या है 4 अक्टूबर 2026 की विशेष खगोलीय घटना ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए बताया कि समय, स्थान और तारीख की बात करें तो पाते हैं कि शनि की विपरीत स्थिति 4 अक्टूबर 2026 को भारतीय समयानुसार शाम 5:30 बजे पर होगी। लेकिन शनि ग्रह को सूर्यास्त के बाद से लेकर पूरी रात भर देखा जा सकता है।

*किस दिशा और तारामण्डल में दिखाई देगा शनि ग्रह ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस दौरान शनि ग्रह, सीट्स (Cetus) तारामंडल में स्थित होगा। जोकि पूर्वी क्षितिज से थोड़ा सा उत्तर दिशा की तरफ से ऊपर आते हुए दिखाई देगा या कुछ यूं कहें कि दृश्यता की बात करें तो पाते हैं कि शनि ग्रह ,सूर्यास्त के समय पूर्वी क्षितिज से उदय होगा और पूरी रात आकाश में दिखाई देता रहेगा, और सूर्योदय के समय पश्चिमी क्षितिज पर अस्त होगा।

*दूरी और चमक (मैग्नीट्यूड) कितना होगा ?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विपरीत स्थिति में शनि की चमक प्लस 0.32 मैग्नीट्यूड तक पहुँच जाएगी, जो इसे आकाश के चमकीले तारों के बराबर बनाती है। यह सामान्य दिनों की तुलना में थोड़ा अधिक चमकीला होगा और साथ ही पृथ्वी से इसकी दूरी की बात करें तो पाते हैं कि बाहरी ग्रह विपरीत स्थिति वाले वर्ष में पृथ्वी के सबसे निकट होते हैं। 2026 में, शनि ग्रह ,पृथ्वी से लगभग 784 मिलियन मील (1.26 बिलियन किलोमीटर) दूर होगा। यह दूरी लगभग 8.43 खगोलीय इकाई (AU) या 70 प्रकाश-मिनट के बराबर होती है।और यह भी जानना आवश्यक है कि डिस्क का आकार क्या होगा तो पता चलता है कि दूरबीन से देखने वालों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि विपरीत स्थिति में शनि की डिस्क का आकार सबसे बड़ा होता है। अपने सबसे बड़े आकार में, शनि दूरबीनों से 19.7 आर्कसेकंड व्यास का दिखाई देगा। इस दौरान शनि के वलयों का काफ़ी झुकाव एक प्रमुख आकर्षण होगा और यह भी समझने में सहूलियत होती है कि कैसे शनि ग्रह अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा के दौरान शनि के छल्लों का दिखना कैसा होता है।जैसे कि खगोलप्रेमियों देखा था कि मार्च 2025 में शनि के वलय तल (Ring Plane) से गुजरा था, जब वलय पृथ्वी से लगभग किनारे-किनारे (edge-on) दिखाई दे रहे थे और छोटी दूरबीनों में अदृश्य से हो गए थे।और अक्टूबर 2026 में, वलय फिर से देखने पर धीरे धीरे से खुलने(दृश्यमान) होने लगे हैं और पृथ्वी से देखने वालों के सापेक्ष शनि के वलय माइनस 7.5 डिग्री दक्षिण की ओर झुके हुए होंगे। हालांकि यह झुकाव 2017 जैसे अधिकतम खुले वलयों (27 डिग्री) जितना नहीं है,लेकिन फ़िर भी यह छोटी दूरबीनों में वलयों को स्पष्ट रूप से देखने के लिए पर्याप्त है। *4 अक्टूबर की रात से 7 अक्टूबर 2026 की रात्रि का खगोलीय दृश्य कैसा होगा?।*

