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वंदे मातरम्' के छंदों पर छिड़ी सियासी लड़ाई, जानें क्या है नौ दशक पुराना 1937 का प्रस्ताव?

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राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के छंदों पर देश में विवाद मचा हुआ है। विवाद की शुरुआत स्वतंत्रता दिवस के दिन कांग्रेस मुख्यालय में तिंरगा फहराने के बाद इस गीत के गायन से हुई। कार्यक्रम के दौरान सोनिया गांधी के व्यवहार का वीडिया सामने आने के बाद बवाल मच गया। इस वीडियो में दिख रहा है कि गीत की पहली दो लाइनों के गायन के बाद सोनिया गांधी बात करने लगती हैं। जबकि नए नियम के तहत इस पूरे गीत का गायन करना अनिवार्य है। इस बीच कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस पार्टी ने ये फैसला लेते हुए अपने क़रीब नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया है।

1937 के प्रस्ताव को ही मानेगी कांग्रेस

पूरा मामला स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस ऑफिस में झंडोत्तोलन के दौरान पूरा वंदे मातरम् गीत बजने पर शुरू हुआ। जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने इस गीत के दो पैराग्राफ के बाद भी इसे गाते रहने पर आपत्ति जताई। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत का अपमान करने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने जवाब में स्पष्ट किया कि उसके आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी के फैसले को आधार बनाया है। यही पुराना फैसला अब दो पद बनाम छह पद की राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

कांग्रेस का 1937 का प्रस्ताव क्या था?

1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया था। बाकी चार पदों को इस रूप में स्वीकार नहीं किया गया। उस समय गीत के आगे के हिस्से में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों को लेकर आपत्ति सामने आई थी। कांग्रेस का तर्क है कि उस समय महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख नेताओं से जुड़े फैसले के तहत शुरुआती दो पदों को ही अपनाया गया था। इसलिए पार्टी आज भी उसी परंपरा का पालन कर रही है।

'वंदे मातरम्' स्वदेशी आंदोलन के नारों की गूंज

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1875 में संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में 'वंदे मातरम्' गीत की रचना की थी। बाद में इसे उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास 'आनंद मठ' में शामिल किया था। 18वीं सदी के अंतिम दौर की कहानी कहने वाले 'आनंद मठ' उपन्यास की पृष्ठभूमि संन्यासी विद्रोह है। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में शासन के शुरुआती दशकों में इसके ख़िलाफ़ बंगाल में संन्यासी विद्रोह हुआ था। 'वंदे मातरम्' गीत 1905 से 1908 के दौरान हुए स्वदेशी आंदोलन में एक नारे के रूप में भी गूंजा और यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहराई से जुड़ता चला गया। 1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था कि जब भी किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम में वंदे मातरम् गीत को गाया जाए तब सिर्फ़ पहले दो अंतरे ही गाए जाएं। इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि गीत के पहले दो अंतरों में ऐसा कुछ नहीं है जिसे लेकर किसी को आपत्ति हो और बाद के अंतरे बहुत चर्चित नहीं हैं।

वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य

बता दें कि 'वंदे मातरम्' के पूर्ण संस्करण को हाल ही में राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है। इसके तहत सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य किया गया है। केंद्र सरकार ने 28 जनवरी को जारी दिशा-निर्देशों में वंदे मातरम् के सभी छह पदों के गायन की व्यवस्था का उल्लेख किया। जब जन गण मन के साथ वंदे मातरम् बजाया जाएगा, तो पहले राष्ट्रगीत के सभी छह पद गाए जाने की बात कही गई है। इससे पहले शुरुआती दो पदों के इस्तेमाल की व्यवस्था बताई गई थी।

संसद मार्ग थाने के बाहर धरने पर बैठे राहुल गांधी, पैलेट गन फायरिंग मामले में FIR दर्ज करने की मांग*

