UPI पर चार्ज लगाए जाने पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र व आरबीआई से मांगा जवाब

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई पेमेंट पर MDR लगाने पर रोक लगाने से फ‍िलहाल इनकार कर द‍िया है। हालांक‍ि, सीजेआई सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ इंड‍िया यानी NPCI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इन्‍हें चार हफ्ते में यह बताने को कहा है क‍ि चार्ज क्‍यों लगाना जरूरी है।

केंद्र सरकार ने ये फैसला लिया है कि 15 अक्टूबर से ₹2,000 से ज़्यादा के कुछ खास UPI 'पर्सन-टू-मर्चेंट' ट्रांजैक्शन पर MDR लगाया जाना है। शुल्क लगाने की केंद्र सरकार की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 हफ्ते के भीतर मांगा हलफनामा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला कानूनी से ज्यादा तकनीकी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समेत सभी पक्षों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस रिट याचिका पर ये नोटिस जारी किया है जिसमें केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा 14 और 15 सितंबर को जारी उन गजट नोटिफिकेशन्स को रद्द करने की मांग की गई है, जिनमें 2,000 रुपये से ज्यादा के कमर्शियल UPI ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने की घोषणा की गई थी।

क्या है याचिकाकर्ता की दलील

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि UPI के आने के बाद ब्लैक मनी से जुड़े ट्रांजैक्शन में कमी आई है। याचिका में नई MDR व्यवस्था के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI भुगतान पर शुल्क लगाने का फैसला पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लिया गया। शुल्क लगाने से अर्थव्यवस्था में नकदी और काले धन के लेन-देन में बढ़ोतरी हो सकती है, और व्यापारी इस अतिरिक्त लागत का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं।

क्या बोली सरकार?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि डेबिट/क्रेडिट कार्ड से लेन-देन करने में लागत आती है। UPI भी इससे अलग नहीं है। 2 ऑपरेटर यह सेवा देते हैं। एक तो बैंक हैं। यह भारत सरकार द्वारा की जाने वाली वैधानिक वसूली नहीं है। यह प्लेयर्स के बीच सेटलमेंट फीस है, जिसे NPCI सुविधाजनक बनाता है। सरकार इसमें से एक रुपया भी नहीं ले रही है।

क्या है मामला

इस महीने की शुरुआत में, केंद्र सरकार ने UPI के लिए एक नया फ्रेमवर्क घोषित किया, जिसके तहत ₹2,000 से ज़्यादा के UPI पेमेंट पर 0.4% का MDR लगेगा। सरकार का कहना है कि व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांजैक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार के अनुसार, ट्रांसफर की गई रकम चाहे कितनी भी हो, सभी व्यक्ति-से-व्यक्ति ट्रांज़ैक्शन के लिए UPI पूरी तरह से मुफ़्त बना रहेगा। MDR मर्चेंट पेमेंट सिस्टम का एक चार्ज है, न कि UPI पेमेंट करने वाले ग्राहकों से लिया जाने वाला शुल्क। बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि मर्चेंट MDR का बोझ ग्राहकों पर न डालें, जबकि UPI ऐप्स को प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए चार्ज लगाने से मना किया गया है।

जेल से बाहर नहीं आ पाएगा अबू सलेम, हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया झटका

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साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी और गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे सालेम की समय पूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अबू सलेम जेल से बाहर नहीं आ सकेगा. उसका कानूनी तिकड़म फेल हो गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

अबू सलेम की समय से पहले रिहाई वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। उसकी याचिका पहले बॉम्बे हाई कोर्ट से भी खारिज हुई थी। जिसके बाद अबू सलेम के वकील ने सर्वोच्च अदालत का रुख किया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रिहा ना करने का फैसला बरकरार रखा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सलेम की रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के निर्णय में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि मानने से इनकार कर दिया।

नासिक सेंट्रल जेल में बंद है सलेम

बता दें कि अबू सलेम अभी नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। सलेम ने पुर्तगाल से हुए प्रत्यर्पण संधि के तहत 25 साल की सजा पूरी होने का दावा करते हुए रिहाई की याचिका भी लगाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

2030 में अबू सलेम की सजा का 25 साल होगा पूरा

अबू सलेम की तरफ से कहा गया है कि सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर उसने 25 साल की सजा पूरी कर ली है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा था कि उसकी याचिका समय से पहले दायर की गई है, उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। सलेम ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

JPSC परीक्षा विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBI जांच की मांग वाली याचिका पर केंद्र और झारखंड सरकार को नोटिस

