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स्वयंसेवकत्व की अखंड यात्रा, ‘विठ्ठल’ से समाजमन के ‘विठ्ठलराव’ तक
– प्रदीप बालकृष्ण भोईर, संगठन एवं प्रबंधन शास्त्र के अध्येता

कुछ व्यक्तित्व पदों से बड़े होते हैं और कुछ अपने कार्य से। कुछ लोगों की पहचान उनके नाम के साथ जुड़े दायित्वों से होती है, तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी सबसे बड़ी पहचान उनका स्वयंसेवकत्व बन जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कोकण प्रांत कार्यवाह, शिक्षा क्षेत्र के अध्ययनशील नेतृत्व, समाजजीवन के कुशल समन्वयक और हजारों कार्यकर्ताओं के आत्मीय मार्गदर्शक श्री. विठ्ठल दुधाप्पा कांबले ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन सेवा, समर्पण, संगठन और संस्कारों की सतत साधना का पर्याय बन गया है।
उनके जन्मदिवस के अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं मिलता, बल्कि संघ संस्कारों से निर्मित उस स्वयंसेवक की यात्रा सामने आती है, जिसने अपने जीवन को राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित कर दिया।
एक कार्यक्रम में मंच संचालक ने उनके द्वारा निभाई जा रही अनेक जिम्मेदारियों का उल्लेख किया। भाषण के लिए खड़े होते ही उन्होंने अपनी सहज और विनोदी शैली में कहा, “आपने मेरी विभिन्न जिम्मेदारियों का परिचय दिया, लेकिन मेरी वास्तविक पहचान बताना भूल गए। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूँ और यही मेरी सबसे बड़ी पहचान है।” यह वाक्य उनके व्यक्तित्व का सार है। पद से अधिक स्वयंसेवकत्व, प्रसिद्धि से अधिक कार्य, अधिकार से अधिक दायित्व और व्यक्तिपूजा से अधिक संगठन इन्हीं मूल्यों पर उनका जीवन आधारित है।
व्यवसाय से शिक्षक और चेंबूर एज्युकेशन सोसायटी के विद्यार्थियों के प्रिय प्रधानाचार्य के रूप में उन्होंने अनेक पीढ़ियों का निर्माण किया। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला है। विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के बीच संवाद और विश्वास का वातावरण निर्मित करते हुए उन्होंने शिक्षा को संस्कारों से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया। इसी कारण वे केवल एक सफल प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायी शिक्षक और संस्कारवान शिक्षाविद् के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
समाजजीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय रहते हुए उन्होंने असंख्य कार्यकर्ताओं को जोड़ा। समरसता, संवाद और सामूहिकता उनकी कार्यशैली की विशेष पहचान है। “संगच्छध्वं संवदध्वं” के वैदिक संदेश को उन्होंने व्यवहार में उतारा। आज समाज के सभी वर्गों के लोग उन्हें आत्मीयता से “विठ्ठलराव” कहकर संबोधित करते हैं। यह संबोधन किसी पद की देन नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और अपनत्व का प्रतीक है।
चेंबूर एज्युकेशन सोसायटी का मैदान और सभागार पिछले कई दशकों से अनेक सामाजिक, शैक्षणिक और संगठनात्मक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मुंबई के निजी अनुदानित विद्यालयों के कर्मचारियों को वेतन पथक दिलाने के लिए हुए ऐतिहासिक संघर्ष की शुरुआत भी इसी परिसर से हुई। अनेक बैठकों, योजनाओं और सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप यह संघर्ष सफल हुआ। इस प्रकार यह परिसर संघर्ष, समर्पण और सफलता का साक्षी बन गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कोकण प्रांत कार्यवाह के रूप में उन्होंने व्यक्तिनिर्माण, परिवार प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और संगठन विस्तार को विशेष महत्व दिया। उनके लिए शाखा केवल एक दैनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का विश्वविद्यालय है। विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में कार्यरत कार्यकर्ताओं को दायित्व सौंपने के साथ-साथ वे गुणवत्ता, व्यवस्थापन, संस्कार और समाजाभिमुखता के प्रति भी निरंतर सजग रहते हैं।
