नेतन्याहू की बढ़ेगी टेंशन! ईरानी विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस से की मुलाकात

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इजराइल 1 अक्टूबर को हुए ईरानी हमले के पलटवार की तैयारी कर रहा है। ईरान पर किस तरह का हमला हो, ये तय करने के लिए नेतन्याहू की कैबिनेट में वोटिंग होगी। इससे पहले इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बुधवार शाम अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से फोन पर बातचीत की। ईरान पर इजराइली हमले की आशंका के बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की। ये मुलाकात बुधवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हुई।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इजराइल के खिलाफ नया मोर्चा बनाने में जुटे हैं।इसके लिए वह इन दिनों क्षेत्र के खाड़ी अरब देशों के दौरे पर हैं। सऊदी अरब को इजराइल का दोस्त माना जाता है। लेकिन हाल ही में सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने गाजा के मसले पर इजराइल को दो टूक कह दिया था कि आजाद फिलिस्तीन के बिना वो इजराइल को मान्यता नहीं देंगे। सऊदी अरब के इस रुख से ईरान की उम्मीदें बढ़ गईं हैं। लिहाजा वह अब इजराइल के खिलाफ सऊदी अरब को साधने की कोशिश में जुटा है।

इसी क्रम में ईरानी विदेश मंत्री अराघची सऊदी अरब पहुंचे और प्रिंस से मुलाकात की। सऊदी अरब के स्टेट मीडिया के मुताबिक इस बैठक के दौरान दोनों ने मिडिल-ईस्ट में बने हालातों पर चर्चा की है। ईरानी विदेश मंत्री ने सऊदी अरब में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के अलावा अपने समकक्ष प्रिंस फैजल बिन फरहान से भी मुलाकात की है। बुधवार को हुई इस मुलाकात में द्विपक्षीय संबंधों और कई क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाने पर चर्चा हुई है।

सऊदी प्रेस एजेंसी के मुताबिक दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच क्षेत्र के ताजा हालात पर भी चर्चा हुई है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर पोस्ट कर लिखा है कि, ‘विदेश मंत्री के दौरे का मकसद क्षेत्र में यहूदी प्रशासन के नरसंहार और आक्रामकता को रोकना, साथ ही गाजा और लेबनान में हमाई भाइयों और बहनों के दर्द और पीड़ा को खत्म करना है।

बता दें कि एक अक्टूबर को ईरान ने इजराइल पर करीब 200 बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया था, ईरान का कहना है कि उसने इस्माइल हानिया, हसन नसरल्लाह और आईआरजीसी के कमांडर निलफोरूशन की मौत का बदला लेने के लिए ये हमला किया था। वहीं अब इजराइल भी ईरान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। इस हालात में ईरान-इजराइल के बीच युद्ध होता है तो क्षेत्र में मौजूद तमाम मुस्लिम देशों की भूमिका बेहद अहम होगी। हालांकि सऊदी अरब, जॉर्डन और इजिप्ट जैसे देश अब तक इस तनाव में तटस्थ नजर आए हैं।

हरियाणा में एमपी-राजस्थान की तरह होंगे 2 डिप्टी सीएम! सैनी कैबिनेट में ये चेहरे हो सकते हैं शामिल

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हरियाणा चुनाव के परिणाम आने के बाद सरकार गठन की कवायद शुरू हो गई हैं। हरियाणा विधानसभा चुनाव के रिजल्ट के बाद बाद प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। कहा जा रहा है कि विजयदशमी के दिन नई सरकार का शपथग्रहण हो सकता है।चर्चाएं हैं कि हरियाणा में भाजपा दो डिप्टी सीएम बना सकती है। इसमें एक दलित तो दूसरा यादव समाज से हो सकता है।

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चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर बीजेपी ने कुछ भी नहीं कहा है, लेकिन पार्टी के बड़े नेता पहले ही नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री का चेहरा बता चुके हैं। हरियाणा के चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान तो साफ-साफ कह चुके हैं कि सरकार आने पर सैनी ही मुख्यमंत्री बनेंगे। ऐसे में कहा जा रहा है कि सैनी ही हरियाणा के नए मुख्यमंत्री हो सकते हैं। जल्द ही पार्टी की तरफ से इसकी आधिकारिक घोषणा को लेकर प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

हरियाणा सरकार में मुख्यमंत्री सहित कुल 14 मंत्री हो सकते हैं। पिछली सरकार के 8 मंत्री चुनाव हार चुके हैं। 3 मंत्रियों के टिकट काटे गए थे। सिर्फ 2 मंत्री चुनाव जीतने में सफल रहे हैं। इसका मतलब है कि भाजपा को 11 नए चेहरों की तलाश करनी होगी। अनिल विज वो सीनियर नेता हैं जिन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी है। अनिल विज को मंत्री पद मिल सकता है। बीजेपी जाटों, ब्राह्मणों, पंजाबी और दलितों सहित राज्य की विभिन्न जातियों को ध्यान में रखकर कैबिनेट का गठन करेगी।