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षा में कथित गड़बड़ी का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जेपीएससी की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच का अनुरोध करने वाली याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में 19 अप्रैल 2026 को आयोजित 14वीं जेपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक जांच कराने के साथ परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा आयोजित करने की मांग की गई है।

जेपीएससी के अलावा कई परीक्षाओं में गड़बड़ी

सुनवाई के दौरान वकील ने बताया कि झारखंड में छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा कि क्या मामला कई परीक्षाओं से जुड़ा है। वकील ने बताया कि एक मामला जेपीएससी और दूसरा झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (जेएसएससी) की परीक्षा से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा का भी जिक्र हुआ। सीजेआई ने पूछा कि क्या ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा भी लोक सेवा आयोग कराता है। कोर्ट ने कहा कि वह इस पहलू को भी देखेगा कि यह परीक्षा कैसे आयोजित होती है।

याचिका में क्या हैं मांगे

याचिकाकर्ता ने झारखंड के बाहर के किसी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है। प्रस्तावित समिति में फोरेंसिक विज्ञान, आईटी, परीक्षा सुरक्षा, OMR मूल्यांकन, साइबर सुरक्षा और लोक प्रशासन के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है। इसके साथ ही OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और परिणाम तैयार करने की पूरी प्रक्रिया के स्वतंत्र ऑडिट की मांग भी की गई है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका दो जुलाई को प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम जारी होने के बाद सामने आए विवाद के बीच दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, एक सफल उम्मीदवार की OMR उत्तर पुस्तिका की कार्बन कॉपी वायरल होने के बाद परीक्षा के मूल्यांकन को लेकर सवाल उठे। याचिका में दावा किया गया है कि संबंधित उम्मीदवार ने प्रथम प्रश्नपत्र में 100 में से केवल 48 सवालों के जवाब दिए थे, इसके बावजूद उसे सफल घोषित किया गया। इन कथित अनियमितताओं को लेकर रांची में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

UGC के नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही बड़ी बात

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देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर केंद्र सरकार फिर से विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्र ने यह जानकारी दी। इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन नियमों पर अंतरिम रोक भी लगा चुका है।

केंद्र सरकार का बड़ा बयान

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की ओर से जारी किए गए 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' को लेकर पूरे देश में बड़े स्तर पर बवाल देखने को मिला था। इन नियमों पर सवर्णों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद यूजीसी के नियमों का ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। अब गुरुवार को इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई हुई जिसके दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है।

नियमों पर फिर से विचार कर रही सरकार

गुरुवार को यूजीसी के नियमों पर हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह UGC के 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' पर फिर से विचार कर रही है, जिनपर कोर्ट ने अभी रोक लगा रखी है। केंद्र सरकार और UGC की ओर से सुनवाई में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि फैसला क्या होगा, लेकिन हम इस पर फिर से विचार कर रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्तों में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह सभी याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को शामिल करते हुए एक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने ये भी कहा है कि हलफनामे की कॉपी याचिकाकर्ताओं को भी देनी होंगी। याचिकाकर्ता उसके बाद दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।

जनवरी में नियमों पर लगाई गई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट इसी साल जनवरी में इन नियमों पर रोक लगा चुका है। कोर्ट ने कहा था कि नियमों का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने वाला हो सकता है। साथ ही, रैगिंग को इन नियमों के दायरे से बाहर रखने पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह भी निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक UGC के इस बारे में 2012 के नियम लागू रहेंगे।

क्या हैं UGC के 2026 नियम?

यूजीसी ने ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से बनाए थे। इनका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसा तंत्र तैयार करना था, जिससे किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। ये नियम जनवरी 2026 में लागू किए गए थे और इन्होंने यूजीसी के पुराने 2012 वाले नियमों की जगह ली थी।

JPSC परीक्षा में गड़बड़ी का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, जनहित याचिका दायर

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएमसी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) परीक्षा में कथित गड़बड़ी को लेकर रांची में छात्रों का प्रदर्शन जारी है। इस बीच ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन ने याचिका दाखिल की है। इस याचिका में नए सिरे से परीक्षा के आयोजन और मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है।

48 सवालों के जवाब देने पर ही पास हो गया एक कैंडिडेट

बता दें कि ये मामला JPSC की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 से जुड़ा है। यह परीक्षा 19 अप्रैल 2026 को हुई थी और इसका प्रारंभिक रिजल्ट 2 जुलाई 2026 को जारी किया गया था। रिजल्ट आने के बाद एक सफल उम्मीदवार की OMR शीट की कार्बन कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल होने की खबर सामने आई थी। फिर आरोप लगा कि उम्मीदवार ने पहले पेपर में 100 में से सिर्फ 48 सवालों के जवाब दिए, फिर भी वह परीक्षा में सफल घोषित हुआ।

याचिका में क्या मांग की गई?

