हनुमान अंश फिल्म के सामूहिक दर्शन से भक्तिमय हुआ माहौल

हजारीबाग। हजारीबाग यूथ विंग के सदस्यों एवं उनके परिवारजनों ने शहर स्थित लक्ष्मी सिनेमा हॉल में सामूहिक रूप से ‘हनुमान अंश’ फिल्म का दर्शन किया। संस्था के संरक्षक चंद्र प्रकाश जैन के निर्देश एवं अध्यक्ष करण जायसवाल के मार्गदर्शन में आयोजित यह कार्यक्रम भक्ति, परिवार और सामाजिक एकजुटता का सुंदर उदाहरण बना।

फिल्म देखने से पहले सभी सदस्य एवं परिवारजन सिनेमा हॉल के बाहर एकत्र हुए, जहां सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। इसके बाद सीताराम के जयघोष के बीच सभी ने सिनेमा हॉल में प्रवेश किया और एक साथ बैठकर फिल्म का आनंद लिया। सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ के कारण पूरे वातावरण में भक्तिमय माहौल बना रहा।

‘हनुमान अंश’ महान संत नीम करौली बाबा (नीब करौरी बाबा) के जीवन और भगवान श्रीहनुमान के प्रति उनके अटूट समर्पण पर आधारित फिल्म है। फिल्म में संत नीम करौली बाबा के जीवन के संघर्ष, साधना और उनसे जुड़ी चमत्कारों की मान्यताओं के साथ प्रेम, सेवा, मानवता तथा ईश्वर के प्रति समर्पण जैसे भावों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म के माध्यम से भक्ति और मानव सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण आधार बनाने का संदेश भी दिया गया है।

फिल्म का भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डाल दी…’ भी दर्शकों के बीच विशेष रूप से भावपूर्ण रहा। सदस्यों एवं उनके परिवारजनों ने पूरी श्रद्धा, उत्साह और भक्ति भावना के साथ फिल्म देखी तथा इसके संदेश की सराहना की।

इस अवसर पर हजारीबाग यूथ विंग के संरक्षक चंद्र प्रकाश जैन ने कहा कि हनुमान चालीसा के सामूहिक पाठ के बाद सभी ने पूरी भक्ति भावना और आनंद के साथ ‘हनुमान अंश’ फिल्म का आनंद लिया। ऐसे आयोजन युवाओं को भक्ति, संस्कार और भारतीय संस्कृति से जोड़ने का सार्थक माध्यम हैं।

वहीं, संस्था के अध्यक्ष करण जायसवाल ने कहा कि परिवारजनों और सदस्यों के साथ सामूहिक रूप से फिल्म देखना बेहद आनंददायक रहा। भक्ति, संस्कार और मनोरंजन का यह सुंदर संगम सभी के लिए यादगार रहा।

हजारीबाग यूथ विंग द्वारा आयोजित इस सामूहिक फिल्म दर्शन का उद्देश्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से युवाओं और परिवारों को एक साथ जोड़ना तथा प्रेम, सेवा, मानवता, भक्ति और संस्कार जैसे मूल्यों के प्रति सकारात्मक भाव जागृत करना भी था। फिल्म से पहले हुए सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ ने पूरे आयोजन को विशेष आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया।

14 सितंबर 2026 को होगी चंद्रमा-शुक्र की दुर्लभ खगोलीय नजदीकी।*


खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आकाश-दर्शन में रुचि रखने वाले अंतरिक्ष प्रेमियों के लिए 14 सितंबर 2026 की शाम बेहद खास होगी, इस दिन चंद्रमा और शुक्र ग्रह पश्चिमी से दक्षिण-पश्चिमी आकाश में एक-दूसरे के बहुत करीब दिखाई देंगे,सूर्यास्त के बाद थोड़े समय के लिए बनने वाली यह चमकीली जोड़ी साफ क्षितिज वाले स्थानों से नंगी आंखों से देखी जा सकेगी, और दोनों खगोलीय पिंडों के बीच न्यूनतम कोणीय दूरी लगभग 28.8 आर्कमिनट, यानी करीब 0.48 डिग्री रहेगी , खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह दूरी इतनी कम होगी कि चंद्रमा और शुक्र ग्रह कम शक्ति वाली दूरबीन या छोटे टेलीस्कोप के एक ही दृश्य क्षेत्र में आ सकते हैं, हालांकि,उन्हें देखने के लिए किसी उपकरण की भी आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि शुक्र ग्रह अपनी अत्यधिक चमक के कारण आकाश में चमकीले तारे जैसा दिखाई देगा, जबकि चंद्रमा पतले बढ़ते हुए अर्धचंद्र के रूप में नजर आएगा। *सूर्यास्त के बाद कितने समय का अवसर मिलेगा* ?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह खगोलीय दृश्य सूर्यास्त के तुरंत बाद पश्चिमी आकाश में दिखाई देगा और दोनों खगोलीय पिंड लगभग शाम 6:16 बजे दक्षिण-पश्चिमी क्षितिज से करीब 16 डिग्री ऊपर दिखाई देंगे इसके बाद वे धीरे धीरे से क्षितिज की ओर नीचे जाते हुए नज़र आयेंगे और रात्रि लगभग 7:30 बजे के क़रीब एवं उसके बाद अस्त होते हुए दिखाई देंगे।

*किस तारामण्डल में मौजूद होंगे और कितना होगा चन्द्रमा और शुक्र ग्रह का मैग्नीट्यूड?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 14 सितम्बर 2026 को दोनों खगोलीय पिण्ड शुक्र ग्रह और चंद्रमा एक दुसरे के बहुत नज़दीक होंगे और इनकी दृश्यता की बात करें तो पाते हैं कि सूर्यास्त से लेकर लगभग 7:30 PM तक दिखाई देंगे उसके बाद दोनों पश्चिमी क्षितिज पर नीचे चले जाएंगे। इसीलिए समय का विशेष ध्यान रखें क्योंकि इनकी बेहद शानदार खगोलीय युति देखने के लिए आपको बहुत ही कम समय मिलेगा। इस दौरान चंद्रमा और शुक्र ग्रह दोनों खगोलीय पिण्ड कन्या तारामंडल में ही स्थित होंगे एवं इस दौरान चंद्रमा का मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 7.63 होगा और शुक्र ग्रह का दृश्य मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 4.73 के क़रीब होगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने यह भी बताया कि स्थानीय भौगोलिक स्थिति, प्रकाश प्रदूषण, सूर्यास्त के समय, धुंध और क्षितिज की रुकावट के कारण अलग-अलग शहरों में दृश्यता का मैग्नीट्यूड कुछ बदल सकता है, इसलिए खगोल प्रेमियों/आकाश दर्शकों को सूर्यास्त से पहले ही खुले मैदान या ऐसे स्थान पर पहुंचने की सलाह दी जाती है, जहां पश्चिमी क्षितिज भवनों, पेड़ों और पहाड़ियों से बाधित न हो, क्योंकि दोनों पिंड क्षितिज के बहुत करीब होंगे, इसलिए अवलोकन के लिए लगभग एक घंटे का ही व्यावहारिक अवसर मिलेगा। *कैसा होगा दोनों खगोलीय पिंडों का दायाँ आरोहण एवं ऐपल्स*?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस दौरान दोनों खगोलीय पिण्ड कन्या तारामंडल में होंगे, या कुछ यूं कहें कि दोनों पिंड
इस अवसर पर चंद्रमा और शुक्र, कन्या तारामंडल की दिशा में ही स्थित होंगे यह विशेषता भी दोनों खगोलीय पिंडों को और भी ख़ास बनाती है,एवं इस दौरान दोनों का right ascension( दायाँ आरोहण) या कुछ यूं कहें कि लगभग उसी समय चंद्रमा और शुक्र का दायाँ आरोहण (Right Ascension) समान होगा,इस स्थिति को खगोलीय भाषा में संयोजन , कंजंक्शन (conjunction) या युति कहा जाता है, या कुछ यूं भी कह सकते हैं कि जब दायाँ आरोहण लगभग समान होता है तो खगोल विज्ञान में इस स्थिति को कंजंक्शन (conjunction) या युति कहा जाता है,और यूं भी समझ सकते हैं कि आकाश में दो पिंडों का बहुत पास दिखाई देना ऐपल्स (appulse) कहलाता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 14 सितंबर 2026 की खगोलीय घटना में दोनों अवधारणाएं लागू होंगी, क्योंकि दोनों पिंड समान (right ascension) दायाँ आरोहण लगभग समान  के निकट होंगे और दृश्य रूप से भी अत्यंत पास नजर आएंगे।
चंद्रमा उस समय लगभग तीन दिन पुराना और करीब 15 प्रतिशत प्रकाशित होगा। यह बढ़ता हुआ अर्धचंद्र होगा। साथ ही इस दौरान शुक्र का दृश्य परिमाण लगभग माइनस 4.73 रहेगा, जिससे वह सूर्यास्त के बाद सबसे चमकीले प्राकृतिक पिंडों में शामिल दिखाई देगा। *कैसा होगा शुक्र का आच्छादन*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विश्व के कुछ भागों में चंद्रमा शुक्र को पूरी तरह ढकता हुआ दिखाई देगा। इस घटना को lunar occultation of Venus, अर्थात या चंद्रमा द्वारा, शुक्र का आच्छादन कहा जाता है, वैसे यह कोई यह चंद्र ग्रहण नहीं होता है, लेकिन कुछ लोगों द्वारा आम बोलचाल की भाषा में इसको शुक्र ग्रह का चंद्र ग्रहण भी बोल देते हैं,  लेकिन खगोल विज्ञान में ग्रहण की बात करें तो पाते हैं कि जब चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, जबकि occultation या आच्छादन में चंद्रमा किसी दूर स्थित पिंड को हमारी दृष्टि से कुछ समय के लिए छिपा देता है इसीलिए इसको खगोल वैज्ञानिक रूप में ऑक्ल्टेशन या आच्छादन कहा जाता है  खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर हम बात करें 14 सितंबर 2026 की घटना की तो पाते हैं कि यह ऑक्ल्टेशन या आच्छादन भारत के कुछ या बड़े हिस्सों से दृश्यता संभव है लेकिन संपूर्ण भारत से इस ऑक्ल्टेशन या आच्छादन को नहीं देखा जा सकेगा, लेकिन शानदार खगोलीय युति को देख सकते हैं। *भारत के बाकी हिस्सों में क्या दिखेगा?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि जहाँ ऑक्ल्टेशन नहीं दिखाई देगा वहाँ चंद्रमा और शुक्र बेहद करीब (कंजंक्शन/युति) में दिखेंगे, सूर्यास्त के बाद पश्चिमी क्षितिज के पास यह शानदार खगोलीय युति को नंगी आँखों/साधारण आँखों से आसानी से दिखने वाला दृश्य होगा,बशर्ते क्षितिज साफ़ हो ।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक शब्द की बात करें तो पाते हैं कि इसे “चंद्र-शुक्र ऑक्ल्टेशन” या “चंद्रमा द्वारा शुक्र का आच्छादन” ही कहा जाता है लेकिन यह भी जानना रुचिकर है कि आम बोलचाल में “चंद्र-शुक्र ग्रहण” भी कहा जाता है, लेकिन इसको तकनीकी रूप से ऑक्ल्टेशन ही कहा जाता है। *ऐपल्स, कंजंक्शन और ऑक्ल्टेशन क्या होता है?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि ऐपल्स वह खगोलीय घटना है,जिसमें दो या दो से अधिक खगोलीय पिंड,आमतौर पर ग्रह या चंद्रमा, जब आकाश में एक-दूसरे के बहुत पास दिखाई देते हैं,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा आकाश में अपेक्षाकृत तेज गति से घूमता है और लगभग हर महीने तारामंडलों के बीच अपनी एक पूरी परिक्रमा पूरी करता है। इसलिए अधिकांश ऐपल्स तब होते हैं, जब चंद्रमा आकाश में किसी अन्य खगोलीय पिंड के पास से गुजरता है और चंद्रमा अपनी कलाओं के चक्र में लगभग समान चरण पर हर महीने लगभग उन्हीं ग्रहों के पास से गुजरता है, इसलिए कई घटनाएं आमतौर पर मासिक आधार पर दोहराई जाती हैं,दो खगोलीय पिंडों के बीच कितनी दूरी होने पर उनके निकट आने को ऐपल्स कहा जाए, इसकी कोई औपचारिक परिभाषा नहीं है, लेकिन खगोलविदों द्वारा उन सभी ऐपल्स को सूचीबद्ध किया जाता है, जिनमें ग्रह या छोटे ग्रह एक-दूसरे से एक डिग्री के भीतर आ जाते हैं, साथ ही नग्न आंखों से दिखाई देने वाले खगोलीय पिंडों के लिए तीन डिग्री तक की दूरी वाले ऐपल्स को शामिल किया जाता है,वहीं,विशेष रूप से चमकीले और नग्न आंखों से आसानी से दिखाई देने वाले पिंडों के लिए पांच डिग्री तक की दूरी को भी ऐपल्स की श्रेणी में रखा जाता है और
कभी-कभी दो खगोलीय पिंडों के बीच होने वाला यह निकट संयोग इतना करीबी होता है कि एक पिंड दूसरे के सामने से गुजरता हुआ दिखाई देता है,इस घटना को पारण या ऑकल्टेशन (Occultation) या आच्छादन भी कहा जाता है,ऐसी अधिकांश घटनाओं में चंद्रमा शामिल होता है, क्योंकि चंद्रमा हर महीने आकाश के बहुत बड़े क्षेत्र से होकर गुजरता है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि ऐपल्स और युति को आम बोलचाल में खगोलीय पिंडों के आकाश में एक-दूसरे के पास दिखाई देने को अक्सर युति या कंजंक्शन (Conjunction) ही कहा जाता है,हालांकि, खगोल विज्ञान में कंजंक्शन का अर्थ कुछ अधिक तकनीकी है, यह उस स्थिति को कहा जाता है, जब दो खगोलीय पिंडों का राइट एसेंशन (Right Ascension) या दायां आरोहण समान हो जाता है, या कुछ और भी अधिक
सरल शब्दों में कहें कि ऐपल्स में दो पिंड आकाश में पास-पास दिखाई देते हैं, जबकि कंजंक्शन दो पिंडों की आकाशीय स्थिति से जुड़ी एक विशिष्ट खगोलीय अवस्था है,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इसको कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि ऐपल्स वह खगोलीय घटना है जिसमें पृथ्वी से देखने पर दो पिंडों के बीच आकाशीय कोणीय दूरी न्यूनतम हो जाती है,इसके लिए कोई सार्वभौमिक दूरी-सीमा निर्धारित नहीं है, इसके विपरीत, कंजंक्शन एक निर्देशांक-आधारित स्थिति है, जिसमें दो पिंड समान दायाँ आरोहण या ecliptic longitude या क्रांतिक रेखांश, क्रांतिवृत्तीय रेखांश या भोगांश (Bhogansh) भी कहा जाता है ,यह अंतरिक्ष में किसी आकाशीय पिंड (जैसे सूर्य, चंद्रमा या ग्रह) की स्थिति को मापने का एक पैमाना है, जो क्रांतिवृत्त (Ecliptic path) पृथ्वी के चारों ओर सूर्य का आभासी पथ) पर आधारित होता है उसको साझा करते हैं, इसी दौरान यदि कोई पिंड दूसरे को हमारी दृष्टि से ढक देता है, तो घटना को ऑकल्टेशन या आच्छादन कहा जाता है। लेकिन अंतरिक्ष में यह पिंड करोड़ों किलोमीटर की दूरी पर मौजूद होते हैं यह केवल पृथ्वी से देखने पर दृष्टि प्रभाव होता है,वास्तविक रूप या भौतिक रूप में उपरोक्त से कोई भी खगोलीय पिण्ड एक दुसरे के इतने निकट नहीं होते हैं। *यह आच्छादन का क्षेत्र कौन कौन से देशों से होंगे।*

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर उत्तर प्रदेश भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत में 14 सितंबर 2026 से पहले चंद्रमा द्वारा शुक्र के ऑक्ल्टेशन की पिछली प्रमाणित घटना 24 मार्च 2023 को हुई थी,भारत के कुछ हिस्सों में यह घटना लगभग 15:55 से 18:16 IST के बीच हुई, हालांकि शहर के अनुसार समय अलग था। लेकिन इस बार 14 सितंबर 2026 की बात करें तो पाते हैं कि इस आच्छादन का क्षेत्र, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और पश्चिमी रूस के कुछ हिस्सों तक सीमित रहेगा,खगोलीय गणनाओं के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर शुक्र के छिपने का समय और पुनः दिखाई देने का समय देशों के हिसाब से अलग अलग होता है,लेकिन भारतीय समय के अनुसार यह   आच्छादन बिल्कुल सूर्यास्त के क़रीब पड़ेगा,इसलिए भारत के कई स्थानों पर यह आच्छादन शाम के कुछ उजाले में होगा और उन स्थानों से बिना उपकरण के इस आच्छादन को देखना कुछ कठिन भी हो सकता है, साथ ही कुछ जगहों से सूर्यास्त के बाद भी यह काफ़ी अच्छा दिखाई देगा, लेकिन भारत में अधिकांश लोगों को युति ही दिखेगी, क्योंकि भारत के हर हिस्से से शुक्र का आच्छादन दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है, जैसा कि दिल्ली सहित कई स्थानों पर यह घटना शाम को क्षितिज के बहुत निकट होगी फिर भी सूर्यास्त के बाद चंद्रमा और शुक्र का निकट संयोग कुछ समय तक भारत के बड़े हिस्से से देखा जा सकेगा।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि या कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि उस दौरान सूर्यास्त और शाम का उजाला (Daylight/Twilight) भी होगा एवं भारत के अधिकांश हिस्सों (विशेषकर मध्य और दक्षिणी भारत) में यह खगोलीय घटना शाम के समय और सूर्यास्त के बेहद करीब होगी,कई जगहों पर उस समय आसमान में शाम का कुछ उजाला रहेगा, इसीलिए ख़ास ऑक्ल्टेशन को बिना उपकरण देखना कठिन हो सकता है चूंकि शुक्र और चंद्रमा दोनों ही सूर्यास्त के धुंधलके या हल्के उजाले में  ही दिखना शुरू हो जाएंगे इसलिए शुरुआती चरणों में बिना टेलीस्कोप या दूरबीन (Binoculars) के इसे स्पष्ट देख पाना वाकई कुछ कठिन हो सकता है, लेकिन सूर्यास्त के कुछ ही देर बाद का नजारा भी बेहतरीन होगा और साथ ही अगर जिन स्थानों पर यह आच्छादन दिखेगा और वहाँ का आसमान भी थोड़ा गहरा साफ़ और प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः दूर होने के कारण पतले से हंसिया आकार (Crescent) के चंद्रमा के पीछे चमकीले शुक्र ग्रह को गायब होते देखना बकाई काफी खूबसूरत और स्पष्ट एवं सुंदर दृश्य के साथ ही भव्य नज़ारा होगा। *किधर देखें।?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इसे देखने के लिए सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में सावधानी पूर्वक सबसे पहले चमकीले शुक्र को खोजें, इसको खोजना बहुत ही आसान है क्योंकि आज कल पश्चिमी दिशा में सबसे चमकदार तारे जैसा (लेकिन वो तारा नहीं है वह शुक्र ग्रह है) जो दिख रहा है, वही है शुक्र ग्रह एवं उसके निकट पतला चंद्र-वर्धमान दिखाई देगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा पृथ्वी के निकट होने के कारण अलग-अलग स्थानों से उसका आकाशीय स्थान बदलता हुआ दिखाई देता है, यह लंबन' कहलाता है, यह किसी वस्तु की स्थिति में होने वाला वह आभासी परिवर्तन या विस्थापन है, जो उसे दो अलग-अलग जगहों या दृष्टियों से देखने पर महसूस होता है।