बीजेपी के पक्ष में दलित, अहीर, गुर्जर और अन्य गैर-जाट ओबीसी के साथ ब्राह्मण और राजपूतों ने भी जमकर मतदान किया है। ऐसे में सरकार में इन जातियों का सियासी दबदबा दिख सकता है। बीजेपी के पास अब दलित समुदाय से नौ विधायक हैं, आठ पंजाबी मूल के, सात ब्राह्मण और जाटों और यादवों में से प्रत्येक के छह विधायक हैं। पार्टी के पास गुर्जर, राजपूत, वैश्य और एक ओबीसी नेता भी हैं।

 

नौ दलित विधायकों में एक हैं छह बार के विधायक कृष्ण लाल पंवार और दूसरे हैं दो बार के विधायक कृष्णा बेदी। पंजाबी मूल के आठ लोगों में सात बार के विधायक और पूर्व गृह मंत्री अनिल विज हैं, जो मार्च में मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने के बाद नाराज हो गए थे। जींद के विधायक कृष्ण मिड्ढा भी इस रेस में हैं, जिन्होंने लगातार तीसरी बार अपनी सीट जीती है। एक और अब तीन बार के विधायक यमुनानगर से घनश्याम दास अरोड़ा हैं। लेकिन उनकी नियुक्ति को छोड़ दिया जा सकता है क्योंकि उनकी सीट अम्बाला क्षेत्र के भीतर है। अरोड़ा को हांसी से तीन बार के विधायक विनोद भयाना के लिए नजरअंदाज किया जा सकता है।

ब्राह्मण चेहरों में बल्लभगढ़ से तीन बार के विधायक मूल चंद शर्मा शामिल हैं, जिन्हें मंत्रिमंडल में बरकरार रखा जा सकता है। एक और संभावित दो बार के लोकसभा सांसद अरविंद शर्मा हैं जिन्होंने गोहाना जीता। राम कुमार गौतम, जिन्होंने सफीदों को जीत दिलाई, जिसे भाजपा ने कभी नहीं जीता था। भाजपा के लिए अहीरवाल बेल्ट के छह विधायक महत्वपूर्ण हैं जिन्होंने एक बार फिर पार्टी को भारी मतों से वोट दिया। इनमें बादशाहपुर से छह बार के विधायक राव नरबीर सिंह हैं। केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती राव ने पहली बार अटेली सीट जीती है, लेकिन उनका नाम शॉर्टलिस्ट में है। साथ ही दो बार के विधायक लक्ष्मण यादव का नाम भी है।

जाट नेता महीपाल ढांडा अब पानीपत (ग्रामीण) से दो बार के विधायक हैं और उनके बरकरार रहने की संभावना है। राई से दूसरी बार चुने गए कृष्ण गहलोत भी इस दौड़ में शामिल हैं। एक संभावित बड़ा नया नाम पार्टी के राज्यसभा सांसद किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी का है। अन्य संभावित उम्मीदवारों में वैश्य समुदाय के पूर्व मंत्री विपुल गोयल शामिल हैं। हरियाणा में सबसे अमीर महिला और हिसार से निर्दलीय विधायक सावित्री जिंदल ने औपचारिक रूप से भाजपा को अपना समर्थन दे दिया है। इससे उनके नए मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना बढ़ गई है।

हरियाणा में हार के बाद राहुल गांधी का बड़ा बयान, बोले- पार्टी की जगह अपना इंटरेस्ट ऊपर रखा

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हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जीतते-जीतते हार गई। इसके साथ कांग्रेस को लगातार तीसरी बार हरियार में हार का मुंह देखना पड़ा है। कांग्रेस राज्य में केवल 37 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद कांग्रेस के ने आज समीक्षा बैठक की। गुरुवार को पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर बैठक हुई, जिसमें राहुल गांधी भी शामिल हुए। सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान राहुल ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा का नाम लिए बिना बड़ी बात कही। उन्होंने साफतौर पर कहा कि नेताओं ने पार्टी की जगह अपना हित देखा।

सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में राहुल गांधी हरियाणा में कांग्रेस को मिली हार की वजह प्रदेश कांग्रेस के नेताओं बताया। हालांकि उन्‍होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्‍होंने जो बयान दिया, उससे उनकी नाराजगी साफ जाहिर हुई। उन्‍होंने कहा कि हरियाणा में नेताओं का इंटरेस्ट ऊपर रहा, जबकि पार्टी का इंटरेस्ट नीचे चला गया।

सूत्रों के मुताबिक, पार्टी हार के कारणों का पता लगाने के लिए एक समिति बनाएगी। कमेटी ये पता करेगी कि उसे चुनाव में क्यों और कैसे हार मिली. समिति में कौन-कौन होगा, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।

भारत की बढ़ेगी ताकतः यूएस से परमाणु पनडुब्बियों-31 प्रीडेटर ड्रोन के लिए 80000 करोड़ का सौदा