अब सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर याचिका दायर की गई है। याचिका में 9 अप्रैल 2026 को हुई प्रारंभिक परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की गई है। याचिका में खास तौर पर प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, OMR शीट की कस्टडी और मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने जांच की जिम्मेदारी CBI को सौंपने या सुप्रीम कोर्ट या झारखंड से बाहर के किसी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र कमेटी गठित करने की मांग की है।

परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने की मांग

याचिका में प्रारंभिक परीक्षा रद्द कर नए सिरे से परीक्षा कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि नई परीक्षा अदालत की निगरानी में तय सुरक्षा उपायों के साथ कराई जाए। इसके अलावा OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और रिजल्ट तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग भी की गई है।

परीक्षा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से परीक्षा से जुड़े सभी भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश देने की मांग की गई है।परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज, डिस्पैच रजिस्टर, स्कैनिंग रिकॉर्ड, समेत तमाम इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं। परीक्षा से जुड़े सभी डिजिटल रिकॉर्ड संरक्षित किए जाने की भी मांग की गी है।

आसाराम को अंतरिम राहत देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, राजस्थान सरकार को जारी किया नोटिस

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धर्मगुरु आसाराम बापू को र नाबालिग दुष्कर्म मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मेडिकल आधार पर मांगी गई अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने आसाराम की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी करते हुए राजस्थान सरकार से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट का जमानत देने से इनकार

शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और कहा है कि यदि आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर होती है या जान को खतरा होता है, तभी जमानत पर विचार किया जाएगा। याचिका में उन्होंने 2013 में एक नाबालिग के रेप केस में हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी सजा और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया था।

पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और शील नागू शामिल हैं। इस बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अभी जमानत पर कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा। पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा और उसके बाद ही आगे विचार किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत के मामलों में यह देखा जाता है कि क्या कोई गंभीर आवश्यकता है, जैसे जीवन पर खतरा आदि।

UPI पर चार्ज लगाए जाने पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र व आरबीआई से मांगा जवाब

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई पेमेंट पर MDR लगाने पर रोक लगाने से फ‍िलहाल इनकार कर द‍िया है। हालांक‍ि, सीजेआई सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ इंड‍िया यानी NPCI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इन्‍हें चार हफ्ते में यह बताने को कहा है क‍ि चार्ज क्‍यों लगाना जरूरी है।

केंद्र सरकार ने ये फैसला लिया है कि 15 अक्टूबर से ₹2,000 से ज़्यादा के कुछ खास UPI 'पर्सन-टू-मर्चेंट' ट्रांजैक्शन पर MDR लगाया जाना है। शुल्क लगाने की केंद्र सरकार की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 हफ्ते के भीतर मांगा हलफनामा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला कानूनी से ज्यादा तकनीकी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समेत सभी पक्षों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस रिट याचिका पर ये नोटिस जारी किया है जिसमें केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा 14 और 15 सितंबर को जारी उन गजट नोटिफिकेशन्स को रद्द करने की मांग की गई है, जिनमें 2,000 रुपये से ज्यादा के कमर्शियल UPI ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने की घोषणा की गई थी।

क्या है याचिकाकर्ता की दलील

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि UPI के आने के बाद ब्लैक मनी से जुड़े ट्रांजैक्शन में कमी आई है। याचिका में नई MDR व्यवस्था के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI भुगतान पर शुल्क लगाने का फैसला पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लिया गया। शुल्क लगाने से अर्थव्यवस्था में नकदी और काले धन के लेन-देन में बढ़ोतरी हो सकती है, और व्यापारी इस अतिरिक्त लागत का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं।

क्या बोली सरकार?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि डेबिट/क्रेडिट कार्ड से लेन-देन करने में लागत आती है। UPI भी इससे अलग नहीं है। 2 ऑपरेटर यह सेवा देते हैं। एक तो बैंक हैं। यह भारत सरकार द्वारा की जाने वाली वैधानिक वसूली नहीं है। यह प्लेयर्स के बीच सेटलमेंट फीस है, जिसे NPCI सुविधाजनक बनाता है। सरकार इसमें से एक रुपया भी नहीं ले रही है।