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जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पैलेट गन के इस्तेमाल का मुद्दा अब थाने तक पहुंच गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शुक्रवार को पीड़ित छात्र साहिल और उसके परिवार के साथ संसद मार्ग थाने पहुंचे। राहुल गांधी की मांग है कि छात्र को लगी चोटों की जांच हो और इस मामले में FIR दर्ज की जाए।

पैलेट गन पीड़ित साहिल लोचब का आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने उनकी शिकायत पर FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया है। राहुल और साहिल पहले कनॉट प्लेस पुलिस स्टेशन गए थे, लेकिन बाद में FIR दर्ज कराने के लिए पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में DCP ऑफिस गए। इस दौरान, राहुल गांधी ने पुलिस द्वारा अब तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी।

पैलेट गन फायरिंग में घायल युवक के साथ धरने पर बैठे

कथित पैलेट गन फायरिंग में घायल हुए युवक के साथ राहुल गांधी पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन पहुंचकर उन्होंने अधिकारियों से फायरिंग करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। राहुल गांधी ने दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट सीपी नुपुर प्रसाद से मुलाकात की। उन्हें चार्ज संभाले अभी दो दिन ही हुए हैं। मुलाकात के बाद राहुल गांधी बाहर आए और यहां पहुंचने के बाद अचानक बाहर ही बैठ गए।

राहुल पहले भी उठे चुके हैं ये मामला

राहुल गांधी के साथ मौजूद साहिल वही छात्र है, जिसे लेकर कांग्रेस नेता पहले भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं। राहुल गांधी ने उस दौरान छात्र के शरीर पर चोटों के निशान दिखाते हुए दावा किया था कि ये पैलेट गन के छर्रों से लगी चोटें हैं। उनका आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ और साहिल की आंख की रोशनी भी बुरी तरह प्रभावित हुई। अब राहुल गांधी चाहते हैं कि पुलिस मेडिकल जांच और दूसरे सबूतों के आधार पर यह साफ करे कि छात्र को चोट किस चीज से लगी और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए गठित की हाई पावर एक्सपर्ट कमेटी

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा तथा पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई की जांच के लिए एक पांच सदस्यीय हाई पावर एक्सपर्ट कमेटी (एचपीईसी) का गठन किया है। कमेटी यह जांच करेगी कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों ने जरूरत से ज्यादा या अनुचित बल का इस्तेमाल तो नहीं किया। इसमें पैलेट गन, बिजली के डंडे, लाठी और आंसू गैस के इस्तेमाल की परिस्थितियों की भी जांच होगी। यह देखा जाएगा कि इनका इस्तेमाल पर्याप्त चेतावनी दिए बिना या जरूरत से अधिक तो नहीं किया गया।

क्या है पैलेट गन विवाद?

बता दें कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा NEET पेपर लीक को लेकर 20 जुलाई को आयोजित 'चलो संसद' मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाने का आरोप है। मीडिया रिपोर्ट में घायलों के बयानों और मेडिकल रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि 20 जुलाई के मार्च के दौरान कई प्रदर्शनकारी पैलेट गन से घायल हुए थे। रिपोर्ट्स में दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल की बात कही जा रही है, जबकि दिल्ली पुलिस ने इस तरह के हथियार के इस्तेमाल से इनकार किया और कहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उनके पास न तो पैलेट गन हैं और न ही वे इनका इस्तेमाल करते हैं।

UGC के नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही बड़ी बात

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देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर केंद्र सरकार फिर से विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्र ने यह जानकारी दी। इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन नियमों पर अंतरिम रोक भी लगा चुका है।

केंद्र सरकार का बड़ा बयान

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की ओर से जारी किए गए 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' को लेकर पूरे देश में बड़े स्तर पर बवाल देखने को मिला था। इन नियमों पर सवर्णों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद यूजीसी के नियमों का ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। अब गुरुवार को इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई हुई जिसके दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है।

