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दिल्ली-NCR में स्वाइन फ्लू का प्रकोप, 1770 के पार पहुंचे मामले, जानें किन्हें है H1N1 से ज्यादा खतरा?

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दिल्ली-एनसीआर में मानसून के बीच H1N1 यानी स्वाइल फ्लू के मामलों में काफी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली में इस साल अब तक स्वाइन फ्लू के 1770 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। वहीं, मानसून के दौरान मौसमी इन्फ्लूएंजा के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है।

अब तक 1777 मामले सामने आए

दिल्ली में इस साल अब तक H1N1 यानी स्वाइन फ्लू के 1,777 मामले सामने आ चुके हैं। दिल्ली में एक ही दिन में एच1एन1 के 114 नए मरीज मिले। इससे इस वर्ष अब तक एन1एच1 की पुष्टि हुई मरीजों की संख्या बढ़कर 1,777 हो गई। छह अगस्त तक दिल्ली में एच1एन1 के 1,344 मामले थे। यानी मात्र 14 दिन में 433 नए मामले सामने आए।

पिछले साल की तुलना में आठ गुना मामले

इस साल के मुकाबले 2025 में 229, 2024 में 3,151 और 2023 में 209 मामले दर्ज किए गए थे। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष करीब आठ गुना मामले हो गए हैं। आंकड़ों से साफ है कि स्वाइन फ्लू के मामले साल-दर-साल काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं।

जेपी नड्डा ने की तैयारियों की समीक्षा

दिल्ली में स्वाइन फ्लू यानी H1N1 के बढ़ते मामलों के बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने शुक्रवार को देश में मौसमी इन्फ्लुएंजा की स्थिति और तैयारियों की समीक्षा की। बैठक में खास तौर पर राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति, अस्पतालों की तैयारियों, निगरानी और जांच व्यवस्था की समीक्षा की गई।

क्या हैं लक्षण

डॉक्टरों के अनुसार, इस मौसम में कई मरीजों में लंबे समय तक रहने वाली खांसी और तेज बुखार देखने को मिल रहा है। वायु प्रदूषण के कारण फेफड़ों में होने वाली सूजन भी कुछ मरीजों में खांसी और सांस से जुड़ी परेशानी बढ़ा सकती है। उन्होंने बताया कि एच1एन1 संक्रमण में आमतौर पर बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, बदन दर्द और थकान जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

मरीजों को सांस लेने में होती है तकलीफ

ज्यादातर लोगों को H1N1 सामान्य फ्लू की तरह ही होता है, लेकिन कुछ मामलों में वायरस फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाता है। इस स्थिति में वायरस फेफड़ों के टिश्यू में सूजन पैदा कर देता है, जहां से शरीर में ऑक्सीजन का आदान-प्रदान होता है। इस वजह से सांस लेने में तकलीफ होती है।

पुणे में राहुल गांधी के कार्यक्रम से पहले बवाल, ABVP-NSUI के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प

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लोकसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के आज 22 अगस्त को होने वाले 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम से एक दिन पहले पुणे में हंगामा हो गया। शुक्रवार को पुणे के सीओईपी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल परिसर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के सदस्यों के बीच झड़प हो गई। घटना के बाद परिसर में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया।

दोनों गुटों ने लगाए एक-दूसरे पर मारपीट के आरोप

‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की पृष्ठभूमि में छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं के बीच विवाद शुरू हुआ। इसके बाद दोनों गुट आमने-सामने आ गए और स्थिति बिगड़ गई। घटना में एबीवीपी और एनएसयूआई दोनों संगठनों ने एक-दूसरे पर मारपीट करने के आरोप लगाए हैं। एबीवीपी के सदस्यों ने आरोप लगाया कि कांग्रेस कार्यकर्ता कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पुणे की छात्राओं पर शनिवार को होने वाले 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के लिए पंजीकरण कराने का दबाव बना रहे थे। वहीं, कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम के समर्थन में बोलने वाली दो छात्राओं को एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने हॉस्टल के अंदर रोक लिया और उन्हें धमकी दी।