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हिंद माहासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए चिंता का विषय है। यही वजह है कि भारत लगातार अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ा रहा है। इसी क्रम में भारतीय नौसेना और रक्षा बलों की निगरानी क्षमताएं बढ़ाने के लिए सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने स्वदेशी रूप से दो परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण और अमेरिका से 31 प्रीडेटर ड्रोन खरीदने के अहम सौदों को मंजूरी दे दी है।सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) ने इस संबंध में 80,000 करोड़ रुपये के प्रमुख सौदों को मंजूरी दे दी है। इससे समुद्र से लेकर सतह और आसमान तक में भारत की मारक और निगरानी क्षमता में प्रभावी वृद्धि होगी।

सूत्रों ने एएनआई को बताया कि योजना के अनुसार, भारतीय नौसेना को दो परमाणु-संचालित हमलावर पनडुब्बियां मिलेंगी जो हिंद महासागर क्षेत्र में इसकी क्षमताओं को कई गुना बढ़ाने में मदद करेंगी। इससे भारत की मारक और निगरानी क्षमता में वृद्धि होगी। जानकारी के मुताबिक दो परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण के लिए विशाखापट्टनम स्थित शिप बिल्डिंग सेंटर के साथ 45,000 करोड़ रुपए की डील हुई है। खास बात ये है कि इसमें लॉर्सन एंड टूब्रो जैसी निजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों की भी भागीदारी होगी। बताया जा रहा है कि ये डील काफी समय से अटकी थी जो अब फाइनल हो गई है।

काफी समय से अटकी थी डील

सूत्रों ने बताया कि यह सौदा लंबे समय से लटका हुआ था। भारतीय नौसेना इस पर जोर दे रही थी क्योंकि समुद्र के भीतर उसकी क्षमता की कमी को पूरा करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। भारत ने नौसेना में पनडुब्बियों को शामिल करने की दीर्घकालिक योजना बनाई है जिसके तहत इस तरह की छह पनडुब्बियां शामिल हैं। इन पनडुब्बियों का निर्माण महत्वाकांक्षी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल प्रोजेक्ट के तहत किया जाएगा जो अरिहंत श्रेणी के तहत बनाई जा रही पांच परमाणु पनडुब्बियों से अलग हैं।

31 प्रीडेटर ड्रोन की डील

सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति द्वारा मंजूर किया गया दूसरा बड़ा सौदा अमेरिकी जनरल एटॉमिक्स से 31 प्रीडेटर ड्रोन खरीदने का है। यह सौदा भारत-अमेरिका के बीच विदेशी सैन्य बिक्री अनुबंध के तहत है। इस सौदे को 31 अक्टूबर से पहले मंजूरी मिलनी थी क्योंकि अमेरिकी प्रस्ताव की वैधता तभी तक थी। अब इस पर अगले कुछ दिनों में ही हस्ताक्षर होंगे।उन्होंने बताया कि अनुबंध के अनुसार, रक्षा बलों को सौदे पर हस्ताक्षर करने के चार साल बाद ड्रोन मिलने शुरू हो जाएंगे। भारतीय नौसेना को 31 में से 15 ड्रोन मिलेंगे। थल सेना और वायु सेना को आठ-आठ ड्रोन मिलेंगे।

अमेरिका से खरीदे जाने वाले 31 ड्रोन में से कुछ को भारत में ही असेंबल किया जाएगा, जिनमें से 30% कंपोनेंट्स इंडियन सप्लायर्स के ही रहेंगे। इन ड्रोन में डीआरडीओ से बनी कोई मिसाइल नहीं लगाई जाएगी, क्योंकि ऐसा करने में ड्रोन की गारंटी खत्म हो जाएगी।

