भारत बना ईरान-यूएई के बीच 'मध्यस्थ', दिल्ली में ब्रिक्स समिट की अहम कामयाबी
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नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच भारत ने उस वक्त बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की, जब पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर आमने-सामने खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात एक साझा ब्रिक्स घोषणा पर सहमत हो गए। पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ईरान के बीच गंभीर मतभेद देख जा रहे हैं। युद्ध और लगातार बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच सहमति बनना सिर्फ ब्रिक्स के लिए नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
ईरान-यूएई को एक साथ लाना था चुनौती
ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और यूएई के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी। ऐसे में दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर ईरान और यूएई समेत ब्रिक्स के सभी सदस्य देश एक साथ खड़े हो सकें। अंतिम घोषणा में किसी एक देश को सीधे तौर पर युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर सामूहिक चिंता जताई गई। सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं।
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ईरानी राष्ट्रपति और यूएई के क्राउन प्रिंस की मुलाकात
इसी बीच दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट के दौरान एक अप्रत्याशित राजनयिक क्षण सामने आया। यूएई के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने ब्रिक्स सिखर सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान से मुलाकात की, जिसमें दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, तनाव कम करने, स्थिरता और क्षेत्रीय शांति और विकास की दिशा में किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा की। युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह सबसे महत्वपूर्ण संपर्कों में से एक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय संघर्ष ने ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों को बेहद संवेदनशील बना दिया है।
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भारत की भूमिका क्यों अहम?
नई दिल्ली के संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के साथ गहरे रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, साथ ही ईरान के साथ भी उसके दीर्घकालिक संबंध बने हुए हैं। इसके अलावा, भारत के अमेरिका, रूस और इज़राइल के साथ भी घनिष्ठ साझेदारी है। इससे भारत को राजनयिक स्तर पर ऐसी पहुँच प्राप्त है जो कई अन्य देशों के पास नहीं है। चुनौती यह है कि उस पहुंच का उपयोग इस तरह से किया जाए कि ऐसा न लगे कि आप किसी का पक्ष ले रहे हैं। नई दिल्ली ने ईरान और अमेरिका या ईरान और अरब देशों के बीच औपचारिक मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका नहीं निभाई है। इसके बजाय, उसने लगातार संवाद, कूटनीति, तनाव कम करने, नागरिकों की सुरक्षा और निर्बाध व्यापार एवं नौवहन की वकालत की है। दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत का प्रस्ताव किसी बड़े शांति समझौते की मध्यस्थता करने से कम और राजनयिक चैनलों को खुला रखने से अधिक संबंधित है।









Sep 15 2026, 16:55
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