पेशवा वंशज की मौजूदगी में लखनऊ में हुआ डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के दो पुस्तकों का लोकार्पण
संजीव सिंह बलिया। जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार, चिंतक एवं 25 ग्रंथों के रचनाकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों के लखनऊ में हुए भव्य लोकार्पण से बलिया के बुद्धिजीवी एवं साहित्यिक वर्ग में हर्ष का माहौल है। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग में आयोजित समारोह में उनकी कृतियों ‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ का लोकार्पण हुआ। समारोह में देश के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों, विद्वानों और गणमान्य लोगों ने डॉ. उपाध्याय की लेखकीय उपलब्धि की सराहना करते हुए उन्हें बधाई दी। विशेष रूप से पेशवा बाजीराव के वंशज एवं समारोह के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने ‘संक्रान्ति का संहार’ की सराहना करते हुए कहा कि डॉ. उपाध्याय ने इतिहास के महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। उन्होंने कहा कि साहित्यकार जब ऐतिहासिक पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने प्रस्तुत करता है तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करता है। उन्होंने पेशवा परंपरा और अपने पूर्वजों से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को साहित्य के माध्यम से सामने लाने के लिए डॉ. उपाध्याय के प्रति आभार व्यक्त किया। मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. उपाध्याय की ऐतिहासिक लेखन-दृष्टि और शोधपरक साधना की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों का संकलन नहीं, बल्कि स्रोतों की पड़ताल, पात्रों की मानसिकता को समझने और तत्कालीन परिवेश के पुनर्निर्माण की कठिन प्रक्रिया है। ‘संक्रान्ति का संहार’ में यह अध्ययनशीलता और शोध-दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने डॉ. उपाध्याय की लेखकीय यात्रा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा से जोड़ते हुए कहा कि इतिहास को शोध, कथात्मकता और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की परंपरा को डॉ. उपाध्याय अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने ‘संक्रान्ति का संहार’ को पानीपत के तृतीय युद्ध की मात्र ऐतिहासिक गाथा न मानकर इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन बताया। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के गुमनाम नायकों का प्रतीक बताते हुए कहा कि कृति में सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए त्याग एवं बलिदान का संदेश उभरता है। पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच वैचारिक सेतु बताया। वहीं डॉ. नरेन्द्र भूषण ने हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी को व्यवहार और लेखन में प्राथमिकता देने का आह्वान किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता निर्भय नारायण तथा संचालन डॉ. ममता पंकज ने किया। डॉ. उपाध्याय की इस उपलब्धि पर जनपद के साहित्यिक एवं बौद्धिक वर्ग ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी है। साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि बलिया की धरती की साहित्यिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में डॉ. उपाध्याय की निरंतर सक्रियता महत्वपूर्ण है। दो नई कृतियों का राजधानी लखनऊ में प्रतिष्ठित मंच पर लोकार्पण होना जनपद के लिए भी गौरव का विषय है। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की इस उपलब्धि पर डॉ जनार्दन राय, डॉ गणेश पाठक, डॉ अशोक सिंह, डॉ मनोज कुमार, राधेश्याम यादव, संतोष कुमार वर्मा, अवध बिहारी मितवा, तारकेश्वर मिश्र राही, तेजन सिंह यादव, अजय पांडेय, बड़ेलाल यादव, वीरेंद्र प्रताप यादव, अशोक कन्नौजिया, सत्येंद्र कुमार राजभर, मुकेश चंचल आदि ने बधाई देते हुए कहा कि इतिहास, भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा को साहित्य के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाने का उनका प्रयास सराहनीय है। उन्होंने दोनों कृतियों के व्यापक पाठकीय स्वीकार और उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य की कामना की। बताते चलें कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय बलिया के बहुआयामी साहित्यकार एवं चिंतक हैं और अब तक 25 ग्रंथों की रचना कर चुके हैं। उनकी रचनाओं में इतिहास, दर्शन, भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कृति और समकालीन सामाजिक सरोकारों के विविध पक्षों का समावेश दिखाई देता है
7 hours ago
- Whatsapp
- Facebook
- Linkedin
- Google Plus
2- Whatsapp
- Facebook
- Linkedin
- Google Plus
5.1k