हरियाणा की हार के बाद, महाराष्ट्र-झारखंड चुनाव में कांग्रेस पर क्या का होगा?
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#after_haryana_congress_cut_down_to_size_by_allies_in_maharashtra_jharkhand हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए बड़ी असफलता साबित हुए हैं। पार्टी ने लोकसभा चुनाव के दौरान जो मोमेंटम हासिल किया था, उसे गंवा दिया है। आने वाले दिनों में महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली के अहम विधानसभा चुनाव होने हैं। जाहिर सी बात है इस हार का असर इन चुनावों में भी देखा जाएगा। हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस की हार का असर आने वाले विधानसभा चुनावों में भी दिखेगा। महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली में कांग्रेस को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। सहयोगियों के साथ मोलभाव कठिन हो सकता है। बता दें कि इस साल के आखिर तक महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव हो सकते हैं। महाराष्ट्र की बात करें तो राहुल गांधी लगातार कांग्रेस की ओर से वहां चुनाव प्रचार करने जा रहे हैं। वह कई सभाओं को संबोधित कर चुके हैं। वहीं, भाजपा भी उस राज्य को हर हाल में अपने साथ रखना चाहती है। इस कारण महाराष्ट्र में भाजपा भी अपनी ताकत लगा रही है। ऐसे में महाराष्ट्र में इस बार जो लड़ाई होगी, वह कांटे की होगी। बीजेपी को हरियाणा में मिल रही जीत से महाराष्ट्र और झारखंड में कई गुना तेजी से पार्टी अपनी ताकत झोंक सकती है। झारखंड चुनाव में भी बीजेपी को उम्मीद ज्यादा है। हेमंत सोरेन की सरकार में जिस तरीके से हिंदुओं पर हमले हुए, लव जिहाद के मामले आए, आदिवासी गांव में बांग्लादेशी घुसपैठियों का आना जाना बढ़ा, उससे झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार निशाने पर आ गई है। यही कारण है कि भाजपा इस चुनाव को लेकर अभी से ही इन्हें मुद्दा बनाते हुए अभी से वहां पूरी ताकत झोंक रही है। खुद पीएम नरेंद्र मोदी बार-बार वहां जा रहे हैं। भाजपा को भी पता है कि वहां दोबारा सत्ता किसी की नहीं आती है। ऐसे में भाजपा को उम्मीद है कि झारखंड में एक बार फिर से उसकी सरकार बन सकती है। यहां कांग्रेस अभी काफी पिछड़ी स्थिति में दिख रही है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों में 99 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस इंडिया ब्लॉक में खुद को बड़े भाई के तौर पर प्रोजेक्ट करने लगी थी। लेकिन हरियाणा और जम्मू कश्मीर की हार से उसका ये भ्रम टूटेगा। जम्मू कश्मीर में कांग्रेस नेशनल कॉन्फ्रेंस की जूनियर पार्टनर बनकर चुनाव लड़ी। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 51 में से 42 सीटों पर जीत हासिल की है। कांग्रेस 32 सीटों पर चुनाव लड़ी और सिर्फ 6 सीटें जीत पाई है। हरियाणा में कांग्रेस को बीजेपी से सीधी लड़ाई में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के बाद करारी मात मिली है। पार्टी मध्य प्रदेश में 15 साल की सत्ता विरोधी लहर को नहीं भुना पाई तो हरियाणा में पार्टी 10 साल की सत्ता विरोधी लहर के बावजूद नहीं जीत पाई। हरियाणा में कांग्रेस की हार ने विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन को प्रभावित किया है, जिससे भविष्य के राज्य चुनावों के लिए उनके दृष्टिकोण में बदलाव होने की संभावना है। कांग्रेस को हार के बाद यह सुझाव दिया जा रहा है कि वो अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करे। हरियाणा की हार के बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि कांग्रेस को अपनी स्ट्रैटजी पर फिर से सोचने की जरूरत है। बीजेपी के साथ सीधी लड़ाई में पार्टी कमजोर पड़ जाती है। ऐसा क्यों होता है। पूरे गठबंधन पर फिर से काम करने की जरूरत है। बता दें कि महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस की सहयोगी पार्टनर है। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 8 अक्टूबर को चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस का सीधे तौर पर जिक्र किए बिना कहा कि किसी भी चुनाव को हल्के में नहीं लेना चाहिए। केजरीवाल ने एमसीडी पार्षदों को संबोधित करते हुए कहा कि हरियाणा का चुनावी परिणाम देखिए। वहां क्या हुआ है। इस परिणाम का सबसे बड़ा सबक ये है कि किसी को भी अति आत्म विश्वास का शिकार नहीं होना चाहिए।
हरियाणा में हार के बाद एक्शन में कांग्रेस, मल्लिकार्जुन खरगे ने हुड्डा-गहलोत से बाबरिया तक को किया तलब!

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हरियाणा में कांग्रेस बुरी तरह हार गई है। हार के लिए मुख्य रूप से कुमारी सैलजा और भूपिंदर सिंह हुड्डा को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।हरियाणा में हार और सहयोगियों के वार के बाद कांग्रेस एक्शन में है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हार की समीक्षा को लेकर आज बड़ी बैठक बुलाई है।इस बैठक में पहले भूपेन्द्र हुड्डा, पर्यवेक्षक अशोक गहलोत, अजय माकन, प्रताप सिंह बाजवा, प्रभारी दीपक बाबरिया, प्रदेश अध्यक्ष उदय भान शामिल होंगे. राहुल गांधी भी इस बैठक में शामिल हो सकते हैं। हरियाणा को लेकर खरगे द्वारा बुलाई गई समीक्षा बैठक में सैलजा और सुरजेवाला को पहले नहीं बुलाया गया है। इन नेताओं को बाद में बुलाया जा सकता है।

चुनाव से पहले यह तय माना जा रहा था कि हरियाणा में इस बार कांग्रेस की वापसी होगी. एग्जिट पोल के सर्वे ने इस अनुमान को थोड़ा और पुख्ता कर दिया. सर्वे के बाद से हरियाणा कांग्रेस में जबरदस्त उत्साह थी. कांग्रेस वाले इस बात को तय मान चुके थे कि 10 साल बाद प्रदेश में उसकी वापसी हो रही है. कोई भी ऐसा सर्वे नहीं था जिसमें कांग्रेस हारती हुई दिख रही थी लेकिन जब नतीजे आए तो सारे सर्वे फेल हो गए. बीजेपी को हरियाणा में ऐतिहासिक जीत मिली. बीजेपी ने प्रदेश में जीत की हैट्रिक लगाई।

जानकारों के अनुसार, कांग्रेस की अंदरूनी कलह, मौजूदा विधायकों पर अत्यधिक निर्भरता और बागियों की वजह से कांग्रेस एक दशक के बाद हरियाणा में वापसी करने में विफल रही। भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा की खींचतान से बीजेपी को बड़ा फायदा मिला। टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक कांग्रेस बंटी नजर आ रही थी। कांग्रेस तीन खेमों में बंट गई थी। इसमें एक खेमा पूर्व सीएम हुड्डा का था तो दूसरा कुमारी सैलजा और तीसरा रणदीप सुरजेवाला का था।

सैलजा-हुड्डा के अलावा इन 4 दिग्गजों का भी हार में हाथ!