*लंबन (विस्थापन) क्या है?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने लंबन के बारे में उदाहरण देते हुए बताया कि जब आप अपनी एक आँख बंद करके और फिर बारी-बारी से दूसरी आँख बंद करके सामने किसी उंगली को देखते हैं, तो उंगली अपनी जगह से हिलती हुई/हटती हुई सी प्रतीत होती है। इसे ही लंबन (Parallax) कहते हैं,पास की वस्तुएं दूर की वस्तुओं की तुलना में अधिक लंबन (विस्थापन) दिखाती हैं,इसी लंबन (parallax) पैरालेक्स के कारण occultation या आच्छादन केवल पृथ्वी के एक सीमित क्षेत्र से दिखाई देता है, जबकि निकट युति अधिक बड़े क्षेत्र में नजर आती है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा द्वारा शुक्र के आच्छादन की पिछली विश्वव्यापी घटना 17 जून 2026 को हुई थी, जबकि भारत से ऐसी घटना 24 मार्च 2023 को दिखाई दी थी , साथ ही खगोलविद अमर पाल सिंह ने अपील भी की है कि आकाश दर्शकों को सूर्य को सीधे दूरबीन या विनोकुलर से, बिना प्रमाणित सोलर फ़िल्टर्स या किसी भी अन्य ऑप्टिवल उपकरण से सूर्य को कभी भी सीधे नहीं देखना चाहिए , खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणित सोलर फिल्टर युक्त दूरबीन या विनोकुलर एवं फिल्टर युक्त कैमरा आदि ऑप्टिकल उपकरण का ही उपयोग करें और सूर्य को सीधे देखने से बचना चाहिए क्योंकि सूर्य को सीधे देखने पर इस से आँखें खराब हो सकती हैं। इसीलिए सूर्यास्त के समय भी सूर्य की तरफ़ दूरबीन/  टेलीस्कोप लगाते समय इस दौरान भी अति महत्वपूर्ण सावधानी रखना चाहिए और इस शानदार खगोलीय घटना का आनंद उठाएं।

      
डीएवी भंडारकोला के 85 खिलाड़ियों का चयन देवघर-डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए:विद्यालय में हुआ भव्य सम्मान समारोह।
देवघर: गीता देवी डीएवी पब्लिक स्कूल, भंडारकोला, देवघर के लिए यह गौरव का विषय है कि विद्यालय के 85 प्रतिभावान खिलाड़ियों का चयन डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए हुआ है। खिलाड़ियों की इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर विद्यालय परिसर में विशेष सम्मान समारोह आयोजित कर चयनित खिलाड़ियों एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि जिला खेल पदाधिकारी श्री संतोष कुमार के द्वारा मेडल प्रदान कर सम्मानित किया गया। विद्यालय के खिलाड़ियों ने विभिन्न खेल विधाओं में शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी प्रतिभा का परचम लहराया। प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों ने बड़ी संख्या में स्वर्ण, रजत एवं कांस्य पदक अर्जित किए। कार्यक्रम के प्रारंभ में एनसीसी कैडेट्स के द्वारा मुख्य अतिथि का स्वागत किया गया। तत्पश्चात तिलक आरती और दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इसके बाद सुमधुर स्वागत गीत और मनमोहक नृत्य के द्वारा बच्चों ने दर्शकों का मन मोह लिया।इस अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य मोहम्मद मुस्तफा मजीद ने कहा कि विद्यालय विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ-साथ खेलों को भी समान महत्व देता है। उन्होंने कहा हमारे 85 खिलाड़ियों का डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए चयन विद्यालय की खेल प्रतिभा,खिलाड़ियों की कड़ी मेहनत और खेल प्रशिक्षकों के कुशल मार्गनिर्देशन का परिणाम है। इन खिलाड़ियों की सफलता अन्य विद्यार्थियों को भी खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी। उन्होंने खिलाड़ियों, अभिभावकों एवं खेल प्रशिक्षकों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी तथा चयनित खिलाड़ियों से राष्ट्रीय स्तर पर विद्यालय और देवघर का नाम रोशन करने का आह्वान किया।मुख्य अतिथि जिला खेल पदाधिकारी श्री संतोष कुमार ने खिलाड़ियों को बधाई देते हुए कहा कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मविश्वास, टीम भावना और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का सशक्त साधन है। उन्होंने कहा कि विद्यालय के 85 खिलाड़ियों का डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए चयन देवघर के लिए भी गर्व की बात है। उन्होंने खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर पर और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए शुभकामनाएँ दीं। जोनल स्तर पर खिलाड़ियों ने ताइक्वांडो में 12 स्वर्ण, 7 रजत एवं 10 कांस्य वुशु में 11 स्वर्ण, 3 रजत एवं 5 कांस्य तैराकी में 16 स्वर्ण, 14 रजत एवं 3 कांस्य जूडो में 2 स्वर्ण, 4 रजत एवं 3 कांस्य अंडर-14 हैंडबॉल बालिका वर्ग में 11 स्वर्ण अंडर-19 वॉलीबॉल बालिका में 19 स्वर्ण एरोबिक्स में 17 स्वर्ण, 15 रजत एवं 4 कांस्य योग में 2 स्वर्ण एवं 8 रजत टेबल टेनिस में 1 रजत एवं 3 कांस्य क्रिकेट में 11 कांस्य बैडमिंटन में 4 कांस्य एथलेटिक्स में 1 स्वर्ण एवं 1 रजत जीते। इस अवसर पर खेल प्रशिक्षक आशुतोष कुमार, प्रवीर कुमार राय, राजीव लोचन, देवेंद्र रविदास के अलावा अभिषेक सूर्य, दीपिका सिन्हा, नीलम चौधरी, सन्निवा पटांदी विशेष रूप से मौजूद थे । उक्त आशय की जानकारी मीडिया प्रभारी अभिषेक सूर्य ने दी।
अपहरण व पाक्सो एक्ट के मामले में वांछित एक नफर बाल अपचारी पुलिस अभिरक्षा में

पुलिस अधीक्षक मऊ कमलेश बहादुर के निर्देशन में अपराध/ अपराधियों के विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान के क्रम में अपर पुलिस अधीक्षक अनूप कुमार के कुशल पर्यवेक्षण एवं क्षेत्राधिकारी मधुबन दिनेश दत्त मिश्र के कुशल निर्देशन में थाना हलधरपुर पुलिस टीम द्वारा चमड़ा गोदाम नहर पुलिया के पास से मु0अ0सं0- 180/2026 धारा 87, 137(2), 65(1) बी.एन.एस. (BNS) व धारा 5L/6 पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) थाना हलधरपुर जनपद मऊ से सम्बन्धित एक नफर बाल अपचारी को पुलिस अभिरक्षा में लिया गया । बाल अपचारी अपरोक्त का चालान माननीय न्यायालय किया गया ।

पंजीकृत अभियोग का विवरण

1. मु0अ0सं0 180/2026 धारा 87, 137(2), 65(1) बी.एन.एस. (BNS) व धारा 5L/6 पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) ।

गिरफ्तार अभियुक्त का नाम, पता

1. एक नफर बाल अपचारी ।

गिरफ्तारी का दिनांक व स्थान

1.दिनांक- 08.09.2026

2.स्थान- चमड़ा गोदाम नहर पुलिया के पास ।

9/10 सितंबर 2026 को होगी, एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा

अज्ञात धूमकेतु से उत्पन्न, एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा होगी ख़ास।

जानें,उल्का वर्षा से संबंधित सभी ख़ास रोचक जानकारियां।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल प्रेमियों के लिए 9/10 सितंबर 2026 को एक विशेष दुर्लभ एवं ख़ास खगोलीय नज़ारा देखने को मिलेगा, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगस्त में होने वाली प्रसिद्ध पर्सिड उल्का वर्षा भले ही समाप्त हो गई हो, लेकिन पर्सियस अभी भी टूटते तारे पैदा करना बंद नहीं कर रहा है,क्योंकि सितंबर में एक कम ज्ञात उल्का वर्षा आ रही है और 2026 में इसे देखने के लिए आसमान में असामान्य रूप से अंधेरा भी रहेगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सितंबर में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिड उल्का वर्षा 9 सितंबर, 2026 को अपने चरम पर होगी, जिससे मानसून (वर्षा ऋतु) के अंतिम चरण के अंत में आकाश में तेज़ गति से चलने वाले उल्का वृष्टि दिखाई देगी लेकिन यह प्रसिद्ध अगस्त पर्सिड उल्का वर्षा की तुलना में काफी छोटी है, फिर भी इस वर्ष इसका एक बड़ा लाभ यह है कि इस उल्का वृष्टि के दौरान चंद्रमा की रोशनी लगभग नहीं के बराबर होगी ।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर आपको लगता था कि उल्का वृष्टि का मौसम अगस्त में होने वाले शानदार पर्सिड्स उल्कापिंडों के साथ समाप्त हो गया है, तो आसमान की ओर देखने का एक और कारण है, सितंबर में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा जिसमें आकाश में तेज़ गति से चलने वाली उल्काएं दिखाई देंगी और सितम्बर 2026 में खगोलविदों के ध्यान देने का एक और भी कारण है कि खगोलीय गणनाओं से पता चलता है कि पृथ्वी 10 सितंबर की सुबह/ भोर में धूमकेतुओं के मलबे की एक पुरानी लकीर से वायुमंडलीय घर्षण कर सकती है,जिससे संभवतः उल्का गतिविधि में संक्षिप्त वृद्धि हो सकती है, लेकिन यह पूरी तरीके से निश्चित नहीं है, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इससे इस वर्ष सितंबर की उल्का वर्षा सामान्य से अधिक रोचक हो सकती है।

सितंबर में एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का देखने का सबसे अच्छा समय एवं चरम समय क्या होगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वर्षा को देखने के लिए 9 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि से 10 सितंबर 2026 की सुबह/भोर तक सबसे ज्यादा अच्छा रह सकता है क्योंकि उस दौरान इसका चरम सक्रिय समय भी रहेगा।

इस दौरान कितनी उल्काएं देख सकते हैं

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैसे तो यह एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वर्षा, लगभग 5 से 21 सितंबर 2026 तक सक्रिय रहेगी लेकिन 9 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि से 10 सितम्बर की भोर को इसका चरम समय होने के कारण आदर्श परिस्थितियों में इसकी अनुमानित दर लगभग 5 से 8 उल्काएं प्रति घंटा तक हो सकती है लेकिन सामान्य दर कई वर्षों में लगभग 5 उल्कापिंड प्रति घंटा ही रही है,और अगर हम इसकी गति की बात करें तो पाते हैं कि एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का की गति लगभग 64 किमी प्रति सेकंड से लेकर 70 किलोमीटर प्रति सेकंड तक भी हो सकती है, इस सितंबर 2026 में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि भारत के लिए देखने का सबसे अच्छा समय 9 सितंबर, 2026 को आधी रात के बाद से सुबह तक रहेगा और भोर से पहले के घंटे में यह उल्का वृष्टि सबसे अधिक प्रकाशमान बिंदु प्रदान कर सकती हैं, साथ ही आदर्श अंधेरे आसमान की स्थिति में उत्तरपूर्वी क्षितिज की ओर, पर्सियस तारामंडल के पास सबसे अच्छा दिखाई देंगी और साथ ही लगभग अमावस्या के चांद के कारण आसमान में उत्कृष्ट अंधेरा भी रहेगा इसीलिए बस मौसम साफ़ और शहर के प्रकाश प्रदूषण की रोशनी से दूर एक सुंदर,साफ़, संपूर्ण सुरक्षित एवं पूर्ण सावधानी पूर्वक एक आदर्श अंधेरी जगह ढूंढ लेंगे तो परिस्थितियां और भी सर्वश्रेष्ठ हो सकती हैं।

दुनियां में और भारत में दृश्यता क्या और कैसी रहेगी ।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में आता है और यह उल्का बौछार मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के देशों में ही दिखाई देगी, इसीलिए इसका मुख्य पीक 9 सितंबर 2026 की रात से लेकर 10 सितंबर 2026 के तड़के सुबह (pre-dawn hours) तक रहेगा,भारत में इसे देखने का सबसे सही समय 9 सितंबर की रात 11:00 बजे के बाद से लेकर अगले दिन सुबह सूरज निकलने से पहले तक है। खगोलविद अमर पाल ने बताया कि चाँद की स्थिति की बात करें तो पाते हैं कि यह (सबसे अच्छी बात) है इस साल 9 सितंबर को चंद्रमा 'न्यू मून' (अमावस्या) के बेहद करीब होगा, जिससे आसमान में चाँद की रोशनी का व्यवधान नहीं रहेगा साथ ही में घना अंधेरा होने के कारण हल्के और बेहद तेज़ तैरते हुए उल्कापिंड भी आसानी से देखे जा सकेंगे,लेकिन लाइट पॉल्यूशन से पूरी तरीके से दूर जाएं क्योंकि शहरों की तेज़ रोशनी और प्रदूषण के कारण ये वैसे ही कम दिखने वाले उल्कापिंड बिल्कुल गायब भी हो सकते हैं साथ ही

मानसून का खलल भी हो सकता है चूंकि भारत में सितंबर की शुरुआत में कई हिस्सों में मानसूनी बादल छाए रहते हैं, इसलिए यदि आपके इलाके में आसमान पूरी तरह साफ़ (Clear Sky) रहता है, तभी आप इसे देख पाएंगे।

किस तारामण्डल क्षेत्र में दिखाई देंगी एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि के दीप्तिमान तारामंडल की बात करें तो पाते हैं कि यह उत्तर-पूर्वी क्षितिज की ओर,पर्सियस तारामंडल क्षेत्र से आती हुई दिखाई देंगी,या कुछ यूं कहें कि पर्सियस तारामंडल क्षेत्र में इस एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि का रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु होगा।

क्या होता है रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि क्योंकि किसी भी तारामंडल क्षेत्र से आती हुई उल्काओं का दिखना केवल एक दृष्टि प्रभाव ही होता है इसीलिए यह एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि भी पर्सियस तारामंडल की तरफ़ से दिखना केवल एक दृष्टि प्रभाव ही होगा,लेकिन इसको कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे की अगर आप कहीं खाली पड़ी हुईं रेलगाड़ियों की पटरियों को देखते हैं तो आपको दूर सामने देखने पर वह आगे एक दूर जगह पर एक दूसरे से मिलती हुईं नज़र आती हैं ठीक वैसे ही आकाश में नज़र करने पर जिस तारामंडल क्षेत्र की तरफ़ से कोई भी उल्का वृष्टि दिखाई देती है उसी के आधार पर उस उल्का वर्षा का नाम रखा गया है और उस बिंदु जिस तरफ़ से आती हुई दिखाई देती हैं उसको खगोल विज्ञान में रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु के नाम से जाना जाता है, लेकिन वैसे तो यह रात्रि आकाश के किसी भी हिस्से में दिखाई दे सकती हैं इसीलिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः बचकर संपूर्ण आकाश में नज़र डालकर खोजने का प्रयास करना चाहिए और इसके चरम की बात करें तो पाते हैं कि भारत में 9–10 सितंबर 2026 की रात को अपने चरम (Peak) पर होगी क्योंकि यह एक छोटी (minor) उल्का वर्षा है, जिसमें आकाश में टूटते तारे दिखाई देते हैं। इसीलिए 9 सितंबर 2026 (रात से अगली सुबह तक) उत्तम समय रहेगा या कुछ यूं कहें कि 9 की आधी रात के बाद और सुबह होने से पहले के साफ और अंधेरे आसमान में लगभग 5 से 10 उल्काएं प्रति घंटा भी नज़र आ सकती हैं लेकिन इनको ठीक से देखने के लिए आपको शहर की तेज रोशनी (Light pollution) से दूर किसी शांत,साफ़ एवं स्वच्छ रात्रि बाली जगह का चुनाव करना होगा साथ ही इस दौरान आसमान को देखने के लिए किसी विशेष टेलीस्कोप या दूरबीन की भी जरूरत नहीं है, इसे खुली आंखों से देखा जा सकता है लेकिन अपनी आंखों को अंधेरे के अनुकूल ढलने के लिए कम से कम 30 मिनट का समय दें क्योंकि यह खास, एप्सिलॉन परर्सीड्स उल्का बौछारें उस दौरान अपने चरम पर होंगी इसीलिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः दूर,साफ मौसम में नग्न आंखों के साथ ही इसका दीदार हो सकेगा।

किस धूमकेतु के कारण घटित होगी यह एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वर्षा।?

