शशि थरूर ने फिर किया सरकार का समर्थन, बोले- ईरान-इजरायल युद्ध पर चुप्पी कायरता नहीं रणनीति
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पश्चिम एशिया में जंग को लेकर भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध पर भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार की चुप्पी पर नैतिक कायरता का आरोप लग रहा है। इस बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से पैदा हुए संकट पर भारत सरकार के स्टैंड का खुलकर समर्थन किया है।
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कांग्रेस के भीतर ही अलग-अलग राय
अमेरिका और इजरायल ने जबसे ईरान पर अटैक किया है, भारत सरकार पर भी देश में “सियासी हमले” हो रहे हैं। सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की एयर स्ट्राइक में मौत की निंदा न करने पर सरकार पर खूब खरी-खोटी सुनाई थी। उन्होंने ईरान की संप्रभुता को तार-तार करने के मामले में भारत की चुप्पी पर भी गंभीर सवाल उठाए थे। हालांकि, अब कांग्रेस पार्टी के ही सांसद शशि थरूर ने सरकार के रुख का बचाव करते हुए इसे जिम्मेदार कूटनीति बताया है।
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भारतीय नीति पर सवाल खड़े करने वालों को दिखाया आईना
केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद और संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनियक शशि थरूर ने एक लेख लिखकर उन्होंने मोदी सरकार पर सवाल उठाने वालों को जमीनी हालात और राष्ट्रहित में अपनी गई रणनीति के बारे में समझाने की कोशिश की है। उनका यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है। थरूर का कहना है कि वेस्ट एशिया में छिड़ी जंग पर भारत की चुप्पी किसी भी तरह से मोरल सरेंडर यानी नैतिक आत्मसमर्पण नहीं है। कांग्रेस सांसद का कहना है कि भारत का साइलेंस एक रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट (सोची-समझी और जिम्मेदार कूटनीति) है।
हर स्थिति में सार्वजनिक निंदा ही एकमात्र विकल्प नहीं-थरूर
थरूर ने स्पष्ट किया कि वे खुद मानते हैं कि अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ किया गया सैन्य अभियान अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है। यह संप्रभुता, आक्रामकता-विरोध और शांतिपूर्ण समाधान जैसे उन सिद्धांतों के खिलाफ है, जिनका भारत ऐतिहासिक रूप से समर्थन करता रहा है। इसके बावजूद उन्होंने सरकार की आलोचना करने से इनकार करते हुए कहा कि हर स्थिति में सार्वजनिक निंदा ही एकमात्र विकल्प नहीं होती। उन्होंने कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हित, रणनीतिक साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए संतुलित रुख अपनाना होता है। थरूर के मुताबिक, सरकार की चुप्पी कायरता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है, और कई बार बिना बयान दिए भी कूटनीतिक रास्ते खुले रखे जा सकते हैं।
सरकार की चुप्पी की निंदा नहीं
थरूर के मुताबिक उनके जैसे जिन लोगों ने पश्चिम एशिया युद्ध पर सरकार की चुप्पी की निंदा नहीं की, लिबरल्स उन्हीं पर निशाना साधने लगे हैं। वे इसे नैतिक कायरता कह रहे हैं। वे हमसे चाहते हैं कि हम यह मांग करें कि भारत नैतिक श्रेष्ठता दिखाते हुए युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन घोषित करे। लेकिन, मैं इस संघर्ष पर सरकार की चुप्पी की निंदा नहीं करूंगा।
लाखों भारतीयों के हितों पर होने वाले असर की दिलाई याद
थरूर ने यह भी कहा कि भारत के पश्चिम एशिया में बड़े हित जुड़े हैं करीब 200 अरब डॉलर का व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और लगभग 90 लाख भारतीयों की मौजूदगी, ऐसे में किसी भी कड़े सार्वजनिक बयान से इन हितों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने अमेरिका के साथ भारत के रक्षा और तकनीकी संबंधों का भी जिक्र करते हुए कहा कि नैतिक भाषण देकर इन संबंधों को खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी।
राष्ट्रीय हितों की रक्षा का व्यावहारिक तरीका-थरूर
जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति का हवाला देते हुए थरूर ने कहा कि यह नैतिक रुख से दूरी नहीं, बल्कि शीत युद्ध के दौरान राष्ट्रीय हितों की रक्षा का व्यावहारिक तरीका था। आज के बहुध्रुवीय विश्व में भारत मल्टी-अलाइनमेंट की नीति पर चल रहा है, जहां वह अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने हितों को प्राथमिकता देता है।
सोवियत संघ के समय अपनाए गए रणनीति का उदाहरण
थरूर ने आलोचकों पर निशाना साधते हुए कहा कि वे यह भूल जाते हैं कि भारत ने अतीत में भी कई बार राष्ट्रीय हितों के चलते चुप्पी साधी है। इसके लिए उन्होंने सोवियत संघ के द्वारा हंगरी (1956), चेकोस्लोवाकिया (1968) और अफगानिस्तान (1979) में किए गए अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघनों का उदाहरण दिया है, जिसकी निंदा करने में हमने बचने की कोशिश की। क्योंकि, मास्को के साथ अपने रिश्तों को हम खतरे में डालने का जोखिम नहीं ले सकते थे।
सोनिया गांधी ने की थी भारत सरकार की तीखी आलोचना
बता दें कि इसी समाचारपत्र में कुछ दिनों पहले सोनया गांधी ने लेख लिखकर सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरान की संप्रभुता पर आक्रमण की खुले शब्दों में निंदा न करने के लिए भारत सरकार की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि ईरान के शीर्ष नेता की हत्या जैसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भारत का मौन रहना तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाएं वैश्विक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए गंभीर चुनौती हैं और भारत जैसे देश को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।





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1 hour and 20 min ago
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