क्या है मामला

इस महीने की शुरुआत में, केंद्र सरकार ने UPI के लिए एक नया फ्रेमवर्क घोषित किया, जिसके तहत ₹2,000 से ज़्यादा के UPI पेमेंट पर 0.4% का MDR लगेगा। सरकार का कहना है कि व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांजैक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार के अनुसार, ट्रांसफर की गई रकम चाहे कितनी भी हो, सभी व्यक्ति-से-व्यक्ति ट्रांज़ैक्शन के लिए UPI पूरी तरह से मुफ़्त बना रहेगा। MDR मर्चेंट पेमेंट सिस्टम का एक चार्ज है, न कि UPI पेमेंट करने वाले ग्राहकों से लिया जाने वाला शुल्क। बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि मर्चेंट MDR का बोझ ग्राहकों पर न डालें, जबकि UPI ऐप्स को प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए चार्ज लगाने से मना किया गया है।

जेल से बाहर नहीं आ पाएगा अबू सलेम, हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया झटका

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साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी और गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे सालेम की समय पूर्व रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अबू सलेम जेल से बाहर नहीं आ सकेगा. उसका कानूनी तिकड़म फेल हो गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

अबू सलेम की समय से पहले रिहाई वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। उसकी याचिका पहले बॉम्बे हाई कोर्ट से भी खारिज हुई थी। जिसके बाद अबू सलेम के वकील ने सर्वोच्च अदालत का रुख किया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रिहा ना करने का फैसला बरकरार रखा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सलेम की रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के निर्णय में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि मानने से इनकार कर दिया।

नासिक सेंट्रल जेल में बंद है सलेम

बता दें कि अबू सलेम अभी नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। सलेम ने पुर्तगाल से हुए प्रत्यर्पण संधि के तहत 25 साल की सजा पूरी होने का दावा करते हुए रिहाई की याचिका भी लगाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

2030 में अबू सलेम की सजा का 25 साल होगा पूरा

अबू सलेम की तरफ से कहा गया है कि सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर उसने 25 साल की सजा पूरी कर ली है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा था कि उसकी याचिका समय से पहले दायर की गई है, उसकी 25 साल की अवधि 2030 में पूरी होगी। सलेम ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

JPSC परीक्षा विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBI जांच की मांग वाली याचिका पर केंद्र और झारखंड सरकार को नोटिस

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षा में कथित गड़बड़ी का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जेपीएससी की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच का अनुरोध करने वाली याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में 19 अप्रैल 2026 को आयोजित 14वीं जेपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक जांच कराने के साथ परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा आयोजित करने की मांग की गई है।

जेपीएससी के अलावा कई परीक्षाओं में गड़बड़ी

सुनवाई के दौरान वकील ने बताया कि झारखंड में छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा कि क्या मामला कई परीक्षाओं से जुड़ा है। वकील ने बताया कि एक मामला जेपीएससी और दूसरा झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (जेएसएससी) की परीक्षा से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा का भी जिक्र हुआ। सीजेआई ने पूछा कि क्या ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा भी लोक सेवा आयोग कराता है। कोर्ट ने कहा कि वह इस पहलू को भी देखेगा कि यह परीक्षा कैसे आयोजित होती है।

याचिका में क्या हैं मांगे

याचिकाकर्ता ने झारखंड के बाहर के किसी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है। प्रस्तावित समिति में फोरेंसिक विज्ञान, आईटी, परीक्षा सुरक्षा, OMR मूल्यांकन, साइबर सुरक्षा और लोक प्रशासन के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है। इसके साथ ही OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और परिणाम तैयार करने की पूरी प्रक्रिया के स्वतंत्र ऑडिट की मांग भी की गई है।

क्या है पूरा मामला?

याचिका दो जुलाई को प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम जारी होने के बाद सामने आए विवाद के बीच दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, एक सफल उम्मीदवार की OMR उत्तर पुस्तिका की कार्बन कॉपी वायरल होने के बाद परीक्षा के मूल्यांकन को लेकर सवाल उठे। याचिका में दावा किया गया है कि संबंधित उम्मीदवार ने प्रथम प्रश्नपत्र में 100 में से केवल 48 सवालों के जवाब दिए थे, इसके बावजूद उसे सफल घोषित किया गया। इन कथित अनियमितताओं को लेकर रांची में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

UGC के नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही बड़ी बात

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देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर केंद्र सरकार फिर से विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्र ने यह जानकारी दी। इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन नियमों पर अंतरिम रोक भी लगा चुका है।

केंद्र सरकार का बड़ा बयान

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की ओर से जारी किए गए 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' को लेकर पूरे देश में बड़े स्तर पर बवाल देखने को मिला था। इन नियमों पर सवर्णों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद यूजीसी के नियमों का ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। अब गुरुवार को इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई हुई जिसके दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है।