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर उत्तर प्रदेश भारत के खगोलविद् अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलीय दृष्टि से 9 सितंबर 2026 को होने वाला यह विशेष एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का है इसके मुख्य जनक यानी कि एप्सिलोन परर्सीड्स उल्काओं का निर्माण करने वाले धूमकेतु की खोज खगोल वैज्ञानिक आज तक निश्चित रूप से नहीं कर पाए हैं, लेकिन ये अंतरिक्ष में घूम रहे धूल और मलबे के कण होते हैं, जो 64 से लेकर 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की अत्यधिक रफ्तार से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही जल जाते हैं,इनको ही वैसे तो साधारण भाषा में टूटते हुए तारे या शूटिंग स्टार्स भी कहा जाता हैं,लेकिन खगोल विज्ञान की भाषा में कहें तो उल्का (Meteor) अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में अत्यधिक वेग से प्रवेश करने वाले छोटे चट्टानी या धात्विक पिंड होते होते हैं एवं उल्काओं की उत्पत्ति की बात करें तो पाते हैं कि ये क्षुद्रग्रहों (Asteroids) के टूटे हुए टुकड़े या ज़्यादातर धूमकेतुओं (Comets) द्वारा छोड़े गए धूल और गैस के कण ही होते हैं जो तेज गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं,तो वायुमण्डल के साथ घर्षण (Friction) के कारण अत्यधिक गर्मी पैदा होती है इससे ये छड़ भर के लिए तीव्र वेग से जल उठते हैं और आकाश में प्रकाश की एक चमकीली धारी या लकीर के रूप में दिखाई देते हैं, लेकिन खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह भी जानना आवश्यक है कि उल्का और उल्कापिंड में अंतर यह होता है कि अधिकांश उल्काएँ वायुमंडल में पूरी तरह जलकर नष्ट हो जाती हैं, या कुछ यूं कहें कि जब यह पृथ्वी के वायुमंडल में रगड़ या घर्षण से जलती हुईं लकीरें बनाती हुई दिखाई देती हैं उस अवस्था को उल्का या उल्का वृष्टि या उल्का वर्षा कहा जाता है, लेकिन जो इनके अंतरिक्षीय टुकड़े आकार में बड़े होने के कारण पूरी तरह जल नहीं पाते हैं और ठोस छोटी- बड़ी चट्टानों के रूप में छोटे एवं बड़े टुकड़ों के रूप में पृथ्वी के वायुमंडलीय झंझावातों को पार करते हुए सीधे पृथ्वी की सतह पर आ कर गिरते हैं, उन्हें ही उल्कापिंड (Meteorites) कहा जाता है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अब अगर विशेष रूप से हम बात करें इस 9 सितंबर 2026 में होने वाली इस ख़ास एप्सिलॉन परर्सीड्स उल्का वृष्टि की तो इसके बारे में कुछ बड़ी ही रोचक जानकारियां भी सामने आती हैं जैसे कि वैज्ञानिक आज तक एप्सिलॉन परसिड्स (September Epsilon Perseids) उल्का बौछार के लिए जिम्मेदार मूल धूमकेतु (Parent Comet) की पूरी तरीके से खोज नहीं कर पाए हैं,लेकिन इस दिशा में विश्व वैज्ञानिक समुदाय की लगातार खोंजे जारी हैं,साथ ही खगोलविद अमर पाल सिंह के विचार प्रयोग परिकल्पना (Thought Experiments Hypothesis) के अनुसार भी इस उल्का बौछार से जुड़े मुख्य तथ्यों में से अज्ञात मूल धूमकेतु के लिए विचार प्रयोग वैज्ञानिक अनुमान है कि इसके लिए जिम्मेदार कोई बड़ा पिंड एक अज्ञात दीर्घ-अवधि (unknonwn long-period) वाला धूमकेतु है, जिसे सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में हजारों साल लगते हैं और उसकी कक्षा भी अति दीर्घवृत्ताकार होगी, क्योंकि दीर्घ-आवर्तकाल वाले धूमकेतु, ऊर्ट बादल (Oort cloud) से उत्पन्न होने वाले खगोलीय पिंड हैं, लेकिन कुछ दीर्घ-अवधि वाले धूमकेतु/ (कॉमेट) या जिन्हें साधारण भाषा में पुच्छल तारा भी कहा जाता है वह अज्ञात ही हैं खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर प्रकाश डालते हुए साथ ही इसकी अपने विचार प्रयोग परिकल्पना की खगोलीय व्याख्या करते हुए अपने ही शब्दों में बताया कि अज्ञात (Unknown) होने के कई और कारण भी हो सकते हैं ,जैसे कि चूंकि ऐसे कई धूमकेतु मानव इतिहास में केवल एक बार या हजारों साल पहले दिखे होते हैं, इसलिए खगोलविदों के पास इनका कई हजारों साल पहले का कोई भी सीधा प्रत्यक्ष पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता है, लेकिन जब ये अचानक से कभी भी पृथ्वी या सूर्य के करीब आते हैं, तभी इनकी खोज हो पाती है, इसलिए इन्हें "अज्ञात" माना जाता है, इसीलिये वह अज्ञात धूमकेतु भी अभी तक हमारे विश्व वैज्ञानिक समुदाय की भी दूरबीनों की नजर में नहीं आया है,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि दुनियां में आगे आने वाले समय में विशेष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एवं अंतरिक्ष आधारित विभिन्न प्रकार की दूरबीनों आदि के माध्यम से लगातार खोजों का आधार एवं दायरा बढ़ता ही जा रहा है जो की अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए विशेष ज़रूरी एवं हमेशा आवश्यक भी है, हालांकि अभी तक तो एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वृष्टि के लिए ख़ास जिम्मेदार वाला मूल धूमकेतु नहीं मिला है, लेकिन पृथ्वी हर साल सितंबर की शुरुआत में अंतरिक्ष में उस अज्ञात धूमकेतु (जो कभी विशालकाय रूप में उस काले घने अंधकारमय अनजाने सुनसान एवं ख़ामोशी युक्त अकेले शांत रास्ते पर चला करता होगा) के द्वारा छोड़े गए मलबे (धूल और बर्फ के कणों) की पट्टी से गुजरती है,तब उसके द्वारा अपने पीछे छोड़े हुए ये कण आज भी जब हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो घर्षण के कारण चमक उठते हैं, जिससे हमें यह ख़ास उल्का बौछार दिखाई देती है। लेकिन इसके (एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वृष्टि) के नियमित अवलोकन और इसकी कक्षा (orbit) के खगोल गणितीय आकलन से विश्व वैज्ञानिक समुदाय के खगोल वैज्ञानिकों ने इसे एक अलग उल्का बौछार के रूप में दर्ज किया है। इसीलिए खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष ज़ोर देते हुए बताया है कि भ्रम से ज़रूर बचें क्योंकि जैसा कि खगोलविद अमर पाल सिंह हमेशा ही अपने मूल कथन में बताते हैं कि सही ज्ञान सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान। इसीलिए यह भी जानना ज़रूरी है कि (अगस्त और सितंबर के परसिड्स में बहुत अंतर होता है) क्योंकि अक्सर तमाम लोग इसे अगस्त में दिखने वाली प्रसिद्ध परसिड्स (Perseids) उल्का बौछार समझ लेते हैं,अगस्त वाली मुख्य परसिड्स उल्का बौछार के धूमकेतु की खोज की जा चुकी है, जिसका नाम स्विफ्ट-टटल (Comet 109P/Swift-Tuttle) है। लेकिन सितंबर में दिखने वाली एप्सिलॉन परसिड्स एक बिल्कुल अलग उल्का धारा है और इसके मूल धूमकेतु का पता लगाया जाना अभी भी बाकी ही है, इसीलिए तब तक,प्राप्त ज्ञान की शक्ति का प्रयोग करते हुए ही इस एप्सिलॉन परसिड्स उल्का वृष्टि का विहंगम दृश्य ग्रामीण इलाकों से बेहतर परिणाम दे सकता है।

8 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि के बाद,चंद्रमा और बृहस्पति की युति दिखाई देगी

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल प्रेमियों के लिए एक शानदार खगोलीय युति घटित होने वाली है क्योंकि 8 सितंबर 2026 को मध्य रात्रि के बाद लगभग 3 बजकर 35 मिनट के बाद पूर्वी क्षितिज के आकाश में चंद्रमा और बृहस्पति ग्रह एक साथ दिखाई देने शुरू हो जाएंगे या कुछ यूं कहें कि यानि कि 9 सितंबर 2026 की भोर सुबह तक के आकाश में एक पतला चंद्र-कोर (Crescent Moon) चन्द्रमा,हमारे सौर मण्डल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति (Jupiter) के बेहद करीब से गुजरेगा,इस दौरान दोनों के बीच की दूरी 1 डिग्री से भी कम होगी, जिससे इस युति के दौरान एक बेहद ही खूबसूरत खगोलीय दृश्य बनेगा, इस खगोलीय संरेखण को खगोल विज्ञान की भाषा में चंद्रमा और बृहस्पति ग्रह के शानदार निकटतम आगमन को चन्द्र -ब्रहस्पति युति कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह दोनों खगोलीय पिण्ड आपस में करोड़ों किलोमीटर की दूरी पर मौजूद हैं लेकिन कभी कभी पृथ्वी से देखने पर दृश्य प्रभाव के कारण काफ़ी पास पास दिखाई देते हैं इसी को खगोल विज्ञान की भाषा में कंजंक्शन या युति भी कहा जाता है।

किस दिशा में और किस तारामण्डल क्षेत्र में स्थित होंगे दोनों खगोलीय पिण्ड।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस शानदार खगोलीय युति को देखने के लिए आपको किसी विशेष दूरबीन/ टेलीस्कोप या विनोकुलर आदि उपकरण की भी आवश्यकता नहीं है, आप अपनी साधारण आंखों से ही इस युति को देख सकते हैं , लेकिन अगर आपके पास कोई टेलीस्कोप /दूरबीन या विनोकुलर आदि उपकरण मौजूद हैं तो आप इसको और भी अधिक सर्वोत्तम तौर पर देख सकते हैं, लेकिन आपको पूर्वी आकाश में क्षितिज से थोड़ा ऊपर देखना होगा तब आकाश में एक बहुत ही पतला हंसिया जैसा चंद्रमा (वैनिंग क्रिसेंट मून) लगभग 8 से 10 प्रतिशत चमकता हुआ दिखाई देगा इस दौरान चंद्रमा का मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 6.78 के क़रीब होगा और यह सिंह तारामंडल क्षेत्र में स्थित होगा और ठीक उसके पास ही में बेहद चमकीला ब्रहस्पति ग्रह एक बड़े तारे की तरह चमकता हुआ नज़र आयेगा इस दौरान बृहस्पति ग्रह का मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 1.66 होगा और यह कर्क तारामंडल में स्थित होगा।

कहां कहां से दिखाई देगा लूनर ऑक्ल्टेशन।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह लूनर ऑक्ल्टेशन की खगोलीय स्थिति भारत से दिखाई नहीं देगी लेकिन यह कनाडा, ग्रीनलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, पूर्वी रूस और उत्तरी प्रशांत क्षेत्र के कुछ स्थानों पर यह घटना और भी रोमांचक होगी क्योंकि वहां चंद्रमा सीधे बृहस्पति के सामने से गुजरेगा और कुछ समय के लिए इस विशाल ग्रह को अपनी ओट में छिपा देगा,इस खगोलीय घटना को चंद्र ग्रहण नहीं, बल्कि “चंद्रमा द्वारा ग्रह का आवरण” या लूनर ऑक्ल्टेशन (Lunar Occultation / चंद्र आवरण) कहा जाता है, लेकिन जो लोग चंद्र आवरण वाले क्षेत्र में नहीं हैं, वे भी चंद्रमा और बृहस्पति की इस शानदार और बेहद निकट खगोलीय युति का आनंद तो उठा ही सकते हैं।

भारत में इस खगोलीय युति का कैसे कर सकते हैं ख़ास दीदार और क्या क्या बरतें सावधानियां।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस ख़ास खगोलीय नज़ारे को देखने के लिए आपको किसी विशेष उपकरण की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इसे देखने के लिए आपको किसी टेलिस्कोप (Telescope) या दूरबीन की आवश्यकता नहीं है, इसे केवल नग्न आँखों से सीधे आसमान में देखा जा सकता है, लेकिन आज कल बढ़ते प्रकाश प्रदूषण/लाइट पॉल्यूशन के कारण तारों और ग्रहों को साधारण आंखों से देखने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है इसलिए उच्च कोटि के दृश्य के लिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः दूर जाएं, या कुछ यूं कहें कि किसी ग्रामीण इलाकों में जाकर देखना शहरों के मुक़ाबले ज़्यादा फायदेमंद होता है,नहीं तो शहरों की अनियमित तेज़ रोशनी और इससे उत्पन्न होने वाले प्रकाश प्रदूषण के कारण वैसे ही साधारण आँखों से दिखाई देने वाले तारों और ग्रहों तक की संख्या सीमित होती जा रही है और बढ़ते हुए प्रकाश प्रदूषण के कारण ही आज कल खगोल प्रेमियों के लिए भी कई बार निराश ही होना पड़ता है और अगर पृथ्वी पर ऐसे ही अनियमित तौर पर अंधाधुंध प्रकाश प्रदूषण बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब तमाम खगोलीय पिंड जो आसानी से दिख जाते थे वह भी दिखना बंद हो जाएंगे और हम अपने ही नहीं बल्कि सभी के हिस्से का आकाश भी खो देंगे जोकि मानवता के लिए किसी दुर्भाग्य से कम नहीं होगा अगर हम पुराने जमाने की बात करें तो पाते हैं कि पुराने जमाने में साधारण आंखों से ही आसानी से दिखने वाले अनगिनत खगोलीय पिण्ड एवं घटनाएँ और हमारी आकाशगंगा एवं अन्य तमाम खगोलीय पिंड ऐसे ही रात्रि के आकाश में साधारण आंखों से ही दिखाई देते थे लेकिन आज जो बचे हुए हैं इन्हें भी जिन्हें साधारण आंखों से आसानी से देखा जा सकता है वो भी बढ़ते प्रकाश प्रदूषण के कारण ही सभी धीरे धीरे बिल्कुल गायब हो जाएंगे इसीलिए अभी भी समय है कि आप ख़ुद के साथ ही सभी में वैज्ञानिक वातावरण उत्पन्न करते हुए समायोचित समझाने का प्रयास करें कि प्रकाश प्रदूषण क्या है और यह कितना खतरनाक साबित हो रहा है सभी के लिए चाहें वह मानव हों। पशु, पक्षी एवं कीट पतंगे आदि कोई भी इसकी अधिकता की चपेट से बचा नहीं है और अगर इसको महसूस करना चाहते हैं तो आप इसे स्पष्ट देखने के लिए किसी ग्रामीण इलाके या ऐसी जगह जाएं जहाँ अंधेरा हो या डार्क स्काई जोन हों,आपको ख़ुद महसूस होगा कि जो खगोलीय घटनाएं एवं तारे, ग्रह और मंदाकिनी आदि शहरों से दिखाई नहीं देती हैं वहीं ग्रामीण इलाकों जहां प्रकाश प्रदूषण नहीं होता है वहां से आसानी से दिखाई देना शुरू हो जाएंगे, लेकिन अगर हम बात करें चंद्रमा और बृहस्पति ग्रह की युति की तो यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मानसून का खलल भी एक बाधक हो सकता है चूंकि भारत में सितंबर की शुरुआत में कई हिस्सों में मानसूनी बादल छाए रहते हैं,इसलिए यदि आपके इलाके में आसमान पूरी तरह साफ़ (Clear Sky) रहता है,तभी आप इसे देख पाएंगे,और साथ ही खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष ज़ोर देते हुए यह भी बताया कि किसी भी समय सावधानी बेहद ही जरूरी है, जैसे की दूरबीनों आदि को लगाते समय भी विशेष ध्यान रखना चाहिए, खासकर,सूर्य के आसपास या उसकी दिशा में कभी भी बिना उचित एवं बिना उच्च कोटि मानकीकृत प्रमाणित सौर फिल्टर एवं संपूर्ण सटीक प्रमाणित वैज्ञानिक जानकारी और सावधानियों के किसी भी दूरबीन,टेलीस्कोप या किसी अन्य ऑप्टिकल उपकरण का उपयोग न करें क्योंकि अन्यथा की स्थिति में बिना जाने ऐसा करने से आंखों को स्थायी नुकसान हो सकता है।

चित्रकूट में बाढ़ के बाद योगी का एक्शन प्लान: क्षति का तत्काल सर्वे, मुआवजा और मंदाकिनी से अतिक्रमण हटाने के निर्देश
लखनऊ। अतिवृष्टि से प्रभावित चित्रकूट धाम का दौरा कर लौटे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर राहत एवं पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बाढ़ प्रभावित परिवारों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाए और फसल व मकान की क्षति का तत्काल सर्वे कराकर पात्र लोगों को नियमानुसार मुआवजा दिया जाए।
मुख्यमंत्री ने पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त मकानों के परिवारों को मुख्यमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने तथा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने को कहा। प्रभावित किसानों की फसल क्षति का सर्वे भी शीघ्र पूरा कराने के निर्देश दिए।

- व्यापारियों और मठ-मंदिरों को भी मिलेगी सहायता
योगी ने चित्रकूट धाम के बाढ़ प्रभावित व्यापारियों को हुए नुकसान का आकलन कराने और उन्हें सहायता व मुआवजा उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था करने को कहा। मठ-मंदिरों को हुई क्षति का भी सर्वे कराने तथा आवश्यक मरम्मत कार्य शीघ्र शुरू कराने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण में शासन आवश्यक सहयोग करेगा।
राहत कार्यों की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने शेष राहत किट का वितरण 48 घंटे के भीतर सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि राहत सामग्री पहुंचाने में किसी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को प्रभावित परिवारों के बीच लगातार मौजूद रहकर उनकी जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

- बाढ़ के बाद बीमारियों से निपटने की तैयारी
मुख्यमंत्री ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी विशेष सतर्कता बरतने को कहा। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग की टीमों को प्रभावित क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखने और जरूरतमंदों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
उन्होंने कहा कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग की टीमें बीमारी के लक्षणों पर नजर रखें और आवश्यकता पड़ने पर तत्काल कार्रवाई करें।

- मंदाकिनी के कैचमेंट से हटेगा अतिक्रमण
मुख्यमंत्री ने मंदाकिनी नदी के कैचमेंट एरिया में हुए अतिक्रमण का चिन्हांकन कर नियमानुसार उसे हटाने के निर्देश दिए। इसके लिए जनपदीय अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों के साथ संवाद करने को कहा गया। साथ ही घाटों के विस्तारीकरण के लिए कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मंदाकिनी में किसी भी दशा में सीवर और नालों का पानी नहीं जाना चाहिए। पर्यटन, सिंचाई और नगर विकास विभाग आपसी समन्वय से इसके लिए ठोस कार्ययोजना तैयार कर उसे लागू करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि मंदाकिनी चित्रकूट की आस्था से जुड़ी नदी है और इसकी स्वच्छता व निर्मलता बनाए रखना सभी संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है।

- फुट ओवरब्रिज की सुरक्षा जांच के निर्देश
मंदाकिनी नदी पर बने फुट ओवरब्रिज का सेफ्टी ऑडिट कराने की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी को दी गई है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनसुरक्षा से जुड़े सभी निर्माण कार्यों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और जरूरत के अनुसार तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई हो।चित्रकूट धाम से एयरपोर्ट जाने वाले मार्ग की भी मुख्यमंत्री ने समीक्षा की। उन्होंने निर्देश दिया कि सड़क का निर्माण कार्य विजयादशमी से पहले हर हाल में पूरा कराया जाए। विलंब के कारणों की समीक्षा कर जिम्मेदारी तय करने को भी कहा।
- गोशालाओं में चारे और पशु स्वास्थ्य की जांच
मुख्यमंत्री ने पशुधन की सुरक्षा के लिए गोशालाओं की जांच कराने और वहां पर्याप्त चारे की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने लंपी डिजीज से बचाव के लिए भी आवश्यक प्रबंध करने को कहा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि राहत और पुनर्वास के साथ चित्रकूट के लिए दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन की कार्ययोजना तैयार की जाए, ताकि भविष्य में अतिवृष्टि और बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। इसमें मंदाकिनी के प्राकृतिक प्रवाह, कैचमेंट एरिया, अतिक्रमण और जल निकासी व्यवस्था को विशेष रूप से शामिल किया जाए।
भदोही पुलिस लाइन और थानों में धूमधाम से मना श्रीकृष्ण जन्मोत्सव: डीएम-एसपी ने की पूजा