मुंबई महानगरपालिका क्षेत्र की निजी अनुदानित शालाओं के विभिन्न प्रश्नों के समाधान के लिए उन्होंने सदैव समन्वयकारी भूमिका निभाई। विभिन्न विचारधाराओं के संगठनों को एक सूत्र में पिरोकर सामूहिक शक्ति का निर्माण करना उनकी विशिष्ट क्षमता रही है। संघ प्रार्थना की पंक्ति “विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिः” में उनका अटूट विश्वास है। उन्होंने अपने कार्य से यह सिद्ध किया है कि संगठित शक्ति के सामने असंभव प्रतीत होने वाली चुनौतियाँ भी परास्त हो जाती हैं। कोविड महामारी के कठिन दौर में जब अनेक शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी और कार्यकर्ता संकट में थे, तब उन्होंने केवल औपचारिक संवेदना व्यक्त नहीं की, बल्कि चिकित्सा सहायता, मानसिक संबल और आत्मीय सहयोग प्रदान कर यह विश्वास जगाया कि संकट की घड़ी में कोई कार्यकर्ता अकेला नहीं है। “सेवा ही साधना है” इस भाव को उन्होंने अपने जीवन में साकार किया।
मुंबई प्राथमिक विभाग के अनुदानित विद्यालयों के कर्मचारियों के हिंदू कॉलोनी स्थित महामोर्चे के दौरान परिस्थितियाँ तनावपूर्ण हो गई थीं। ऐसे समय में संयम, अनुशासन और विश्वास के बल पर उन्होंने पूरे आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखा। संघर्ष के क्षणों में भी संगठनात्मक मर्यादा और अनुशासन को बनाए रखने का उनका यह प्रयास प्रेरणादायी है।
विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के प्रति उनकी विशेष संवेदनशीलता है। राष्ट्रभक्ति, सेवाभाव, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण संरक्षण और नेतृत्व क्षमता जैसे गुण विद्यार्थियों में विकसित हों, इसके लिए वे निरंतर प्रयासरत रहते हैं। खेल, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में स्वयं सहभागी होकर वे नई पीढ़ी को प्रेरणा प्रदान करते हैं। उनके कार्य से यह अनुभव होता है कि शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का शिल्पकार होता है।
मेरे व्यक्तिगत जीवन में उनका स्थान एक बड़े भाई जैसा है। विभिन्न संगठनों के समन्वय की जिम्मेदारियाँ निभाते समय अनेक कठिन परिस्थितियाँ सामने आईं। उन दिनों प्रायः उनका फोन आता था “प्रदीप, कैसे हो? कोई परेशानी तो नहीं?” अत्यंत व्यस्त जीवन के बावजूद हर परिस्थिति में साथ खड़े रहने वाला यह मित्र कब बड़े भाई का स्वरूप बन गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ।
आज अनेक सेवानिवृत्त शिक्षिकाएँ, शिक्षकेतर कर्मचारी और सहयोगी मुस्कराते हुए पूछते हैं “भोईर, तुम्हारा यह विठ्ठल हमें कब पावेगा?” इस सहज प्रश्न में उनके प्रति लोगों के मन में बसे विश्वास, स्नेह और अपनत्व की झलक दिखाई देती है। इतना व्यापक कार्य करने के बाद भी पुरस्कार, प्रसिद्धि और पदों के प्रति उनमें कोई आकर्षण नहीं है। उनके लिए संघकार्य ही साधना है। इसलिए हजारों शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी और कार्यकर्ता विश्वासपूर्वक कहते हैं “कांबले सर हैं, तो समाधान अवश्य निकलेगा।” किंतु वे स्वयं सदैव इस बात पर बल देते हैं कि परिवर्तन किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि संगठित शक्ति से आता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गीत की पंक्तियाँ मानो उनके जीवन का परिचय देती हैं
“तन समर्पित, मन समर्पित, और यह जीवन समर्पित,
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।”
आज मेरा मित्र “विठ्ठल” समाजमन का “विठ्ठलराव” बन चुका है। यह सम्मान किसी पद, प्रतिष्ठा अथवा प्रसिद्धि का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयंसेवकत्व, सेवा, समरसता, संगठन, संस्कार और आत्मीयता की लंबी साधना का प्रतिफल है।
कबीर ने कहा है
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥”
किन्तु विठ्ठलराव का जीवन उस वटवृक्ष की भाँति है, जिसकी छाया में असंख्य कार्यकर्ताओं को विश्वास, मार्गदर्शन और आत्मीयता का संबल प्राप्त होता है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनके माध्यम से समाजजीवन में सेवा, राष्ट्रनिष्ठा और संगठन का यह दीपक निरंतर प्रज्वलित रहता रहे और आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देता रहे।