सैलजा और हुड्डा के अलावा कांग्रेस के भीतर 4 ऐसे भी दिग्गज हैं, जिनके ऊपर हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनाने की जिम्मेदारी थी, लेकिन जिस तरह से पार्टी की हार हुई है, उससे कहा जा रहा है कि इन नेताओं की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।

1. दीपक बाबरिया- जून 2023 में शक्ति सिंह गोहिल के गुजरात जाने के बाद दीपक बाबरिया को हरियाणा कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया। प्रभारी महासचिव बनने के बाद बाबरिया न तो हरियाणा में कांग्रेस की संगठन तैयार कर पाए और न ही गुटबाजी खत्म कर पाए। इतना ही नहीं, बाबरिया के बयान ने ही कई बार कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी।

2. अजय माकन- कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन हरियाणा चुनाव में स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख थे। कांग्रेस के भीतर टिकट वितरण का काम स्क्रीनिंग कमेटी के पास ही है। कांग्रेस का टिकट वितरण पूरे चुनाव के दौरान विवादों में रहा। आरोप है कि टिकट वितरण में सिर्फ हुड्डा गुट को तरजीह मिली। 89 टिकट में से 72 टिकट कांग्रेस में हुड्डा समर्थकों को दे दी गई। टिकट वितरण के बाद कुमारी सैलजा नाराज होकर प्रचार से दूर हो गई। सैलजा की नाराजगी रिजल्ट पर भी दिखा है।

यही नहीं, राहुल गांधी के कहने पर जब कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन की कवायद शुरू की तो अजय माकन और हुड्डा इसके विरोध में थे। माकन दिल्ली की राजनीति की वजह से शुरू से ही अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी का विरोध कर रहे हैं।

3. अशोक गहलोत- राजस्थान से दिल्ली की तरफ लौटे अशोक गहलोत को कांग्रेस ने हरियाणा का वरिष्ठ पर्यवेक्षक बनाया था। कांग्रेस के भीतर पर्यवेक्षक का काम सभी को साथ लेकर चलना, क्राइसिस मैनेजमेंट करना और ग्राउंड की रिपोर्ट से हाईकमान को अवगत कराना होता है। अशोक गहलोत पूरे चुनाव में क्राइसिस मैनेज नहीं कर पाए। कांग्रेस के 29 बागी मैदान में उतर गए, जिसमें से एकाध बागी को ही कांग्रेस मना पाई। अंबाला और जींद में तो कांग्रेस के बागी ने ही पार्टी का खेल खराब कर दिया।

गहलोत पर्यवेक्षक थे, लेकिन सार्वजनिक तौर पर सैलजा और हुड्डा की लड़ाई को रोक नहीं पाए। सैलजा ने आखिर दिन तक मीडिया को इंटरव्यू दिया और हर इंटरव्यू में सीएम पद देने की मांग उठाई.

4. सुनील कनुगोलू-अगस्त 2022 में औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल होने वाले सुनील कनुगोलू हरियाणा में कांग्रेस की रणनीति देख रहे थे। कहा जाता है कि हरियाणा मांगे हिसाब पदयात्रा का रोडमैप भी कनुगोलू की टीम ने ही तैयार किया था। कनुगोलू के सर्वे को आधार बनाकर ही हुड्डा कैंप ने कई बड़े फैसले हाईकमान से करवाए।

हालांकि, कनुगोलू बीजेपी की रणनीति को समझने में फेल रहे। जमीन पर जिस तरह से बीजेपी ने जाट वर्सेज गैर जाट का फॉर्मूला तैयार किया, उसे भी कनुगोलू की टीम काउंटर नहीं कर पाए।

अमेरिकी राष्‍ट्रपति ने इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से की बात, जानें किन मुद्दों पर हुई चर्चा

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अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने बुधवार को इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से टेलीफोन पर बात की। इजराइल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से बुधवार को फोन पर बातचीत की। इनके बीच करीब 50 मिनटों तक बात हुई है। लेबनान और ईरान पर हमले के बाद दोनों देशों के प्रमुखों के बीच यह पहली बातचीत है। इस बातचीत के दौरान इजरायल को अमेरिका से हिजबुल्‍लाह के खिलाफ अपने हमलों को जारी रखने की खुली छूट मिल गई है। हालांकि, बाइडन ने नेतन्याहू को लेबनान में आम नागरिकों को कम से कम नुकसान पहुंचाने का आग्रह भी किया है।