पुलिसकर्मियों और परिजनों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लिया हिस्सा

रिपोर्टर -‌ नितेश श्रीवास्तव


भदोही। बीती रात श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर भदोही जिले की पुलिस लाइन और सभी थानों में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर पुलिस लाइन और थानों में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और लीलाओं से जुड़ी सुंदर झांकियां सजाई गईं। साथ ही, कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।

भदोही के जिलाधिकारी शैलेश कुमार और पुलिस अधीक्षक अभिनव त्यागी ने पुलिस लाइन स्थित मंदिर में हवन-पूजन किया। उन्होंने भगवान कृष्ण से जिले में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। इस अवसर पर पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों और उनके परिजनों ने श्रद्धा से पूजा की।

पुलिस लाइन में हुए श्रीकृष्ण जन्मोत्सव कार्यक्रम में अपर पुलिस अधीक्षक शुभम अग्रवाल, क्षेत्राधिकारी ज्ञानपुर चमन सिंह चावड़ा, क्षेत्राधिकारी लाइन धीरेंद्र सिंह, क्षेत्राधिकारी राजीव कुमार और प्रतिसार निरीक्षक, पुलिस लाइन ज्ञानपुर समेत कई पुलिस अधिकारी, कर्मचारी और उनके परिजन मौजूद रहे। सभी ने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के विभिन्न कार्यक्रमों में उत्साह से हिस्सा लिया।

पुलिस अधीक्षक भदोही ने जिले के लोगों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अपील की कि इस पर्व को आपसी भाईचारे, सौहार्द और शांतिपूर्ण माहौल में मनाया जाए।
छात्रों के नाम पर राजनीतिक नौटंकी कर रही भाजपा : विनोद पांडेय

झामुमो महासचिव ने कहा कि 48 घंटे का अल्टीमेटम देना भाजपा की हताशा और राजनीतिक अहंकार का परिचायक

झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने भाजपा के 48 घंटे के अल्टीमेटम और चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा पर

कड़ा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि भाजपा छात्रों के नाम पर राजनीतिक नौटंकी कर रही है और युवाओं के आक्रोश को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रही है।

महासचिव विनोद पांडेय ने कहा कि भाजपा को पहले अपने शासनकाल का हिसाब देना चाहिए। केंद्र और झारखंड में वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद युवाओं के लिए रोजगार के कितने अवसर पैदा किए, इसका जवाब भाजपा दे। झारखंड के छात्रों के मुद्दे पर घड़ियाली आंसू बहाने से भाजपा की असलियत नहीं छिपेगी।

उन्होंने कहा कि छात्रों पर दर्ज मुकदमों को भाजपा नेता फर्जी बता रहे हैं। यदि मुकदमे फर्जी हैं तो भाजपा तथ्य और प्रमाण सामने रखे। कानून तोड़ने वालों को राजनीतिक संरक्षण देने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। भाजपा आंदोलन के नाम पर सरकारी व्यवस्था को चुनौती देने की राजनीति कर रही है।

झामुमो महासचिव ने कहा कि 48 घंटे का अल्टीमेटम देना भाजपा की हताशा और राजनीतिक अहंकार का परिचायक है। झारखंड सरकार भाजपा के अल्टीमेटम से नहीं चलती। भाजपा को लगता है कि धमकी और दबाव की राजनीति से सरकार को झुकाया जा सकता है, तो यह उसकी बड़ी भूल है।

‘नौकरी बेचने’ के भाजपा के आरोप पर उन्होंने कहा कि भाजपा के पास यदि कोई प्रमाण है तो सामने लाए, अन्यथा झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाकर जनता को गुमराह करना बंद करे। बिना प्रमाण आरोप लगाना भाजपा की पुरानी राजनीतिक आदत रही है।

मुख्य सचिव से इंडिया गठबंधन के नेताओं की मुलाकात पर भाजपा की टिप्पणी पर उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव से मिलने पर भाजपा को तकलीफ इसलिए हो रही है, क्योंकि उसे हर राजनीतिक गतिविधि में अपना राजनीतिक संकट दिखाई देता है। मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं होने की भाजपा की बात पूरी तरह हास्यास्पद है।

विनोद पांडेय ने कहा कि भाजपा छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रही है। झारखंड के युवा भाजपा की इस राजनीति को समझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा चाहे जितने अल्टीमेटम दे और जितने प्रदर्शन कर ले, सरकार को धमकी देकर राजनीतिक दबाव में लेने का उसका मंसूबा पूरा नहीं होगा।

32 मन विशुद्ध सोने के अलौकिक विग्रह : श्री वंशीधर नगर धाम - पंचम धाम की महिमा

अभय तिवारी ।

गढ़वा :- विंध्य क्षेत्र अंतर्गत झारखंड के पश्चिम छोर पर गढ़वा जिला के बंशीधर नगर धाम, छत्तीसगढ़, यूपी और बिहार यानी तीन राज्यों के त्रिकोण पर वनों एवं पर्वतों से आच्छादित खूबसूरत वादियों के बीच और पतित पावनी कल कल निनादिनी मां बांकी नदी के किनारे बसा श्री बंशीधर नगर इस भूमंडल पर पांचवां धाम है।

विद्वानों के मुताबिक ऐसा भगवान श्रीकृष्ण जी द्वारा विग्रह रुप में यहां स्वयं आकर विराजमान होना है। विग्रह रुप में श्री वंशीधर जी का प्राकट्य विग्रहावतार माना जाता है। विद्वानों के मुताबिक श्री वंशीधर जी के रुप में उनका विग्रहावतार, अर्चावतार भी है। इसलिए इसे श्री बंशीधर नगर धाम के नाम से जाना जाता है।

विद्वानों की राय है कि आमतौर पर पहले किसी मंदिर का निर्माण होता है, उसके बाद मंदिर में भगवान का विग्रह स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। लेकिन श्री वंशीधर मंदिर में ठीक इसके विपरीत रानी शिवमानी देवी को स्वप्न देकर पधारे भगवान श्री वंशीधर जी के विग्रह की स्थापना हुई और उसके बाद मंदिर का निर्माण हुआ है। श्री वंशीधर जी का प्रतिमा 32 मन विशुद्ध सोने का विग्रह मनमोहक, अदभुत, अलौकिक और अकल्पनीय है। भगवान श्रीकृष्ण जी का ऐसा विग्रह दुनियां के किसी कोने में नहीं है।

भगवान के विग्रह का वर्णन शब्दों में करना कठिन है, लेकिन एक वाक्य कहना और लिखना हो तो बस यही कहा और लिखा जायेगा कि जिनके दर्शन मात्र से सारे पीड़ा और संताप दूर हो जाते हैं। तन और मन हर्षित हो जाता है। विग्रह ऐसा कि नजर नहीं हटती। हमेशा देखते रहने का जी करता है।

श्री बंशीधर नगर में श्री वंशीधर जी के कण कण में विद्यमान रहने का अहसास होता है। इसके कारण यह स्थान श्रीकृष्ण की उपासना करने वाले व वैष्णवों के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां सुविख्यात वैष्णव संत जगदाचार्य श्री श्री 1008 त्रिदंडी स्वामी जी महाराज, उनके शिष्य श्री श्री 1008 लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज व श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्य विद्या भास्कर जी महाराज समेत वैष्णव संप्रदाय के कई चोटी के संत यहां भगवान का दर्शन पूजन कर श्री वंशीधर धाम व श्री वंशीधर जी की महिमा का वर्णन कर चुके हैं।

पंडित राहुल सांकृत्यायन और विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय कई जानी मानी हस्तियां भी भगवान का दर्शन अर्चन कर चुके हैं। श्री वंशीधर मंदिर में श्रीकृष्ण जी की वंशीवादन करती आदमकद प्रतिमा के दर्शन के बाद लोगों को अदभुत सुख शांति की अनुभूति होती है। इस नगरी में कभी शोक और उदासी का भाव किसी के मन में उत्पन्न नहीं होता है। बाहर से श्री वंशीधर जी की नगरी में जो भी श्रद्धालु आते हैं, बस भगवान के दर्शन मात्र से उनके चित्त को परम शांति मिलती है। श्री वंशीधर जी के द्वार पर कभी किसी को मांगने की जरुरत नहीं पड़ी है। श्री वंशीधर के द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा। जो भी श्रद्धालु श्री वंशीधरजी के दरबार में गया, उसकी अभिष्ट कामना की पूर्ति अवश्य हुई है। ऐसी मान्यता है कि भगवान अपने द्वार पर आने वाले भक्तों की मनोकामना को अवश्य पूरी करते हैं।

श्री बंशीधर नगरी की परिधि के भीतर अब तक कभी किसी प्रकार के प्राकृतिक आपदा का प्रभाव नहीं पड़ा है। लगभग एक दशक तक घोर उग्रवाद क्षेत्र से ग्रसित होने के बाद भी श्री बंशीधर नगर के लोगों में भय के वातावरण का कभी अहसास नहीं हुआ। श्री वंशीधर क्षेत्र में कभी महामारी को आसपास भटकने का भी अवसर नहीं मिला है। मतलब इस नगरी में सब कुछ श्री वंशीधर जी की इच्छा के अनुकूल होता है। प्राकृतिक आपदा और महामारी जैसे असामयिक घटना जिससे श्री वंशीधर जी के भक्त को परेशानी और शोक हो, इन सब चीजों को श्री वंशीधरजी अपने क्षेत्र में कभी फटकने नहीं देते। श्री वंशीधर जी की प्रेरणा से यहां वर्ष भर धार्मिक अनुष्ठान, संत्सग आदि का क्रम जारी रहता है। लोग एक दूसरे के हर सुख दुख में सहभागी बनकर जीवन यापन करते हैं। श्री वंशीधर की कृपा ही है कि लोग बिना किसी भय अथवा चिंता किये यहां सुखपूर्वक निवास करते हैं।

श्री बंशीधर नगर को योगेश्वर कृष्ण की भूमि और इस धरती को द्वितीय मथुरा और वृंदावन माना जाता है। श्री बंशीधर जी की स्थापना के बारे में पलामू के प्रसिद्ध इतिहासकारों स्व. रामदीन पाण्डेय, स्व. हवलधारी राम गुप्त हलधर एवं राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त सेवानिवृत्त शिक्षक सह इतिहासकार डॉ रमेश चंचल ने अपनी रचनाओं में बड़ी विस्तार से की है। इतिहासकारों के अनुसार संवत 1885 में राजा स्व भवानी सिंह देव की विधवा शिवमानी कुंवर राजकाज का संचालन कर रही थी। रानी शिवमानी कुंवर धर्मपरायण एवं भगवत भक्ति में पूर्ण निष्ठावान थी। 14 अगस्त 1827 को रानी साहिबा जन्माष्टमी व्रत किया था उसी दिन मध्य रात्रि में उन्हें स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ।

स्वप्न में श्री कृष्ण ने रानी से वर मांगने को कहा। रानी ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु आपकी सदैव कृपा हम पर रहे। तब भगवान कृष्ण ने रानी से कनहर नदी के किनारे यूपी के महुअरिया के निकट शिव पहाड़ी अपनी प्रतिमा के गड़े होने की जानकारी दी और उन्हें अपने राज्य में लाने को कहा। भगवत कृपा जान रानी ने शिवपहाड़ी जाकर विधिवत पूजा अर्चना के बाद खुदाई करायी तो श्री बंशीधर जी की अद्वितीय असाधारण प्रतिमा मिली। जिसे हाथियों पर बैठाकर श्री बंशीधर नगर लाया गया। गढ़ के मुख्य द्वार पर अंतिम हाथी बैठ गया। लाख प्रयत्न के बावजूद हाथी नहीं उठने पर रानी ने राजपुरोहितों से राय मशविरा कर वहीं पर मंदिर का निर्माण कराया तथा वाराणसी से राधा रानी की अष्टधातु की प्रतिमा मंगाकर दिनांक 21 जनवरी 1828 स्थापित करायी।।।

संवत 1885 तदनुसार 21 जनवरी 1828 को वसंत पंचमी के दिन श्री राधा वंशीधर जी की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कराई। जिसके बाद मंदिर में शुरू हुआ पूजन दर्शन अनवरत जारी है। प्रतिवर्ष असंख्य लोग भगवान का दर्शन पूजन कर मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। श्री बंशीधर जी की प्रतिमा कला के दृष्टिकोण से अति सुंदर एवं अद्वितीय है। बिना किसी रसायन के प्रयोग या अन्य पॉलिस के प्रतिमा की चमक पूर्ववत है। भगवान श्री कृष्ण शेषनाग के उपर कमल पीड़िका पर बंशीवादन नृत्य करते विराजमान हैं। भूगर्भ में गड़े होने के कारण शेषनाग दृष्टिगोचर नहीं होते हैं।।।

श्री बंशीधर मंदिर के बारे में विद्वानों का मत है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों स्वरूप में हैं। विद्वानों का तर्क है कि यहां स्थित श्री बंशीधरजी जटाधारी के रूप में दिखाई देते है जबकि शास्त्रों में श्रीकृष्ण के खुले लट और घुंघराले बाल का वर्णन है इस लिहाज से मान्यता है कि श्रीकृष्ण जटाधारी अर्थात देवाधिदेव महादेव के रूप में विराजमान हैं। श्रीकृष्ण के शेषशैय्या पर होने का वर्णन शास्त्रों में मिलता है लेकिन यहां श्री बंशीधर जी शेषनाग के उपर कमलपुष्प पर विराजमान हैं, जबकि कमलपुष्प ब्रह्मा का आसन है। इस लिहाज से मान्यता है कि कमल पुष्पासीन श्री कृष्ण कमलासन ब्रह्मा के रूप में विराजमान हैं। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं लक्ष्मीनाथ विष्णु के अवतार है इसलिये विष्णु के स्वरूप में विराजमान हैं। त्रिदेव के रूप में विराजमान भगवान सबकी मनोकामना पूरी करते हैं।।।

मंदिर में होने वाले कार्यक्रम व श्रद्धालुओं का आगमन

श्री बंशीधर मंदिर में वर्ष भर प्रतिमाह धार्मिक कार्यक्रम जारी रहता है। प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण की जयंती जन्माष्टमी मथुरा एवं वृंदावन की तरह मनाई जाती है। इस मौके पर एक सप्ताह तक श्रीमद्भागवत कथा और रात्रि काल में वृंदावन की मंडली द्वारा रासलीला का आयोजन किया जाता है ।जिससे श्री बंशीधर नगर सहित आस पास के गांवों का माहौल भक्तिमय हो जाता है। जन्माष्टमी के मौके पर आठ दिनों तक आयोजित जन्मोत्सव में शामिल होने के लिए देश भर से बड़ी संख्या में हजारों श्रद्धालु आते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर एक महीने तक मंदिर परिसर में भव्य मेला लगता है।

कार्तिक छठ पूजा पर देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालु छठ व्रत करने मंदिर में दर्शन करने आते हैं। शारदीय और वासंतिक नवरात्रि दीपावली, गोवर्धन पूजा, चौबीसों एकादशी, वसंत पंचमी पर मंदिर स्थापना दिवस, अन्नकूट एवं हर माह पूर्णिमा आदि त्योहार पर मंदिर में विशेष कार्यक्रम व अनुष्ठान, भंडारा आयोजित होता है। जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय एवं बाहरी श्रद्धालु शामिल होते हैं। उपरोक्त विशेष आयोजन और अवसरों पर स्थानीय एवं पड़ोसी राज्यों के हजारों श्रद्धालु आते हैं।वही हर वर्ष में एक बार बंशीधर महोत्सव मनाया जाता है। साथ ही पहले से नगर उंटारी का नाम था उसे बदल कर श्री बंशीधर नगर कर दिया गया है। सांसद श्री विष्णुदयाल राम ने लोकसभा में श्री बंशीधर जी का महात्म्य बताते हुए भारत सरकार से श्री बंशीधर नगर को तीर्थ क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिए स्वदेश दर्शन योजना में शामिल करने और श्री कृष्ण सर्किट से जोड़ने का अनुरोध किया है।।।

मंदिर से विभिन्न स्थानों की दूरी

मंदिर से रेलवे स्टेशन की दूरी 2.5 किमी, बस स्टैंड की दूरी 1.5 और थाना की दूरी 1.8 किमी, अनुमंडल की दूरी 2.8 और प्रखंड कार्यालय की दूरी 2.5 किमी, जिला मुख्यालय गढ़वा की दूरी 40 किमी है। झारखंड राज्य की राजधानी रांची की दूरी 245 किमी है। यूपी का सोनभद्र जिला सबसे करीब और सटा हुआ है। सोनभद्र जिलान्तर्गत विंढमगंज की दूरी मात्र 12 किमी है। जबकि सोनभद्र जिला मुख्यालय रॉबर्टसगंज की दूरी 100 किमी है। तीर्थ और धार्मिक लिहाज से महत्वपूर्ण वाराणसी एवं मिर्जापुर से 180 किमी है। बिहार की राजधानी पटना से 275 किमी है। दूसरे पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिला भी सटा हुआ है। सरगुजा जिले का सनावल की दूरी लगभग 30 किमी है। सरगुजा का जिला मुख्यालय अंबिकापुर की दूरी 200 किमी है। तीसरे पड़ोसी राज्य बिहार का रोहतास जिला भी सटा हुआ है। रोहतास जिले का नौहट्टा की दूरी लगभग 50 किमी है। जहां से नाव से सोन नदी पार कर 8 महीने तक आवागमन होता है। श्री बंशीधर नगर शहर एनएच 75 एवं गढ़वा रोड चोपन रेलखंड पर स्थित है। रांची, वाराणसी, अंबिकापुर से श्री बंशीधर नगर तक अंतर्राज्यीय बस सेवा उपलब्ध है। प्रतिदिन कई बसें उपरोक्त स्थानों से आया जाया करती हैं। गढ़वा रोड चोपन रेलखंड पर चलने वाली सभी एक्सप्रेस और पैंसेंजर ट्रेनें श्री बंशीधर जी की नगरी में स्थित नगर ऊंटारी रेलवे स्टेशन पर रुकती हैं। सड़क और रेल मार्ग से वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना जाना होता रहता है।।।

तीन राज्य तो बंशीधर नगर धाम से सटा हुआ रहने के कारण लोग आसानी से इनके दरबार में हाजिरी लगाने तो आते ही है ।लेकिन देश के कई कोने से भी भक्त यहां पहुंचते है ।और दर्शन कर अपनी मनोकामना बंशीधर नगर धाम में कहते है ।और उसे पूर्ण होने पर लोगों का आना जाना बराबर लगा रहता है।