महाराष्ट्र के सभी आईटीआई के आधुनिकीकरण हेतु 5,400 करोड़ रुपए की घोषणा
सोलापुर । सोलापुर जिले के करमाला स्थित शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान का नाम परिवर्तित कर उसे ‘मदनदास देवी शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान’ नाम दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सह-सरकार्यवाह स्व. मदनदास देवी की राष्ट्रसेवा, शिक्षा तथा विद्यार्थियों के निर्माण में दिए गए योगदान के सम्मान में आयोजित नामकरण समारोह उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर, कौशल, रोजगार, उद्यमिता एवं नवाचार मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा, विधायक नारायण आबा पाटील, पूर्व विधायक राम सातपुते, करमाला नगराध्यक्ष श्रीमती मोहिनी सावंत, श्रीमती रश्मी बागल, व्यवसाय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संचालक सतीश सूर्यवंशी, सह-निदेशक चंद्रशेखर ढेकणे, सह-आयुक्त श्रीमती संगीता खंदारे, व्यवसाय शिक्षा एवं प्रशिक्षण अधिकारी मनोज बिडकर, संस्था प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जितेंद्र राठी, स्व. मदनदास देवी के ज्येष्ठ भ्राता खुशालदास देवी एवं राधेश्याम देवी, तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विभिन्न जनप्रतिनिधि, अधिकारी, शिक्षक, विद्यार्थी एवं नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का शुभकामना संदेश वीडियो के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। उन्होंने कहा कि स्व. मदनदास देवीजीने विद्यार्थियों में राष्ट्रभावना, शिक्षा के प्रति रुचि तथा समाजसेवा की प्रेरणा जागृत करने का उल्लेखनीय कार्य किया। उनके नाम पर संस्थान का नामकरण होने से भावी पीढ़ियों को उनके विचारों से प्रेरणा मिलती रहेगी, ऐसा विश्वास उन्होंने व्यक्त किया।
इस अवसर पर मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने घोषणा की कि राज्य की सभी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं के आधुनिकीकरण हेतु आगामी पाँच वर्षों में ₹5,400 करोड़ का निधि उपलब्ध कराया जाएगा। इसके माध्यम से आधुनिक आधारभूत सुविधाओं का विकास कर उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल आधारित एवं नवीन युग के पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाएंगे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि करमाला आईटीआई में एक वर्ष के भीतर छह नए पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाएंगे। साथ ही, टाटा समूह के सहयोग से राज्य की चयनित आईटीआई में आधुनिक तकनीकी शाखाएँ प्रारंभ करने की योजना शासन के विचाराधीन है तथा उस योजना में करमाला आईटीआई को शामिल करने के प्रयास किए जाएंगे। आगामी छह महीनों में राज्य की आईटीआई में नई तकनीकों पर आधारित पाठ्यक्रम चरणबद्ध तरीके से प्रारंभ करने का भी उन्होंने मानस व्यक्त किया।उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण कौशल शिक्षा उपलब्ध कराना शासन की प्राथमिकता है। कौशल विकास, प्रौद्योगिकी एवं उद्यमिता के माध्यम से युवाओं को रोजगार योग्य तथा रोजगार सृजक बनाने पर विशेष बल दिया जाएगा। स्व. मदनदास देवी के कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से कौशल, चरित्र और राष्ट्रभावना का समन्वय स्थापित कर समाज के प्रति योगदान देने का आह्वान किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान केवल व्यावसायिक शिक्षा देने वाले संस्थान न रहकर संस्कार, चरित्र, राष्ट्रनिष्ठा और कौशल का समन्वय स्थापित करने वाले केंद्र बनें। उन्होंने कहा कि स्व. मदनदास देवी ने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रकार्य और समाजकार्य के लिए समर्पित किया तथा विद्यार्थियों को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्रहित की भावना विकसित करनी चाहिए। इस अवसर पर उन्होंने स्व. मदनदास देवी के कार्यों से जुड़ी कुछ स्मृतियों को भी साझा किया।
मैनपुर में मनोकामनेश्वर महादेव मंदिर का संकल्प साकार, प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए डॉ. अनील काशी मुरारका