व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने बुधवार को इजराइली नेता बेंजामिन नेतन्याहू से बात की। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरिन जीन-पियरे ने कहा कि बाइडेन और नेतन्‍याहू के बीच कई मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने इस बातचीत को ईरान के हमले के लिए इजरायल की प्रतिक्रिया के बारे में अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों के बीच चर्चा का विस्तार बताया। बाइडेन ने नेतन्‍याहू से कहा है कि ईरान के हमले पर इजरायल का रिस्‍पॉन्‍स संतुलित होना चाहिए। सीएनएन के मुताबिक ईरान पर इजरायल की संभावित कार्रवाई के बारे में इससे ज्‍यादा कोई जानकारी नहीं दी गई।

जो बाइडन और बेंजामिन नेतन्याहू की यह बीतचीत बीते दो महीने में पहली बार हुई। इस दौरान बाइडन ने नेतन्याहू को लेबनान में आम नागरिकों को कम से कम नुकसान पहुंचाने का आग्रह भी किया। इससे पहले अमेरिका ने इजराइल को ईरान के तेल ठिकानों पर हमला न करने को भी कहा था। गौरतलब है कि बीते दिनों ईरान ने इजराइल पर मिसाइल और रॉकेट हमला किया था। इसके बाद इजराइल ने बदला लेने और ईरान पर जवाबी कार्रवाई करने की बात कही थी। अमेरिका ने भी ईरान के इजराइल पर हमले की निंदा की थी और इजराइल को अडिग समर्थन देने का वादा किया था।

बता दे कि इजरायल इस वक्‍त लेबनान में घुसकर ग्राउंड ऑपरेशन को आगे बढ़ा रहा है। साथ ही आसमान से भी बेरुत सहित अन्‍य शहरों में लगातार बमबारी की जा रही है। इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि इजरायल किसी भी वक्‍त ईरान पर हमला कर सकता है। इजरायल की तरफ से एक दिन पहले यह बयान दिया गया था कि ईरान पर इजरायल का हमला बेहद घातक, सटीक और उसे चौंका देने वाला होगा।

रतन टाटा का टाटा ग्रुप के साथ नहीं था कोई खून का रिश्ता, जानें कैसे मिला ये टाइटल?

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भारत के मशहूर उद्योगपति रतन टाटा अब हमारे बीच नहीं रहे। बुधवार देर रात उन्होंने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 86 वर्षीय रतन टाटा ने अपने जीवनकाल में सफलता के शिखर को छुआ। देश का हर बड़ा करोबारी उनके जैसे सफल इंसान बनने की कल्पना करता है।उद्योग के क्षेत्र में रतन टाटा का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। लेकिन क्या आपको पता है रतन टाटा का टाटा ग्रुप से खून का रिश्ता नहीं था। दरअसल, रतन टाटा के पिता नवल होर्मुसजी जब 13 साल के हुए तो एक दिन उनके नाम के साथ 'टाटा' सरनेम जुड़ गया।

रतन टाटा के पिता का नाम नवल टाटा था, जिनका जन्म 30 अगस्त 1904 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता यानी रतन टाटा के दादा होर्मुसजी, टाटा समूह की अहमदाबाद स्थित एडवांस मिल्स में स्पिनिंग मास्टर थे। नवल जब 4 साल के थे, तब उनके पिता होर्मुसजी का 1908 में निधन हो गया। पिता के गुजर जाने के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आन खड़ा हुआ।

इसके बाद नवल और उनकी मां मुंबई से गुजरात के नवासारी में आ गईं। यहां रोजगार का कोई मजबूत साधन नहीं था। उनकी मां ने कपड़े की कढ़ाई का खुद का छोटा सा काम शुरू कर दिया। इस काम से होने वाली इंकम से परिवार का सिर्फ गुजारा चल रहा था। जैसे-जैसे नवल की उम्र बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे मां को उनके भविष्य की चिंता सता रही थी।

उनके परिवार को जानने वालों ने नवल की पढ़ाई और मदद के लिए उन्हें जेएन पेटिट पारसी अनाथालय भिजवा दिया। वहां वह अपनी पढ़ाई-लिखाई करने लगे। शुरूआती पढाई उन्होंने यहीं से की। जब 13 साल के हुए तब 1917 में सर रतन टाटा (सुविख्यात पारसी उद्योगपति और जनसेवी जमशेदजी नासरवान जी टाटा के पुत्र) की पत्नी नवाजबाई जेएन पेटिट पारसी अनाथालय पहुंची। वहां उन्हें नवल दिखाई दिए। नवाजबाई को नवल बहुत पसंद आए और उन्हें अपना बेटा बनाकर गोद ले लिया। जिसके बाद ‘नवल’ टाटा परिवार से जुड़कर ‘नवल टाटा’ बन गए।

जब नवल को गोद लिया गया, तब उनकी उम्र केवल 13 साल थी। इसके बाद नवल को बेहतरीन शिक्षा मिली और उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वे लंदन जाकर अकाउंटिंग से संबंधित कोर्स करने लगे।