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश,भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया 4 अक्टूबर से 7 अक्टूबर 2026 तक की रात आकाश में एक सुंदर एवं खगोलीय जिज्ञासा बढ़ाने वाला खगोलीय दृश्य देखने को मिलेगा, जिसमें शनि के अलावा अन्य ग्रह, तारे और चंद्रमा भी शामिल होंगे। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 4 अक्टूबर 2026 की रात्रि में शनि ग्रह की बात करें तो पाते हैं कि  यह शाम को लगभग 5:50 बजे के बाद से पूर्वी क्षितिज से ऊपर आते हुए रात भर आकाश के सीट्स तारामंडल में प्लस 0.32 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ चमकीला खगोलीय पिंड होगा।और चंद्रमा रात लगभग 12:30 बजे पूर्वी क्षितिज पर थोड़ा उत्तर दिशा में कर्क (Cancer) तारामंडल में लगभग माइनस 9.57 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ उदय होगा। और उसी दिशा में दो सुंदर तारों की बात करें तो पाते हैं कि चंद्रमा के ऊपर कैस्टर (Castor) और पोलैक्स (Pollux) तारे चमकते हुए दिखाई देंगे। अब अगर मंगल ग्रह की बात करें तो पाते हैं कि उसी दिशा से निकलते हुए मंगल ग्रह लगभग 12:50 बजे पूर्वी क्षितिज पर थोड़ा सा उत्तर दिशा में ऊपर आना शुरू करेगा और चंद्रमा के काफी नीचे कर्क तारामंडल क्षेत्र में ही मंगल ग्रह लगभग प्लस 1.10 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ दिखाई देगा। एवं इसी कड़ी में ब्रहस्पति ग्रह की भी बात करें तो पाते हैं कि बृहस्पति ग्रह भी रात लगभग 2:05 बजे, सिंह (Leo) तारामंडल में लगभग माइनस 1.74 मैग्नीट्यूड की चमक लिए उदय होगा और उसी दिशा क्षेत्र में रेगुलस तारा भी अपनी चमक बिखेरते हुए रात लगभग 2:50 बजे, ठीक उसी पूर्वी क्षितिज से थोड़ा उत्तर दिशा में सिंह तारामंडल क्षेत्र में रेगुलस तारा लगभग प्लस 1.40 मैग्नीट्यूड की चमक के साथ दिखाई देगा।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह सुंदर खगोलीय दृश्य 4 अक्टूबर से लेकर 7 अक्टूबर 2026 तक थोड़े सा समय में भी बदलाव करते हुए एवं आगे-पीछे दिखते और मैग्नीट्यूड में थोड़ा सा परिवर्तन के साथ दिखाई देते रहेंगे। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विशेष रूप से, 7 अक्टूबर को रात में लगभग 2:40 बजे के बाद क्षितिज से ऊपर चंद्रमा और रेगुलस तारे की एक शानदार युति  (Conjunction) भी दिखाई देगी, जहाँ वे काफी पास-पास दिखाई देंगे।
इसी दौरान खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष व्याख्या करते हुए समायोचित रूप में बताया कि हमारे समाज में शनि ग्रह को लेकर फैले हुए भ्रम से बचने की भी अति आवश्यकता है क्योंकि बिना जाने एवं देखे, जांचे,परखे और बिना विश्व वैज्ञानिक प्रमाण आधारित तथ्यों के कुछ भी यूँ ही नहीं मानना चाहिए, इसीलिए पहले ठीक से जानना चाहिए तभी मानना चाहिए और तभी किसी समाज में व्याप्त अंधविश्वासों का निवारण किया जा सकता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं सर्वांगीण वैज्ञानिक वातावरण से उत्पन्न वैज्ञानिक चेतना का विकास हो सकता है एवं तभी किसी समाज और देश का भला भी हो सकता है, इसीलिए खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि शनि के छल्लों और चंद्रमाओं की दुनिया की बात करें तो पाते हैं कि शनि, सूर्य से बाहर की ओर स्थित छठा ग्रह है। प्राचीन काल में लोग इसे स्थिर तारों के बीच घूमने वाले एक सुनहरे "तारे" या 'घुमक्कड़' के रूप में देखते थे। लेकिन उन्होंने बाद में जाना कि यह कोई तारा नहीं है बल्कि यही है शनि ग्रह। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि शनि के वलयों की बात करें तो पाते हैं कि 17वीं शताब्दी में दूरबीनों के आविष्कार के बाद ही इसके छल्ले दिखाई देने लगे। साथ ही बाद में अंतरिक्ष यानों ने भी खुलासा किया कि शनि के कई पतले, बारीक और अति सुंदर वलय हैं जो बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़ों से बने हैं। और यही छल्ले इसकी खूबसूरती का राज़ हैं जो इसे सुंदरता में अन्य से ज़्यादा सम्मान दिलाते हैं, इसीलिए इसको वलयों का सम्राट भी कहा जाता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अब अगर हम शनि ग्रह के चंद्रमाओं की बात करें तो पाते हैं कि शनि के कम से कम 293 चंद्रमा हैं जिनकी कक्षाएँ सिद्ध हो चुकी हैं। इनमें से केवल 13 चंद्रमाओं का व्यास 30 मील (लगभग 50 किलोमीटर) से अधिक है।