गाजीपुर। मुंबई के प्रख्यात समाजसेवी डॉ. अनील काशी मुरारका ने अप्रैल 2024 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद स्थित मैनपुर गांव में जिस शिव मंदिर का शिलान्यास किया था तथा मंदिर निर्माण के लिए मुरारका परिवार की तरफ से एक बड़ी धनराशि प्रदान की थी, वहां भव्य श्री मनोकामनेश्वर महादेव मंदिर बनकर तैयार हो गया इस मंदिर निर्माण में गांव के लोगों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा। डाक्टर मुरारका ने आज  पूरी श्रद्धा के साथ गांव वालों के बीच मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए। यही नहीं उन्होंने आगे भी यहां एक भव्य गणेश मंदिर बनवाने का वायदा किया। डॉ मुरारका ने मंदिर निर्माण के लिए सहयोग राशि अपनी मां मीनादेवी काशीप्रसाद मुरारका, बहन मनीषा मुरारका–रुईया एवं अपने पूर्वजों की पावन स्मृति में सीबी मुरारका चैरिटेबल ट्रस्ट मुंबई–लक्ष्मणगढ़ राजस्थान की तरफ से प्रदान किया। डॉ मुरारका को इस गांव तक लाने का पूरा श्रेय इसी गांव के मूल निवासी तथा मुंबई के स्वतंत्र पत्रकार राजहंस सिंह को जाता है। उन्हीं के विशेष अनुरोध पर डॉ मुरारका ने इस भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया था और आज मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के साथ उनका संकल्प पूरा हुआ। डॉ मुरारका के हाथों प्राण प्रतिष्ठा की धार्मिक रस्म में पूरी की गई। मंत्रोच्चार के बीच जिस समय वे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर रहे थे, बाहर खड़े हजारों लोग हर हर महादेव के जयकारे लगा रहे थे। पूरा मैनपुर गांव हर हर महादेव के नारों से गूंज उठा । मंदिर के निर्माण में गांव वालों का भी विशेष योगदान रहा। इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख लोगों में गीतकार राणा सिंह, सुनील कुमार सिंह (सुन्नु), कृष्ण अवतार गुप्ता , सुनील दुबे (सुडु बाबा ) जनार्दन सिंह ,सुभाष सिंह, राजेश सिंह, आलोक सिंह, राकेश सिंह, कन्हैया पासवान, रामविलास यादव , विशाल गुप्ता, सुरेंद्र यादव दिनेश बिन्द, गौरव कुमार सिंह, नागेश देवा, विकास सिंह, संजय सिंह आदि का समावेश रहा।
भारतीय जनभाषा प्रचार समिति की मासिक काव्यगोष्ठी संपन्न
ठाणे l साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था भारतीय जनभाषा प्रचार समिति ठाणे की मासिक काव्यगोष्ठी शनिवार 27 जून 2026 को मुन्ना विष्ट कार्यालय सिडको ठाणे में आयोजित किया गया।जिसकी अध्यक्षता संगीत साहित्य मंच के संस्थापक वरिष्ठ साहित्यकार रामजीत गुप्ता ने किया तथा मुख्य अतिथि के रूप में काव्य सृजन अध्यक्ष श्रीधर मिश्र आत्मिक एवं नरेन्द्र शर्मा खामोश उपस्थित थे। गोष्ठी का शुभारंभ अनिल कुमार राही के सरस्वती वंदना से हुआ।उपस्थित साहित्यकारों में डॉ शारदा प्रसाद दुबे,नरसिंह हैरान जौनपुरी, अनिल कुमार राही,शिवशंकर मिश्र,लालबहादुर यादव कमल, ओमप्रकाश तिवारी,नंदलाल क्षितिज,उमेश पाण्डेय,टी आर खुराना,अजय कुमार सिंह,डॉ वफ़ा वारसी, सुशील शुक्ला नाचीज़, ओमप्रकाश सिंह, विनय शर्मा दीप,त्रिलोचन सिंह अरोरा,विनय सिंह विनम्र रहे। उपस्थित सभी साहित्यकारों ने खूबसूरत काव्य पाठ से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।मंच का संचालन संस्था अध्यक्ष विनय सिंह विनम्र ने किया। मिडिया सचिव विनय शर्मा दीप ने बताया कि उक्त गोष्ठी का आयोजन चेयरमैन रामप्यारे सिंह रघुवंशी के दिशा निर्देशन में किया गया।उपस्थित मंचस्थ अतिथि साहित्यकारों को अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया।अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन पश्चात राष्ट्रगान के साथ गोष्ठी का समापन किया गया।
हिंदी प्रचार एवं शोध संस्था, मुंबई की 261वीं मासिक साहित्यिक गोष्ठी संपन्न
मुंबई। हिंदी प्रचार एवं शोध संस्था, मुंबई द्वारा 261वीं मासिक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन न्यू सी व्यू, न्यू रविराज कॉम्प्लेक्स, जेसल पार्क, भाईंदर (पूर्व) में संपन्न हुआ।गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुधाकर मिश्र ने की। मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. कृपाशंकर मिश्र तथा विशिष्ट अतिथि एवं संयोग साहित्य पत्रिका के संपादक मुरलीधर पाण्डेय उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन संस्था के महासचिव डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल ने किया।अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सुधाकर मिश्र ने सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए साहित्य की सामाजिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपना गीत सुनाते हुए कहा कि "आ रहे दिन त्रासदी के, छा रहा थक्का अंधेरा, सत्य भाषिक धूप-सी मोहक…"। उनके गीत ने वर्तमान समय की विसंगतियों के बीच सत्य और आशा का संदेश दिया।