नियमों पर फिर से विचार कर रही सरकार

गुरुवार को यूजीसी के नियमों पर हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह UGC के 'इक्विटी रेगुलेशंस, 2026' पर फिर से विचार कर रही है, जिनपर कोर्ट ने अभी रोक लगा रखी है। केंद्र सरकार और UGC की ओर से सुनवाई में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि फैसला क्या होगा, लेकिन हम इस पर फिर से विचार कर रहे हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्तों में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह सभी याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को शामिल करते हुए एक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने ये भी कहा है कि हलफनामे की कॉपी याचिकाकर्ताओं को भी देनी होंगी। याचिकाकर्ता उसके बाद दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।

जनवरी में नियमों पर लगाई गई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट इसी साल जनवरी में इन नियमों पर रोक लगा चुका है। कोर्ट ने कहा था कि नियमों का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने वाला हो सकता है। साथ ही, रैगिंग को इन नियमों के दायरे से बाहर रखने पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह भी निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक UGC के इस बारे में 2012 के नियम लागू रहेंगे।

क्या हैं UGC के 2026 नियम?

यूजीसी ने ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से बनाए थे। इनका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसा तंत्र तैयार करना था, जिससे किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। ये नियम जनवरी 2026 में लागू किए गए थे और इन्होंने यूजीसी के पुराने 2012 वाले नियमों की जगह ली थी।

1984 दंगों में उम्रकैद काट रहे कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का निधन, तिहाड़ जेल में थे बंद

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पूर्व सांसद और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार का निधन हो गया है। उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया था, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार 1984 के सिख-विरोधी दंगों को लेकर तिहाड़ जेल में काट रहे थे सजा।

7 सालों से तिहाड़ जेल में थे बंद

1984 सिख विरोधी दंगा मामले में वह तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। सज्जन कुमार 7 सालों से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद थे। दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उन्होंने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी। लेकिन उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। 27 अप्रैल 2022 को उन्हें दंगों से संबंधित एक मामले में जमानत मिली, लेकिन दूसरे मामले में दोषी ठहराए जाने की वजह से वह जेल में ही बंद रहे।

सिख दंगों में क्या रही थी भूमिका?

कोर्ट ने उनको 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुंदीप सिंह की हत्या में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया था। तीन बार सांसद रह चुके सज्जन कुमार को भीड़ को जसवंत सिंह और उनके परिवार को निशाना बनाने वाली भीड़ को उकसाने का दोषी पाए जाने पर उनको आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। तौर पर सिखों के घरों की पहचान करवाकर भीड़ को हमले के लिए उकसाया था। आरोप ये भी थे कि सज्जन सिंह के समर्थकों ने दिल्ली में वोटर लिस्ट के जरिए सिखों के घर और बिजनेस की पहचान की और उनमें तोड़फोड़ की या आग लगा दी। कई सिखों को उनके घरों से निकालकर मारा गया।

कांग्रेस ने वंदे मारतम् के दो टुकड़े किए...” अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- 1937 वाली नीति नहीं चलेगी

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस के रुख पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के दो टुकड़ किए हैं। यह देश विरोधी फैसला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का महान वंदेमातरम गीत के दो ही छंद गाने का फैसला तुष्टिकरण की राजनीति है।

वंदे मातरम के दो टुकड़े कर विभाजन की नींव डाली

तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने 1937 के अपने प्रस्ताव को आधार बनाते हुए वंदे मातरम के केवल दो पद गाने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में मुसलमानों को खुश करने के लिए वंदे मातरम को बांटने का फैसला किया गया था और इससे देश के विभाजन की नींव पड़ी।

1937 के गलत फैसले को 80 साल बाद सुधारा-अमित शाह

अमित शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति में लिए गए फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि देश में तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी। उनके 1937 में लिए गए फैसले को पीएम मोदी ने आजादी के 80 साल बाद सुधारा है। गृह मंत्री ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए कांग्रेस की उस गलती को सुधारा है और इसे कानूनी आधार भी दिया है।