हनुमान अंश फिल्म के सामूहिक दर्शन से भक्तिमय हुआ माहौल

हजारीबाग। हजारीबाग यूथ विंग के सदस्यों एवं उनके परिवारजनों ने शहर स्थित लक्ष्मी सिनेमा हॉल में सामूहिक रूप से ‘हनुमान अंश’ फिल्म का दर्शन किया। संस्था के संरक्षक चंद्र प्रकाश जैन के निर्देश एवं अध्यक्ष करण जायसवाल के मार्गदर्शन में आयोजित यह कार्यक्रम भक्ति, परिवार और सामाजिक एकजुटता का सुंदर उदाहरण बना।

फिल्म देखने से पहले सभी सदस्य एवं परिवारजन सिनेमा हॉल के बाहर एकत्र हुए, जहां सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। इसके बाद सीताराम के जयघोष के बीच सभी ने सिनेमा हॉल में प्रवेश किया और एक साथ बैठकर फिल्म का आनंद लिया। सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ के कारण पूरे वातावरण में भक्तिमय माहौल बना रहा।

‘हनुमान अंश’ महान संत नीम करौली बाबा (नीब करौरी बाबा) के जीवन और भगवान श्रीहनुमान के प्रति उनके अटूट समर्पण पर आधारित फिल्म है। फिल्म में संत नीम करौली बाबा के जीवन के संघर्ष, साधना और उनसे जुड़ी चमत्कारों की मान्यताओं के साथ प्रेम, सेवा, मानवता तथा ईश्वर के प्रति समर्पण जैसे भावों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म के माध्यम से भक्ति और मानव सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण आधार बनाने का संदेश भी दिया गया है।

फिल्म का भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डाल दी…’ भी दर्शकों के बीच विशेष रूप से भावपूर्ण रहा। सदस्यों एवं उनके परिवारजनों ने पूरी श्रद्धा, उत्साह और भक्ति भावना के साथ फिल्म देखी तथा इसके संदेश की सराहना की।

इस अवसर पर हजारीबाग यूथ विंग के संरक्षक चंद्र प्रकाश जैन ने कहा कि हनुमान चालीसा के सामूहिक पाठ के बाद सभी ने पूरी भक्ति भावना और आनंद के साथ ‘हनुमान अंश’ फिल्म का आनंद लिया। ऐसे आयोजन युवाओं को भक्ति, संस्कार और भारतीय संस्कृति से जोड़ने का सार्थक माध्यम हैं।

वहीं, संस्था के अध्यक्ष करण जायसवाल ने कहा कि परिवारजनों और सदस्यों के साथ सामूहिक रूप से फिल्म देखना बेहद आनंददायक रहा। भक्ति, संस्कार और मनोरंजन का यह सुंदर संगम सभी के लिए यादगार रहा।

हजारीबाग यूथ विंग द्वारा आयोजित इस सामूहिक फिल्म दर्शन का उद्देश्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से युवाओं और परिवारों को एक साथ जोड़ना तथा प्रेम, सेवा, मानवता, भक्ति और संस्कार जैसे मूल्यों के प्रति सकारात्मक भाव जागृत करना भी था। फिल्म से पहले हुए सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ ने पूरे आयोजन को विशेष आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया।

14 सितंबर 2026 को होगी चंद्रमा-शुक्र की दुर्लभ खगोलीय नजदीकी।*


खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आकाश-दर्शन में रुचि रखने वाले अंतरिक्ष प्रेमियों के लिए 14 सितंबर 2026 की शाम बेहद खास होगी, इस दिन चंद्रमा और शुक्र ग्रह पश्चिमी से दक्षिण-पश्चिमी आकाश में एक-दूसरे के बहुत करीब दिखाई देंगे,सूर्यास्त के बाद थोड़े समय के लिए बनने वाली यह चमकीली जोड़ी साफ क्षितिज वाले स्थानों से नंगी आंखों से देखी जा सकेगी, और दोनों खगोलीय पिंडों के बीच न्यूनतम कोणीय दूरी लगभग 28.8 आर्कमिनट, यानी करीब 0.48 डिग्री रहेगी , खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह दूरी इतनी कम होगी कि चंद्रमा और शुक्र ग्रह कम शक्ति वाली दूरबीन या छोटे टेलीस्कोप के एक ही दृश्य क्षेत्र में आ सकते हैं, हालांकि,उन्हें देखने के लिए किसी उपकरण की भी आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि शुक्र ग्रह अपनी अत्यधिक चमक के कारण आकाश में चमकीले तारे जैसा दिखाई देगा, जबकि चंद्रमा पतले बढ़ते हुए अर्धचंद्र के रूप में नजर आएगा। *सूर्यास्त के बाद कितने समय का अवसर मिलेगा* ?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह खगोलीय दृश्य सूर्यास्त के तुरंत बाद पश्चिमी आकाश में दिखाई देगा और दोनों खगोलीय पिंड लगभग शाम 6:16 बजे दक्षिण-पश्चिमी क्षितिज से करीब 16 डिग्री ऊपर दिखाई देंगे इसके बाद वे धीरे धीरे से क्षितिज की ओर नीचे जाते हुए नज़र आयेंगे और रात्रि लगभग 7:30 बजे के क़रीब एवं उसके बाद अस्त होते हुए दिखाई देंगे।

*किस तारामण्डल में मौजूद होंगे और कितना होगा चन्द्रमा और शुक्र ग्रह का मैग्नीट्यूड?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 14 सितम्बर 2026 को दोनों खगोलीय पिण्ड शुक्र ग्रह और चंद्रमा एक दुसरे के बहुत नज़दीक होंगे और इनकी दृश्यता की बात करें तो पाते हैं कि सूर्यास्त से लेकर लगभग 7:30 PM तक दिखाई देंगे उसके बाद दोनों पश्चिमी क्षितिज पर नीचे चले जाएंगे। इसीलिए समय का विशेष ध्यान रखें क्योंकि इनकी बेहद शानदार खगोलीय युति देखने के लिए आपको बहुत ही कम समय मिलेगा। इस दौरान चंद्रमा और शुक्र ग्रह दोनों खगोलीय पिण्ड कन्या तारामंडल में ही स्थित होंगे एवं इस दौरान चंद्रमा का मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 7.63 होगा और शुक्र ग्रह का दृश्य मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 4.73 के क़रीब होगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने यह भी बताया कि स्थानीय भौगोलिक स्थिति, प्रकाश प्रदूषण, सूर्यास्त के समय, धुंध और क्षितिज की रुकावट के कारण अलग-अलग शहरों में दृश्यता का मैग्नीट्यूड कुछ बदल सकता है, इसलिए खगोल प्रेमियों/आकाश दर्शकों को सूर्यास्त से पहले ही खुले मैदान या ऐसे स्थान पर पहुंचने की सलाह दी जाती है, जहां पश्चिमी क्षितिज भवनों, पेड़ों और पहाड़ियों से बाधित न हो, क्योंकि दोनों पिंड क्षितिज के बहुत करीब होंगे, इसलिए अवलोकन के लिए लगभग एक घंटे का ही व्यावहारिक अवसर मिलेगा। *कैसा होगा दोनों खगोलीय पिंडों का दायाँ आरोहण एवं ऐपल्स*?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस दौरान दोनों खगोलीय पिण्ड कन्या तारामंडल में होंगे, या कुछ यूं कहें कि दोनों पिंड
इस अवसर पर चंद्रमा और शुक्र, कन्या तारामंडल की दिशा में ही स्थित होंगे यह विशेषता भी दोनों खगोलीय पिंडों को और भी ख़ास बनाती है,एवं इस दौरान दोनों का right ascension( दायाँ आरोहण) या कुछ यूं कहें कि लगभग उसी समय चंद्रमा और शुक्र का दायाँ आरोहण (Right Ascension) समान होगा,इस स्थिति को खगोलीय भाषा में संयोजन , कंजंक्शन (conjunction) या युति कहा जाता है, या कुछ यूं भी कह सकते हैं कि जब दायाँ आरोहण लगभग समान होता है तो खगोल विज्ञान में इस स्थिति को कंजंक्शन (conjunction) या युति कहा जाता है,और यूं भी समझ सकते हैं कि आकाश में दो पिंडों का बहुत पास दिखाई देना ऐपल्स (appulse) कहलाता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 14 सितंबर 2026 की खगोलीय घटना में दोनों अवधारणाएं लागू होंगी, क्योंकि दोनों पिंड समान (right ascension) दायाँ आरोहण लगभग समान  के निकट होंगे और दृश्य रूप से भी अत्यंत पास नजर आएंगे।
चंद्रमा उस समय लगभग तीन दिन पुराना और करीब 15 प्रतिशत प्रकाशित होगा। यह बढ़ता हुआ अर्धचंद्र होगा। साथ ही इस दौरान शुक्र का दृश्य परिमाण लगभग माइनस 4.73 रहेगा, जिससे वह सूर्यास्त के बाद सबसे चमकीले प्राकृतिक पिंडों में शामिल दिखाई देगा। *कैसा होगा शुक्र का आच्छादन*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विश्व के कुछ भागों में चंद्रमा शुक्र को पूरी तरह ढकता हुआ दिखाई देगा। इस घटना को lunar occultation of Venus, अर्थात या चंद्रमा द्वारा, शुक्र का आच्छादन कहा जाता है, वैसे यह कोई यह चंद्र ग्रहण नहीं होता है, लेकिन कुछ लोगों द्वारा आम बोलचाल की भाषा में इसको शुक्र ग्रह का चंद्र ग्रहण भी बोल देते हैं,  लेकिन खगोल विज्ञान में ग्रहण की बात करें तो पाते हैं कि जब चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, जबकि occultation या आच्छादन में चंद्रमा किसी दूर स्थित पिंड को हमारी दृष्टि से कुछ समय के लिए छिपा देता है इसीलिए इसको खगोल वैज्ञानिक रूप में ऑक्ल्टेशन या आच्छादन कहा जाता है  खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर हम बात करें 14 सितंबर 2026 की घटना की तो पाते हैं कि यह ऑक्ल्टेशन या आच्छादन भारत के कुछ या बड़े हिस्सों से दृश्यता संभव है लेकिन संपूर्ण भारत से इस ऑक्ल्टेशन या आच्छादन को नहीं देखा जा सकेगा, लेकिन शानदार खगोलीय युति को देख सकते हैं। *भारत के बाकी हिस्सों में क्या दिखेगा?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि जहाँ ऑक्ल्टेशन नहीं दिखाई देगा वहाँ चंद्रमा और शुक्र बेहद करीब (कंजंक्शन/युति) में दिखेंगे, सूर्यास्त के बाद पश्चिमी क्षितिज के पास यह शानदार खगोलीय युति को नंगी आँखों/साधारण आँखों से आसानी से दिखने वाला दृश्य होगा,बशर्ते क्षितिज साफ़ हो ।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक शब्द की बात करें तो पाते हैं कि इसे “चंद्र-शुक्र ऑक्ल्टेशन” या “चंद्रमा द्वारा शुक्र का आच्छादन” ही कहा जाता है लेकिन यह भी जानना रुचिकर है कि आम बोलचाल में “चंद्र-शुक्र ग्रहण” भी कहा जाता है, लेकिन इसको तकनीकी रूप से ऑक्ल्टेशन ही कहा जाता है। *ऐपल्स, कंजंक्शन और ऑक्ल्टेशन क्या होता है?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि ऐपल्स वह खगोलीय घटना है,जिसमें दो या दो से अधिक खगोलीय पिंड,आमतौर पर ग्रह या चंद्रमा, जब आकाश में एक-दूसरे के बहुत पास दिखाई देते हैं,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा आकाश में अपेक्षाकृत तेज गति से घूमता है और लगभग हर महीने तारामंडलों के बीच अपनी एक पूरी परिक्रमा पूरी करता है। इसलिए अधिकांश ऐपल्स तब होते हैं, जब चंद्रमा आकाश में किसी अन्य खगोलीय पिंड के पास से गुजरता है और चंद्रमा अपनी कलाओं के चक्र में लगभग समान चरण पर हर महीने लगभग उन्हीं ग्रहों के पास से गुजरता है, इसलिए कई घटनाएं आमतौर पर मासिक आधार पर दोहराई जाती हैं,दो खगोलीय पिंडों के बीच कितनी दूरी होने पर उनके निकट आने को ऐपल्स कहा जाए, इसकी कोई औपचारिक परिभाषा नहीं है, लेकिन खगोलविदों द्वारा उन सभी ऐपल्स को सूचीबद्ध किया जाता है, जिनमें ग्रह या छोटे ग्रह एक-दूसरे से एक डिग्री के भीतर आ जाते हैं, साथ ही नग्न आंखों से दिखाई देने वाले खगोलीय पिंडों के लिए तीन डिग्री तक की दूरी वाले ऐपल्स को शामिल किया जाता है,वहीं,विशेष रूप से चमकीले और नग्न आंखों से आसानी से दिखाई देने वाले पिंडों के लिए पांच डिग्री तक की दूरी को भी ऐपल्स की श्रेणी में रखा जाता है और
कभी-कभी दो खगोलीय पिंडों के बीच होने वाला यह निकट संयोग इतना करीबी होता है कि एक पिंड दूसरे के सामने से गुजरता हुआ दिखाई देता है,इस घटना को पारण या ऑकल्टेशन (Occultation) या आच्छादन भी कहा जाता है,ऐसी अधिकांश घटनाओं में चंद्रमा शामिल होता है, क्योंकि चंद्रमा हर महीने आकाश के बहुत बड़े क्षेत्र से होकर गुजरता है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि ऐपल्स और युति को आम बोलचाल में खगोलीय पिंडों के आकाश में एक-दूसरे के पास दिखाई देने को अक्सर युति या कंजंक्शन (Conjunction) ही कहा जाता है,हालांकि, खगोल विज्ञान में कंजंक्शन का अर्थ कुछ अधिक तकनीकी है, यह उस स्थिति को कहा जाता है, जब दो खगोलीय पिंडों का राइट एसेंशन (Right Ascension) या दायां आरोहण समान हो जाता है, या कुछ और भी अधिक
सरल शब्दों में कहें कि ऐपल्स में दो पिंड आकाश में पास-पास दिखाई देते हैं, जबकि कंजंक्शन दो पिंडों की आकाशीय स्थिति से जुड़ी एक विशिष्ट खगोलीय अवस्था है,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इसको कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि ऐपल्स वह खगोलीय घटना है जिसमें पृथ्वी से देखने पर दो पिंडों के बीच आकाशीय कोणीय दूरी न्यूनतम हो जाती है,इसके लिए कोई सार्वभौमिक दूरी-सीमा निर्धारित नहीं है, इसके विपरीत, कंजंक्शन एक निर्देशांक-आधारित स्थिति है, जिसमें दो पिंड समान दायाँ आरोहण या ecliptic longitude या क्रांतिक रेखांश, क्रांतिवृत्तीय रेखांश या भोगांश (Bhogansh) भी कहा जाता है ,यह अंतरिक्ष में किसी आकाशीय पिंड (जैसे सूर्य, चंद्रमा या ग्रह) की स्थिति को मापने का एक पैमाना है, जो क्रांतिवृत्त (Ecliptic path) पृथ्वी के चारों ओर सूर्य का आभासी पथ) पर आधारित होता है उसको साझा करते हैं, इसी दौरान यदि कोई पिंड दूसरे को हमारी दृष्टि से ढक देता है, तो घटना को ऑकल्टेशन या आच्छादन कहा जाता है। लेकिन अंतरिक्ष में यह पिंड करोड़ों किलोमीटर की दूरी पर मौजूद होते हैं यह केवल पृथ्वी से देखने पर दृष्टि प्रभाव होता है,वास्तविक रूप या भौतिक रूप में उपरोक्त से कोई भी खगोलीय पिण्ड एक दुसरे के इतने निकट नहीं होते हैं। *यह आच्छादन का क्षेत्र कौन कौन से देशों से होंगे।*

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर उत्तर प्रदेश भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत में 14 सितंबर 2026 से पहले चंद्रमा द्वारा शुक्र के ऑक्ल्टेशन की पिछली प्रमाणित घटना 24 मार्च 2023 को हुई थी,भारत के कुछ हिस्सों में यह घटना लगभग 15:55 से 18:16 IST के बीच हुई, हालांकि शहर के अनुसार समय अलग था। लेकिन इस बार 14 सितंबर 2026 की बात करें तो पाते हैं कि इस आच्छादन का क्षेत्र, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और पश्चिमी रूस के कुछ हिस्सों तक सीमित रहेगा,खगोलीय गणनाओं के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर शुक्र के छिपने का समय और पुनः दिखाई देने का समय देशों के हिसाब से अलग अलग होता है,लेकिन भारतीय समय के अनुसार यह   आच्छादन बिल्कुल सूर्यास्त के क़रीब पड़ेगा,इसलिए भारत के कई स्थानों पर यह आच्छादन शाम के कुछ उजाले में होगा और उन स्थानों से बिना उपकरण के इस आच्छादन को देखना कुछ कठिन भी हो सकता है, साथ ही कुछ जगहों से सूर्यास्त के बाद भी यह काफ़ी अच्छा दिखाई देगा, लेकिन भारत में अधिकांश लोगों को युति ही दिखेगी, क्योंकि भारत के हर हिस्से से शुक्र का आच्छादन दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है, जैसा कि दिल्ली सहित कई स्थानों पर यह घटना शाम को क्षितिज के बहुत निकट होगी फिर भी सूर्यास्त के बाद चंद्रमा और शुक्र का निकट संयोग कुछ समय तक भारत के बड़े हिस्से से देखा जा सकेगा।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि या कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि उस दौरान सूर्यास्त और शाम का उजाला (Daylight/Twilight) भी होगा एवं भारत के अधिकांश हिस्सों (विशेषकर मध्य और दक्षिणी भारत) में यह खगोलीय घटना शाम के समय और सूर्यास्त के बेहद करीब होगी,कई जगहों पर उस समय आसमान में शाम का कुछ उजाला रहेगा, इसीलिए ख़ास ऑक्ल्टेशन को बिना उपकरण देखना कठिन हो सकता है चूंकि शुक्र और चंद्रमा दोनों ही सूर्यास्त के धुंधलके या हल्के उजाले में  ही दिखना शुरू हो जाएंगे इसलिए शुरुआती चरणों में बिना टेलीस्कोप या दूरबीन (Binoculars) के इसे स्पष्ट देख पाना वाकई कुछ कठिन हो सकता है, लेकिन सूर्यास्त के कुछ ही देर बाद का नजारा भी बेहतरीन होगा और साथ ही अगर जिन स्थानों पर यह आच्छादन दिखेगा और वहाँ का आसमान भी थोड़ा गहरा साफ़ और प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः दूर होने के कारण पतले से हंसिया आकार (Crescent) के चंद्रमा के पीछे चमकीले शुक्र ग्रह को गायब होते देखना बकाई काफी खूबसूरत और स्पष्ट एवं सुंदर दृश्य के साथ ही भव्य नज़ारा होगा। *किधर देखें।?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इसे देखने के लिए सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में सावधानी पूर्वक सबसे पहले चमकीले शुक्र को खोजें, इसको खोजना बहुत ही आसान है क्योंकि आज कल पश्चिमी दिशा में सबसे चमकदार तारे जैसा (लेकिन वो तारा नहीं है वह शुक्र ग्रह है) जो दिख रहा है, वही है शुक्र ग्रह एवं उसके निकट पतला चंद्र-वर्धमान दिखाई देगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा पृथ्वी के निकट होने के कारण अलग-अलग स्थानों से उसका आकाशीय स्थान बदलता हुआ दिखाई देता है, यह लंबन' कहलाता है, यह किसी वस्तु की स्थिति में होने वाला वह आभासी परिवर्तन या विस्थापन है, जो उसे दो अलग-अलग जगहों या दृष्टियों से देखने पर महसूस होता है।