मुख्य अतिथि डॉ. कृपाशंकर मिश्र ने अपने गीतों के माध्यम से ग्राम्य जीवन की स्मृतियों को जीवंत करते हुए कहा— "आइए गाँव की बातें करते हैं", "शहर का हो के भी शहर का हो नहीं पाया", "चलो हम ढूँढ़ लाएँ फिर उस गुज़रे ज़माने को।" उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावुक कर दिया।विशिष्ट अतिथि मुरलीधर पाण्डेय ने अपनी संवेदनशील रचना "ये ज़िंदगी कुछ बोलती नहीं" का पाठ कर जीवन के मौन सत्य को अभिव्यक्ति दी। प्रख्यात ग़ज़लकार डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल ने अपनी सशक्त ग़ज़लों से खूब वाहवाही बटोरी। उन्होंने पढ़ा "चिता की आग में जलते हुए मंजर देखे, हमने मिट्टी के खुदाओं के मुकद्दर देखे।" एक अन्य शेर में उन्होंने सामाजिक मूल्यों की रक्षा का संदेश देते हुए कहा "ज़मीर बेचकर दुकान-मकान मत करना, तुम दागदार अपना खानदान मत करना।" वहीं उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कहा— "रोज़ छत की दरकनों को देखता हूँ ख़ौफ़ से, अब भरोसा भी नहीं बाकी किसी शहतीर में।"शिव प्रसाद जमदग्निपुरी ने सामाजिक चेतना से ओतप्रोत रचनाएँ प्रस्तुत करते हुए कहा— "दबी हुई आग को भड़काइए मत" तथा "यही पिलाते हैं दूध विषधर को दिन-रात।"अरुण दुबे ने मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते हुए गीत प्रस्तुत किया— "जाने कैसे बने दरिंदे आज के इंसानों में।" डॉ. ओमप्रकाश तिवारी ने अपनी मार्मिक रचनाओं "धूम्र, तुम कितने प्रिय थे इस धरती पर" तथा "मैया, अब आसन कहाँ लगाऊँ" का पाठ किया।डॉ. प्रमोद पल्लवित ने "पाप-पुण्य का लेखा-जोखा", "देख रहा हूँ एकटक उसकी ओर" तथा "मेरी तक़दीर में तुम रहो न रहो, मेरे जज़्बात…" जैसी रचनाओं से श्रोताओं को भाव-विभोर किया।
विमलेश झा ने समसामयिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि "लोभ-लालच बढ़ रहा इंसान में" तथा "कहीं न जान ले ले अधम यह आपकी चुप्पी।" उपेन्द्र पाण्डेय ने आध्यात्मिक भावभूमि पर आधारित रचनाओं का पाठ किया "जहाँ में कोई आता है, जहाँ से कोई जाता है" तथा "यह सृष्टि रुक नहीं सकती, प्रभु इसको चलाता है।" अजीत सिंह ने मानवीय मूल्यों के ह्रास पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा "मानव पतित आज बन गया, न इसमें मानवता है।"डॉ. अशोक पाण्डेय ने अपनी प्रेरणादायी रचनाओं "हम पत्थर पर फूल खिलाते हैं" तथा "लोरी के गीत सुनाती थी" का पाठ कर खूब सराहना प्राप्त की। माता कृपाल उपाध्याय ने समसामयिक राजनीतिक परिवेश पर व्यंग्य करते हुए अपनी रचना "ग्राम पंचायत का चुनाव, तनाव सारे यूपी में" सुनाई। गोष्ठी का शुभारंभ उपेन्द्र पाण्डेय द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। अंत में उन्होंने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। गोष्ठी का समापन सौहार्दपूर्ण एवं साहित्यिक वातावरण में हुआ।
हस्ताक्षरम् की मासिक काव्य गोष्ठी कांदिवली में सम्पन्न
मुंबई । साहित्यिक व सामाजिक संस्था  हस्ताक्षरम की मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन कांदिवली पूर्व के ठाकुर कांप्लेक्स स्थित एवान सोसाइटी में आमंत्रित कवियों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। गोष्ठी की अध्यक्षता संस्था के वरिष्ठ सलाहकार अमरनाथ द्विवेदी व संचालन की जिम्मेदारी डाॅ. मृदुल 'महक' व अल्हड़ असरदार ने संयुक्त रूप से वहन किया। मुख्य अतिथि के रूप में गाजियाबाद के वरिष्ठ सायर नरेंद्र शर्मा 'खामोश' उपस्थित रहे।पश्चिम रेल्वे में सेवारत साहित्यकार कवि विनोद शुक्ला ने सरस्वती वंदना कर गोष्ठी का आरंभ किया। ओमप्रकाश तिवारी, अरूण दुबे, आनंद पाण्डेय 'केवल' , अर्चना झा, हिरालाल यादव, कल्पेश यादव, सारिका सिंह, डॉ. मृदुल 'महक', वाचस्पति तिवारी, नरेंद्र शर्मा 'खामोश', अल्हड़ असरदार एवं अमरनाथ द्विवेदी ने क्रमशः अपनी अपनी कविताओं, गीतों व गजलों का पाठन किया। समसामयिक विषयों पर काव्यात्मक टिप्पणियां हुई, सामाजिक व पारिवारिक विषयों पर मंथन के साथ साथ राजनीतिक विषयों पर भी रचनाएं पढ़ी गई। हास्य व्यंग, श्रृंगार के साथ ही वीर रस से परिपूर्ण कविताएं पढ़ी व सुनी गई। गोष्ठी के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले पंकज सिंह व सारिका सिंह ने सभी का यथोचित स्वागत व धन्यवाद ज्ञापित किया। स्वादिष्ट अल्पाहार व चाय के साथ गोष्ठी का समापन हुआ।
अपनों की बात आखिर सबसे अंत में क्यों?
–डॉ मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा वरिष्ठ साहित्यकार