कानून को नकार रही कांग्रेस-अमित शाह

शाह ने कहा कि कांग्रेस एक तरफ अपने 1937 के प्रस्ताव को लागू कर रही है, जबकि दूसरी तरफ संसद द्वारा बनाए गए कानून को नकार रही है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक बार फिर तुष्टिकरण की राजनीति को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा, देश एक बार वंदे मातरम को दो हिस्सों में बंटने देने की गलती कर चुका है और हमने इसके नतीजे भुगते हैं। शाह ने लोगों से कांग्रेस के इस फैसले के खिलाफ एकजुट होने की अपील की

क्या है वंदे मातरम् पर कांग्रेस का फैसला?

दरअसल, कांग्रेस ने बुधवार को कहा था कि वह ‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और उस समय के अन्य प्रमुख नेताओं द्वारा किए गए फैसले का पूरी तरह पालन करेगी। इसी के अनुरूप पार्टी कार्यकर्ता राष्ट्रगीत के सिर्फ दो अंतरे ही गाएंगे। वंदे मातरम् में 6 अंतरा हैं। कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में इसको लेकर चर्चा हुई और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 1937 के सीडब्ल्यूसी के उस प्रस्ताव के कुछ अंश भी पढ़े जो महान नेताओं की मौजूदगी में पारित हुआ था और जिसमें वंदे मातरम् के दो अंतरों के गायन का निर्णय लिया गया था।

भारत ने सुरक्षा परिषद में विस्तार के समर्थन में फिर उठाई आवाज, आतंकवाद पर भरी हुंकार

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भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (USNC) में सुधारों के पक्ष में जोरदार तरीके से मांग उठाई है। UNSC के कामकाज के तरीकों पर सालाना खुली बहस में भारत ने कहा कि आज सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा साफ और जरूरी हो गई है।

सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव पर जोर

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की चार्ज डी अफेयर योजना पटेल ने जोर देकर मांग की कि UNSC को आज और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए सही ढंग से तैयार किया जाए। भारतीय राजदूत ने 1945 में बने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव पर जोर दिया और कहा कि दुनिया अब पूरी तरह बदल चुकी है। योजना पटेल ने कहा कि सदस्य देशों के नागरिकों के मन में सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता,असरदार होने और उसके फैसले लेने के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। इसकी मुख्य वजह है कि यह अहम संस्था दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे झगड़ों में असरदार ढंग से दखल नहीं दे पाई है।

अस्थायी सदस्यों को भी अधिकार देने की मांग

इसके साथ ही उन्होंने दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाने वाले अस्थायी सदस्यों को दस्तावेजों तक पहुंच की मांग की। उन्होंने कहा, ऐतिहासिक दस्तावेजों तक पहुंच केवल कुछ ही लोगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सुरक्षा परिषद की प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की। 'लिस्टिंग' और 'डी-लिस्टिंग' का उदाहरण देते हुए भारतीय राजदूत ने कहा कि सुरक्षा परिषद को संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने का मंच नहीं बनना चाहिए।

आतंकवाद पर राजनीतिक दखल पर कड़ी आपत्ति

भारत ने यूएनएससी में आतंकियों की लिस्टिंग को लेकर चीन और पाकिस्तान पर निशाना साधा है। यूएनएससी में भारत की सीडीए यानी कार्यवाहक राजदूत योजना पटेल ने पाकिस्तान-चीन का नाम लिए बगैर उन्हें अच्छे से धोया है। उन्होंने सुरक्षा परिषद में आतंकियों की लिस्टिंग-डीलिस्टिंग को राजनीति से दूर रखने की हिदायत दी है। साथ ही राजनीतिक दखल पर कड़ी आपत्ति जताई। भारत ने बिना नाम लिए बिना कहा कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता का इस्तेमाल आतंकियों को बचाने या उन्हें डीलिस्ट कराने के लिए नहीं होना चाहिए।