1930 में नवल ने टाटा सन्स जॉइन किया, जहां उन्होंने क्लर्क-कम-असिस्टेंट सेक्रेटरी के रूप में शुरुआत की. उनकी मेहनत और योग्यता के चलते उन्हें जल्दी ही तरक्की मिलती गई। 1933 में उन्हें एविएशन डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी बनाया गया, और इसके बाद उन्होंने टाटा मिल्स और अन्य यूनिट्स में अपनी भूमिका निभाई।

28 दिसंबर, 1937 को रतन टाटा ने टाटा सन्स ग्रुप के एविएशन डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी नवल टाटा के घर जन्म लिया. उनके जन्म के ठीक 2 साल बाद नवल टाटा, टाटा मिल्स के जॉइन्ट मैनेजिंग डायरेक्टर बन गए। 1941 में वे टाटा सन्स के डायरेक्टर बने, और 1961 में टाटा पावर (तब टाटा इलेक्ट्रिक कंपनीज़) के चेयरमैन के पद पर पहुंचे। 1962 में उन्हें टाटा सन्स के डिप्टी चेयरमैन का पद भी मिला। 1965 में नवल टाटा ने सर रतन टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन बने और अपने आखिरी समय तक वह इससे जुड़कर समाजसेवा का काम किया।

नवल टाटा ने दो शादियां की थीं। पहली पत्नी सूनी कॉमिस्सैरिएट और दूसरी सिमोन डुनोयर थीं। सूनी कॉमिस्सैरिएट से उनके दो बच्चे रतन टाटा और जिमी टाटा हुए। 1940 में नवल टाटा का सूनी कॉमिस्सैरिएट से तलाक हो गया था। 1955 में नवल टाटा ने स्विट्जरलैंड की बिजनेसवूमन सिमोन से शादी की। जिनसे नियोल टाटा का जन्म हुआ। नवल टाटा कैंसर की बीमारी से ग्रस्त हो गए। 5 मई 1989 को मुंबई (बॉम्बे) में उनका निधन हो गया।

रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार का एलान, इन तीन वैज्ञानिकों अपने नाम किया अवॉर्ड

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साल 2024 के रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के विजेताओं का ऐलान कर दिया गया है। डेविड बेकर, डेमिस हसबिस और जॉन जम्पर को प्रोटीन पर उनके काम के लिए रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया गया। बेकर वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में काम करते हैं, जबकि हसबिस और जम्पर दोनों लंदन में गूगल डीपमाइंड में काम करते हैं। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के महासचिव हैंस एलेग्रेन ने नोबल पुरस्कार की घोषणा की।

रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने बुधवार को बताया है कि रसायन विज्ञान में 2024 का नोबेल पुरस्कार डेविड बेकर, डेमिस हसाबिस और जॉन एम. जम्पर को देने का फैसला लिया है। डेविड बेकर को 'कम्प्यूटेशनल प्रोटीन डिजाइन के लिए' के लिए पुरस्कार मिला है। डेमिस हसाबिस और जॉन जम्पर को संयुक्त रूप से 'प्रोटीन स्ट्रंक्चर की भविष्यवाणी' के लिए चुना गया है।

रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के महासचिव हैंस एलेग्रेन ने बताया है कि इस साल का रसायन विज्ञान का नोबेल दो हिस्सों में दिया जा रहा है। एक हिस्से में डेविड बेकर हैं और दूसरे आधे हिस्से में संयुक्त रूप से डेमिस हसाबिस और जॉन एम. जम्पर हैं। नोबेल समिति ने कहा कि 2003 में बेकर ने एक नया प्रोटीन डिजाइन किया और तब से उनके शोध समूह ने एक के बाद एक कल्पनाशील प्रोटीन निर्माण किए हैं, जिनमें ऐसे प्रोटीन शामिल हैं जिनका उपयोग फार्मास्यूटिकल्स, वैक्सीन, नैनोमटेरियल और छोटे सेंसर के रूप में किया जा सकता है।समिति ने कहा कि हसबिस और जम्पर ने एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल बनाया है, जो 200 मिलियन प्रोटीन की संरचना की भविष्यवाणी करने में सक्षम है।

इससे पहले मंगलवार को भौतिकी क्षेत्र के लिए अवॉर्ड का एलान किया गया था। जॉन जे. हॉपफील्ड और जेफ्री ई. हिंटन को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार देने का फैसला किया गया था। इन्हें कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क के साथ मशीन लर्निंग को सक्षम करने वाली मूलभूत खोजों और आविष्कारों के लिए यह पुरस्कार देने का फैसला किया गया था।

वहीं, सोमवार को फिजियोलॉजी या मेडिसिन क्षेत्र के लिए इस सम्मान के विजेताओं के नाम का एलान किया गया था। इस साल अमेरिका के विक्टर एंब्रोस और गैरी रुवकुन को चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। दोनों को माइक्रो आरएनए की खोज के लिए यह सम्मान दिया गया।

हुड्डा के हठ से “हाथ” से गया हरियाणा, अब क्या करेगी कांग्रेस?