*लंबन (विस्थापन) क्या है?*

खगोलविद अमर पाल सिंह ने लंबन के बारे में उदाहरण देते हुए बताया कि जब आप अपनी एक आँख बंद करके और फिर बारी-बारी से दूसरी आँख बंद करके सामने किसी उंगली को देखते हैं, तो उंगली अपनी जगह से हिलती हुई/हटती हुई सी प्रतीत होती है। इसे ही लंबन (Parallax) कहते हैं,पास की वस्तुएं दूर की वस्तुओं की तुलना में अधिक लंबन (विस्थापन) दिखाती हैं,इसी लंबन (parallax) पैरालेक्स के कारण occultation या आच्छादन केवल पृथ्वी के एक सीमित क्षेत्र से दिखाई देता है, जबकि निकट युति अधिक बड़े क्षेत्र में नजर आती है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा द्वारा शुक्र के आच्छादन की पिछली विश्वव्यापी घटना 17 जून 2026 को हुई थी, जबकि भारत से ऐसी घटना 24 मार्च 2023 को दिखाई दी थी , साथ ही खगोलविद अमर पाल सिंह ने अपील भी की है कि आकाश दर्शकों को सूर्य को सीधे दूरबीन या विनोकुलर से, बिना प्रमाणित सोलर फ़िल्टर्स या किसी भी अन्य ऑप्टिवल उपकरण से सूर्य को कभी भी सीधे नहीं देखना चाहिए , खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणित सोलर फिल्टर युक्त दूरबीन या विनोकुलर एवं फिल्टर युक्त कैमरा आदि ऑप्टिकल उपकरण का ही उपयोग करें और सूर्य को सीधे देखने से बचना चाहिए क्योंकि सूर्य को सीधे देखने पर इस से आँखें खराब हो सकती हैं। इसीलिए सूर्यास्त के समय भी सूर्य की तरफ़ दूरबीन/  टेलीस्कोप लगाते समय इस दौरान भी अति महत्वपूर्ण सावधानी रखना चाहिए और इस शानदार खगोलीय घटना का आनंद उठाएं।

      
डीएवी भंडारकोला के 85 खिलाड़ियों का चयन देवघर-डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए:विद्यालय में हुआ भव्य सम्मान समारोह।
देवघर: गीता देवी डीएवी पब्लिक स्कूल, भंडारकोला, देवघर के लिए यह गौरव का विषय है कि विद्यालय के 85 प्रतिभावान खिलाड़ियों का चयन डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए हुआ है। खिलाड़ियों की इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर विद्यालय परिसर में विशेष सम्मान समारोह आयोजित कर चयनित खिलाड़ियों एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि जिला खेल पदाधिकारी श्री संतोष कुमार के द्वारा मेडल प्रदान कर सम्मानित किया गया। विद्यालय के खिलाड़ियों ने विभिन्न खेल विधाओं में शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी प्रतिभा का परचम लहराया। प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों ने बड़ी संख्या में स्वर्ण, रजत एवं कांस्य पदक अर्जित किए। कार्यक्रम के प्रारंभ में एनसीसी कैडेट्स के द्वारा मुख्य अतिथि का स्वागत किया गया। तत्पश्चात तिलक आरती और दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इसके बाद सुमधुर स्वागत गीत और मनमोहक नृत्य के द्वारा बच्चों ने दर्शकों का मन मोह लिया।इस अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य मोहम्मद मुस्तफा मजीद ने कहा कि विद्यालय विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ-साथ खेलों को भी समान महत्व देता है। उन्होंने कहा हमारे 85 खिलाड़ियों का डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए चयन विद्यालय की खेल प्रतिभा,खिलाड़ियों की कड़ी मेहनत और खेल प्रशिक्षकों के कुशल मार्गनिर्देशन का परिणाम है। इन खिलाड़ियों की सफलता अन्य विद्यार्थियों को भी खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी। उन्होंने खिलाड़ियों, अभिभावकों एवं खेल प्रशिक्षकों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी तथा चयनित खिलाड़ियों से राष्ट्रीय स्तर पर विद्यालय और देवघर का नाम रोशन करने का आह्वान किया।मुख्य अतिथि जिला खेल पदाधिकारी श्री संतोष कुमार ने खिलाड़ियों को बधाई देते हुए कहा कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मविश्वास, टीम भावना और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का सशक्त साधन है। उन्होंने कहा कि विद्यालय के 85 खिलाड़ियों का डीएवी नेशनल स्पोर्ट्स के लिए चयन देवघर के लिए भी गर्व की बात है। उन्होंने खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर पर और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए शुभकामनाएँ दीं। जोनल स्तर पर खिलाड़ियों ने ताइक्वांडो में 12 स्वर्ण, 7 रजत एवं 10 कांस्य वुशु में 11 स्वर्ण, 3 रजत एवं 5 कांस्य तैराकी में 16 स्वर्ण, 14 रजत एवं 3 कांस्य जूडो में 2 स्वर्ण, 4 रजत एवं 3 कांस्य अंडर-14 हैंडबॉल बालिका वर्ग में 11 स्वर्ण अंडर-19 वॉलीबॉल बालिका में 19 स्वर्ण एरोबिक्स में 17 स्वर्ण, 15 रजत एवं 4 कांस्य योग में 2 स्वर्ण एवं 8 रजत टेबल टेनिस में 1 रजत एवं 3 कांस्य क्रिकेट में 11 कांस्य बैडमिंटन में 4 कांस्य एथलेटिक्स में 1 स्वर्ण एवं 1 रजत जीते। इस अवसर पर खेल प्रशिक्षक आशुतोष कुमार, प्रवीर कुमार राय, राजीव लोचन, देवेंद्र रविदास के अलावा अभिषेक सूर्य, दीपिका सिन्हा, नीलम चौधरी, सन्निवा पटांदी विशेष रूप से मौजूद थे । उक्त आशय की जानकारी मीडिया प्रभारी अभिषेक सूर्य ने दी।
अपहरण व पाक्सो एक्ट के मामले में वांछित एक नफर बाल अपचारी पुलिस अभिरक्षा में

पुलिस अधीक्षक मऊ कमलेश बहादुर के निर्देशन में अपराध/ अपराधियों के विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान के क्रम में अपर पुलिस अधीक्षक अनूप कुमार के कुशल पर्यवेक्षण एवं क्षेत्राधिकारी मधुबन दिनेश दत्त मिश्र के कुशल निर्देशन में थाना हलधरपुर पुलिस टीम द्वारा चमड़ा गोदाम नहर पुलिया के पास से मु0अ0सं0- 180/2026 धारा 87, 137(2), 65(1) बी.एन.एस. (BNS) व धारा 5L/6 पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) थाना हलधरपुर जनपद मऊ से सम्बन्धित एक नफर बाल अपचारी को पुलिस अभिरक्षा में लिया गया । बाल अपचारी अपरोक्त का चालान माननीय न्यायालय किया गया ।

पंजीकृत अभियोग का विवरण

1. मु0अ0सं0 180/2026 धारा 87, 137(2), 65(1) बी.एन.एस. (BNS) व धारा 5L/6 पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) ।

गिरफ्तार अभियुक्त का नाम, पता

1. एक नफर बाल अपचारी ।

गिरफ्तारी का दिनांक व स्थान

1.दिनांक- 08.09.2026

2.स्थान- चमड़ा गोदाम नहर पुलिया के पास ।

9/10 सितंबर 2026 को होगी, एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा

अज्ञात धूमकेतु से उत्पन्न, एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा होगी ख़ास।

जानें,उल्का वर्षा से संबंधित सभी ख़ास रोचक जानकारियां।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल प्रेमियों के लिए 9/10 सितंबर 2026 को एक विशेष दुर्लभ एवं ख़ास खगोलीय नज़ारा देखने को मिलेगा, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगस्त में होने वाली प्रसिद्ध पर्सिड उल्का वर्षा भले ही समाप्त हो गई हो, लेकिन पर्सियस अभी भी टूटते तारे पैदा करना बंद नहीं कर रहा है,क्योंकि सितंबर में एक कम ज्ञात उल्का वर्षा आ रही है और 2026 में इसे देखने के लिए आसमान में असामान्य रूप से अंधेरा भी रहेगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सितंबर में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिड उल्का वर्षा 9 सितंबर, 2026 को अपने चरम पर होगी, जिससे मानसून (वर्षा ऋतु) के अंतिम चरण के अंत में आकाश में तेज़ गति से चलने वाले उल्का वृष्टि दिखाई देगी लेकिन यह प्रसिद्ध अगस्त पर्सिड उल्का वर्षा की तुलना में काफी छोटी है, फिर भी इस वर्ष इसका एक बड़ा लाभ यह है कि इस उल्का वृष्टि के दौरान चंद्रमा की रोशनी लगभग नहीं के बराबर होगी ।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर आपको लगता था कि उल्का वृष्टि का मौसम अगस्त में होने वाले शानदार पर्सिड्स उल्कापिंडों के साथ समाप्त हो गया है, तो आसमान की ओर देखने का एक और कारण है, सितंबर में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिडस उल्का वर्षा जिसमें आकाश में तेज़ गति से चलने वाली उल्काएं दिखाई देंगी और सितम्बर 2026 में खगोलविदों के ध्यान देने का एक और भी कारण है कि खगोलीय गणनाओं से पता चलता है कि पृथ्वी 10 सितंबर की सुबह/ भोर में धूमकेतुओं के मलबे की एक पुरानी लकीर से वायुमंडलीय घर्षण कर सकती है,जिससे संभवतः उल्का गतिविधि में संक्षिप्त वृद्धि हो सकती है, लेकिन यह पूरी तरीके से निश्चित नहीं है, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इससे इस वर्ष सितंबर की उल्का वर्षा सामान्य से अधिक रोचक हो सकती है।

सितंबर में एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का देखने का सबसे अच्छा समय एवं चरम समय क्या होगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वर्षा को देखने के लिए 9 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि से 10 सितंबर 2026 की सुबह/भोर तक सबसे ज्यादा अच्छा रह सकता है क्योंकि उस दौरान इसका चरम सक्रिय समय भी रहेगा।

इस दौरान कितनी उल्काएं देख सकते हैं

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैसे तो यह एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वर्षा, लगभग 5 से 21 सितंबर 2026 तक सक्रिय रहेगी लेकिन 9 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि से 10 सितम्बर की भोर को इसका चरम समय होने के कारण आदर्श परिस्थितियों में इसकी अनुमानित दर लगभग 5 से 8 उल्काएं प्रति घंटा तक हो सकती है लेकिन सामान्य दर कई वर्षों में लगभग 5 उल्कापिंड प्रति घंटा ही रही है,और अगर हम इसकी गति की बात करें तो पाते हैं कि एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का की गति लगभग 64 किमी प्रति सेकंड से लेकर 70 किलोमीटर प्रति सेकंड तक भी हो सकती है, इस सितंबर 2026 में होने वाली एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि भारत के लिए देखने का सबसे अच्छा समय 9 सितंबर, 2026 को आधी रात के बाद से सुबह तक रहेगा और भोर से पहले के घंटे में यह उल्का वृष्टि सबसे अधिक प्रकाशमान बिंदु प्रदान कर सकती हैं, साथ ही आदर्श अंधेरे आसमान की स्थिति में उत्तरपूर्वी क्षितिज की ओर, पर्सियस तारामंडल के पास सबसे अच्छा दिखाई देंगी और साथ ही लगभग अमावस्या के चांद के कारण आसमान में उत्कृष्ट अंधेरा भी रहेगा इसीलिए बस मौसम साफ़ और शहर के प्रकाश प्रदूषण की रोशनी से दूर एक सुंदर,साफ़, संपूर्ण सुरक्षित एवं पूर्ण सावधानी पूर्वक एक आदर्श अंधेरी जगह ढूंढ लेंगे तो परिस्थितियां और भी सर्वश्रेष्ठ हो सकती हैं।

दुनियां में और भारत में दृश्यता क्या और कैसी रहेगी ।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में आता है और यह उल्का बौछार मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के देशों में ही दिखाई देगी, इसीलिए इसका मुख्य पीक 9 सितंबर 2026 की रात से लेकर 10 सितंबर 2026 के तड़के सुबह (pre-dawn hours) तक रहेगा,भारत में इसे देखने का सबसे सही समय 9 सितंबर की रात 11:00 बजे के बाद से लेकर अगले दिन सुबह सूरज निकलने से पहले तक है। खगोलविद अमर पाल ने बताया कि चाँद की स्थिति की बात करें तो पाते हैं कि यह (सबसे अच्छी बात) है इस साल 9 सितंबर को चंद्रमा 'न्यू मून' (अमावस्या) के बेहद करीब होगा, जिससे आसमान में चाँद की रोशनी का व्यवधान नहीं रहेगा साथ ही में घना अंधेरा होने के कारण हल्के और बेहद तेज़ तैरते हुए उल्कापिंड भी आसानी से देखे जा सकेंगे,लेकिन लाइट पॉल्यूशन से पूरी तरीके से दूर जाएं क्योंकि शहरों की तेज़ रोशनी और प्रदूषण के कारण ये वैसे ही कम दिखने वाले उल्कापिंड बिल्कुल गायब भी हो सकते हैं साथ ही

मानसून का खलल भी हो सकता है चूंकि भारत में सितंबर की शुरुआत में कई हिस्सों में मानसूनी बादल छाए रहते हैं, इसलिए यदि आपके इलाके में आसमान पूरी तरह साफ़ (Clear Sky) रहता है, तभी आप इसे देख पाएंगे।

किस तारामण्डल क्षेत्र में दिखाई देंगी एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि के दीप्तिमान तारामंडल की बात करें तो पाते हैं कि यह उत्तर-पूर्वी क्षितिज की ओर,पर्सियस तारामंडल क्षेत्र से आती हुई दिखाई देंगी,या कुछ यूं कहें कि पर्सियस तारामंडल क्षेत्र में इस एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि का रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु होगा।

क्या होता है रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि क्योंकि किसी भी तारामंडल क्षेत्र से आती हुई उल्काओं का दिखना केवल एक दृष्टि प्रभाव ही होता है इसीलिए यह एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वृष्टि भी पर्सियस तारामंडल की तरफ़ से दिखना केवल एक दृष्टि प्रभाव ही होगा,लेकिन इसको कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे की अगर आप कहीं खाली पड़ी हुईं रेलगाड़ियों की पटरियों को देखते हैं तो आपको दूर सामने देखने पर वह आगे एक दूर जगह पर एक दूसरे से मिलती हुईं नज़र आती हैं ठीक वैसे ही आकाश में नज़र करने पर जिस तारामंडल क्षेत्र की तरफ़ से कोई भी उल्का वृष्टि दिखाई देती है उसी के आधार पर उस उल्का वर्षा का नाम रखा गया है और उस बिंदु जिस तरफ़ से आती हुई दिखाई देती हैं उसको खगोल विज्ञान में रेडिएंट पॉइंट या विकीर्णक बिंदु के नाम से जाना जाता है, लेकिन वैसे तो यह रात्रि आकाश के किसी भी हिस्से में दिखाई दे सकती हैं इसीलिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः बचकर संपूर्ण आकाश में नज़र डालकर खोजने का प्रयास करना चाहिए और इसके चरम की बात करें तो पाते हैं कि भारत में 9–10 सितंबर 2026 की रात को अपने चरम (Peak) पर होगी क्योंकि यह एक छोटी (minor) उल्का वर्षा है, जिसमें आकाश में टूटते तारे दिखाई देते हैं। इसीलिए 9 सितंबर 2026 (रात से अगली सुबह तक) उत्तम समय रहेगा या कुछ यूं कहें कि 9 की आधी रात के बाद और सुबह होने से पहले के साफ और अंधेरे आसमान में लगभग 5 से 10 उल्काएं प्रति घंटा भी नज़र आ सकती हैं लेकिन इनको ठीक से देखने के लिए आपको शहर की तेज रोशनी (Light pollution) से दूर किसी शांत,साफ़ एवं स्वच्छ रात्रि बाली जगह का चुनाव करना होगा साथ ही इस दौरान आसमान को देखने के लिए किसी विशेष टेलीस्कोप या दूरबीन की भी जरूरत नहीं है, इसे खुली आंखों से देखा जा सकता है लेकिन अपनी आंखों को अंधेरे के अनुकूल ढलने के लिए कम से कम 30 मिनट का समय दें क्योंकि यह खास, एप्सिलॉन परर्सीड्स उल्का बौछारें उस दौरान अपने चरम पर होंगी इसीलिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः दूर,साफ मौसम में नग्न आंखों के साथ ही इसका दीदार हो सकेगा।

किस धूमकेतु के कारण घटित होगी यह एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वर्षा।?