होर्मुज में अमेरिकी ने चली नई चाल, बनाया सीक्रेट शिपिंग कॉरिडोर, रोज निकाल रहा लाखों बैरल तेल

#unitedstatesfindsnewwayinstraitofhormuzstealthoperationtotransport_oil

ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच अमेरिका ने बड़ी चाल चली है। यूएस ने होर्मुज स्ट्रेट में तेल की आवाजाही के लिए एक गुप्त शिपिंग कॉरिडोर तैयार किया है। अमेरिकी सेना ओमान के तट के पास स्ट्रेट के दक्षिणी हिस्से से हर रात तेल टैंकरों को सुरक्षित निकाल रही है।

रोजाना लगभग 1 करोड़ बैरल तेल निकल रहा

अमेरिकी मीडिया आउटलेट Axios ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों में चल रहे इस ऑपरेशन के तहत हर रात 15 से 20 टैंकर ओमान के तट के पास एक दक्षिणी चैनल से इस जलडमरूमध्य में आ-जा रहे हैं। अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि रोजाना लगभग 1 करोड़ बैरल तेल इस जलडमरूमध्य से बाहर निकालकर वैश्विक ऊर्जा बाजार में भेजा जा रहा है। यह मात्रा युद्ध शुरू होने के पहले की आधा है।

वैश्विक आपूर्ति में आया फर्क

हालांकि, तेल निकाले जाने की मात्रा अभी भी पुराने स्तर से कम है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति में फर्क साफ दिख रहा है। यह सिर्फ भरे हुए टैंकरों की सुरक्षा नहीं है। अमेरिकी सेना खाली टैंकरों को भी अरब सागर से होर्मुज होते हुए खाड़ी में ले जा रही है। वहां वे तेल भरकर वापस बाहर निकलते हैं। अधिकारियों ने इसे बड़ी कामयाबी बताया है, क्योंकि इससे वैश्विक आपूर्ति में आ रही समस्या के अंतर को कम किया जा रहा है।

दो महीने से जारी है ये ऑपरेशन

एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया- ‘अमेरिका दो महीने से होर्मुज के दक्षिणी लेन को नियंत्रित कर रहे हैं। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स परेशान तो करती है, लेकिन जलडमरूमध्य पर उनका कंट्रोल नहीं है, बल्कि कंट्रोल हमारे पास है।’ यह टास्क फोर्स नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग स्थित आर्मी हेडक्वार्टर से चल रही है। यह खाड़ी के सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम कर रही है।

अमेरिकी सेना की निगरानी में निकाले जा रहे टैंकर

हर रात जहाजों की आवाजाही के लिए अलग-अलग समय तय किया जाता है। इसके बाद अमेरिकी सेना की निगरानी में टैंकरों को होर्मुज के दक्षिणी चैनल से निकाला जाता है। अमेरिकी वायुसेना के लड़ाकू विमान ईरानी क्रूज मिसाइलों और ड्रोनों से सुरक्षा करते हैं। यह ऑपरेशन इसलिए संभव हुआ क्योंकि अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने हाल में दो हफ्ते के अभियान में ईरान के रडार और समुद्री निगरानी सिस्टम को काफी नुकसान पहुंचाया।

अमेरिका में आरएसएस पर बैन की मांग, 29 अगस्त को भागवत के न्यूयॉर्क दौरे से पहले USCIRF सख्त

#usreligiousfreedombodyuscirfdemandsrss_ban

अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग यानी USCIRF ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। आयोग ने अमेरिकी सरकार से आरएसएस नेताओं को राजनयिक सम्मान नहीं देने और उनके साथ उच्चस्तरीय बैठकें नहीं करने को कहा है। यह मांग आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के इसी महीने वाले होने वाले अमेरिका दौरे से कुछ दिन पहले उठी है।