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हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को लगातार तीसरी बार करारी हार का सामना करना पड़ा है। हरियाणा में कांग्रेस का चूक जाना किसी बड़े झटके से कम नहीं है। क्योंकि एग्जिट पोले से लेकर शुरूआती रूझान भी कांग्रेस के पक्ष में थे। लेकिन कांग्रेस जीतते-जीतते हार गई।कांग्रेस पार्टी को हरियाणा में बीजेपी से सिर्फ 0.85% वोट ही कम आए। बीजेपी को 39.94 प्रतिशत वोट मिले तो कांग्रेस ने भी 39.09 प्रतिशत वोट हासिल किया। यह इस बात की पुष्टि करता है कि हरियाणा में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना था। फिर भी करारी हार मिली।

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पार्टी के अंदर ही कुछ लोग इस हार के लिए हुड्डा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कांग्रेस हाईकमान ने हुड्डा को चुनाव में टिकट बंटवारे में खुली छूट दी थी। दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जबरदस्त वापसी हुई थी। कांग्रेस हरियाणा की 5 सीटें जीतने में सफल हुई थी। उस समय हुड्डा को कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा माना जा रहा था।तब हुड्डा के समर्थकों ने दावा किया था कि अगर टिकट बंटवारे की जिम्मेदारी हुड्डा को दी जाती तो कांग्रेस सत्ता में वापस आ जाती। हालांकि, हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस नेतृत्व को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने का मौका दे दिया है।

हुड्डा ने एकतरफा चलते हुए कुमारी सैलजा और रणदीप सुरजेवाला को दरकिनार कर दिया। हुड्डा खेमे ने इन नेताओं को बिना जनाधार वाला बताया और टिकटों से लेकर हर जगह अपनी चलाई। यही नहीं, किरण चौधरी और कुलदीप बिश्नोई जैसे वरिष्ठ नेताओं ने हुड्डा पर पार्टी पर कब्जा करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस छोड़ दी थी।

गठबंधन दलों से नहीं तालमेल नहीं बिठाया

कांग्रेस के दलित-जाट वोट में सेंधमारी के लिए इनेलो-बीएसपी और जेजेपी-आजाद समाज पार्टी के गठबंधन बने तो राहुल ने वोटों का बिखराव रोकने के लिए गठबंधन की सलाह दी। मगर, भूपिंदर हुड्डा ने आम आदमी पार्टी से तालमेल नहीं किया। इसके बाद दीपेंद्र हुड्डा ने सपा को हरियाणा में खारिज कर दिया। विरोधी खेमे ने आरोप लगाया है कि हुड्डा ने विरोधियों को बैठाने की बजाय उनकी मदद की। ताकि इससे सीटें 40 के करीब आएं और निर्दलीय उम्मीदवारों के सहारे वो सीएम बन सकें। सूत्रों के मुताबिक, एक वक्त बीजेपी में नाराज चल रहे अहीरवाल इलाके के बड़े क्षत्रप राव इंद्रजीत को कांग्रेस में लाने के लिए एक खेमे ने हरी झंडी दे दी थी। तब भी हुड्डा ने उनकी जरूरत को खारिज कर दिया। लिहाजा न सपा साथ थी, न राव साथ आए और पूरी बेल्ट में सूपड़ा साफ हो गया।

सैलजा ने भी इशारों-इशारों में लिया हुड्डा का नाम

हरियाणा में कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा दलित चेहरा कुमारी सैलजा है। उन्होंने चुनाव परिणाम आने के बाद कहा कि सभी अंडे एक ही टोकरी में रखने की नीति कभी सही नहीं मानी जाती है। उनका इशारा उम्मीदवारों के चयन प्रक्रिया में भूपेंद्र सिंह हुड्डा का पूरा दबदबा होने की तरफ है। कांग्रेस को जाटों पर हद से ज्यादा भरोसा करके बाकी जातियों को नजरअंदाज करने की कीमत चुकानी पड़ी है। अब सैलजा कह रही हैं कि शीर्ष नेतृत्व को इस रणनीति पर पुनर्विचार करते हुए हार के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करनी चाहिए। शीर्ष नेतृत्व यह सब कर भी ले तो अब क्या? वो कहते हैं ना- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।

लगातार तीसरी बार सरकार बनने का रिकॉर्ड

बता दें कि हरियाणा में देवी लाल, भजन लाल, बंशी लाल जैसे दिग्गज नेता हुए, लेकिन प्रदेश के लोगों ने कभी किसी का लगातार तीसरी बार साथ नहीं दिया। कांग्रेस के पास हरियाणा के मतदाताओं के इस माइंडसेट को मजबूत बनाए रखने का मौका था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई। उसकी इस नाकामयाबी ने बीजेपी को 54 साल की परंपरा को तोड़कर नया रेकॉर्ड बनाने का अवसर दे दिया। आखिरकार बीजेपी ने हरियाणा में पहली बार लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का रेकॉर्ड कायम कर लिया।