कुछ दिन पहले मैं अचानक अपनी एक प्रिय सखी के घर मिलने चली गई। हम दोनों परिवार वर्षों से एक-दूसरे को जानते हैं, इसलिए औपचारिकता का प्रश्न ही नहीं था।

मैंने देखा कि वह और उनके पति किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। मेरी सखी कोई बात कहती और उनके पति तुरंत उसकी बात काट देते। उसकी लगभग हर राय का विरोध हो रहा था। कुछ देर तक उसने धैर्य रखा, फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ, लेकिन भीतर से आहत होकर बोली

"आपको जो ठीक लगे, वही कर लीजिए। मेरा काम था समझाना, मैंने समझा दिया।"

उसके शब्दों में शिकायत कम और हार अधिक थी।

उस दिन घर से लौटते समय मन में एक ही प्रश्न बार-बार उठता रहा :
आख़िर ऐसा क्यों होता है कि जिन लोगों को हम सबसे अधिक अपना मानते हैं, उनकी बात ही सबसे अंत में सुनते हैं?

पति-पत्नी हों, माता-पिता हों, भाई-बहन हों या परिवार का कोई अन्य सदस्य—जब वे हमें कोई सलाह देते हैं, तो हम उसमें कमियाँ खोजने लगते हैं। लेकिन वही बात यदि कोई मित्र, पड़ोसी या बाहरी व्यक्ति कह दे, तो वह हमें बहुत समझदारी भरी लगने लगती है।

क्या इसलिए कि अपने लोग हमेशा हमारे साथ रहते हैं और हम उन्हें "टेकन फॉर ग्रांटेड" लेने लगते हैं?

सच तो यह हैं कि दुनिया में सबसे निस्वार्थ सलाह वही देता है, जिसका दिल हमारे लिए धड़कता है। बाहर वाले सलाह तो दे सकते हैं, लेकिन उसके परिणामों की जिम्मेदारी नहीं उठाते। यदि बात गलत हो जाए तो सहज कह देंगे—"हमने तो सिर्फ राय दी थी, मानना या न मानना आपका निर्णय था।"

लेकिन परिवार का सदस्य ऐसा नहीं कह सकता, क्योंकि उसका सुख-दुःख हमारे जीवन से जुड़ा होता है।

सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब हम दूसरों के सामने अपने ही जीवनसाथी की बात काट देते हैं, उसकी राय को महत्व नहीं देते या उसका मज़ाक बना देते हैं। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि शब्दों के घाव दिखाई नहीं देते, लेकिन वे बहुत गहरे होते हैं।

बाहर बैठे लोग भले मुस्कुरा दें, लेकिन मन ही मन यही सोचते हैं—"जो एक-दूसरे का सम्मान नहीं कर सकते, वे साथ कैसे निभाएँगे?"

इसके विपरीत कुछ घर ऐसे भी होते हैं, जहाँ पति-पत्नी बिना अधिक शब्दों के भी एक-दूसरे का मन समझ लेते हैं। वे जानते हैं कि हर बार मैं ही सही नहीं हो सकता। वे एक-दूसरे को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं, एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं। यही परिपक्वता रिश्तों को मजबूत बनाती है।

हर इंसान चाहता हैं कि उसकी बात सुनी जाए, उसकी राय का सम्मान हो, उसके योगदान की कद्र हो। विशेषकर उस घर में, जिसके लिए उसने अपना समय, श्रम, प्रेम और पूरा जीवन समर्पित कर दिया हो।

जब किसी को बार-बार यह महसूस कराया जाता है कि उसकी बात का कोई मूल्य नहीं है, उसकी राय का कोई महत्व नहीं है, तब वह धीरे-धीरे भीतर से टूटने लगता है। उपेक्षा का दर्द दिखाई नहीं देता, लेकिन यह इंसान को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। कई बार यही उपेक्षा उसे अवसाद और निराशा की ओर भी धकेल देती है।

आज एक और समस्या तेजी से बढ़ रही है—"टेकन फॉर ग्रांटेड"।

घर का जो सदस्य सबसे अधिक करता है, उसी से सबसे अधिक अपेक्षाएँ रखी जाती हैं। चाहे माता-पिता हों, बड़े भाई-भाभी हों, जेठ-जेठानी हों या पति-पत्नी—जो जिम्मेदार होता है, उससे सबको उम्मीद रहती हैं कि वह करता ही रहेगा। लेकिन उसके लिए हम क्या कर सकते हैं, यह सोचने का समय बहुत कम लोग निकालते हैं।

रिश्ते केवल लेने से नहीं चलते, देने से भी चलते हैं। सम्मान केवल पाने की चीज़ नहीं, देने की आदत भी है।

आजकल कुछ लोग बाहर की दुनिया में आदर्श पति-पत्नी होने का ऐसा प्रदर्शन करते हैं कि लगता है उनसे अधिक प्रेम करने वाला कोई नहीं। लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर वही रिश्ता तानों, कटु शब्दों और अपमान से भर जाता है। सुबह की चाय के साथ कभी पत्नी की आँखों से आँसू बहते हैं, तो कभी पति चुपचाप अपनी पीड़ा भीतर ही दबा लेता है।

यदि सचमुच एक सुखी परिवार बनाना है, तो सबसे पहले बाहर वालों से अधिक अपने जीवनसाथी को महत्व देना होगा। क्योंकि अंत में जीवन की हर कठिन राह पर साथ मित्र नहीं, समाज नहीं, बल्कि पति-पत्नी ही निभाते हैं। बच्चे भी एक दिन अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं, लेकिन जीवनसाथी का साथ जीवन के अंतिम पड़ाव तक बना रहता है।