आरएसएस नेताओं से दूरी बनाने की मांग

USCIRF के पाकिस्तानी मूल के अध्यक्ष आसिफ महमूद ने आरएसएस को एक ऐसा मुख्य संगठन बताया जिसके सहयोगी संगठनों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं। महमूद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस के सदस्य हैं। USCIRF के कमिश्नर जीन मिल्स ने कहा कि आरएसएस नेताओं के साथ उच्च-स्तरीय बैठकें या राजनयिक शिष्टाचार का सम्मान नहीं दिया जाना चाहिए, भले ही वे भारत सरकार से जुड़े हों।

आरएसएस पर अल्पसंख्यकों पर हमले के आरोप- आसिफ महमूद

यूएससीआईआरएफ के चेयरमैन आसिफ महमूद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस के सदस्य हैं। उन्होंने आरएसएस को एक 'अंब्रेला ऑर्गनाइजेशन' यानी ऐसा मुख्य संगठन बताया, जिसके सहयोगी संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करने के आरोप लगते रहे हैं। जिसमें ईसाई और मुस्लिम शामिल हैं। अब आरएसएस नेता मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा की योजना है।

आरएसएस पर बैन की मांग

जीन मिल्स ने आगे कहा कि इसके बजाय अमेरिकी सरकार को उन आरएसएस सदस्यों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए जो धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाए गए हैं। USCIRF के अलावा मानवाधिकार समूह हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स ने भी भागवत के दौरे का विरोध किया है। संगठन ने कहा कि इसे मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ RSS नेटवर्क की हिंसा से अलग नहीं किया जा सकता।

भागवत के अमेरिका दौरे से से पहले उठी मांग

महमूद का यह बयान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे से कुछ दिन पहले आया है। भागवत 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के दौरे पर जाएंगे। भागवत 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) के ‘यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशंस’ कार्यक्रम में शामिल होंगे।

100 से ज्यादा संगठनों ने भागवत के दौरे का समर्थन किया

कनाडा के 100 से ज्यादा संगठनों ने RSS प्रमुख मोहन भागवत के प्रस्तावित दौरे का समर्थन किया है। उन्होंने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और मंत्रियों को पत्र लिखकर भागवत को रोकने की मांगों को खारिज करने की अपील की। संगठनों ने कहा कि किसी व्यक्ति पर कार्रवाई से पहले स्वतंत्र और विश्वसनीय सबूतों के साथ कानून और उचित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।

कोलकाता में भीषण अग्निकांड, होटल में आग लगने से 9 बांग्लादेशी नागरिकों की दर्दनाक मौत

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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में आज भयंकर आग लगी। इस दर्दनाक हादसे में 2 महिलाओं और 1 बच्चे समेत 9 लोगों की मौत हो गई। हादसे में छह लोग घायल हुए हैं। जिस इलाके में आग लगी है, वह कोलकाता का व्यक्त इलाका है। पास में ही एक नामी स्कूल भी है और पश्चिम बंगाल फायर डिपार्टमेंट का हेडक्वार्टर भी नजदीक है।

रात करीब 2 बजे लगी आग

कोलकाता के मिर्जा गालिब स्ट्रीट स्थित एक होटल में रात करीब 2 बजे आग लगी। पुलिस के मुताबिक, आग रात करीब 1:45 बजे लगी। सूचना मिलते ही दमकल की पांच गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। पुलिस और आपदा प्रबंधन विभाग की टीमों ने राहत और बचाव अभियान शुरू किया। अधिकारियों ने बताया कि इमारत से करीब 80 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है।

मरने वाले सभी बांग्लादेशी नागरिक

समाचार एजेंसी एनआई की मानें तो मरने वालों की पहचान बांग्लादेशी नागरिकों के तौर पर हुई है। ये सभी बांग्लादेशी इलाज के लिए कोलकाता आए थे। होटल के गेस्ट गहरी नींद में सो रहे थे, जिससे कई मेहमान इमारत के अंदर फंस गए और बड़े पैमाने पर बचाव अभियान शुरू करना पड़ा।