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर उत्तर प्रदेश भारत के खगोलविद् अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलीय दृष्टि से 9 सितंबर 2026 को होने वाला यह विशेष एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का है इसके मुख्य जनक यानी कि एप्सिलोन परर्सीड्स उल्काओं का निर्माण करने वाले धूमकेतु की खोज खगोल वैज्ञानिक आज तक निश्चित रूप से नहीं कर पाए हैं, लेकिन ये अंतरिक्ष में घूम रहे धूल और मलबे के कण होते हैं, जो 64 से लेकर 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की अत्यधिक रफ्तार से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही जल जाते हैं,इनको ही वैसे तो साधारण भाषा में टूटते हुए तारे या शूटिंग स्टार्स भी कहा जाता हैं,लेकिन खगोल विज्ञान की भाषा में कहें तो उल्का (Meteor) अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में अत्यधिक वेग से प्रवेश करने वाले छोटे चट्टानी या धात्विक पिंड होते होते हैं एवं उल्काओं की उत्पत्ति की बात करें तो पाते हैं कि ये क्षुद्रग्रहों (Asteroids) के टूटे हुए टुकड़े या ज़्यादातर धूमकेतुओं (Comets) द्वारा छोड़े गए धूल और गैस के कण ही होते हैं जो तेज गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं,तो वायुमण्डल के साथ घर्षण (Friction) के कारण अत्यधिक गर्मी पैदा होती है इससे ये छड़ भर के लिए तीव्र वेग से जल उठते हैं और आकाश में प्रकाश की एक चमकीली धारी या लकीर के रूप में दिखाई देते हैं, लेकिन खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह भी जानना आवश्यक है कि उल्का और उल्कापिंड में अंतर यह होता है कि अधिकांश उल्काएँ वायुमंडल में पूरी तरह जलकर नष्ट हो जाती हैं, या कुछ यूं कहें कि जब यह पृथ्वी के वायुमंडल में रगड़ या घर्षण से जलती हुईं लकीरें बनाती हुई दिखाई देती हैं उस अवस्था को उल्का या उल्का वृष्टि या उल्का वर्षा कहा जाता है, लेकिन जो इनके अंतरिक्षीय टुकड़े आकार में बड़े होने के कारण पूरी तरह जल नहीं पाते हैं और ठोस छोटी- बड़ी चट्टानों के रूप में छोटे एवं बड़े टुकड़ों के रूप में पृथ्वी के वायुमंडलीय झंझावातों को पार करते हुए सीधे पृथ्वी की सतह पर आ कर गिरते हैं, उन्हें ही उल्कापिंड (Meteorites) कहा जाता है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अब अगर विशेष रूप से हम बात करें इस 9 सितंबर 2026 में होने वाली इस ख़ास एप्सिलॉन परर्सीड्स उल्का वृष्टि की तो इसके बारे में कुछ बड़ी ही रोचक जानकारियां भी सामने आती हैं जैसे कि वैज्ञानिक आज तक एप्सिलॉन परसिड्स (September Epsilon Perseids) उल्का बौछार के लिए जिम्मेदार मूल धूमकेतु (Parent Comet) की पूरी तरीके से खोज नहीं कर पाए हैं,लेकिन इस दिशा में विश्व वैज्ञानिक समुदाय की लगातार खोंजे जारी हैं,साथ ही खगोलविद अमर पाल सिंह के विचार प्रयोग परिकल्पना (Thought Experiments Hypothesis) के अनुसार भी इस उल्का बौछार से जुड़े मुख्य तथ्यों में से अज्ञात मूल धूमकेतु के लिए विचार प्रयोग वैज्ञानिक अनुमान है कि इसके लिए जिम्मेदार कोई बड़ा पिंड एक अज्ञात दीर्घ-अवधि (unknonwn long-period) वाला धूमकेतु है, जिसे सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में हजारों साल लगते हैं और उसकी कक्षा भी अति दीर्घवृत्ताकार होगी, क्योंकि दीर्घ-आवर्तकाल वाले धूमकेतु, ऊर्ट बादल (Oort cloud) से उत्पन्न होने वाले खगोलीय पिंड हैं, लेकिन कुछ दीर्घ-अवधि वाले धूमकेतु/ (कॉमेट) या जिन्हें साधारण भाषा में पुच्छल तारा भी कहा जाता है वह अज्ञात ही हैं खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस पर प्रकाश डालते हुए साथ ही इसकी अपने विचार प्रयोग परिकल्पना की खगोलीय व्याख्या करते हुए अपने ही शब्दों में बताया कि अज्ञात (Unknown) होने के कई और कारण भी हो सकते हैं ,जैसे कि चूंकि ऐसे कई धूमकेतु मानव इतिहास में केवल एक बार या हजारों साल पहले दिखे होते हैं, इसलिए खगोलविदों के पास इनका कई हजारों साल पहले का कोई भी सीधा प्रत्यक्ष पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता है, लेकिन जब ये अचानक से कभी भी पृथ्वी या सूर्य के करीब आते हैं, तभी इनकी खोज हो पाती है, इसलिए इन्हें "अज्ञात" माना जाता है, इसीलिये वह अज्ञात धूमकेतु भी अभी तक हमारे विश्व वैज्ञानिक समुदाय की भी दूरबीनों की नजर में नहीं आया है,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि दुनियां में आगे आने वाले समय में विशेष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एवं अंतरिक्ष आधारित विभिन्न प्रकार की दूरबीनों आदि के माध्यम से लगातार खोजों का आधार एवं दायरा बढ़ता ही जा रहा है जो की अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए विशेष ज़रूरी एवं हमेशा आवश्यक भी है, हालांकि अभी तक तो एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वृष्टि के लिए ख़ास जिम्मेदार वाला मूल धूमकेतु नहीं मिला है, लेकिन पृथ्वी हर साल सितंबर की शुरुआत में अंतरिक्ष में उस अज्ञात धूमकेतु (जो कभी विशालकाय रूप में उस काले घने अंधकारमय अनजाने सुनसान एवं ख़ामोशी युक्त अकेले शांत रास्ते पर चला करता होगा) के द्वारा छोड़े गए मलबे (धूल और बर्फ के कणों) की पट्टी से गुजरती है,तब उसके द्वारा अपने पीछे छोड़े हुए ये कण आज भी जब हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो घर्षण के कारण चमक उठते हैं, जिससे हमें यह ख़ास उल्का बौछार दिखाई देती है। लेकिन इसके (एप्सिलोन परर्सीड्स उल्का वृष्टि) के नियमित अवलोकन और इसकी कक्षा (orbit) के खगोल गणितीय आकलन से विश्व वैज्ञानिक समुदाय के खगोल वैज्ञानिकों ने इसे एक अलग उल्का बौछार के रूप में दर्ज किया है। इसीलिए खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष ज़ोर देते हुए बताया है कि भ्रम से ज़रूर बचें क्योंकि जैसा कि खगोलविद अमर पाल सिंह हमेशा ही अपने मूल कथन में बताते हैं कि सही ज्ञान सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान। इसीलिए यह भी जानना ज़रूरी है कि (अगस्त और सितंबर के परसिड्स में बहुत अंतर होता है) क्योंकि अक्सर तमाम लोग इसे अगस्त में दिखने वाली प्रसिद्ध परसिड्स (Perseids) उल्का बौछार समझ लेते हैं,अगस्त वाली मुख्य परसिड्स उल्का बौछार के धूमकेतु की खोज की जा चुकी है, जिसका नाम स्विफ्ट-टटल (Comet 109P/Swift-Tuttle) है। लेकिन सितंबर में दिखने वाली एप्सिलॉन परसिड्स एक बिल्कुल अलग उल्का धारा है और इसके मूल धूमकेतु का पता लगाया जाना अभी भी बाकी ही है, इसीलिए तब तक,प्राप्त ज्ञान की शक्ति का प्रयोग करते हुए ही इस एप्सिलॉन परसिड्स उल्का वृष्टि का विहंगम दृश्य ग्रामीण इलाकों से बेहतर परिणाम दे सकता है।

8 सितंबर 2026 की मध्य रात्रि के बाद,चंद्रमा और बृहस्पति की युति दिखाई देगी

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल प्रेमियों के लिए एक शानदार खगोलीय युति घटित होने वाली है क्योंकि 8 सितंबर 2026 को मध्य रात्रि के बाद लगभग 3 बजकर 35 मिनट के बाद पूर्वी क्षितिज के आकाश में चंद्रमा और बृहस्पति ग्रह एक साथ दिखाई देने शुरू हो जाएंगे या कुछ यूं कहें कि यानि कि 9 सितंबर 2026 की भोर सुबह तक के आकाश में एक पतला चंद्र-कोर (Crescent Moon) चन्द्रमा,हमारे सौर मण्डल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति (Jupiter) के बेहद करीब से गुजरेगा,इस दौरान दोनों के बीच की दूरी 1 डिग्री से भी कम होगी, जिससे इस युति के दौरान एक बेहद ही खूबसूरत खगोलीय दृश्य बनेगा, इस खगोलीय संरेखण को खगोल विज्ञान की भाषा में चंद्रमा और बृहस्पति ग्रह के शानदार निकटतम आगमन को चन्द्र -ब्रहस्पति युति कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह दोनों खगोलीय पिण्ड आपस में करोड़ों किलोमीटर की दूरी पर मौजूद हैं लेकिन कभी कभी पृथ्वी से देखने पर दृश्य प्रभाव के कारण काफ़ी पास पास दिखाई देते हैं इसी को खगोल विज्ञान की भाषा में कंजंक्शन या युति भी कहा जाता है।

किस दिशा में और किस तारामण्डल क्षेत्र में स्थित होंगे दोनों खगोलीय पिण्ड।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस शानदार खगोलीय युति को देखने के लिए आपको किसी विशेष दूरबीन/ टेलीस्कोप या विनोकुलर आदि उपकरण की भी आवश्यकता नहीं है, आप अपनी साधारण आंखों से ही इस युति को देख सकते हैं , लेकिन अगर आपके पास कोई टेलीस्कोप /दूरबीन या विनोकुलर आदि उपकरण मौजूद हैं तो आप इसको और भी अधिक सर्वोत्तम तौर पर देख सकते हैं, लेकिन आपको पूर्वी आकाश में क्षितिज से थोड़ा ऊपर देखना होगा तब आकाश में एक बहुत ही पतला हंसिया जैसा चंद्रमा (वैनिंग क्रिसेंट मून) लगभग 8 से 10 प्रतिशत चमकता हुआ दिखाई देगा इस दौरान चंद्रमा का मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 6.78 के क़रीब होगा और यह सिंह तारामंडल क्षेत्र में स्थित होगा और ठीक उसके पास ही में बेहद चमकीला ब्रहस्पति ग्रह एक बड़े तारे की तरह चमकता हुआ नज़र आयेगा इस दौरान बृहस्पति ग्रह का मैग्नीट्यूड लगभग माइनस 1.66 होगा और यह कर्क तारामंडल में स्थित होगा।

कहां कहां से दिखाई देगा लूनर ऑक्ल्टेशन।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह लूनर ऑक्ल्टेशन की खगोलीय स्थिति भारत से दिखाई नहीं देगी लेकिन यह कनाडा, ग्रीनलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, पूर्वी रूस और उत्तरी प्रशांत क्षेत्र के कुछ स्थानों पर यह घटना और भी रोमांचक होगी क्योंकि वहां चंद्रमा सीधे बृहस्पति के सामने से गुजरेगा और कुछ समय के लिए इस विशाल ग्रह को अपनी ओट में छिपा देगा,इस खगोलीय घटना को चंद्र ग्रहण नहीं, बल्कि “चंद्रमा द्वारा ग्रह का आवरण” या लूनर ऑक्ल्टेशन (Lunar Occultation / चंद्र आवरण) कहा जाता है, लेकिन जो लोग चंद्र आवरण वाले क्षेत्र में नहीं हैं, वे भी चंद्रमा और बृहस्पति की इस शानदार और बेहद निकट खगोलीय युति का आनंद तो उठा ही सकते हैं।

भारत में इस खगोलीय युति का कैसे कर सकते हैं ख़ास दीदार और क्या क्या बरतें सावधानियां।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस ख़ास खगोलीय नज़ारे को देखने के लिए आपको किसी विशेष उपकरण की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इसे देखने के लिए आपको किसी टेलिस्कोप (Telescope) या दूरबीन की आवश्यकता नहीं है, इसे केवल नग्न आँखों से सीधे आसमान में देखा जा सकता है, लेकिन आज कल बढ़ते प्रकाश प्रदूषण/लाइट पॉल्यूशन के कारण तारों और ग्रहों को साधारण आंखों से देखने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है इसलिए उच्च कोटि के दृश्य के लिए प्रकाश प्रदूषण से पूर्णतः दूर जाएं, या कुछ यूं कहें कि किसी ग्रामीण इलाकों में जाकर देखना शहरों के मुक़ाबले ज़्यादा फायदेमंद होता है,नहीं तो शहरों की अनियमित तेज़ रोशनी और इससे उत्पन्न होने वाले प्रकाश प्रदूषण के कारण वैसे ही साधारण आँखों से दिखाई देने वाले तारों और ग्रहों तक की संख्या सीमित होती जा रही है और बढ़ते हुए प्रकाश प्रदूषण के कारण ही आज कल खगोल प्रेमियों के लिए भी कई बार निराश ही होना पड़ता है और अगर पृथ्वी पर ऐसे ही अनियमित तौर पर अंधाधुंध प्रकाश प्रदूषण बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब तमाम खगोलीय पिंड जो आसानी से दिख जाते थे वह भी दिखना बंद हो जाएंगे और हम अपने ही नहीं बल्कि सभी के हिस्से का आकाश भी खो देंगे जोकि मानवता के लिए किसी दुर्भाग्य से कम नहीं होगा अगर हम पुराने जमाने की बात करें तो पाते हैं कि पुराने जमाने में साधारण आंखों से ही आसानी से दिखने वाले अनगिनत खगोलीय पिण्ड एवं घटनाएँ और हमारी आकाशगंगा एवं अन्य तमाम खगोलीय पिंड ऐसे ही रात्रि के आकाश में साधारण आंखों से ही दिखाई देते थे लेकिन आज जो बचे हुए हैं इन्हें भी जिन्हें साधारण आंखों से आसानी से देखा जा सकता है वो भी बढ़ते प्रकाश प्रदूषण के कारण ही सभी धीरे धीरे बिल्कुल गायब हो जाएंगे इसीलिए अभी भी समय है कि आप ख़ुद के साथ ही सभी में वैज्ञानिक वातावरण उत्पन्न करते हुए समायोचित समझाने का प्रयास करें कि प्रकाश प्रदूषण क्या है और यह कितना खतरनाक साबित हो रहा है सभी के लिए चाहें वह मानव हों। पशु, पक्षी एवं कीट पतंगे आदि कोई भी इसकी अधिकता की चपेट से बचा नहीं है और अगर इसको महसूस करना चाहते हैं तो आप इसे स्पष्ट देखने के लिए किसी ग्रामीण इलाके या ऐसी जगह जाएं जहाँ अंधेरा हो या डार्क स्काई जोन हों,आपको ख़ुद महसूस होगा कि जो खगोलीय घटनाएं एवं तारे, ग्रह और मंदाकिनी आदि शहरों से दिखाई नहीं देती हैं वहीं ग्रामीण इलाकों जहां प्रकाश प्रदूषण नहीं होता है वहां से आसानी से दिखाई देना शुरू हो जाएंगे, लेकिन अगर हम बात करें चंद्रमा और बृहस्पति ग्रह की युति की तो यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मानसून का खलल भी एक बाधक हो सकता है चूंकि भारत में सितंबर की शुरुआत में कई हिस्सों में मानसूनी बादल छाए रहते हैं,इसलिए यदि आपके इलाके में आसमान पूरी तरह साफ़ (Clear Sky) रहता है,तभी आप इसे देख पाएंगे,और साथ ही खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष ज़ोर देते हुए यह भी बताया कि किसी भी समय सावधानी बेहद ही जरूरी है, जैसे की दूरबीनों आदि को लगाते समय भी विशेष ध्यान रखना चाहिए, खासकर,सूर्य के आसपास या उसकी दिशा में कभी भी बिना उचित एवं बिना उच्च कोटि मानकीकृत प्रमाणित सौर फिल्टर एवं संपूर्ण सटीक प्रमाणित वैज्ञानिक जानकारी और सावधानियों के किसी भी दूरबीन,टेलीस्कोप या किसी अन्य ऑप्टिकल उपकरण का उपयोग न करें क्योंकि अन्यथा की स्थिति में बिना जाने ऐसा करने से आंखों को स्थायी नुकसान हो सकता है।

चित्रकूट में बाढ़ के बाद योगी का एक्शन प्लान: क्षति का तत्काल सर्वे, मुआवजा और मंदाकिनी से अतिक्रमण हटाने के निर्देश
लखनऊ। अतिवृष्टि से प्रभावित चित्रकूट धाम का दौरा कर लौटे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर राहत एवं पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बाढ़ प्रभावित परिवारों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाए और फसल व मकान की क्षति का तत्काल सर्वे कराकर पात्र लोगों को नियमानुसार मुआवजा दिया जाए।
मुख्यमंत्री ने पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त मकानों के परिवारों को मुख्यमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने तथा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने को कहा। प्रभावित किसानों की फसल क्षति का सर्वे भी शीघ्र पूरा कराने के निर्देश दिए।

- व्यापारियों और मठ-मंदिरों को भी मिलेगी सहायता
योगी ने चित्रकूट धाम के बाढ़ प्रभावित व्यापारियों को हुए नुकसान का आकलन कराने और उन्हें सहायता व मुआवजा उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था करने को कहा। मठ-मंदिरों को हुई क्षति का भी सर्वे कराने तथा आवश्यक मरम्मत कार्य शीघ्र शुरू कराने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण में शासन आवश्यक सहयोग करेगा।
राहत कार्यों की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने शेष राहत किट का वितरण 48 घंटे के भीतर सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि राहत सामग्री पहुंचाने में किसी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को प्रभावित परिवारों के बीच लगातार मौजूद रहकर उनकी जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

- बाढ़ के बाद बीमारियों से निपटने की तैयारी
मुख्यमंत्री ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी विशेष सतर्कता बरतने को कहा। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग की टीमों को प्रभावित क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखने और जरूरतमंदों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
उन्होंने कहा कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग की टीमें बीमारी के लक्षणों पर नजर रखें और आवश्यकता पड़ने पर तत्काल कार्रवाई करें।

- मंदाकिनी के कैचमेंट से हटेगा अतिक्रमण
मुख्यमंत्री ने मंदाकिनी नदी के कैचमेंट एरिया में हुए अतिक्रमण का चिन्हांकन कर नियमानुसार उसे हटाने के निर्देश दिए। इसके लिए जनपदीय अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों के साथ संवाद करने को कहा गया। साथ ही घाटों के विस्तारीकरण के लिए कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मंदाकिनी में किसी भी दशा में सीवर और नालों का पानी नहीं जाना चाहिए। पर्यटन, सिंचाई और नगर विकास विभाग आपसी समन्वय से इसके लिए ठोस कार्ययोजना तैयार कर उसे लागू करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि मंदाकिनी चित्रकूट की आस्था से जुड़ी नदी है और इसकी स्वच्छता व निर्मलता बनाए रखना सभी संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है।

- फुट ओवरब्रिज की सुरक्षा जांच के निर्देश
मंदाकिनी नदी पर बने फुट ओवरब्रिज का सेफ्टी ऑडिट कराने की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी को दी गई है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनसुरक्षा से जुड़े सभी निर्माण कार्यों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और जरूरत के अनुसार तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई हो।चित्रकूट धाम से एयरपोर्ट जाने वाले मार्ग की भी मुख्यमंत्री ने समीक्षा की। उन्होंने निर्देश दिया कि सड़क का निर्माण कार्य विजयादशमी से पहले हर हाल में पूरा कराया जाए। विलंब के कारणों की समीक्षा कर जिम्मेदारी तय करने को भी कहा।
- गोशालाओं में चारे और पशु स्वास्थ्य की जांच
मुख्यमंत्री ने पशुधन की सुरक्षा के लिए गोशालाओं की जांच कराने और वहां पर्याप्त चारे की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने लंपी डिजीज से बचाव के लिए भी आवश्यक प्रबंध करने को कहा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि राहत और पुनर्वास के साथ चित्रकूट के लिए दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन की कार्ययोजना तैयार की जाए, ताकि भविष्य में अतिवृष्टि और बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। इसमें मंदाकिनी के प्राकृतिक प्रवाह, कैचमेंट एरिया, अतिक्रमण और जल निकासी व्यवस्था को विशेष रूप से शामिल किया जाए।
भदोही पुलिस लाइन और थानों में धूमधाम से मना श्रीकृष्ण जन्मोत्सव: डीएम-एसपी ने की पूजा