*शनि को देखने का सबसे अच्छा समय कौनसा होता है?।*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि शनि ग्रह को देखने के लिए सबसे अच्छा समय, विपरीत स्थिति होती है जो वर्ष के उस सर्वोत्तम समय के मध्य में होती है जब किसी बाहरी ग्रह को देखना संभव होता है। एवं बिना किसी दूरबीन/ टेलीस्कोप या विनोकुलर आदि उपकरण की सहायता से भी आप नंगी आँखों से ही शनि ग्रह को आसानी से देख कर पहचान सकते हैं क्योंकि शनि ग्रह भी एक चमकीला ग्रह है और जब यह हमारे क्षितिज के ऊपर होता है, तो यह बिना किसी उपकरण के आसानी से दिखाई देता है। लेकिन अगर आप इसके छल्लों को अच्छे से देखना चाहते हैं तो आप किसी भी अच्छी दूरबीन, जिसे स्थिर रूप से पकड़ा जाए या तिपाई पर लगाया जाए, तब शनि को एक चमकदार अंडाकार डिस्क के रूप में प्रदर्शित करेगी। वहीं, यदि आप छोटी दूरबीन को भी अच्छे से समान्तरण कर सकें और प्रकाश प्रदूषण नहीं हो एवं साथ ही सटीक दिशा का ज्ञान और पहचान होने पर मौसम साफ़ हो तो किसी भी 6 इंच के छोटे घरेलू दूरबीन से भी इसके सुंदर छल्ले आसानी से दिखाई दे सकते हैं ।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 4 अक्टूबर 2026 की रात शनि को देखने के लिए एक बेहतरीन मौका है। इस दौरान आप साधारण आँखों से ही इसे देख सकते हैं और यह न केवल वर्ष का सबसे चमकीला शनि होगा,बल्कि इस रात्रि में चंद्रमा, मंगल, बृहस्पति और कैस्टर,पोलक्स और रेगुलस तारे के साथ बना खगोलीय दृश्य भी दर्शनीय होगा। और अंत में खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष ज़ोर देते हुए यह भी बताया कि खगोल/अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बिना एक्सपर्ट के जानकारी दिए ऐसे ही किसी की भी आदि अधूरी और अप्रमाणित सूचनाओं के साथ ही भ्रामक जानकारियों एवं अंधविश्वासों से पूरी तरीके से दूर रहें, इसीलिए खगोलविद अमर पाल सिंह हमेशा ही कहते हैं कि सही ज्ञान, सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान।
इसी के साथ खगोलविद अमर पाल सिंह ने यह भी बताया कि अगर 4 अक्टूबर 2026 की रात को आप उपरोक्त तारों, ग्रहों और चंद्रमा को किसी कारणवश नहीं देख पाएं तो भी उतना निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि शनि की विपरीत स्थिति का दृश्य छोड़कर उपरोक्त खगोलीय पिण्डों का दिखना जैसे चंद्रमा, ग्रहों और तारों का दृश्य संयोजन दूरी में आगे पीछे एवं समय और थोड़ा सा मैग्नीट्यूड और दिशा आदि में भी परिवर्तन के साथ आकाश में दिखाई देते हुए 7 अक्टूबर तक सुंदर दृश्य रूप में दिखाई देंगे।
     
युजवेंद्र चहल ने क्रिकेट के इस फॉर्मेट से लिया संन्यास, इंस्टाग्राम पर लिखा भावुक मैसेज

