कोडरमा की अस्मिता और जनभावनाओं के साथ विश्वासघात
जनता के संघर्ष और सरकार के आश्वासन को ठेंगा दिखाकर जे.जे. कॉलेज को फिर गिरिडीह भेजने की अधिसूचना
सरकार आश्वासन देकर ताला खुलवाती है और फिर दो दिन बाद वही फैसला थोप देती है
यह लोकतंत्र नहीं, जनता के साथ छल है
जे.जे. कॉलेज, झुमरी तिलैया को विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग से हटाकर सर जे.सी. बोस विश्वविद्यालय, गिरिडीह में शामिल करने का राज्य सरकार का फैसला कोडरमा की जनता, विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों की भावनाओं के साथ गंभीर अन्याय है। इस निर्णय के खिलाफ पिछले कई महीनों से कोडरमा की जनता लगातार संघर्ष कर रही है। कॉलेज की ताला-बंदी तक करनी पड़ी। यह आंदोलन किसी व्यक्ति, दल या राजनीतिक स्वार्थ का आंदोलन नहीं, बल्कि कोडरमा की शैक्षणिक अस्मिता, विद्यार्थियों के भविष्य और जनता के अधिकारों का आंदोलन है। लंबे संघर्ष के बाद जब झारखंड सरकार के प्रतिनिधियों ने आंदोलनकारियों से बातचीत कर भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों पर सकारात्मक विचार किया जाएगा, तब लगभग चार माह से चल रहे संघर्ष के बीच कॉलेज की ताला-बंदी समाप्त की गई। हमें उम्मीद थी कि सरकार जनता की भावना का सम्मान करेगी और जे.जे. कॉलेज को यथावत विनोबा भावे विश्वविद्यालय के अधीन रखा जाएगा। इतना ही नहीं, हमने इस मामले में भारत सरकार और झारखंड सरकार के अनेक वरिष्ठ अधिकारियों एवं मंत्रियों को लगभग 20 आवेदन देकर पूरे मामले की गंभीरता से अवगत कराया। माननीय राज्यपाल महोदय के समक्ष भी हमने अपनी बात रखी और वहां से भी हमें यह विश्वास मिला कि जे.जे. कॉलेज के संबंध में जनभावनाओं का सम्मान किया जाएगा तथा कॉलेज को यथावत रखने की दिशा में सकारात्मक पहल होगी। लेकिन अफसोस और आक्रोश की बात है कि जनता को आश्वासन देकर आंदोलन समाप्त करवाने के कुछ ही दिनों बाद सरकार ने पुनः जे.जे. कॉलेज को गिरिडीह विश्वविद्यालय में शामिल करने की अधिसूचना जारी कर दी। इससे कोडरमा की जनता के मन में यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार के आश्वासन का मूल्य क्या है? हाल में प्रकाशित समाचार में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जे.जे. कॉलेज, झुमरी तिलैया सहित 14 अंगीभूत कॉलेजों को सर जे.सी. बोस विश्वविद्यालय में शामिल किया गया है तथा विद्यार्थियों के लिए कुल 18,180 सीटें निर्धारित की गई हैं। यह खबर केवल प्रशासनिक फेरबदल की खबर नहीं है, बल्कि कोडरमा के लाखों लोगों के लिए गहरी चिंता और आक्रोश का विषय है। यह केवल कॉलेज का स्थानांतरण नहीं, विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है सरकार और सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि विश्वविद्यालय की सीमा बदल देना कागज पर आसान हो सकता है, लेकिन इसका प्रभाव हजारों विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर पड़ता है। विशेष रूप से गरीब, ग्रामीण एवं मध्यमवर्गीय परिवारों के विद्यार्थी इससे प्रभावित होंगे। छात्राओं के लिए भी अतिरिक्त दूरी, आवागमन, सुरक्षा और आर्थिक बोझ गंभीर प्रश्न हैं। जे.जे. कॉलेज केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं है। यह कोडरमा की शैक्षणिक विरासत, सामाजिक चेतना और हजारों परिवारों की आकांक्षाओं से जुड़ी हुई धरोहर है। इसके साथ कोई भी निर्णय केवल सरकारी फाइलों के आधार पर नहीं लिया जा सकता। सरकार जनता की आवाज सुने, आदेश नहीं थोपे हम सरकार से पूछना चाहते है, जब जनता विरोध कर रही है, विद्यार्थी विरोध कर रहे हैं, अभिभावक विरोध कर रहे हैं, बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं और जनप्रतिनिधियों के समक्ष लगातार आपत्तियां रखी जा रही हैं, तो आखिर किसके हित में यह निर्णय लिया जा रहा है? क्या लोकतंत्र में जनता की भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है? क्या सरकार का आश्वासन केवल आंदोलन समाप्त करवाने तक सीमित है? क्या कोडरमा की जनता की वर्षों की शैक्षणिक विरासत को प्रशासनिक सुविधा अथवा राजनीतिक स्वार्थ के नाम पर समाप्त किया जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल— अगर सरकार को अपना फैसला पहले ही लागू करना था, तो जनता से बातचीत और आश्वासन का नाटक क्यों किया गया?अब संघर्ष रुकेगा नहीं मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि जे.जे. कॉलेज बचाओ संघर्ष समिति और कोडरमा की जागरूक जनता इस निर्णय के सामने झुकने वाली नहीं है। हम पुनः आंदोलन की व्यापक रूपरेखा तैयार करेंगे। आंदोलन को गांव-गांव, पंचायत-पंचायत और विद्यार्थी-अभिभावक तक ले जाया जाएगा। जिले के सभी महाविद्यालयों को विनोबा भावे विश्वविद्यालय के अधीन यथावत रखने की मांग को लेकर लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण संघर्ष को और व्यापक बनाया जाएगा। हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं है। हमारा संघर्ष अन्यायपूर्ण निर्णय और जनभावनाओं की अनदेखी के विरुद्ध है। हम कोडरमा के विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, युवाओं और सभी राजनीतिक-सामाजिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर इस सवाल पर एकजुट हों। कोडरमा की जनता से मेरा आह्वान आज यदि हम चुप रहे तो कल हमारी आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि जब उनके शिक्षण संस्थानों और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा था, तब कोडरमा के लोग चुप क्यों बैठे थे? यह समय घरों में बैठकर केवल चर्चा करने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करने का है। हम सरकार को चेतावनी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आग्रह के साथ कहना चाहते हैं— जनता की भावनाओं का सम्मान कीजिए। जे.जे. कॉलेज को यथावत विनोबा भावे विश्वविद्यालय में रखिए। कोडरमा के विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ मत कीजिए। आश्वासन और अधिसूचना के इस विरोधाभास को समाप्त कीजिए। यदि सरकार ने जनभावनाओं की अनदेखी जारी रखी तो आने वाले दिनों में एक व्यापक, निर्णायक और ऐतिहासिक जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा। हमारा संकल्प स्पष्ट है— *“जे.जे. कॉलेज को बचाएंगे, कोडरमा की शैक्षणिक अस्मिता बचाएंगे।अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे और अंतिम सांस तक लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेंगे।”* कोडरमा की जनता अब जाग चुकी है।अब फैसला जनता की अदालत में होगा। राम रतन अवध्या कोडरमा कोडरमा, झारखंड
Aug 25 2026, 21:10
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