मुझे अपना बचपन याद आता है।

मैंने अपने माता-पिता को कभी हमारे सामने एक-दूसरे का अपमान करते नहीं देखा। मतभेद अवश्य होते होंगे, लेकिन मनभेद कभी नहीं देखा , उन्होंने अपने मतभेद को कभी बच्चों के सामने तमाशा नहीं बनने दिया। यदि किसी से भूल हो जाती, तो "सॉरी" कहने में किसी का अहंकार आड़े नहीं आता था।

शायद यही कारण था कि हमारा बचपन इतना तनावमुक्त और सुखद था। संयुक्त परिवार में रहते हुए हमें हर ओर अपनापन, सुरक्षा और स्नेह का अनुभव होता था। ऐसा लगता था कि पूरा परिवार हमारी ताकत है, हमारी ढाल है।

आज भी मन कहता है—काश! हर घर में फिर वही अपनापन लौट आए। चाहे संयुक्त परिवार हो या एकल परिवार, यदि संवाद रहेगा, सम्मान रहेगा, संवेदनशीलता रहेगी, तो हर घर फिर से मुस्कुराने लगेगा।

याद रखिए :
रिश्तों को सबसे अधिक प्रेम नहीं, सम्मान जीवित रखता है।
जिस दिन हम बाहर वालों से पहले अपनों की बात सुनना सीख जाएँगे, उसी दिन हमारे घरों की आधी समस्याएँ अपने आप समाप्त हो जाएँगी।

क्योंकि जो व्यक्ति आपके सुख-दुःख में आपके साथ खड़ा रहता है, उसकी सलाह केवल शब्द नहीं होती, उसमें उसका प्रेम, अनुभव और आपका भविष्य छिपा होता है। इसलिए अपनों की बात को सबसे अंत में नहीं, सबसे पहले सुनिए। वहीं से रिश्तों की मिठास और जीवन की सच्ची खुशियाँ शुरू होती हैं।

अपनों की बातों में अनुभव का सार होता है,
हर शब्द में छिपा सच्चा प्यार होता है।
जो बाहर वालों की आवाज़ में अपने खो देते हैं,
अक्सर वे रिश्तों का सबसे अनमोल उपहार खो देते हैं।

