स्वतंत्रता और सम्मान व्यक्तिगत जीवन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण, खुदीराम का बलिदान युवाओं के लिए बड़ा संदेश
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आज जब हम 18 साल की उम्र के युवाओं की गलतियों को बचपना कहकर दरकिनार करने की कोशिश करते हैं। ऐसी ही छोटी उम्र में एक युवक ने कुछ ऐसा कर दिया था, जिसने पूरे अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी। अंग्रेजों के जुल्म के खिलाफ क्रांति को एक नई आग दी। देश के इतिहास के पन्नों में दर्ज वो युवक जो 18 साल की उम्र में हंसते-हंसते भारत माता की रक्षा के लिए फांसी के फंदे पर झूल गया था। हम बात कर रहे हैं अमर शहीद खुदीराम बोस की।
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आजादी का एक मतवाला अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए 15 साल की उम्र में अनुशीलन समिति से जुड़ गए। अनुशीलन समिति 20वीं सदी के शुरुआती दौर में बंगाल में बनी एक गुप्त, क्रांतिकारी और सशस्त्र संगठन था। इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को समाप्त कर भारत को स्वतंत्र कराना था। देश को स्वतंत्र कराने और अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ खड़ा हुआ ये युवक आज ही के दिन यानी 11 अगस्त को केवल 18 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूल गया।
इस तरह नाम पड़ा खुदीराम बोस
खुदीराम बोस का जन्म पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर जिले में 3 दिसंबर 1889 को त्रिलोक्यपुरी बोस और लक्ष्मीप्रिया के घर हुआ। खुदीराम के जन्म से पहले उनके माता-पिता ने दो बेटों को बीमारी के चलते खोया था। इस बार खुदीराम के रूप में तीसरी संतान हुई तो डर स्वाभाविक था। तब मां-बाप ने एक देसी टोटका आजमाया। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को तीन मुट्ठी 'खुदी' (बंगाल में टूटे हुए चावल को खुदी कहते हैं) देकर इस बच्चे को प्रतीकात्मक रूप से बेच दिया, ताकि मौत की नजर इस पर न पड़े। तीन मुट्ठी खुदी के बदले बचे इस बच्चे का नाम पड़ गया- खुदीराम।
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15 साल की उम्र में पहली गिरफ्तारी
जिस उम्र में लड़के किताबों की दुनिया स्कूली जीवन में मस्त रहते हैं उस उम्र में खुदीराम बोस अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लेने उतर गए। उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटने में लगा दिया गया। यह बात थी साल 1906 की। एक और क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ बोस ने वंदे मातरम लिखकर अंग्रेजी शासन के विरोध में पर्चे बंटवाने की जिम्मेदारी दी। मिदनापुर में आयोजित एक मेले में इस पर्चे को बंटवाने का प्लान था। अंग्रेजों को इस बात का पता चल गया। अंग्रेजों के पिट्ठुओं ने इसकी खबर दे दी। खुदीराम बोस को देखते ही उन्हें पकड़ने का प्रयास हुआ। लेकिन, खुदीराम ने अंग्रेज अफसर के मुंह पर घूंसा जड़ दिया। हालांकि कई अंग्रेज सिपाही होने के चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। और पहली बार देश के लिए खुदीराम गिरफ्तार हुए। उन दिनों जिला जज हुआ करते थे डगलस किंग्सफोर्ड। इस जज को भारतीयों को सख्त नफरत थी। सजा के नाम पर भारतीयों पर कोडे़ बरसाने की सजा दी जाती थी। 15 साल के खुदीराम को जज ने 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई थी। इस जज ने भारतीयों पर अत्याचार मचा रखा था। आखिर में इस जज को मारने का प्लान बनाया गया।
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किंग्सफोर्ड को मारने का प्लान
क्रांतिकारियों ने तय किया कि इस किंग्सफोर्ड का काम तमाम करना होगा। खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल कुमार चाकी को यह जिम्मेदारी दी गई। किंग्सफोर्ड का ट्रांसफर बिहार के मुजफ्फरपुर हो गया था। ये दोनों लड़के अप्रैल 1908 में मुजफ्फरपुर पहुंचे। कई दिनों तक किंग्सफोर्ड की रेकी की गई। शाम का वक्त था। खुदीराम और प्रफुल्ल किंग्सफोर्ड के घर के बाहर एक पेड़ के अंधेरे में घात लगाए बैठे थे। तभी एक बग्गी बाहर निकली। खुदीराम को लगा शिकार सामने हैय़ उन्होंने दौड़कर उस बग्गी पर बम मार दिया। जोरदार धमाका हुआ। दोनों को लगा कि उन्होंने अपना मिशन पूरा कर लिया है। लेकिन उस बग्गी में किंग्सफोर्ड नहीं था। उसमें लोकल बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी सवार थीं, जिनकी इस हमले में जान चली गई।
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18 साल में हँसते-हँसते फाँसी को गले लगाया
दोनों करीब 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बोस पर पुलिस को शक हो गया और पूसा रोड रेलवे स्टेशन (अब यह स्टेशन खुदीराम बोस के नाम पर है) पर उन्हें घेर लिया गया। खुद को घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने स्वयं को गोली मार ली पर खुदीराम पकड़े गए। खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला और सिर्फ पांच दिन में मुकदमे का फैसला हो गया। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। खुदीराम बोस ने मात्र 18 साल, 8 महीने और 8 दिन की उम्र में 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में हँसते-हँसते फाँसी को गले लगा लिया था। उन्हें किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंकने के आरोप में यह सजा दी गई थी। उनका यह बलिदान देश के युवाओं में आज भी देशभक्ति की एक अनोखी मिसाल है।
खुदीराम का बलिदान आज की युवा पीढ़ी के लिए संदेश
खुदीराम बोस का बलिदान आज की युवा पीढ़ी को देशप्रेम, निस्वार्थ त्याग और अन्याय के खिलाफ अदम्य साहस का पाठ पढ़ाता है। मात्र 18 वर्ष की आयु में हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़कर उन्होंने यह सिखाया कि देश की स्वतंत्रता और सम्मान व्यक्तिगत जीवन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। बिना किसी स्वार्थ के देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देना। व्यक्तिगत सुखों से ऊपर राष्ट्रहित को रखना। देश की संस्कृति और स्वतंत्रता के प्रति हमेशा जागरूक रहना। आज की आज़ादी को हल्के में न लेकर इसके पीछे के संघर्षों को याद रखना।







43 min ago
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