विरोध में कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन

घटना की जानकारी मिलते ही कांग्रेस नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय वडेट्टीवार मौके पर पहुंचे। विजय वडेट्टीवार ने घटना के बाद हॉस्टल का दौरा किया। उन्होंने दावा किया कि एबीवीपी कार्यकर्ता दोनों छात्राओं को धमका रहे थे। घटना के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कॉलेज परिसर में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। विजय वडेट्टीवार, सतेज पाटील और विश्वजीत कदम धरने पर बैठ गए।

पुलिस कर रही मामले की जांच

घटना के बाद परिसर में तनाव का माहौल बन गया। विवाद की वास्तविक पृष्ठभूमि और झड़प किस कारण से शुरू हुई, इसे लेकर अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी स्पष्ट नहीं हो सकी है। पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। पुणे के डीसीपी हसन गौहर ने कहा, "हमें दो गुटों के बीच झड़प की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंचने पर हमने कुछ लोगों को नारे लगाते और सड़क जाम करने की कोशिश करते हुए पाया; उन्हें हिरासत में ले लिया गया है।

चीनी की कीमत में रिकॉर्ड उछाल, अचानक क्यों 65 रुपये किलो तक पहुंचा भाव

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इन दिनों चाय की चुस्की फीकी लगने लगी है। मिठास घोलने वाली चीनी अब जरा कड़वी लगने लगी है। भारत में चीनी के दाम पिछले कुछ महीनों से तेजी से बढ़ रहे हैं। चीनी 65 रुपए के पार हो गई है। इस बीच केंद्र सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी बिना आयात शुल्क के मंगाने की अनुमति दी है। दस साल बाद ऐसा होगा जब भारत को चीनी का आयात करना पड़ रहा है।

पहले कभी इतने ऊंचे नहीं गए चीनी के दाम

रिपोर्ट के मुताबिक, इसी महीने भारत में चीनी की कीमतों में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 20 अगस्त को खुदरा बाजार में चीनी की कीमत 55.7 रुपए प्रति किलोग्राम थी। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, एक महीने पहले चीनी की कीमत 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी। 20 अगस्त, 2025 को इसकी कीमत 46.3 रुपए प्रति किलोग्राम थी। बाजार के जानकारों का कहना है कि चीनी के दाम इससे पहले कभी इतने ऊंचे नहीं गए।

चीनी के दाम अचानक क्यों बढ़े?

ऐसे में सवाल उठता है कि चीनी के दाम अचानक क्यों बढ़ रहे हैं? क्या देश में चीनी की कमी है या आपूर्ति को लेकर समस्या है? चीनी की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता को लेकर बढ़ता दबाव है। चीनी मिलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के उपाध्यक्ष केतन पटेल का कहना है कि 2025-26 के चीनी वर्ष में देश में चीनी उत्पादन 3.2 करोड़ टन (32 अरब किलोग्राम) रहने का अनुमान था, लेकिन वास्तव में यह क़रीब 3 करोड़ टन (30 अरब किलोग्राम) ही रहा।

चीनी की कीमतों पर मौसम का भी असर

चीनी की कीमतों पर मौसम का असर भी पड़ रहा है। पिछले साल बारिश ज़्यादा हुई थी, जिसका गन्ने की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा। वहीं, इस साल भारत में मानसून के 11 साल के सबसे निचले स्तर पर रहने का अनुमान जताया गया है। कमजोर बारिश ने गन्ने की बुवाई और फसल को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही अल नीनो का खतरा भी बना हुआ है। अगर अनुमान के मुताबिक बारिश कमजोर रहती है तो गन्ने की बुवाई प्रभावित होगी और भारत कम से कम अगले तीन साल तक चीनी के निर्यात बाजार से बाहर रह सकता है। इसी तरह अधिक उत्पादन देने वाली सीओ-0238 नाम की गन्ने की किस्म में उत्तर प्रदेश में गेरुआ रोग फैल गया