रिश्ते तब नहीं टूटते जब मतभेद होते हैं,
रिश्ते तब टूटते हैं जब सम्मान समाप्त हो जाता है।
इसलिए अपनों की बात सुनिए, समझिए और उन्हें महसूस कराइए—
कि वे केवल आपके परिवार का हिस्सा नहीं,
आपके जीवन का सबसे बड़ा सहारा हैं।
आदर्श शिक्षक गामा प्रसाद रजक का सेवानिवृत्त सम्मान समारोह संपन्न
मुंबई। पहले निजी विद्यालय और बाद में समायोजन के बाद मुंबई महानगरपालिका शिक्षण विभाग में शिक्षक के रूप में कार्यरत गामा प्रसाद रजक का सेवानिवृत्त सम्मान समारोह 28 जून को भरुचा रोड हिंदी  स्कूल,दहिसर पूर्व के सभागार कक्ष में आयोजित किया गया, जिसमें भारी संख्या में उपस्थित लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता संत श्री राम कुमार चौरसिया गुरुजी ने की। सम्मानित अतिथि के रूप में मुख्याध्यापिका संगीता तिवारी, पूर्व नगरसेवक कमलेश यादव प्रिंसिपल रमाकांत सरोज, प्रबंधक शिवपूजन यादव, मुख्याध्यापक बागुल सर, शरद सर, मुख्याध्यापिका ज्योति शर्मा, पूर्व मुख्याध्यापक अशोक सिंह, दशरथ कनौजिया सिकंदर कनौजिया जगदीश कनौजिया उपस्थित रहे। गामा प्रसाद रजक के बड़े भाई श्रीराम रजक, दयाराम रजक और भाभी निर्मला अनीता भी मंच पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन कौशलेंद्र सिंह ने किया। कार्यक्रम का आयोजन भरूचा रोड हिंदी शाला क्रमांक 1 की तरफ से किया गया। इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख लोगों में लालजी, जितेंद्र, मोतीलाल, ईश्वरलाल, नागेंद्र ,राजकुमार, राजाराम, राम आत्मा, अशोक, नीरज सिंह, पुरेंद्र कुमार ,हरिओम, शिवधनी,सती राम,,समशेर सिंह छविनाथ रजक, विजय धोबी, विजय रजक, संजय, विनोद, योगेश जियालाल, पुष्पा, हरिओम, राहुल, सुरेश, धीरेन्द्र, विनोद यादव,भरुचा रोड़ हिंदी स्कूल के सभी शिक्षक शिक्षिकाएं और सामाजिक साथी इत्यादि का समावेश रहा।
संदीप तिवारी, मीरा भायंदर उत्तर भारतीय समाज का ताकतवर चेहरा : प्रताप सरनाईक
भायंदर। संदीप तिवारी मीरा भायंदर उत्तर भारतीय समाज का ताकतवर चेहरा हैं। उनके शिवसेना में शामिल होने से न सिर्फ शिवसेना की ताकत बढ़ेगी अपितु उत्तर भारतीय समाज और शिवसेना के बीच और मजबूत संबंध कायम होगा। मीरा रोड स्थित शिवसेना कार्यालय में सैकड़ो समर्थकों के साथ उत्तर भारतीय युवा नेता संदीप तिवारी के शिवसेना में शामिल होने के बाद उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने उपरोक्त बातें कही। उन्होंने कहा कि संदीप तिवारी की सामाजिक ताकत और युवाओं पर उनके प्रभाव को देखते हुए जल्द ही इन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। शिवसेना विधानसभा प्रमुख विक्रम प्रताप सिंह ने कहा कि जनता के बीच संदीप की अच्छी लोकप्रियता है। समाज सेवा के माध्यम से हमेशा लोगों के बीच विद्यमान रहते हैं। उन्होंने कहा कि यह संदीप की घर वापसी है और यह उनके जीवन की यादगार राजनीतिक पारी होगी। जिला प्रमुख राजू भोईर ने कहा कि संदीप तिवारी ऊर्जावान और प्रभावशाली युवा नेता है। राजनीतिक परिवार से हैं। उत्तर भारतीय समाज को इनसे बड़ी आशाएं हैं। नवीन सिंह, पूर्व नगरसेवक विजय राय,गुड्डू तिवारी और राजेश यादव ने भी उनके शिवसेना प्रवेश का स्वागत करते हुए कहा कि संदीप तिवारी को सही राजनीतिक प्लेटफार्म मिल गया है। देखा जाए तो संदीप तिवारी ने अपनी राजनीतिक शुरुआत शिवसेना से ही की थी। उनके चाचा रविंद्र नाथ तिवारी भाजपा के विधायक रहे हैं,बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए और महानगरपालिका चुनाव में प्रभाग क्रमांक 10 से चुनाव लड़ने की तैयारी की। परंतु अंतिम क्षणों में जब भाजपा ने उन्हें टिकट देने से मना कर दिया तो उन्होंने मातोश्री जाकर शिवसेना यूबीटी ज्वाइन कर ली। शिवसेना ने उन्हें प्रभाग क्रमांक 10 से अपना प्रत्याशी बनाया, परंतु चुनाव में पराजित हो गए। इस बारे में पत्रकारों से बात करते हुए संदीप तिवारी ने कहा कि मीरा भायंदर में यूबीटी का प्रभाव बहुत कमजोर है। महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक द्वारा किए जा रहे लोकगीत कार्यों का जनता पर अच्छा प्रभाव है। यही कारण है कि उन्होंने अपने सैकड़ो समर्थकों के साथ शिवसेना ज्वाइन किया। उन्होंने कहा कि मीरा भायंदर में शिवसेना को सबसे ताकतवर पार्टी बनाने की दिशा में कैबिनेट मंत्री प्रताप सरनाईक के मार्गदर्शन में पूरी ताकत के साथ काम करेंगे।
मुनाफे के लिए बीएमसी हमारे बच्चों के सपनों को कुचल नहीं सकती : वर्षा गायकवाड
मुंबई। मुंबई फुटबॉल एसोसिएशन ने शनिवार को नेविल डिसूज़ा फुटबॉल ग्राउंड पर बीएमसी के कन्वेंशन सेंटर प्लान के खिलाफ जोरदार लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और चेतावनी दी कि योजना तुरंत रद्द की जाए। सैकड़ों खिलाड़ी, अभिभावक, कोच और स्थानीय निवासी "LET KIDS PLAY, LET FOOTBALL STAY" के बैनर लेकर मैदान पर जुटे। सांसद श्रीमती वर्षा गायकवाड़ ने बीएमसी पर कड़ा हमला बोलते हुए कहां किआप मुनाफे के लिए हमारे बच्चों के सपनों को नहीं कुचल सकते। अगर बीएमसी को लगता है कि वह बांद्रा के युवाओं से ये मैदान छीन लेगी, तो वह गलतफहमी में है। हम सड़कों पर भी लड़ेंगे और संसद में भी। ये मैदान यहीं रहेगा। सामाजिक कार्यकर्ता निखिल रुपारेल ने भी कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि ये विकास नहीं, विनाश है। बीएमसी हजारों बच्चों का इकलौता खेल का मैदान छीनने की कोशिश कर रही है। अगर ये प्लान वापस नहीं लिया गया तो बांद्रा चुप नहीं बैठेगा। मैदान छीनने की हर कोशिश को हम रोक देंगे। एमएफए और बांद्रा के निवासियों ने बीएमसी को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि प्रस्ताव रद्द किया जाए और मैदान को स्थायी रूप से खेल के लिए आरक्षित रखा जाए। अभिभावकों ने चेतावनी दी कि अगर प्रशासन ने जवाब नहीं दिया तो आंदोलन और तेज होगा।