पुलिसकर्मियों और परिजनों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लिया हिस्सा

रिपोर्टर -‌ नितेश श्रीवास्तव


भदोही। बीती रात श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर भदोही जिले की पुलिस लाइन और सभी थानों में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर पुलिस लाइन और थानों में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और लीलाओं से जुड़ी सुंदर झांकियां सजाई गईं। साथ ही, कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।

भदोही के जिलाधिकारी शैलेश कुमार और पुलिस अधीक्षक अभिनव त्यागी ने पुलिस लाइन स्थित मंदिर में हवन-पूजन किया। उन्होंने भगवान कृष्ण से जिले में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। इस अवसर पर पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों और उनके परिजनों ने श्रद्धा से पूजा की।

पुलिस लाइन में हुए श्रीकृष्ण जन्मोत्सव कार्यक्रम में अपर पुलिस अधीक्षक शुभम अग्रवाल, क्षेत्राधिकारी ज्ञानपुर चमन सिंह चावड़ा, क्षेत्राधिकारी लाइन धीरेंद्र सिंह, क्षेत्राधिकारी राजीव कुमार और प्रतिसार निरीक्षक, पुलिस लाइन ज्ञानपुर समेत कई पुलिस अधिकारी, कर्मचारी और उनके परिजन मौजूद रहे। सभी ने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के विभिन्न कार्यक्रमों में उत्साह से हिस्सा लिया।

पुलिस अधीक्षक भदोही ने जिले के लोगों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अपील की कि इस पर्व को आपसी भाईचारे, सौहार्द और शांतिपूर्ण माहौल में मनाया जाए।
छात्रों के नाम पर राजनीतिक नौटंकी कर रही भाजपा : विनोद पांडेय

झामुमो महासचिव ने कहा कि 48 घंटे का अल्टीमेटम देना भाजपा की हताशा और राजनीतिक अहंकार का परिचायक

झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने भाजपा के 48 घंटे के अल्टीमेटम और चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा पर

कड़ा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि भाजपा छात्रों के नाम पर राजनीतिक नौटंकी कर रही है और युवाओं के आक्रोश को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रही है।

महासचिव विनोद पांडेय ने कहा कि भाजपा को पहले अपने शासनकाल का हिसाब देना चाहिए। केंद्र और झारखंड में वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद युवाओं के लिए रोजगार के कितने अवसर पैदा किए, इसका जवाब भाजपा दे। झारखंड के छात्रों के मुद्दे पर घड़ियाली आंसू बहाने से भाजपा की असलियत नहीं छिपेगी।

उन्होंने कहा कि छात्रों पर दर्ज मुकदमों को भाजपा नेता फर्जी बता रहे हैं। यदि मुकदमे फर्जी हैं तो भाजपा तथ्य और प्रमाण सामने रखे। कानून तोड़ने वालों को राजनीतिक संरक्षण देने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। भाजपा आंदोलन के नाम पर सरकारी व्यवस्था को चुनौती देने की राजनीति कर रही है।

झामुमो महासचिव ने कहा कि 48 घंटे का अल्टीमेटम देना भाजपा की हताशा और राजनीतिक अहंकार का परिचायक है। झारखंड सरकार भाजपा के अल्टीमेटम से नहीं चलती। भाजपा को लगता है कि धमकी और दबाव की राजनीति से सरकार को झुकाया जा सकता है, तो यह उसकी बड़ी भूल है।

‘नौकरी बेचने’ के भाजपा के आरोप पर उन्होंने कहा कि भाजपा के पास यदि कोई प्रमाण है तो सामने लाए, अन्यथा झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाकर जनता को गुमराह करना बंद करे। बिना प्रमाण आरोप लगाना भाजपा की पुरानी राजनीतिक आदत रही है।

मुख्य सचिव से इंडिया गठबंधन के नेताओं की मुलाकात पर भाजपा की टिप्पणी पर उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव से मिलने पर भाजपा को तकलीफ इसलिए हो रही है, क्योंकि उसे हर राजनीतिक गतिविधि में अपना राजनीतिक संकट दिखाई देता है। मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं होने की भाजपा की बात पूरी तरह हास्यास्पद है।

विनोद पांडेय ने कहा कि भाजपा छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रही है। झारखंड के युवा भाजपा की इस राजनीति को समझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा चाहे जितने अल्टीमेटम दे और जितने प्रदर्शन कर ले, सरकार को धमकी देकर राजनीतिक दबाव में लेने का उसका मंसूबा पूरा नहीं होगा।

32 मन विशुद्ध सोने के अलौकिक विग्रह : श्री वंशीधर नगर धाम - पंचम धाम की महिमा

अभय तिवारी ।

गढ़वा :- विंध्य क्षेत्र अंतर्गत झारखंड के पश्चिम छोर पर गढ़वा जिला के बंशीधर नगर धाम, छत्तीसगढ़, यूपी और बिहार यानी तीन राज्यों के त्रिकोण पर वनों एवं पर्वतों से आच्छादित खूबसूरत वादियों के बीच और पतित पावनी कल कल निनादिनी मां बांकी नदी के किनारे बसा श्री बंशीधर नगर इस भूमंडल पर पांचवां धाम है।

विद्वानों के मुताबिक ऐसा भगवान श्रीकृष्ण जी द्वारा विग्रह रुप में यहां स्वयं आकर विराजमान होना है। विग्रह रुप में श्री वंशीधर जी का प्राकट्य विग्रहावतार माना जाता है। विद्वानों के मुताबिक श्री वंशीधर जी के रुप में उनका विग्रहावतार, अर्चावतार भी है। इसलिए इसे श्री बंशीधर नगर धाम के नाम से जाना जाता है।

विद्वानों की राय है कि आमतौर पर पहले किसी मंदिर का निर्माण होता है, उसके बाद मंदिर में भगवान का विग्रह स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। लेकिन श्री वंशीधर मंदिर में ठीक इसके विपरीत रानी शिवमानी देवी को स्वप्न देकर पधारे भगवान श्री वंशीधर जी के विग्रह की स्थापना हुई और उसके बाद मंदिर का निर्माण हुआ है। श्री वंशीधर जी का प्रतिमा 32 मन विशुद्ध सोने का विग्रह मनमोहक, अदभुत, अलौकिक और अकल्पनीय है। भगवान श्रीकृष्ण जी का ऐसा विग्रह दुनियां के किसी कोने में नहीं है।

भगवान के विग्रह का वर्णन शब्दों में करना कठिन है, लेकिन एक वाक्य कहना और लिखना हो तो बस यही कहा और लिखा जायेगा कि जिनके दर्शन मात्र से सारे पीड़ा और संताप दूर हो जाते हैं। तन और मन हर्षित हो जाता है। विग्रह ऐसा कि नजर नहीं हटती। हमेशा देखते रहने का जी करता है।

श्री बंशीधर नगर में श्री वंशीधर जी के कण कण में विद्यमान रहने का अहसास होता है। इसके कारण यह स्थान श्रीकृष्ण की उपासना करने वाले व वैष्णवों के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां सुविख्यात वैष्णव संत जगदाचार्य श्री श्री 1008 त्रिदंडी स्वामी जी महाराज, उनके शिष्य श्री श्री 1008 लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज व श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्य विद्या भास्कर जी महाराज समेत वैष्णव संप्रदाय के कई चोटी के संत यहां भगवान का दर्शन पूजन कर श्री वंशीधर धाम व श्री वंशीधर जी की महिमा का वर्णन कर चुके हैं।

पंडित राहुल सांकृत्यायन और विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय कई जानी मानी हस्तियां भी भगवान का दर्शन अर्चन कर चुके हैं। श्री वंशीधर मंदिर में श्रीकृष्ण जी की वंशीवादन करती आदमकद प्रतिमा के दर्शन के बाद लोगों को अदभुत सुख शांति की अनुभूति होती है। इस नगरी में कभी शोक और उदासी का भाव किसी के मन में उत्पन्न नहीं होता है। बाहर से श्री वंशीधर जी की नगरी में जो भी श्रद्धालु आते हैं, बस भगवान के दर्शन मात्र से उनके चित्त को परम शांति मिलती है। श्री वंशीधर जी के द्वार पर कभी किसी को मांगने की जरुरत नहीं पड़ी है। श्री वंशीधर के द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा। जो भी श्रद्धालु श्री वंशीधरजी के दरबार में गया, उसकी अभिष्ट कामना की पूर्ति अवश्य हुई है। ऐसी मान्यता है कि भगवान अपने द्वार पर आने वाले भक्तों की मनोकामना को अवश्य पूरी करते हैं।

श्री बंशीधर नगरी की परिधि के भीतर अब तक कभी किसी प्रकार के प्राकृतिक आपदा का प्रभाव नहीं पड़ा है। लगभग एक दशक तक घोर उग्रवाद क्षेत्र से ग्रसित होने के बाद भी श्री बंशीधर नगर के लोगों में भय के वातावरण का कभी अहसास नहीं हुआ। श्री वंशीधर क्षेत्र में कभी महामारी को आसपास भटकने का भी अवसर नहीं मिला है। मतलब इस नगरी में सब कुछ श्री वंशीधर जी की इच्छा के अनुकूल होता है। प्राकृतिक आपदा और महामारी जैसे असामयिक घटना जिससे श्री वंशीधर जी के भक्त को परेशानी और शोक हो, इन सब चीजों को श्री वंशीधरजी अपने क्षेत्र में कभी फटकने नहीं देते। श्री वंशीधर जी की प्रेरणा से यहां वर्ष भर धार्मिक अनुष्ठान, संत्सग आदि का क्रम जारी रहता है। लोग एक दूसरे के हर सुख दुख में सहभागी बनकर जीवन यापन करते हैं। श्री वंशीधर की कृपा ही है कि लोग बिना किसी भय अथवा चिंता किये यहां सुखपूर्वक निवास करते हैं।

श्री बंशीधर नगर को योगेश्वर कृष्ण की भूमि और इस धरती को द्वितीय मथुरा और वृंदावन माना जाता है। श्री बंशीधर जी की स्थापना के बारे में पलामू के प्रसिद्ध इतिहासकारों स्व. रामदीन पाण्डेय, स्व. हवलधारी राम गुप्त हलधर एवं राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त सेवानिवृत्त शिक्षक सह इतिहासकार डॉ रमेश चंचल ने अपनी रचनाओं में बड़ी विस्तार से की है। इतिहासकारों के अनुसार संवत 1885 में राजा स्व भवानी सिंह देव की विधवा शिवमानी कुंवर राजकाज का संचालन कर रही थी। रानी शिवमानी कुंवर धर्मपरायण एवं भगवत भक्ति में पूर्ण निष्ठावान थी। 14 अगस्त 1827 को रानी साहिबा जन्माष्टमी व्रत किया था उसी दिन मध्य रात्रि में उन्हें स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ।

स्वप्न में श्री कृष्ण ने रानी से वर मांगने को कहा। रानी ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु आपकी सदैव कृपा हम पर रहे। तब भगवान कृष्ण ने रानी से कनहर नदी के किनारे यूपी के महुअरिया के निकट शिव पहाड़ी अपनी प्रतिमा के गड़े होने की जानकारी दी और उन्हें अपने राज्य में लाने को कहा। भगवत कृपा जान रानी ने शिवपहाड़ी जाकर विधिवत पूजा अर्चना के बाद खुदाई करायी तो श्री बंशीधर जी की अद्वितीय असाधारण प्रतिमा मिली। जिसे हाथियों पर बैठाकर श्री बंशीधर नगर लाया गया। गढ़ के मुख्य द्वार पर अंतिम हाथी बैठ गया। लाख प्रयत्न के बावजूद हाथी नहीं उठने पर रानी ने राजपुरोहितों से राय मशविरा कर वहीं पर मंदिर का निर्माण कराया तथा वाराणसी से राधा रानी की अष्टधातु की प्रतिमा मंगाकर दिनांक 21 जनवरी 1828 स्थापित करायी।।।

संवत 1885 तदनुसार 21 जनवरी 1828 को वसंत पंचमी के दिन श्री राधा वंशीधर जी की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कराई। जिसके बाद मंदिर में शुरू हुआ पूजन दर्शन अनवरत जारी है। प्रतिवर्ष असंख्य लोग भगवान का दर्शन पूजन कर मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। श्री बंशीधर जी की प्रतिमा कला के दृष्टिकोण से अति सुंदर एवं अद्वितीय है। बिना किसी रसायन के प्रयोग या अन्य पॉलिस के प्रतिमा की चमक पूर्ववत है। भगवान श्री कृष्ण शेषनाग के उपर कमल पीड़िका पर बंशीवादन नृत्य करते विराजमान हैं। भूगर्भ में गड़े होने के कारण शेषनाग दृष्टिगोचर नहीं होते हैं।।।

श्री बंशीधर मंदिर के बारे में विद्वानों का मत है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों स्वरूप में हैं। विद्वानों का तर्क है कि यहां स्थित श्री बंशीधरजी जटाधारी के रूप में दिखाई देते है जबकि शास्त्रों में श्रीकृष्ण के खुले लट और घुंघराले बाल का वर्णन है इस लिहाज से मान्यता है कि श्रीकृष्ण जटाधारी अर्थात देवाधिदेव महादेव के रूप में विराजमान हैं। श्रीकृष्ण के शेषशैय्या पर होने का वर्णन शास्त्रों में मिलता है लेकिन यहां श्री बंशीधर जी शेषनाग के उपर कमलपुष्प पर विराजमान हैं, जबकि कमलपुष्प ब्रह्मा का आसन है। इस लिहाज से मान्यता है कि कमल पुष्पासीन श्री कृष्ण कमलासन ब्रह्मा के रूप में विराजमान हैं। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं लक्ष्मीनाथ विष्णु के अवतार है इसलिये विष्णु के स्वरूप में विराजमान हैं। त्रिदेव के रूप में विराजमान भगवान सबकी मनोकामना पूरी करते हैं।।।

मंदिर में होने वाले कार्यक्रम व श्रद्धालुओं का आगमन

श्री बंशीधर मंदिर में वर्ष भर प्रतिमाह धार्मिक कार्यक्रम जारी रहता है। प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण की जयंती जन्माष्टमी मथुरा एवं वृंदावन की तरह मनाई जाती है। इस मौके पर एक सप्ताह तक श्रीमद्भागवत कथा और रात्रि काल में वृंदावन की मंडली द्वारा रासलीला का आयोजन किया जाता है ।जिससे श्री बंशीधर नगर सहित आस पास के गांवों का माहौल भक्तिमय हो जाता है। जन्माष्टमी के मौके पर आठ दिनों तक आयोजित जन्मोत्सव में शामिल होने के लिए देश भर से बड़ी संख्या में हजारों श्रद्धालु आते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर एक महीने तक मंदिर परिसर में भव्य मेला लगता है।

कार्तिक छठ पूजा पर देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालु छठ व्रत करने मंदिर में दर्शन करने आते हैं। शारदीय और वासंतिक नवरात्रि दीपावली, गोवर्धन पूजा, चौबीसों एकादशी, वसंत पंचमी पर मंदिर स्थापना दिवस, अन्नकूट एवं हर माह पूर्णिमा आदि त्योहार पर मंदिर में विशेष कार्यक्रम व अनुष्ठान, भंडारा आयोजित होता है। जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय एवं बाहरी श्रद्धालु शामिल होते हैं। उपरोक्त विशेष आयोजन और अवसरों पर स्थानीय एवं पड़ोसी राज्यों के हजारों श्रद्धालु आते हैं।वही हर वर्ष में एक बार बंशीधर महोत्सव मनाया जाता है। साथ ही पहले से नगर उंटारी का नाम था उसे बदल कर श्री बंशीधर नगर कर दिया गया है। सांसद श्री विष्णुदयाल राम ने लोकसभा में श्री बंशीधर जी का महात्म्य बताते हुए भारत सरकार से श्री बंशीधर नगर को तीर्थ क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिए स्वदेश दर्शन योजना में शामिल करने और श्री कृष्ण सर्किट से जोड़ने का अनुरोध किया है।।।

मंदिर से विभिन्न स्थानों की दूरी

मंदिर से रेलवे स्टेशन की दूरी 2.5 किमी, बस स्टैंड की दूरी 1.5 और थाना की दूरी 1.8 किमी, अनुमंडल की दूरी 2.8 और प्रखंड कार्यालय की दूरी 2.5 किमी, जिला मुख्यालय गढ़वा की दूरी 40 किमी है। झारखंड राज्य की राजधानी रांची की दूरी 245 किमी है। यूपी का सोनभद्र जिला सबसे करीब और सटा हुआ है। सोनभद्र जिलान्तर्गत विंढमगंज की दूरी मात्र 12 किमी है। जबकि सोनभद्र जिला मुख्यालय रॉबर्टसगंज की दूरी 100 किमी है। तीर्थ और धार्मिक लिहाज से महत्वपूर्ण वाराणसी एवं मिर्जापुर से 180 किमी है। बिहार की राजधानी पटना से 275 किमी है। दूसरे पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिला भी सटा हुआ है। सरगुजा जिले का सनावल की दूरी लगभग 30 किमी है। सरगुजा का जिला मुख्यालय अंबिकापुर की दूरी 200 किमी है। तीसरे पड़ोसी राज्य बिहार का रोहतास जिला भी सटा हुआ है। रोहतास जिले का नौहट्टा की दूरी लगभग 50 किमी है। जहां से नाव से सोन नदी पार कर 8 महीने तक आवागमन होता है। श्री बंशीधर नगर शहर एनएच 75 एवं गढ़वा रोड चोपन रेलखंड पर स्थित है। रांची, वाराणसी, अंबिकापुर से श्री बंशीधर नगर तक अंतर्राज्यीय बस सेवा उपलब्ध है। प्रतिदिन कई बसें उपरोक्त स्थानों से आया जाया करती हैं। गढ़वा रोड चोपन रेलखंड पर चलने वाली सभी एक्सप्रेस और पैंसेंजर ट्रेनें श्री बंशीधर जी की नगरी में स्थित नगर ऊंटारी रेलवे स्टेशन पर रुकती हैं। सड़क और रेल मार्ग से वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना जाना होता रहता है।।।

तीन राज्य तो बंशीधर नगर धाम से सटा हुआ रहने के कारण लोग आसानी से इनके दरबार में हाजिरी लगाने तो आते ही है ।लेकिन देश के कई कोने से भी भक्त यहां पहुंचते है ।और दर्शन कर अपनी मनोकामना बंशीधर नगर धाम में कहते है ।और उसे पूर्ण होने पर लोगों का आना जाना बराबर लगा रहता है।