सरकार ने चीनी के निर्यात पर लगाई रोक

जन्माष्टमी से शुरू होने वाला त्योहारों का मौसम क़रीब आ रहा है। चीनी की मांग पूरे साल रहती है, लेकिन त्योहारों के दौरान इसमें खास बढ़ोतरी होती है। रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के समय मिठाई की बिक्री काफी बढ़ जाती है। ऐसे में चीनी की बढ़ती क़ीमतों पर क़ाबू पाने के लिए सरकार ने चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी है। साथ ही, थोक व्यापारियों के पास चीनी का कितना स्टॉक हो सकता है, इस पर स्टॉक लिमिट भी लगा दी गई है

वंदे मातरम्' के छंदों पर छिड़ी सियासी लड़ाई, जानें क्या है नौ दशक पुराना 1937 का प्रस्ताव?

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राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के छंदों पर देश में विवाद मचा हुआ है। विवाद की शुरुआत स्वतंत्रता दिवस के दिन कांग्रेस मुख्यालय में तिंरगा फहराने के बाद इस गीत के गायन से हुई। कार्यक्रम के दौरान सोनिया गांधी के व्यवहार का वीडिया सामने आने के बाद बवाल मच गया। इस वीडियो में दिख रहा है कि गीत की पहली दो लाइनों के गायन के बाद सोनिया गांधी बात करने लगती हैं। जबकि नए नियम के तहत इस पूरे गीत का गायन करना अनिवार्य है। इस बीच कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस पार्टी ने ये फैसला लेते हुए अपने क़रीब नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया है।

1937 के प्रस्ताव को ही मानेगी कांग्रेस

पूरा मामला स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस ऑफिस में झंडोत्तोलन के दौरान पूरा वंदे मातरम् गीत बजने पर शुरू हुआ। जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने इस गीत के दो पैराग्राफ के बाद भी इसे गाते रहने पर आपत्ति जताई। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत का अपमान करने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने जवाब में स्पष्ट किया कि उसके आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी के फैसले को आधार बनाया है। यही पुराना फैसला अब दो पद बनाम छह पद की राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

कांग्रेस का 1937 का प्रस्ताव क्या था?

1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया था। बाकी चार पदों को इस रूप में स्वीकार नहीं किया गया। उस समय गीत के आगे के हिस्से में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों को लेकर आपत्ति सामने आई थी। कांग्रेस का तर्क है कि उस समय महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख नेताओं से जुड़े फैसले के तहत शुरुआती दो पदों को ही अपनाया गया था। इसलिए पार्टी आज भी उसी परंपरा का पालन कर रही है।

'वंदे मातरम्' स्वदेशी आंदोलन के नारों की गूंज

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1875 में संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में 'वंदे मातरम्' गीत की रचना की थी। बाद में इसे उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास 'आनंद मठ' में शामिल किया था। 18वीं सदी के अंतिम दौर की कहानी कहने वाले 'आनंद मठ' उपन्यास की पृष्ठभूमि संन्यासी विद्रोह है। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में शासन के शुरुआती दशकों में इसके ख़िलाफ़ बंगाल में संन्यासी विद्रोह हुआ था। 'वंदे मातरम्' गीत 1905 से 1908 के दौरान हुए स्वदेशी आंदोलन में एक नारे के रूप में भी गूंजा और यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहराई से जुड़ता चला गया। 1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था कि जब भी किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम में वंदे मातरम् गीत को गाया जाए तब सिर्फ़ पहले दो अंतरे ही गाए जाएं। इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि गीत के पहले दो अंतरों में ऐसा कुछ नहीं है जिसे लेकर किसी को आपत्ति हो और बाद के अंतरे बहुत चर्चित नहीं हैं।

वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य

बता दें कि 'वंदे मातरम्' के पूर्ण संस्करण को हाल ही में राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है। इसके तहत सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य किया गया है। केंद्र सरकार ने 28 जनवरी को जारी दिशा-निर्देशों में वंदे मातरम् के सभी छह पदों के गायन की व्यवस्था का उल्लेख किया। जब जन गण मन के साथ वंदे मातरम् बजाया जाएगा, तो पहले राष्ट्रगीत के सभी छह पद गाए जाने की बात कही गई है। इससे पहले शुरुआती दो पदों के इस्तेमाल की व्यवस्था बताई गई थी।

संसद मार्ग थाने के बाहर धरने पर बैठे राहुल गांधी, पैलेट गन फायरिंग मामले में FIR दर्ज करने की मांग*

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जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पैलेट गन के इस्तेमाल का मुद्दा अब थाने तक पहुंच गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शुक्रवार को पीड़ित छात्र साहिल और उसके परिवार के साथ संसद मार्ग थाने पहुंचे। राहुल गांधी की मांग है कि छात्र को लगी चोटों की जांच हो और इस मामले में FIR दर्ज की जाए।

पैलेट गन पीड़ित साहिल लोचब का आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने उनकी शिकायत पर FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया है। राहुल और साहिल पहले कनॉट प्लेस पुलिस स्टेशन गए थे, लेकिन बाद में FIR दर्ज कराने के लिए पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में DCP ऑफिस गए। इस दौरान, राहुल गांधी ने पुलिस द्वारा अब तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी।

पैलेट गन फायरिंग में घायल युवक के साथ धरने पर बैठे

कथित पैलेट गन फायरिंग में घायल हुए युवक के साथ राहुल गांधी पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन पहुंचकर उन्होंने अधिकारियों से फायरिंग करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। राहुल गांधी ने दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट सीपी नुपुर प्रसाद से मुलाकात की। उन्हें चार्ज संभाले अभी दो दिन ही हुए हैं। मुलाकात के बाद राहुल गांधी बाहर आए और यहां पहुंचने के बाद अचानक बाहर ही बैठ गए।

राहुल पहले भी उठे चुके हैं ये मामला

राहुल गांधी के साथ मौजूद साहिल वही छात्र है, जिसे लेकर कांग्रेस नेता पहले भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं। राहुल गांधी ने उस दौरान छात्र के शरीर पर चोटों के निशान दिखाते हुए दावा किया था कि ये पैलेट गन के छर्रों से लगी चोटें हैं। उनका आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ और साहिल की आंख की रोशनी भी बुरी तरह प्रभावित हुई। अब राहुल गांधी चाहते हैं कि पुलिस मेडिकल जांच और दूसरे सबूतों के आधार पर यह साफ करे कि छात्र को चोट किस चीज से लगी और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए गठित की हाई पावर एक्सपर्ट कमेटी

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा तथा पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई की जांच के लिए एक पांच सदस्यीय हाई पावर एक्सपर्ट कमेटी (एचपीईसी) का गठन किया है। कमेटी यह जांच करेगी कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों ने जरूरत से ज्यादा या अनुचित बल का इस्तेमाल तो नहीं किया। इसमें पैलेट गन, बिजली के डंडे, लाठी और आंसू गैस के इस्तेमाल की परिस्थितियों की भी जांच होगी। यह देखा जाएगा कि इनका इस्तेमाल पर्याप्त चेतावनी दिए बिना या जरूरत से अधिक तो नहीं किया गया।

क्या है पैलेट गन विवाद?

बता दें कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा NEET पेपर लीक को लेकर 20 जुलाई को आयोजित 'चलो संसद' मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाने का आरोप है। मीडिया रिपोर्ट में घायलों के बयानों और मेडिकल रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि 20 जुलाई के मार्च के दौरान कई प्रदर्शनकारी पैलेट गन से घायल हुए थे। रिपोर्ट्स में दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल की बात कही जा रही है, जबकि दिल्ली पुलिस ने इस तरह के हथियार के इस्तेमाल से इनकार किया और कहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उनके पास न तो पैलेट गन हैं और न ही वे इनका इस्तेमाल करते हैं।

UGC के नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही बड़ी बात

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देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर केंद्र सरकार फिर से विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्र ने यह जानकारी दी। इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन नियमों पर अंतरिम रोक भी लगा चुका है।

केंद्र सरकार का बड़ा बयान

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की ओर से जारी किए गए 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' को लेकर पूरे देश में बड़े स्तर पर बवाल देखने को मिला था। इन नियमों पर सवर्णों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद यूजीसी के नियमों का ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। अब गुरुवार को इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई हुई जिसके दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है।

नियमों पर फिर से विचार कर रही सरकार

गुरुवार को यूजीसी के नियमों पर हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह UGC के 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' पर फिर से विचार कर रही है, जिनपर कोर्ट ने अभी रोक लगा रखी है। केंद्र सरकार और UGC की ओर से सुनवाई में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि फैसला क्या होगा, लेकिन हम इस पर फिर से विचार कर रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्तों में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह सभी याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को शामिल करते हुए एक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने ये भी कहा है कि हलफनामे की कॉपी याचिकाकर्ताओं को भी देनी होंगी। याचिकाकर्ता उसके बाद दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।

जनवरी में नियमों पर लगाई गई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट इसी साल जनवरी में इन नियमों पर रोक लगा चुका है। कोर्ट ने कहा था कि नियमों का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने वाला हो सकता है। साथ ही, रैगिंग को इन नियमों के दायरे से बाहर रखने पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह भी निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक UGC के इस बारे में 2012 के नियम लागू रहेंगे।

क्या हैं UGC के 2026 नियम?

यूजीसी ने ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से बनाए थे। इनका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसा तंत्र तैयार करना था, जिससे किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। ये नियम जनवरी 2026 में लागू किए गए थे और इन्होंने यूजीसी के पुराने 2012 वाले नियमों की जगह ली थी।

1984 दंगों में उम्रकैद काट रहे कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का निधन, तिहाड़ जेल में थे बंद

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पूर्व सांसद और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार का निधन हो गया है। उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया था, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार 1984 के सिख-विरोधी दंगों को लेकर तिहाड़ जेल में काट रहे थे सजा।

7 सालों से तिहाड़ जेल में थे बंद

1984 सिख विरोधी दंगा मामले में वह तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। सज्जन कुमार 7 सालों से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद थे। दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उन्होंने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी। लेकिन उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। 27 अप्रैल 2022 को उन्हें दंगों से संबंधित एक मामले में जमानत मिली, लेकिन दूसरे मामले में दोषी ठहराए जाने की वजह से वह जेल में ही बंद रहे।

सिख दंगों में क्या रही थी भूमिका?

कोर्ट ने उनको 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुंदीप सिंह की हत्या में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया था। तीन बार सांसद रह चुके सज्जन कुमार को भीड़ को जसवंत सिंह और उनके परिवार को निशाना बनाने वाली भीड़ को उकसाने का दोषी पाए जाने पर उनको आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। तौर पर सिखों के घरों की पहचान करवाकर भीड़ को हमले के लिए उकसाया था। आरोप ये भी थे कि सज्जन सिंह के समर्थकों ने दिल्ली में वोटर लिस्ट के जरिए सिखों के घर और बिजनेस की पहचान की और उनमें तोड़फोड़ की या आग लगा दी। कई सिखों को उनके घरों से निकालकर मारा गया।

कांग्रेस ने वंदे मारतम् के दो टुकड़े किए...” अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- 1937 वाली नीति नहीं चलेगी

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस के रुख पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के दो टुकड़ किए हैं। यह देश विरोधी फैसला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का महान वंदेमातरम गीत के दो ही छंद गाने का फैसला तुष्टिकरण की राजनीति है।