#yuzvendrachahalannouncedhisretirementfromfirstclasscricket

भारतीय स्पिनर युजवेंद्र चहल ने रेड बॉल क्रिकेट फॉर्मेट यानी फर्स्ट क्लास क्रिकेट से संन्यास का एलान कर दिया है। चहल ने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिये फर्स्ट क्लास क्रिकेट को अलविदा कहने की घोषणा की। हालांकि, उन्होंने भारत के लिए खेलने की इच्छा जाहिर की है। उन्होंने अपना आखिरी रेड-बॉल मैच हाल ही में लॉर्ड्स में नॉर्थम्पटनशायर के लिए खेला था। अब व्हाइट-बॉल क्रिकेट खेलना जारी रखेंगे।

युजवेंद्र चहल का भावुक पोस्ट

न्यास का ऐलान करते हुए युजवेंद्र चहल ने भावुक पोस्ट शेयर किया। चहल ने इंस्टाग्राम पोस्ट पर लिखते हुए कहा- मैंने जो पहली क्रिकेट बॉल पकड़ी थी, वह लाल रंग की थी। तब मैं 10 साल का था और मुझे अंदाजा भी नहीं था कि मुझे इस खेल से इतना गहरा लगाव हो जाएगा। मेरे लिए रेड-बॉल क्रिकेट कभी भी सिर्फ एक और फॉर्मेट नहीं था। इसी खेल ने मुझे सब्र, कैरेक्टर, मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत और घंटों तक मैदान पर डटे रहकर हर रन और हर विकेट के लिए संघर्ष करने की असली खुशी का मतलब सिखाया।

मेरा सफर खत्म नहीं हुआ-चहल

उन्होंने आगे लिखा, मैंने अपना आखिरी प्रथम श्रेणी मैच लॉर्ड्स में खेला। यह कहते हुए भावुकता महसूस होती है क्योंकि टेस्ट कैप पाना हमेशा से मेरा सपना रहा था, जिसे मैंने कई वर्षों तक संजोकर रखा था। भले ही वह सपना पूरा न हो सका, लेकिन मैं अपने इस सफर से सचमुच संतुष्ट हूं और इस प्रारूप में मिले हर मौके के लिए बेहद शुक्रगुजार हूं। रेड बॉल ने मुझे मेरी जिंदगी की कुछ सबसे खूबसूरत यादें दी हैं और कोई भी मुझसे वे यादें कभी नहीं छीन सकता। लेकिन मेरा सफर अभी खत्म नहीं हुआ है।

एक भी टेस्ट खेलने का मौका नहीं मिला

वह लंबे समय से टीम इंडिया से भी बाहर चल रहे है। अगस्त 2023 में भारत के लिए आखिरी बार वेस्टइंडीज के खिलाफ खेलते नजर आए थे। 36 साल के चहल ने भारत के लिए 72 वनडे और 80 टी-20 इंटरनेशनल खेले हैं, लेकिन उन्हें एक भी टेस्ट खेलने का मौका नहीं मिला। यानी रेड बॉल में उन्होंने कभी कोई इंटरनेशनल मैच नहीं खेला।

भारत के लिए कभी नहीं खेला टेस्ट

चहल ने लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड पर नॉर्थम्प्टनशायर के लिए रेड बॉल प्रारूप में अपना आखिरी मैच खेला। चहल ने अपने करियर में 49 प्रथम श्रेणी मैच खेले, जिसमें उन्होंने 32.27 की औसत से 148 विकेट लिए। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 6/25 रहा। हाल ही में उन्होंने नॉर्थम्प्टनशायर के लिए काउंटी क्रिकेट खेला और लॉर्ड्स में मिडलसेक्स के खिलाफ अपने आखिरी मैच में दो विकेट लिए। 2026-27 सीजन में 36 वर्षीय खिलाड़ी ने काउंटी चैंपियनशिप में पांच मैच खेले और 21 विकेट लिए। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन डरहम के खिलाफ रहा, जहां उन्होंने कुल नौ विकेट लिए जिसमें पहली पारी में पांच विकेट लेना भी शामिल था।