एसी विस्फोट के कारण आग लगने की आशंका

शुरुआती खबरों से पता चलता है कि आग एयर-कंडीशनर में विस्फोट के कारण लगी हो सकती है, हालांकि आग लगने की सही वजह की अभी पुष्टि नहीं हुई है। यह घटना पश्चिम बंगाल में एक और होटल में आग लगने के ठीक दो दिन बाद हुई है। सोमवार को बीरभूम जिले के तारापीठ स्थित एक होटल में कथित तौर पर शॉर्ट सर्किट के कारण कम से कम 7 लोगों की मौत हो गई थी।

राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों का ऐलान, 17 खिलाड़ियों को अर्जुन अवॉर्ड, खेल रत्न के लिए कोई नाम नहीं

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भारतीय खेल मंत्रालय ने 2025 के नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड का ऐलान कर दिया है। इस बार 17 खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार के लिए चुना गया है। अर्जुन अवॉर्ड के अलावा तीन कोच को द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए चुना गया है। हालांकि, इस बार देश के सर्वोच्च खेल सम्मान मेजर ध्यानचंद खेल रत्न के लिए किसी खिलाड़ी का चयन नहीं किया गया।

17 खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार

भारत के उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर, सरकार ने अलग-अलग श्रेणी में खिलाड़ियों, कोच और संस्थाओं को अवॉर्ड देने का फैसला किया है। अर्जुन पुरस्कार के लिए इस बार अलग-अलग खेलों से 17 खिलाड़ियों को चुना गया है। इनमें एथलेटिक्स, बैडमिंटन, बॉक्सिंग, शतरंज, हॉकी, कबड्डी, पैरा-स्पोर्ट्स, रोइंग और शूटिंग जैसे खेलों के खिलाड़ी शामिल हैं।

अर्जुन पुरस्कार के लिए 17 खिलाड़ियों का चयन

अर्जुन पुरस्कार पाने वाले खिलाड़ियों में तेजस्विन शंकर, प्रियंका गोस्वामी, मुहम्मद अजमल, नरेंद्र, विदित गुजराती, दिव्या देशमुख, धनुष श्रीकांत, राजकुमार पाल, सुरजीत, रुद्रांश खंडेलवाल, एकता भ्यान, अरविंद सिंह, अखिल श्योराण, ट्रीसा जॉली, गायत्री गोपीचंद, लालरेमसियामी और पूजा शामिल हैं। यह पुरस्कार पिछले चार वर्षों में शानदार प्रदर्शन के साथ-साथ नेतृत्व क्षमता, खेल भावना और अनुशासन के लिए दिया जाता है।

खेल रत्न इस बार किसी के नाम नहीं

राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों में इस बार सबसे ज्यादा चर्चा खेल रत्न पुरस्कार नहीं दिए जाने को लेकर है। मंत्रालय ने मेजर ध्यानचंद खेल रत्न के लिए किसी भी खिलाड़ी को योग्य नहीं माना। हॉकी स्टार हार्दिक सिंह का नाम देश के सर्वोच्च खेल सम्मान के लिए चर्चा में था, लेकिन अंतिम लिस्ट में उन्हें जगह नहीं मिली। ऐसा लंबे समय बाद हुआ है जब किसी भी खिलाड़ी को खेल रत्न से सम्मानित नहीं किया जाएगा। इससे पहले 2014 में ऐसा हुआ था, जब इस पुरस्कार के लिए कोई नाम घोषित नहीं किया गया था।

इस बार अर्जुन पुरस्कार में नहीं कोई क्रिकेटर

राष्ट्रीय खेल पुरस्कार 2025 की एक और बड़ी खासियत यह है कि 17 अर्जुन पुरस्कार विजेताओं में एक भी क्रिकेटर नहीं है। 2023 में तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी के बाद लगातार तीसरे साल अर्जुन पुरस्कार की लिस्ट में किसी क्रिकेटर का नाम नहीं आया है। यह ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय क्रिकेट के कई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं।