विश्व आदिवासी दिवस, झारखंड की वो 5 आदिवासी महिलाएं जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद जल-जंगल-जमीन से लेकर ओलंपिक और FIFA तक में बनाई अम
विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) केवल अपनी परंपराओं और जड़ों को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह उस शख्सियतों पर भी गर्व करने अवसर है जिसने सीमित साधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद वैश्विक पटल पर अमिट पहचान बनाई. खासकर झारखंड जैसे राज्यों के महिलाओं की, जिसने समाज की रूढ़िवादी सोच को दरकिनार ऐसी पहचान बनाई कि दुनिया तालियां बजाने पर मजबूर हो गई. जिसने तमाम कठिनाईयों में भी हार नहीं मानी और अपनी अलग पहचान बनाई. आज हम झारखंड की उन 5 प्रमुख आदिवासी महिलाओं के बारे में जानेंगे जिनकी उपलब्धियों की गूंज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुनाई दी.
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दयामनी बारला
खूंटी और गुमला के जंगलों से उठकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचने वाली दयामनी बारला जल-जंगल-जमीन के संरक्षण की प्रतीक हैं. विश्व प्रसिद्ध स्टील दिग्गज 'आर्सेलरमित्तल' के मेगा प्रोजेक्ट के खिलाफ अपने अहिंसक जन-आंदोलन के बल पर उन्होंने कंपनी को बैकफुट पर ढकेला. उनके इस ऐतिहासिक संघर्ष के लिए अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था कल्चरल सर्वाइवल द्वारा उन्हें ''एलन लुट्ज़ इंडिजिनियस राइट्स पुरस्कार' (2013) से सम्मानित किया गया. उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय जलवायु और मानवाधिकार सम्मेलनों में स्वदेशी अधिकारों की बेबाक तरीके से उठाई.
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निक्की प्रधान
खूंटी जिले के एक बेहद छोटे से गांव हेसेल से निकलकर जब निक्की प्रधान 2016 के रियो ओलंपिक और उसके बाद 2020 के टोक्यो ओलंपिक के मैदान पर उतरीं, तो इतिहास के पन्नों में नया अध्याय जुड़ गया. वे ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली झारखंड की पहली महिला आदिवासी एथलीट बनीं. रियो से लेकर टोक्यो ओलंपिक और विश्व कप में उनके प्रदर्शन ने साबित किया कि झारखंड के गांवों की पगडंडियों से निकलने वाली महिलाओं में भी खास प्रतिभा छिपी है.
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सलीमा टेटे
सिमडेगा की बेहद साधारण परिवार से आने वाली सलीमा टेटे ने अपनी अद्भुत गति और ड्रिबलिंग से टोक्यो ओलंपिक में पूरी दुनिया का ध्यान खींचा. उनकी इसी वैश्विक पहचान और मैदान पर नेतृत्व क्षमता को देखते हुए एशियाई हॉकी महासंघ (AHF) ने उन्हें "एशिया का एथलीट एंबेसडर" नियुक्त किया. वर्तमान में वे भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी करते हुए विश्व मंच पर देश और राज्य का मान बढ़ा रही हैं.
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अष्टम उरांव
गुमला के बनासो गांव की अष्टम उरांव ने तब वैश्विक इतिहास रचा जब भारत में आयोजित फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप 2022 में वे भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की कप्तान बनीं. दुनिया के सबसे बड़े खेल संगठन 'फीफा' के मंच पर भारत का नेतृत्व करना किसी भी खिलाड़ी के लिए सर्वोच्च सपना होता है. अष्टम की इस उपलब्धि ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल जगत में झारखंडी प्रतिभा का डंका बजाया.
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जमुना टुडू
पूर्वी सिंहभूम के जंगलों को लकड़ी माफियाओं के चंगुल से बचाने के लिए 'वन सुरक्षा समितियां' बनाकर हजारों आदिवासी महिलाओं की सशस्त्र सेना खड़ी करने वाली जमुना टुडू को दुनिया 'लेडी टार्जन' के नाम से जानती है. 2019 में पद्मश्री से सम्मानित उनकी इस साहसी सामुदायिक वन-संरक्षण मॉडल की मिसाल अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलनों और वनों के संरक्षण से जुड़े वैश्विक मंचों पर प्रमुखता से दी जाती है.

विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) केवल अपनी परंपराओं और जड़ों को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह उस शख्सियतों पर भी गर्व करने अवसर है जिसने सीमित साधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद वैश्विक पटल पर अमिट पहचान बनाई. खासकर झारखंड जैसे राज्यों के महिलाओं की, जिसने समाज की रूढ़िवादी सोच को दरकिनार ऐसी पहचान बनाई कि दुनिया तालियां बजाने पर मजबूर हो गई. जिसने तमाम कठिनाईयों में भी हार नहीं मानी और अपनी अलग पहचान बनाई. आज हम झारखंड की उन 5 प्रमुख आदिवासी महिलाओं के बारे में जानेंगे जिनकी उपलब्धियों की गूंज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुनाई दी.












Aug 09 2026, 14:52
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