नियमों पर फिर से विचार कर रही सरकार

गुरुवार को यूजीसी के नियमों पर हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह UGC के 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' पर फिर से विचार कर रही है, जिनपर कोर्ट ने अभी रोक लगा रखी है। केंद्र सरकार और UGC की ओर से सुनवाई में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि फैसला क्या होगा, लेकिन हम इस पर फिर से विचार कर रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्तों में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह सभी याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को शामिल करते हुए एक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने ये भी कहा है कि हलफनामे की कॉपी याचिकाकर्ताओं को भी देनी होंगी। याचिकाकर्ता उसके बाद दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।

जनवरी में नियमों पर लगाई गई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट इसी साल जनवरी में इन नियमों पर रोक लगा चुका है। कोर्ट ने कहा था कि नियमों का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने वाला हो सकता है। साथ ही, रैगिंग को इन नियमों के दायरे से बाहर रखने पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह भी निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक UGC के इस बारे में 2012 के नियम लागू रहेंगे।

क्या हैं UGC के 2026 नियम?

यूजीसी ने ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से बनाए थे। इनका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसा तंत्र तैयार करना था, जिससे किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। ये नियम जनवरी 2026 में लागू किए गए थे और इन्होंने यूजीसी के पुराने 2012 वाले नियमों की जगह ली थी।

JPSC परीक्षा में गड़बड़ी का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, जनहित याचिका दायर

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झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएमसी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) परीक्षा में कथित गड़बड़ी को लेकर रांची में छात्रों का प्रदर्शन जारी है। इस बीच ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन ने याचिका दाखिल की है। इस याचिका में नए सिरे से परीक्षा के आयोजन और मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है।

48 सवालों के जवाब देने पर ही पास हो गया एक कैंडिडेट

बता दें कि ये मामला JPSC की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 से जुड़ा है। यह परीक्षा 19 अप्रैल 2026 को हुई थी और इसका प्रारंभिक रिजल्ट 2 जुलाई 2026 को जारी किया गया था। रिजल्ट आने के बाद एक सफल उम्मीदवार की OMR शीट की कार्बन कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल होने की खबर सामने आई थी। फिर आरोप लगा कि उम्मीदवार ने पहले पेपर में 100 में से सिर्फ 48 सवालों के जवाब दिए, फिर भी वह परीक्षा में सफल घोषित हुआ।

याचिका में क्या मांग की गई?

अब सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर याचिका दायर की गई है। याचिका में 9 अप्रैल 2026 को हुई प्रारंभिक परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की गई है। याचिका में खास तौर पर प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, OMR शीट की कस्टडी और मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने जांच की जिम्मेदारी CBI को सौंपने या सुप्रीम कोर्ट या झारखंड से बाहर के किसी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र कमेटी गठित करने की मांग की है।

परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने की मांग

याचिका में प्रारंभिक परीक्षा रद्द कर नए सिरे से परीक्षा कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि नई परीक्षा अदालत की निगरानी में तय सुरक्षा उपायों के साथ कराई जाए। इसके अलावा OMR स्कैनिंग, कोडिंग, मूल्यांकन और रिजल्ट तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग भी की गई है।

परीक्षा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से परीक्षा से जुड़े सभी भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश देने की मांग की गई है।परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज, डिस्पैच रजिस्टर, स्कैनिंग रिकॉर्ड, समेत तमाम इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं। परीक्षा से जुड़े सभी डिजिटल रिकॉर्ड संरक्षित किए जाने की भी मांग की गी है।

आसाराम को अंतरिम राहत देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, राजस्थान सरकार को जारी किया नोटिस

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धर्मगुरु आसाराम बापू को र नाबालिग दुष्कर्म मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मेडिकल आधार पर मांगी गई अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने आसाराम की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी करते हुए राजस्थान सरकार से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट का जमानत देने से इनकार

शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और कहा है कि यदि आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर होती है या जान को खतरा होता है, तभी जमानत पर विचार किया जाएगा। याचिका में उन्होंने 2013 में एक नाबालिग के रेप केस में हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी सजा और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया था।

पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और शील नागू शामिल हैं। इस बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अभी जमानत पर कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा। पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि पहले राज्य सरकार का पक्ष सुना जाएगा और उसके बाद ही आगे विचार किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत के मामलों में यह देखा जाता है कि क्या कोई गंभीर आवश्यकता है, जैसे जीवन पर खतरा आदि।