वंदे मातरम के दो टुकड़े कर विभाजन की नींव डाली

तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने 1937 के अपने प्रस्ताव को आधार बनाते हुए वंदे मातरम के केवल दो पद गाने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में मुसलमानों को खुश करने के लिए वंदे मातरम को बांटने का फैसला किया गया था और इससे देश के विभाजन की नींव पड़ी।

1937 के गलत फैसले को 80 साल बाद सुधारा-अमित शाह

अमित शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति में लिए गए फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि देश में तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी। उनके 1937 में लिए गए फैसले को पीएम मोदी ने आजादी के 80 साल बाद सुधारा है। गृह मंत्री ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए कांग्रेस की उस गलती को सुधारा है और इसे कानूनी आधार भी दिया है।

कानून को नकार रही कांग्रेस-अमित शाह

शाह ने कहा कि कांग्रेस एक तरफ अपने 1937 के प्रस्ताव को लागू कर रही है, जबकि दूसरी तरफ संसद द्वारा बनाए गए कानून को नकार रही है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक बार फिर तुष्टिकरण की राजनीति को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा, देश एक बार वंदे मातरम को दो हिस्सों में बंटने देने की गलती कर चुका है और हमने इसके नतीजे भुगते हैं। शाह ने लोगों से कांग्रेस के इस फैसले के खिलाफ एकजुट होने की अपील की

क्या है वंदे मातरम् पर कांग्रेस का फैसला?

दरअसल, कांग्रेस ने बुधवार को कहा था कि वह ‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और उस समय के अन्य प्रमुख नेताओं द्वारा किए गए फैसले का पूरी तरह पालन करेगी। इसी के अनुरूप पार्टी कार्यकर्ता राष्ट्रगीत के सिर्फ दो अंतरे ही गाएंगे। वंदे मातरम् में 6 अंतरा हैं। कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में इसको लेकर चर्चा हुई और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 1937 के सीडब्ल्यूसी के उस प्रस्ताव के कुछ अंश भी पढ़े जो महान नेताओं की मौजूदगी में पारित हुआ था और जिसमें वंदे मातरम् के दो अंतरों के गायन का निर्णय लिया गया था।

भारत ने सुरक्षा परिषद में विस्तार के समर्थन में फिर उठाई आवाज, आतंकवाद पर भरी हुंकार

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भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (USNC) में सुधारों के पक्ष में जोरदार तरीके से मांग उठाई है। UNSC के कामकाज के तरीकों पर सालाना खुली बहस में भारत ने कहा कि आज सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा साफ और जरूरी हो गई है।

सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव पर जोर

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की चार्ज डी अफेयर योजना पटेल ने जोर देकर मांग की कि UNSC को आज और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए सही ढंग से तैयार किया जाए। भारतीय राजदूत ने 1945 में बने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव पर जोर दिया और कहा कि दुनिया अब पूरी तरह बदल चुकी है। योजना पटेल ने कहा कि सदस्य देशों के नागरिकों के मन में सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता,असरदार होने और उसके फैसले लेने के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। इसकी मुख्य वजह है कि यह अहम संस्था दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे झगड़ों में असरदार ढंग से दखल नहीं दे पाई है।

अस्थायी सदस्यों को भी अधिकार देने की मांग

इसके साथ ही उन्होंने दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाने वाले अस्थायी सदस्यों को दस्तावेजों तक पहुंच की मांग की। उन्होंने कहा, ऐतिहासिक दस्तावेजों तक पहुंच केवल कुछ ही लोगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सुरक्षा परिषद की प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की। 'लिस्टिंग' और 'डी-लिस्टिंग' का उदाहरण देते हुए भारतीय राजदूत ने कहा कि सुरक्षा परिषद को संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने का मंच नहीं बनना चाहिए।

आतंकवाद पर राजनीतिक दखल पर कड़ी आपत्ति

भारत ने यूएनएससी में आतंकियों की लिस्टिंग को लेकर चीन और पाकिस्तान पर निशाना साधा है। यूएनएससी में भारत की सीडीए यानी कार्यवाहक राजदूत योजना पटेल ने पाकिस्तान-चीन का नाम लिए बगैर उन्हें अच्छे से धोया है। उन्होंने सुरक्षा परिषद में आतंकियों की लिस्टिंग-डीलिस्टिंग को राजनीति से दूर रखने की हिदायत दी है। साथ ही राजनीतिक दखल पर कड़ी आपत्ति जताई। भारत ने बिना नाम लिए बिना कहा कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता का इस्तेमाल आतंकियों को बचाने या उन्हें डीलिस्ट कराने के लिए नहीं होना चाहिए।

होर्मुज में अमेरिकी ने चली नई चाल, बनाया सीक्रेट शिपिंग कॉरिडोर, रोज निकाल रहा लाखों बैरल तेल

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ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच अमेरिका ने बड़ी चाल चली है। यूएस ने होर्मुज स्ट्रेट में तेल की आवाजाही के लिए एक गुप्त शिपिंग कॉरिडोर तैयार किया है। अमेरिकी सेना ओमान के तट के पास स्ट्रेट के दक्षिणी हिस्से से हर रात तेल टैंकरों को सुरक्षित निकाल रही है।

रोजाना लगभग 1 करोड़ बैरल तेल निकल रहा

अमेरिकी मीडिया आउटलेट Axios ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों में चल रहे इस ऑपरेशन के तहत हर रात 15 से 20 टैंकर ओमान के तट के पास एक दक्षिणी चैनल से इस जलडमरूमध्य में आ-जा रहे हैं। अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि रोजाना लगभग 1 करोड़ बैरल तेल इस जलडमरूमध्य से बाहर निकालकर वैश्विक ऊर्जा बाजार में भेजा जा रहा है। यह मात्रा युद्ध शुरू होने के पहले की आधा है।

वैश्विक आपूर्ति में आया फर्क

हालांकि, तेल निकाले जाने की मात्रा अभी भी पुराने स्तर से कम है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति में फर्क साफ दिख रहा है। यह सिर्फ भरे हुए टैंकरों की सुरक्षा नहीं है। अमेरिकी सेना खाली टैंकरों को भी अरब सागर से होर्मुज होते हुए खाड़ी में ले जा रही है। वहां वे तेल भरकर वापस बाहर निकलते हैं। अधिकारियों ने इसे बड़ी कामयाबी बताया है, क्योंकि इससे वैश्विक आपूर्ति में आ रही समस्या के अंतर को कम किया जा रहा है।

दो महीने से जारी है ये ऑपरेशन

एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया- ‘अमेरिका दो महीने से होर्मुज के दक्षिणी लेन को नियंत्रित कर रहे हैं। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स परेशान तो करती है, लेकिन जलडमरूमध्य पर उनका कंट्रोल नहीं है, बल्कि कंट्रोल हमारे पास है।’ यह टास्क फोर्स नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग स्थित आर्मी हेडक्वार्टर से चल रही है। यह खाड़ी के सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम कर रही है।

अमेरिकी सेना की निगरानी में निकाले जा रहे टैंकर

हर रात जहाजों की आवाजाही के लिए अलग-अलग समय तय किया जाता है। इसके बाद अमेरिकी सेना की निगरानी में टैंकरों को होर्मुज के दक्षिणी चैनल से निकाला जाता है। अमेरिकी वायुसेना के लड़ाकू विमान ईरानी क्रूज मिसाइलों और ड्रोनों से सुरक्षा करते हैं। यह ऑपरेशन इसलिए संभव हुआ क्योंकि अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने हाल में दो हफ्ते के अभियान में ईरान के रडार और समुद्री निगरानी सिस्टम को काफी नुकसान पहुंचाया।